Saturday, February 29, 2020

नई राहें: ज्ञान, नजरिया और अच्छी शुरुआत

                                                 - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर, वेलनेस  कंसलटेंट ...
सफल होना सबकी चाहत होती है. लोग इसके लिए अपने-अपने हिसाब से प्रयास भी करते हैं. सामान्यतः उन्हें इसके अनुरूप फल भी मिलता है. लेकिन अपनी आशा और अपेक्षा के अनुरूप अगर हमें कामयाबी को अपना साथी बनाए रखना है तो कुछ बातों को अपनी आदत का हिस्सा बनाना जरुरी है.

गीता में कहा गया है कि ज्ञान के समान इस संसार में और कुछ भी पवित्र नहीं है. प्रसिद्ध ब्रिटिश दार्शनिक फ्रांसिस बेकन ने भी साफ़ कहा है, "नॉलेज इज पॉवर" यानी ज्ञान ही शक्ति है. सच है कि ज्ञान की शक्ति से मनुष्य अन्धकार से प्रकाश की ओर अग्रसर होता है. ज्ञान से हमारा बौद्धिक विकास होता है,  हममें तर्क व विश्लेषण की शक्ति विकसित होती है. इससे हम रूढ़िवादिता और अन्धविश्वास से मुक्त हो पाते हैं. सही-गलत की समझ पैदा होती है. ज्ञान से बड़ा कोई धन नहीं. सो, हमेशा ज्ञान यात्रा के पथिक बने रहने का प्रयास करें. इसके साथ-साथ यह भी कोशिश करते रहें  कि ज्ञान का यथोचित उपयोग हमारे हर एक्शन में हो. तभी हम कठिन-से-कठिन काम संपन्न कर सकते हैं. यही तो कारण है कि वर्क प्लेस में हर एम्प्लायर को नॉलेज वर्कर की तलाश रहती है, क्योंकि वे जानते हैं कि ऐसे कर्मी को थोड़ी ट्रेनिंग एवं मोटिवेशन मिले तो वह अपने काम को अच्छी तरह समझ कर अपेक्षित समय में अच्छे तरीके से पूरा करता है. इसलिए इस बात का हमेशा रखें हम पूरा ध्यान, ज्ञान से मिले सफलता तथा  मान-सम्मान. 

विख्यात अमेरिकी लेखक और  मोटिवेशनल स्पीकर जिग जिगलर का कहना है कि "योर एटीचुड एंड नॉट एप्टीचुड विल डीसाइड योर एलटीचुड" अर्थात आपका नजरिया, ना कि आपकी अभिरुचि या योग्यता, आपकी उंचाई का निर्धारण करेगी. इस कथन पर विचार करें तो पायेंगे कि हमारे आसपास कितने ही मेधावी और मेहनती लोग केवल सही या सकारात्मक नजरिए के अभाव में कैरियर, नौकरी या व्यवसाय में उस लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाते हैं जिसे उन्हें सामान्यतः हासिल करना चाहिए था. रिलेशनशिप मैनेजमेंट की बात हो  या पोटेंशियल मैनेजमेंट की, हर जगह हमारा नजरिया एक अहम भूमिका अदा करता है. इसी बात  को क्वीन ऑफ़ आल मीडिया के नाम से प्रसिद्ध ओपरा विनफ्रे इन शब्दों में बयां करती हैं, "अब तक की सबसे बड़ी खोज यह है कि व्यक्ति महज अपना नजरिया बदल कर अपना भविष्य बदल सकता है." विनफ्रे सहित देश-विदेश  में हजारों ऐसी रियल लाइफ हीरो हैं जिनका जीवन  इस बात की गवाही देता है कि कैसे  वे लोग  अपने नजरिए को उन्नत बनाए रखकर जीवन में सफलता और समृद्धि के हकदार बनें. मेरा तो स्पष्ट मत है कि सही नजरिया हमारे जीवन को संवारे, नित हमारे व्यक्तित्व को निखारे.

आमतौर पर देश-विदेश में कॉलेज-यूनिवर्सिटी में पढ़नेवाले युवा हों या पेशेवर या नौकरीपेशा व्यक्ति, सभी डे-मैनेजमेंट यानी दिन में क्या-क्या करना है और कैसे करना है, को बहुत महत्व देते हैं और देना भी चाहिए. लेकिन उनमें से कुछ ही लोग मार्निंग मैनेजमेंट को भी उतना या कुछ ज्यादा महत्व देते हैं, क्यों कि वे जानते हैं कि सुबह की अच्छी शुरुआत से दिनभर के काम के लिए अपेक्षित उर्जा, उत्साह और उमंग से आदमी भर जाता है. वाकई, समय का वह हिस्सा जो बहुत रेफ्रेशिंग होने के साथ-साथ सामान्यतः हमारे नियंत्रण में होता है वह है सुबह का समय. ज्यों ही हम घर से कार्यस्थल के लिए चल पड़ते हैं, कमोबेश हम बाहरी फैक्टर्स के अधीन आ जाते हैं. इसलिए  सबको सुबह का कम-से-कम एक से दो घंटा समय खुद पर निवेश करना चाहिए. इस दौरान शॉ (एसएडब्लू)  फैक्टर (सनशाइन, एयर यानी ऑक्सीजन, वाटर) जो हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत अहम हैं, उन पर फोकस करना हमारे लिए आसान होता है. यह तीनों चीजें हमें मुफ्त में उपलब्ध  हैं. ऐसे तो सूर्योदय के आसपास सो कर उठ जाना शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य के लिए उत्तम माना गया है, लेकिन कतिपय कारणों से कई लोगों के लिए ऐसा संभव नहीं होता. इसलिए जब भी उठें तब एक-दो घंटे का निवेश खुद पर करें. इस अवधि  में पहले ठीक से कम-से-कम आधा लीटर पानी पीने के अलावे अपने वाशरूम के नित्यकर्म को निबटाकर शरीर को ऑक्सीजन युक्त करने और धूप का सेवन करने का प्रयास करें. नियमित रूप से सूर्योदय के बाद आधे घंटे तेज गति से  टहलने, प्राणायाम आदि करने से बहुत फायदा होगा. जोर देने की जरुरत नहीं कि मॉर्निंग मैनेजमेंट का अहम हिस्सा है सुबह का पौष्टिक नाश्ता. हमेशा आराम से ब्रेकफास्ट करें, लाइफ कितना भी फ़ास्ट क्यों न हो. नाश्ता करने के बाद तुरत घर से निकलने की जल्दबाजी न करें. 10-15 मिनट आराम से बैठ कर दिन में किए जानेवाले महत्वपूर्ण कार्यों की सूची (प्राथमिकता के आधार पर) बना लें. इससे कार्यस्थल पर पहुंचकर उस एजेंडा के मुताबिक़ तुरत काम शुरू करना आसान होगा. इससे आपकी कार्यक्षमता  और उत्पादकता में गुणात्मक सुधार होगा.  
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                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 
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Tuesday, February 25, 2020

एक्टिव रहेंगे तो प्रोडक्टिव रहेंगे

                                               - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर... .... 
हम सब अच्छी तरह जानते हैं कि जीवन में सक्रियता का बहुत महत्व है. सक्रियता से मेरा तात्पर्य यहां सकारात्मक सक्रियता से है. जो लोग एक्टिव रहते हैं, देखा गया है कि वे लोग ज्यादा प्रोडक्टिव बने रहते हैं. छात्र-छात्राओं पर भी यह बात लागू होती है. मौजूदा दौर में नियोक्ता ऐसे उम्मीदवार की तलाश में रहते हैं जो संस्थान की प्रोडक्टिविटी में लगातार योगदान करते रहें. इसके मद्देनजर विद्यार्थियों को शुरू से ही एक्टिव रहने की आदत डालने की जरुरत होगी. 

अगले तीन महीने में सीबीएसई की प्लस टू यानी बारहवीं की मुख्य परीक्षा शुरू होगी. प्री बोर्ड की परीक्षा तो जल्द शुरू होगी. स्टेट बोर्ड द्वारा संचालित परीक्षाएं भी कमोबेश इसी दौरान होंगी. बताने की जरुरत नहीं कि हर विद्यार्थी के लिए शारीरिक एवं मानसिक रूप से सक्रिय रहना आगामी परीक्षा के साथ-साथ उनके सर्वांगीण विकास के लिए भी बहुत अहम है. उनकी बुनियाद मजबूत होगी तभी  जाकर  वे जीवन में बड़े लक्ष्यों को प्राप्त करने में खुद को सक्षम रख पायेंगे. 

