Sunday, June 9, 2019

मोटिवेशन : दिमाग को साफ़-सुथरा रखना जरुरी

                                                                              - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर...
हमारा देश युवाओं का देश है. यहां संभावनाओं और क्षमताओं की कोई कमी नहीं है. यह देश के लिए ख़ुशी की बात है. सूचना और संचार क्रांति के इस युग में हमारे युवाओं को चारों दिशाओं से प्रति क्षण असंख्य सूचना-समाचार मिलते रहते हैं. मोबाइल और इंटरनेट की सुलभता से यह काम और भी आसान हो गया है. सोशल मीडिया पर पुष्ट-अपुष्ट, सही-गलत, वांछित-अवांछित, शील-अश्लील सब तरह की सामग्री की बाढ़ से बेशक सभी हैरान हैं, बहुत से युवा परेशान भी.

मनुष्य मूल रूप से एक संवेदनशील प्राणी है. उसके दिमाग की कार्यक्षमता असीमित है, ऐसा मेडिकल साइंस भी मानता है. हमारे वेद-पुराण में इस तथ्य को साबित करने के अनेकानेक उद्धरण मौजूद हैं. आधुनिक युग में भी संसारभर में जिन लाखों विलक्षण लोगों ने अपने-अपने कार्यक्षेत्र में सर्वथा असाधारण कार्य किये हैं और कर रहे हैं वह स्वामी विवेकानन्द के इस उक्ति को संपुष्ट करते हैं कि सभी शक्तियां आपके अन्दर मौजूद हैं. आप कुछ भी कर सकते हैं. 

कंप्यूटर परिचालन में शुरू में ही बताया जाता है कि गार्बेज इन, गार्बेज आउट. अर्थात कचड़ा अन्दर डालेंगे तो कचड़ा ही बाहर आएगा. कहने का मतलब जैसा अन्दर डालेंगे, वैसा ही बाहर आएगा. कमोबेश यही सिद्धांत मनुष्य के दिमागी कंप्यूटर के साथ भी होता है, ऐसा सामान्यतः स्पष्ट दिखाई पड़ता है. इसी कारण हर समाज में शिक्षा और संस्कार के महत्व पर सभी एकमत रहे हैं. अच्छी शिक्षा और संस्कार से  सोच और बुद्धि का सीधा संबंध होता है. 

बहरहाल, चिंता की बात है कि इतना सब जानते-समझते-मानते हुए भी जाने-अनजाने बहुत सारे युवा नकारात्मक एवं अवांछित बातों-विचारों को अपने दिमाग में घुसने और अपने दिमाग को कचड़ा घर बनने दे रहे हैं. उनके दैनंदिन आचार-व्यवहार में इसकी झलक मिलती रहती है. लेकिन ऐसा नहीं है कि बच्चों, किशोरों और युवाओं के सरल एवं स्वच्छ मन-मानस को इस महामारी से बचाना बहुत मुश्किल है. इसके लिए समेकित प्रयास की जरुरत होगी. निःसंदेह, अभिभावकों एवं गुरुजनों का इस मामले में बहुत बड़ी भूमिका होगी, लेकिन पहल तो युवाओं को ही करना होगा.    

सबसे पहले स्वयं युवाओं के लिए  यह विचार करना जरुरी है कि उनके दिमाग में जो चीजें जा रही हैं वे बातें उनके लिए हितकारी हैं या नहीं, क्यों कि उसमें से अनेक बातें दिमाग में ठहर जाती है और उन्हें  कारण-अकारण व्यस्त रखती हैं. कई बार इसमें उनका  बहुत-सा समय यूँ ही खर्च होता है और वे समझ भी नहीं पाते. सोचनेवाली बात यह भी है कि जो अहितकारी बातें रोजाना उनके  पास आती हैं, आखिर वह किस स्रोत से ज्यादा आती हैं - किसी दोस्त, परिजन, सोशल मीडिया या अन्य किसी माध्यम से. युवाओं के लिए इसका गहराई से विश्लेषण करना निहायत जरुरी है. बेहतर तो यह होगा कि विश्लेषण एवं नियमित समीक्षा की प्रक्रिया उनके  रुटीन का हिस्सा बन जाए जिससे कि  दिमाग को प्रदूषित करने वाले स्रोत को पहचान कर तुरत उसे गुडबाय कर सकें. बुद्धिमान लोग तो  ऐसे कचड़े को आने से रोकने के लिए दिमाग के दरवाजे पर एक सशक्त स्कैनर लगा कर रखते हैं. उसे वहीँ  से बिदा कर दिया जाता है. 

एक अहम बात और. यह देखना भी जरुरी है कि वैसे कौन-कौन से विचार हैं जो उनके  दिमाग को अनावश्यक रूप से उलझाते हैं और परेशान करते हैं. उनकी पहचान कर लेने के बाद उनसे मुक्ति के लिए जरुरी है कि वे रोजाना अपने दिन की शुरुआत सकारात्मक सोच के साथ करें. सुबह जल्दी उठने का प्रयत्न करें. जो भी उनके आदर्श हों - माता-पिता, गुरुजन या कोई महान व्यक्ति, उन्हें याद कर उनका नमन करें. फिर सूरज की ओर देखें और महसूस करें कि आपके शरीर के  अन्दर दिव्य प्रकाश का प्रवेश हो रहा है और अँधेरा मिट रहा है. अब एक बार अपने शरीर के सारे अंगों- पैर की उंगलियों से सिर तक, को ठीक से देखें और सोचें कि आप कितने भाग्यशाली हैं कि आपके सारे अंग क्रियाशील हैं. इस शुरुआती पांच मिनट में ही आप आशा और विश्वास से भरने लगेंगे.  कहते हैं न ‘वेल बिगन इज हाफ डन’ यानी अच्छी शुरुआत आधा काम पूरा कर देता है. फिर दिनभर अच्छे कार्यों में व्यस्त रहें. बीच में अगर कोई नेगेटिव विचार या व्यक्ति आ जाए, उससे जल्द छुटकारा पा कर पॉजिटिव जोन में लौटें. नियमित अभ्यास से यह सब करना आसान होता जाएगा. रात में भी सोने से पूर्व फिर सकारात्मक सोच-विचार में थोड़ा वक्त गुजारें, उसका चिंतन-मनन करें. 

स्वभाविक है कि जो स्रोत उनके  लिए अच्छे हैं, ऐसे स्रोतों की संख्या बढ़ती रहे तो स्कूल-कॉलेज की परीक्षा हो या कोई कम्पटीशन, हर जगह प्रदर्शन बेहतर होना सुनिश्चित है. फिर तो लम्बी जीवन यात्रा में सफलता और खुशी उनके साथ-साथ चलती रहेगी और सर्वे भवन्तु सुखिनः जैसे विचारों को फलने-फूलने का सुअवसर भी मिलता रहेगा. 
                                                                                   (hellomilansinha@gmail.com)
               और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं
   
 # लोकप्रिय साप्ताहिक "युगवार्ता" के 09.06.2019 अंक में प्रकाशित
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Tuesday, June 4, 2019

मोटिवेशन : समय को दें महत्व

                                                                             - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर...
आमतौर पर यह देखा गया है कि किसी भी प्रतियोगिता परीक्षा का समय नजदीक आते ही प्रतिभागियों और विद्यार्थियों को समय की कमी महसूस होने लगती है, जब कि प्रतियोगिता परीक्षा की तारीख अधिकांश मामलों में पहले से घोषित होती है.  यह अस्वाभाविक नहीं है. अब बचे हुए समय में सारे बाकी बचे चैप्टर पढ़ने, दोहराने, सबको याद रखने  और फिर परीक्षा में अच्छा स्कोर करने की चुनौती सामने जो होती है. 

आज के युवाओं में सामान्यतः मेधा की कमी नहीं है. और अब तो सूचना और जानकारी पाने के न जाने कितने सरल और सुलभ माध्यम उपलब्ध हैं. समय के साथ परीक्षा के तरीके भी आधुनिक तकनीक के कारण सरल और  पारदर्शी हो गए हैं. कहने का अभिप्राय यह कि आज के युवा के पास संसाधन की उपलब्धता कमोबेश एक सामान है और  परीक्षा में भी कोई भेदभाव नहीं. अब तो सवाल है सिर्फ तैयारी के प्रति प्रतिबद्धता के साथ समय के सदुपयोग का, उसके यथोचित प्रबंधन का. 

दिनभर में 24 घंटे का समय सबको सामान रूप से उपलब्ध है, न किसी को थोड़ा भी कम या ज्यादा. सो समय की कमी की बात करना सही नहीं लगता है. तभी तो एच जैक्सन ब्राउन फरमाते हैं, "आप यह कैसे कह सकते हैं कि आपके पास पर्याप्त समय नहीं है ? आपके पास एक दिन  में उतने ही घंटे हैं, जितने हेलेन केलर, लुई पाश्चर, माइकल एंजेलो, लियोनार्डो द विंची, थॉमस जेफ़र्सन और अल्बर्ट आइंस्टीन के पास थे." 

बहरहाल, समय के बारे में सबने यह सुना है, 'टाइम एंड टाइड वेट फॉर नन'. अर्थात समय और समुद्र की लहरें किसी का इन्तजार नहीं करती. ग़ालिब के इस कथन, 'मै कोई गया वक्त तो नहीं कि लौट कर वापस आ न सकूं'  से स्पष्ट है कि बीते हुए समय को किसी भी तरह दोबारा हासिल करना असंभव है.  लुइस ममफोर्ड ने तो समय के महत्व को समझाने के लिए इसे इन शब्दों में व्यक्त किया है ,'आधुनिक औद्योगिक युग की सबसे प्रमुख मशीन भाप का इंजन नहीं, बल्कि घड़ी है.'

विशषज्ञों का कहना है कि समय प्रबंधन दरअसल जीवन प्रबंधन का एक प्रमुख हिस्सा है. लिहाजा आवश्यकता इस बात की ही  कि आप पहले यह तय करें कि आपको अपने समय का सर्वथा सदुपयोग करना है. जहां चाह, वहां राह. अब जिन कार्यों को आप अहम मानते हैं यानी जो आपके लिए ज्यादा जरुरी है, उसका एक लिस्ट बना लें. अमूमन रोजाना उन कार्यों को करने के लिए कितने समय की जरुरत होगी, इसका आकलन कर उसे भी लिख लें. इसके बाद अपने मौजूदा दिनचर्या की सूक्ष्मतम समीक्षा करें और यह जानें कि दिनभर में आपके पॉजिटिव, नेगेटिव और आइडिल इंगेजमेंट कितने हैं और उसमें आपका कितना समय व्यय होता है. नेगेटिव और आइडिल इंगेजमेंट को तिलांजलि देकर पॉजिटिव कार्य के लिए अतिरिक्त समय निकालना निश्चित रूप से बुद्धिमानी और फायदे का काम है. हां, इस मामले में हर व्यक्ति की स्थिति भिन्न होगी, लेकिन फायदा तो बेशक सबको होगा.  

अमूमन यह देखा गया है कि युवाओं और छात्रों का समय चार हिस्सों में बंटता है. शैक्षणिक संस्थान में, स्वाध्याय में, दैनंदिन कार्य मसलन स्नान, व्यायाम, खाने, मनोरंजन आदि में और सोने में. इन चारों कार्यकलाप में ही सामन्यतः आपका समय व्यतीत होता है, किसी में थोड़ा ज्यादा, किसी में उससे कम. दिलचस्प बात है कि ये चारों व्यस्तताएं हमारे जीवन को समग्रता में जीने के लिए जरुरी है. समयावधि बेशक परिवर्तनशील हों. उदाहरण के तौर पर परीक्षा के समय सोने और मनोरंजन में आप समय कम बिताते हैं और पढ़ने में ज्यादा. 

आइये, अंत में पैरेटो के 20/80 के सिद्धांत की चर्चा भी कर लें. इस सिद्धांत के अनुसार लोग अस्सी फीसदी कार्य अपने बीस फीसदी समय में संपन्न करते हैं. दूसरे शब्दों में, लोग अस्सी फीसदी समय अपना मात्र बीस फीसदी कार्य पूरा करने में लगाते हैं. अब अगर वे लोग  यह जान सकें कि वे कौन से बीस प्रतिशत कार्य हैं जिनको पूरा करने के लिए अस्सी फीसदी समय का व्यय करना पड़ता है, तो समझिये कि बेहतर  समय प्रबंधन की ओर उनका पहला कदम बढ़ गया.  अब अगर लोग इस समझ को दैनंदिन जीवन में अमल में ला सकें तो उनका समय प्रबंधन बेहतर से और बेहतर होता जायगा और साथ में हर क्षेत्र में उनकी उत्पादकता में इजाफा भी दर्ज होता रहेगा. 

कहने की जरुरत नहीं कि कम समय में ज्यादा हासिल करनेवाला ही जीत का हकदार बनता है, चाहे वह प्रतियोगिता परीक्षा हो  या अन्य कोई कार्य क्षेत्र. निःसंदेह, इसे हासिल करने के लिए तन्मयता से पढ़ने, लगातार प्रैक्टिस करने और परीक्षा में पूरे आत्मविश्वास के साथ सवालों का तय समयावधि में सही-सही उत्तर देने की जरुरत तो होगी ही.  

सच कहें तो समय के महत्व की सीख हम प्रकृति से भी लें सकते हैं. देश-विदेश के महान व्यक्तियों की दिनचर्या को गौर से देखने पर भी यह आसानी से सीखने को मिल सकता है. (hellomilansinha@gmail.com)

                 और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

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Monday, May 27, 2019

मोटिवेशन : जीवनशैली प्रबंधन से राहें आसान

                                               - मिलन  सिन्हा, मोटिवेशनल स्पीकर, स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट ... 
देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा हमारे स्कूल-कॉलेज -यूनिवर्सिटी में पढ़नेवाले विद्यार्थियों का है. लिहाजा, हमारे विद्यार्थियों को शिक्षित करने और  रोजगार के लायक बनाने  के साथ–साथ तन्दुरस्त बनाए रखना अनिवार्य है. तभी आने वाले समय में वे एक समर्थ इंसान के रूप में जीवन की तमाम चुनौतियों से निबटते एवं अपनी जिम्मेदारिओं को निबाहते हुए समाज एवं देश को भी मजबूत बना पायेंगे. लेकिन ऐसा कैसे संभव होगा ?

निसंदेह, इसके लिए छात्र-छात्राओं को एक सरल, सक्रिय व सामान्य जिंदगी जीने का अवसर देना होगा, उन्हें इसके लिए प्रेरित करना होगा. कहने का तात्पर्य यह कि विद्यार्थियों को पौष्टिक खानपान, समुचित पढ़ाई, रोजगार उन्मुख दक्षता एवं शारीरिक सक्रियता के प्रति निरंतर जागरूक करते हुए जीवनशैली प्रबंधन के महत्व को समझाना होगा. इससे हमारे विद्यार्थीगण न  केवल उर्जा, उमंग व उत्साह से लबरेज होकर अपने छोटे–बड़े लक्ष्यों को हासिल करने में सक्षम हो पायेंगे, बल्कि ज्यादा  स्वस्थ व आनंदित भी रह पायेंगे.

मानव शरीर रूपी इस अदभुत मशीन के बारे में जितना जानें, कहें और लिखें, कम ही होगा. बचपन से बुढ़ापे तक अनवरत धड़कने वाला जहां हमारा यह दिल है, वहीं अकल्पनीय सोच, खोज व अनुसंधान-आविष्कार का जनक हमारा मस्तिष्क. सोचने से करने तक के सफ़र में निरंतरता को साधे रखने का इस मशीन का कोई जोड़ नहीं है. लेकिन क्या यह सब बस यूँ ही होता रहता है या इस शरीर को सर्वथा स्वस्थ व जीवंत बनाये रखने के लिए जीवनशैली प्रबंधन में पारंगत होना जरुरी होता है ? तो आइये, जानते है जीवनशैली प्रबंधन से जुड़ी कुछ बुनियादी बातें : 

कहते हैं जल है तो जीवन है. जानकार बताते हैं, शरीर जितना हाइड्रेटेड रहेगा, आप उतना ही स्वस्थ रहेंगे. अतः  आपको  रोजाना 3-4 लीटर पानी पीना चाहिए.  हाँ, पीना चाहिए, गटकना नहीं. पीने का अर्थ है धीरे-धीरे जल ग्रहण करना और वह भी बैठ कर आराम से. रोज सुबह उठने  के बाद कम से कम आधा लीटर गुनगुना पानी पीना शरीर के अंदरूनी सफाई के लिए बहुत कारगर है. विशेषज्ञ यह भी कहते हैं  कि खाने के तुरत पहले, खाने के बीच में और खाने के तुरत बाद पानी नहीं पीना चाहिए, क्यों कि इससे पाचन क्रिया दुष्प्रभावित होती  है. बेहतर स्वास्थ्य के लिए भोजन से कम–से-कम 30 मिनट पहले और 30 मिनट बाद में पानी पीना चाहिए.

क्या आप रोजाना हेल्दी इटिंग करते हैं? सच पूछें तो घर में  उपलब्ध एवं तैयार पौष्टिक आहार से  प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, फैट, विटामिन, मिनिरल आदि पर्याप्त मात्रा में मिल जाता है जो आपको  शारीरिक एवं मानसिक रूप से स्वस्थ रखने के लिए काफी है. ध्यान रखें कि जब भी खाएं खूब चबाकर एवं स्वाद लेकर खाएं. सुबह का नाश्ता बहुत ही पौष्टिक हो और मात्रा में ज्यादा भी. दोपहर के खाने में चावल या रोटी के साथ दाल, मौसमी हरी सब्जी, दही, सलाद का सेवन करें. अपने आहार  में मौसमी फलों – केला, पपीता, नारंगी, अमरुद, सेव आदि को भी शामिल करें. रात के खाने को सादा एवं सबसे हल्का रखें और  खाना जल्दी खा भी लें. सोने से पहले एक कप / गिलास  गुनगुना दूध पी कर सोयें. हाँ, जंक, बाजारू एवं प्रोसेस्ड चीजों से बचने की हरसंभव कोशिश करें.

सच पूछिये तो  व्यायाम व खेलकूद  सामान्य शारीरिक क्रियाएं हैं, पर इसके परिणाम अत्यन्त ही बहुआयामी व दूरगामी होते हैं. सुबह जल्दी उठकर पानी पीने एवं  शौच आदि से निवृत होने के बाद 1-2 चम्मच शहद खा लें. फिर 5 मिनट फ्री हैण्ड एक्सरसाइज कर लें यानी  वार्म-अप हो लें. अब 10 मिनट साइकिलिंग या स्किपिंग कर लें  या  पांच राउंड सूर्य नमस्कार आसन कर लें. अपराह्न या शाम को फ़ुटबाल, कबड्डी, हॉकी, बैडमिंटन, क्रिकेट जैसे किसी खेल में भाग लें. स्कूल-कॉलेज में होने वाले आउटडोर गेम्स में जरुर शामिल हों. इन सबका आपके व्यक्तित्व के  सर्वांगीण विकास में अहम योगदान होता है.
योग व ध्यान जीवनशैली वह अहम हिस्सा है जो जीवन के प्रति आपके  दृष्टिकोण को व्यापक तथा समग्र बनाता है. जानकार-समझदार लोग भी श्वास की महत्ता को बखूबी समझते हैं और उसकी तार्किक व्याख्या भी करते हैं. अतः सुबह व्यायाम/आसन  के बाद प्राकृतिक परिवेश में कम-से-कम 15-20 मिनट प्राणायाम और ध्यान करें. कहना न होगा, योगाभ्यास के जरिए आप  निराशा, तनाव (स्ट्रेस) एवं अवसाद (डिप्रेशन) से भी निजात पा सकते हैं. 

