Sunday, March 29, 2015

गुड लाइफ: क्या आप भी युवा हैं ?

                                                                  - मिलन सिन्हा
clipभारत युवाओं का देश है. विश्व की सबसे बड़ी युवा आबादी हमारे देश में रहती है. युवा किसी भी देश का वर्तमान होते हैं और भविष्य भी. लेकिन क्या उम्र ही युवा होने का एकमात्र मापदंड है या युवा कहलाने के लिए हमें कुछ सामान्य युवोचित गुणों से लैस होना चाहिए. जरा सोचिये, क्या आप ऐसे युवा वय के लोगों को वाकई युवा की श्रेणी में रखना चाहेंगे, जिनका शारीरिक स्वास्थ्य तो दुरुस्त हो, तथापि जिनमें उर्जा, उत्साह, उमंग, उद्दमशीलता, प्रयोगधर्मिता, आशावादिता आदि का गंभीर अभाव साफ़ दिखता हो. जो आलस्य से भरे हों, जो संघर्ष से जी चुराते हों या जो सही और गलत में फर्क करने की समझदारी रखते हुए भी आहार, विचार और व्यवहार के मामले में गलती पर गलती कर रहे हों. जिन्हें न फूलों की खुशबू, न प्रकृति का अप्रतिम सौन्दर्य आकर्षित करता हो या जिन्हें सीखने- सिखाने में आनंद की अनुभूति न होती हो. नहीं न ! हेनरी फोर्ड के शब्दों में, ‘जो हमेशा कुछ नया सीखता है, वही युवा है. जैसे ही आप सीखना बंद करते हैं, आपकी गिनती बुजर्गों में होने लगती है.’ 

गौरतलब बात यह है कि तन और मन से युवा होना और बने रहना जीवन का सबसे महत्वपूर्ण समय होता है. इस दरम्यान कोई भी व्यक्ति उत्पादकता एवं उपलब्धियों के नए-नए कीर्तिमान स्थापित कर सकता है, क्यों कि युवाओं में ज्ञानार्जन की भूख होती है, कुछ नया व बेहतर करने का जज्बा होता है, संकल्प व साहस से वह भरा होता है. अतीत के साथ वर्तमान में भी ऐसे अनेक उदहारण विद्द्यमान हैं जो युवाओं द्वारा किये गए असाधारण व प्रेरक कार्यों के गवाह हैं. यहाँ यह कहना अनिवार्य है कि संसार भर में ऐसे लाखों-करोड़ों बुजुर्ग भी हैं जो शारीरिक रूप से अपेक्षाकृत कम क्षमतावान होते हुए भी, संकल्प, उत्साह एवं उमंग के साथ जीवन को समग्रता में जीने के मामले में अपने से आधे उम्र के किसी युवा से कम नहीं हैं. सो उन्हें भी युवा ही कहेंगे न
                   और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Sunday, March 22, 2015

आज की कविता : सड़क का साथ

                                              - मिलन सिन्हा  

सड़क का साथ
तुम 
भाग्यशाली नहीं हो 
क्यों कि 
शाम को 
थक-हार कर
घर लौटना 
तुम्हारे वश  की बात नहीं 
सचमुच,
वह घर अब 
बहुत पीछे छूट चुका है 
या फिर 
तुम्हारी स्मृति के 
किसी कोने में पड़ा 
सिसक रहा है 
और फिर 
इधर तो तुम 
न जाने कितने वर्षों से 
सड़कों को नाप रहे हो 
कभी अपने शरीर को 
पैमाना बना कर 
तो कभी अपने डग को 
छोटा और लम्बा करते हुए !

         और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Sunday, March 15, 2015

गुड लाइफ:जीवन में संतुलन

                                                                                    - मिलन सिन्हा 
clipजीवन में संतुलन की अनिवार्यता से कोई इन्कार नहीं कर सकता, तथापि ज्यादातर लोग असंतुलित जीवन जीते हैं, कुछ जानबूझ कर तो अधिकतर लोग अनजाने में. ऐसे लोगों के जीवन में झांक कर देखें तो पता लगता है कि बुद्धि एवं श्रम का यथोचित इस्तेमाल करने के बावजूद उनके जीवन में संतुष्टि, सुख व सकून की कमी बनी रहती है, बेशक वे आर्थिक रूप से थोड़े मजबूत बन जाएं. बहरहाल, यह तो सच है कि यदि चौबीस घंटे में अठारह–बीस घंटे मुस्तैदी से काम करेंगे तो कार्य क्षेत्र में आगे तो रह सकते हैं, लेकिन इसके लिए पारिवारिक सुख के अलावे नींद व आराम से समझौता करना पड़ेगा जिसका प्रत्यक्ष असर शीघ्र ही हमारे स्वास्थ्य पर दिखने लगेगा. फलतः हम देर सवेर बीमार पड़ेंगे, काम से छुट्टी लेकर घर पर पड़े रहेंगे. अब बीमार रहने के दौरान चिकित्सा पर हुए खर्च, स्वास्थ्य पर होने वाले प्रतिकूल प्रभाव एवं घर–परिवार की  चिंता–बेचैनी का हिसाब–किताब न भी लगाएं और सिर्फ समय संदर्भित गणना करें तो पायेंगे कि औसतन हमने इस दरम्यान प्रतिदिन सात–आठ घंटे ही काम किया जो कि हम रोजाना नियमपूर्वक आसानी से कर सकते हैं. 