प्रकृति के मूल चरित्र को देखें या देश-विदेश के महान लोगों की दिनचर्या को, आपको हर जगह सक्रियता दिखाई देगी. इनमें खेलकूद सहित अन्य शारीरिक गतिविधियां शामिल हैं. चौबीस घंटे के समय चक्र में सारे जरुरी कार्यों को सम्पन्न करने के लिए सक्रियता की अनिवार्यता से शायद ही कोई इन्कार  कर सकता है. बावजूद इसके बहुत सारे विद्यार्थी सक्रिय जीवन नहीं जीते हैं. इसके एकाधिक दुष्परिणाम कई रोगों के रूप में विद्यार्थियों को झेलने पड़ते हैं. ऐसा तब होता है जब कि सभी जानते हैं कि शारीरिक सक्रियता से  मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में भी मदद मिलती है. 

सवाल है कि सक्रियता को अपनी आदत में शुमार करने के लिए क्या-क्या  करना जरुरी होता है? सर्वमान्य तथ्य है कि सुबह की शुरुआत अच्छी हो तो दिन अच्छा गुजरता है. सुबह जल्दी उठना इसकी पहली शर्त है. कहा भी गया है कि रात में जल्दी सोने और सुबह जल्दी उठने से व्यक्ति स्वस्थ, समृद्ध और बुद्धिमान होता है. लिहाजा विद्यार्थियों के लिए सुबह उठकर पहले एक घंटे  में अपने शरीर की आन्तरिक सफाई के साथ-साथ फिजिकल एक्सरसाइज और पौष्टिक आहार से शरीर को सक्रिय और इंधनयुक्त करना बहुत लाभकारी होता है. ऐसा पाया गया है कि बहुत सारे विद्यार्थी बगैर नाश्ता किए ट्यूशन या कोचिंग क्लास के लिए निकल जाते हैं और फिर देर-सबेर बाहर समोसा, कचौड़ी,  पिज्जा, बर्गर जैसी कम पौष्टिक या नुकसानदेह चीजें खाकर पेट भरते हैं. यह स्वास्थ्य की दृष्टि से गलत बात है. ऐसे विद्यार्थियों के लिए भी बेहतर तो यह होता है कि सुबह घर में पौष्टिक नाश्ता करने के बाद पिछले दिन जो कुछ भी पढ़ा है,  पहले उसे एक बार लिखने का प्रयास करें. इससे उन्हें अपने दिमाग को सक्रिय करने का मौका मिलेगा और यह भी पता चलेगा कि उन्होंने कल जो पढ़ा था वह कितना समझ में आया और उसमें से कितना वे वाकई कागज़ पर उतार पा रहे हैं. अगर इसमें कुछ कमी रह जाती है तो तुरत उसे फिर से अच्छी तरह पढ़ें और फिर उसे लिखने का प्रयास करें. ऐसा कर लेने के बाद 10-15 मिनट का ब्रेक लें. बाहर निकलें या खिड़की से बाहर देखें या आंख बंद करके दीर्घ श्वास लें या बस आराम से बैठें या लेटे रहें. कहने का आशय यह कि इस दौरान बॉडी और माइंड को रिलैक्स करने दें जिससे कि वे फिर से रिचार्ज हो सकें. इसके बाद आज जो कुछ पढ़ने के लिए तय किया है, उसमें जो सबसे कठिन जान पड़ता है, उसे पहले पढ़ें - तन्मयता और एकाग्रचित्त होकर. फिर भी अगर बातें पूरी तरह समझ में न आए तो एक बार फिर पढ़ें. आप पायेंगे कि अधिकतर मामलों में आपको कठिन विषय भी अपेक्षाकृत ज्यादा आसानी से समझ में आने लगेगी. सुबह के इस बेहतर प्रबंधन से न केवल आपको अपने कोर्स को अच्छी तरह पूरा करने में सफलता मिलेगी बल्कि इससे आपका आत्मविश्वास में बहुत इजाफा होगा. इतना ही नहीं, आप दिनभर के अन्य सभी टास्क को इसी सक्रियता से पूरा करने को उत्साहित और प्रेरित होंगे.  
          