दरअसल, नींद हमारी जरुरत नहीं, आवश्यकता है. रात में जल्दी सोयें और सुबह जल्दी उठें. रात में 7-8 घंटा जरुर सोयें. रात में  नींद के  दौरान शरीर रूपी इस जटिल, किन्तु अदभुत मशीन की रोजाना सफाई व रिपेयरिंग आदि होती रहती है; छोटे-मोटे रोग स्वतः ठीक हो जाते हैं. तभी तो  दिनभर की व्यस्तता के कारण जो  थकान महसूस होती है वह रात भर की नींद से काफूर हो जाती है और आप हर सुबह तरोताजा महसूसते हैं. 
                              (hellomilansinha@gmail.com)

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Sunday, May 19, 2019

मोटिवेशन : सोच-समझकर कोर्स का करें चयन

                                          - मिलन सिन्हा, मोटिवेशनल स्पीकर, स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट ... 
सामान्यतः इंटरमीडिएट और 12वीं यानी प्लस-टू की परीक्षा के बाद विद्यार्थियों के लिए अपने कैरियर को ध्यान में रख कर उपयुक्त कोर्स चुनने का कठिन समय होता है. ऐसा देखा गया है कि  साइंस के अच्छे विद्यार्थी पर मुख्यतः इंजीनियरिंग या मेडिकल में एडमिशन के लिए आंतरिक  एवं बाहरी दवाब होता है और चाहे–अनचाहे वे इन्हीं दोनों कोर्स  में से किसी एक में दाखिला लेने की कोशिश करते हैं. ऐसे पिछले कुछ वर्षों से विद्यार्थी एग्रीकल्चर साइंस और उससे जुड़े कई कोर्स में भी रूचि दिखा रहे हैं. इसके पीछे अधिकांश विद्यार्थी एवं उनके अभिभावकों की भावना मूलतः यह होती है कि एक बार इनमें से किसी कोर्स  में एडमिशन हो गया तो नौकरी  या अपना व्यवसाय अथवा प्रैक्टिस करके जीवन यापन करना आसान हो जाएगा. इंजीनियरिंग पढ़ने को इच्छुक विद्यार्थियों के लिए गौरतलब बात है कि आईआईटी, एनआईटी के साथ-साथ हजारों निजी और सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज में परंपरागत कोर्स के अलावे अब इंडस्ट्रियल इंजीनियरिंग जैसे कोर्स की पढ़ाई हो रही है, क्यों कि देश-विदेश  के रोजगार बाजार में इनकी अच्छी मांग है. इसी तरह मेडिकल की पढ़ाई के मामले में भी नए-नए कोर्स शामिल हो रहे हैं. विद्यार्थी पैरामेडिकल साइंस से जुड़े कई कोर्स में दाखिला ले सकते हैं, जिनका चिकित्सा क्षेत्र में अच्छी उपयोगिता है और आगे इसमें रोजगार की संभावना काफी बढ़नेवाली है.  

कॉमर्स और आर्ट्स के अच्छे विद्यार्थी चार्टर्ड एकाउंटेंसी, कॉस्ट एकाउंटेंसी आदि को चुनते हैं और तदनुरूप कोशिश करते हैं. ऐसे साइंस, कॉमर्स और आर्ट्स के अधिकांश विद्यार्थी  बीएससी, बीए, बीकॉम जैसे  पारम्परिक कोर्सों में एडमिशन के लिए प्रयास करते देखे गए हैं. उन सभी विद्यार्थियों के लिए  बीबीए (बैचलर इन बिज़नस एडमिनिस्ट्रेशन), बीसीए (बैचलर इन कंप्यूटर एप्लीकेशन), होटल मैनेजमेंट, फोटोग्राफी, इवेंट मैनेजमेंट, जर्नलिज्म जैसे कई और  विकल्प मौजूद हैं. भारत सरकार के डिजिटल पहल के साथ ही उससे संबंधित क्षेत्र रोजगार  के नए द्वार खोल रहे हैं और विद्यार्थियों के पास उससे जुड़े विभिन्न कोर्स की पढ़ाई कर नौकरी व रोजगार पाने का मौका है.

कहना न होगा, निम्न एवं मध्यम आय वर्ग के परिवारों के लड़के-लड़कियां औपचारिक शिक्षा ग्रहण करने के बाद एक अच्छी नौकरी की चाहत रखते हैं. लेकिन  नौकरी के आज के बाजार में सिर्फ परंपरागत स्नातक या स्नातकोत्तर डिग्री के बूते मनचाही नौकरी पाना आसान नहीं है.  देश में शिक्षित बेरोजगारों से संबंधित आंकड़े भी बताते हैं कि परंपरागत कोर्सों में अच्छे अंक या ग्रेड के साथ उत्तीर्ण होने के बावजूद ऐसे विद्यार्थियों  में से अनेक या तो बेरोजगार हैं या कोई ऐसी-वैसी नौकरी कर रहे हैं जिनका उनकी डिग्री से कोई प्रत्यक्ष वास्ता नहीं होता है, जब कि ऐसी डिग्रियां अर्जित करने में काफी वक्त एवं  मोटी रकम खरचने पड़ते हैं. यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि व्यापार एवं उद्योग की बदलती जरूरतों के लिहाज से ऐसे कई कोर्स विभिन्न शिक्षण संस्थानों तथा स्किल डेवलपमेंट इंस्टिट्यूट में अब उपलब्ध हैं जिन्हें  नौकरी के बाजार में अपेक्षाकृत ज्यादा अहमियत दी जा रही है. देखा जा रहा है कि नियोक्ता के तौर पर आजकल निजी क्षेत्र की कम्पनियां आम तौर पर ऐसे उम्मीदवार को तरजीह देते हैं जिनका एकेडमिक बैकग्राउंड तो ठीक-ठाक हो, साथ ही जो नयी चीजें सीखने तथा चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए तत्पर रहे. कारण, ऐसे नए कर्मियों को तीन से बारह  माह की अवधि का उपयुक्त ऑन-द-जॉब ट्रेनिंग देकर दक्ष बनाना आसान होता है. अतः यह आवश्यक है कि विद्यार्थी अभी से अपने एकेडमिक कोर्स के चयन के साथ-साथ अपने जॉब / बिज़नेस कैरियर की प्लानिंग को भी यथोचित महत्व दें.

कहते हैं न कि जानकारी  समाधान तक पहुंचने का एक अहम जरिया है. लिहाजा, नए भारत के निर्माण के मौजूदा दौर में विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों को इस बात पर भी गंभीरता  से विचार  करना पड़ेगा कि नौकरी के अलावा स्व-रोजगार के निरंतर बढ़ती संभावनाओं को ध्यान में रखकर विद्यार्थी कोर्स का चुनाव करें. अगर नौकरी और स्व-रोजगार दोनों के दरवाजे खुले रखने हैं तो यह मुनासिब होगा कि विद्यार्थी वैसे कोर्स में दाखिला लें, जिससे बाद में दोनों को साधने की संभावना बनी रहे. दोस्तों के देखा-देखी किसी भी कोर्स को चुनना और आगे चार-पांच साल व्यतीत  करना, समय और पैसे दोनों की बर्बादी है. निराशा और तनाव जो झेलना पड़ेगा, सो अलग. अभिभावकों और शिक्षकों से भी विद्यार्थियों के साथ विचार-विमर्श करने और उनका उचित मार्गदर्शन करने की अपेक्षा स्वाभाविक है.                      (hellomilansinha@gmail.com) 

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Monday, May 6, 2019

मोटिवेशन : रिजल्ट स्वीकारें और आगे बढ़ें

                                     - मिलन सिन्हा, मोटिवेशनल स्पीकर, स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट ... 
यूनिवर्सिटी, कॉलेज या स्कूल की वार्षिक परीक्षाओं की बात करें तो  रिजल्ट का दिन स्वाभाविक रूप से आशा, उत्सुकता, संशय और तनाव का दिन होता है - विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों  के लिए विशेष तौर पर. परीक्षाफल किसी के लिए खुशियों की सौगात लेकर आता है, किसी के लिए संतोष की छोटी-सी मुस्कान, तो किसी के लिए गम की गठरी. किसी के घर में उत्सव का माहौल होता है, किसी के घर में न ख़ुशी, न गम की सामान्य स्थिति, तो किसी के घर में डांट-फटकार, दोषारोपण और पश्चाताप की स्थिति. अगले कुछ दिन इसी तरह गुजरते हैं. विद्यार्थी खुद भी और उनके आसपास के लोग तुलनात्मक आकलन और कमेन्ट्री में व्यस्त हो जाते हैं. कई घरों में तो विद्यार्थी द्वारा पिछली परीक्षा से बेहतर रिजल्ट हासिल करने पर भी अभिभावक खुश होने तथा अपने लड़के या लड़की को शाबाशी देने के बजाय उसे कोसने लगते हैं क्यों कि पड़ोसी के बच्चे ने उनके बच्चे से कुछ बेहतर अंक हासिल किए हैं, जब कि उन्हें यह पता नहीं होता कि पड़ोसी के बच्चे ने पिछली परीक्षा से कम ही मार्क्स स्कोर किए हैं. कहने की जरुरत नहीं कि इसी बीच कुछ वियार्थी अपने खराब रिजल्ट और उसके बाद घर-बाहर के तानों से परेशान हो कर घर से भाग जाते हैं, अवसादग्रस्त हो जाते हैं या आत्मघाती कदम तक उठा लेते हैं. ऐसे समय अखबारों में छात्र-छात्राओं द्वारा आत्महत्या की घटनाओं की खबर सभी पढ़ते रहे हैं. विचारणीय प्रश्न है कि विद्यार्थी और उनके घरवालों दोनों को अच्छी तरह मालूम होता है कि रिजल्ट को बदल पाना अब संभव नहीं है, फिर भी वे उसे मन से स्वीकार नहीं करते हैं और परिणामस्वरूप घर के सभी लोग अकारण तनाव में जीते हैं. निश्चित रूप से यह किसी भी दृष्टि से अच्छी स्थिति नहीं है. जो होना था, वो तो हो गया. अब उसे स्वीकारते हुए आगे क्या करना है इस पर ठंडे दिमाग से सोच-विचार-विश्लेषण करके भविष्य में ऐसी गलती फिर न हो यह सुनिश्चित करने का विद्यार्थी द्वारा प्रयास करना सर्वथा उचित होता है.  देखिए, एप्पल कंपनी के संस्थापक और प्रसिद्ध आईटी एवं प्रबंधन विशेषज्ञ स्टीव जॉब्स क्या कहते हैं, 'कई बार आपके प्रयास में कमियां रह जाती हैं. सबसे बेहतर है, जितना जल्दी हो उन्हें स्वीकार करें और अपनी कोशिशों में सुधार लायें.'

