Thursday, October 12, 2017

प्रेरक प्रसंग : कैसे पहुंचे लोहिया मद्रास से कलकत्ता ?

                                                                                      - मिलन सिन्हा
ब्रिटिश हुकूमत का दौर था. पूरे देश में स्वतंत्रता आन्दोलन का जोर था. ऐसे ही समय डॉक्टरेट की उपाधि से विभूषित लोहिया जी जब बर्लिन से पानी के जहाज द्वारा मद्रास पहुंचे तो उस समय उनके पास एक भी पैसा नहीं था. ऊपर से किताबों सहित उनका सारा सामान न जाने क्यों, रास्ते में ही जब्त कर लिया गया था. अब समस्या यह थी कि मद्रास से कलकत्ता कैसे पहुंचा जाय. जाने अचानक उनके दिमाग में क्या आया कि वे जहाज से उतर कर सीधे मद्रास से प्रकाशित अखबार ‘हिन्दू’ के दफ्तर में पहुंच गए. संपादक के पास पहुंच कर फर्राटे की अंग्रेजी में बोले, ‘मैं अभी-अभी बर्लिन से आ रहा हूँ और आपके उपयोग हेतु एक-दो लेख देने की इच्छा रखता हूँ. 

संपादक ने अपरिचित नौजवान को एक पल ठीक से देखा और पूछा, 'कहां है लेख? दीजिए.’

‘कृपया कागज़-कलम दें, मैं अभी तुरन्त लिख देता हूँ ’ – लोहिया जी ने कहा.

संपादक जी अवाक. कारण पूछा तो मालूम हुआ कि कलकत्ता जाने के लिए पैसे चाहिए. कागज़-कलम मिलते ही लोहिया जी वहीं बैठकर लिखने लगे, बिना किसी रुकावट के जैसे कि लेख लिखने के लिए वे पहले से ही तैयार बैठे हों. संपादक जी के लिए यह बिलकुल नया अनुभव था. 

कुछ ही देर में दो लेख लिखकर उन्होंने संपादक जी को दे दिए. दोनों लेख पढ़कर संपादक जी ने  लोहिया जी की विद्वता एवं प्रतिभा का प्रमाण पा लिया. संपादक जी ने तुरन्त पारिश्रमिक के रूप में उन्हें पच्चीस रूपये दिए और साथ ही शाम को अपने घर साथ खाने का निमंत्रण भी.
                                                                           (hellomilansinha@gmail.com)
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

# डॉ. राममनोहर लोहिया की पुण्यतिथि के अवसर पर 

प्रेरक प्रसंग : इतिहास का अध्येता

                                                                                                 - मिलन सिन्हा 
राममनोहर लोहिया काशी के एक कॉलेज में इंटर की पढ़ाई  कर रहे थे. सभी विषयों में उन्हें इतिहास ही सबसे प्रिय था. अतएव अपने पाठ्यक्रम की इतिहास की पुस्तकों के अलावा जो भी इतिहास की पुस्तकें उनके हाथ लग जाती उन्हें वे जल्दी ही पढ़  जाते. इतिहास की पुस्तकों के इस व्यापक अध्ययन का परिणाम यह हुआ कि उनकी दृष्टि समालोचक की हो गई. अब जहां भी  वे कोई तथ्यहीन बात पढ़ते तो तुरन्त उसे गलत साबित करने में जुट जाते.

उनके अपने पाठ्यक्रम में इतिहास की एक पुस्तक थी - 'ईसाई शक्ति का उदय'. इस किताब में एक स्थान पर कलकत्ते की एक काल कोठरी का वर्णन करते हुए भारतवासियों पर यह आरोप लगाया गया था कि उस काल कोठरी में एक सौ चालीस अंग्रेजों को एक साथ बंद कर उनकी हत्या की गयी थी. लोहिया जी को ये सब पढ़ते ही ऐसा लगा कि सारा वाकया तथ्य से परे है और इस तरह के प्रचार के पीछे भारत के लोगों को एन-केन-प्रकारेण बदनाम करने का उद्देश्य है. फिर क्या था, लोहिया जी ने इस मुद्दे को बहस के लिए सबके सामने रखा. बहस का लम्बा दौर चला और अंत में लोहिया जी ने यह साबित कर दिया कि उक्त पुस्तक में जिन एक सौ चालीस अंग्रेजों का जिक्र है, वे कभी इंग्लैंड से भारत आये ही नहीं. और तो और, जिस काल कोठरी का उस किताब में उल्लेख है उस कोठरी में किसी भी तरह एक सौ चालीस आदमी समा ही नहीं सकते. इतना ही नहीं, लोहिया जी ने उसी पुस्तक में छत्रपति शिवाजी को 'लुटेरा सरदार' लिखे जाने की बात को भी ठोस प्रमाणों द्वारा बेबुनियाद और झूठा साबित कर दिया.
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                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

डॉ. राममनोहर लोहिया की पुण्यतिथि के अवसर पर  

Sunday, October 1, 2017

यात्रा के रंग : गंगटोक और आसपास -5- अब शान्ति व्यू पॉइंट और ...

                                                                                          -मिलन सिन्हा
हल्का नाश्ता करने के बाद हम नीचे उतरने लगे तो राजू ने बताया कि इसी रास्ते में थोड़ी  दूर पर विख्यात ‘जवाहरलाल नेहरु बोटानिकल  गार्डन’ है. जल्द ही हम वहां पहुंच गए. यह गार्डन एक बड़े से परिसर में है, जिसका देखरेख सरकार का वन विभाग करता है. इस परिसर का माहौल खुशनुमा है. यहां आप अनेक प्रकार के आर्किड का आनंद ले सकते हैं. ओक सहित अन्य अनेक दुर्लभ प्रजाति के पेड़-पौधों के बीच वक्त कैसे गुजर जाता है, पता ही नहीं चलता. 

रोचक तथ्य ये भी कि इतना पैदल चलने पर भी आप ज्यादा नहीं थकते, कारण रोजमर्रा की भागदौड़ की जिंदगी से इतर आपको प्रकृति के साथ वक्त गुजरना अच्छा लगता है और आप ऑक्सीजन अर्थात प्राण-वायु से भरे भी तो रहते हैं. 

आगे हमारी गाड़ी “शान्ति व्यू पॉइंट” पर आ कर रुकी. इस स्थान से आप पूरे गंगटोक का एक बेहद खूबसूरत दृश्य देख सकते हैं. पहाड़ों के विस्तारित श्रृंखला में पूरे गंगटोक शहर और उसके आसपास फैले छोटे-बड़े इलाके का ऐसा विहंगम दृश्य शायद शान्ति व्यू पॉइंट  से ही शान्ति और सकून से आप देख सकते हैं. सच कहें तो आप चाय की चुस्की लेते हुए घंटों यहाँ समय बिता सकते हैं. सो, हमने भी थोड़ा ज्यादा समय इस जगह के नाम किया, बेशक बीच-बीच में राजू की  दिलचस्प आपबीती सुनते हुए. 

सचमुच, यात्रा हमें बहुत कुछ दिखाती है, बहुत कुछ सिखाती-समझाती है. तभी तो कई बड़े लोगों ने अलग-अलग तरीके से  कहा है : दुनिया एक बड़ी किताब है और वे जो यात्रा नहीं करते सिर्फ कुछ पेज पढ़ कर ही रह जाते हैं.

शाम हो चली थी. सड़क के दोनों ओर फैले प्रकृति के विभिन्न रूपों को निहारते हुए हम आ गए थे गंगटोक की ह्रदय स्थली महात्मा गांधी रोड के पास. हमने राजू से विदा ली, उसे गले लगाया, शुक्रिया कहा. राजू ने भी थैंक्स कहा और मुस्कुराते हुए बढ़ गया, कल फिर किसी और सैलानी को गंगटोक घुमाने की इच्छा के साथ – एक अच्छे गाइड की तरह. जीते रहो राजू....असीम शुभकामनाएं. 
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                     और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 
# साहित्यिक पत्रिका 'नई धारा' में प्रकाशित

Wednesday, September 6, 2017

यात्रा के रंग : गंगटोक और आसपास -4 - आज प्रसिद्ध 'रूमटेक मठ'

                                                                               -मिलन सिन्हा
आपको जानकर अच्छा लगेगा कि गंगटोक के आसपास कई प्राचीन धार्मिक मठ हैं, जो पर्यटकों एवं अनुयायियों के आकर्षण के केन्द्र रहे हैं . लेकिन किसी कारण से आप इन सभी मठों का दर्शन न भी कर सकें तो कम-से-कम प्रसिद्ध रूमटेक मठ जरुर जाएं, क्यों कि यह सिक्किम का सबसे बड़ा और चर्चित मठ है. यह भी एक कारण था कि हमारे दूसरे दिन के कार्यक्रम में रूमटेक मठ देखना शामिल था, साथ ही  उसके आसपास के दर्शनीय स्थानों को देखना भी. ड्राईवर और गाइड राजू समय पर आ गया था. सो, सुबह–सुबह ही हम गंगटोक शहर से करीब 25 किलोमीटर दूर अवस्थित इस मठ को देखने निकल पड़े. बताते चलें कि धर्मचक्र केन्द्र के रूप में विख्यात  रूमटेक मठ करीब 300 साल पुराना है और तिब्बती वास्तुकला की बेहतरीन मिसाल है. यह करमापा लामा का मुख्य कार्य स्थान रहा है. यह मठ समुद्र तल से 5800 फीट की ऊंचाई पर है. कहा जाता है कि यह मठ तिब्बत स्थित मूल तिब्बती बौद्ध मठ का प्रतिरूप है, जिसका पुनर्निर्माण  1960 के दशक में 16 वें करमापा द्वारा करवाया गया. 

पहाड़ी रास्ते से होते हुए हम करीब घंटे भर में रूमटेक मठ के मेन गेट के पास पहुंच गए. गाड़ी वहीं छोड़नी पड़ी. अन्दर जाने के लिए हम सबको अपना-अपना परिचय कार्ड दिखाना पड़ा, सुरक्षा जांच से गुजरना पड़ा. पता चला कि सुरक्षा कारणों से यहाँ सुरक्षा कर्मी पूरे परिसर की चौबीसों घंटे कड़ी चौकसी करते हैं.  मेन गेट से थोड़ी चढ़ाई करते हुए और एक कतार में लगे प्रार्थना चक्रों ( प्रेयर व्हील्स ) को घुमाते हुए हम मठ के मुख्य द्वार पर पहुंच गए. वहां सुरक्षा कर्मी हर श्रद्धालु की जांच कर उन्हें मठ में प्रवेश की अनुमति दे रहे थे. अन्दर का माहौल भक्तिमय था और पूरा दृश्य अभिभूत कर रहा था. सुबह का समय होने के कारण हमें बौद्ध भिक्षुओं द्वारा पूरे अनुष्ठानपूर्वक एवं परंपरागत तरीके से की जा रही प्रार्थना का गवाह बनने का सौभाग्य मिला. यह हमारे लिए एक अपूर्व अनुभव था. इस प्रार्थना में शामिल छोटे-बड़े करीब 30-35 भिक्षुओं  की तन्मयता और अनुशासन देखने लायक थी.  

प्रार्थना का कार्यक्रम समाप्त होने के बाद हम परिसर के अन्य भागों को देखने चले. मठ के दाहिने हिस्से से हम पीछे की ओर गए जहाँ  ‘करमा श्री नालंदा इंस्टिट्यूट ऑफ़ हायर बुद्धिस्ट स्टडीज’ का खूबसूरत परिसर है. यह अनूठा शिक्षण संस्थान वाराणसी स्थित संस्कृत विश्वविद्यालय से सम्बद्ध है और यहाँ युवा भिक्षुओं को बौद्ध दर्शन व इतिहास, तिब्बती साहित्य व कला के अलावे अंग्रेजी, हिन्दी, पाली, संस्कृत आदि भाषाओँ  की  शिक्षा दी जाती है. इस इंस्टिट्यूट में दुनिया भर से छात्र शिक्षा ग्रहण करने आते हैं. अध्ययनरत सभी भिक्षु यहीं छात्रावास में रहते हैं.  इस परिसर के एक छोटे से हॉल में प्रसिद्ध स्वर्ण स्तूप भी है. कहा जाता है कि इसी स्थान पर 16 वें करमापा की पवित्र अस्थियां रक्खी गई हैं.  

परिसर में आते-जाते कई भिक्षुओं से हमें रोचक वार्तालाप का अवसर भी मिला. जानकारी मिली कि यहां से शिक्षित-प्रशिक्षित बौद्ध भिक्षु जीवनभर धार्मिक-सामाजिक-शैक्षणिक  कार्य में खुद को समर्पित कर देते हैं. सच मानिए, शहर के कोलाहल एवं प्रदूषण से परे पहाड़ पर बसे एवं मनोरम प्राकृतिक परिवेश में समर्पित धर्म गुरुओं एवं विद्वानों  से शिक्षित होना भिक्षुओं के लिए निश्चय ही सौभाग्य की बात है. 

लौटने के क्रम में हमने मठ के निकट कुछ श्रद्धालुओं को शान्ति के प्रतीक ‘कबूतर’ को दाना खिलाते देखा. सैकड़ों की संख्या में कबूतरों को बेख़ौफ़ कई श्रद्धालुओं के हाथ से दाना चुगते देखा, शायद पास खड़े सुरक्षा कर्मी के कारण वे भी आश्वस्त थे, आशंका मुक्त थे. सचमुच, यह दृश्य हमें मंत्र-मुग्ध कर गया. इसी हर्षातिरेक में हम प्रार्थना चक्रों को घुमाते हुए रूमटेक मठ के गेट से बाहर आ गए.
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# साहित्यिक पत्रिका 'नई धारा' में प्रकाशित

Friday, September 1, 2017

यात्रा के रंग : गंगटोक और आसपास -3- अब बक्थांग वॉटरफॉल और ....

                                                                                          -मिलन सिन्हा
आप घूमने जाएं, वह भी घरवालों के साथ और फिर वहां कुछ खरीदारी न करें, यह नामुमकिन है. वह भी तब जब आप गंगटोक हस्तशिल्प एवं हैंडलूम प्रतिष्ठान  में आ गए हों. यहाँ हैंडलूम के महिला कारीगरों को पूरी तन्मयता से काम करते हुए एवं कलात्मक चीजों का निर्माण करते हुए देख सकते हैं. देखने पर ही पता चलता है कि यह सब कितनी मेहनत एवं एकाग्रता की मांग करता है. इसके दूसरे हिस्से में एक तरफ हस्तशिल्प प्रदर्शनी लगी है तो दूसरे तरफ चीजें बिक्री के लिए उपलब्ध हैं. मेक इन इंडिया का अच्छा उदहारण. कलाप्रेमी एवं मानव श्रम को महत्व देने वाले लोगों के लिए यहाँ कुछ समय गुजारना एक अच्छा अनुभव साबित होगा. 

यहाँ से बनझकरी जलप्रपात, ताशी व्यू पॉइंट, एंची मठ एवं  लिंग्दुम मठ  का भ्रमण करते हुए और बीच में मुसलाधार बारिश का लुफ्त उठाते हुए हम अब पहुंच गए हैं प्रसिद्ध बक्थांग वॉटरफॉल. यह खूबसूरत वॉटरफॉल वस्तुतः एकाधिक वाटर फॉल का एक समूह है. इस स्थान पर आप ‘रोप स्लाइडिंग’ का भी मजा ले सकते हैं. यहाँ सैलानियों की बहुत भीड़ होती है, कारण यह शहर के नजदीक है; मुख्य सड़क के बिलकुल पास अवस्थित है और बहुत आकर्षक भी है. सही है, पेड़ों से आच्छादित ऊँचे पहाड़ से एक साथ कई जल-प्रपात को नीचे आते देखना किसे विस्मत एवं मंत्र-मुग्ध नहीं करेगा. लिहाजा, यहाँ के प्राकृतिक दृश्यों को कैमरे में कैद करने में लोगों को मशगूल देखना बहुत ही स्वभाविक है. हाँ, कुछ राशि खर्च करके यहाँ आप सिक्किम के पारंपरिक लिबास में फोटो खिचवाने का आनंद उठा सकते हैं. बहरहाल, यहाँ से चलते वक्त स्वतः ही गुनगुना उठा मनोज कुमार एवं जया भादुड़ी अभिनीत चर्चित हिन्दी फिल्म ’शोर’ का वह कर्णप्रिय गाना – पानी रे पानी तेरा रंग कैसा....  