दिलचस्प बात है कि इस तरह सक्रिय रहकर पढ़ाई-लिखाई, खाना-पीना, खेलकूद आदि में व्यस्त रहने से छात्र-छात्राएं प्रोडक्टिव बने रहने के साथ-साथ आनंदित भी रहते हैं, क्यों कि उन्हें अपने लक्ष्य को हासिल और अपने सपनों को साकार करने का विश्वास होने लगता है. इसका परिणाम यह होता है कि वे अमूमन तनावमुक्त रहते हैं और अच्छी नींद का सुख ले पाते हैं. कहने की जरुरत नहीं कि ऐसे विद्यार्थी जीवन में सफल तो होते ही हैं, स्वस्थ और सानंद भी रहते हैं.    
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                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 

# लोकप्रिय साप्ताहिक "युगवार्ता" के 08.12.2019 अंक में प्रकाशित
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Tuesday, February 18, 2020

नई राहें: बनें कामयाबी के हकदार

                                            - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर, वेलनेस  कंसलटेंट ...
जीवन की लम्बी यात्रा में कई उतार-चढ़ाव आते हैं और सफलता-असफलता से हम रूबरू होते हैं. इसमें अस्वाभाविक कुछ भी नहीं. सच कहें तो अनुकूल एवं प्रतिकूल दोनों ही अवस्था में जब हम खुद से प्यार करते रहते हैं, तभी हम सफलता या असफलता का सही आकलन-विश्लेषण कर पाते हैं. और-तो-और इससे हमें आगे की कार्ययोजना को बेहतर बनाकर यथासाध्य कोशिश करते रहने की प्रेरणा भी मिलती है. प्रसिद्ध अमेरिकी गायिका, मॉडल और अभिनेत्री लूसली बॉल का स्पष्ट कहना है, "पहले खुद से प्यार करें. बाकी सबकुछ स्वतः ठीक होते जायेंगे. इस संसार में कुछ भी करने के लिए आपको वाकई खुद से प्यार करना होगा." दरअसल, जीवन में सक्सेस की संख्या को सहजता से बढ़ाते रहने के लिए खुद से प्यार करना तो अनिवार्य शर्त है ही, साथ ही सक्सेस यात्रा में मजबूती से आगे बढ़ते रहने के लिए कुछ और सरल व अहम सूत्र को जानना, समझना और ठीक से आत्मसात करके उस पर अमल करना भी जरुरी है.

पहला है खुद को अच्छी तरह से जानना - हमारे सपने, हमारी इच्छाएं, जीवन का मुख्य लक्ष्य, हमारे व्यक्तित्व की खूबियां और खामियां आदि. इन बातों पर निरपेक्ष भाव से अच्छी तरह गौर करना और उन्हें एक कागज़ पर लिखना अनिवार्य है. इससे हमें अच्छी तरह पता हो जाता है कि हमारे स्ट्रांग पॉइंट्स क्या हैं और हम किन मामलों में कमजोर हैं. खूबियों की संख्या ज्यादा होने पर न तो उससे अंहकार से ग्रस्त हों और न ही कमियां ज्यादा होने पर दुखी या अवसादग्रस्त. हर हाल  में खुद से प्यार करते रहें. हां, उस फैक्ट शीट के आधार पर अगर हम लगातार अपने मजबूत पक्ष को और मजबूत करते रहें और साथ में अपनी कमजोरियों को कम करते रहें, तो कुछ महीनों में ही हमें अपने व्यक्तित्व में सकारात्मक बदलाव साफ़ दिखने लगेगा. स्वाभाविक रूप से हमारी कार्यक्षमता और उत्पादकता पर इसका जबरदस्त असर भी होगा.

