Monday, December 31, 2012

आज की कविता : नई दिशा

                                  - मिलन  सिन्हा 
नई दिशा 
शाम सुर्ख हो चली थी 
पक्षी अपने  नीड़  को लौट रहे थे 
मजदूर  अपने घरों को 
सभी जल्दी में थे 
कुछ बालाओं के पीछे 
कुछ लड़के भी थे 
दूरी कम करने की 
इच्छा  बलवती  थी 
बालाएं गुमसुम  थीं 
लड़के  मुखर 
एक सुझाव आया 
पकड़ो न उसका हाथ 
एक तत्पर  हुआ 
तभी उस लड़की ने अचानक घूमकर 
उस लड़के का हाथ कसकर पकड़ा 
फिर ममोड़ा 
हल्की  चीख निकली 
लड़के स्तब्ध, हतप्रभ 
लड़की अविचलित 
आत्मविश्वास से  ओतप्रोत 
लड़की बोली 
भाई, इस मोड़ से  शायद 
तुम्हारी जिंदगी में नया मोड़ आ जाए 
शायद  तुम दहेज  लेने  को आतुर बैठे 
अपने पिता का हाथ पकड़ सको 
अपनी बहन पर हो रहे 
ससुरालवालों का जुल्म रोक सको 
अपने आसपास हो रहे अन्याय को 
कुछ कम कर सको 
भ्रष्टाचार के कीचड़ के कमल बन सको 
साम्प्रदायिकता के जहर को मिटा सको 
और फिर जब तुम्हारे ये हाथ 
वाकई इतने समर्थ  एवं सक्षम हो जाये 
कि सचमुच जिस लड़की का हाथ पकड़ो 
उसका हर हाल में 
साथ निभा सको 
उसका पति  परमेश्वर नहीं 
वाकई हमसफ़र, हमराज बन सको 
तब तुम ऐसा जरूर करना 
पर चोरी छुपे नहीं 
बल्कि 
सबके सामने सर उठाकर  करना 
सच मानो, मेरे भाई 
इस देश की हर लड़की को 
ऐसे नौजवान की प्रतीक्षा है 
तुम आना 
ऐसा बन जाओ तो आना 
लड़की चली गई 
लड़के भी चुपचाप चले गए 
तमाशबीन भी चलते बने 
पर, मुझे लगा कि 
शाम  का सुर्ख  होना 
बेमानी नहीं था 
भविष्य की दिशा 
ऐसे ही निश्चित होगी शायद !

( 'हिन्दुस्तान' में 6 फ़रवरी, 2006 को प्रकाशित) 

                                                       और भी बातें करेंगे, चलते-चलते असीम शुभकामनाएं

Saturday, December 22, 2012

व्यंग्य कविताएं : हैरानी , चार फ़िल्में

                                   - मिलन सिन्हा
हैरानी
शाम को अचानक
नौकर  कहीं चला गया
मालिक इस बात से
कुछ  परेशान हो गया
लेकिन, कुछ देर बाद जब
मालिक अपनी बीबी के साथ
सिनेमा  हाल  में गया
तो यह देख कर
बिल्कुल  हैरान रह गया
कि नौकर उनके बगल में बैठा था
और  बड़े  इत्मीनान से  फिल्म
'साहब, बीबी और गुलाम ' देख रहा था !

चार  फ़िल्में
एक सिनेमा हाल में
एक के बाद एक  हुआ
चार फिल्मों का  प्रदर्शन
'आक्रोश', 'आन्दोलन',
'क्रांति' और 'अमन' !

                      और भी बातें करेंगे, चलते-चलते असीम शुभकामनाएं

Friday, December 7, 2012

लघु कविताएं : बुद्धिमान, महापुरुष, शक्तिमान, नेता

                                                           - मिलन  सिन्हा 

बुद्धिमान 
किसे कहें ?
जिसकी  बुद्धि 
दूसरे को सम्मान देने का 
साधन बन सके, 
उसे कहें !


महापुरुष 

किसे कहें ?
जो असाधारण होते हुए भी 
साधारण रहे,
साधारण दिखे, 
उसे कहें !


शक्तिमान 

किसे कहें ?
जो न किसी से डरता हो 
और 
न ही किसी  को डराता हो, 
उसे कहें !


नेता 

किसे कहें ? 
जो किसी से 
कुछ न लेता हो 
बल्कि, 
सबको  देता हो, 
उसे कहें ! 