दरअसल, परीक्षार्थी से बेहतर और कोई नहीं जानता कि रिजल्ट अच्छा, खराब अथवा आशा के अनुरूप नहीं होने के मुख्य कारण क्या हैं. सच पूछिए तो  इसके एक नहीं, अनेक कारण हो सकते हैं. मसलन, पढ़ा बहुत, पर सवाल कठिन थे; सवाल तो सही थे, पर सटीक उत्तर नहीं लिख पाये या तय समय के भीतर सभी सवाल का जवाब नहीं लिख पाये; तैयारी पूरी नहीं कर पाये; तैयारी तो पूरी थी, पर एग्जाम से ठीक पहले तबियत खराब हो गयी आदि. हां, अलग-अलग विद्यार्थी के लिए कारण में भिन्नता स्वाभाविक है. जो भी हो इस समय विद्यार्थी खुद को कोसना शुरू मत कर दें और न ही इस समय बड़ों के डांट- फटकार या किसी दूसरे के तंज को दिल से लें. 

खराब रिजल्ट के कारण तात्कालिक रूप से मायूस / तनावग्रस्त / अवसादग्रस्त हो जाना गैर मुनासिब नहीं है, तथापि ऐसी अवस्था हो तो थोड़ी देर खुली हवा में आँख बंद कर बैठें और डीप ब्रीदिंग करें. फिर खुले मन से अपनी गलती को सबके सामने बिना संकोच स्वीकारें और उन्हें यह भरोसा दिलाएं कि अगली परीक्षा में आप बेहतर प्रदर्शन जरुर करके दिखायेंगे. इतना करने भर  से ही आपका मन कुछ तो हल्का हो ही जाएगा और आपके घरवाले भी थोड़ा सहज-सामान्य फील करने लगेंगे. अब स्नान आदि से निवृत होकर सबके साथ खाना खाएं. अपना व्यवहार यथासंभव नार्मल रखने की कोशिश करें. तनाव फिर भी महसूस हो तो घर में आपके सबसे प्रिय व्यक्ति से खुल कर बात करें या अपने सबसे अच्छे दोस्त से बात करें, टीवी आदि पर कॉमेडी शो का आनन्द लें, पर्याप्त पानी/ मौसमी फल का रस पीएं और नींद का पूरा लाभ उठाएं. आपका तनाव स्वतः बहुत कम हो जाएगा. अगले दिन से एक बेहतर रूटीन को ईमानदारी से फॉलो करें.   

एक बात और. हर विद्यार्थी को यह मानना चाहिए कि उनके जीवन में परीक्षाएं आती-जाती रहेंगी, रिजल्ट अनुकूल-प्रतिकूल होते रहेंगे, आसपास के लोग कुछ-न-कुछ बोलते रहेंगे, लेकिन किसी भी परिस्थिति में खुद पर भरोसा बनाए रखना, अपना संतुलन कायम रखना और यथाशक्ति निष्ठापूर्वक अपना काम करते जाना उनके लिए सबसे जरुरी और अहम है. इतिहास के पन्ने ऐसे हजारों रियल लाइफ स्टोरी से भरे पड़े हैं, जिसमें हर शख्स ने कंफ्यूशियस के इस विचार को अपने कर्मों से साबित किया है कि 'हमारी महानतम विशालता कभी भी न गिरने में नहीं बल्कि गिरने पर हर बार फिर उठ जाने में निहित है.'
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Tuesday, April 9, 2019

मोटिवेशन : संघर्ष और सफलता

                                                                       - मिलन सिन्हा, मोटिवेशनल स्पीकर, ... ...

समय-समय पर अखबारों व अन्य समाचार माध्यमों से यह खबर मिलती रहती  है कि कैसे किसी छात्र या छात्रा ने तमाम आर्थिक, सामाजिक और शारीरिक कठिनाइयों के बावजूद पढ़ाई या खेलकूद या किसी अन्य क्षेत्र में असाधारण उपलब्धि हासिल की है. रिपोर्ट में उनके अनथक संघर्ष का विवरण भी रहता है. हाल ही सीए (चार्टर्ड एकाउंटेंसी) फाइनल परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त करने वाले एक लड़के की चर्चा अखबारों में थी कि कैसे कोटा निवासी उस दर्जी के बेटे ने संघर्ष के रास्ते यह मुकाम अर्जित किया. इसके विपरीत आपके आसपास भी ऐसे कई विद्यार्थी मिल जायेंगे जो अध्ययन एवं मेहनत से भागते हैं. इससे बचने के लिए कोई-न-कोई बहाना बनाते हैं. उन्हें आराम की जिंदगी जीने की तलब तो होती है, पर उसके लिए कुछ करना नहीं चाहते. क्या ऐसे विद्यार्थी जीवन में सफलता, सुख और शांति हासिल कर सकते हैं ? क्या उनका जीवन सार्थक कहा या माना जाएगा ? क्या उनकी यह आदत उनके आत्मविश्वास और आंतरिक क्षमता को कमजोर  नहीं करेगी ?   

प्रसिद्ध कवि जगदीश गुप्त की यह पक्तियां कि 'सच हम नहीं सच तुम नहीं सच है सतत संघर्ष ही / संघर्ष से हट कर जिए तो क्या जिए हम या कि तुम....'  या अमेरिकी राष्ट्रपति थियोडोर रूजवेल्ट के ये शब्द कि  'इतिहास आसान जीवन जीने वाले को याद नहीं रखता, इसलिए आरामतलबी को छोड़ते हुए हमें संघर्ष कर उससे प्राप्त सुख का भोग करना चाहिए' इस बात को बखूबी रेखांकित करते हैं कि जीवन में संघर्ष न हो तो जीवन में सच्चे आनंद का सुख हम नहीं भोग सकते. ज्ञानीजन यह भी कहते हैं कि जीवन में संघर्ष और सफलता लगातार आगे-पीछे चलते रहते हैं. 

आप भी मानेंगे, अगर कोई भी संघर्ष के रास्ते जीवन में सकारात्मक लक्ष्य की ओर खुशी-खुशी और मजबूती से चल पड़ें तो कोई कारण नहीं कि उन्हें अपेक्षित कामयाबी, खुशी, सुख और सकून न मिले. जरा सोचिये, 29 मई 1953 को माउंट एवेरेस्ट पर पहली बार विजयी पताका लहराने वाले न्यूज़ीलैंड के महान पर्वतारोही एडमंड हिलेरी एवं उनके नेपाली साथी शेरपा तेनजिंग नोरगे ने कितने मजबूत इरादों एवं कठिन परिश्रम से वह सुखद कीर्तिमान बनाया होगा. किस कठिनतम परिस्थिति में उन्होंने किस दिलेरी से अनजाने दुर्गम पहाड़ों से होते हुए अंततः विश्व की सर्वोच्य चोटी को फतह किया होगा. उस वक्त हिलेरी की उम्र मात्र 34 वर्ष और शेरपा तेनजिंग की 39 साल थी. दिलचस्प बात यह थी की शेरपा तेनजिंग को संघर्ष के उस महानतम मंजिल पर विजय हासिल करने पर इतनी खुशी मिली  कि उन्होंने 29 मई को ही अपना जन्मदिन मानने, बताने और मनाने भी लगे. दरअसल शेरपा तेनजिंग को अपना वास्तविक जन्म साल  तो ज्ञात था, लेकिन जन्मदिन नहीं. 

हमारी आजादी के संग्राम में जिन लोगों ने असाधारण भूमिका निभाई उनमें से यहां एक विभूति की चर्चा करें तो संघर्ष की महत्ता को समझना आसान होगा. वे हैं लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक.     

'स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और इसे मैं लेकर रहूँगा' के दृढ़ संकल्प से युक्त तिलक ने सुखमय जिंदगी का परित्याग कर देश की आजादी के लिए कठिन संघर्ष का मार्ग अपनाया. तिलक गणित, इतिहास, संस्कृत, कानून और खगोल विज्ञान के ज्ञाता थे. वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के पहले लोकप्रिय नेता थे जिनसे ब्रिटिश सरकार खौफ खाती थी. संघर्ष के उन्हीं दिनों में उन्होंने लोगों को जागृत करने के लिए दो अखबारों का प्रकाशन शुरू किया, जो आगे चलकर लोगों के बीच बहुत लोकप्रिय हुआ. स्वतंत्रता संग्राम के पक्ष में लिखे गए उनके लेखों के कारण उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा. 52 वर्ष की उम्र में (वर्ष 1908) ब्रिटिश सरकार ने उन्हें प्रसिद्द क्रांतिकारी खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी के समर्थन में आगे आने के लिए बर्मा (आज के म्यंमार) के कुख्यात मांडले जेल में छह साल  के कारावास में भेज दिया. लेकिन जैसे सोना आग में तपकर और निखरता है, उसी प्रकार बाल  गंगाधर तिलक ने उस कठिन परिस्थिति को चुनौती मानकर उस दौरान 'गीता रहस्य' नामक प्रसिद्ध किताब लिख डाली, जिसका बाद में अनेक भाषाओँ  में अनुवाद भी हुआ. संघर्ष के उस काल खंड में ऐसा भी वक्त आया जब तिलक की पत्नी का देहांत हो गया जिसकी सूचना उन्हें बाद में  दी गई. परिणामस्वरुप  वे पत्नी के अंतिम संस्कार में शामिल तक नहीं हो पाए. लोकमान्य तिलक ने लोगों को सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक रूप से जोड़ने और जागृत करने के लिए 'गणपति उत्सव' तथा  'छत्रपति शिवाजी उत्सव' की शानदार शुरुआत की और स्वामी विवेकानंद के इस उक्ति को बखूबी साबित किया  कि 'जितना बड़ा संघर्ष होगा, जीत उतनी ही शानदार होगी.'     
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Tuesday, March 12, 2019

मोटिवेशन : सफलता के लिए नियमितता जरुरी

                                                                       - मिलन सिन्हा, मोटिवेशनल स्पीकर, ... ...
कहते हैं कि जोश के साथ होश भी हो और अच्छे काम की अच्छी शुरुआत के साथ उसकी गतिशीलता बनी रहे तो परिणाम बेहतर होने की संभावना से कोई इनकार नहीं कर सकता. परीक्षा से पहले अमूमन सभी विद्यार्थी के पढ़ने की अवधि और नियमितता में सुधार दिखाई पड़ता है. इसका लाभ परीक्षाफल में भी दिखाई पड़ता है. लेकिन परीक्षा ख़त्म होने के बाद ( एक-दो दिन के रिलैक्सेशन को छोड़ दें तब भी ) अधिकांश विद्यार्थी क्या करते  हैं? क्या वे उतने ही घंटे की पढ़ाई नियमित रूप से जारी रखते हैं? यह एक विचारणीय विषय है. 