रोज सुबह-सुबह अपने अंदर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करने के लिए एक सरल मंत्र है. इसे आजमाकर जरुर देखें. सुबह सो कर उठने के बाद सबसे पहले कुछ देर आईने के सामने खड़े होकर खुद को निहारें. इसके बाद खुद से कई बार कहें 'आइ एम द बेस्ट'; मैं कर सकता हूं और मैं करूंगा.  ऐसा करने से शरीर में सकारात्मक तरंगों का संचार होगा. इससे न सिर्फ शरीर में स्फूर्ति महसूस होगी, बल्कि विचार भी बेहतर बनेंगे. दरअसल, मन को जैसा समझाएंगे, मानस वैसा बनेगा और व्यक्तित्व भी वैसा ही बनेगा. सभी जानते हैं कि कोशिश करने वालों की कभी हार  नहीं होती. केवल क्षमता प्रबंधन के महत्व को समझते हुए परफॉरमेंस को बेहतर करते रहना है.

मार्टिन लूथर किंग जूनियर कहते हैं कि अच्छा कार्य करने के लिए हर समय अच्छा होता है. बीता हुआ वक्त कभी लौट कर नहीं आता. लिहाजा, हमारे शार्ट टर्म और लॉन्ग टर्म एजेंडा में जो भी कार्य शामिल किए गए हैं, उन्हें निर्धारित समय पर शुरू और संपन्न करना जरुरी है. हां, जिस समय जो काम करें पूरे मनोयोग से करें और उसे एन्जॉय करें. चाणक्य का कहना है, "जब भी किसी काम को आरम्भ करें, असफलता से मत डरें और उस काम को बीच में नहीं छोड़ें. जो लोग इमानदारी से काम करते हैं वो ज्यादा खुश रहते हैं." रोचक तथ्य है कि  दुनिया के हर व्यक्ति को 24 घंटे का ही समय मिला है, न एक मिनट ज्यादा और न ही एक मिनट कम. कामयाब लोग इसको बहुत अच्छी तरह समझते है और समय का बेहतर उपयोग करके सफलता के नए-नए मुकाम हासिल करते हैं.

घर हो या बाहर हमें आए दिन किसी-न-किसी समस्या का सामना करना पड़ता है. वर्क प्लेस में तो अमूमन ऐसी स्थिति दिन में कई बार आती है. कभी समस्या  छोटी होती है तो कई बार बड़ी और बहुत गंभीर. हर जगह चुनौती और अपेक्षा यह होती है कि समस्या  से कैसे सफलतापूर्वक निबटा जाय और अंततः समाधान तक पहुंचा जाय. कई सर्वे में यह पाया गया है कि कई लोग किसी भी नए ओपरचुनिटी में कोई-न-कोई प्रॉब्लम देख लेते हैं. इतना ही नहीं वे जाने-अनजाने समस्या को बड़ा बना कर प्रस्तुत करते हैं. इससे कार्यस्थल का वातावरण नेगेटिव बनता है. इसके विपरीत, बस कुछ लोग ऐसे होते हैं जो हर समस्या में कुछ बेहतर करने का एक नया अवसर देखते हैं. कहने की जरुरत नहीं कि हर नियोक्ता या उच्च अधिकारी बस यही तो चाहते  हैं कि उनके कर्मी ऐसे खुले दिमागवाले हों जो हर चुनौती या समस्या को सलूशन फाइंडर की दृष्टि से देखें और सामने आए समस्या को शुरू से ही सुलझाने का हर संभव प्रयास करें. गौरतलब बात है कि ऐसे पॉजिटिव थॉट वाले कर्मी हर ऐसे सहकर्मी से मदद लेने का प्रयास भी करते हैं  जो उस मामले को सुलझाने में उससे बेहतर क्षमता एवं दक्षता रखते हैं. जाहिर है कि तमाम समस्याओं के बावजूद ऐसे लोग ही संस्था को समाधान तक पहुंचाने में सक्रिय और प्रभावी भूमिका निभाते हैं. किसी  सफलता का श्रेय लेना उसका ध्येय नहीं होता. वे तो केवल आस्था व निष्ठा पूर्वक अपनी ड्यूटी करते हैं.  निःसंदेह, ऐसी प्रकृति के लोग हर जगह सक्सेस और सम्मान के हकदार भी बनते हैं. 
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Tuesday, February 11, 2020

