Sunday, June 29, 2014

गुड लाइफ : जीवन में मुफ्त का महत्व

                                                       - मिलन सिन्हा 

Displaying 11324069-0.jpgहमारे जीवन में कुछ चीजें अत्यावश्यक होते हुए भी हमें मुफ्त में  मिल जाती है। इन्हें कुदरत ने बड़े -छोटे सबको समान रूप से उपलब्ध करवाया है। कौन सी हैं ये चीजें, नहीं समझे ? कुदरत का अनमोल उपहार - वायु, जल,धूप आदि। अब हवा को ही लें। हवा न हो तो जीवन की कल्पना तो दूर, साइकिल से लेकर हवाई जहाज तक की बात हम सोच भी नहीं सकते हैं। मानव जीवन में हवा से हमारा अभिप्राय मुख्यतः ऑक्सीजन से होता है।कहते हैं एक साधारण इंसान  बिना ऑक्सीजन के आठ मिनट से ज्यादा जिन्दा नहीं रह सकता है। सबको मालूम हैं कि जब हम श्वास लेते हैं तब ऑक्सीजन युक्त हवा फेफड़े तक पहुंचती है और हमारे फेफड़े में भरी कार्बन डाई ऑक्साइड युक्त दूषित हवा बाहर निकलती  है। पेड़-पौधों द्वारा इस  कार्बन डाई ऑक्साइड को  फोटोसिंथेसिस क्रिया के माध्यम से ऑक्सीजन में परिवर्तित करने का महत्वपूर्ण कार्य  संपन्न होता है।

साधु-संत  योगी-साधक के साथ-साथ जानकार-समझदार लोग भी श्वास की महत्ता को बखूबी समझते हैं और उसकी तार्किक व्याख्या भी करते हैं। यही कारण है कि वे  प्राकृतिक परिवेश में विभिन्न ब्रीदिंग एक्सरसाइज का लाभ उठाते हैं। वे कहते हैं कि दीर्घ श्वास लेनेवाले प्राणी की उम्र, जल्दी-जल्दी श्वास लेनेवाले से कहीं ज्यादा होती है। यह बात गौर करने लायक है कि श्वसन दर का सीधा ताल्लुक दिल की सेहत से है तथा उसका प्राणी की आयु से। मसलन, चूहे की उम्र बहुत कम होती है, क्यों कि उसके दिल की धड़कन औसतन एक हजार प्रति मिनट है, जब कि दीर्घजीवी प्राणी हाथी व व्हेयल मछली के दिल की धड़कन प्रति मिनट क्रमशः पच्चीस एवं सोलह है। कहने का तात्पर्य यह कि दीर्घ व  लयपूर्ण श्वास प्रक्रिया से ऑक्सीजन का समुचित उपयोग कर हम लम्बी उम्र तक गुड लाइफ का आनंद ले सकते हैं। 

                    और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Tuesday, June 24, 2014

'पहले शौचालय' पर अमल की जरुरत

                                                                                 - मिलन सिन्हा 
Displaying 11263596-0.jpg आपको याद होगा, पिछले वर्ष नयी दिल्ली में बीजेपी द्वारा आयोजित युवाओं की एक सभा में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री व देश के वर्त्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी  ने कहा था, 'मेरी छवि हिन्दुत्ववाले नेता की  है, लेकिन मैं आपको अपने सच्चे विचार बताऊँ, 'पहले शौचालय फिर देवालय'। इस पर बहुत गर्मागर्म चर्चा हुई।  उससे पूर्व तत्कालीन  केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश  ने भी कहा था कि भारतवर्ष के लिए शौचालय  ज्यादा महत्वपूर्ण है। 

बहरहाल, विचारों व चिंताओं से आगे जाकर इससे जुड़ी जमीनी हकीकत की थोड़ी पड़ताल करें तो साफ़ हो जाता है कि स्थिति बेहद गंभीर है जिसका  बहुआयामी नकारात्मक असर हमारे स्वास्थ्य व सोच पर हो रहा है। हाल ही में उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले के कटरा सआदतगंज गांव में घटी बलात्कार व हत्या की जघन्य घटना के कई कारणों में एक महत्वपूर्ण कारण घटना की शिकार दोनों नाबालिग लड़कियों का रात को शौच के लिए घर से बाहर जाना बताया जाता है, कारण उनके घर में कोई शौचालय नहीं था। इसे विडंबना ही कहेंगे  कि प्रत्येक राजनीतिक दल नारी सशक्तिकरण की  बात तो जोर -शोर से करते हैं, लेकिन नारी के स्वास्थ्य, सुरक्षा -संरक्षा, मर्यादा व अस्मिता से गहरे ताल्लुक रखनेवाले कार्यों  (शौचालय, स्वच्छता आदि ) को जमीन पर उतारने में गंभीर नहीं रहते । 