सभी विद्यार्थी के जीवन में एक परीक्षा ख़त्म होती है तो देर-सबेर आगे दूसरी कोई परीक्षा इन्तजार करती है. हर दिन एक नया दिन होता है. उस दिन को सार्थक तरीके से जीना हर मायने में अच्छा होता है. जो लोग कुछ करते रहते हैं और नियमित रूप से करते रहते हैं, बेशक सकारात्मक सोच और तरीके से, उनकी प्रगति  यात्रा बदस्तूर जारी रहती है. इस मामले में प्रकृति के मूल चरित्र पर थोड़ा गौर करें तो आसानी से बहुत कुछ सीखने को मिलता है.     

सामान्यतः यह पाया गया है कि स्कूल-कॉलेज की सालाना परीक्षा समाप्त होने के बाद  विद्यार्थी अपनी किताबों को उठाकर रख देते हैं, जैसे कि अब उन किताबों से कोई सरोकार ही नहीं. जब कि परीक्षा के दौरान और उससे पहले भी बहुत कम विद्यार्थी ही कोर्स के सभी विषयों के सभी चैप्टर को ठीक से समझ कर पढ़ पाते हैं. ऐसे में अगर परीक्षा के बाद उपलब्ध समय को उस अधूरे ज्ञान को पूर्ण करने में लगा दें तो शायद रिजल्ट आने से पहले ज्ञान के मामले में आप बहुत बेहतर स्थिति में रहेंगे, अलबत्ता आपका रिजल्ट कैसा भी हो.  सभी जानते हैं कि सही ज्ञान से ही सही सम्मान मिलता है, आत्मविश्वास में यथोचित उछाल आता है, सो अलग. एक बात और. इस दौरान अगर कुछ समय अगले क्लास या जिस प्रतियोगिता परीक्षा में शामिल होने की योजना है, उससे संबंधित सिलेबस का अवलोकन कर सकें, कुछ पढ़-समझ सकें तो उसका फायदा आपको ही मिलेगा और समय का सदुपयोग भी होगा. ऐसे भी कहा गया है कि खाली दिमाग शैतान का घर और सकारात्मक व गतिशील दिमाग प्रगति का द्योतक.  

इस विषय का एक और पहलू भी है. उदाहरण के तौर पर दसवीं एवं बारहवीं की परीक्षा को ही लें तो इसमें  विद्यार्थी एक निर्धारित पाठ्यक्रम पर आधारित सवालों का उत्तर देते हैं. अर्थात अधिक-से-अधिक उन्हें उनके सिलेबस में शामिल विषयों का अध्ययन करना पड़ता है. हर बढ़ते क्लास के लिए पाठ्यक्रम थोड़ा भिन्न और उच्च स्तर का होता जाता है और विद्यार्थी उसी अनुरूप खुद को तैयार कर नयी चुनौती का सामना करते हैं. आगे इंजीनियरिंग, मेडिकल या अन्य प्रतियोगिता परीक्षा में पाठ्यक्रम का यह दायरा विस्तारित हो जाता है. यहां सिर्फ उत्तीर्ण होने या अच्छा ग्रेड हासिल करने की बात नहीं होती, बल्कि इतना बेहतर करने की कठिन चुनौती होती है जिससे कि अंततः लाखों प्रतियोगियों में से चुनिन्दा सफल लोगों की सूची में अपना स्थान सुनिश्चित कर सकें. ऐसे में, तैयारी का दायरा बढ़ जाता है और उसकी शैली भी. इसलिए पढ़ने और सीखने के क्रम को जारी रखना बहुत जरुरी होता है. यानी आगे की परीक्षा में बेहतर करने के लिए नियमितता अनिवार्य है - पढ़ने और सीखने के मामले में. 

यहां इस बात को रेखांकित करना भी प्रासंगिक होगा कि कई विद्यार्थी कई बार किसी अच्छे कार्य को  पूरे उत्साह और उल्लास  के साथ शुरू तो करते हैं, लेकिन उन्हें नियमित व योजनानुसार आगे बढ़ाने से चूकते रहते है. सो, उस  कार्य की रफ्तार धीमी हो जाती है और अंततः वह कार्य रुक जाता है या अर्थहीन हो जाता है. परिणामस्वरूप,  एक तो वे  उस अच्छे कार्य को तार्किक परिणिति तक नहीं पहुंचा पाते और उसके फल का उपभोग नहीं कर पाते, बावजूद इसके कि उन्होंने  अपनी ऊर्जा और समय उस कार्य में लगाया है, दूसरे अगला कोई नया काम शुरू करने में उनको डर और शंका शुरू से ही घेरने लगती है.  

जानकार कहते हैं कि अगर किसी भी कार्य को समुचित ढंग से प्रारंभ करके आप अपनी दिनचर्या तथा दैनिक कार्य योजना में शामिल कर लेते हैं और उसे अगले साठ से नब्बे दिनों तक नियमित रूप से जारी रखते हैं तो आगे वह स्वतः चलता रहता है और एक समयावधि के बाद उसके अच्छे फल का आप  भरपूर आनंद उठाते हैं. अपने आसपास देखने पर भी आपको कई ऐसे साथी-सहपाठी मिल जायेंगे जो नियम और निष्ठापूर्वक इस सिद्धांत को अमल में लाकर सफलता और आनंद के हकदार बनते रहे हैं. 
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Saturday, February 23, 2019

मोटिवेशन : खुद से प्रतिस्पर्धा करें !

                                                                    - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर...
हाल ही में 'परीक्षा पर चर्चा' कार्यक्रम में प्रधानमन्त्री ने करीब दो हजार विद्यार्थियों, शिक्षक-शिक्षिकाओं  एवं अभिभावकों से करीब दो घंटे तक रूबरू बातचीत की. करोड़ों विद्यार्थियों ने इस कार्यक्रम  को टीवी और रेडियो पर देखा और सुना. उस दौरान प्रधानमंत्री ने अपने नायाब अंदाज में परीक्षा के प्रति उनका दृष्टिकोण, आम माता-पिता एवं शिक्षकों का व्यवहार, बच्चों की अपेक्षाएं, तनाव-अवसाद, सफलता-असफलता, डिजिटल क्रांति आदि अनेक विषयों पर खुलकर बात की और अपने विचार साझा किए. इसी क्रम में उन्होंने विद्यार्थियों से कहा, "दूसरों के साथ प्रतिस्पर्धा मत कीजिए, बल्कि खुद के साथ अनुस्पर्धा कीजिए."

बिलकुल सही है. ऐसा इसलिए कि किसी स्वस्थ प्रतिस्पर्धा में भी व्यक्ति मूलतः अपनी क्षमताओं का यथोचित उपयोग करने के बजाय बस अपने प्रतिस्पर्धी से आगे रहने की मंशा से कार्य करता है. इस प्रक्रिया में कई बार लोग यह तक भूल जाते हैं कि इस प्रतिस्पर्धा में आगे रहकर वे वस्तुतः क्या पाना चाहते हैं या पाते भी हैं. 

हमारे देश में भी हर वर्ष अनेक विद्यार्थी तनाव और अवसाद के  शिकार हो जाते हैं और एक बड़ी संख्या तो परीक्षा और उसके रिजल्ट के समय जीवन से हारकर मौत को गले लगा लेते हैं, जब कि वे भी भलीभांति जानते हैं कि उनका जन्म जीने के लिए हुआ है, इस तरह  अप्राकृतिक मौत को अंगीकार करने के लिए नहीं.

सभी जानते हैं कि प्रतिस्पर्धा किसी दूसरे से ही की जाती है. आमतौर पर विद्यार्थी अपने साथी -सह्पाठी से प्रतिस्पर्धा करते हैं. उनसे आगे बढ़ने पर अपना सारा ध्यान लगा देता है, अलबत्ता यह आगे बढ़ना कितना छोटा ही क्यों न हो. उसका सहपाठी भी वैसा ही करता है. गौर करनेवाली बात है कि इस प्रतिस्पर्धा के कारण उनके बीच संवाद में खुलापन और सरलता दुष्प्रभावित होने लगती है,  वे एक दूसरे से कई अहम बातें छुपाने लगते हैं, झूठ बोलते हैं और कई लोग तो मित्र से दुश्मन तक बन जाते हैं. कई बार तो यह प्रतिस्पर्धा इतना गलाकाट हो जाती है कि उनके लिए इसे सह पाना मुश्किल हो जाता है. इस सबके कारण उनको समय,उर्जा और एकाग्रता की क्षति उठानी पड़ती है. मानसिक उलझन एवं तनाव में वृद्धि होती है, सो अलग. 

चाहे कोई भी वजह हो या कोई भी इच्छा हो, इसके दवाब में आप प्रतिस्पर्धा के दौड़ में शामिल हो जाते हैं और फिर जायज-नाजायज किसी भी तरीके से जीत हासिल करना चाहते हैं, जब कि आप स्वयं जानते हैं कि प्राप्त जीत से कहीं बड़ी जीत हासिल करने की क्षमता आपमें है और वह भी सही तरीके से. लेकिन प्रतिस्पर्धा के दवाब में आप उतनी सी जीत से ही तात्कालिक रूप से खुद को विजयी मानने की गलती कर बैठते हैं. विचारणीय सवाल है कि कहीं आप इस प्रकार के रेस में फंसकर अपनी स्वभाविक क्षमता धीरे-धीरे कम तो नहीं करते जाते हैं, क्यों कि  इसका सीधा असर आपके आत्मविश्वास और उत्साह पर पड़ना लाजिमी है? 

इसके विपरीत अगर आप अनुस्पर्धा के मार्ग पर चल पड़ें तो आप खुद में छिपी असीम क्षमता के अनुरूप अपने प्रदर्शन को दिन-पर-दिन उन्नत करने को सचेष्ट हो जायेंगे और कालान्तर में आप सफलता की उन ऊँचाइयों पर पहुंचने में सक्षम होंगें जो आपको पहले नामुमकिन और दुरुह लगता था. ऐसा इसलिए कि आपके स्ट्रांग पॉइंट्स, आपकी कमजोरियों, आपके सामने उपलब्ध संभावनाओं और आपके सम्मुख उपस्थित होनेवाले जोखिमों के विषय में आपसे बेहतर कोई और शायद ही जान सकता है और उसका विश्लेषण कर सकता है.

अब अगर उक्त परिप्रेक्ष्य में आप सदैव अपने परफॉरमेंस को बीते हुए कल से बेहतर बनाने का संकल्प ले लें और फिर खुद को उस कसौटी पर कसते हुए यथोचित परिश्रम और लगन से आगे बढ़ते रहें, तो कोई कारण नहीं आप किसी से भी अच्छा मुकाम हासिल न कर पायें. ओलिंपिक खेलों  में अबतक सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करनेवालों में शामिल उक्रेन के सर्गेई बुबका और जमैका के उसैन बोल्ट ने इसको बखूबी साबित किया है. जीवन के हर क्षेत्र में ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं.  

सार संक्षेप यह कि आप दूसरों से स्पर्धा करने के बजाय स्वयं से स्पर्धा करने का संकल्प लीजिए और ऐसा करने की आदत डालिए. अपनी अच्छाइयों को पहचान कर उसमें निरंतर सुधार  सुनिश्चित करें. साथ-ही-साथ अपनी कमजोरियों को भी पहचान कर उसे कम करने और अंततः ख़त्म करने की पूरी कोशिश करें. एक आदत के रूप में रोज कुछ अच्छा और बेहतर जानें, सीखें और अमल में लाएं. नियमित रूप से किसी-न-किसी महान व्यक्ति की आत्मकथा या जीवनवृत पढ़ें. इससे आपका यह मत सुदृढ़ होता जायगा कि अनुस्पर्धा के मार्ग पर चलते हुए किस तरह ऐसे लोगों ने खुद को सतत उन्नत करते हुए असंभव को भी संभव कर दिया. खुद हमारे प्रधानमंत्री इसका ज्वलंत उदाहरण हैं.                 (hellomilansinha@gmail.com) 
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Tuesday, February 12, 2019

मोटिवेशन : समय प्रबंधन से मिलेंगे अच्छे अंक

                                                                            - मिलन  सिन्हामोटिवेशनल स्पीकर...
स्कूल-कॉलेज के छात्र-छात्राओं को मोटिवेट करने के क्रम में मैं "3 आर" को ठीक से साधने की बात करता रहा हूँ. यहाँ "3 आर" का मतलब रीडिंग, रिटेंशन और रिप्रोडक्शन से है. आम तौर पर यह पाया गया है कि पढ़ने, दिमाग में रख पाने तथा इम्तिहान में उसका उपयोग करने का अनुपात यानी  "3 आर"  का अनुपात 10 : 6 : 3 रहता है. इसका मतलब यह हुआ कि आपने 10 पेज पढ़ा, 6 पेज दिमाग में अंकित हुआ और मात्र 3 पेज के बराबर परीक्षा में लिख पाए. इसमें भी तारतम्य की गड़बड़ी रहती है सो अलग. यह कहने की जरुरत नहीं कि अच्छे विद्यार्थी का यह अनुपात यकीनन बेहतर होता है और तारतम्य भी. तो अब सवाल उठता है कि "3 आर" अनुपात को अच्छे ढंग से साधने के लिए वास्तव में क्या करना चाहिए?

पहले तो तन्मयता से पढ़ने की आदत डालनी चाहिए. तन्मयता से पढ़ने का मतलब यह है कि आप जब पढ़ने बैठते हैं, उस समय पूरे मनोयोग से आप उस चैप्टर को पढ़ें. पढ़ते वक्त आपका ध्यान आप जो पढ़ रहे हैं, मुख्यतः उसपर रहे. कोई भी दूसरा काम आपके ध्यान को बाधित नहीं कर पाए. कहने का अभिप्राय यह कि महाभारत में वर्णित श्रेष्ठ धनुर्धर पांडव पुत्र अर्जुन की तरह एकाग्रचित्त हो कर कार्य करें. अगर दो घंटे लगातार पढ़ने का मन बनाकर बैठते हैं तो उन दो घंटों में मोबाइल को साइलेंट मोड में कर लें और उसे पढ़ाई के टेबल से दूर रखें. ऐसे ही दूसरे अवरोधों से बचें. पढ़ने के लिए सुबह का समय कई कारणों से बेहतर माना जाता है. देखा गया है कि शाम तक जो विद्यार्थी दिनभर के लिए निर्धारित पढ़ाई कर लेते हैं, उन्हें रात में नींद भी अच्छी आती है. कारण सोने से पहले वे तनावमुक्त रहते हैं. इसके विपरीत दिनभर दूसरे क्रियाकलाप में व्यस्त रहनेवाले विद्यार्थी के लिए देर रात तक पढ़ने का प्रेशर रहता है, जब कि दिनभर के कार्य से शरीर थका रहता है और आराम खोजता है. ऐसे विद्यार्थियों के अस्वस्थ होने की संभावना भी ज्यादा रहती है. इसके अलावे एक और बात का ध्यान रखना लाभदायक होता है. शोरगुलवाले स्थान से अलग शांत माहौल में पढ़ने से एकाग्रता में खलल नहीं पड़ता है, फलतः चीजों को समझना और याद रखना आसान होता है. इस तरह एक बार विषय पर फोकस करके पढ़ने की आदत हो जाती है तो फिर आगे उसे जारी रखना आसान भी होता जाता है. 

पढ़ी हुई बातों को दिमाग में संजो कर रखने का अर्थ है कि वे बातें आपके दिमागी हार्ड डिस्क में ठीक से अंकित हो जाय. इसके लिए अपने दिमाग को उन बातों के स्वागत के लिए तैयार करने की जरुरत होती है. पढ़ी हुई बातों को दिमाग में अच्छी तरह सहेज कर रखना बहुत फलदायी साबित होता है. इससे जब भी जरुरत हो वह हमारे दिमागी स्क्रीन पर तुरत दिखने लगता है. कहते हैं "प्रैक्टिस मेकस ए मैन परफेक्ट" अर्थात अभ्यास आदमी को पूर्णता प्रदान करता है. जिन चीजों को तन्मयता से एक बार समझ पढ़ा-समझा, उसे छोटे-छोटे अंतराल में अगर फिर पढ़ और समझ लिया जाय, बिना देखे फिर उसको लिखने का अभ्यास कर लें, किसी दूसरे को वही बातें बता दें, पढ़ा दें, सिखा दें, तो यकीन मानिए आपके दिमाग में वह दृढ़ता से अंकित हो जाता है. कविवर वृंद ने सही कहा  है कि "करत-करत अभ्यास ते जड़मति होत सुजान, रसरी आवत जात ते सिल पर परत निसान." लिखने के सतत अभ्यास से आपको यह भी पता चल जाता है कि एक प्रश्न का उत्तर लिखने में कितना समय लगता है, जिससे कि परीक्षा के समय सब कुछ बेहतर ढंग से संपन्न हो सके. 

अब बात करते हैं किसी भी परीक्षा में अपेक्षानुसार या तैयारी के अनुरूप परफॉर्म करने की यानी पढ़ी और समझी हुई बातों की बुनियाद पर प्रश्नों का उत्तर लिखने की. इसके लिए पहले तो आपको शारीरिक एवं मानसिक रूप से संयत, संतुलित और शांत रहने की आवश्यकता होगी. अंतिम समय में पढ़कर या रटकर कुछ बेहतर हासिल करने की कवायद इच्छित फल नहीं देता है. इसके उलट ज्यादातर मामलों में आपका कनफूजन बढ़ जाता और साथ में उत्तेजना भी. परिणामस्वरूप, पहले जो कुछ अच्छे से पढ़ा है, उसे भी याद रखना मुश्किल लगने लगता है. फिर तो परीक्षा हॉल में नियत समय में सारे प्रश्नों का उत्तर देना नामुमकिन हो जाता है, जब कि प्रश्नों का उत्तर आपको मालूम होता है. इसलिए हर विषय की परीक्षा से पहली रात को जल्दी सो जाएं, 10 बजे से 11 बजे के बीच. सबेरे उठकर कर सामान्य दिनचर्या पर अमल करें. परीक्षा सेंटर पर समय से थोड़ा पहले पहुंचें. प्रश्नपत्र मिलने पर सभी प्रश्नों को पहले अच्छी तरह पढ़ें और हर प्रश्न के उत्तर पर कितने अंक मिलेंगे उस पर ध्यान देकर समय प्रबंधन की रुपरेखा बना लें. इसमें सभी प्रश्नों का जवाब लिखने के बाद अंत में 10-15 मिनट का समय रिवीजन के लिए रखें. अब उन सवालों को हल करते चलें जिन्हें कम समय में कर सकते हैं. जैसे-जैसे आप सवाल हल करते जायेंगे, आपका आत्मविश्वास बेहतर होता जाएगा और साथ में आपका दिमागी कंप्यूटर ज्यादा प्रभावी ढंग से काम भी करने लगेगा. रिप्रोडक्शन प्रक्रिया बेहतर होगी और अंतिम परिणाम भी. 
                                                                                     (hellomilansinha@gmail.com) 
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Tuesday, February 5, 2019