युवाओं में नशे की लत घातक

                                                   - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर... .... 
हाल ही में प्रधानमंत्री ने "मन की बात" कार्यक्रम में इ-सिगरेट के खतरे से युवाओं को बचने की सलाह दी. यह अकारण नहीं था. नशीली पदार्थों की किस्में और दायरा दोनों बढ़ रहा है. हाई प्रोफाइल इलाके से लेकर झुग्गी बस्तियों तक के युवा नशे की चपेट में आ रहे हैं. देश के शैक्षणिक संस्थानों में पढ़ रहे विद्यार्थियों में से हजारों  विद्यार्थियों का किसी-न-किसी प्रकार के नशे के प्रति बढ़ता झुकाव बहुत बड़ी  चिंता का कारण है. यह विद्यर्थियों के भविष्य के लिए बहुत बड़ा खतरा है तो देश के  सामने एक  गंभीर चुनौती भी. ऐसा पाया गया है कि 16-18 वर्ष की उम्र में नशे की लत लग जाती है. सिगरेट, शराब, गुटखा, तम्बाकू, भांग और गांजा की ओर युवा सबसे ज्यादा आकर्षित हो रहे है. इससे आगे उन्हें  चरस, अफीम, कोकीन, हेरोइन जैसे नशीले पदार्थ लुभाते  हैं. इस छोटी उम्र में जो विद्यार्थी नशे के शिकार हो जाते हैं, उनके लिए आगे यह केवल मौजमस्ती या फैशन का नहीं, बल्कि बड़ी जरुरत का कारण बन जाती है. "शराब है खराब या नशा करता है आपका नाश या सिगरेट-शराब स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है" जैसी चेतावनी उनके लिए निरर्थक है. आम तौर पर यह देखा गया है कि विद्यार्थियों में इस लत की शुरुआत दूसरों के देखादेखी, विज्ञापन प्रेरित, दोस्तों के दवाब, क्षणिक रोमांच, अकेलापन, हीनभावना, उपेक्षाभाव, भय, तनाव, अवसाद आदि कारणों से होती है. 

जोर देने की जरुरत नहीं कि नशीले पदार्थों के सेवन से कम उम्र के विद्यार्थी न केवल कई रोगों का शिकार होते हैं, बल्कि कई गैर कानूनी एवं असामाजिक कार्यों में शामिल होकर अपना और अपने परिवार-समाज-देश को कई तरह से नुकसान पहुंचाते हैं. पहले तो उनको  पढ़ाई-लिखाई में  मन नहीं लगता है. इससे उनका रिजल्ट खराब होता है. इधर नशे के दुष्प्रभाव से सेहत खराब होने लगती है. झूठ बोलना और छोटी-मोटी चोरी का सिलसिला भी शुरू हो जाता है. शातिर असामाजिक तत्व इस वक्त रहनुमा और हितैषी बनकर अवतरित होते हैं और ऐसे विद्यार्थियों को  अपने जाल में आसानी से फंसा लेते हैं. फिर तो अधिकांश  मामले में उन विद्यार्थियों का जीवन छोटा हो जाने के साथ-साथ किसी-न-किसी अवांछित काम में बर्बाद हो जाता है. अपने आसपास देखने पर विद्यार्थियों को ऐसे अनेक मामले दिखाई पड़ जायेंगे. देश-विदेश की कई फिल्मों में भी इन घटनाक्रमों को दिखाया जाता रहा है. यहां सभी विद्यार्थियों के लिए अहम विचारणीय सवाल है कि आखिर क्यों कोई विद्यार्थी अपने अमूल्य जीवन को नशे की लत में पड़कर नाहक विनाश पथ पर ले जाता है, जब कि बचपन से ही उनके अभिभावक-शिक्षक-परिजन उन्हें अच्छी-अच्छी बातें सिखाते हैं और नशे आदि से हमेशा दूर रहने को कहते हैं? 

