Tuesday, February 11, 2020

युवाओं में नशे की लत घातक

                                                   - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर... .... 
हाल ही में प्रधानमंत्री ने "मन की बात" कार्यक्रम में इ-सिगरेट के खतरे से युवाओं को बचने की सलाह दी. यह अकारण नहीं था. नशीली पदार्थों की किस्में और दायरा दोनों बढ़ रहा है. हाई प्रोफाइल इलाके से लेकर झुग्गी बस्तियों तक के युवा नशे की चपेट में आ रहे हैं. देश के शैक्षणिक संस्थानों में पढ़ रहे विद्यार्थियों में से हजारों  विद्यार्थियों का किसी-न-किसी प्रकार के नशे के प्रति बढ़ता झुकाव बहुत बड़ी  चिंता का कारण है. यह विद्यर्थियों के भविष्य के लिए बहुत बड़ा खतरा है तो देश के  सामने एक  गंभीर चुनौती भी. ऐसा पाया गया है कि 16-18 वर्ष की उम्र में नशे की लत लग जाती है. सिगरेट, शराब, गुटखा, तम्बाकू, भांग और गांजा की ओर युवा सबसे ज्यादा आकर्षित हो रहे है. इससे आगे उन्हें  चरस, अफीम, कोकीन, हेरोइन जैसे नशीले पदार्थ लुभाते  हैं. इस छोटी उम्र में जो विद्यार्थी नशे के शिकार हो जाते हैं, उनके लिए आगे यह केवल मौजमस्ती या फैशन का नहीं, बल्कि बड़ी जरुरत का कारण बन जाती है. "शराब है खराब या नशा करता है आपका नाश या सिगरेट-शराब स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है" जैसी चेतावनी उनके लिए निरर्थक है. आम तौर पर यह देखा गया है कि विद्यार्थियों में इस लत की शुरुआत दूसरों के देखादेखी, विज्ञापन प्रेरित, दोस्तों के दवाब, क्षणिक रोमांच, अकेलापन, हीनभावना, उपेक्षाभाव, भय, तनाव, अवसाद आदि कारणों से होती है. 

जोर देने की जरुरत नहीं कि नशीले पदार्थों के सेवन से कम उम्र के विद्यार्थी न केवल कई रोगों का शिकार होते हैं, बल्कि कई गैर कानूनी एवं असामाजिक कार्यों में शामिल होकर अपना और अपने परिवार-समाज-देश को कई तरह से नुकसान पहुंचाते हैं. पहले तो उनको  पढ़ाई-लिखाई में  मन नहीं लगता है. इससे उनका रिजल्ट खराब होता है. इधर नशे के दुष्प्रभाव से सेहत खराब होने लगती है. झूठ बोलना और छोटी-मोटी चोरी का सिलसिला भी शुरू हो जाता है. शातिर असामाजिक तत्व इस वक्त रहनुमा और हितैषी बनकर अवतरित होते हैं और ऐसे विद्यार्थियों को  अपने जाल में आसानी से फंसा लेते हैं. फिर तो अधिकांश  मामले में उन विद्यार्थियों का जीवन छोटा हो जाने के साथ-साथ किसी-न-किसी अवांछित काम में बर्बाद हो जाता है. अपने आसपास देखने पर विद्यार्थियों को ऐसे अनेक मामले दिखाई पड़ जायेंगे. देश-विदेश की कई फिल्मों में भी इन घटनाक्रमों को दिखाया जाता रहा है. यहां सभी विद्यार्थियों के लिए अहम विचारणीय सवाल है कि आखिर क्यों कोई विद्यार्थी अपने अमूल्य जीवन को नशे की लत में पड़कर नाहक विनाश पथ पर ले जाता है, जब कि बचपन से ही उनके अभिभावक-शिक्षक-परिजन उन्हें अच्छी-अच्छी बातें सिखाते हैं और नशे आदि से हमेशा दूर रहने को कहते हैं? 

