Tuesday, February 25, 2014

गुड लाइफ : दृढ़ बनें और खुश रहें

                                                                                           - मिलन  सिन्हा 

Displaying PATNA - City, CITY _DigitalEdition-page-001.jpgगलती करना, उसका एहसास होना, फिर पछताना और उस गलती से सीख लेने एवं  आगे उसे पुनः न दोहराने का संकल्प लेकर जीवन में अग्रसर हो जाना, मानव जीवन का उत्तम उसूल माना जाता रहा है। देखने पर  हर महान व्यक्ति का जीवन इस सिद्धांत का पालन करता हुआ प्रतीत होगा। लेकिन, हम अपने आसपास नजर दौड़ाने  पर पाते हैं  कि हममें  से अनेक लोगों के लिए गलती करना और फिर  पछताना,  समानांतर व सतत चलनेवाली प्रक्रिया है। देखा गया है कि वे जानते हुए भी ऐसे काम करते हैं जिसके लिए उन्हें पिछली  बार भी पछताना पड़ा था।

ऐसे स्वभाव व व्यवहारवाले लोग मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं - एक तो  सबमिसिव अर्थात दब्बू और दूसरे  एग्रेसिव अर्थात आक्रामक। इन दोनों प्रकृति के लोगों को यह मालूम नहीं होता या मालूम होने पर भी यह तय नहीं कर पाते कि कब बोलना चाहिए और कब चुप रहना चाहिए। कहां और कब अपना पक्ष दृढ़ता से रखना है और किस मौके पर सिर्फ वेट एंड वाच की  अवस्था में रहना श्रेयस्कर होता है। दिलचस्प बात यह है कि ये दोनों विपरीत स्वभाव के व्यक्ति होते है, पर दोनों ही विभिन्न राज रोगों (मधुमेह, ह्रदय रोग डिप्रेशन आदि) से ग्रसित होते हैं।  जो सबमिसिव होते हैं, वे 'यस सर' (जी, महाशय ) श्रेणी के होते हैं. सही हो या गलत, बॉस के हर बात में 'यस सर' और बाद में सिर पकड़ कर बैठना, करवटें बदलते हुए सोने का प्रयास करना। दूसरी ओर जो एग्रेसिव होते हैं वे अपने को सही दिखाने के लिए अनावश्यक रूप से हर जगह हावी होना चाहते हैं। ये 'हायरिंग- फायरिंग' सिद्धांत वाले हैं। ऐसे लोग विवेचना कर जवाब देनेवाले लोगों को पसंद नहीं करते। इन्हें तो हर स्थिति में 'यस सर' कहनेवाले सबमिसिव लोग बहुत पसंद हैं। इस तरह ये गलती पर गलती करते हैं, पछताते हैं, किन्तु  दूसरों पर दोष डाल  कर फिर वैसी ही गलती करते रहते हैं।  

कहने का तात्पर्य, व्यवहार में दब्बू अथवा आक्रामक होने के बदले, यह हमेशा वांछनीय है कि हम दृढ़ यानि निश्चयात्मक (एसर्टिव)  बनें। पाया गया है कि निश्चयात्मक व्यवहारवाले मनुष्य संतुलित, सक्षम, विश्वस्त, वस्तुपरक, प्रगतिशील, निर्णयात्मक,  विनोदप्रिय, शांतचित्त और तार्किक होते हैं। फलतः वे गुड लाइफ का पूरा आनंद उठाते हैं।  

                    और भी बातें करेंगे, चलते-चलते असीम शुभकामनाएं
# 'प्रभात खबर' के मेरे संडे कॉलम, 'गुड लाइफ' में प्रकाशित     

Monday, February 17, 2014

गुड लाइफ : आर्ट ऑफ रिटायरिंग

                                                                                             - मिलन सिन्हा 
Displaying 7517349-0.jpgजीवन जीना विज्ञान नहीं, एक कला है, आज के इस वैज्ञानिक युग में भी। हमारे जीवन में कई पड़ाव, कई मोड़ आते हैं जो हमें एक मौका देते हैं समीक्षा का, आगे की योजना बनाने का।  कामकाजी लोगों, वो भी संगठित क्षेत्र में नौकरी करनेवाले लाखों लोगों के लिए जीवन में एक ऐसा ही महत्वपूर्ण मोड़ आता है, रिटायरमेंट का। नौकरी को अलविदा  कहने का - चाहे -अनचाहे, अनेक  मामलों में अनचाहे। कई  लोगों के लिए यह समय अत्यधिक पीड़ादायक तो कभी -कभी डरावना और जानलेवा तक हो जाता है।  'टायर्ड'  हुए नहीं, पर  'री-टायर्ड' मानकर  विदाई दे दी गई। ऐसे में जब कोई उन्हें रिटायर्ड कहता है तो लगता है कि जैसे वे अब थके -हारे, अशक्त, चुके हुए, किसी काम के व्यक्ति नहीं रहे।