दरअसल, किशोरावस्था के संक्रांति काल में जब हार्मोनल बदलाव के साथ-साथ परिवेशजन्य  कई बदलावों से छात्र-छात्राएं गुजरते हैं, तब एक साथ कई परिवर्तनों - शारीरिक, मानसिक, शैक्षणिक तथा सामाजिक, का प्रबंधन एक जरुरी, पर कठिन काम होता है. मन चंचल होता है. इसी समय एकाधिक कारणों, खासकर संस्कार, संयम और संकल्प में कुछ कमी, से छात्र-छात्राएं भटकते हैं और फिर गलत संगत में पड़कर नशे की तथाकथित रोमानी और रोमांचक दुनिया में प्रवेश करते हैं. माता-पिता, भैया-दीदी, शिक्षक तथा अन्य परिजन अगर इस वक्त विद्यार्थियों को अच्छे तरीके से इन बदलावों को समझने और उनका अपने हित में प्रबंधन करने में मदद करें तो विद्यार्थियों के लिए इन बदलावों के अनुरूप खुद को एडजस्ट करना और सम्हाले रखना आसान हो जाता है. हां, इस अवधि में विद्यार्थियों की असामान्य गतिविधियों पर ध्यान देना और उन्हें समझाना अभिभावकों  की बड़ी जिम्मेदारी होती है. 

हां, अगर किसी विद्यार्थी को चाहे-अनचाहे नशे की लत लग गई है तो उन्हें इससे यथाशीघ्र बाहर निकलने का प्रयास करना चाहिए. यकीनन  इसके लिए साहस और संकल्प की दरकार होती है. बस यह मान लें कि जो हुआ सो हुआ. बीत गई सो बात गई.  हर दिन एक नया दिन होता है. जीवन में एक नयी शुरुआत कभी भी और किसी भी परिस्थिति में की जा सकती है. बेशक ऐसे समय घरवालों और अच्छे दोस्तों की भूमिका बहुत अहम होती है. उन्हें नशा करनेवाले विद्यार्थियों से नफरत करने के बजाय उन्हें बढ़िया से समझाने की हर संभव कोशिश करने की विशेष जरुरत होती है, क्यों कि इसी दौरान उनको मोटिवेशन और इमोशनल सपोर्ट की सख्त जरुरत होती है. 
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# लोकप्रिय साप्ताहिक "युगवार्ता" के 24.11.2019 अंक में प्रकाशित
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Sunday, February 2, 2020

रोते हुए नहीं, मुस्कुरा के जिएं

                                                                        - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर... .... 
वर्ष 1967 में आई चर्चित हिन्दी फिल्म 'हमराज़' में साहिर लुधियानवी रचित एक गाना है जिसके बोल हैं : ना मुँह छुपा के जियो और ना सर झुका के जियो,  गमों का दौर भी आए तो मुस्कुरा के जियो... ...मेरी एक बाल कविता की पहली दो पंक्तियां हैं : 'रोना नहीं, हंसना सीखो, मेरे बच्चों जीना सीखो.' दरअसल ऐसी बातें सभी अभिभावक-शिक्षक किसी-न-किसी रूप में सभी विद्यार्थियों को बताते-समझाते रहे हैं. भारतीय संस्कृति और परम्पराओं में भी अनेकानेक सन्दर्भों में इस बात को साफ़ तौर पर रेखांकित किया गया है.
  
ऐसे हर समाज में एक ही तरह की परिस्थिति में रहनेवाले विद्यार्थियों में कुछ तो बराबर किसी-न-किसी चीज के न होने का रोना रोते रहते हैं, वहीँ कुछ विद्यार्थी उसी परिस्थिति में खुश रहते हुए अपने कर्तव्य पथ पर चलने का भरसक प्रयास करते रहते हैं. खेल का मैदान हो या परीक्षा हॉल, हर जगह प्रयास करने से पहले ही हार माननेवालों यानी रोनेवालों का विजयी होना नामुमकिन होता है, जब कि उनको भी कई बार बताया जा चुका  है कि कोशिश करनेवालों की कभी हार नहीं होती. 