यहाँ से हम आगे बढ़े प्रसिद्ध नामग्याल इंस्टिट्यूट ऑफ़ तिब्ब्तोलाजी  की ओर. यह स्थान  देवराली टैक्सी स्टैंड जो कि राष्ट्रीय उच्च मार्ग-31ए पर अवस्थित है, के निकट है. तिब्बती सभ्यता व संस्कृति का प्रमाणिक परिचय प्राप्त करना हो तो यहाँ आना सार्थक होगा. अपने स्थापना वर्ष 1958 से यह संस्था लगातार तिब्बत के लोगों के धर्म, भाषा, कला, इतिहास आदि से संबंधित अध्ययन तथा शोध-अनुसंधान में जुटा है. इसके पुस्तकालय एवं म्यूजियम  में तिब्बती जन-जीवन से जुड़ी तमाम कलाकृतियों और पुस्तकों-पांडुलिपियों का विराट संग्रह है. शायद यही कारण है कि बड़ी संख्या में शोधार्थी, विद्यार्थी एवं पर्यटक इस संस्थान में आते रहते हैं. 

सुबह से शाम तक के इस लोकल टूर का एक  दिलचस्प पहलू यह रहा कि हमें राजू नामक एक खुश-मिजाज ड्राईवर –सह-गाइड मिला, अन्यथा इन महत्वपूर्ण दस पॉइंट का भ्रमण शायद ही यादगार बन पाता. दरअसल, राजू एक पढ़ा-लिखा नौजवान है जिसकी रूचि हर सम-सामयिक विषयों में है. राजनीति से लेकर फिल्म तक उसकी एक समझ है जिसे व्यक्त  करने में उसे कोई झिझक नहीं, जैसा कि हम सामान्यतः अनेक संभ्रांत लोगों में पाते हैं. लिहाजा, जब राजू ने पूर्व मुख्यमंत्री की चर्चा की तो उसके साथ उनके समय की अच्छी-बुरी दोनों बातों का जिक्र किया, आम सिक्किमवासी  के आशा-आकंक्षा के बारे में बताया. गंगटोक में बेरोजगारी की स्थिति पर जब मैंने उसके विचार जानने चाहे तो बेशक राजू थोड़ा गुस्से में आ गया. उसने शिक्षित बेरोजगारों की बात की और कहा कि उनके लिए स्व-रोजगार के अलावे रोजगार के विकल्प बहुत ही सीमित हैं. स्व-रोजगार भी पर्यटन से जुड़ा है, लेकिन पर्यटन को एक उद्योग के रूप में विकसित करने में सरकार अबतक सफल नहीं हो पाई है. पर्वतीय पर्यटन का एक अलग  मिजाज होता है और एक सीमित अवधि. मसलन, गंगटोक में जाड़े के मौसम में पर्यटन से जुड़े सारे व्यवसाय बिलकुल सुस्त पड़ जाते हैं. नतीजतन, इन पर निर्भर एक बड़ी आबादी ठण्ड और बेरोजगारी के दोहरे मार को झेलने को मजबूर हो जाती है. एक और बात. यहाँ के युवा  सेना और अर्द्ध-सैनिक बलों में जाना चाहते  हैं, लेकिन वहां भी अनजाने कारणों से कुछ ही लोगों की बहाली हो पाती है. बड़े व्यवसाय में गैर-सिक्कमी लोगों, खासकर राजस्थानी, बंगाली एवं बिहारी लोगों के निरंतर बढ़ते वर्चस्व के प्रति भी उसने अपना रोष नहीं छिपाया. राजनीतिक भ्रष्टाचार को बढ़ाने में इन बाहरी लोगों की भूमिका को भी राजू ने रेखांकित किया. 

सूर्यास्त हो गया था. हम अपने होटल लौट आए. राजू से हाथ मिलाया, उसे थैंक्स कहा और उससे अगले दिन सुबह समय पर पहुंचने का आग्रह किया. वह हंसा और ओके कहकर बढ़ गया अपनी गाड़ी के साथ.
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# साहित्यिक पत्रिका 'नई धारा' में प्रकाशित

Wednesday, August 30, 2017

यात्रा के रंग : गंगटोक और आसपास -2 - अब हनुमान टोक और ...

                                                                              -मिलन सिन्हा
गाड़ी बढ़ चली अब अगले पॉइंट- हनुमान टोक यानी हनुमान मंदिर की ओर. गंगटोक शहर से करीब 10 किलोमीटर की दूरी एवं  समुद्र तल से करीब 7200 फीट की ऊंचाई पर स्थित है यह खूबसूरत मंदिर. पार्किंग स्थल से मंदिर तक जाने के लिए सीढियां बनी है, जिसमें बीच-बीच में बैठने-सुस्ताने की व्यवस्था है. मंदिर के रास्ते में लगातार घंटियां लगी हैं, जिन्हें बजाते जाने पर ध्वनि की अदभुत गूंज-अनुगूंज से आप अभिभूत हुए बिना नहीं रह सकते. सारा परिसर इतना साफ़-सुथरा एवं सुरुचिपूर्ण ढंग से सुसज्जित है कि आप स्वतः पूछ बैठेंगे कि ऐसा रख-रखाव तो सेना के देखरेख में ही संभव है. बिलकुल ठीक सोचा है आपने. 

वर्ष 1968 से भारतीय सेना के माउंटेन डिवीज़न के जवान इस हनुमान मंदिर का रख-रखाव करते रहे हैं. इस स्थान से कंचनजंघा पर्वतमाला के अप्रतिम सौन्दर्य का आप आनन्द उठा सकते हैं. कहने की जरुरत नहीँ कि यहाँ आने पर आपको थोड़ा और रुकने का मन जरुर करेगा. लेकिन आगे और भी तो बहुत कुछ देखना है और घड़ी कहाँ तक आपको रुकने देगी. हाँ, एक और जानने योग्य बात. वर्षों से प्रचलित लोकमत के अनुसार राम-रावण युद्ध के दौरान आहत पड़े लक्ष्मण के लिए हिमालय से संजीवनी बुटी ले जाने के क्रम में हनुमान जी कुछ देर  के लिए इस स्थान पर रुके थे. 

पेड़ों से भरे पहाड़ी रास्ते से होकर अब हम हनुमान टोक से करीब 1200 फीट नीचे गणेश टोक के पास आ गए हैं. घुमावदार सीढ़ियों से चढ़ कर इस मंदिर तक पहुँचते हुए आप प्रकृति के विविध रूपों का गवाह बनेंगे, साथ ही मौका मिलेगा गंगटोक शहर के एक  कुछ हिस्सों के विहंगम दृश्य से रूबरू होने का. इस गणेश मंदिर के पार्किंग स्थल के बिलकुल पास में आपको खाने-पीने की सामग्री मिल जायेगी और हस्तशिल्प की कुछ खूबसूरत वस्तुएं भी. कई सीनियर सिटीजन जो शारीरिक कारण से ऊपर मंदिर  तक नहीं जा पाते हैं, नीचे पार्किंग स्थल से भगवान गणेश को प्रणाम कर लेते हैं और ईश्वर का आशीर्वाद  पाने की अनुभूति से खुश हो जाते हैं. चाय-पानी और अन्य खरीदारी बाद में करते रहते हैं. 
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# साहित्यिक पत्रिका 'नई धारा' में प्रकाशित 

Monday, August 28, 2017

यात्रा के रंग : गंगटोक और आसपास -1

                                                                                                         -मिलन सिन्हा
ऐसे, आप गंगटोक तक आएं और उसके आसपास के दर्शनीय स्थानों को देखे बिना लौट जाएं, यह मुनासिब नहीं. वह भी तब जब कि इस शहर के आसपास के पर्यटक स्थलों को देखने के लिए आप अपने समय एवं बजट के हिसाब से पांच, सात या दस पॉइंट्स में से कोई भी ‘पैकज टूर’ चुन सकते हैं.  इसमें पर्यटन सूचना केन्द्र एवं महात्मा गाँधी मार्ग  स्थित एकाधिक ट्रेवल एजेंसी आपके लिए मददगार साबित होंगे. सच कहें तो हमने इन्ही सूत्रों से पूछताछ करके पिछले दिन ही आज के घूमने के कुल दस स्थानों को तय कर लिया था. इसके बाद इन स्थानों पर जाने के लिए हमने एक छोटी गाड़ी भी दिनभर के लिए बुक कर ली. गाड़ी पहले बुक करना अच्छा रहता है, क्यों कि टूरिस्ट सीजन में कई बार आपको गाड़ी न मिलने के कारण अपना प्रोग्राम कैंसिल करना पड़ जाता है. 

सुबह गाड़ी समय पर आ गयी. ड्राईवर ने मोबाइल पर सूचित किया. होटल से हम निकले तो बाहर झमाझम बारिश हो रही थी. पहाड़ों पर कब घटायें घिर आयें, बारिश होने लगे और कब अचानक धूप खिल उठे, अनुमान लगाना कठिन होता है, खासकर बाहर से आये लोगों के लिए. बहरहाल, कुछ मिनटों के बाद बारिश थमते ही हम चल पड़े गंगटोक शहर के आसपास स्थित दर्शनीय जगहों का आनंद उठाने. 

पहाड़ी जगह होने के कारण बारिश का पानी सड़क पर जमा होने की गुंजाइश कम थी. पुलिस मुख्यालय से पहले ही ड्राईवर ने एक ढलानवाली सड़क पर गाड़ी को मोड़ दिया. यह सड़क कम चौड़ी थी, फिर भी दोनों ओर से वाहनों का आना –जाना लगा था. अगल-बगल होटल एवं गेस्ट हाउस होने के कारण गाड़ियां सुस्त गति से चल रही थी. कुछ दूर आगे जाकर हमारी गाड़ी अचानक रुक गयी. सामने और भी गाड़ियां खड़ी थी. तभी ड्राईवर ने थोड़ी दूर पर सड़क के किनारे खड़े एक सज्जन को दिखा कर कहा, ‘सर देखिए, ये हैं सिक्किम के पूर्व चीफ मिनिस्टर श्री नरबहादुर भण्डारी ’. कोट-पेंट-टाई पहने भण्डारी साहब एक आम शहरी के तरह खड़े थे और किसी को इशारे से बुला रहे थे. कोई तामझाम नहीं, कोई दिखावा नहीं, आसपास कोई सुरक्षा कर्मी भी नहीं. जब तक मै गाड़ी से निकलता और उनसे मिलकर कुछ बातें कर पाता, गाड़ी चल पड़ी. गाड़ी रोक कर बात करना संभव नहीं था, कारण पीछे भी गाड़ियां कतार से चल रही थीं. हां, गाड़ी तो चल रही थी, पर मैं मानसिक रूप से रुका हुआ था भण्डारी साहब के आसपास. बता दें कि नर बहादुर भण्डारी ने 1977 में सिक्किम जनता परिषद् का गठन किया और उसके संस्थापक के रूप में 1979 में चुनाव लड़ा. वे अक्टूबर 1979 से जून 1994 के बीच तीन बार सिक्किम के मुख्य मंत्री रहे और सिक्किम के लोगों के बीच काफी लोकप्रिय भी, बेशक उन पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे. बहरहाल, चलती गाड़ी और चलती घड़ी ने हमें फ्लावर शो सेंटर  पहुंचा दिया. 

एक छोटे से स्थान में संचालित इस सेंटर में अनेक तरह के फूल खूबसूरत तरीके से प्रदर्शित किये गए हैं. रंग –बिरंगे फूलों के साथ अपने प्रियजनों का फोटो खींचने और फोटो खींचवाने में पर्यटकों की बड़ी भीड़ व्यस्त थी. दिन चढ़ते ही सैलानियों से भरी बसें आने लगी एवं यहाँ भीड़ बढ़ने लगी. 

बाहर निकला तो देखा खीरा बिक रहा है. पिताजी की बात याद आ गयी. वे कहा करते  थे कि सेहत के लिए सुबह का खीरा हीरा, रात का खीरा पीड़ा. बस, दो खीरा खरीदा और खाते-खिलाते हुए गाड़ी में बैठ गए. गाड़ी चली तो ड्राईवर ने बताया  कि वो सामने वर्तमान मुख्य मंत्री श्री पवन कुमार चामलिंग  का सरकारी आवास है. श्री चामलिंग पिछले 23 वर्षों से सिक्किम के मुख्यमंत्री हैं.  अगर गाड़ी के चालक ने न बताया होता तो देख कर अनुमान लगाना मुश्किल था कि यह प्रदेश के सबसे प्रभावशाली व्यक्ति का निवासस्थान है. कारण, न कोई आडम्बर, न बेरिकेडिंग  और न ही पुलिसिया तामझाम. आवागमन बिलकुल सामान्य. .... ....
                                                                                      (hellomilansinha@gmail.com)
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# साहित्यिक पत्रिका 'नई धारा' में प्रकाशित

Wednesday, July 5, 2017

मोटिवेशन : स्वच्छता क्या सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी है ?

                                                                  - मिलन  सिन्हा, मोटिवेशनल स्पीकर...
कल रात की हल्की बारिश के बाद आज सुबह जब बाजार की ओर निकला तो सामने की सड़क थोड़ी साफ़ लगी. देख कर अच्छा लगा. बारिश ने अपना काम किया था. लेकिन, थोड़ा और आगे बढ़ा तो खुशी गायब हो गई. एक बड़े मकान के सामने सड़क पर कचड़ा बिखरा पड़ा था. दो–तीन कुत्ते वहीं जमे थे. गाड़ियां    कचड़े का कचूमर निकालती, कचड़े को और दूर तक फैलाती बेपरवाह दौड़ लगा रही थी. यह दृश्य मुख्य सड़क पर पहुंचने तक कई जगह दिखा. आते-जाते लोग कचड़े से बच कर निकल रहे थे; कुछ संभ्रांत किस्म के लोग नाक पर रुमाल भी रखे दिखाई पड़े. 

आगे चौराहे पर एक नई बड़ी गाड़ी में बैठे चार-पांच पुलिस कर्मी खैनी मलने या मोबाइल में व्यस्त थे. ट्रैफिक पुलिस की ड्यूटी का समय अभी नहीं हुआ था. सड़क किनारे नियमित लगने वाले सब्जी-फल बाजार में अव्यवस्था का आलम था. गौर से इधर –उधर नजर दौड़ाई और कुछ सब्जी विक्रेताओं से पूछा तो पता चला कि कल दिन में नाले की उढ़ाई हुई और फिर जो रात में बारिश हुई, तो यह गन्दगी चारों ओर इस तरह बिखरनी ही थी. सभी विक्रेता नगर निगम को इस हाल के लिए दोष दे रहे थे. उनका कहना था कि नगर निगम टैक्स तो लेती है, लेकिन काम ठीक से नहीं करती. नाले की साप्ताहिक सफाई भी नहीं होती. जब भी सफाई- उढ़ाई होती है, नाले से निकले बदबूदार कचड़े का ढेर दो-तीन दिनों तक ऐसे ही पड़ा रहता है; भोर में कचड़ा उठाने के बजाय दुकानदारी शुरू होने के बाद नौ-दस बजे नगर निगम सड़क पर ट्रेक्टर लगा कर कचड़ा उठाती है और बदबू फैलाते हुए खुला ही ले जाती है. 

दरअसल, शहर को साफ़ –सुथरा रखने के नाम पर नगर निगम ऐसे ही कार्य करता रहा है. विडम्बना है कि प्रदेश में भाजपा की सरकार है, प्रधानमंत्री के स्वच्छता अभियान की खूब दुहाई दी जाती है, सफाई के मद में पहले से ज्यादा राशि खर्च करने की बात भी अखबारों में दिखती है, पर हकीकत कुछ और ही बयाँ करती है. 

यह तो हुई नगर निगम या सरकार के कार्यशैली की बात. पर स्वच्छता के मुत्तलिक बड़ा सवाल यह है कि एक जागरूक शहरी और समाज के रूप में हम सब क्या कर रहे हैं? स्वच्छता तो ‘स्व’ अर्थात  खुद से शुरू होता है न.

तो फिर चलते हैं वहीं जहां से यह चर्चा प्रारंभ हुई थी - अपनी गली में. गली में कचड़ा जिनके भी घर के सामने पड़ा और बिखरा हुआ मिले, क्या वे इसका समाधान अपने पड़ोसियों के साथ मिलकर आसानी से नहीं निकाल सकते? एक छोटी-सी पहल तो प्लास्टिक का कूड़ेदान रखकर कर ही सकते हैं, क्यों? फिर नगर निगम को नरक निगम कहना छोड़ उसके सफाई कर्मियों से कचड़े की नियमित सफाई का अनुरोध नहीं, आग्रह करें, जरुरत हो तो मिलकर करें. सार्थक परिणाम न निकले तो बात को आगे तक ले जाएं – मौखिक और लिखित दोनों स्तर पर. आखिर हमारे टैक्स के पैसे से ही नगर निगम के कर्मियों को वेतन मिलता है. यकीन मानिए, स्थिति सुधरेगी, बेशक कछुआ गति से. 

अब चलें सब्जी-फल के बाजार में. जिस भी कारण से और जिसकी भी अनुमति या सहमति से सड़क किनारे ये लोग दुकान लगाते हैं, अपने आसपास की सफाई का ध्यान तो रख ही सकते हैं. सड़ी-गली सब्जियां, सूखे-गले फल, बेकार पत्ते-कागज़ आदि जहां-तहां न फेंक कर, बगल के नाले में न डाल कर उन्हें छोटे-बड़े डस्टबीन में डाल सकते हैं. शाम को घर लौटने से पहले अपनी जगह की सफाई कर अवशेष को कूड़ेदान के सुपुर्द कर दें. जो लोग ऐसा न करें, उन्हें सब मिलकर समझाने का प्रयास करें. झगड़ने की जरुरत नहीं. बिलकुल न समझें तो निगम के अधिकारी से आग्रह करें. इतने से भी स्वच्छता के अभियान में कुछ योगदान तो कर ही लेंगे. 

मेरी तो स्पष्ट मान्यता रही है कि देश के एक आम नागरिक के रूप में हमें जो करना चाहिए, उसे हम करने का प्रयास करें, यथासाध्य करें. हर बात के लिए सरकार का मुखापेक्षी होना और सरकार पर निर्भर रहना कहां तक मुनासिब है. एक बात और, जब हम अपना कर्तव्य का निर्वाह करेंगे, तभी तो पूरी नैतिकता के साथ सरकार पर भी सही जोर डाल पायेंगे.             
                                                                                    (hellomilansinha@gmail.com)
                   और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं  

Friday, June 9, 2017

आज की बात : कौन ज्यादा जरुरी – 500 करोड़ से रांची में एक एलिवेटेड रोड या झारखण्ड के गांवों में 3.33 लाख शौचालय ?

                                                                                 - मिलन  सिन्हा
केन्द्रीय सड़क परिवहन एवं जहाजरानी मंत्री जहां जाते हैं, कुछ न कुछ दे कर आते हैं. अच्छी बात है. आज के अखबार में है कि वे झारखण्ड की राजधानी रांची आये और शहर के एक व्यस्ततम इलाके में एलिवेटेड रोड बनवाने में केन्द्रीय सहायता देने का एलान कर गए. इसमें 500 करोड़ की लागत आयेगी और इस पर जल्द ही काम शुरू किया जाएगा. राज्य सरकार इस एलिवेटेड रोड के निर्माण के लिए केन्द्रीय सहायता की मांग करती रही है.

सोशल मीडिया पर कल से ही इसकी चर्चा शुरू हो गई थी. कुछ लोगों ने इसका स्वागत किया, तो विपक्ष सहित कुछ ने इसे अनावश्यक बताया - बड़े प्रोजेक्ट के साथ बड़े कमीशन के लाभ का जिक्र भी किया.

बहरहाल, एक प्रश्न जो कई लोगों ने उठाई या आगे भी उठाये जायेंगे, वह यह कि जिस सड़क पर लगातार जाम लगने की दुहाई दे कर इस प्रोजेक्ट को लाने की घोषणा हुई, क्या वास्तव में इसकी नितांत आवश्यकता है. ऐसा इसलिए कि झारखण्ड जैसे राज्य में, जहां एक बड़ी आबादी को राज्य के निर्माण के 17 साल बाद भी पीने के पानी तक का अभाव झेलना पड़ता है, सब के लिए शौचालय निर्माण में अभी बहुत काम करना है, प्राइमरी स्कूलों तक में आधारभूत सुविधाओं की कमी बरकरार है, प्राइमरी हेल्थ सेंटर में दवा-डॉक्टर आदि तक की कमी है. इस सन्दर्भ में 500 करोड़ की राशि को राजधानी के एक एलिवेटेड रोड निर्माण में खर्च करना कहाँ तक उचित है. वह भी तब जब कि सरकार और प्रशासन ने उक्त व्यस्ततम रोड के दोनों ओर अतिक्रमित जगह को खाली करवाने, प्राइम टाइम में ट्रैफिक को बेहतर तौर पर रेगुलेट करने, एक दूसरे से जुड़ी दसाधिक गलियों को अतिक्रमण मुक्त कर विकसित करने जैसे तमाम विकल्पों पर शिद्दत से कारवाई तक न की हो.

बेहतर तो यह होगा कि मौजूदा व्यवस्था को ठीक करने की पुरजोर कोशिश लगातार की जाय, उस इलाके के आम लोगों का सहयोग और समर्थन प्राप्त करें, उन्हें जागरूक भी करते रहें, जरुरत हो तो अतिक्रमण हटा कर सड़क चौड़ीकरण करें और इस बीच 500 करोड़ जितनी बड़ी राशि से ग्रामीण इलाकों में विकास के बुनियादी कार्य करें. सोचिये, 500 करोड़ रुपये से रु.15000/- प्रति शौचालय के दर  से करीब 3.33 लाख शौचालय बनाए जा सकते हैं या रु. 10 लाख प्रति स्कूल के हिसाब से 5000 नए विद्यालय भवन बनाए जा सकते हैं  या ...
आम जनता के व्यापक हित में इन बातों पर गौर करना अनिवार्य है, क्यों कि कर और कर्ज से चलने वाली सरकारों को उचित प्राथमिकताएं तो तय करनी ही पड़ेगी.    ( hellomilansinha@gmail.com)
                    और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Wednesday, June 7, 2017

आज की बात : लोगों की मौत और हिंसक प्रदर्शन से आगे क्या ?

              -  मिलन सिन्हा
आज अखबार का हेड लाइन देखकर मन दुखी हो गया. मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले में प्रदर्शनकारी भीड़ पर फायरिंग से पांच किसान भाइयों के मरने की खबर थी. कहा जा रहा है कि उसके प्रतिक्रिया स्वरुप प्रदेश के कई अन्य भागों में भी हिंसक वारदातें हुई, लूटपाट, आगजनी और तोड़फोड़ की घटनाएं हुई.

जब भी कहीं किसी का असामयिक निधन होता है, तो अनायास ही उनके परिजनों का रोता-बिलखता चेहरा सामने आ जाता है. कुछ देर पहले जो व्यक्ति जीवित था, सक्रिय था, जिसके ऊपर कई पारिवारिक-सामाजिक जिम्मेदारी थी, जिसके कई सपने थे, कई लक्ष्य थे, एकाएक गुजर गया. यह सोचना भी मुश्किल होता है. लेकिन ऐसा हुआ और ऐसा कारण-अकारण होता रहता है कभी इस प्रदेश में तो कभी उस प्रदेश में.

ऐसे हमारे देश में सिर्फ ह्रदय रोग से हर दिन आठ हजार से ज्यादा लोग मरते हैं, न जाने कितने और लोग भूख से और अन्य अनेक रोगों से रोज दुनिया से उठ जाते हैं. लेकिन ऐसे सभी  व्यक्ति के मरने पर ट्रक, बस, कार में भीड़ द्वारा आग नहीं लगाईं जाती, तोड़फोड़ नहीं किये जाते, उपद्रव नहीं मचाये जाते, सड़क जाम नहीं किये जाते. होना भी नहीं चाहिए, क्यों कि समस्या है तो मिल-बैठकर समाधान ढूंढना बेहतर तरीका है. नहीं तो पूरा देश ही हर समय उपद्रवग्रस्त रहेगा, कितने और लोग परेशान होंगे, शायद कुछ और निर्दोष लोग ऐसे उपद्रव में मारे भी जायेंगे. संपत्ति की अनावश्यक हानि होगी, सो अलग

जरा सोचिये, समाज में अशांति फैलाने के लिए पेड उपद्रवियों (यानि पैसे के लिए कुछ भी करेगा टाइप उपद्रवीऔर उनके पीछे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से खड़े कतिपय राजनीतिक नेताओं को छोड़ कर ऐसा असामाजिक कृत्य कोई कैसे कर सकता है. फिर सोचने वाली बात यह भी है कि सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने से आम कर दाताओं का ही जेब ढीला होता है. ट्रक, बस आदि जलाने से बीमा कंपनियों द्वारा क्षति का भुगतान करना पड़ता है, जो प्रकारांतर से हमें और देश को आर्थिक नुकसान पहुंचाता है. ऐसे भी, कुछ लोगों के गैरकानूनी हरकतों के कारण हजारोंलाखों लोग आए दिन क्यों बेवजह मुसीबत झेलें.

लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शित करने के सैंकड़ों प्रभावी तरीके हैं जो हिंसक नहीं हैं और देश को हानि पहुंचाने वाले भी नहीं. अहिंसा के पुजारी और सत्याग्रह के प्रबलतम पक्षधर राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के देश में यह कौन नहीं जानता

तो क्या अब समय नहीं आ गया है कि देश भर में प्रशासन निष्पक्ष तरीके से ऐसे पेशेवर उपद्रवियों, उनको शह देने वाले नेताओं और ऐसे मौके पर अफवाह फैलाने वाले तत्वों की स्पष्ट पहचान करे और उन्हें कानून के मुताबिक़ यथाशीघ्र कठोर सजा दिलवाने की ठोस पहल करे.

कहने की जरुरत नहीं कि सभी दलों के अच्छे नेताओं को ऐसी किसी भी स्थिति से तीव्रता से निबटने के लिए प्रदेश सरकार के साथ मिलकर काम करना ही होगा. हां, आंदोलित भीड़ से निबटने के लिए पुलिस को और ज्यादा समर्थ, धैर्यवान एवं संवेदनशील बनाने की जरुरत तो है ही. उन्हें इस दिशा में निरंतर मोटिवेट करते रहने की भी जरुरत है.
                                                                                              ( hellomilansinha@gmail.com)
                 और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं
# प्रवक्ता . कॉम पर प्रकाशित

Tuesday, June 6, 2017

आज की बात : बारिश और बचपन

                                                             - मिलन  सिन्हा 
दो दिनों की गर्मी के बाद आज सुबह से ही कुछ अच्छा होने का आभास हो रहा था. कहते हैं कि प्रकृति विज्ञानी तो पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों की हरकतों से जान जाते हैं कि प्रकृति आज कौन-सा रंग दिखाने वाली है. बहरहाल, अपराह्न एक बजे के बाद से तेज हवा चलने लगी, बादल आने-जाने लगे और बस बारिश शुरू हुई तो एकदम झमाझम. बालकनी से घर के सामने और बगल में फैले आम, नीम, यूकलिप्ट्स, सहजन, अमरुद आदि के पेड़ों को बारिश में बेख़ौफ़ हंसते-झूमते देख कर बहुत ही अच्छा लग रहा था. सामने की भीड़ वाली सड़क पर अभी इक्के-दुक्के लोग छाता सहित या रहित आ-जा रहे थे. सड़क किनारे नाले में पानी का बहाव तेज हो गया था, पर सड़क पर कहीं बच्चे नजर नहीं आ रहे थे. इसी सोच-विचार में पता नहीं कब अतीत ने घेर लिया. 

बचपन में बारिश हो और हम जैसे बच्चे घर में बैठे रहें, नामुमकिन था. किसी न किसी बहाने बाहर जाना था, बारिश की ठंडी फुहारों का आनन्द लेते हुए न जाने क्या-क्या करना था. हां, पहले से बना कर रक्खे विभिन्न साइज के कागज़ के नाव को बारिश के बहते पानी में चलाना और पानी में छप-छपाक करना सभी बच्चों का पसंदीदा शगल था. नाव को तेजी से भागते हुए देखने के लिए उसे नाले में तेज गति से बहते पानी में डालने में भी हमें कोई गुरेज नहीं होता था. फिर उस नाव के साथ-साथ घर से कितनी दूर चलते जाते, अक्सर इसका होश भी नहीं होता और न ही रहती यह फ़िक्र कि घर लौटने पर मां कितना बिगड़ेगी.... अनायास ही गुनगुना उठता हूँ, ‘बचपन के दिन भी क्या दिन थे ... ... ...’  

आकाश में बिजली चमकी और गड़गड़ाहट हुई तो वर्तमान में लौट आया. यहाँ तो कोई भी बच्चा बारिश का आनंद लेते नहीं दिख रहा है, न कोई कागज़ के नाव को बहते पानी में तैराते हुए. क्या आजकल बच्चे बारिश का आनंद नहीं लेना चाहते या हम इस या उस आशंका से उन्हें इस अपूर्व अनुभव से वंचित कर रहे हैं या आधुनिक दिखने-दिखाने के चक्कर में बच्चों से उनका बचपन छीन रहे हैं. शायद किसी सर्वे से पता चले कि महानगर और बड़े शहरों में सम्पन्नता में रहने वाले और बड़े स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के लिए कहीं उनके अभिभावकों ने इसे अवांछनीय तो घोषित नहीं कर रखा है. चलिए, अच्छी बात है कि गांवों तथा कस्बों के आम बच्चे प्रकृति से अब तक जुड़े हुए हैं और इसका बहुआयामी फायदा पा रहे हैं. बरबस याद आ जाती है सर्वेश्वरदयाल सक्सेना  की ये पंक्तियां :
मेघ आए 
बड़े बन ठन के सँवर के.

आगे-आगे नाचती-गाती बयार चली,
दरवाज़े खिड़कियाँ खुलने लगीं गली-गली,
पाहुन ज्यों आए हों गाँव में शहर के

मेघ आए 
            बडे बन-ठन के सँवर के. ... ...

विचारणीय प्रश्न है कि हम जाने-अनजाने अपने बच्चों को प्रकृति के अप्रतिम रूपों को देखने-महसूसने से क्यों वंचित कर रहे हैं, उन्हें कृत्रिमता के आगोश में क्यों धकेल रहे हैं?  
  
हां, एक और बात. कहा जाता है कि बारिश में स्नान करने से घमौरियां ख़त्म हो जाती हैं, किसी तरह के कूल-कूल पाउडर की जरुरत नहीं होती. हमने तो ऐसा पाया है. क्या आपने भी ?
                                                                                            ( hellomilansinha@gmail.com)
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Monday, May 29, 2017

मोटिवेशन : सफलता और असफलता जीवन का एक हिस्सा है

                                                                      -मिलन सिन्हा, मोटिवेशनल स्पीकर 
सीबीएसई 12वीं के परीक्षार्थियों की प्रतीक्षा ख़त्म हो गई.  रिजल्ट की घोषणा हो चुकी.  स्वभाविक रूप से  कुछ बच्चे खुश हैं, तो कुछ बच्चे नाखुश. माता-पिता, शिक्षक, अभिभावक के लिए भी कहीं खुशी और कहीं गम का माहौल है. जिन बच्चों का रिजल्ट अच्छा नहीं हुआ, वे तो स्वयं मायूस, परेशान और तनाव ग्रस्त होंगे. सोच-विचार कर रहे होंगे कि अपेक्षित मार्क्स क्यों नहीं आये, कहां चूक हो गई, अभिभावक और शिक्षक क्या सोचेंगे, लोग क्या कहेंगे, आगे कहां और क्या पढ़ पायेंगे आदि. बावजूद इसके ज्यादातर अभिभावक अपने ऐसे मायूस बच्चों को पीटने-डांटने-कोसने से बाज नहीं आते हैं, जब कि वे भी जानते हैं कि बच्चे पर इसका नकारात्मक असर होगा और यह भी कि इससे बच्चे के इस रिजल्ट में कोई बदलाव नहीं होने वाला है. जो होना था, हो गया है. अब तो इसे खुले मन से स्वीकारने के अलावा कोई विकल्प भी नहीं. 

बेहतर ये होता है कि ऐसे मौके पर अभिभावक अपने-अपने बच्चे के साथ भावनात्मक रूप से खड़े रहें और दिखें भी. उन्हें प्यार करें; उनकी क्षमता पर भरोसा जताएं. एक काम और करें. ऐसे समय में  'पर-पीड़ा सुख' पाने के इच्छुक ऐसे सभी पड़ोसी और सगे-संबंधी से बच्चों को बचा कर रखना अनिवार्य है. बच्चों को भी गम के दरिया में डुबकियां लगाने, अंधेरे कमरे  में बैठ कर खुद को कोसने और अपने दोस्तों के रिजल्ट से तुलना करने और  दूसरे को दोष देने  के बजाय 'टेक-इट-इजी'  सिद्धांत  का पालन करते हुए शांत रहने की कोशिश करनी चाहिए. 

जीवन से बड़ा कुछ भी नहीं. यह जीवन अनमोल है. अब्राहम लिंकन, महात्मा गांधी, अल्बर्ट आइंस्टीन एवं  ए पी जे अब्दुल कलाम सहित अनेकानेक महान लोगों की जिंदगी असफलताओं के बीच से होकर अकल्पनीय सफलता-उपलब्धि हासिल करने की कहानी कहता है. ऐसे भी, हम सभी जानते हैं कि सफलता-असफलता सभी के जीवन में आते रहते हैं. बेहतर उपलब्धि के लिए सतत कोशिश करते रहना ज्यादा महत्वपूर्ण होता है. 

हां, अब तो अपने देश में 12वीं के बाद बहुत सारे रोजगार उन्मुखी कोर्स शुरू हो गए हैं. सोच-समझ कर दाखिला लेने से भविष्य में कई फायदे होंगे.   

ऐसे, रिजल्ट खराब अथवा आशा के अनुरूप नहीं होने के एक नहीं, अनेक कारण हो सकते हैं.  किसी भी कारण से इस बार अगर अपेक्षित परिणाम नहीं मिले, तो उन कारणों की गहन समीक्षा खुले मन और ठंढे दिमाग से अर्थात निरपेक्ष भाव से तीन-चार  दिनों के बाद करनी चाहिए, तुरन्त तो कदापि  नहीं. 

तो अगले दो दिनों तक क्या करें ? पहला तो, अपने रिजल्ट को पूरी तरह स्वीकार करें. दूसरा, किसी के भी डांट- फटकार, कटाक्ष, आलोचना, व्यंग्य आदि को दिल से न लें. तीसरा, अच्छे से स्नान कर पसंदीदा ड्रेस पहनकर आईने के सामने जाकर मुस्कुराएं और खुद को देर तक निहारते हुए मन ही मन दोहरायें - जो हुआ, ठीक ही हुआ. मैंने जैसी परीक्षा दी, परिणाम कमोबेश उसी के अनुरूप आया. ऐसे भी, मुझे जीवन में अनेक छोटी -बड़ी परीक्षाएं देनी हैं, सफलता-असफलता के अलग-अलग दौर से गुजरना है, तो अब मायूसी किस बात की. पीछे कोई भूल  हुई है तो उसे आगे नहीं दोहराएंगे, खूब मेहनत करेंगे. आगे हम जरुर  कामयाब होंगे, मन में है मेरे यह विश्वास....मन हल्का हो जायगा, हैप्पी-हैप्पी फील होगा. माता-पिता सहित घर के सभी बड़ों का आशीर्वाद  लें और उन्हें आगे बेहतर रिजल्ट का आश्वासन दें. फिर खुशी -खुशी खाना खाएं, टीवी में कॉमेडी शो या फिल्म देखें और रात में जल्दी सो जाएं. यकीन मानिए, आपका कल आज से जरुर बेहतर होगा. आप सफल तो होंगे ही, स्वस्थ भी रहेंगे और आनंदित भी.     
                                                                                       ( hellomilansinha@gmail.com)
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Tuesday, April 25, 2017

मोटिवेशन: खुद पर भरोसा रखें; खुद से प्यार करें

                                         -  मिलन  सिन्हा, मोटिवेशनल स्पीकर...
क्या हम वाकई खुद से प्यार करते हैं ?  एक हिन्दी फिल्म के गाने का मुखड़ा है, प्यार बांटते चलो ... ...सही है. हम नफरत क्यों बांटे, खुद को और अपने समाज को गन्दा क्यों करें; कमजोर क्यों करें ? लेकिन अपने पास प्यार की पूंजी होगी, तभी तो हम बाटेंगे न, क्यों ? क्रिस्टिना पेरी का कहना है, ‘यह जरुरी है कि आप खुद से सौ फीसदी प्यार करें, तभी आप किसी दूसरे को प्यार कर सकते हैं.’

सुबह उठते ही हम सभी अपने –आप को आईने में देखना पसंद करते हैं. देखें, जरुर देखें, पर सिर्फ एक पल के लिए नहीं, बल्कि थोड़ा  रुकें और खुद को गौर से देखते हुए सवाल पूछें कि क्या मुझसे बेहतर मुझे कोई और जानता है या जान भी सकता है ? क्या मै इस संसार में यूँ ही आया हूँ और ऐसे ही एक दिन यहाँ से चला भी जाऊँगा; या कि मेरा भी जन्म एक दिव्य शक्ति के साथ हुआ है; मेरे अन्दर भी असीमित क्षमता है बहुत कुछ अच्छा करने के लिए - जिससे मेरा हित हो और मेरे समाज का भी ? क्या मैं आज को बीते हुए कल से थोड़ा बेहतर बनाने का प्रयास नहीं कर सकता ? 

यकीनन, आपको सकारात्मक उत्तर मिलेगा. और तब एक छोटे से मुस्कान के साथ खुद को सिर्फ गुड मॉर्निंग नहीं, वेरी गुड मॉर्निंग कहें. तत्पश्चात मन ही मन जोर से बोलें, हाँ, मैं कर सकता हूँ और जरुर करूँगा. करके देखिए, बहुत अच्छा लगेगा. आपको  एक अनोखी-सी वेलनेस की फीलिंग महसूस होगी. आप खुद को थोड़ा ज्यादा उत्साहित व उर्जावान पायेंगे और आपका दिन बेहतर गुजरेगा. ऐसे भी अंग्रेजी में कहते हैं, ‘मॉर्निंग शोज दि डे’  और यह भी कि ‘वेल बिगन इज हाफ डन’   

इतिहास गवाह है कि महान व्यक्तियों की जिन्दगी इन्हीं बातों को जानते-समझते हुए कार्य करते रहने और रोज खुद को उन्नत करते जाने की यात्रा रही है. उन्होंने खुद से प्यार करना सीखा और विपरीत परिस्थिति में भी खुद पर भरोसा कम नहीं होने दिया. असफलता के दौर में भी उन्होंने खुद से प्यार करना नहीं छोड़ा, अपितु उन पलों में वे आलोचना, आरोप, अपशब्द आदि से अविचलित रह कर अपने से और ज्यादा जुड़े,  अपने को एक सच्चे दोस्त की भांति संभाला और  खुद की हौसला आफजाई भी की. 

हाँ, यह सही है कि  खुद को  रोज उन्नत करते जाना, खुद अपने साथ हर परिस्थिति में मजबूती से खड़े रहना आसान नहीं है, लेकिन यह नामुमकिन भी नहीं है. तभी तो राष्ट्र कवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ कहते है, 

“ खम ठोक ठेलता है जब नर, पर्वत के जाते पांव उखड़; 
मानव जब जोर लगाता है, पत्थर पानी बन जाता है ....” 

हम सभी जानते हैं कि कुछ पाने के लिए कुछ करना पड़ता है. अतः दिन की शुरुआत आशा और उत्साह के साथ करें ; संकल्प और पूरे सामर्थ्य के साथ करें. सुबह का एक घंटा खुद पर इन्वेस्ट करें – खुद को शारीरिक एवं मानसिक रूप से पूर्णतः तैयार करने के लिए. लेकिन सवाल है, यह सब कैसे करें ? 60 मिनट को तीन हिस्से में बांट लें. सुबह जागने के बाद पहले बीस मिनट में शौच आदि से निवृत हो लें. फिर अगले चरण में शरीर की जड़ता को, जो रात भर सोने के कारण स्वभाविक रूप से महसूस होती है, सामान्य व्यायाम अथवा पवनमुक्तासन से दूर करें. तत्पश्चात अगले बीस मिनट में प्राणायाम और ध्यान का निष्ठापूर्वक अभ्यास कर लें. नियमित रूप से सुबह के इस एक घंटे का आस्थापूर्वक सदुपयोग करने पर आप जल्द ही खुद को काफी बेहतर अवस्था में पायेंगे. रोजमर्रा के जीवन में समस्याओं को देखने एवं उनसे निबटने का आपका नजरिया ज्यादा सकारात्मक होता जाएगा और समाधान तक पहुंचना आसान  भी. इससे आपके कार्यक्षमता में वृद्धि होगी तथा आपकी उत्पादकता में गुणात्मक सुधार भी. परिणाम स्वरुप अव्वल तो आप और ज्यादा अच्छा महसूस करेंगे, दूसरे खुद से और ज्यादा प्यार करने लगेंगे और खुद पर आपका भरोसा और सुदृढ़ होगा. और तब आप अनायास ही गुनगुना उठेंगे : 

हम हैं राही प्यार के ... या यह कविता भी : हममें  भी है दम, बढ़ चले अब हमारे भी कदम ...
                                                                                (hellomilansinha@gmail.com)
                  और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 

# बैंक ऑफ़ इंडिया की गृह पत्रिका "तारांगण" के दिसम्बर'16 अंक में प्रकाशित 

Thursday, March 23, 2017

प्रेरक प्रसंग : नमक और सत्याग्रह

                                                                                   - मिलन सिन्हा 
मात्र 11 वर्ष की उम्र में ही राममनोहर लोहिया अपने पिता श्री हीरालाल लोहिया के साथ गाँधी जी से पहली बार मिले थे. पिता तो गाँधी भक्त थे ही, पुत्र  भी प्रथम दर्शन में ही प्रभावित  हुए. फिर तो लोहिया जी ने अपनी शक्ति और बुद्धि के अनुसार राजनीति में प्रवेश के अपने प्रथम चरण में बी. ए. पास करने तक देश में गाँधी जी के नेतृत्व में चल रहे आन्दोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई. उसके बाद बर्लिन में अपने शोधकार्य के दौरान भी उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण अवसरों पर गाँधी जी के कार्यक्रमों एवं देश में चल रहे स्वतंत्रता संग्राम के औचित्य की सशक्त वकालत की. गाँधी जी के प्रति उनकी श्रद्धा एवं उनके कार्यक्रमों के प्रति उनकी आस्था का इससे अच्छा और क्या प्रमाण होगा कि लोहिया जी ने 'नमक और सत्याग्रह' विषय पर वर्ष 1932 में अपना शोध प्रबंध पूरा कर बर्लिन विश्वविद्द्यालय से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की. 
                                                                                 (hellomilansinha@gmail.com)
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

डॉ. राममनोहर लोहिया  के  जन्मदिन  के अवसर पर 

Monday, March 13, 2017

बातों-बातों में : होली के मौके पर थोड़ी तुकबंदी (सन्दर्भ : उत्तर प्रदेश चुनाव-2017)

                                                                        - मिलन  सिन्हा 

सब कुछ हो गया शांत,
थम गया चुनाव का शोर. 
ढूंढें जरा,कहाँ छुपे हैं पीके,
सबके चहेते प्रशांत किशोर. 

जानना चाहते है सभी यूपीवासी,  
पीके ने ऐसा करतब कैसे कर दिखाया?
साइकिल पर सवार दो युवाओं को 
कैसे हार के गर्त में पहुंचाया?

.....होली की असीम शुभकामनाएं.
                                                          (hellomilansinha@gmail.com)
                   और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 

Saturday, March 11, 2017

बातों-बातों में : उत्तर प्रदेश चुनाव-2017 के नतीजे

                                                                                          - मिलन सिन्हा 
उत्तर प्रदेश सहित पांच राज्यों के चुनाव परिणाम आ गए. सुबह से देश-प्रदेश के ढेर सारे न्यूज़ चैनल्स (मूलतः राजनीतिक न्यूज़ को समर्पित) लगातार रुझान और फिर परिणाम पर घनघोर चर्चा कर रहे हैं, नेताओं -पत्रकारों के विचार ले रहे हैं. यह सिलसिला अभी जारी रहेगा, कुछ कम -ज्यादा तीव्रता के साथ जब तक इन राज्यों में नई सरकार स्थापित नहीं हो जाती.

दीगर बात है कि चुनाव परिणाम आने से पहले तक सभी बड़ी पार्टियां अपने-अपने जीत का दवा करती हैं. फिर चुनाव परिणाम आने के बाद हार -जीत के हिसाब से उनके नेताओं का बयान -स्पष्टीकरण भी आ जाता है - ज्यादातर तर्क व तथ्य से परे. एक-दो बानगी देखिए:

22 करोड़ की आबादी वाले देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के 403 सीटों में से भाजपा ने 312 सीटों पर विजय प्राप्त की है, लेकिन बसपा की नेता मायावती जी कहती हैं कि ऐसा इवीएम (वोटिंग मशीन) में छेड़छाड़ करके किया गया यानी उत्तर प्रदेश की सपा सरकार और उनके अधीन काम करने वाला प्रशासन सत्तारूढ़ पार्टी और बसपा को चुनाव में हराने के लिए वोटिंग मशीन के साथ छेड़छाड़ करता रहा और खुद मुख्यमंत्री तथा निर्वाचन आयोग मूक दर्शक बना रहा..... 

2. सपा सरकार और निवर्तमान मुख्यमंत्री और सपा अध्यक्ष अखिलेश जी कहते है कि प्रदेश के मतदाता बहकावे में आ गए यानी कल तक जो मतदाता समझदार था, "हाथ" से हाथ मिला रहा था और "साइकिल" की सवारी करने को प्रतिबद्ध था, मतदान के दिन बहक गया, नासमझ हो गया. ...

उत्तर प्रदेश में चुनाव की तारीखों की घोषणा के बाद से आज सुबह तक सोशल मीडिया या न्यूज़ चैनल्स या समाचार पत्रों में आये ज्यादातर हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकारों व संपादकों (कुछ पूर्व संपादकों जो अपने अतीतगान में लगे रहते हैं, सोशल मीडिया पर रोज न जाने क्या-क्या लिखते रहते हैं) के विचारों-रपटों पर गौर कर लें, तो आपको उनके Intellectual dishonesty का अंदाजा लग जाएगा. शायद यही कारण रहा कि पूरे उत्तर प्रदेश का दौरा करने व वहां के मतदाताओं का मिजाज समझने का दावा करने के बावजूद ये लोग भाजपा के इस अभूतपूर्व जीत का संकेत तक नहीं दे पाए. ऐसे लोग खुद को समाचार जगत के नामचीन प्रतिनिधि तो बताते रहते हैं, लेकिन क्या इनका आचरण सम-आचार के बुनियादी सिद्धांत के अनुरूप है ? Either they fail to see the obvious or reporting otherwise even by seeing the truth or knowing the real fact.

इसे आप क्या कहेंगे ?

अंत में एक  छोटा-सा तथ्य आपके विचारार्थ व आपके निरपेक्ष मंतव्य हेतु : 
इन पांच राज्यों में हुए चुनाव में कुल 690 सीटों, जिसमें अकेले उत्तर प्रदेश में 403 हैं, के लिए चुनाव हुए और इनमें  से सिर्फ भाजपा ने अकेले करीब 406 सीटों (58 .84%) पर जीत हासिल की, जब कि भाजपा ने सभी 690 सीटों पर चुनाव नहीं लड़े. एक बात और. पहले भाजपा को इन राज्यों में  मात्र 110 सीटें हासिल थी. 

....इसे आप किसी भी पार्टी के लिए कैसी उपलब्धि मानते हैं? 
                                                                         (hellomilansinha@gmail.com)
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