मजेदार बात यह है कि इसका उलटा भी उतना ही सच है. कहने का तात्पर्य यह कि अगर हम चौबीस घंटे में अठारह –बीस घंटे सोते रहें, आराम करते रहें, उसका भी बुरा असर हमारे सेहत व जिंदगी पर लाजिमी है. तो क्या करना चाहिए? दिन के चौबीस घंटे को तीन हिस्से में बांट लें और फिर प्रत्येक आठ घंटे को i) काम ii) नींद व आराम तथा iii) घरेलू- सामाजिक जिम्मेदारी, मनोरंजन आदि के लिए निर्धारित करके उसके अनुरूप चलें. इस तरह हम ‘वर्क–लाइफ बैलेंस’ को व्यवहार में चरितार्थ कर जीवन को सम्पूर्णता में जी भी सकेंगे और उसका भरपूर आनंद भी उठा सकेंगे. 

               और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Sunday, March 8, 2015

गुड लाइफ : प्राथमिकता तय करें

                                                             - मिलन सिन्हा 

clipऔपचारिक शिक्षा के पहले पायदान अर्थात  प्राथमिक कक्षा से हमें प्राथमिकता का पाठ पढ़ाया जाता है। समय के साथ इसकी बारीकियों व इसके बहुआयामी महत्व  को जानते -समझते हुए हम जीवन की रंग -बिरंगी यात्रा में अपने-अपने खट्टे -मीठे अनुभवों के साथ आगे बढ़ते रहते हैं। लिहाजा, अगर अगले कुछेक  घंटे में कई काम संपन्न करने की चुनौती होती है, तो उसमें से पहले कौन सा काम करें और बाद में कौन-सा, प्राथमिकता के सिद्धांत को लागू करते हुए अपनी समझदारी से हम न केवल पूरे काम को जल्द निबटाते हैं, बल्कि काम के परिणाम में बेहतरी भी सुनिश्चित कर पाते हैं। ऑफिस हो या फैक्टरी, हर स्थान पर रोजमर्रा के काम में हमें कई बार एक साथ कई काम दिए जाते हैं, जिसे नियत समय सीमा के अन्दर अंजाम तक पहुंचाने की सामान्य अपेक्षा होती है। ऐसे भी अवसर आते हैं जब दिए गए सारे कार्य इतने महत्वपूर्ण होते हैं और लगते भी हैं कि किसे पहले एवं किसे थोड़ी देर बाद में करें, फैसला करना मुश्किल हो जाता है। यूँ भी, एक साथ सब काम करना संभव  नहीं होता, और -तो -और, अगर सारे काम एक साथ करने की ठान भी लें, तथापि  सभी काम को सही तरीके से अंजाम तक पहुंचाना काफी जोखिमभरा साबित होता है।  अतः ऐसी परिस्थिति में अति महत्वपूर्ण और महत्वपूर्ण की श्रेणी में रखकर कार्यों को साधना मुनासिब होता  है। ऑफिस या अन्य किसी कार्यस्थान में ज्यादा  प्रभावी कर्मी एवं मेहनती लेकिन कम प्रभावी कर्मी के बीच मुख्यतः फर्क इसी बात का होता है। कहना न होगा, आज के तेज रफ़्तार कॉरपोरेट कार्य संस्कृति में जब सबकुछ फटाफट चाहिए होता है वहां संस्था के निरन्तर विकसित होते जाने के घोषित -अघोषित लक्ष्य के सन्दर्भ में 'रिस्क -रिवॉर्ड' यानी 'जोखिम बनाम फायदा' का ध्यान रखना लाजिमी होता है ।  ऐसे भी, प्राथमिकता तय करके काम करना जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में कामयाबी तक पहुंचने का एक महत्वपूर्ण सूत्र माना गया है।

              और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं