Tuesday, October 22, 2019

अच्छे स्वभाव व व्यवहार के मायने

                                                         - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर... ....
जॉब इंटरव्यू पैनल में शामिल रहने के कारण पर्सनल इंटरव्यू और ग्रुप डिस्कशन के दौरान छात्र-छात्राओं को परखने और सेलेक्ट करने के क्रम में हो या स्कूल-कॉलेज में अपने मोटिवेशनल स्पीच के क्रम में मुझे विद्यार्थियों से मिलने, उन्हें जानने-समझने का अवसर मिलता रहता है. कई विद्यार्थी मुखर या आक्रामक, कई चुपचाप या दब्बू तो कई बिलकुल संयत, संतुलित व दृढ़ पाए जाते हैं. छात्र-छात्राओं के किसी समूह या भीड़ को गौर से देखने पर भी आपको इसका एहसास हो जाएगा. जेनेटिक तथा परवरिश-परिवेश जन्य कारणों से मूलतः हमारी व्यवहार पद्धति निर्मित होती है. आमतौर पर यह देखा जाता है कि सच्चे और अच्छे लोगों की संतान सामान्यतः अच्छे गुण व संस्कार से लैस होते हैं. 

गलती करना, उसका एहसास होना, फिर पछताना और उस गलती से सीख लेने एवं  आगे उसे पुनः न दोहराने का संकल्प लेकर जीवन में अग्रसर हो जाना, मानव जीवन का उत्तम उसूल माना जाता रहा है. देखने पर  हर महान व्यक्ति का जीवन इस सिद्धांत का पालन करता हुआ प्रतीत होगा. लेकिन अगर आप अपने आसपास देखेंगे तो आप पायेंगे कि कुछ  विद्यार्थियों के लिए गलती करना और पछताना, फिर गलती करना और फिर पछताना, वाकई एक समानांतर  तथा सतत चलनेवाली प्रक्रिया है. देखा गया है कि वे जानते हुए भी ऐसे काम करते हैं जिसके लिए उन्हें पिछली बार भी पछताना पड़ा था और कई बार डांट भी खानी पड़ी थी.  महात्मा गांधी  सहित किसी भी महान व्यक्ति की जीवनी पढ़ लीजिए, सब ने जीवन के किसी-न-किसी काल खंड में एक-दो या ज्यादा गलतियां की हैं, लेकिन एक ही गलती बारबार नहीं की और हर गलती से कुछ-न-कुछ सीख लेकर जीवन पथ पर कठिन से कठिन चुनौतियों का डट कर सामना किया और असाधारण रूप से विजयी भी हुए.