                 और भी बातें करेंगे, चलते-चलते असीम शुभकामनाएं

Wednesday, December 5, 2012

आज की कविता : सपने बेचना

                                            - मिलन  सिन्हा 
sllepवे 
सपने बेच रहे हैं 
एक अरसे से 
बेच रहे हैं 
भोर के नहीं 
दोपहर के सपने 
बेच रहे हैं 
तरह तरह के 
रंग बिरंगे सपने 
बेच रहे हैं 
खूब बेच रहे हैं 
मनमाने भाव में 
बेच रहे हैं 
अपनी अपनी दुकानों से 
बेच रहे हैं 
मालामाल हो रहे हैं 
निरंकुश हो रहे हैं 
होते रहेंगे तबतक 
अधजगे खरीदते रहेंगे 
लोग  सपने  जबतक !

प्रवक्ता . कॉम पर प्रकाशित
                                                     और भी बातें करेंगे, चलते-चलते असीम शुभकामनाएं

Monday, December 3, 2012

आज की कविता : कारनामा

                                                                                - मिलन सिन्हा 
successउसका किसी से 
कोई बैर नहीं 
जो उससे बैर करे 
उसकी फिर खैर नहीं 
जो भी करे वह 
उसमें कोई  शोर नहीं 
पुलिस अगर तफ्तीश करे भी 
मिले कोई डोर नहीं 
सुबह देर तक सोता है 
रात  में  काम सब करता है 
बड़े गाड़ियों में घूमता है 
जब चाहे उड़ता है 
कपड़े  सफ़ेद  पहनता है 
कारनामे  अनेक  करता है 
अच्छों के  मुंह  पर
गाली  बकता है 
न जाने और क्या-क्या करता है 
ऐसे शख्स के बारे में 
और बताएं क्या 
आप जैसे समझदारों को 
और समझाएं क्या ? 

प्रवक्ता . कॉम पर प्रकाशित
                   
                     और भी बातें करेंगे, चलते-चलते असीम शुभकामनाएं

Saturday, December 1, 2012

आज की कविता : कुत्ते की मौत

                                - मिलन सिन्हा  
कुत्ते की मौत
अब 
कभी-कभार  ही कुत्ते, 
कुत्ते की मौत मरते हैं। 
कुत्ते अब नहीं भौंकते 
चोर, डाकुओं को देखकर। 
अपितु, 
वफादार, चरणदास की तरह 
दुम  हिलाते  हैं। 
आखिर, पेट का सवाल है ! 
हाँ, कुत्ते तो भौकते हैं, 
काटने को भी दौड़ते हैं, 
देखकर उन्हें, 
जो हैं सत्य, ईमान  के पक्षधर। 
ऐसे  कुत्तों से 
सहमा सहमा-सा 
डरा डरा-सा 
जिंदगी जी रहा है आदमी 
या 
मर रहा  है  यहाँ - वहाँ 
सरेआम, 
कुत्ते की मौत !

('प्रभात खबर' में 21 सितम्बर,2008 को प्रकाशित)

                           और भी बातें करेंगे, चलते-चलते असीम शुभकामनाएं

आज की कविता : सेवा में व्यापार

                                    * मिलन सिन्हा 
सेवा  में व्यापार 
इंतजार और इंतजार 
अभी  तो 
लम्बी है कतार 
लोग  ज्यादातर  फटेहाल,
लाचार और बीमार 
आसपास  फैला  है 
गन्दगी का अम्बार
सफाई के लिए 
नहीं है कोई तैयार 
अन्दर जो पड़े हैं  
कराह रहे हैं 
चीख  रहे हैं 
रह रह कर 
ऊपर  ताक  रहे हैं 
सगे  संबंधी  
आशा आशंका के बीच 
दिन काट रहे हैं 
न पर्याप्त डाक्टर, न दवाई 
सरकारी वादे, इरादे 
सब हवा हवाई 
मशीन, उपकरण 
सब पड़े हैं बेकार 
सेवा के नाम पर 
चालू  है बाकी कारोबार 
मालूम नहीं,
कब किसकी चली जाए जान  
गेट पर ही बिक रहा है 
कफ़न और बाकी सामान 
बड़ा ही अजीब है 
यहां  का माहौल 
जानने वाले बताते हैं 
रहता है ऐसा  ही 
बराबर यहां का हाल 
तभी तो कहते हैं लोग इसे 
सरकारी अस्पताल !

# प्रवासी दुनिया .कॉम पर प्रकाशित

               और भी बातें करेंगे, चलते-चलते असीम शुभकामनाएं

Saturday, November 24, 2012

व्यंग्य कविता : पहुँच वाले

                                                                      * मिलन सिन्हा 
पहुँच वाले 
ए जी, ओ जी 
हो जाओ  शुरू जी  से 
टू जी  तक पहुँच गए। 
बेईमानी  का यह खेल 
खेलते - खेलते 
कामन वेल्थ में सेंध लगा गए।
कहते हैं, 
पहुँच वाले 
अपनी  पहुँच से 
कहीं भी पहुँच जाते  हैं,
काले सफ़ेद के चक्कर में 
अन्त में, कालिख पुतवा कर 
जेल की हवा खाते हैं !
                                  और भी बातें करेंगे, चलते-चलते असीम शुभकामनाएं                        

आज की कविता : काला पानी का सच

                                                                   - मिलन सिन्हा 

जो थे राष्ट्रभक्त 
और स्वतंत्रता सेनानी 
उन्हें तो 
उठानी पड़ी थी 
अनेकानेक परेशानी।
भेज देते थे उन्हें 
बर्बर गोरे  अंग्रेज 
भोगने  काला पानी।
तथापि,
 वे सत्याग्रह करते गए 
बेशक इस क्रम में 
अनेक मर गए,
तो कुछ 
गुमनामी के अँधेरे में 
खो गए।
लेकिन,
देश को यही  लोग 
स्वाधीन कर गए।
आजाद हुआ देश
तो 
बदलने लगा परिवेश।
सब कुछ हो अपना
यही तो था 
सबका सपना।
अपना कानून, 
अपना संविधान,
अपनी बोली, 
अपना परिधान।
इस बीच,
गुजर गई आधी शताब्दी 
और 
विकास के साथ 
बढती गई हमारी आबादी।
परन्तु, 
साढ़े छह दशक बाद भी 
काला पानी ने 
न छोड़ा हमारा साथ 
काला पानी पेश करना तो अब 
हो गई  है 
शिष्टाचार की बात।
वैज्ञानिक कहते रहें 
इसे खराब 
स्टार तो हमारे 
कहते हैं इसे लाजवाब।
हो कोई क्रिकेटर 
या हो कोई फ़िल्मी एक्टर  
सबके लिए पैसा है 
बहुत बड़ा फैक्टर।
काला  पानी से 
देखिए उनका अपनापन,
हर तरफ आजकल 
छाया है उसी का  विज्ञापन।
काला पानी अब 
हम भोगते नहीं 
बल्कि 
खूब पीते हैं 
जिंदगी को ऐसे ही 
खूब मस्ती में जीते हैं।
गरीबों/ ग्रामीणों  को
मिले न मिले 
पीने को पानी
पर, हर जगह 
मिल रहा है काला पानी, 
काला पानी।  

# प्रवक्ता .कॉम पर प्रकाशित 

                        और भी बातें करेंगे, चलते-चलते असीम शुभकामनाएं                      

Thursday, November 22, 2012

आज की कविता : चौराहे पर खड़े हम

                                                                       *  मिलन  सिन्हा
garib








चौराहे पर खड़े हम
जिसके सहारे था, उसी ने मुझे बेसहारा किया
साहिल ने भी  अब  मुझसे  किनारा किया।

दिन गुजर गया, पर किसी ने खबर न ली
शाम को उसने मुझे दूर से  इशारा किया।

खट्टी-मीठी यादों का नाम है मेरी जिंदगी
यादों के सहारे ही हमने अबतक गुजरा किया।

जो  कुछ  झूठ  है, वही  सब  सच  है  यहाँ
देश के कर्णधारों (?) ने तैयार यह नारा किया।

जो गन्दा है, भूखा है, नंगा है, उसे मत देखो 
उन्होंने  हिदायत दी, पर मैंने वही दुबारा किया।

कौन  थे  वे  लोग, कहाँ  गए  वे  लोग 
जिन्होंने हमें आज चौराहे पर खड़ा किया।

#  प्रवक्ता . कॉम पर प्रकाशित

                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते। असीम शुभकामनाएं

Thursday, November 15, 2012

देश के गरीब बच्चों के लिए कब मनायेंगे बाल दिवस ?

                                                                           -- मिलन सिन्हा 
     कल (14 नवम्बर)  बाल दिवस था और चाचा नेहरु का जन्म दिवस भी। अनेक  सरकारी आयोजन हुए, स्कूलों में  पिछले वर्षों की भांति कई कार्यक्रम हुए, बहुत  बातें हुई,  बच्चों की  भलाई के   लिए ढेर सारे वादे किये गए, तालियां बजी  और क्या ? हां, आजाद  देश के पहले प्रधान मंत्री और बच्चों के चाचा नेहरू के जन्म दिन के उपलक्ष्य में भी अनेक कार्यक्रम आयोजित किये गये।   

ज़रा सोचिये, इस मौके पर  पूरे  देश में  जितने रूपये सारे सरकारी आयोजनों में खर्च हुए दिखाए जायेंगे, उतना अगर कुछ गरीब, बेसहारा, कुपोषित बच्चों  के भलाई के लिए  कुछ बेहद पिछड़े गांवों में   खर्च किये जाते तो कुछ तो अच्छा होता।

आजादी के 66  साल बाद भी  पूरी आजादी से गरीब छोटे बच्चे सिपाही जी को रेलवे के किसी स्टेशन पर या चलती ट्रेन में मुफ्त में गुटखा, सिगरेट,बीड़ी या तम्बाकू खिलाता,पिलाता दिख जायेगा। वैसे ही दिख जाएगा  नेताओं, मंत्रियों, अधिकारियों  के घर में भी  नौकर के रूप में काम करते हुए  लाचार,  बेवश  छोटे गरीब बच्चे। सड़क किनारे छोटे होटलों, ढाबों, अनेक छोटे-मोटे कारखानों, दुकानों आदि में ऐसे छोटे बच्चे सुबह से शाम तक हर तरह का काम करते मिल जायेंगे, तथाकथित  बचपन बचाओ अभियान को अंगूठा दिखाते हुए। हमारे देश में जन्म से ही गरीब तबके के  बच्चों के साथ  लापरवाही या जैसे-तैसे पेश आने का प्रचलन  रहा हो ऐसा प्रतीत  होता है, यह सब देख कर।

इस मौके पर निम्नलिखित तथ्यों पर गौर करना प्रासंगिक होगा :
  • बच्चों के अधिकार पर आयोजित संयुक्त राष्ट्र संघ अधिवेशन में पारित प्रस्ताव के अनुसार 18 वर्ष से कम आयु के लड़का और लड़की को बच्चों की श्रेणी में रखा जाता है।
  • भारतवर्ष में बच्चों की कुल संख्या देश की आबादी का 40% है, यानी करीब 48 करोड़।
  • देश में हर घंटे 100 बच्चों की मृत्यु होती है।
  • भारत में बाल मृत्यु  दर (प्रति 1000 बच्चों के जन्म पर ) अनेक राज्यों में 50 से ज्यादा है जब कि इसे 30 से नीचे लाने की आवश्यकता है।
  • दुनिया के एक तिहाई  कुपोषित  बच्चे भारत में रहते हैं।
  • देश में आधे से ज्यादा बच्चे कुपोषण के कारण  मरते हैं।
  • पांच साल तक के बच्चों में 42% बच्चे कुपोषण के शिकार हैं।
  • जो बच्चे स्कूल जाते है  उनमें  से 40% से ज्यादा बीच में ही स्कूल छोड़ देते हैं जब कि शिक्षा के अधिकार कानून के तहत उनके स्कूली शिक्षा के लिए सरकार को हर उपाय  करना है।
  • हाल के वर्षों  में बच्चों के खिलाफ अपराध के मामलों में वृद्धि हुई है।
        इस तरह  के अन्य अनेक तथ्यों से रूबरू होते रहते है हम पढ़े-लिखे, खाते-पीते लोग। कभी- कभी वक्त मिले तो थोड़ी चर्चा भी कर लेते हैं। लेकिन, अब  सरकार के साथ-साथ भारतीय समाज को भी इस विषय पर गंभीरता से सोचना पड़ेगा और संविधान/कानून  के मुताबिक  जल्द ही कुछ  प्रभावी कदम  उठाने पड़ेंगे, नहीं तो इन गरीब, शोषित, कुपोषित,अशिक्षित बच्चों की बढती आबादी आने वाले वर्षों  में देश के सामने बहुत  बड़ी और बहुआयामी चुनौती पेश करनेवाले हैं।ऐसे  भी, हम कब तक सिर्फ  सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी ) और शाइनिंग इंडिया  की चर्चा से देश की आम जनता को बहलाते रहेंगे।


               और भी बातें करेंगे, चलते-चलते असीम शुभकामनाएं                                                         

Saturday, November 10, 2012

तीन लघु कविताएं : मोह, कारगर, महान

                                                                                      - मिलन सिन्हा 
मोह
जीवन 
आनन्ददायक है, 
किसके लिए ?
जिसने 
इसका  मोह 
त्याग दिया है, 
उसके लिए !

कारगर
स्वतन्त्रता 
कारगर है, 
कब ?
इसके साथ जब 
रोटी भी हो, 
तब !

महान 
आदमी 
महान  बनेगा, 
कब ?
वह जब 
'मैं' से निकल कर 
'ममेतर' में जायेगा, 
तब ! 

# जीवन साहित्य के दिसम्बर '८१ अंक में प्रकाशित 

                       और भी बातें करेंगे, चलते चलते असीम शुभकामनाएं

Wednesday, November 7, 2012

तीन लघु कविताएं : भयानक, सराहनीय, उपदेश

                                                                                        - मिलन सिन्हा 
भयानक 
मौत 
भयानक है, 
किसके लिए ?
जो इसकी 
अनिश्चितता से 
डर  गया, 
उसके लिए !

सराहनीय
सुन्दरता 
सराहनीय  है, 
कब ?
जब यह 
दूसरे को भी 
सुन्दर होने का 
बोध कराए, 
तब !

उपदेश
उपदेश दो, 
किसे ?
जो इसे 
मानने से पहले 
जांचे - परखे, 
उसे !
 # जीवन साहित्य के दिसम्बर '८१ अंक में प्रकाशित

            और भी बातें करेंगे, चलते-चलते असीम शुभकामनाएं


हास्य व्यंग्य कविताएं महंगाई और भ्रष्टाचार, आधुनिक परिभाषा        
                                                                   0 मिलन सिन्हा  
महंगाई और भ्रष्टाचार 
काफी समय से 
पति पत्नी के बीच 
चल रही थी तकरार 
पर कोई भी अपनी हार 
स्वीकारने को 
नहीं थे तैयार .
तभी पत्नी बोली,
तुम मुझे मत धमकाओ 
वरना, मैं महंगाई  बन जाऊंगी 
और तुम पर तो क्या 
पूरे देश पर छा जाऊंगी .
तैश में आकर तब 
पतिदेव ने फरमाया,
ठीक है, मैं भी तब 
भ्रष्टाचार बन जाऊंगा 
और केवल
अपने देश पर ही नहीं 
पूरे विश्व पर छा जाऊंगा .

आधुनिक परिभाषा 
एक आधुनिक पत्नी ने 
अपने पति को
'पतिव्रता' शब्द का
अर्थ यूं समझाया 
कि 'पति' से महीने   
दस दिन निराहार 'व्रत' रखवाया .

                              और भी बातें करेंगे, चलते-चलते असीम शुभकामनाएं 
           

Saturday, November 3, 2012

आज की कविता : यही है बस

                                      - मिलन सिन्हा 

बस, यही है बस।
हमारे  गांव की बस 
सभी गांवों की बस 
ऊपर नीचे लोग ठसाठस 
बराबर दौड़ती रहती है यह 
चांदनी हो या हो अमावस 
बस, यही है बस।

जाति -पांति मिटानेवाली बस 
सबको साथ ले चलनेवाली बस 
जहां कहो रुकनेवाली  बस 
छोटे - बड़े सबकी बस 
समाजवाद का नमूना है बस 
बस, यही है बस।

हमारे गांव जैसी है यह बस 
टूट रही है, उजड़ रही है बस 
गरीबी, बेकारी की कहानी है बस 
शहर में झोपड़पट्टी जैसी है बस
हर समय हमें झकझोरती है बस 
बस, यही है बस।

('हिन्दुस्तान ' में 10 जुलाई,2003 को प्रकाशित)

                         और भी बातें करेंगे, चलते-चलतेअसीम शुभकामनाएं

Sunday, October 28, 2012

औचित्य मंत्रिमंडल विस्तार का

                                                                                     - मिलन सिन्हा 
                 आखिर हो ही गया ममोहन सिंह के बड़े मंत्रिमंडल का चिर प्रतीक्षित बड़ा  विस्तार । कई महीनों  से इसके कयास  लगाये  जा रहे थे, तारीखें   तय होने और बदले जाने की ख़बरें भी  आती रही । विभिन्न टीवी चैनेलों ने इन खबरों से लोगों को बाखबर भी रखा कई  अवसरों पर पिछले दिनों।इस बीच हिमाचल प्रदेश और गुजरात विधानसभाओं के लिए चुनाव  प्रक्रिया शुरू होने के साथ वाड्रा तथा गडकरी पर घोटाले के सनसनीखेज  आरोप लगे  जिससे चर्चाओं को नया मुद्दा भी मिला। हाँ, इसी दौरान  डीजल तथा रसोई गैस के बढ़ी कीमतों ने आम लोगों को महंगाई के डायन से और ज्यादा रूबरू  भी करवाया।

                बहरहाल, चर्चा को आज के मंत्रिमंडल  विस्तार तक  ही सीमित रखें तो विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के लोक को क्या मिला इस राजनीतिक कवायद से - सिर्फ कुछ मंत्रियों के पद छोड़ने, कुछ के प्रोन्नत  होने, कुछ का विभाग बदले जाने, दो-चार नए वफादारों को मंत्री बनाने और इस  सब को अंजाम तक पहुँचाने  के लिए अपनायी  गयी  प्रक्रिया में आम करदाता का कई करोड़ रुपया  जाया  करने के अलावे। याद करिए, पिछले विस्तार प्रक्रिया के पश्चात् यही बातें नहीं कही गयी थी  कि इससे सरकार की कार्यकुशलता बढ़ेगी, विकास को  और गति प्रदान की जा सकेगी आदि, आदि .।

               पर, क्या पिछले  कुछ  महीनों में ऐसा कुछ हुआ या, देश कुछ और बदहाल हुआ? तो फिर इस बार के इस प्रयास से क्या हासिल हो जायेगा? क्या हम इतने बड़े-बड़े मंत्रिमंडल का बोझ उठाने में सक्षम हैं? आइये, जरा इस पर भी सोचें और  विचार करें।

              और भी बातें करेंगे, चलते-चलतेअसीम  शुभकामनाएं

Friday, October 26, 2012

आज की कविता : संकल्प

                                                                                  -मिलन सिन्हा 
alone-man1











जो है खरा 
झंझावात में भी वही 
रह पायेगा खड़ा .
नहीं दिखेगा वह 
कभी भी डरा-डरा .
कोई भी उसे 
अपने संकल्प से 
नहीं डिगा पायेगा 
पर,
जो खोटा  है 
भले ही मोटा है 
देखने में 
चिकना चुपड़ा  है 
सौन्दर्य प्रसाधनों का 
चलता-फिरता विज्ञापन है,
मुखौटा हटते ही 
उसका असली चेहरा दिखेगा 
तब क्या वह 
किसी के सामने 
बिना  बैसाखियों के 
खड़ा भी रह पायेगा ?

  # प्रवक्ता . कॉम  पर प्रकाशित 

                      और भी बातें करेंगे, चलते-चलते असीम शुभकामनाएं

Wednesday, October 24, 2012

आज की कविता : नया सफ़र

                                                                  - मिलन सिन्हा 
life1













नया सफ़र 
लगता है जैसे 
वे कर रहे हों एक  तैयारी 
आज शायद उनकी 
आ गयी है बारी 
क्या खोया, क्या पाया 
ठीक से समझ रहे हैं 
गुजरा हुआ एक एक पल 
फिर से जैसे जी रहे हैं 
कभी ख़ुशी,
तो कभी गम के आंसू 
स्वतः निकल रहे हैं 
डाक्टरों ने 
जवाब दे दिया है 
बेतार माध्यम ने 
तुरंत यह खबर 
परिजनों को दे दिया है  
एक एक कर 
सब आने लगे हैं 
पहुँचते ही 
उन्हें छू  कर रोने लगे हैं 
घर भर गया है 
माहौल ग़मगीन
 हो गया है  
आंसू से फर्श तक 
गीला हो गया है 
तभी उनकी 
लड़खड़ाती  आवाज गूंजती है 
काहे  का यह रोना धोना 
हर किसी को तो 
एक-न-एक दिन है जाना 
मैंने तो फिर भी 
खेली है लम्बी पारी 
बस, अब तो 
एक नये सफ़र की है तैयारी  !

# प्रवक्ता . कॉम पर प्रकाशित

                        और भी बातें करेंगे, चलते चलते असीम शुभकामनाएं

Tuesday, October 23, 2012

हास्य व्यंग्य कविता : पॉपुलर कारपोरेट मंत्र

                                                                        -मिलन सिन्हा 
corporate













सुबह से हो जाती थी शाम 
  पर, हर दिन  
रहता था वह  परेशान. 
मामला ओफिशिएल था 
कुछ -कुछ ,
कांफिडेंसिएल  था. 
इसीलिए 
किसी से कुछ न कहता था 
खुद ही चुपचाप , 
 सबकुछ  सहता था. 
देखी  जब मैंने  उसकी दशा 
 सुनी गौर  से 
उसकी समस्या, 
सब कुछ समझ में आ गया .
असल बीमारी का 
पता भी चल गया. 
रोग साइकोलोजिकल  था 
पर, समाधान 
बिल्कुल प्रक्टिकल  था. 
मैंने  उसे सिर्फ़  एक  मंत्र  सिखाया 
जिसे उसने 
बड़े मन से अपनाया. 
आफ़िस  में अब उसे 
नहीं है कोई टेंशन, 
सेलेरी को अब वह 
समझने लगा है पेंशन. 
"झाड़ने " को वह  अब 
"कला " मानता है .
अपने मातहतों  को 
खूब झाड़ता  है. 
और अपने बॉस के फाइरिंग को 
चैम्बर से  निकलते ही 
ठीक से "झाड़ता " है .
"झाड़ने " को वह  अब 
"कला " मानता है I 

# प्रवक्ता . कॉम  पर प्रकाशित 

   और भी बातें करेंगे, चलते-चलते। असीम शुभकामनाएं  

Monday, October 22, 2012

आज की कविता : स्मिति

                                                                        - मिलन  सिन्हा 
एक नन्ही सी लड़की 
मुस्कुराई, 
पेड़ पर  लगे 
फूल को देखकर .
फूल  ने भी किया 
लड़की का अभिवादन 
खिलखिलाकर .
हुए दोनों प्रफुल्लित .
देखकर यह सब 
पेड़ का मन हुआ पुलकित .
फिर,
पेड़ फूलों से भर गया .
विद्वेष की कालिमा लगी मिटने .
सब ओर 
मुस्कुराहट लगी फैलने .
समाज लगा फूलों से सजने .
खुशबुओं से लगा भरने !

प्रवासी दुनिया .कॉम पर प्रकाशित

                       और भी बातें करेंगे, चलते-चलतेअसीम शुभकामनाएं

Saturday, October 20, 2012

दो छोटी कविताएं : देखनेवाले, अक्लवाले

                                                                        - मिलन सिन्हा 
 देखनेवाले
आज 
जो लोग 
उजाले में हैं 
वे 
अंधेरे में पड़े 
लोगों को 
नहीं देख पा रहे हैं .
पर,
अंधेरे में पड़े लोग 
उन्हें  बराबर 
अच्छी तरह
देख रहे हैं !

अक्लवाले 
आज 
लोग 
अक्ल की 
बात 
कल पर 
छोड़  रहे हैं 
लेकिन,
अर्थ की 
बातों को 
अपने स्वार्थ  से 
तुरत 
जोड़  रहे हैं !
                और भी बातें करेंगे, चलते - चलते असीम शुभकमनाएं। 

Friday, October 19, 2012

हास्य व्यंग्य कविता: गांधीवादी परम्परा

                                                                                     * मिलन सिन्हा 
















हमारे  नेता जी काफी चर्चित थे .
जनता से
 जो काम करने को कहते थे 
उसे पहले 
खुद करते थे .
इस  मामले वे अपने को 
पक्के सिद्धान्तवादी-गांधीवादी कहते थे .
एक बार उन्होंने कहा,
हम गरीबी हटाकर रहेंगे 
अब गरीबी रहेगी या 
 हम रहेंगे .
 सिद्धान्त के मुताबिक  उन्होंने पहले 
अपनी गरीबी हटाने का प्रयास किया 
और जल्दी ही 
कई गाड़ियां खरीद लीं, 
चार-पांच मकान  बनवा लिया 
और भी न जाने 
क्या-क्या जोड़ लिया .
इस तरह उन्होंने
एक नयी परम्परा को जन्म दिया 
जिसका अनुसरण करते हुए 
अधिकांश नेता गांधीवादी (?) बन गए 
और पहले 
अपनी-अपनी गरीबी हटाने में जुट गए !
                                       
# प्रवक्ता . कॉम  में प्रकाशित 

                 और भी बातें करेंगे, चलते - चलते असीम शुभकमनाएं

Tuesday, October 16, 2012

वायु प्रदूषण के गंभीर खतरे के बीच हमारा जीवन

                                                                                      - मिलन सिन्हा 
Pollution in New Delhi
   
गाँव छोड़ कर लोग लगातार शहरों में आ रहे हैं।शहरों पर बोझ बढ़  रहा है। शहर में बुनियादी सुविधाएँ पहले  ही नाकाफी थी, अतिरिक्त जनसँख्या के दवाब में तो अब हालत और भी खस्ता हो गई  है। सुबह हो या शाम, घर से बाहर निकल कर सड़क पर आते ही आपको हर छोटे बड़े शहर में सड़कों पर जाम से रूबरू होना पड़ेगा और सडकों  पर गुजारे सारे वक्त में वायु प्रदूषण  के दुष्प्रभावों को झेलना पड़ेगा। हालांकि  वायु प्रदूषण   का प्रकोप सर्वव्यापी है, फिर भी नगरों, महानगरों की हालत गाँव की अपेक्षा बहुत ही गंभीर होती जा रही है दिन-पर-दिन। वायु प्रदूषण  के विभिन्न आयामों पर चर्चा जारी  रखने से पहले आइये इन तथ्यों पर गौर कर लें :
  • चीन के  बाद भारत विश्व का दूसरा आबादीवाला देश है। भारत की आबादी 120 करोड़ से ज्यादा है।
  • भारत में यात्री वाहनों की संख्या चार करोड़ से ज्यादा है।
  • हर साल भारत में 110 लाख वाहन का उत्पादन होता है।
  • भारत विश्व के दस बड़े वाहन उत्पादक देशों में से एक है।
  • हमारे देश में पेट्रोल, डीजल आदि की खपत तेजी से बढ़ रही है।
  • हम अपने खनिज तेल की जरूरतों का 80% आयात करते हैं।
  • वर्ष 2011-12 में   हमने  खनिज तेल  के आयात पर 475 बिलियन डालर  खर्च किया है।
  • कोयले के उत्पादन और खपत में भी लगातार वृद्धि हो रही है।
          उपर्युक्त वर्णित तथ्यों के आधार पर  हम स्वयं ही अनुमान लगा सकते हैं कि हमारी स्थिति कितनी गंभीर होती जा रही है। देश में खनिज तेल जरुरत की तुलना में मात्र 20% है, पर तेल पर चलनेवाले वाहनों  की  संख्या  तेजी से बढती जा रही है।सड़कें छोटी पड़ती जा रही हैं, वायु प्रदूषण  बढ़ता जा रहा है, सड़क दुर्घटनाओं की  संख्या भी निरंतर बढती जा रही है, देश की राजधानी विश्व के कुछ सबसे बड़े प्रदूषित शहरों में शामिल हो गया है, लेकिन किसे इन बातों की फिक्र है? नतीजतन, आज हम सभी निम्नलिखित परिस्थिति से दरपेश हैं:
  • वायु प्रदूषण से  भारत में हर साल 6 लाख से ज्यादा लोग मरते हैं।
  • वायु प्रदूषण से  एक बड़ी आबादी दमा, हृदय रोग, कैंसर , चर्म रोग आदि से ग्रस्त हैं।
  • गर्ववती महिलाएं और पांच साल तक के बच्चे  वायु प्रदूषण से बुरी तरह प्रभावित होते हैं।
  • वायु प्रदूषण के कारण मानव समाज के अलावे पशु-पक्षी एवं वनस्पति तक को गहरी क्षति होती है।
       तो आखिर क्या करें? सिर्फ सरकार द्वारा उठाये जानेवाले क़दमों के भरोसे रहें? या अपनी ओर से अपने वायु मंडल को प्रदूषण  से बचाने  के लिए  नीचे लिखे कार्यों को अंजाम तक पहुँचाने  में बढ़-चढ़ कर भाग लें और सरकार को भी इन्हें सख्ती से लागू करने के लिए  संविधानिक  तरीके से मजबूर करें:
  • सार्वजनिक परिवहन प्रणाली में व्यापक एवं प्रभावी  सुधार।
  • साइकिल चालन को अत्यधिक प्रोत्साहित करना।
  • मौजूदा जंगलों /पेड़ों को संरक्षित करना एवं साथ-साथ बड़े पैमाने पर वनीकरण को बढ़ावा देना।
  • यथासंभव प्राथमिकता के आधार पर सौर  तथा  पवन उर्जा को लोकप्रिय बनाना।
  • उत्सर्जन मानदंडों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करना।
      आशा है, हम समय रहते इस  समस्या से निबटने में एक हद तक कामयाब होंगे।
  # प्रवक्ता . कॉम पर प्रकाशित 

                  और भी बातें करेंगे, चलते-चलते। असीम शुभकामनाएं। 

Sunday, October 14, 2012

चार लघु कविताएं : प्यार, सुख, शिक्षा, बोध

                                                              - मिलन  सिन्हा 
प्यार 
प्यार 
सफल है 
कब?
जब वह 
सीमाबद्ध न रहे 
तब !

सुख 
जिंदगी 
सुखमय है 
कब ?
जब वह 
दूसरे की 
जिंदगी को भी 
सुख से 
भर सके 
तब !

शिक्षा 
शिक्षा 
सार्थक है 
कब ?
जब वह 
आदमी  को 
विनम्र, भद्र  बनाए 
तब !

बोध 
मिलन 
सफल है 
कब ?
जब वह 
दूसरे को 
बिछुड़न  का 
बोध न कराए 
तब ! 

# जीवन साहित्य के अगस्त '85  अंक में प्रकाशित

                  और भी बातें करेंगे, चलते चलते। असीम शुभकामनाएं