Saturday, October 5, 2019

टेंशन को जल्द कहें ना

                                                            - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर... ....
हाल ही में एक शैक्षणिक संस्थान में सिविल सर्विसेस प्रतियोगिता परीक्षा की  तैयारी कर रहे  छात्र-छात्राओं के एक बड़े समूह से बातचीत करने के क्रम में मैंने एकाधिक बार उनसे कहा कि कुछ भी हो, पर टेंशन नहीं लें. चिंता नहीं, चिंतन करें. हेल्दी रहें. विद्यार्थियों के चेहरे पर आए तात्कालिक भाव को पढ़कर लगा कि उन्हें मेरी बात अच्छी लगी. फिर भी सेशन के अंत में कुछ विद्यार्थियों ने पूछ ही लिया कि आखिर टेंशन को कैसे कहें ना? विशेषज्ञ कहते हैं कि कारण जानेंगे तो निवारण भी पा लेंगे. तो पहले मूल बात पर गौर कर लेते हैं  कि टेंशन आखिर होता क्यों है?

निरंतर बढ़ती प्रतिस्पर्धा के मौजूदा समय में बहुत सारे विद्यार्थी टेंशन में रहते हैं और दिखते भी हैं. हां, कई लोग अपना टेंशन छुपाने में सफल भी रहते हैं, यद्दपि ऐसे लोग ऐसा करके  कई बार अपना टेंशन और बढ़ा लेते हैं. आपने भी देखा होगा कि एक जैसी परिस्थिति में दो विद्यार्थी अलग-अलग मानसिक स्थिति में रहते हैं. पहला फ़िक्र और टेंशन से परेशान है तो दूसरा बेफिक्र और मस्त. पहला जहां यह गाना गाता प्रतीत होता है कि जिंदगी क्या है, गम का दरिया है ...तो वहीँ  दूसरा यह गाता हुआ लगता है कि "मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया, हर फ़िक्र को धुंए में उड़ाता चला गया...."  

बहरहाल, प्रतियोगिता परीक्षा में शामिल होनेवाले विद्यार्थियों को केंद्र में रखकर इस चर्चा  को आगे  बढ़ाएं  तो यह कहना मुनासिब होगा कि यहां टेंशन के अनेक कारण हो सकते हैं. प्लस टू , ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन के बेसिक क्वालिफिकेशन के बाद प्रतियोगिता परीक्षा से विद्यार्थियों का वास्तव में सीधा सामना होता है. आईआईटी-एनआईटी, नीट, बैंकिंग, रेलवे, एसएससी, आईआईएम,  सिविल सर्विसेस या अन्य प्रतियोगिता परीक्षा की बात करें, तो  हर जगह  सिलेबस बड़ा हो जाता है.  विषय ऐच्छिक और अनिवार्य दोनों होते हैं. प्रश्नों का पैटर्न भिन्न  होता है. सामान्यतः पास मार्क्स जैसी कोई बात नहीं होती. बस उपलब्ध सीटों  के हिसाब से प्रतियोगिता में शामिल विद्यार्थियों की कुल संख्या में से सबसे अच्छे अंक अर्जित करनेवाले विद्यार्थियों का चयन होता है. ऐसे में दिमागी कनफूजन, सफलता के प्रति संशय, असफलता का डर, घरवालों की अपेक्षा पर खरा न उतरने पर उपेक्षा की आशा, अनहोनी की आशंका आदि टेंशन के आम कारण होते हैं. यूँ तो कई विद्यार्थी कभी-कभी बस बिना कारण भी टेंशन में पाए जाते हैं.

जानकार कहते हैं कि अगर आप केवल एक हफ्ते तक रोज रात को सोने से पहले दिनभर के कार्यों-व्यस्तताओं की निरपेक्ष समीक्षा करें तो आप पायेंगे कि अमूमन कितना समय आपने  रोज टेंशन में गुजारा है. अब खुद ही यह भी विवेचना करें कि जिन बातों को लेकर टेंशन में रहे, उनमें से कितने टेंशन करने लायक थे और कितने बेवजह. सर्वे बताते हैं कि आधा से ज्यादा समय छात्र-छात्राएं अकारण ही टेंशन में रहते हैं. मजे की बात है कि जब भी आप टेंशन में रहते हैं उस समय आप जो भी कार्य करते हैं, मसलन पढ़ना-लिखना, खेलना या और भी कुछ, उसमें आपकी  उत्पादकता या परफॉरमेंस औसत से बहुत कम होता है. मानसिक रूप से आप अशांत और नाखुश रहते हैं. ऐसे में आपका मेटाबोलिज्म दुष्प्रभावित होता है. आपका  पाचनतंत्र से लेकर अन्य ऑर्गन सामान्य ढंग से काम नहीं करते, जो स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह  साबित होता है.

तो फिर टेंशन को ना कहने के लिए क्या करना चाहिए? सबसे पहले अपने लक्ष्य के प्रति खुद को पूर्णतः समर्पित करते हुए जो कुछ कर सकते हैं उसे करने की पूरी कोशिश करें. झूठ-फ़रेब से दूर रहें. दिनभर का एक रुटीन बना लें और उस पर पूरा अमल करें. सही कहा है किसी ने कि कोशिश करनेवालों की कभी हार नहीं होती. देर हो सकती है, पर अगर आप शिद्दत से कोशिश करते रहें तो आप लक्ष्य तक पहुंचेंगे जरुर. इस दौरान महात्मा गांधी के इस कथन को याद रखना आपको उर्जा व प्रेरणा देगा कि हम जो करते हैं और हम जो कर सकते हैं, इसके बीच का अंतर दुनिया की ज्यादातर समस्याओं के समाधान के लिए पर्याप्त होगा. एक बात और. आपके प्रयासों का आकलन आपसे बेहतर शायद ही कोई कर सकता है. अतः दूसरों की राय से न तो बहुत खुश हो और न ही एकदम दुखी. खुद पर और अपनी कोशिशों पर हमेशा भरोसा करें. गलती हो गई हो तो अव्वल तो उसे दोहराएं  नहीं, उसे यथाशीघ्र सुधारें. छोटी-मोटी परेशानियों को तत्काल सुलझाने  या फिर झेलने या इग्नोर करने की आदत बना लें, जिससे कि आप बड़े और महत्वपूर्ण टास्क पर ध्यान केन्द्रित कर सकें. हर समय इस मानसिक सोच से काम करें कि अच्छे तरीके से कोई भी काम करेंगे तो अंततः उसका परिणाम अच्छा ही होगा. इन सरल उपायों से आप टेंशन को एक बड़ा-सा 'ना' कह सकेंगे. 
(hellomilansinha@gmail.com)

                 
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं  
#For Motivational Articles in English, pl. visit my site : www.milanksinha.com

Tuesday, October 1, 2019

हमेशा युवा बनें रहें

                                                            - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर... ....
सभी जानते और मानते हैं कि किसी भी देश का युवा उस देश के निर्माण और विकास में अहम रोल अदा करता है. हमारे देश को तो युवाओं का देश कहा जाता है, क्यों कि संसार के सबसे ज्यादा युवा हमारे देश में रहते हैं. कॉलेज एवं यूनिवर्सिटी में पढ़नेवाले छात्र-छात्राओं  के अलावे स्कूल के अनेक विद्यार्थियों को भी युवा की  श्रेणी में रखा जा सकता है. ऐसे, सही अर्थों में उम्र ही युवा होने का एकमात्र मापदंड नहीं होता है. युवा कहलाने के लिए हर विद्यार्थी में  कुछ सामान्य गुणों का होना भी जरुरी माना गया है. स्वामी विवेकानंद इसे इन शब्दों में परिभाषित करते हैं : युवा वह है जो अनीति से लड़ता है; जो दुर्गुणों से दूर रहता है; जो काल की चाल को बदल देता है; जिसमें जोश के साथ होश भी है; जिसमें राष्ट्र के लिए बलिदान की आस्था है; जो समस्याओं का समाधान निकालता है; जो प्रेरक इतिहास रचता है; जो बातों का बादशाह नहीं, बल्कि करके दिखता है. आगे वे यह भी बताते हैं कि यह संसार ही चरित्र-गठन हेतु एक विशाल नैतिक व्यायामशाला है, जिसमें हम सबको नियमित अभ्यास से इसे हासिल करना पड़ता है.

स्वामी जी के इन विचारों की कसौटी पर अगर हरेक विद्यार्थी अपने को कसे तो उन्हें अपने व्यक्तित्व में ऐसे कई गुणों का अभाव दिखेगा. इसमें अस्वाभाविक कुछ नहीं है. कोई भी विद्यार्थी जन्म से ही सभी अच्छे गुणों से युक्त नहीं होता. इसके लिए सतत प्रयासरत रहना आवश्यक माना गया है. उसी तरह कोई भी बच्चा अवगुणों के साथ जन्म नहीं लेता है. सारी बुरी आदत - झूठ बोलना, व्यसन करना अर्थात शराब, ड्रग्स, सिगरेट, गुटका, तम्बाकू आदि का सेवन करना, मारपीट, तोड़फोड़, लूटपाट, छेड़खानी आदि में शामिल रहना, बुजुर्गों का अनादर-अपमान करना या किसी  गैर कानूनी कार्य में संलिप्त रहना, सब कुछ यहीं उनकी आदत में शुमार होता है. इसके लिए किसी दूसरे को दोष देना और आगे उन्हीं आदतों से ग्रसित रहना खुद को धोखा देना है. फिर भी ऐसा कहना ठीक नहीं होगा कि गलत आदतों से ग्रस्त कोई विद्यार्थी उससे बाहर नहीं आ सकता. हां,  इसके लिए उन्हें ही ठोस निर्णय लेकर सही दिशा में बढ़ते रहना होगा. दूसरे लोग इस कार्य में बस उनकी कुछ सहायता कर सकते हैं, उनको अच्छा सीखने एवं करने के लिए मोटीवेट कर सकते हैं और जरुरत हो तो सिखा भी सकते हैं. इसी कारण अभिभावक, शिक्षक, अच्छे दोस्त और प्रकृति भी हर समय उनके साथ होते हैं. जॉन लुब्बोक तो कहते हैं, "पृथ्वी और आकाश, जंगल और मैदान, झीलें और नदियां, पहाड़ और समुद्र ये सभी उत्कृष्ट शिक्षक हैं और हममें से कुछ को इतना सिखाते हैं  जितना हम किताबों से नहीं सीख सकते."  कहने की दरकार नहीं कि देश-विदेश में अनेक विद्यार्थी हैं जिन्होंने गलत कार्य और मार्ग को एक झटके में छोड़ दिया और फिर सही मार्ग पर चलते हुए सच्चे युवा होने का धर्म बखूबी निभाया है.  

सच तो यह है कि यह जिंदगी आपको रोज यह अवसर -छोटा या बड़ा, देती है जिससे आप तमाम परेशानी या समस्या के बावजूद सद्गुणों को समेटते चल सकते हैं. देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने एक भाषण में कहा है, "समस्‍याएं होती है. हर किसी के नसीब में मक्‍खन पर लकीर करने का सौभाग्‍य नहीं होता है. पत्‍थर पर लकीर करने की ताकत होनी चाहिए और अगर हम अपने आप को युवा कहते हैं तो उसकी पहली शर्त यह होती है कि वो मक्‍खन पर लकीर करने के रास्‍ते न ढूंढे, वो पत्‍थर पर लकीर करने की ताकत के लिए सोचे. अगर यही इरादे लेकर के हम चलते हैं तो हम अपनी तो जिन्‍दगी बनाते हैं, साथ ही कइयों की जिन्‍दगी में बदलाव लाने का कारण भी बनते हैं.

जाहिर है कि हर विद्यार्थी को जो खुद को युवा कहता और मानता है, उन्हें स्वामी जी और अन्य महान लोगों की महत्वपूर्ण बातों को एक स्थान पर मोटे अक्षरों में लिखकर रखना चाहिए. रोज एक बार उसे बढ़िया से पढ़ना और उस पर चिंतन करना चाहिए, जिससे कि उस पर दृढ़ता से अमल करना आसान हो जाए. जीवन के इस लम्बे और सबसे अहम दौर में विद्यार्थियों को यह भी सुनिश्चित करते रहने की जरुरत है कि वे  शारीरिक और मानसिक रूप से बराबर स्वस्थ और सजग रहें. आलस्य एवं उदासी को पीछे छोड़ कर्मपथ पर आगे बढ़ते हुए जीवन के इन्द्रधनुषी रंगों का खुद तो आनंद लें ही, दूसरों को भी इसका भरपूर आनंद लेने दें. ऐसे भी फ्रांज काफ्का ने सही कहा है, "युवा खुश रहता है क्यों कि उसमें सौन्दर्य देखने की क्षमता होती है. जो व्यक्ति खूबसूरती को तलाश सकता है, वह कभी बूढ़ा नहीं होता." तो फिर हमेशा युवा बनें रहें.
(hellomilansinha@gmail.com)

                 
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं  
#For Motivational Articles in English, pl. visit my site : www.milanksinha.com

Tuesday, September 24, 2019

अपेक्षा प्रबंधन के लाभ अनेक

                                                        - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर... ....
विलियम शेक्सपियर कहते हैं कि अपेक्षा दिल टूटने का बड़ा कारण है. सही है. दूसरे से अपेक्षा कम तो निराशा भी कम, कुछ विद्यार्थी ऐसा भी कहते व मानते हैं. लेकिन अनेक विद्यार्थी दूसरों से अपेक्षा रखते हैं कि वे उनकी मदद करें; उनके काम आएं, बेशक वे खुद दोस्तों-सहपाठियों की मदद करें या नहीं करें. फिर भी जब अपेक्षा के अनुरूप कोई उनको हेल्प करता है तो अच्छा लगता है. लेकिन अनेक मामलों में ऐसा नहीं होता है. तब उनको बहुत बुरा लगता है. ऐसा तब होता है जब हर विद्यार्थी को बचपन से ही घर-बाहर हर जगह  यह बताया और सिखाया जाता है कि हमेशा जरुरतमंदों की मदद करें, लेकिन बदले में उनसे कुछ भी अपेक्षा न करें. मिल गया तो ठीक, नहीं मिला तो भी ठीक. संस्कार युक्त परिवारों में यह सीख भी दी जाती है कि जीवन की सार्थकता पाने से ज्यादा देने में है.  कई विद्यार्थियों के लिए तो देने का सिलसिला ज्ञान दान के रूप में स्कूल से ही शुरू हो जाता है. अपने आसपास आपने भी कई विद्यार्थियों को घर-बाहर के बच्चों को पढ़ाते देखा होगा.

मानव जीवन को गौर से देखें तो बचपन से विद्यार्थी जीवन तक हम सभी  मोटे तौर पर माता-पिता, बड़े-बुजुर्ग, शिक्षकगण और समाज से बहुत कुछ सिर्फ प्राप्त  ही करते हैं. सो, हमें पाने की एक आदत-सी लग जाती है. आगे भी अपेक्षा करने और पाने का यह सिलसिला जारी रहता है, जब कि होना यह चाहिए कि जब विद्यार्थी पढ़-लिखकर अपने पांव पर खड़ा हो जाए; स्वावलंबी, समर्थ और समृद्ध हो जाए, तब वह समाज को यथासाध्य देना-लौटना शुरू कर दे. पाने की अपेक्षा को कम करके देने की भावना को तीव्र करे.

बहरहाल, काबिलेगौर बात यह है कि बाजारवाद की आज की दुनिया में जब रिश्ते लेनदेन यानी गिव एंड टेक पर आधारित होते जा रहे  हैं, तब विद्यार्थियों के लिए यह और भी जरुरी हो जाता है कि वे अपने दोस्तों -रिश्तेदारों के साथ के संबंधों  को अपेक्षा की तराजू पर न तौलें. वास्तविक जीवन जीने का सतत प्रयास करें. ऐसा इसलिए कि अपेक्षा और उपेक्षा का भाव साथ-साथ चलते हैं. हम दूसरों से जितनी ज्यादा अपेक्षा रखते हैं, उतनी ज्यादा उपेक्षा की संभावना भी रहती है. मसलन आप अगर किसी दोस्त से बहुत अपेक्षा रखते हैं, उससे वह नहीं मिलने पर आपको उपेक्षा का गहरा एहसास होता है. परिणामतः आपसी समझबूझ में कमी आती है; मनमुटाव बढ़ता है और अंततः वर्षों के रिश्ते बेवजह टूट जाते हैं. इससे आप भी दुष्प्रभावित होते हैं. इसके विपरीत जिनसे आप कोई अपेक्षा नहीं रखते, वह आपके काम के बदले कुछ करे-न-करे आपको कोई खास फर्क नहीं पड़ता.

हां, हर विद्यार्थी को खुद से बहुत अपेक्षा होती है जो बहुत स्वाभाविक है. ज्ञानीजन कहते हैं कि  वे सभी  विद्यार्थी जो ज्यादा स्वाभिमानी होते हैं, वे खुद से कुछ ज्यादा ही अपेक्षा रखते हैं, क्यों कि उन्हें अपनी क्षमता पर पूरा यकीन होता है. उन्हें किसी बैसाखी के सहारे चलना मंजूर नहीं. वे आंख खोलकर सपने देखने और उन्हें साकार करने में दृढ विश्वास रखते हैं. कड़ा परिश्रम करते हैं. लेकिन यहां भी विद्यार्थियों को कुछ बातों का ध्यान रखने की जरुरत है. 

हर विद्यार्थी को परीक्षा में अच्छा अंक लाने की अपेक्षा रहती है जो कि वास्तव में परीक्षा पूर्व उनकी तैयारी और परीक्षा में उनके वास्तविक प्रदर्शन पर निर्भर करता है. इस सच्चाई के इतर अगर  कोई विद्यार्थी ठीक से अध्ययन न करे और सिर्फ यह अपेक्षा करे कि परिणाम अच्छे होंगे तो उसे निराशा तो होगी ही. प्रतियोगिता परीक्षा में आपको तो यह मालूम होता है कि आपकी  तैयारी  कैसी है, लेकिन आप यह  नहीं जानते कि बाकी हजारों-लाखों प्रतिभागी कितनी तैयारी के साथ परीक्षा में शामिल हो रहे हैं. ऐसे में सेलेक्शन के प्रति आपकी  अपेक्षा यथार्थ पर आधारित होनी चाहिए. ऐसा नहीं होने की स्थिति में आप अनावश्यक निराशा और अवसाद से ग्रस्त हो सकते हैं. जिन प्रतियोगिता परीक्षाओं में लिखित परीक्षा के अलावा इंटरव्यू और ग्रुप डिस्कशन भी रहता है, वहां तो आपका अपेक्षा प्रबंधन बहुत ही यथार्थवादी होना जरुरी है. दूसरे शब्दों में कहें तो आप दूसरों से न्यूनतम अपेक्षा रखें, खुद से जो अपेक्षा हो उसके अनुरूप तैयारी और परफॉर्म करें और हमेशा यथार्थवादी दृष्टिकोण से परिणाम का आकलन और विश्लेषण करें. इससे आपकी उत्पादकता बेहतर होगी और रिजल्ट भी. इसी वर्ष जनवरी में परीक्षा पर चर्चा विषय पर छात्र-छात्राओं से बात करते हुए देश के प्रधान मंत्री ने अपेक्षा प्रबंधन के महत्व को भी रेखांकित किया था. आपने वह कार्यक्रम तो देखा ही होगा, क्यों?
(hellomilansinha@gmail.com)

                 
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं  
#For Motivational Articles in English, pl. visit my site : www.milanksinha.com

Friday, September 13, 2019

शॉर्टकट से नहीं मिलेगी मंजिल

                                                           - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर... ....
सभी विद्यार्थी सफल होना चाहते हैं. विद्यार्थी जीवन अनेक नयी बातों को जानने, समझने और सीखने का प्राइम टाइम होता है. जीवन के बुनियादी वसूलों से विद्यार्थी अवगत होते हैं. कहते हैं कि अच्छी शुरुआत से आधा काम संपन्न हो जाता है. सही है. उदाहरण के तौर पर जिन विद्यार्थियों के पढ़ने-लिखने की शुरुआत अच्छी होती है और जो आगे भी निष्ठापूर्वक अध्ययन करते हैं, उनके लिए परीक्षा में अच्छा अंक लाना आसान हो जाता है. ऐसे विद्यार्थी "देयर इज नो शॉर्टकट टू सक्सेस" जैसी उक्ति पर विश्वास करते हैं. रूटीन बनाकर साल-दर-साल नियमित पढ़ाई करते हैं. प्रामाणिक पुस्तकों को पढ़कर विषय की बुनियादी जानकारी अच्छी तरह ग्रहण करते हैं. यही कारण है कि सिविल सर्विसेस परीक्षा के प्रतिभागियों को विषय के बेसिक नॉलेज के लिए एनसीईआरटी की पुस्तकें अच्छी तरह पढ़ने की सलाह दी जाती है. 

क्या सभी विद्यार्थी ऐसा करते हैं? सच तो यह है कि कुछ विद्यार्थियों को ऐसा करना अच्छा नहीं लगता है. वे क्लास में भी सीरियस नहीं रहते हैं. क्लास बंक करके मौज-मस्ती करने में वे अपना समय व्यतीत करते हैं. अभिभावक के प्रेशर में बेमन से पढ़ने बैठते हैं, जो उन्हें अपेक्षित लाभ नहीं देता. बस परीक्षा सिर पर आ जाने पर वे पढ़ना शुरू करते हैं. स्वाभाविक रूप से उस समय सिलेबस में शामिल सभी विषयों को अच्छी तरह पढ़ना संभव नहीं होता है. ऐसे में, किसी दूसरे के बने बनाये नोट्स या अन्य शॉर्टकट रास्ते से वे परीक्षा में अच्छा अंक हासिल करना चाहते हैं. ट्यूशन और कोचिंग पर ऐसे विद्यार्थियों की निर्भरता सबसे ज्यादा होती है.
  
सोचनेवाली बात है कि शॉर्ट-कट के रास्ते एकाध बार ऐसा हो सकता है कि आप परीक्षा में अच्छे नंबर ले आएं, पर ऐसा हर बार कतई संभव नहीं है. यह भी सौ फीसदी सच है कि शार्टकट के रास्ते पर चलकर किसी भी विद्यार्थी को विषय की अच्छी समझ नहीं हो पाती है. लिहाजा, वे अखिल भारतीय स्तर की उन्नत प्रतियोगिता परीक्षाओं में कई प्रयासों के बाद भी सफल नहीं हो पाते हैं. और तो और जीवन की शायद ही किसी बड़ी परीक्षा में सफलता उनके हिस्से आ पाती है. ऐसा भी देखने में आता है कि अंतिम समय में शार्टकट के सहारे मंजिल तक पहुंचने के चक्कर में कई विद्यार्थी अनावश्यक जोखिम उठाते हैं; जाने-अनजाने कुछ गलत कर बैठते हैं. धीरे-धीरे ऐसा करने की उनकी आदत हो जाती है. और सब जानते हैं कि आदत बुरी बला. कहना न होगा, इस प्रवृति के विद्यार्थी न केवल अनेक मौकों पर दुर्घटनाओं के शिकार होते हैं, बल्कि कई बार आपराधिक गतिविधियों और जुर्म में भी शामिल पाये जाते हैं.

आखिर कोई भी विद्यार्थी ऐसा क्यों करता है? विशेषज्ञ बताते हैं कि जिन विद्यार्थियों को आलस्य, आराम और मौज-मस्ती की आदत लग जाती है, वे सामान्यतः मेहनत से भागते हैं और मुश्किलों का सामना करने से घबराते हैं. अभिभावक के सामने झूठ और बहानेबाजी के सहारे वे बच निकलते हैं. और फिर जब कुछ चीजें, चाहे छोटी ही क्यों न हो, शार्टकट के रास्ते से पाने में वे सफल हो जाते हैं, तो बस शॉर्टकट ही उनका एक मात्र रास्ता बन जाता है. लाजिमी है कि तब तक जीवन की सच्चाई को स्वीकारने और सही रास्ते से मंजिल तक की यात्रा पूरी करने के मामले में  ऐसे विद्यार्थियों का आत्मविश्वास पहले की तुलना में काफी नीचे चला जाता है. सोचिए जरा, शॉर्टकट से आजतक किसी को बड़ी सफलता मिली है क्या? तो फिर पढ़ने-लिखने के बजाय रोज मौज-मस्ती, आलस्य या अन्य किसी कारण से समय का दुरुपयोग करने के बाद परीक्षा से पहले परेशान होने और शार्टकट का रास्ता अपनाने में कौन-सी बुद्धिमानी है? 

सार-संक्षेप यह कि शॉर्टकट से हम बड़ी कामयाबी हासिल नहीं कर सकते. इसके विपरीत, लगातार निष्ठापूर्वक किया गया कोई भी काम देर-सबेर हमें इच्छित मंजिल तक  पहुंचाने की गारंटी देता है. ऐसा माननेवाले सभी छात्र-छात्राओं  के लिए सही तरीका और परिश्रम के बलबूते  सफलता के मंजिल पर पहुंचना ही असल उपलब्धि है. वे "लिफ्ट करा दे या एलीवेटर से शिखर तक पहुंचा दे" जैसी बातों में यकीन नहीं करते. बड़े-बुजुर्ग सही कहते हैं कि अच्छा विद्यार्थी हमेशा कठिन पर सही मार्ग चुनता है क्यों कि इस तरह सफल होने पर न केवल वह खुद को उस उपलब्धि के लायक मानता है, बल्कि इससे उसका आत्मविश्वास भी कई गुना बढ़ जाता है. जाहिर है कि उनके प्रेरणा स्रोत विख्यात धाविका हिमा दास, गेंदबाज जसप्रीत बूमराह  या पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम जैसे लोग ही होते हैं.        (hellomilansinha@gmail.com)


                 
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं  
#For Motivational Articles in English, pl. visit my site : www.milanksinha.com

Tuesday, September 3, 2019

कुछ नायाब सोचें

                                                                 - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर... ....
हर शिक्षण संस्थान में कई विद्यार्थी  ऐसे जरुर होते हैं  जो सामान्यतः हर काम लीक से हटकर  या थोड़ा अलग तरीके से करने की चेष्टा करते हैं. उन्हें सीमित दायरे में रह कर काम करने में रूचि नहीं होती. ऐसे विद्यार्थी  नामुमकिन से 'ना' हटाकर न केवल अपनी कार्ययोजना बनाते हैं, बल्कि उस पर अमल भी करते हैं. आम विद्यार्थियों की तुलना में बेशक उन्हें चुनौतियों और परेशानियों  का ज्यादा सामना करना पड़ता है, लेकिन अनुभव, आत्मसंतोष, आत्मविश्वास, कामयाबी आदि के पैमाने पर देखें तो उन्हें दूसरों की अपेक्षा ज्यादा हासिल भी होता है.

आर्यभट्ट, न्यूटन, आइन्स्टाइन, थॉमस एडिसन, ग्राहम बेल, जगदीश चन्द्र बोस, सी.वी. रमण,  विक्रम साराभाई, होमी भाभा, अब्दुल कलाम  से लेकर वर्तमान में इसरो के प्रमुख के. सिवम तक  जितने भी बड़े आविष्कारक एवं वैज्ञानिक हुए हैं, उनके नाम और काम से ज्यादातर विद्यार्थी परिचित हैं. इन सबमें एक चीज कॉमन है. इन सबों ने  अपने-अपने दायरे से बाहर निकल कर कुछ नया और नायाब करने की कोशिश की और अत्यंत सफल भी हुए. इसी तरह राजनीतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्र में काम करनेवाले देश-विदेश के अनेक विभूतियों ने भी अनेक अभिनव तथा असाधारण काम किए.

हम जो काम करते रहते हैं, स्वाभाविक है कि वह काम हमें आसान लगता है. उसी को करने में हम कम्फ़र्टेबल फील करते हैं, अलबत्ता  शुरू में हम वह काम करने से घबराते हैं और उससे बचना भी चाहते हैं. उसी तरह हम जहां रहते हैं, वह जगह हमें अच्छी लगती है, लेकिन वहां आने से पहले अनजाना-अनदेखा से जुड़े अटपटे-असामान्य भाव मन में रहते हैं.  हम जो खेल खेलते हैं, वही खेल खेलना अच्छा लगता है, उसके अलावे दूसरे खेल को आजमाने की शायद ही कोशिश करते हैं. संकोच, शंका, आशंका, आदत आदि के डोर  से बंधे रहते हैं. अधिकांश विद्यार्थी ऐसा ही करते पाए जाते हैं. वे सभी अपने बनाए दायरे में रहना पसंद करते हैं. न्यूटन का जड़ता का सिद्धांत यहां भी लागू होता है. बचे हुए विद्यार्थी ऐसा नहीं सोचते और न ही करते हैं. वे छोटे बच्चों की तरह अपने दायरे से बाहर जाने की कोशिश करते हैं. कुछ नया जानने एवं करने के प्रति उत्साहित रहते हैं. नया विषय, नया माहौल, नए शिक्षक, नए सहपाठी, नया शहर - सब कुछ नया-नया जैसे उन्हें अच्छा लगता है. ऐसे विद्यार्थी खूब मेहनत करते हैं और अनिश्चितता, परेशानी, नाकामयाबी आदि से घबराते और डरते नहीं हैं. उन्हें अपने काम में बोरियत महसूस नहीं होती. वे बदलाव  को स्वीकार करते हुए जीवन यात्रा का आनंद उठाते हैं. इस प्रक्रिया में बोनस के तौर पर उन्हें अनेक खट्टे-मीठे अनुभव प्राप्त होते हैं, जो उन्हें आंतरिक रूप से पहले से ज्यादा मजबूत बनाते हैं. 

जरा सोचिए, अगर किसी स्कूल-कॉलेज के विद्यार्थी को केवल हिन्दी या गणित या भूगोल या केमिस्ट्री या कोई एक ही विषय पढ़ने में अच्छा लगता हो और वह सिर्फ वही पढ़े तो क्या वार्षिक परीक्षा में सभी विषयों में अच्छा अंक लाकर अच्छे ग्रेड से उतीर्ण हो पायेगा? यकीनन, परीक्षा में शानदार अंक व ग्रेड हासिल करने के लिए हर विद्यार्थी को अपने पसंद के विषय के अलावे  कोर्स के अन्य विषयों को भी पढ़ना पड़ेगा और उन विषयों में भी अच्छा अंक अर्जित करना पड़ेगा. अपने ज्ञान को विस्तार देने एवं उसका बहुआयामी उपयोग करने के लिए यह जरुरी भी है. खाने, पहनने, खेलने आदि के मामले में भी अपने आराम की दुनिया से बाहर निकलना बेहतर माना गया है. ब्रायन ट्रेसी, रोबिन शर्मा सहित कई विचारकों -विशषज्ञों ने इस संबंध में बहुत कुछ लिखा है; अनेक फायदे बताए हैं. जीते-जागते मिसाल  के रूप में अपने देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु व योग विशेषज्ञ सदगुरु जग्गी वासुदेव का जिक्र प्रासंगिक होगा.

जाहिरा तौर पर विद्यार्थियों को अगर एक बेहतर जीवन जीना है तो नए रास्ते और नए तरीके भी तलाशने होंगे. अपने लक्ष्य तक पहुंचने के लिए क्रिएटिव और इनोवेटिव सोच के साथ चलना पड़ेगा. दिल से अगर-मगर, किन्तु-परन्तु के भाव को निकाल कर "मैं कर सकता हूँ और मैं करूँगा" के मन्त्र को आत्मसात करते हुए सजगता के साथ नए पथ पर मजबूत क़दमों से आगे बढ़ना होगा. शुरू करके देखें. दो-चार बार ऐसा करने से आपको खुद बहुत कुछ पता चलेगा. अनुभव से सीखेंगे. शायद उसके हिसाब से कुछ कोर्स करेक्शन भी करेंगे. खुद पर विश्वास बढ़ता जाएगा. सच मानिए, आगे आपको जीवन का सफ़र सरस, सुगम और सुखद लगने लगेगा और आप सफलता की सीढ़ियां चढ़ते जायेंगे.                    
(hellomilansinha@gmail.com)

                 
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं  
#For Motivational Articles in English, pl. visit my site : www.milanksinha.com

Sunday, August 11, 2019

मोटिवेशन : उन्माद व हिंसा से सिर्फ नुकसान

                                                                       - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर... ....
विविधताओं से भरे हमारे विशाल देश में प्रायः रोज कहीं-न-कहीं कारण-अकारण हिंसा की छोटी-बड़ी घटनाएं होती रहती है. लोगों के घायल होने, मरने से लेकर निजी एवं सार्वजनिक संपत्ति का नुकसान भी होता है. विद्यार्थियों के बीच बात-बेबात लड़ाई-झगड़े-मारपीट आदि की खबरें भी मिलती रहती है. इस सबसे सामाजिक व शैक्षणिक माहौल बिगड़ता है. विभिन्न सर्वेक्षणों में पाया गया है कि ऐसे अधिकांश  मामलों में चाहे-अनचाहे कुछ विद्यार्थी शामिल रहते हैं. कारण कई हैं.

विद्यार्थी जीवन उतार-चढ़ाव से भरा होता है. गतिशीलता का यह पर्याय है. उर्जा, उमंग और उत्साह विद्यार्थी जीवन के सहचर होते हैं. इन्हें सम्हालना और अच्छे कार्य में लगाना विद्यार्थियों के  उज्जवल भविष्य की दिशा निर्धारित करता है. हां, यह भी सच है कि इस उम्र में उतावलापन और उन्माद कुछ ज्यादा होता है जो हिंसा, तोड़फोड़ आदि का सहज कारण बनता है. ऊपर से खाली  दिमाग तो शैतान का घर होता ही है. यह बात निहित स्वार्थी तत्व बहुत अच्छी तरह जानते-समझते हैं. ऐसे तत्वों को अपने समाज और देश की भलाई से कोई मतलब नहीं होता. उनका एक मात्र उद्देश्य किसी भी तरह द्वेष व भ्रम फैलाकर आपसी सदभाव एवं भाईचारा को नष्ट करना और अंततः हिंसा और तोड़फोड़ के जरिए अपना उल्लू सीधा करना होता है. और इन कार्यों को अंजाम देने के लिए वे  विद्यार्थी और युवा वर्ग को सॉफ्ट टारगेट मानते हैं. जानकार बताते हैं कि इन असामाजिक तत्वों के बहकावे या प्रलोभन में आकर कई विद्यार्थी हिंसा सहित अन्य अवांछित कार्यों में शामिल हो जाते हैं और अंततः पुलिस के गिरफ्त में आ जाते हैं. स्वाभाविक रूप से गैर-कानूनी काम में संलिप्तता साबित होने पर जेल तक की सजा होती है. फिर पुलिस रिकॉर्ड में एक बार नाम दर्ज हो जाने का दुष्परिणाम  विद्यार्थी को लम्बे समय तक भोगना पड़ता है. अहम सवाल यह है कि जीवन के इस महत्वपूर्ण कालखंड में हमारे विद्यार्थी उन्माद, हिंसा आदि से कैसे बचें?

पहले तो हर विद्यार्थी हमेशा यह याद रखें कि इस समय यानी जीवन के इस प्राइम टाइम में उनका मूल मकसद क्या है? पढ़ाई -लिखाई, खेल-कूद और व्यक्तित्व विकास के अन्य कार्य. यही न. तो फिर इससे इतर कोई अन्य काम, खासकर ऐसा कोई काम जो प्रथम दृष्टया ही गैर-कानूनी लगता हो या अनैतिक हो, करने से सर्वथा दूर रहें. दूसरे, कोई भी कनफूजन हो तो अपने अभिभावक-शिक्षक से बात कर लें. और तीसरे, ऐसी किसी स्थिति में इस बात का भी स्मरण कर लें कि महात्मा बुद्ध, महात्मा गांधी, लियो टॉलस्टॉय से लेकर आज तक के सभी महान लोगों ने स्पष्ट रूप से बारबार कहा है कि किसी भी समस्या का समाधान उन्माद और हिंसा से नहीं हो सकता है.

इन सब बातों का मतलब यह नहीं कि छात्र-छात्राएं अन्याय, शोषण या अत्याचार को चुपचाप सहते रहें और उसका प्रतिकार न करें. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी या लोकनायक जयप्रकाश नारायण द्वारा बताया गया शांतिपूर्ण सत्याग्रह तथा अहिंसक आन्दोलन का मार्ग तो हमेशा खुला है. 

एक बात और. सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के इस दौर में किसी भी घटना-दुर्घटना की सच्चाई की सही पड़ताल एवं छानबीन किए बगैर बस किसी प्रतिक्रिया स्वरुप तुरत गुस्से या उन्माद में आने, भीड़ का हिस्सा बनकर सड़क पर उतरने और हिंसा-तोड़फोड़ में शामिल होने का परिणाम विद्यार्थियों के लिए  बहुत घातक हो सकता है. ऐसे हजारों केस हैं जब हिंसक घटना के बाद थाने में पुलिस के सामने विद्यार्थियों एवं उनके अभिभावकों को पश्चाताप करते और रोते-विलखते-माफ़ी मांगते देखा गया है. पर जो हो जाता है, उसे पलटना कहां मुमकिन होता है? कानून के अनुसार उसका दंड तो भुगतना ही पड़ता है.

एक विचारणीय तथ्य यह भी है कि देश के अच्छे शिक्षण संस्थान, मसलन आईआईटी, आईआईएम, एम्स आदि में पढ़नेवाले विद्यार्थियों को आपने कदाचित ही किसी हिंसक आन्दोलन में शामिल होते और तोड़फोड़ करते हुए निजी एवं सार्वजनिक संपत्ति को क्षति पहुंचाते देखा होगा. शायद  इसलिए कि इन संस्थानों के विद्यार्थियों को हर क्षण अपना मूल मकसद याद रहता है. बड़ा सच तो यह भी है कि सभी शिक्षण संस्थान के अच्छे विद्यार्थी न केवल अपने मित्रों को बहकावे एवं प्रलोभन  में आने से रोकते हैं बल्कि विद्यार्थियों को बहकाने, फुसलाने और समाज में अशांति फैलानेवाले तत्वों को प्रशासन के हवाले करने की यथासंभव कोशिश भी करते हैं, जिससे कि समाज में शांति बनी रहे. आखिर शिक्षा के वास्तविक मर्म को समझनेवाले विद्यार्थियों से समाज को भी अपेक्षा तो रहती ही है कि वे एक जागरूक और जिम्मेदार नागरिक का कर्तव्य बखूबी निभाएं. 
(hellomilansinha@gmail.com)

                   
            और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं
   
#For Motivational Articles in English, pl. visit my site : www.milanksinha.com

Thursday, August 8, 2019

मोटिवेशन : मन को मना लो

                                                                  - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर... ....
कॉलेज के दिनों की बात है. हमारे एक प्राध्यापक थे. बहुत अच्छा पढ़ाते थे. पढ़ाते वक्त उनकी तल्लीनता के क्या कहने. क्लास में या बाहर कई विद्यार्थियों को अक्सर उन्हें यह कहते सुना था  कि सफल होना है तो मन को मना लो और अच्छे काम में लगा लो. उनके कहने का अभिप्राय यह था कि पढ़ना, खेलना, खाना या अन्य कोई भी काम हो - बस मन लगा कर करो.  सामान्यतः कुछ इसी  तरह की नसीहत बचपन से लेकर बड़े होने तक, घर-स्कूल-कॉलेज-यूनिवर्सिटी तक और उसके बाद भी बड़े-बुजुर्ग-अध्यापक अपने बच्चों-विद्यार्थियों को देते रहते हैं. आपको भी मिली होगी. लेकिन क्या आपने कभी गंभीरता से इस नसीहत पर विचार किया है ?

सभी जानते हैं कि मानव मन चंचल है और मन की चंचलता के मामले में बच्चे-किशोर-युवा स्वभावतः आगे रहते हैं. कभी सिर्फ दो मिनट अपनी आखें बंद कर मन को खुला छोड़ दें और इस बात पर ध्यान दें कि आपका मन कहां-कहां घूम रहा है, क्या-क्या सोच रहा है? ऐसे, बैठे-बिठाए भी मन के विचरण का अंदाजा लगाना आसान है.  ज्ञानीजन भी कहते हैं कि अगर किसी ने अपने मन को मना लिया तथा  मन को अच्छे काम में लगा लिया तो  वे जीवन की तमाम चुनौतियों का अच्छी तरह सामना करते हैं; उनके लिए जीवन के मुश्किल-से-मुश्किल दौर से निकलकर  लक्ष्य तक पहुंचना कठिन नहीं होता है. खासकर विद्यार्थियों के लिए ऐसा करना तो बहुत फायदेमंद है.

 फर्ज कीजिए कि आप किताब खोलकर पढ़ने बैठे हैं, पढ़ भी रहे हैं, पर कुछ देर बाद एकाएक लगता है कि जैसे कुछ पढ़ा ही नहीं या कुछ पढ़ा तो कुछ  वाकई  नहीं पढ़ा. ऐसा भी कई बार  देखा होगा कि क्लास में शिक्षक पूरा चैप्टर पढ़ा गए और अंत में जब उन्होंने एक छोटा-सा प्रश्न पूछा तो कुछ विद्यार्थी उत्तर नहीं दे सके, जब कि अन्य कई छात्र-छात्राओं ने उस सवाल का जवाब आसानी से दे दिया. आखिर ऐसा  क्यों और कैसे होता है? दरअसल, तन से तो सब विद्यार्थी  वहां मौजूद थे और शिक्षक महोदय द्वारा पढ़ाये जाने वाले विषय के प्रति सजग भी दिख रहे थे अथवा खुद भी जब पढ़ रहे थे, दोनों ही स्थिति में क्या आपका  मन भी तब वहां था या  कहीं और भटक रहा था या किसी सोच में व्यस्त था? शर्तिया उस वक्त तन और मन एक साथ उस कार्यविशेष के प्रति समर्पित नहीं था. पढ़ने, काम करने आदि की बात छोड़ें, बहुत लोग तो क्या खा रहे हैं, कितना खा रहे हैं - कुछ देर बाद ही उसकी बाबत पूछने पर बताने में असमर्थ रहते हैं. सोचनेवाली बात है कि पढ़ाई हो या अन्य कोई काम, शरीर से तो वैसे भी वे वहां होते ही हैं, समय, उर्जा आदि भी खर्च करते हैं, लेकिन चूंकि मन को उस काम में नहीं लगा पाते, इसके कारण वे अपेक्षित लाभ नहीं पाते हैं. इसका नकारात्मक असर उनके व्यक्तित्व विकास पर पड़ना लाजिमी है. मन को मनाने और अच्छे काम में लगाने से यह परेशानी नहीं होती है. 

दिलचस्प बात है कि जब आप किसी काम को मन से करते हैं तो न केवल उसमें अपेक्षित रूचि लेते हैं और तन्मयता से उसे अंजाम देने की भरसक कोशिश करते हैं, बल्कि  उस काम को संपन्न  करने का पूरा आनंद भी महसूस करते हैं. इसके विपरीत जब आप उसी काम को बेमन से करते हैं, बोझ समझकर करते हैं तो उस कार्य की गुणवत्ता तो दुष्प्रभावित  होती ही है, कार्य पूरा होने के बाद भी आनंद की अनुभूति नहीं होती है. 

कहने का तात्पर्य यह कि अगर पढ़ने बैठे हैं तो मन को सिर्फ पढ़ने में लगाएं. उस एक-दो घंटे के सीटिंग में मोबाइल को साइलेंट मोड में करके दूर रख दें, ध्वनि प्रदूषण सहित अन्य व्यवधानों से बचें और हर तीस मिनट के बाद एक मिनट का ब्रेक लें और आंख बंद कर यह याद करने की कोशिश करें कि इस बीच क्या पढ़ा, क्या उसे अभी आप लिख पायेंगे? लगातार ऐसा अभ्यास करते रहने पर आप खुद ही मन लगाकर पढ़ने में पारंगत होते जायेंगे. अन्य किसी काम में भी आप इस सिद्धांत को अमल में लाकर लगातार अपने परफॉरमेंस को बेहतर करने में सक्षम हो सकते हैं. ऐसे, हमारे संत-महात्मा ध्यान के नियमित अभ्यास से मन को मनाने और नियंत्रित करने का उपदेश तो देते ही रहे हैं. 

सच तो यह है कि मन लगा कर काम करनेवाले विद्यार्थी अच्छे-बुरे हर  परिस्थिति में  अपने काम को एन्जॉय भी करते हैं. लिहाजा वे ज्यादा स्वस्थ एवं खुश भी रहते हैं. काबिलेगौर बात यह भी है कि इस तरह काम करने से कार्यक्षमता बढ़ती है, आत्मविश्वास में इजाफा होता है, समय का पूरा सदुपयोग होता है और साथ ही आप बेहतर परिणाम के हकदार भी बनते हैं.   (hellomilansinha@gmail.com)

                     
            और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं
   
#For Motivational Articles in English, pl. visit my site : www.milanksinha.com

Thursday, August 1, 2019

मोटिवेशन : संयम को अपना दोस्त बनाएं

                                                                 - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर... ....
आप सभी ने क्रिकेट विश्व कप टूर्नामेंट में भारत के साथ अन्य टीमों के कई खिलाड़ियों को कठिन परिस्थितियों  में भी संयमशीलता का प्रमाण प्रस्तुत करते हुए देखा होगा. उन्होंने अपने-अपने  टीम के लिए बहुत उल्लेखनीय योगदान किया. जरा सोचिए, अगर इन खिलाड़ियों ने उन मैचों में उतावलापन दिखाया होता, जल्दबाजी की होती तो शायद वे ऐसी यादगार पारी नहीं खेल पाते. यह महज विश्व कप की बात नहीं है. संयम का मीठा फल हर क्षेत्र में मिलता है. विलियम शेक्सपियर कहते हैं, "वे कितने निर्धन हैं जिनके पास संयम नहीं है." सही बात है. घर-बाहर हर जगह हमें इसका प्रमाण मिलता है. 

'हड़बड़ से गड़बड़', 'जल्दी काम शैतान का' जैसी कहावतें सभी विद्यार्थी सुनते रहते हैं. बड़े-बुजुर्ग हमेशा कहते हैं कि संयम का फल मीठा होता है. पेड़ पर लगे फल को समय पूर्व अर्थात पकने से पहले तोड़ कर खाने पर वह खट्टा व कसैला लगता है. जो लोग संयम रखते हैं और फल को पकने देते हैं, उन्हें ही मीठा फल खाने को मिलता है. विद्यार्थियों के मामले में भी हमें ऐसा ही  देखने को मिलता है. 

विद्यार्थी जीवन में अमूमन हर कोई  उत्साह, उमंग और उर्जा से भरा रहता है. वह कई तरह के सपने देखता है. उसकी विविध इच्छाएं-आकांक्षाएं होती हैं. वह एक साथ बहुत कुछ हासिल करना चाहता है और वह भी फटाफट. इसके लिए वह कुछ भी करने को तैयार रहता है. वाकई करने की कोशिश भी करता है. हां, यह बात और है कि कई बार चाहकर भी कर नहीं पाता है. इसके एकाधिक कारण हो सकते हैं. लेकिन इस सबमें एक बात तो साफ़ है कि चाहने, करने, होने और फल पाने के बीच संकल्प और मेहनत के साथ-साथ संयम की बहुत अहम भूमिका होती है. सोच कर देखिए, अगर कोई किसान यह सोचे कि आज बीज रोपा और कल फसल काट लेंगे, तो क्या यह संभव होगा? उसी तरह अगर कोई विद्यार्थी यह सोचे कि उसकी आज की पढ़ाई या अध्ययन  का फल  कल ही या उनके इच्छानुसार तुरत मिल जाएगा तो यह क्या सही होगा? इस संबंध में प्रकृति के व्यवहार और चरित्र को समझना दिलचस्प तथा ज्ञानवर्धक होगा.

दरअसल, जीवन में संयम का पालन करना कामयाबी की कुंजी है. असंख्य गुणीजनों ने जीवन  में संयम की अनिवार्यता एवं अहमियत को अपने कर्मों से साबित किया है और रेखांकित भी. लिहाजा, विद्यार्थियों के लिए संयम के महत्व को ठीक से समझना और उसे अपने जीवन में अंगीकार करना बहुत ही जरुरी है. सभी  इस बात को मानेंगे कि जोश के साथ होश में रहकर हर कार्य को ठीक से सम्पन्न करने में संयम की अहम भूमिका होती है. संयम से विद्यार्थियों में धीरता, गंभीरता, समझदारी एवं परिपक्वता आती है. इससे  सही निर्णय लेने में वे ज्यादा सक्षम होते जाते है. इसका बहुआयामी फायदा उनके साथ-साथ समाज और देश को भी मिलता है. ऐसे विद्यार्थी पढ़ाई में बेहतर तो होते ही हैं, अन्य कार्यों में भी बेहतर प्रदर्शन करते हैं. इसके विपरीत जो विद्यार्थी जीवन में संयम का महत्व जानते-समझते हुए भी उसे उपयोग में नहीं लाते हैं, उनके जीवन में अनायास ही अनुशासनहीनता, संवेदनहीनता, उदंडता जैसी बुराइयां घर कर लेती हैं, जिसका दुष्परिणाम उनको और देश-समाज को बराबर भुगतना पड़ता है. 

शोध कार्य में लगे विद्वानों-वैज्ञानिकों को जरा गौर से काम करते हुए देखिए तो आपको पाता चलेगा कि संयम का दामन थामकर वे साल-दर-साल तन्मयता से परिश्रम करते रहते हैं, तब कहीं जाकर वे अपने शोध कार्य को पूरा कर पाते हैं. दुनिया में हुए तमाम आविष्कारों का इतिहास अगर हम पढ़ें तो संयम  की महत्ता का प्रमाण स्वतः मिल जाएगा. इलेक्ट्रिक बल्ब के आविष्कारक थॉमस अल्वा एडिसन इसके ज्वलंत उदाहरण हैं. सार्वजनिक जीवन में असाधारण सफलता हासिल करनेवालों के जीवन पर भी नजर डालें, चाहे वे महात्मा गांधी, सुभाष चन्द्र बोस, लालबहादुर शास्त्री, सरदार पटेल, राजेंद्र प्रसाद, जयप्रकाश नारायण, लोहिया, दीनदयाल उपाध्याय या अब्दुल कलाम हों, तो आपको वाणी से लेकर उनके व्यवहार एवं कार्यशैली में यह  गुण अनायास ही दिख जायेंगे. सच है, उन लोगों ने संयम को हमेशा अपना दोस्त बनाए रखा. 
                                                                          (hellomilansinha@gmail.com)


               और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं   
#For Motivational Articles in English, pl. visit my site : www.milanksinha.com

Friday, July 26, 2019

मल्टी-टास्किंग के दौर में सफलता के सूत्र

                                            - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर... ....
चाहे-अनचाहे आजकल सभी विद्यार्थीयों को कई बार एक साथ कई काम करने होते हैं. इन कार्यों या प्रोजेक्ट्स को  नियत समय सीमा के अन्दर अंजाम तक पहुंचाने की सामान्य अपेक्षा भी होती  है.  ऐसे भी अवसर आते हैं जब वे सारे कार्य इतने महत्वपूर्ण होते हैं और लगते भी हैं कि किसे पहले एवं किसे थोड़ी देर बाद में करें, फैसला करना मुश्किल हो जाता है. सच कहें तो मल्टी-टास्किंग के मौजूदा दौर में कई काम एक साथ करने का प्रेशर तो रहता है, लेकिन कई बार  एक साथ सब काम करना संभव नहीं होता. और -तो -और, ऐसी परिस्थिति में अगर सारे काम एक साथ करने की ठान भी लें, तथापि  सभी काम को सही तरीके से अंजाम तक पहुंचाना कई बार काफी जोखिमभरा भी साबित होता है. 

बहरहाल, सुबह उठने से लेकर रात में सोने से पहले तक सभी विद्यार्थी किसी-न-किसी काम में व्यस्त रहते हैं. पढ़ाई, परीक्षा, प्रतियोगिता और परिणाम के प्रेशर  के बीच  कई  विद्यार्थी सुबह पहले जो भी सरल एवं आसान काम सामने होता है उसे निबटाने में लग जाते हैं. लिहाजा, आवश्यक या महत्वपूर्ण या कठिन और मुश्किल काम या तो बिल्कुल नहीं हो पाता है या शुरू तो होता है, लेकिन एकाधिक कारणों से पूरा  नहीं हो पाता है. इस वजह से अहम काम या तो छूट जाते हैं या अधूरे रह जाते हैं. वे काम अगले दिन के एजेंडा में आ तो जाते हैं, लेकिन आदतन अगले दिन भी ऐसा ही कुछ होता है. इस तरह पढ़ाई हो या अन्य कार्य, छोटे, सरल और गैर-जरुरी काम तो किसी तरह होते रहते हैं, किन्तु महत्वपूर्ण और आवश्यक  कार्यों का अम्बार खड़ा होता रहता है. और तब उन्हें उतने सारे अहम कार्यों को तय सीमा में पूरा करना मुश्किल ही नहीं, असंभव लगने लगता है. इसका बहुआयामी दुष्प्रभाव उनके परफॉरमेंस पर पड़ना लाजिमी है. ऐसी स्थिति में आत्मविश्वास डोलने लगता है; बहानेबाजी और शार्ट-कट का सिलसिला चल पड़ता है. ऐसे में धीरे-धीरे उन्हें अपने  ज्ञान, कौशल एवं क़ाबलियत  पर अविश्वास-सा होने लगता है. उन्हें कठिन कार्यों  से डर और घबराहट होने लगती है. नतीजतन, ऐसे विद्यार्थी खुद को औसत या उससे भी कम क्षमतावान मानने लगते हैं और लोगों की नजर में भी वैसा ही दिखने लगते हैं.

 इसके विपरीत कुछ विद्यार्थी सुबह पहले आवश्यक, महत्वपूर्ण और कठिन काम को यथाशक्ति   अंजाम तक पहुँचाने में लग जाते हैं. वे सभी काम पूरा हो जाने पर उन्हें  संतोष और खुशी दोनों मिलती है. अंदर से एक फील-गुड फीलिंग उत्पन्न होती है जिससे वे  अतिरिक्त उत्साह और उमंग से भर जाते हैं. आत्मविश्वास में इजाफा तो होता ही है. अब वे  बहुत आसानी और तीव्रता से आसान कार्यों को कर लेते हैं. शायद ही उनका कोई जरुरी काम छूटता है. अगले दिन काम करने की उनकी यही शैली होती है. वे चुनौतियों से घबराते  नहीं, बल्कि उनके स्वागत के लिए पूरी तरह तैयार रहते हैं. उनके लिए हर दिन एक नया दिन होता है और हर बड़ी-छोटी चुनौती से सफलतापूर्वक निबटना उनका मकसद.

 कहना न होगा, आज के तेज रफ़्तार कार्य संस्कृति में जब कई बार सबकुछ फटाफट एवं अच्छी तरह करना होता है, तब प्राथमिकता तय करके कार्य करना अनिवार्य होता है. यहां  एलन लेकीन की इस बात पर गौर करना फायदेमंद होगा कि अपनी प्राथमिकताओं की समीक्षा करें और यह सवाल पूछें – हमारे समय का इस वक्त सबसे अच्छा उपयोग क्या है. 

दरअसल, लगातार अच्छी सफलता अर्जित करनेवाले सभी विद्यार्थी प्राथमिकता तय  करके काम करने को कामयाबी तक पहुंचने का एक महत्वपूर्ण सूत्र मानते हैं. लिहाजा, अगर अगले कुछेक घंटे में कई विषयों को पढ़ने  की चुनौती सामने होती है, तो उसमें से पहले कौन-सा पढ़ें और बाद में कौन-सा, अपनी समझदारी से 'प्राथमिकता के सिद्धांत' को लागू करते हुए वे विषयों को अति महत्वपूर्ण, महत्वपूर्ण और कम महत्वपूर्ण  की श्रेणी में रखकर न केवल सभी विषयों को यथासमय निबटाते हैं, बल्कि आगे उसके  परिणाम में बेहतरी भी सुनिश्चित कर पाते हैं. ऐसे विद्यार्थी आवश्यकता के अनुसार प्राथमिकता में थोड़ा -बहुत परिवर्तन के लिए मानसिक रूप  से पूरी तरह तैयार भी रहते हैं. 

बताने की जरुरत नहीं कि स्कूल, कॉलेज या यूनिवर्सिटी के अत्यंत सफल, सफल और कम सफल विद्यार्थियों के बीच एक बड़ा फर्क इस बात का भी होता है.    (hellomilansinha@gmail.com)
                                                                           
               और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं
   
#For Motivational Articles in English, pl. visit my site : www.milanksinha.com

Sunday, July 14, 2019

मोटिवेशन : पढ़ने के साथ खेलना भी जरुरी

                                                    - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर... ....
सम्प्रति इंग्लैंड में आईसीसी क्रिकेट वर्ल्ड कप टूर्नामेंट चल रहा है. कुल दस टीमों - भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, अफगानिस्तान, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, वेस्टइंडीज, साउथ अफ्रीका और इंग्लैंड के बीच 30 मई से प्रारंभ हुए इस क्रिकेट महाकुम्भ का समापन 14 जुलाई को होगा. विश्व के बड़े भूभाग में रहनेवाले लोग,  खासकर  विद्यार्थी  फिलहाल क्रिकेट का भरपूर आनंद ले रहे हैं. विद्यार्थियों के बीच वर्ल्ड कप क्रिकेट ही चर्चा एवं बहस का बड़ा मुद्दा है. सभी मैचों का लाइव टेलीकास्ट हो रहा है. प्रिंट हो या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, सब जगह क्रिकेट वर्ल्ड कप से जुड़ी ख़बरों को प्रधानता दी जा रही है. भारत के नामचीन पूर्व क्रिकेट खिलाड़ी - सचिन, गावस्कर, कपिलदेव, गांगुली, सहवाग, इरफ़ान, हरभजन, लक्ष्मण आदि न केवल क्रिकेट कमेंटरी कर रहे हैं, बल्कि इसी क्रम में क्रिकेट की बारीकियों पर  रोचक एवं जीवंत चर्चा भी कर रहे हैं. इससे क्रिकेट खेलनेवाले विद्यार्थियों को बहुत लाभ मिल रहा है. रोचक बात है कि इस समय ज्यादा बड़ी संख्या में देश के गांव-कस्बे तक में हर उम्र के विद्यार्थियों को क्रिकेट खेलते हुए देखा जा सकता है. हां, कमोबेश ऐसा माहौल सभी खेलों के बड़े आयोजनों के वक्त देखा जाता है, क्यों कि आम छात्र-छात्राओं में स्वभावतः खेलकूद के प्रति लगाव-जुड़ाव होता है. 

देशभर में सभी मनोवैज्ञानिक स्कूल-कॉलेज के विद्यार्थियों को जीवन में सफल होने और स्वस्थ रहने के लिए पढ़ाई के साथ-साथ नियमित रूप से खेलकूद में सक्रिय रूप से भाग  लेने का सुझाव देते हैं. ऐसा इस सच्चाई के मद्देनजर और भी जरुरी हो गया है कि हमारे देश में भी आजकल बहुत सारे  विद्यार्थी टाइम पास के रूप में या मनोरंजन के लिए कंप्यूटर या मोबाइल गेम में घंटों व्यस्त पाए जाते हैं. कई शोधों में इसे शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक पाया गया है. स्वास्थ्य विशेषज्ञ तो मानते हैं कि यह आदत विद्यार्थियों को कई  रोगों से ग्रसित कर रहा  है. इसी कारण वे अभिभावकों को बचपन से ही अपने बच्चों को इससे बचाने की सलाह  देते हैं. 

बहरहाल, ख़ुशी की बात है कि पहले की अपेक्षा अब केंद्र सरकार एवं ज्यादातर राज्य सरकारें खेलकूद को बढ़ावा तथा प्रोत्साहन देने के लिए कई सकारात्मक कदम उठा रही है. नतीजतन, स्कूल-कॉलेज -यूनिवर्सिटी में भी आउटडोर -इंडोर सभी खेलों का अपेक्षाकृत ज्यादा आयोजन हो रहा है और विद्यार्थियों की भागीदारी भी बढ़ रही है. लड़कियां भी अब ज्यादा संख्या में खेलकूद में भाग ले  रही हैं और राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में अच्छा प्रदर्शन कर पदक भी जीत रही हैं. लेकिन विश्व के सबसे बड़े युवा आबादीवाले हमारे देश के लिए इस दिशा में अभी बहुत काम करने की जरुरत है. खेलकूद को विद्यार्थियों के जीवन का अहम हिस्सा बनाना आवश्यक है. 

विविधताओं से भरे हमारे देश में राष्ट्र को एक सूत्र में बांध कर रखने में खेलकूद की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण है. सच कहें तो भाषा, धर्म, क्षेत्र एवं जाति से परे खेल के मैदान में देश की एकता का हमें हर बार पुख्ता प्रमाण मिलता है.  यह भी सब लोग अच्छी तरह जानते-समझते हैं कि खेलकूद का हमारे बच्चों और युवाओं के सर्वांगीण विकास में कितना सकारात्मक योगदान रहता है. स्कूल-कॉलेज के मैदान या अन्य किसी मैदान या खाली स्थान पर कबड्डी, फुटबॉल, हॉकी, क्रिकेट, वॉलीबॉल, बास्केटबॉल आदि खेल में सुबह या शाम के समय का उपयोग एकाधिक मायनों में विद्यार्थियों के लिए फायदेमंद होता है. खेलने से शरीर में रक्त संचार तीव्र होता है, सारे अंग सक्रिय हो जाते हैं, आलस्य दूर होता है, बुद्धि कुशाग्र होती है  और विद्यार्थी रचनात्मकता व उत्साह से भर जाता है. एक बार बाहर खेलने में जो आनंद  मिलता है, उसकी आदत जब लग जाती है तब विद्यार्थी घर बैठे विडियो गेम आदि में अपना समय बर्बाद नहीं करते हैं. रोज कुछ अच्छा सीखने-सीखाने का सिलसिला भी चल पड़ता है. सामाजिक जुड़ाव एवं सदभाव भी बढ़ता है.

जाहिर-सी बात है कि योजना, कार्यन्वयन, समय प्रबंधन, टीम वर्क, आत्मविश्वास, समावेशी  सोच सरीखे महत्वपूर्ण लीडरशिप क्वालिटी विकसित करने का स्वर्णिम अवसर विद्यार्थियों को  खेल  के मैदान में अनायास ही मिल जाता है. उनको शारीरिक और मानसिक तौर पर स्वस्थ बनाए रखने के अलावे नैतिक, बौद्धिक और भावनात्मक रूप से मजबूत एवं परिपक्व बनाने में स्पोर्ट्स का कोई जोड़ नहीं.  इसके अलावा यदि आपमें किसी खेल को लेकर जुनून है तो उसे भी निखरने का मंच मिल जाता है.                 (hellomilansinha@gmail.com) 

             और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं
   
#For Motivational Articles in English, pl. visit my site : www.milanksinha.com

Tuesday, July 9, 2019

मोटिवेशन : निराशा व अवसाद को कहें बाय-बाय

                                                                      - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर...
हाल ही में एक रिपोर्ट में यह बताया गया कि हमारे स्कूल-कॉलेज के अनेक  विद्यार्थियों में पढ़ाई  के प्रेशर, घरवालों की उनसे परीक्षा में अच्छे परिणाम की अपेक्षा और खुद उनका अपने रिजल्ट के प्रति आशंकित रहना निराशा और अवसाद का कारण बनता है.  कई मामलों में यह भी पाया गया है कि कुछ  विद्यार्थी  येन-केन-प्रकारेण अच्छा ग्रेड या अंक पाने और दूसरे से ज्यादा कामयाब होने के दौड़ और होड़ में जाने-अनजाने शामिल हो जाते हैं. ऐसे में, अपेक्षित परिणाम न आने पर उनका कन्फयूजन बढ़ना और परेशान हो जाना स्वाभाविक है. गौर करनेवाली  बात है कि वे इस विषय पर जितना सोचते हैं, उतना ही उलझते चले जाते हैं. वे अपनी स्थिति को अभिभावकों से साझा करने से भी कतराते हैं. परिणाम स्वरुप कई बार स्थिति चिंताजनक हो जाती है. 

यह सच है कि फ़ास्ट लाइफ और टफ कम्पटीशन के मौजूदा दौर में आम तौर पर निराशा का भाव देश के अनेक छात्र-छात्राओं  के मन–मानस को उलझाए रखता है.  कई विद्यार्थी तो अनिश्चितता और आशंका से ज्यादा कुशंका से जूझते रहते हैं. इससे उनकी सेहत तो खराब होती ही है, वे घर-बाहर कहीं भी चैन व सुकून से कार्य निष्पादित नहीं कर पाते, जिसका स्पष्ट असर उनकी उत्पादकता पर पड़ता है. आरोप लगना शुरू हो जाता है, तंज कसे जाते हैं, कभी-कभार डांट भी पड़ती है. मन और बैचैन हो जाता है. निराशा का भाव और गहराता है. कठिनाई समस्या बनने लगती है. अवसाद के आगोश में जाने की यह प्रारंभिक अवस्था होती है. लिहाजा इससे बचना निहायत जरुरी है. और इसके लिए उम्मीद का दामन थामना श्रेयष्कर साबित होता है. मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने क्या खूब कहा है कि हमें सीमित निराशा को स्वीकार तो करना चाहिए, परन्तु अनंत उम्मीदों का साथ नहीं छोड़ना चाहिए. 

मेरे एक मित्र हैं. निराशा के पल में वे बचपन में पढ़ी प्रख्यात कवि मैथिलीशरण गुप्त की यह कविता एक बार गुनगुना लेते हैं. कहते हैं, इससे उन्हें प्रेरणा मिलती है, उनमें आशा का संचार होता है. कविता की पंक्ति है : नर हो न निराश करो मन को, कुछ काम करो, कुछ काम करो, जग में रहकर कुछ नाम करो ... ....

मनोवैज्ञानिक मानते और कहते हैं कि स्वस्थ एवं प्रसन्न रहने के लिए जीवन में उम्मीद का साथ होना आवश्यक है. हमारे देश के अनेकानेक ऋषि –मुनि तो इस विषय पर अपने अमूल्य विचारों एवं व्याख्यानों के माध्यम से असंख्य लोगों को विंदास जीने को प्रेरित करते रहे हैं. 

विचारणीय प्रश्न यह भी है कि तमाम कोशिशों के बावजूद अगर आप किसी कारण असफल हो भी जाते हैं तो आपके सिर पर आसमान टूट कर तो गिरनेवाला नहीं. अलबत्ता कुछ नुकसान होगा. हां, विश्लेषण करने पर कई बार आप पाते हैं कि आपके प्रयास में कमियां रह गई थी. ऐसे समय सबसे बेहतर होता है, जल्दी-से-जल्दी उसे मन से स्वीकार करना और अपनी कोशिशों में अपेक्षित सुधार लाना. एप्पल कंपनी के संस्थापक स्टीव जाब्स इस बात पर अमल करने में विश्वास करते थे. 

एक बात और. जीवन से बड़ा कुछ भी नहीं. फिर जीवन में आगे और भी मंजिलें तय करनी बाकी है. जरा सोचिए अमेरिका के सोलहवें राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन के जीवन यात्रा के विषय में. एक-के-बाद-एक विफलताओं के बाद भी उम्मीद और सत्प्रयासों के बलबूते वे अमेरिका के सर्वोच्च पद पर आसीन हुए और अमेरिका के गृह युद्ध (अमेरिकन सिविल वार) के कठिनतम  समय में देश का सफल नेतृत्व किया, देश में शान्ति स्थापित की. अमेरिका की पहली बधिर एवं नेत्रहीन कला स्नातक एवं प्रख्यात लेखिका हेलेन केलर हो या विश्वप्रसिद्ध ब्रिटिश भौतिक विज्ञानी स्टीफन विलियम हाकिंग या उनके जैसे अन्य अनेक दिव्यांग विभूति, सबने आशा को हमेशा अपना अभिन्न मित्र बना कर रखा और जीवन में अभूतपूर्व सफलता पाई. यहां यह जानना दिलचस्प तथा प्रेरणादायी है कि एक बार जब किसी ने स्वामी विवेकानन्द से पूछा कि 'सब कुछ खोने से ज्यादा बुरा क्या है' तो स्वामीजी ने उत्तर दिया कि 'उस समय उस उम्मीद को खो देना, जिसके भरोसे पर हम सब कुछ वापस पा सकते हैं.'  सच कहें तो  अपने आसपास देखने पर भी आपको कई लोग मिल जायेंगे जो इस जीवन दर्शन पर अमल करके अपने-अपने कार्यक्षेत्र में उन्नति के नये-नए कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं.       (hellomilansinha@gmail.com) 

               और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं
   
#For Motivational Articles in English, pl. visit my site : www.milanksinha.com

Monday, July 1, 2019

मोटिवेशन : बेहतर क्षमता प्रबंधन से सफलता

                                                                       - मिलन सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर ...
     हमारे विद्यालय-महाविद्यालय -विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों से मुलाक़ात के क्रम में मैंने यह  पाया   है कि उनमें अपेक्षित संभावना एवं क्षमता की कमी नहीं है. मेधा और मेहनत में भी वे पीछे नहीं हैं. सभी जानते हैं कि उत्साह, उमंग और उर्जा भी व्यक्ति के  सोच और शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य पर निर्भर करता है. आम विद्यार्थियों की संभावना को परफॉरमेंस  में तब्दील करने की स्वभाविक चाहत से भी हम वाकिफ हैं. इसके बावजूद सभी विद्यार्थी अपने मुकाम को हासिल नहीं कर पाते हैं. इसके कई कारण हो सकते हैं. क्षमता प्रबंधन इनमें से एक बड़ा कारण है. इसे एकाधिक ज्वलंत उदाहरण के मार्फत सरलता से समझने की कोशिश करते हैं. 

हाल ही में संपन्न विवो आईपीएल क्रिकेट टूर्नामेंट के दौरान  आंद्रे रसेल, महेन्द्र सिंह धोनी, क्रिस गेल, हार्दिक पंड्या  जैसे कई खिलाड़ियों ने अपने-अपने क्षमता प्रबंधन का शानदार प्रदर्शन करते हुए अपनी टीम को अप्रत्याशित जीत दिलाई. आरसीबी (रॉयल चैलेंजर बंगलोर) टीम के खिलाफ केकेआर (कोलकता नाईटराइडर्स) की ओर से खेलते हुए एक मैच में रसेल ने मात्र तेरह बॉल पर सात छक्का और एक चौके के साथ नाबाद 48 रनों की बदौलत अत्यंत आश्चर्यजनक तरीके से अपनी टीम को विजय दिलाई. सीएसके (चेन्नई सुपर किंग्स) कप्तान धोनी ने राजस्थान रॉयल्स के खिलाफ एक मैच में कुछ ऐसा ही प्रदर्शन कर अपनी टीम को विजयी बनाया. बल्लेबाज के रूप में कब किस बॉल को किस तरह खेलना है जिससे कि अपने विकेट को बचाते हुए मात्र 20 ओवर के मैच में कम से कम गेंदों पर ज्यादा से ज्यादा रन बटोरते हुए विपक्षी टीम के खिलाफ जीत हासिल करें, यही उस खिलाड़ी की उच्च क्षमता प्रबंधन को रेखांकित करता है. उसी प्रकार एक बॉलर अपनी गेंदबाजी के दौरान बल्लेबाज विशेष के बैटिंग स्टाइल, फील्ड सेटिंग, पिच की स्थिति आदि को घ्यान में रखकर जब इंटेलीजेंटली गेंदबाजी करता है तो बल्लेबाज या तो जल्दी आउट हो जाता है या बहुत कम रन बना पाता है. ऐसे सभी खिलाड़ी विपरीत परिस्थिति में भी अपनी  क्षमता का समुचित उपयोग करना जानते हैं और कदाचित ही अपनी क्षमता को जाया होने देते हैं. 

एक बेमिसाल उदाहरण और. हाल ही में जिस एक शख्स की देश के कोने-कोने में खूब चर्चा हुई उसे आप सब अच्छी तरह जानते हैं. हां, मैं वायुवीर  विंग कमांडर अभिनन्दन वर्धमान की बात  कर रहा हूँ. आज अभिनन्दन सभी भारतीयों, खासकर विद्यार्थियों और युवाओं के सुपर हीरो हैं. हो भी क्यों नहीं. उन्होंने देश के सामने जिस धैर्य, संकल्प, संतुलन, वीरता और पराक्रम की मिसाल पेश की है उसका गुणगान स्वाभाविक रूप से सब ओर हो रहा है.  35 वर्षीय इस जाबांज वायुसेना अधिकारी, जो मिग-21 बाइसन जेट उड़ा रहे थे, ने पाकिस्तानी वायुसेना में शामिल अमेरिका में निर्मित आधुनिक एफ-16 में सवार पाक एयर पायलटों के नापाक इरादों को ध्वस्त कर दिया. उनके इस बेमिसाल कार्य से दुश्मन के हौसले पस्त हो गए. 

पूरे प्रकरण में काबिले गौर बात यह रही कि बेहद चुनौतीपूर्ण एवं बाद में बहुत विपरीत परिस्थिति में भी अभिनंदन ने यथोचित निर्णय  लिए और उसे बड़ी कुशलता से कार्यान्वित भी किया. दुर्घटनाग्रस्त मिग -21 से सफलतापूर्वक पैराशूट द्वारा दुर्भाग्यवश सीमा पार पाक इलाके  में उतरने के बाद स्थानीय उग्र भीड़ से खुद को बचाते हुए देश की  सुरक्षा से जुड़े गोपनीय दस्तावेजों को नियोजित ढंग से नष्ट करने में उन्होंने शारीरिक एवं मानसिक दोनों स्तर पर अपनी क्षमता प्रबंधन की उच्चतम मिसाल पेश की.  दुश्मन सेना द्वारा कब्जे में  लिए  जाने के बाद भी उनका आचरण बेहद संतुलित, संयमित और मर्यादित रहा और वे शूरवीर की तरह स्वदेश भी लौटे. 

उपर्युक्त कुछ उदाहरणों से यह बात साफ़ तौर पर उभर कर आती है कि जीवन में अपनी क्षमता पर विश्वास करना और उसे उत्तरोत्तर विकसित करना जितना जरुरी है, उतना ही जरुरी है उसका प्रबंधन. कहते हैं न कि लोहा जब गरम हो तभी चोट करना फायदेमंद होता है. उसी तरह प्रतियोगिता परीक्षा हो या हो खेल का मैदान, अगर "हम कौन-सा बॉल खेलें, कौन-सा बॉल छोड़ें" के तर्ज पर जीवन की छोटी-बड़ी परीक्षाओं में अपनी क्षमता का प्रबंधन करते हुए तदनुरूप प्रदर्शन कर सकें तो कोई भी जीत हमसे दूर नहीं जा सकती है. सार-संक्षेप यह कि हरेक विद्यार्थी के जीवन में उतार-चढ़ाव आता है -कम या ज्यादा. सफलता-असफलता  से भी वे सब रूबरू होते रहते हैं. लेकिन अगर वे बीच-बीच में अपनी क्षमता प्रबंधन की खुद ही गहरी समीक्षा करते हैं और अपनी कमियों में सुधार लाकर आगे बेहतर क्षमता प्रबंधन करते हैं, तो वे भी बेहतर उपलब्धि के हकदार बनते रहेंगे.             (hellomilansinha@gmail.com)
                                                                           
             और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं
   
 # लोकप्रिय साप्ताहिक "युगवार्ता" के 16.06.2019 अंक में प्रकाशित
#For Motivational Articles in English, pl. visit my site : www.milanksinha.com