स्वभाव व व्यवहार के सन्दर्भ में बात करें तो विद्यार्थियों को  मुख्यतः तीन श्रेणी में रख सकते हैं. पहला  दब्बू, दूसरा  आक्रामक और तीसरा दृढ़ और निश्चयात्मक व्यवहारवाले. पहले दो प्रकृति  के विद्यार्थियों को यह मालूम नहीं होता  या  मालूम  होने पर भी यह तय नहीं कर पाते कि कब बोलना चाहिए और कब चुप रहना चाहिए. कहां और कब अपना पक्ष दृढ़ता से रखना है और किस मौके पर सिर्फ वेट एंड वाच की  अवस्था में रहना श्रेयस्कर होता है.  दिलचस्प बात यह है कि ये दोनों विपरीत स्वभाव के विद्यार्थी होते हैं, पर दोनों  एक दूसरे के पूरक होने के नाते जाने-अनजाने कारणों से एक साथ दिखाई पड़ते हैं. जो विद्यार्थी दब्बू  होते हैं, वे 'यस सर' (जी, महाशय ) श्रेणी के होते हैं. सही हो या गलत, बॉस टाइप विद्यार्थी की  हर बात में हां में हां मिलाते हैं. काबिले गौर बात है कि ऐसे विद्यार्थी बाद में सिर पकड़ कर बैठते हैं और करवटें बदलते हुए सोने का प्रयास करते हैं. दूसरी ओर जो आक्रामक होते हैं वे अपने को सही दिखाने के लिए अनावश्यक रूप से हर जगह हावी होना चाहते हैं. ये वही बॉस टाइप या दबंग किस्म के विद्यार्थी होते हैं. ऐसे विद्यार्थी का ईगो बहुत बड़ा होता है. वे चिल्लाकर तथा शारीरिक बल से दब्बू किस्म के विद्यार्थियों में दहशत फैलाते हैं और अपना रौब झाड़ते हैं. इनके पास तथ्य और तर्क का अभाव होता है. ऐसे विद्यार्थियों को विरोध करनेवाले या सोच-विचारकर जवाब देनेवाले सहपाठी या जूनियर  पसंद नहीं आते. इन्हें तो हर स्थिति में 'यस सर' कहनेवाले  दब्बू  लोग बहुत पसंद हैं. इस तरह ये गलती पर गलती करते हैं, पछताते हैं, किन्तु  दूसरों पर दोष डाल कर फिर वैसी ही गलती करते रहते हैं. पाया गया है कि इन दोनों किस्मों के विद्यार्थी आंतरिक रूप से कमजोर होते हैं.  न चाहते हुए भी अधिकांश समय निराशा, भय, अवसाद आदि से पीड़ित रहते हैं. फलतः  परीक्षा में अच्छा कर पाना मुश्किल होता है. ऐसे विद्यार्थी कम उम्र में ही कई व्यसन और व्याधि के शिकार भी हो जाते हैं.
  
दिलचस्प और बहुत ही विचारणीय तथ्य है कि पहले दो प्रकार के विद्यार्थियों के अलावे कुछ विद्यार्थी हर शैक्षणिक संस्थान और गाँव-शहर में मिल जायेंगे जो धीर-गंभीर होते हैं. वे सोच-समझ कर कार्य करते हैं. उनका  विचार-स्वभाव -व्यवहार अच्छा  होता है. वे दृढ़ निश्चय वाले होते हैं. वे न तो किसी को डराते हैं और न ही किसी से डरते हैं. बिनोवा भावे के शब्दों में ऐसे विद्यार्थी ही वीर कहे जा सकते हैं. कहने का तात्पर्य, व्यवहार में दब्बू अथवा आक्रामक होने के बदले, यह हमेशा वांछनीय है कि छात्र-छात्राओं का व्यवहार निश्चयात्मक, संयत और संतुलित हो.  पाया गया है कि ऐसे व्यवहारवाले विद्यार्थी मेहनती, निष्ठावान, सक्षम, विश्वस्त, विनोदप्रिय, शांतचित्त और तार्किक  होते हैं. फलतः वे हमेशा एक बेहतर जिंदगी जीते हैं -सफलता, सुख, समृद्धि, संतोष, स्वास्थ्य और आनंद के पैमाने पर. 
(hellomilansinha@gmail.com)

                 
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं  
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Saturday, October 5, 2019

टेंशन को जल्द कहें ना

                                                            - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर... ....
हाल ही में एक शैक्षणिक संस्थान में सिविल सर्विसेस प्रतियोगिता परीक्षा की  तैयारी कर रहे  छात्र-छात्राओं के एक बड़े समूह से बातचीत करने के क्रम में मैंने एकाधिक बार उनसे कहा कि कुछ भी हो, पर टेंशन नहीं लें. चिंता नहीं, चिंतन करें. हेल्दी रहें. विद्यार्थियों के चेहरे पर आए तात्कालिक भाव को पढ़कर लगा कि उन्हें मेरी बात अच्छी लगी. फिर भी सेशन के अंत में कुछ विद्यार्थियों ने पूछ ही लिया कि आखिर टेंशन को कैसे कहें ना? विशेषज्ञ कहते हैं कि कारण जानेंगे तो निवारण भी पा लेंगे. तो पहले मूल बात पर गौर कर लेते हैं  कि टेंशन आखिर होता क्यों है?

निरंतर बढ़ती प्रतिस्पर्धा के मौजूदा समय में बहुत सारे विद्यार्थी टेंशन में रहते हैं और दिखते भी हैं. हां, कई लोग अपना टेंशन छुपाने में सफल भी रहते हैं, यद्दपि ऐसे लोग ऐसा करके  कई बार अपना टेंशन और बढ़ा लेते हैं. आपने भी देखा होगा कि एक जैसी परिस्थिति में दो विद्यार्थी अलग-अलग मानसिक स्थिति में रहते हैं. पहला फ़िक्र और टेंशन से परेशान है तो दूसरा बेफिक्र और मस्त. पहला जहां यह गाना गाता प्रतीत होता है कि जिंदगी क्या है, गम का दरिया है ...तो वहीँ  दूसरा यह गाता हुआ लगता है कि "मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया, हर फ़िक्र को धुंए में उड़ाता चला गया...."  

बहरहाल, प्रतियोगिता परीक्षा में शामिल होनेवाले विद्यार्थियों को केंद्र में रखकर इस चर्चा  को आगे  बढ़ाएं  तो यह कहना मुनासिब होगा कि यहां टेंशन के अनेक कारण हो सकते हैं. प्लस टू , ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन के बेसिक क्वालिफिकेशन के बाद प्रतियोगिता परीक्षा से विद्यार्थियों का वास्तव में सीधा सामना होता है. आईआईटी-एनआईटी, नीट, बैंकिंग, रेलवे, एसएससी, आईआईएम,  सिविल सर्विसेस या अन्य प्रतियोगिता परीक्षा की बात करें, तो  हर जगह  सिलेबस बड़ा हो जाता है.  विषय ऐच्छिक और अनिवार्य दोनों होते हैं. प्रश्नों का पैटर्न भिन्न  होता है. सामान्यतः पास मार्क्स जैसी कोई बात नहीं होती. बस उपलब्ध सीटों  के हिसाब से प्रतियोगिता में शामिल विद्यार्थियों की कुल संख्या में से सबसे अच्छे अंक अर्जित करनेवाले विद्यार्थियों का चयन होता है. ऐसे में दिमागी कनफूजन, सफलता के प्रति संशय, असफलता का डर, घरवालों की अपेक्षा पर खरा न उतरने पर उपेक्षा की आशा, अनहोनी की आशंका आदि टेंशन के आम कारण होते हैं. यूँ तो कई विद्यार्थी कभी-कभी बस बिना कारण भी टेंशन में पाए जाते हैं.

जानकार कहते हैं कि अगर आप केवल एक हफ्ते तक रोज रात को सोने से पहले दिनभर के कार्यों-व्यस्तताओं की निरपेक्ष समीक्षा करें तो आप पायेंगे कि अमूमन कितना समय आपने  रोज टेंशन में गुजारा है. अब खुद ही यह भी विवेचना करें कि जिन बातों को लेकर टेंशन में रहे, उनमें से कितने टेंशन करने लायक थे और कितने बेवजह. सर्वे बताते हैं कि आधा से ज्यादा समय छात्र-छात्राएं अकारण ही टेंशन में रहते हैं. मजे की बात है कि जब भी आप टेंशन में रहते हैं उस समय आप जो भी कार्य करते हैं, मसलन पढ़ना-लिखना, खेलना या और भी कुछ, उसमें आपकी  उत्पादकता या परफॉरमेंस औसत से बहुत कम होता है. मानसिक रूप से आप अशांत और नाखुश रहते हैं. ऐसे में आपका मेटाबोलिज्म दुष्प्रभावित होता है. आपका  पाचनतंत्र से लेकर अन्य ऑर्गन सामान्य ढंग से काम नहीं करते, जो स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह  साबित होता है.

तो फिर टेंशन को ना कहने के लिए क्या करना चाहिए? सबसे पहले अपने लक्ष्य के प्रति खुद को पूर्णतः समर्पित करते हुए जो कुछ कर सकते हैं उसे करने की पूरी कोशिश करें. झूठ-फ़रेब से दूर रहें. दिनभर का एक रुटीन बना लें और उस पर पूरा अमल करें. सही कहा है किसी ने कि कोशिश करनेवालों की कभी हार नहीं होती. देर हो सकती है, पर अगर आप शिद्दत से कोशिश करते रहें तो आप लक्ष्य तक पहुंचेंगे जरुर. इस दौरान महात्मा गांधी के इस कथन को याद रखना आपको उर्जा व प्रेरणा देगा कि हम जो करते हैं और हम जो कर सकते हैं, इसके बीच का अंतर दुनिया की ज्यादातर समस्याओं के समाधान के लिए पर्याप्त होगा. एक बात और. आपके प्रयासों का आकलन आपसे बेहतर शायद ही कोई कर सकता है. अतः दूसरों की राय से न तो बहुत खुश हो और न ही एकदम दुखी. खुद पर और अपनी कोशिशों पर हमेशा भरोसा करें. गलती हो गई हो तो अव्वल तो उसे दोहराएं  नहीं, उसे यथाशीघ्र सुधारें. छोटी-मोटी परेशानियों को तत्काल सुलझाने  या फिर झेलने या इग्नोर करने की आदत बना लें, जिससे कि आप बड़े और महत्वपूर्ण टास्क पर ध्यान केन्द्रित कर सकें. हर समय इस मानसिक सोच से काम करें कि अच्छे तरीके से कोई भी काम करेंगे तो अंततः उसका परिणाम अच्छा ही होगा. इन सरल उपायों से आप टेंशन को एक बड़ा-सा 'ना' कह सकेंगे. 
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Tuesday, October 1, 2019

हमेशा युवा बनें रहें

                                                            - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर... ....
सभी जानते और मानते हैं कि किसी भी देश का युवा उस देश के निर्माण और विकास में अहम रोल अदा करता है. हमारे देश को तो युवाओं का देश कहा जाता है, क्यों कि संसार के सबसे ज्यादा युवा हमारे देश में रहते हैं. कॉलेज एवं यूनिवर्सिटी में पढ़नेवाले छात्र-छात्राओं  के अलावे स्कूल के अनेक विद्यार्थियों को भी युवा की  श्रेणी में रखा जा सकता है. ऐसे, सही अर्थों में उम्र ही युवा होने का एकमात्र मापदंड नहीं होता है. युवा कहलाने के लिए हर विद्यार्थी में  कुछ सामान्य गुणों का होना भी जरुरी माना गया है. स्वामी विवेकानंद इसे इन शब्दों में परिभाषित करते हैं : युवा वह है जो अनीति से लड़ता है; जो दुर्गुणों से दूर रहता है; जो काल की चाल को बदल देता है; जिसमें जोश के साथ होश भी है; जिसमें राष्ट्र के लिए बलिदान की आस्था है; जो समस्याओं का समाधान निकालता है; जो प्रेरक इतिहास रचता है; जो बातों का बादशाह नहीं, बल्कि करके दिखता है. आगे वे यह भी बताते हैं कि यह संसार ही चरित्र-गठन हेतु एक विशाल नैतिक व्यायामशाला है, जिसमें हम सबको नियमित अभ्यास से इसे हासिल करना पड़ता है.

स्वामी जी के इन विचारों की कसौटी पर अगर हरेक विद्यार्थी अपने को कसे तो उन्हें अपने व्यक्तित्व में ऐसे कई गुणों का अभाव दिखेगा. इसमें अस्वाभाविक कुछ नहीं है. कोई भी विद्यार्थी जन्म से ही सभी अच्छे गुणों से युक्त नहीं होता. इसके लिए सतत प्रयासरत रहना आवश्यक माना गया है. उसी तरह कोई भी बच्चा अवगुणों के साथ जन्म नहीं लेता है. सारी बुरी आदत - झूठ बोलना, व्यसन करना अर्थात शराब, ड्रग्स, सिगरेट, गुटका, तम्बाकू आदि का सेवन करना, मारपीट, तोड़फोड़, लूटपाट, छेड़खानी आदि में शामिल रहना, बुजुर्गों का अनादर-अपमान करना या किसी  गैर कानूनी कार्य में संलिप्त रहना, सब कुछ यहीं उनकी आदत में शुमार होता है. इसके लिए किसी दूसरे को दोष देना और आगे उन्हीं आदतों से ग्रसित रहना खुद को धोखा देना है. फिर भी ऐसा कहना ठीक नहीं होगा कि गलत आदतों से ग्रस्त कोई विद्यार्थी उससे बाहर नहीं आ सकता. हां,  इसके लिए उन्हें ही ठोस निर्णय लेकर सही दिशा में बढ़ते रहना होगा. दूसरे लोग इस कार्य में बस उनकी कुछ सहायता कर सकते हैं, उनको अच्छा सीखने एवं करने के लिए मोटीवेट कर सकते हैं और जरुरत हो तो सिखा भी सकते हैं. इसी कारण अभिभावक, शिक्षक, अच्छे दोस्त और प्रकृति भी हर समय उनके साथ होते हैं. जॉन लुब्बोक तो कहते हैं, "पृथ्वी और आकाश, जंगल और मैदान, झीलें और नदियां, पहाड़ और समुद्र ये सभी उत्कृष्ट शिक्षक हैं और हममें से कुछ को इतना सिखाते हैं  जितना हम किताबों से नहीं सीख सकते."  कहने की दरकार नहीं कि देश-विदेश में अनेक विद्यार्थी हैं जिन्होंने गलत कार्य और मार्ग को एक झटके में छोड़ दिया और फिर सही मार्ग पर चलते हुए सच्चे युवा होने का धर्म बखूबी निभाया है.  

सच तो यह है कि यह जिंदगी आपको रोज यह अवसर -छोटा या बड़ा, देती है जिससे आप तमाम परेशानी या समस्या के बावजूद सद्गुणों को समेटते चल सकते हैं. देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने एक भाषण में कहा है, "समस्‍याएं होती है. हर किसी के नसीब में मक्‍खन पर लकीर करने का सौभाग्‍य नहीं होता है. पत्‍थर पर लकीर करने की ताकत होनी चाहिए और अगर हम अपने आप को युवा कहते हैं तो उसकी पहली शर्त यह होती है कि वो मक्‍खन पर लकीर करने के रास्‍ते न ढूंढे, वो पत्‍थर पर लकीर करने की ताकत के लिए सोचे. अगर यही इरादे लेकर के हम चलते हैं तो हम अपनी तो जिन्‍दगी बनाते हैं, साथ ही कइयों की जिन्‍दगी में बदलाव लाने का कारण भी बनते हैं.

जाहिर है कि हर विद्यार्थी को जो खुद को युवा कहता और मानता है, उन्हें स्वामी जी और अन्य महान लोगों की महत्वपूर्ण बातों को एक स्थान पर मोटे अक्षरों में लिखकर रखना चाहिए. रोज एक बार उसे बढ़िया से पढ़ना और उस पर चिंतन करना चाहिए, जिससे कि उस पर दृढ़ता से अमल करना आसान हो जाए. जीवन के इस लम्बे और सबसे अहम दौर में विद्यार्थियों को यह भी सुनिश्चित करते रहने की जरुरत है कि वे  शारीरिक और मानसिक रूप से बराबर स्वस्थ और सजग रहें. आलस्य एवं उदासी को पीछे छोड़ कर्मपथ पर आगे बढ़ते हुए जीवन के इन्द्रधनुषी रंगों का खुद तो आनंद लें ही, दूसरों को भी इसका भरपूर आनंद लेने दें. ऐसे भी फ्रांज काफ्का ने सही कहा है, "युवा खुश रहता है क्यों कि उसमें सौन्दर्य देखने की क्षमता होती है. जो व्यक्ति खूबसूरती को तलाश सकता है, वह कभी बूढ़ा नहीं होता." तो फिर हमेशा युवा बनें रहें.
(hellomilansinha@gmail.com)

                 
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