दरअसल, किशोरावस्था के संक्रांति काल में जब हार्मोनल बदलाव के साथ-साथ परिवेशजन्य  कई बदलावों से छात्र-छात्राएं गुजरते हैं, तब एक साथ कई परिवर्तनों - शारीरिक, मानसिक, शैक्षणिक तथा सामाजिक, का प्रबंधन एक जरुरी, पर कठिन काम होता है. मन चंचल होता है. इसी समय एकाधिक कारणों, खासकर संस्कार, संयम और संकल्प में कुछ कमी, से छात्र-छात्राएं भटकते हैं और फिर गलत संगत में पड़कर नशे की तथाकथित रोमानी और रोमांचक दुनिया में प्रवेश करते हैं. माता-पिता, भैया-दीदी, शिक्षक तथा अन्य परिजन अगर इस वक्त विद्यार्थियों को अच्छे तरीके से इन बदलावों को समझने और उनका अपने हित में प्रबंधन करने में मदद करें तो विद्यार्थियों के लिए इन बदलावों के अनुरूप खुद को एडजस्ट करना और सम्हाले रखना आसान हो जाता है. हां, इस अवधि में विद्यार्थियों की असामान्य गतिविधियों पर ध्यान देना और उन्हें समझाना अभिभावकों  की बड़ी जिम्मेदारी होती है. 

हां, अगर किसी विद्यार्थी को चाहे-अनचाहे नशे की लत लग गई है तो उन्हें इससे यथाशीघ्र बाहर निकलने का प्रयास करना चाहिए. यकीनन  इसके लिए साहस और संकल्प की दरकार होती है. बस यह मान लें कि जो हुआ सो हुआ. बीत गई सो बात गई.  हर दिन एक नया दिन होता है. जीवन में एक नयी शुरुआत कभी भी और किसी भी परिस्थिति में की जा सकती है. बेशक ऐसे समय घरवालों और अच्छे दोस्तों की भूमिका बहुत अहम होती है. उन्हें नशा करनेवाले विद्यार्थियों से नफरत करने के बजाय उन्हें बढ़िया से समझाने की हर संभव कोशिश करने की विशेष जरुरत होती है, क्यों कि इसी दौरान उनको मोटिवेशन और इमोशनल सपोर्ट की सख्त जरुरत होती है. 
(hellomilansinha@gmail.com)

                 
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 

# लोकप्रिय साप्ताहिक "युगवार्ता" के 24.11.2019 अंक में प्रकाशित
#For Motivational Articles in English, pl. visit my site : www.milanksinha.com  

Sunday, February 2, 2020

रोते हुए नहीं, मुस्कुरा के जीएं

                                                                        - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर... .... 
वर्ष 1967 में आई चर्चित हिन्दी फिल्म 'हमराज़' में साहिर लुधियानवी रचित एक गाना है जिसके बोल हैं : ना मुँह छुपा के जियो और ना सर झुका के जियो,  गमों का दौर भी आए तो मुस्कुरा के जियो... ...मेरी एक बाल कविता की पहली दो पंक्तियां हैं : 'रोना नहीं, हंसना सीखो, मेरे बच्चों जीना सीखो.' दरअसल ऐसी बातें सभी अभिभावक-शिक्षक किसी-न-किसी रूप में सभी विद्यार्थियों को बताते-समझाते रहे हैं. भारतीय संस्कृति और परम्पराओं में भी अनेकानेक सन्दर्भों में इस बात को साफ़ तौर पर रेखांकित किया गया है.
  
ऐसे हर समाज में एक ही तरह की परिस्थिति में रहनेवाले विद्यार्थियों में कुछ तो बराबर किसी-न-किसी चीज के न होने का रोना रोते रहते हैं, वहीँ कुछ विद्यार्थी उसी परिस्थिति में खुश रहते हुए अपने कर्तव्य पथ पर चलने का भरसक प्रयास करते रहते हैं. खेल का मैदान हो या परीक्षा हॉल, हर जगह प्रयास करने से पहले ही हार माननेवालों यानी रोनेवालों का विजयी होना नामुमकिन होता है, जब कि उनको भी कई बार बताया जा चुका  है कि कोशिश करनेवालों की कभी हार नहीं होती. 

जीवन के चौराहे पर खड़े कई विद्यार्थियों के सामने जब चारों दिशाओं में रास्ते खुले होते हैं, वे हर रास्ते में आगे कठिनाई का रोना वहीँ खड़े-खड़े रोते रहते हैं और आगे कदम नहीं बढ़ाते. उनके पास जो रहता है उसका सदुपयोग करने और आनंद उठाने के बजाय जो कुछ नहीं है उसी का राग अलापते रहते हैं. एक उदाहरण से इसे और अच्छी तरह समझते हैं. एक ही कक्षा के दो विद्यार्थी हैं. एक हफ्ते बाद परीक्षा है. एग्जाम के पहले दिन के पेपर से संबंधित कुछ चैप्टर पढ़ना जरुरी है, पर किताब नहीं है. किताब खरीदने का पैसा भी नहीं है. अब पहला विद्यार्थी किताब न होने का रोना रोता है. अपनी परिस्थिति को दोष देता है और अपने भाग्य को कोसता है. किताब हासिल करने और फिर उसे पढ़ने के लिए मौजूद विकल्प की ओर ध्यान नहीं देता है, जब कि विकल्प कई हैं.  परिणाम क्या होगा, इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है. वहीँ  दूसरा विद्यार्थी कॉलेज की लाइब्रेरी या किसी सहपाठी या शिक्षक की मदद से किताब पढ़ लेता है और हंसी-ख़ुशी परीक्षा में शामिल होता है.

जीवन के लम्बे काल खंड में सबके सामने कुछ चीजें होने और कुछ चीजें नहीं होने का सवाल किसी-न-किसी समय सामने आ खड़ा होता है. यह भी सच है कि शायद ही किसी के पास सब चीजें सब समय उपलब्ध होती हैं. छात्र-छात्राएं अगर प्रबंधन के मूल सिद्धांत पर गौर करेंगे तो उन्हें लगेगा कि चीजें कम हो या ज्यादा, उपलब्ध साधनों के ही माध्यम से किसी भी परिस्थिति में लक्ष्य तक पहुंचना कठिन तो हो सकता है, पर असंभव नहीं है. सोचिए जरा, गांधी जी और अन्य स्वतंत्रता सेनानी अगर यह सोचते कि अपने सीमित साधनों से वे कैसे महाशक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ फेकेंगे तो क्या आजादी हासिल करना जल्दी संभव हो पाता?

स्वास्थ्य की दृष्टि से सोचें तो हर बात पर रोने की आदत न केवल आपके मेटाबोलिज्म को दुष्प्रभावित करता हैं, बल्कि आपको मानसिक रूप से नेगेटिव और कमजोर बनाता है. आप तनावग्रस्त रहने लगते हैं. फलतः आप कई बीमारियों के चपेट में भी आ जाते हैं.  धीरे-धीरे "हम नहीं कर सकते हैं, हम नहीं कर पायेंगे" ही  आपका नजरिया बन जाता है. और इस नजरिए से फिर तो सफलता तक पहुँच पाना बहुत ही मुश्किल हो जाता है. "कौन बनेगा करोड़पति" के कर्मवीर नामक एपिसोड में आप  जिन लोगों को देखते हैं और उनकी जीवन यात्रा से परिचित होते हैं, उनसे आपको कौन से प्रेरक संदेश प्राप्त होते हैं? यही न कि कभी ख़ुशी, कभी गम से भरी इस जिंदगी में रोना छोड़ अगर कोई हंसते हुए कोशिश करते रहे तो सफ़र मुश्किल होने के बावजूद भी रोमांचक और मजेदार लगता है और पता भी नहीं चलता कि इस क्रम में कितनी सारी छोटी-बड़ी मंजिलों को वे हासिल भी करते गए. राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर तो यह भी कहते हैं: "विपत्ति जब आती है, कायर को ही दहलाती है, सूरमा नहीं विचलित होते, क्षण एक नहीं धीरज खोते ...."  

रोचक तथ्य है कि जब आप किसी भी परिस्थिति में किसी भी काम को दृढ़ संकल्प के साथ यथाशक्ति और यथाबुद्धि करने में जुट जाते हैं तो अव्वल तो वह काम उतना मुश्किल प्रतीत नहीं होता और दूसरे आपकी आंतरिक शक्ति कई गुना बढ़ जाती है. परिणामस्वरूप, अधिकाश समय असंभव लगनेवाला काम भी संपन्न हो जाता है. निसंदेह,  ऐसी सफलता से आपके आत्मविश्वास में जबरदस्त उछाल आता है और आपको असाधारण ख़ुशी भी मिलती है. 
(hellomilansinha@gmail.com)

                 
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 

# लोकप्रिय साप्ताहिक "युगवार्ता" के 01.12.2019 अंक में प्रकाशित
#For Motivational Articles in English, pl. visit my site : www.milanksinha.com