 'यूनिसेफ' एवं 'डब्लू एच ओ' के एक संयुक्त रिपोर्ट के मुताबिक पूरे विश्व में खुले में शौच करने वाले लोगों की संख्या 110 करोड़ है जिसमें  से अधिकतर भारतवर्ष  के हैं, इंडोनेशिया, पाकिस्तान, इथोपिया और नाइजीरिया का नम्बर इसके बाद आता है।' दरअसल, देश में खुले में शौच करने वाले लोगों की संख्या करीब 60 करोड़ है यानी  देश की करीब आधी आबादी । 2011 के जनगणना के अनुसार पूरे देश में 53 % घरों में शौचालय नहीं है जब कि ग्रामीण इलाके में स्थिति और खराब है- वहाँ यह 69.3 % है। 

दिलचस्प बात यह है कि वर्ष 1999 -2000 में पूरे तामजाम तामझाम व प्रचार-प्रसार के साथ शुरू किये गए राष्ट्रीय कार्यक्रम, 'निर्मल भारत अभियान' के तहत यह लक्ष्य रक्खा गया था कि गांव के लोगों को जागरूक व प्रेरित करके बड़े पैमाने पर शौचालयों का निर्माण किया जाएगा जिससे खुले में शौच के चलन को ख़त्म किया जा सके और लोग एक स्वच्छ परिवेश में जी सकें।  लेकिन 15  वर्षों के बाद भी उक्त कार्यक्रम की समीक्षा में यह तथ्य उभर कर आता है कि आज भी भारत को खुले में शौच करने वालों की राजधानी कहा जाता है। ज्यादा दुःख की बात तो यह है कि इस आलोच्य अवधि में देश के कुल दो लाख चालीस हजार ग्राम पंचायतों में से मात्र 28 हजार ग्राम पंचायतों को 'निर्मल भारत अभियान' के अन्तर्गत 'निर्मल ग्राम' का दर्जा मिल पाया। बावजूद इस शर्मनाक हालत के, 'यूनिसेफ' एवं 'डब्लू एच ओ' के नए संयुक्त रिपोर्ट ने बताया है कि भारत में इस दिशा में प्रगति की रफ़्तार उत्साहवर्धक नहीं रही है जब कि बांग्लादेश, वियतनाम और पेरू जैसे छोटे देशों ने अपनी जनता को शौचालय उपलब्ध  करवाने एवं खुले में शौच के चलन को कम करने में शानदार सफलता पाई है 

11 जून , 2014 को यूनिसेफ एवं बिहार सरकार के लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग द्वारा 'सेनिटेशन एंड हाइजीन एडवोकेसी एंड कम्युनिकेशन स्ट्रेटेजी' विषय पर  पटना में आयोजित  सेमिनार में बिहार के लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण मंत्री महाचंद्र प्रसाद सिंह ने  मुख्य अतिथि के रूप में भाग लेते हुए कहा कि वर्ष 2020 तक खुले में शौच से मुक्त होगा बिहार। उक्त सेमिनार में चर्चा के दौरान यह तथ्य सामने आया कि राज्य की महज 18 % आबादी ही शौच के लिए शौचालय का प्रयोग करती है ।  यह स्थिति तब है जब सरकार कहती है कि  निर्मल भारत अभियान के अन्तर्गत पिछले 10 सालों में राज्य के कुल 179 लाख  घरों में से 47.5 लाख घरों में शौचालय बनाया जा चुका है। 