मोटिवेशन : प्लान करके चलें, सपनों को साकार करें

                                                                     - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर...
स्कूल, कॉलेज और  यूनिवर्सिटी में आपने भी शिक्षकों को यह कहते सुना होगा कि बेहतर परिणाम पाना चाहते हैं तो प्लान करके चलें. यही बात कॉरपोरेट जगत में बॉस और विशेषज्ञों भी कहते पाए जाते हैं. किसी खास समय जैसे कि इम्तिहान के वक्त हर विद्यार्थी आम दिनों से कुछ ज्यादा प्लान करके चलता है. बुद्धिमान और अच्छा रिजल्ट करनेवाले तो सामान्य  तौर पर बराबर ही प्लान करके चलते हैं. सच कहें तो प्लानिंग उनके दैनंदिन जिन्दगी का अभिन्न अंग हो जाता है; आदत का हिस्सा बन जाता है. वे इसके लिए हमेशा जागरूक रहते हैं. कल कौन-कौन से काम कब और कैसे करना है, उसे वे पहले से ही सूचीबद्ध कर लेते हैं और कमोबेश उसी के अनुसार कार्य संपादित करते हैं. उन्हें आप कदाचित ही फायर फाइटिंग मोड में देखेंगे. जब कि प्लान करके नहीं चलनेवालों को आप अधिकतर समय फायर फाइटिंग मोड में ही पायेंगे अर्थात घर में आग लग जाने पर उसे बुझाने के लिए भागमभाग करना, हो-हल्ला मचाना, अस्त-व्यस्त रहना. ऐसे लोग कम सफल और कम उत्पादक तो होते ही हैं, अनावश्यक तनाव में भी रहते हैं. और सभी जानते हैं, बराबर तनाव में रहना सेहत के लिए बिलकुल ही ठीक नहीं. इसके बहुआयामी दुष्प्रभाव हैं.

अन्तरिक्ष वैज्ञानिकों की प्लानिंग से बहुत कुछ सीखा जा सकता है. कैसे सब कुछ निर्धारित समय में पूरी सूक्ष्मता एवं गुणवत्ता के उच्चतम मानकों के साथ होता है जिससे काउंट डाउन ख़त्म होते ही अन्तरिक्ष यान अपने गंतव्य की ओर चल पड़ता है. कितनी प्लानिंग से सब कुछ आगाज से अंजाम तक पहुंचाया जाता है; एक बड़ी टीम में कितने लोग किस तरह प्लान करके चलते हैं कि एक नियत तिथि को सब कुछ सफलतापूर्वक संपन्न किया जाता है. वास्तव में,  हर प्रोजेक्ट प्लानिंग अपने आप में एक अनोखी एवं विचार समृद्ध प्रक्रिया होती है.

बेंजामिन फ्रैंकलिन कहते हैं, ‘अगर आप प्लान करने में असफल रहते हैं तो आप वाकई असफल होने का प्लान कर रहे हैं.’ सपनों को साकार करने के लिए तथा अपने लक्ष्यों को हासिल करने के लिए हमारे युवा जितनी मेहनत और लगन से लगे रहते हैं, उन्हें फ्रैंकलिन की बात की अहमियत अच्छी तरह समझने की आवश्यकता है. 

हम यह सब जानते और मानते हैं कि जहां भी संसाधनों की किल्लत रहती है, चाहे वह समय, उर्जा, धन, अवसर, मशीन, श्रमिक आदि ही क्यों न हो, वहां प्लान करके चलना निहायत जरुरी है. दूसरे शब्दों में कहें तो जब भी, जहाँ भी सीमित संसाधनों से एक नियत समयावधि में किसी भी कार्य को संपन्न करने की चुनौती होती है, तब-तब योजना की अनिवार्यता और स्पष्ट होती है. लेस्टर राबर्ट बिटल तो  कहते हैं, ‘अच्छी योजना अच्छे निर्णय का द्योतक है जिससे सपनों को साकार करना आसान हो जाता है.’ 

युवाओं के साथ -साथ यह बात नौकरी पेशा लोगों सहित उन सब पर लागू होता है, जो सहज और सुचारू ढंग से अपने दैनंदिन जीवन में अपने लक्ष्य को हासिल करना चाहते हैं. यह तब और अहम हो जाता है जब प्रतिस्पर्धा के इस युग में युवाओं को कई बार मल्टी-टास्किंग से रूबरू होना पड़ता है यानी एक साथ एकाधिक कार्य करने का प्रेशर होता है. तभी तो प्रसिद्ध फुटबॉल कोच पॉल ब्रायंट कहते हैं, ‘योजना बनायें, उसे ईमानदारी से अमल में लायें और फिर देखें कि आप कितने सफल हो सकते हैं. अधिकतर लोगों के पास कोई योजना नहीं होती. इसी कारण उन्हें हराना आसान  होता है.’ 

तो प्रश्न यह है कि विद्यार्थी इम्तिहान के इस मौसम में कैसे प्लान करें कि वे अपेक्षा के अनुरूप परीक्षा में परफॉर्म कर सकें ? 

परीक्षा से पहले अब जितना दिन बचा है और किसी दो विषयों की परीक्षा के बीच जो अंतराल है, उस दौरान जितना घंटा मिलता है, सबको जोड़ लें. अब उसमें से सोने के औसतन 7-8 घंटे तथा अन्य दैनिक दिनचर्या के लिए 3-4 घंटे  रोज के हिसाब से निकालने के बाद जितने घंटे बचते हैं, उसे विषय विशेष की जरुरत के मुताबिक़ आबंटित कर उस प्लान पर अमल करना शुरू करें. इस प्लान में कुछ घंटे खाली भी रखें यानी प्लान में थोड़ा लचीलापन रखें जिससे कि सभी विषयों पर यथोचित ध्यान दिया जा सके. ऐसे बनाए गए प्लान को पहले दो -तीन तक अमल में लाने के बाद आपकी  शारीरिक घड़ी एवं मन-मानस इस प्लान से एडजस्ट हो जाती है. फिर तो आगे उस प्लान के अमल से होनेवाले फायदे आपको खुद पता चलने लगते हैं और आपके उर्जा, उत्साह और उमंग में उछाल स्वतः आता रहता है. निःसंदेह, प्लान करके चलने की मानसिकता परीक्षा हॉल में भी आपको बहुत लाभ पहुंचाता है.  
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Tuesday, January 29, 2019

युवा कैसे करें तनाव प्रबंधन?

                                                               - मिलन  सिन्हामोटिवेशनल स्पीकर...
वास्तव में हमारे युवाओं, खासकर विद्यार्थियों को सुबह से शाम तक  तनाव से परेशान देखना आम बात हो गई है. यह सही है क्यों कि निरंतर बढ़ते प्रतिस्पर्धा के मौजूदा दौर में उनके लिए अपेक्षा, उत्पादकता, आनंद आदि के बीच तालमेल बिठाना कठिनतर होता जा रहा है. परिणामस्वरूप, वे अक्सर थके-हारे, मायूस और अस्वस्थ नजर आते हैं. इससे उनका उत्साह, आत्मविश्वास और उत्पादकता तो प्रभावित होता है, इसका नकारात्मक असर पारिवारिक सुख-शान्ति पर भी पड़ता है. 

दरअसल, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विशेषज्ञों की मानें तो तनावग्रस्त रहने और उसी अवस्था में कार्य करते रहने की बाध्यता के कारण ऐसे युवा तनाव-जनित अनेक बीमारियों के शिकार भी हो रहे हैं, और वह भी बड़ी संख्या में. इन बीमारियों में सिरदर्द, माइग्रेन, डिप्रेशन से लेकर ह्रदय रोग, मधुमेह, कैंसर आदि शामिल हैं. स्वाभाविक तौर पर यह किसी भी व्यक्ति और उनके परिवार के लिए सुखद स्थिति नहीं कही जा सकती. तो फिर सवाल है कि बिना किसी डॉक्टर के पास गए और बिना दवाइयों के सेवन के इस स्थिति से कैसे पार पाया जाय.

जोर देने की जरुरत नहीं कि इन सभी स्वास्थ्य समस्याओं का एक मात्र सटीक समाधान हमें योग से जुड़ कर मिल सकता है. योग के विषय में विश्व प्रसिद्ध ‘बिहार योग विद्द्यालय, मुंगेर’ के संस्थापक स्वामी सत्यानन्द सरस्वती ने बहुत सही कहा है, “योग मानवता की प्राचीन पूंजी है, मानव द्वारा संग्रहित सबसे बहुमूल्य खजाना है. मनुष्य तीन वस्तुओं से बना है – शरीर, मन व आत्मा. अपने शरीर पर नियंत्रण, मन पर नियंत्रण और अपने अन्तरात्मा की आवाज को पहचानना – इस प्रकार शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक इन तीनों अवस्थाओं का संतुलन ही योग है.  योग एक ऐसा रास्ता है, जो मनुष्य को स्वयं को पहचानने में मदद करता है. मानव शरीर को स्वस्थ और निरोग बनाता है एवं मनुष्य को बाहरी तनावों, शारीरिक विकारों से मुक्ति दिलाता है जो मनुष्य की स्वाभाविक क्रियाओं में अवरोध उत्पन्न करते हैं.  योग द्वारा मनुष्य अपने मन तथा व्यक्तित्व की अवस्थाएं तथा दोषों का सामना करता है.  यह मनुष्य को उसके संकुचित और निम्न विचारों से मुक्ति दिलाता है... …”

कहने का अभिप्राय यह कि योग अर्थात आसन, प्राणायाम,  ध्यान आदि का विज्ञान कहता है कि हम योग से जुड़कर अपने शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक क्षमताओं के बीच बेहतर संतुलन कायम कर न केवल खुद को आज और भविष्य में भी ज्यादा स्वस्थ, उत्पादक और खुश रख सकते हैं,  बल्कि अपने परिवारजनों को सही रूप में योग से जुड़ने और उसके असीमित सकारात्मक पहलुओं को जानने –समझने को प्रेरित कर सकते हैं. इस तरह हम खुद के अलावे अपने परिवार, समाज और देश को सही अर्थों में मजबूत, समर्थ, संपन्न और खुशहाल बना सकते हैं. 

हां, इसे मूर्तरूप देने के लिए स्वामी विवेकानन्द के इस कथन कि “सब शक्ति हमारे अन्दर है. हम सब कुछ कर सकते हैं” पर पूर्ण विश्वास करते हुए पूरी आस्था और निष्ठा से किसी योग्य प्रशिक्षक की देखरेख में योगाभ्यास प्रारंभ करना मुनासिब होगा. 

सूर्योदय के आसपास शौच आदि से निवृत होकर पहले आसन, फिर प्राणायाम और अंत में ध्यान – इस क्रम में पूरे योगाभ्यास को 30-40 मिनट में भी पूरा किया जा सकता है. 

आसन में पवनमुक्तासन से शुरू करके सूर्य नमस्कार तक की क्रिया की जा सकती है. सच कहें तो सूर्य नमस्कार का 8-10 राउंड अपने-आप में सम्पूर्ण आसन अर्थात व्यायाम है. इसके विकल्प के रूप में कुछ देर के सामान्य वार्मअप एक्सरसाइज के बाद पवनमुक्तासन श्रेणी के चार-पांच आसन जैसे ताड़ासन, कटि-चक्रासन, भुजंगासन, शशांकासन, नौकासन नियमित रुप से करें, तब भी अपेक्षित लाभ मिलेगा. 

प्राणायाम यानी ब्रीदिंग एक्सरसाइज में अनुलोम-विलोम, कपालभाती, उज्जायी, शीतली और भ्रामरी से शुरू कर सकते हैं. इसके बाद ध्यान मुद्रा यानी मेडिटेशन में कम-से-कम 5-10 मिनट बैठें. 

संक्षेप में कहें तो 10-15 मिनट का आसन, 10-15 मिनट का प्राणायाम और 5-10 का ध्यान अगर नियमितता, तन्मयता और निष्ठा से करें तो अप्रत्याशित लाभ के हकदार बनेंगे.      (hellomilansinha@gmail.com)

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Monday, January 21, 2019

मोटिवेशन : परीक्षा तो जीवन का हिस्सा है

                                                  - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर...
कुछ ही दिनों में सीबीएसइ की दसवीं तथा बारहवीं की परीक्षा सहित प्रादेशिक बोर्ड की परीक्षाएं भी   प्रारंभ हो रही हैं. छात्र–छात्राएं तैयारी में पूरी तरह जुट गए हैं. अभिभावक–शिक्षक की व्यस्तता भी बढ़ गई है. सही है. 

जरा सोचें कि परीक्षा आखिर है क्या, तो पायेंगे कि यह तो वाकई विद्यार्थियों के धैर्य, दिमागी संतुलन, ज्ञान एवं समय प्रबंधन का एक टेस्ट मात्र है.  दूसरे शब्दों में, उन्होंने अबतक जो कुछ पढ़ा है, सीखा है, जाना है, समझा है, और अगले कुछ दिनों तक उसमें जो कुछ जोड़ेंगे, उसके आधार पर परीक्षा में एक नियत समय सीमा के भीतर पूछे गए प्रश्नों का सटीक जबाव देना है.

कुछ लोग परीक्षा को ‘पर इच्छा’ भी कहते हैं. अगर यह सही है तो  परीक्षा में सब कुछ अपनी इच्छा के अनुरूप हो, यह जरूरी  नहीं. इसलिए, परीक्षा के पहले यह अपेक्षित है कि कूल -कूल और नार्मल रहते हुए यथासाध्य प्रयास करते रहें. इसके लिए संतुलित जीवनशैली अपनाकर खुद को फिट एवं जीवंत बनाए रखना बहुत लाभकारी होता है. हालांकि इस दौरान अमूमन यह देखने में आता है  कि अध्ययन के नार्मल रूटीन के साथ -साथ छात्र-छात्राओं की अन्य सामान्य दिनचर्या तक अस्त-व्यस्त हो जाती है. कहने का मतलब  यह  कि उन्हें न तो समय पर खाने की फ़िक्र रहती  है और न ही समय पर सोने  की,  जब  कि  परीक्षा की पूरी अवधि में  खाने और सोने पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता होती है, जितना कि पढ़ने पर.  ऐसा  इसलिए कि यथासमय आहार व नींद से  दूर रहने पर वे पर्याप्त शारीरिक एवं मानसिक शक्ति से युक्त नहीं रह सकते हैं. इसके एक दुष्प्रभाव  के रूप में उनमें नकारात्मक विचारों में वृद्धि हो जाती है  और वे अचानक ही खुद को अनेक समस्याओं से घिरे पाते हैं; परीक्षा के दौरान बीमार पड़ने की संभावना भी बढ़ जाती है; और फिर परीक्षा में बेहतर परफॉर्म करना कठिन हो जाता है. तो क्या करें?

रात में जल्दी सोयें और सुबह जल्दी उठें. नित्यक्रिया से निवृत होकर कम-से-कम 15 मिनट वार्मअप एक्सरसाइज एवं प्राणायाम –ध्यान कर लें.  सुबह नाश्ता खूब बढ़िया से करें यानी पौष्टिक आहार लें. सच पूछें तो घर में  उपलब्ध एवं तैयार पौष्टिक नाश्ते से  प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, फैट, विटामिन, मिनिरल आदि पर्याप्त मात्रा में मिल जाता है जो हमें शारीरिक एवं मानसिक रूप से स्वस्थ रखने के लिए काफी है. दोपहर के खाने में चावल या रोटी के साथ दाल, मौसमी हरी सब्जी, दही, सलाद का सेवन करें. अपने आहार  में मौसमी फलों को भी शामिल करें. रात के खाने को सादा एवं सबसे हल्का रखें और  नौ बजे तक खाना खा भी लें.  हाँ, जंक, बाजारू एवं प्रोसेस्ड चीजों से बचने की हरसंभव कोशिश करें. डिनर पार्टी आदि से दूर रहें. परीक्षा के दिन यथासंभव सादा एवं सुपाच्य भोजन करें, मसलन दाल–रोटी, दही–चूड़ा, खिचड़ी, इडली-सांभर  आदि. खाना खूब चबाकर खाएं और शरीर को बराबर हाइड्रेटेड रखें, अर्थात पानी पीते रहें.

चिकित्सा विज्ञान कहता है कि रात में अपर्याप्त नींद के कारण हमारा स्वास्थ्य खराब हो जाता है. ऐसे लोगों का स्ट्रेस हॉर्मोन्स काफी बढ़ जाता है जिसके चलते वे एकाधिक रोगों की चपेट में आ जाते हैं. लिहाजा, रात में सात–आठ घंटा जरुर सोयें. रात की अच्छी नींद सुबह आपके लिए ताजगी, उमंग व उत्साह का उपहार लेकर आती है. हाँ, सोने से पहले  अपना  मोबाइल बंद कर लें तो उत्तम, नहीं तो कम से कम साइलेंट मोड पर जरूर कर लें. मोबाइल को सोने के स्थान से दूर रखें. एक और बात. ध्वनि तथा प्रकाश अच्छी नींद को बाधित करते हैं.  सोने से पहले इसका  ध्यान रखें तो बेहतर. मौका मिले तो दोपहर में भी थोड़ी देर (घंटा भर) सो लें – रीफ्रेशड फील करेंगे. 

सार-संक्षेप यह कि परीक्षा से पहले अब जितने दिन शेष है, उसका बेहतर उपयोग करें. किस विषय में और कितना समय दे सकते हैं, उसका सही आकलन कर एक स्मार्ट कार्ययोजना बनाकर उस पर अमल करें. जो समय बीत गया, उसकी चिंता इस वक्त कतई न करें. प्रख्यात कवि हरिवंश राय बच्चन ने लिखा है न, 'जो बीत गयी सो बात गयी ….'  बेहतर तो यह है कि अब जो कर सकते हैं  उसी पर फोकस करें.  यथासाध्य और यथासंभव रीविजन करें, लिखने का अभ्यास भी करें.  कहते हैं न, ‘प्रैक्टिस मेक्स ए मैन परफेक्ट’. फार्मूला, महत्वपूर्ण पॉइंट्स आदि पर विशेष ध्यान दें, उन्हें अंडरलाइन करें, हाईलाइट करें.

परीक्षा जैसे नाजुक अवसर पर यह भी देखा  गया है कि ज्यादातर स्टूडेंट यह सोच-सोच कर  परेशान  रहते हैं कि दोस्त क्या पढ़ रहे हैं, क्या कर रहें हैं. ऐसा सोचना बहुमूल्य समय की बेवजह बर्वादी है.  ऐसे वक्त दोस्त को फ़ोन करना नाइंसाफी  से कम नहीं.  ऐसे में अपना  मोबाइल बंद कर लें तो उत्तम, नहीं तो कम से कम साइलेंट मोड पर जरूर कर लें.  फेस बुक आदि से इस समय दूर ही रहें तो अच्छा. बस खुद पर और परीक्षा की अपनी तैयारी  पर ध्यान केन्द्रित करें.

अंत में एक छोटी-सी बात और.  परीक्षा के दौरान  “टेक-इट-इजी”  सिद्धांत को फॉलो करें. इस सिद्धांत के तहत प्रश्नों को पहले ठीक से पढ़ना, समझना और फिर उत्तर देना चाहिए.  इस अवसर पर ‘स्मार्ट समय प्रबंधन’ आपके परफॉरमेंस और परीक्षाफल को बेहतर बनाता है.      (hellomilansinha@gmail.com)

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