जीवन के चौराहे पर खड़े कई विद्यार्थियों के सामने जब चारों दिशाओं में रास्ते खुले होते हैं, वे हर रास्ते में आगे कठिनाई का रोना वहीँ खड़े-खड़े रोते रहते हैं और आगे कदम नहीं बढ़ाते. उनके पास जो रहता है उसका सदुपयोग करने और आनंद उठाने के बजाय जो कुछ नहीं है उसी का राग अलापते रहते हैं. एक उदाहरण से इसे और अच्छी तरह समझते हैं. एक ही कक्षा के दो विद्यार्थी हैं. एक हफ्ते बाद परीक्षा है. एग्जाम के पहले दिन के पेपर से संबंधित कुछ चैप्टर पढ़ना जरुरी है, पर किताब नहीं है. किताब खरीदने का पैसा भी नहीं है. अब पहला विद्यार्थी किताब न होने का रोना रोता है. अपनी परिस्थिति को दोष देता है और अपने भाग्य को कोसता है. किताब हासिल करने और फिर उसे पढ़ने के लिए मौजूद विकल्प की ओर ध्यान नहीं देता है, जब कि विकल्प कई हैं.  परिणाम क्या होगा, इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है. वहीँ  दूसरा विद्यार्थी कॉलेज की लाइब्रेरी या किसी सहपाठी या शिक्षक की मदद से किताब पढ़ लेता है और हंसी-ख़ुशी परीक्षा में शामिल होता है.

जीवन के लम्बे काल खंड में सबके सामने कुछ चीजें होने और कुछ चीजें नहीं होने का सवाल किसी-न-किसी समय सामने आ खड़ा होता है. यह भी सच है कि शायद ही किसी के पास सब चीजें सब समय उपलब्ध होती हैं. छात्र-छात्राएं अगर प्रबंधन के मूल सिद्धांत पर गौर करेंगे तो उन्हें लगेगा कि चीजें कम हो या ज्यादा, उपलब्ध साधनों के ही माध्यम से किसी भी परिस्थिति में लक्ष्य तक पहुंचना कठिन तो हो सकता है, पर असंभव नहीं है. सोचिए जरा, गांधी जी और अन्य स्वतंत्रता सेनानी अगर यह सोचते कि अपने सीमित साधनों से वे कैसे महाशक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ फेकेंगे तो क्या आजादी हासिल करना जल्दी संभव हो पाता?

स्वास्थ्य की दृष्टि से सोचें तो हर बात पर रोने की आदत न केवल आपके मेटाबोलिज्म को दुष्प्रभावित करता हैं, बल्कि आपको मानसिक रूप से नेगेटिव और कमजोर बनाता है. आप तनावग्रस्त रहने लगते हैं. फलतः आप कई बीमारियों के चपेट में भी आ जाते हैं.  धीरे-धीरे "हम नहीं कर सकते हैं, हम नहीं कर पायेंगे" ही  आपका नजरिया बन जाता है. और इस नजरिए से फिर तो सफलता तक पहुँच पाना बहुत ही मुश्किल हो जाता है. "कौन बनेगा करोड़पति" के कर्मवीर नामक एपिसोड में आप  जिन लोगों को देखते हैं और उनकी जीवन यात्रा से परिचित होते हैं, उनसे आपको कौन से प्रेरक संदेश प्राप्त होते हैं? यही न कि कभी ख़ुशी, कभी गम से भरी इस जिंदगी में रोना छोड़ अगर कोई हंसते हुए कोशिश करते रहे तो सफ़र मुश्किल होने के बावजूद भी रोमांचक और मजेदार लगता है और पता भी नहीं चलता कि इस क्रम में कितनी सारी छोटी-बड़ी मंजिलों को वे हासिल भी करते गए. राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर तो यह भी कहते हैं: "विपत्ति जब आती है, कायर को ही दहलाती है, सूरमा नहीं विचलित होते, क्षण एक नहीं धीरज खोते ...."  

रोचक तथ्य है कि जब आप किसी भी परिस्थिति में किसी भी काम को दृढ़ संकल्प के साथ यथाशक्ति और यथाबुद्धि करने में जुट जाते हैं तो अव्वल तो वह काम उतना मुश्किल प्रतीत नहीं होता और दूसरे आपकी आंतरिक शक्ति कई गुना बढ़ जाती है. परिणामस्वरूप, अधिकाश समय असंभव लगनेवाला काम भी संपन्न हो जाता है. निसंदेह,  ऐसी सफलता से आपके आत्मविश्वास में जबरदस्त उछाल आता है और आपको असाधारण ख़ुशी भी मिलती है. 
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# लोकप्रिय साप्ताहिक "युगवार्ता" के 01.12.2019 अंक में प्रकाशित
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