                      और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Sunday, June 22, 2014

गुड लाइफ : प्रकृति और प्रवृत्ति

                                                                    - मिलन सिन्हा
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पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, घाटी-पहाड़, नदी-तालाब के साथ रहते-सीखते लोग बेशक कम डिग्री वाले हों, पर होते हैं अपेक्षाकृत ज्यादा समझदार, मेहनती व स्वस्थ। ऐसे लोग यह बेहतर जानते हैं कि हर चीज चाहने मात्र से उसी वक्त नहीं मिल सकती है, उसके लिए यथोचित श्रम, अनुकूल मौसम व सही समय महत्वपूर्ण है। वैसे ही जैसे आम, जामुन,लीची आदि फलों के लिए हमें इस गर्मी का इंतजार करना पड़ता है। किसान इस बात को बखूबी जानते हैं और पूरे धैर्य व संयम के साथ प्रकृति के नियमों का पालन करते हुए जीवन के सुख-दुःख में चैन से जीते हैं। हम जानते हैं कि हमारा मौसम चक्र सूरज की आकाशीय गति पर निर्भर करता है और इसीलिये हमारा कृषि एवं  भोजन विज्ञान उसी के अनुरूप चलता है। तभी तो हम अलग-अलग मौसम में  भांति -भांति के अनाज, सब्जी,फल आदि का स्वाद भी ले पाते हैं और मौसम के अनुरूप शरीर को स्वस्थ बनाये रखने लिए आवश्यक प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेड, मिनिरल व विटामिन  भी प्राप्त कर लेते हैं।ज्ञानीजन तो कहते ही हैं कि मनुष्यता का सारा विकास प्रकृति के साथ तारतम्य बिठाकर ही हुआ है। 

प्रकृति के सम्पर्क में रहने का बहुत ही सकारात्मक प्रभाव हमारे शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक दृष्टिकोण पर भी पड़ता है। इस क्रम में मनुष्य को प्रकृति की अपार शक्ति का ज्ञान होता है और तब वह भी अपने भीतर की शक्तियों को जगाने का प्रयास करता है। इस पूरी प्रक्रिया में  व्यक्ति के आत्मविश्वास में इजाफा तो होता ही है, उनके विचार तथा व्यवहार दोनों में परिष्कार भी दिखने लगता है। संक्षेप में कहें तो  प्रकृति को जानने-समझने तथा उसके सानिध्य में  जीनेवाले लोगों की प्रकृति व प्रवृत्ति भी प्रकृति के तरह अनुशासित, उदार व समावेशी होता है। 

                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Sunday, June 15, 2014

गुड लाइफ : बिजी दिखाएं नहीं, रहें

                                                   - मिलन सिन्हा 

Displaying 10142159-0.jpgआज जिधर देखिये अधिकांश लोग भागम -भाग में लगे हैं। घर  में बैठ कर इत्मीनान से दो पल बात करने तक का समय नहीं है; खाने का समय नहीं है; परिवार के साथ घूमने का वक्त नहीं है। कारण बस वही - बहुत बिजी  हैं! अब चूँकि बहुत बिजी हैं, तो इजी कैसे हो सकते हैं? चलिए, ऐसे लोग जो  अपने काम से वाकई बिजी हैं, उनकी परेशानी तो फिर भी समझ में आती है, लेकिन ऐसे लोगों का क्या कहेंगे, जो बीजी होते नहीं हैं, बल्कि बिजी दिखते हैं, दिखाते हैं। दुर्भाग्य से ऐसे लोगों की संख्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है जिसका नुकसान अंततः देश को ही उठाना पड़ता है। 

इनसे जब भी मिलने का प्रयास करें, बताएंगे कि वे कितना बिजी हैं। आप उनसे एक हफ्ते बाद का समय मांगे तो कहेंगे - कब व कैसे मिलेगा समय, मालूम नहीं। यदि आप उनके  व्यस्तता के बारे में सही जानकारी चाहते हैं तो उनके आसपास के लोगों यथा ड्राइवर, सहकर्मी आदि से पूछ लें। पता चलेगा कि वे बिजी हैं नहीं, लेकिन दिखाते हैं जिससे उनका महत्व एवं सोशल स्टेटस बढ़े। जरा सोचिये, किसी सार्थक प्रयोजन से बिजी रहना तो अच्छी बात है, लेकिन मात्र बिजी दिखने के लिए बिजी  रहना ? अव्वल तो यह खुद से धोखाधड़ी है,साथ में समय की बर्बादी भी। दूसरे, जो खुद के प्रति ईमानदार नहीं होंगें, उनसे दूसरे के प्रति ईमानदार होने की अपेक्षा का कोई अर्थ नहीं। विशेषज्ञों की मानें तो ऐसे लोग बीमार मानसिकतावाले होते हैं, जिन्हें आईना दिखाने के साथ-साथ सही काउंसलिंग की तत्काल जरुरत है। शोध एवं सर्वेक्षण बताते हैं कि क्षणिक लाभ या इगो तुष्टिकरण के लिए किये गए कार्य अंततः हमें दुःख ही देते हैं। उत्तम तो यह है कि बिजी दिखने-दिखाने के चक्रव्यूह से निकलकर सार्थक रूप से सक्रिय रहें। इससे हमें आत्मसंतुष्टि की अनुभूति तो होगी ही,हम गुडलाइफ का भरपूर मजा भी ले पायेंगे। 