कहते हैं न, आदत बुरी बला। बीस - तीस साल तक नौकरी में रहते हुए हम एक आदत विशेष के शिकार हो जाते हैं। फिर एक दिन उस आदत के दायरे से बिलकुल बाहर निकल कर एक सामान्य आदमी की तरह जीना बहुत कठिन लगता है, और वो  भी तब जब वह कोई सरकारी या अन्य उच्च पद पर आसीन व्यक्ति रहा हो। लगता है सब शान -सुविधाएं छिन गई, अपनी अब कोई पहचान नहीं रही। उस परिस्थिति में यह प्रतीत होना स्वभाविक है कि विपत्ति अकेली नहीं आती, जैसे घर -बाहर सबकी समस्याएं, एक साथ सामने आ खड़ी हो गई । 

बुद्धिमान लोगों का मत है कि आर्ट ऑफ लिविंग का ही एक  महत्पूर्ण अध्य़ाय है 'आर्ट ऑफ रिटायरिंग'। सो, रिटायरमेंट को प्लान करना अनिवार्य है जिससे भविष्य में होनेवाले बदलावों को सहज अंगीकार किया जा सके। दरअसल, रिटायरमेंट के उस संक्रांति पल को और उसके बाद शुरू होनेवाली जिंदगी को  बिल्कुल नए ढंग से जीना अपने -आप में चुनौतीपूर्ण तो है, लेकिन है एक कला - कहीं ज्यादा रोमांचक और मजेदार। कारण, नौकरी के  सारे बंधनों से मुक्त, अपने ज्ञान तथा  अनुभव के बल पर - स्वयं एवं समाज दोनों के हित में कुछ नया व  ज्यादा सार्थक करने के लिए अब खुद को समर्पित कर सकते हैं। हां, जरुरत है तो सिर्फ पारम्परिक सोच के दायरे से बाहर निकल कर सोचने और क्रियाशील होने की। 

                       और भी बातें करेंगे, चलते-चलते असीम शुभकामनाएं

Wednesday, February 12, 2014

गुड लाइफ : जिंदगी न मिलेगी दोबारा

                                                                                - मिलन सिन्हा 
Displaying 7412643-0.jpgसिर्फ फ़िल्म अभिनेता, निर्देशक फरहान अख्तर ही नहीं, हम  सभी बखूबी जानते हैं, 'जिंदगी न मिलेगी  दोबारा' । फिर  भी हमें अखबारों में आत्महत्या के समाचार रोज दिखते हैं। हाल ही में कानपुर आइआइटी के एक छात्र के  आत्महत्या की खबर आपने भी पढ़ी होगी। सवाल है, आखिर मरना कौन चाहता है और कोई मरे भी क्यों जब कि हमारा जन्म जीने के लिए हुआ है।  मृत्यु तो ऐसे भी हमारी जिंदगी की लम्बी यात्रा का अंतिम पड़ाव है। तो फिर बात -बेबात पर हम अवसाद ग्रस्त क्यों हो जाते हैं, क्यों आत्महत्या का विचार मन में लाते हैं ? 


यह जानना दिलचस्प है कि मनुष्य बिना खाये 40 दिनों तक, बिना पानी के 3  दिनों तक और बिना ऑक्सीजन के 8  मिनट तक जिन्दा रह सकता है, परन्तु बिना उम्मीद के शायद दो पल भी नहीं। तभी तो होश सम्हालने के बाद से ही हम सुनते, जानते और समझते रहे हैं  कि दुनिया उम्मीद पर ही टिकी है। तब क्यों और कैसे हम ऐसी नाउम्मीदी के चंगुल में फंसते हैं जो हममें से अधिकांश लोगों का जीवन बेमजा कर देता है और तो और कई कमजोर दिल-दिमाग वालों को आत्महत्या की ओर  धकेलता है ?

सोचिये जरा, हम खुद को आहत कब महसूस करते हैं ? सामान्यतः जब हमारी चाहत पूरी नहीं होती है।  मतलब, अगर आप चाहत को कंट्रोल करने की क्षमता विकसित कर लें, तो आहत होने की संभावना भी कम हो जायेगी। दूसरे, चाहत की व्यवहारिकता को भी जांच लेनी चाहिए।  ऐसा नहीं कि जो प्रथम दृष्ट्या ही नामुमकिन लगे, बिना सोचे समझे उसे भी हासिल  करने की जिद पकड़ लें। तीसरे, चाहत के अनुरूप जो भी उपक्रम हमें करने चाहिए, उसे पूरी शिद्दत से करेंगे, तभी  तो फलाफल अपेक्षित होगा। 

क्या आपने एक भी ऐसा व्यक्ति देखा है जिनके जीवन में सिर्फ मजा ही मजा है , कोई सजा, गम या समस्या नहीं ? नहीं न ! तो फिर क्यों न इस बेशकीमती जीवन को उसकी सम्पूर्णता - चुनौती, ख़ुशी, गम, उतार,चढ़ाव, सफलता, असफलता आदि  में जीने का संकल्प लेकर  एक नए अंदाज में फिर से जीना शुरू करें और  जीवन का भरपूर आनंद लें। 

                    और भी बातें करेंगे, चलते-चलते असीम शुभकामनाएं
'प्रभात खबर' के मेरे संडे कॉलम, 'गुड लाइफ' में  प्रकाशित    

Tuesday, February 4, 2014

गुड लाइफ : एग्जाम - टेक-इट-इजी

                                                                - मिलन सिन्हा
clip thumbआ गया है  फिर परीक्षा का मौसम और साथ ही तेज हो गया है तैयारी का सिलसिला। आम तौर पर यह पाया  गया है कि परीक्षा के मौके पर छात्र- छात्राओं का मानसिक दबाव  बढ़  जाता है। यह बिलकुल स्वाभाविक बात है। लेकिन, अगर जरा सोचें कि परीक्षा आखिर है क्या, तो पायेंगे कि  यह तो वाकई हमारे धैर्य, दिमागी संतुलन, ज्ञान व समय प्रबंधन का टेस्ट मात्र है। कहने  का मतलब, हमने जो कुछ पढ़ा है, सीखा है उसके बुनियाद पर एक नियत समय सीमा के भीतर पूछे गए प्रश्नों का सटीक जबाव देना है।

कुछ लोग इसे ‘पर इच्छा’ भी कहते हैं। अगर यह सही है तो  परीक्षा में सब कुछ अपनी इच्छा के अनुरूप हो, यह जरूरी  नहीं। इसलिए, परीक्षा के पहले यह अपेक्षित है कि हम कूल -कूल और नार्मल रहने का प्रयास करें। अब तक जो नहीं पढ़ पाए हैं, उसकी चिंता इस वक्त कतई न करें।प्रख्यात कवि हरिवंश राय  बच्चन ने लिखा है न ,'जो बीत गयी सो बात गयी ….।' बेहतर तो यह है कि हमने जो पढ़ा है उसी पर फोकस करें। यथासाध्य और यथासंभव उसी का रीविजन करें, लिखने का अभ्यास भी करें । फार्मूला, महत्वपूर्ण पॉइंट्स आदि पर विशेष ध्यान दें, उन्हें अंडरलाइन करें, हाईलाइट करें ।

 परीक्षा जैसे नाजुक अवसर पर यह भी देखा  गया है कि ज्यादातर स्टूडेंट यह सोच-सोच कर  परेशान  रहते हैं, अनावश्यक तनाव में रहते हैं कि दोस्त क्या पढ़ रहे हैं, क्या कर रहें हैं। ऐसा सोचना बहुमूल्य समय की बेवजह बर्वादी है। ऐसे वक्त दोस्त को फ़ोन करना नाइंसाफी  से कम नहीं। ऐसे में अपना  मोबाइल बंद कर लें तो उत्तम, नहीं तो कम से कम साइलेंट मोड पर जरूर कर लें। फेस बुक आदि से इस समय दूर ही रहें तो अच्छा। बस खुद पर और परीक्षा की अपनी तैयारी  पर ध्यान केन्द्रित करें । संतुलित आहार और अच्छी नींद खुद को फिट एवं जीवंत रखने के लिए आवश्यक तो  है ही। 


एक छोटी-सी बात और। परीक्षा के दौरान  “टेक-इट-इजी”  सिद्धांत को फॉलो करें। इस सिद्धांत के तहत प्रश्नों को पहले ठीक से पढ़ना, समझना और फिर उत्तर देना चाहिए। इस अवसर पर स्मार्ट समय प्रबंधन हमारे परफॉरमेंस को बेहतर बनाता है और हमारे लिए एक बेहतर जीवन  का मार्ग  प्रशस्त करता है। 

                      और भी बातें करेंगे, चलते-चलते असीम शुभकामनाएं