                 और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Tuesday, June 10, 2014

नेताओं के काफिले छोटे हों

                                                                                            - मिलन सिन्हा

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क्या नेताओं को जनता के पैसे से असीमित तेल खर्च करने की  आजादी  है ? हाल ही में एक न्यूज़ चैनल में दिखाया जा रहा था कि किस – किस राज्य के मुख्यमंत्री के काफिले के साथ कितनी गाड़ियां तेल गटकते हुए दौड़ती है। किसी के साथ सत्रह, तो किसी के साथ बारह।  सबसे कम छह गाड़ियों के साथ चलने वाले दो तीन मुख्यमंत्री हैं, बेशक त्रिपुरा के मुख्यमंत्री को छोड़ कर, जो सादगी का एक उदहारण हैं। सवाल उठता है कि अगर कुछ मुख्यमंत्री छह गाड़ियों के साथ चल सकते हैं तो दूसरे क्यों नहीं ? ऐसे मुख्यमंत्रियों में कई अपने को लोहियावादी, गरीबों-शोषितों के मसीहा  कहते नहीं थकते हैं।
  
एक मोटे अनुमान के मुताबिक केवल केंद्र सरकार के मंत्रियों, अधिकारिओं आदि के वाहनों पर आनेवाला सालाना खर्च तीन हजार करोड़ रूपया से भी अधिक है।अगर देश के सभी राज्यों एवं केन्द्र शासित प्रदेशों  में इस मद में होनेवाले व्यय को शामिल कर लिया जाय तो यह राशि सालाना पचास हजार करोड़ से कम नहीं होगी।  

ऐसे में यह नितांत आवश्यक है कि तुरंत प्रभाव से सरकारी अमले द्वारा तेल के खपत को अत्यधिक कम किया जाय जिसकी शुरुआत केंद्र एवं राज्यों के मंत्रियों और अधिकारिओं द्वारा निजी कार्यों के लिए सरकारी वाहन का उपयोग बंद करने से हो। इससे एक सार्थक सन्देश  आम लोगों तक जाएगा। देश के प्रधानमंत्री और राज्यों के मुख्य मंत्रियों को अपने अपने काफिले में कम से कम गाड़ियों को शामिल करने का निर्णय स्वयं लेना चाहिए जिससे  खर्च  में कटौती तो हो ही, साथ ही  इस कठिन दौर में वे खुद जनता के वास्तविक प्रतिनिधि के रूप में खड़ा पा सकें । 

                 और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Sunday, June 8, 2014

गुड लाइफ : पर्यावरण को दें महत्व

                                                                                - मिलन सिन्हा
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मुख्यतः आर्थिक- सामजिक कारणों से देश में शहरीकरण की प्रक्रिया अप्रत्याशित रूप से तीव्र हो गयी है जिसके परिणामस्वरूप परिवार दर परिवार गाँव के प्राकृतिक परिवेश से विस्थापित होकर शहर के भीड़ -भाड़ भरे कृत्रिम परिवेश में शामिल होते जा रहें हैं । एक तो बड़ी आबादी के गाँव से शहर की ओर आने से शहरों पर दवाब बहुत बढ़ गया है । दूसरे मौजूदा शहरों के विस्तारीकरण के लिए अनिवार्य एक समग्र नीति व कार्ययोजना के अभाव में शहर नरक में तब्दील होते जा रहे हैं ।अप्रत्याशित गर्मी पड़ रही है, मानसून के आने में भी देर हो रही है । सो, गर्मी के इस मौसम में बिजली -पानी से लेकर शुद्ध हवा तक की किल्लत हो जाती है । सड़कों पर गंदे पानी व कचड़े का साम्राज्य है । पेड़-पौधे तो नाम मात्र के रह गए हैं । न तो पर्याप्त ऑक्सीजन है और न ही ठंडी छाँव । कहना न होगा, इन सबका दुष्प्रभाव हमारे जीवन व पर्यावरण पर साफ़ देखा जा सकता है । 

अभी -अभी हम सबने विश्व पर्यावरण दिवस मनाया । पर्यावरण संरक्षण के प्रति  जागरुकता बढ़ाने का इससे बेहतर अवसर और कौन हो सकता है । फलतः सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं की तरफ से कार्यकर्मों का आयोजन स्वाभाविक है । पूरे देश में हजारों स्थानों पर  स्कूली बच्चों तक के बीच पर्यावरण जागरुकता से जुड़ी प्रतियोगिताओं का आयोजन हुआ  जिसमें पर्यावरण संरक्षण को प्रभावी बनाने में जल, जंगल एवं जमीन की महत्ता पर जोर दिया गया । हमारे देश- प्रदेश की बात करें तो ऊपर वर्णित परेशानियों से निबटने के लिए मोटे तौर पर हम सबको मिलकर अधिकाधिक वृक्षारोपण, बेहतर सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था, जल संग्रहण व संचयन, ऊर्जा संरक्षण, साफ़-सफाई जैसे बुनियादी बातों को अमल में लाना होगा । 
                                                                
               और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Saturday, June 7, 2014

आज की कविता : सीने में जलती आग

                              - मिलन सिन्हा 
हर मौसम में 
देखता हूँ उन्हें 
मौसम बारिश का हो 
या चुनाव का 
रेल पटरियों से सटे 
उनके टाट -फूस के 
घर भी हैं सटे -सटे 
चुनाव से पूर्व उन्हें 
एक सपना दिखाई देता है 
बारिश से पहले 
अपने एक पक्के घर का 
लेकिन  चुनाव के बाद 
बारिश शुरू होते ही 
एक दुःस्वप्न दिखाई देता है उन्हें 
बारिश के पानी टपकने का
अपने - अपने घर के ढहने का 
आंगन में ठेहुना भर पानी जमने का 
जमा किये हुए सूखे लकड़ियों का 
आग में तब्दील न होने का 
फिर भी, 
एक आग तब भी देखी है 
उन सबके सीने में जलते हुए 
यह आग  भविष्य को जलाकर 
राख करनेवाली नहीं है 
बल्कि, हर विपरीत मौसम में भी 
आपसी संबंधों को गर्माहट देनेवाली, 
जीवन को  संघर्षरत  रखनेवाली है। 

          और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

# प्रवक्ता . कॉम पर प्रकाशित, दिनांक :04.06.2014

Sunday, June 1, 2014

गुड लाइफ : रिजल्ट को स्वीकारें

                                                                                           - मिलन सिन्हा

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दसवीं और बारहवीं के परीक्षा फल की चर्चा सब ओर जारी है । कहीं ख़ुशी, कहीं गम का माहौल है । लेकिन सोचनेवाली बात है कि जो रिजल्ट घोषित हो चुका, उसे क्या अब पलटा जा सकता है ? नहीं न ! तो फिर, परीक्षा का जैसा भी रिजल्ट रहा हो,  उसे हमेशा स्पोर्टिंगली लें । सक्सेस या फेलियर ( सफलता या असफलता ) तो एक सापेक्ष स्थिति है । रिजल्ट खराब अथवा आशा के अनुरूप नहीं होने के एक नहीं, अनेक कारण हो सकते हैं । मसलन, पढ़ा बहुत, पर सवाल कठिन थे; सवाल तो सही थे, पर सटीक उत्तर नहीं  लिख पाये; तैयारी पूरी नहीं कर पाये; तैयारी तो पूरी थी, पर एग्जाम से ठीक पहले तबियत खराब हो गयी आदि,आदि । सो, खुद को कोसना शुरू मत कर दें और न ही इस समय बड़ों के डांट- फटकार या किसी दूसरे के आलोचना को दिल से लें ।  खराब रिजल्ट के कारण मायूस/तनावग्रस्त/ अवसादग्रस्त हो जाना गैर मुनासिब नहीं है तथापि ऐसी अवस्था हो तो बच्चों का अपने अच्छे दोस्तों से बातचीत करना, टीवी आदि पर कॉमेडी शो का आनन्द लेना,पर्याप्त पानी/ मौसमी फल का रस पीना और नींद का पूरा लाभ लेना बेहतर है । हाँ, थोड़ा ठहर कर ही अनपेक्षित रिजल्ट का निरपेक्ष भाव से अच्छी तरह विश्लेषण करना उचित है । फिर पीछे जो गलतियां हुई थीं, उन्हें आगे न दोहराने का संकल्प लेते हुए आगे सुधार हेतु प्रभावी कार्ययोजना बनाकर उसपर अमल प्रारम्भ कर देना चाहिए । 
   
कहना न होगा, ऐसे वक्त में अभिभावकों का बच्चों के साथ मजबूती से खड़ा रहना  और घर के वातावरण को तनाव से मुक्त रखने की पूरी कोशिश करना अपेक्षित है । आखिरकार, जिंदगी में परीक्षाएं तो आती रहेंगी और सफलता -असफलता का सिलसिला भी कमोबेश चलता रहेगा, पर कोई भी रिजल्ट जीवन से बड़ा तो नहीं हो सकता, क्यों?

                 और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं