Tuesday, January 15, 2019

मोटिवेशन : बड़े उद्देश्य को हासिल करना होगा आसान

                                                                - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर...
बीते दिनों मीडिया में इस बात की खूब चर्चा हुई कि 35 वर्षीय भारतीय महिला मुक्केबाज एम.सी. मैरी कॉम ने 10वीं एआईबीए महिला विश्व मुक्केबाजी चैंपियनशिप में शानदार जीत हासिल की. इस तरह उन्होंने 6 विश्व चैंपियनशिप जीतकर भारतीय खेल इतिहास में स्वर्णाक्षर में अपना नाम दर्ज करवाया. 

अंतरराष्ट्रीय खेलों में त्रिपुरा की जिमनास्ट दीपा करमाकर और असम की धाविका हीमा दास के अभूतपूर्व प्रदर्शन को भी हम भूले नहीं हैं. हाल ही में वर्ल्ड टूर बैडमिंटन फाइनल में पी. वी. सिंधु ने जापान की नोजोमी ओकुहारा को पराजित कर जो विश्व खिताब हासिल किया, उससे पूरा देश गौरवान्वित महसूस कर रहा है. 

खेलकूद की दुनिया में ध्यानचंद, प्रकाश पादुकोणे, माइकल फरेरा से लेकर अविनव बिंद्रा, सुनील क्षेत्री और महेंद्र सिंह धोनी तक हमारे देश के अनेक खिलाड़ियों ने सैकड़ों नए मानदंड बनाए. 

‘भाग मिल्खा भाग’ नाम से चर्चित फिल्म आपने भी देखी होगी, जिसमें अपने उद्देश्य के प्रति समर्पित मिल्खा सिंह के जोश, जूनून और मेहनत को बखूबी दर्शाया गया है. तमाम अवरोधों एवं परेशानियों के बावजूद मिल्खा सिंह  कैसे एक के बाद एक रिकॉर्ड तोड़ते गए. तभी तो वे आज भी  देश –विदेश के लाखों –करोड़ों युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत बने हुए हैं.

विज्ञान के क्षेत्र से एक उदाहरण लेते है, जिन्होंने अपने तय मुकाम को पाने के लिए आशा, दृढ़ निश्चय और अथक परिश्रम के बलबूते अविश्वसनीय सफलता हासिल की और नए कीर्तिमान स्थापित किये. हां, मैडम क्यूरी की जिन्दगी संघर्षों से निरंतर लड़ते हुए अपने लक्ष्य तक पहुंचने की  गौरव गाथा है. रेडियम जैसे महत्वपूर्ण धातु का आविष्कार करने वाली इस वैज्ञानिक को दो बार नोबेल पुरस्कार विजेता होने की असाधारण ख्याति मिली. दरअसल, मैडम क्यूरी के नाम से प्रसिद्ध होने से पहले उन्हें लोग मार्जा स्क्लोदोव्स्का के नाम से जानते थे जो पोलैंड की राजधानी वारसा की रहनेवाली थी. उनके पिता विज्ञान के शिक्षक थे. घर की कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण युवा मार्जा को भी एक बच्ची को उसके घर जा कर पढ़ाना पड़ता था. बावजूद इसके परिस्थिति कुछ यूँ बिगड़ी कि उसे मजबूरन वारसा से पेरिस आना पड़ा जिससे वह अपनी विज्ञान की पढ़ाई जारी रख सके. लेकिन यहाँ भी उनकी आर्थिक हालत कुछ ऐसी रही कि कमरे का किराया चुकाने के बाद उन्हें खाने –पहनने तक की बड़ी परेशानी से रोज रूबरू होना पड़ता. पेरिस की कड़ाके की सर्दी को झेलने के लिए उनके पास न तो पर्याप्त गर्म कपड़े थे और न ही घर  को गर्म रखने के लिए लकड़ी –कोयला आदि खरीदने के लिए पैसे. लिहाजा वह पढ़ते व सोते हुए सर्दी से ठिठुरती रहती. खाने के मामले में भी बहुत बुरा हाल था. हफ्ते-दर-हफ्ते वह डबल रोटी व चाय पर गुजारा करती. नतीजतन, वह इतनी  कमजोर हो  गयी  कि एक बार तो अपने क्लास में ही बेहोश हो गयी. तथापि पढ़ाई के प्रति उनकी लगन कम नहीं हुई और आगे तो उन्होंने विज्ञान के क्षेत्र में कमाल के काम किये और भौतिक शास्त्र एवं रसायन शास्त्र दोनों में नोबेल पुरस्कार जीता.

वाकई यह जानना मुनासिब और दिलचस्प होगा कि आखिर किस तरह इन लोगों ने अपने-अपने क्षेत्र में सफलता का परचम लहराया. लेकिन उससे ज्यादा यह जानना जरुरी है कि क्या सफलता के पीछे कुछ बुनियादी सिद्धांत कार्य करते हैं? 

हां, बिलकुल करते हैं. पहले तो हमें एक सार्थक या यूँ कहें कि एक स्मार्ट लक्ष्य तय करना पड़ता है. यहां स्मार्ट का मतलब है, एक निश्चित समयावधि में हासिल करने योग्य. इसके बाद उस उद्देश्य तक पहुंचने के लिए सही व समयबद्ध कार्ययोजना की आवश्यकता होती है. कहने की जरुरत नहीं कि उस निर्धारित उद्देश्य की प्राप्ति के लिए पूरे लगन एवं मेहनत से उस दिशा में जुटे रहना भी अनिवार्य है. इसीलिये मिसाइल मैन व जनता के राष्ट्रपति के नाम से विख्यात पूर्व राष्ट्रपति ए. पी. जे. अब्दुल कलाम का कहना है,‘अपने मिशन में कामयाब होने के लिए, आपको अपने लक्ष्य के प्रति पूर्णतः निष्ठावान होना पड़ेगा.’

वाकई इस सिद्धांत पर चलते रहने पर पारिवारिक जीवन हो या नौकरी या व्यवसाय या कोई अन्य क्षेत्र हो, हमारे सफल होने की संभावना बहुत बढ़ जाती है, साथ ही आगे और बड़े मुकाम को प्राप्त करने के प्रति हमारा आत्मविश्वास भी. गुणीजनों का भी स्पष्ट मत है कि जीवन में एक बड़े उद्देश्य को लेकर शिद्दत से आगे बढ़ना सफलता का सोपान बनता है.          (hellomilansinha@gmail.com)

                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं
   
#लोकप्रिय साप्ताहिक "युगवार्ता" के 13 जनवरी, 2019 अंक में प्रकाशित 
#For Motivational Articles in English, pl. visit my site : www.milanksinha.com  

Sunday, December 16, 2018

मोटिवेशन : अच्छाई और सच्चाई में है सफलता का राज

                                                  - मिलन सिन्हा, मोटिवेशनल स्पीकर एवं लेखक 
देश-विदेश सब जगह अच्छाई और सच्चाई के साथ जीनेवाले लोगों की संख्या अच्छी-खासी है. वे मेहनत से पीछे नहीं हटते. संघर्ष को वे साथी मानते हैं और अपनी स्थिति को मजबूत करने का सतत प्रयास करते हैं. शार्ट-कट में उनका विश्वास नहीं होता. वे जीवन को एक खूबसूरत यात्रा समझते हैं. यात्रा के उतार –चढ़ाव, आसानी-परेशानी, सफलता-असफलता और ख़ुशी–गम के बीच से तमाम अनुभूतियों–अनुभवों को समेटते हुए जीवन पथ पर आगे बढ़ते रहते हैं. वे जानते और मानते हैं कि हर रात के बाद एक नई सुबह आती है, आशा और उमंग का संचार करती है. उनके जीवन में जो भी चुनौतियां आती हैं उसका समाधान पाने में वे पूरे सामर्थ्य से लग जाते हैं. वे असफलता को सिर पर रखते हैं और सफलता को दिल में. वे जानते हैं कि असफलता का निरपेक्ष विश्लेषण करके उसके पीछे के कारणों को बेहतर ढंग से जानना संभव होता है और आगे की कार्ययोजना में उन सीखों को इस्तेमाल करना सर्वथा अपेक्षित और बेहतर होता है.  

हर मनुष्य के जीवन में कभी–न-कभी कोई बड़ी समस्या आती है, कई बार तो बार-बार आती है; छोटे-छोटे अंतराल में आती रहती है, उस समय ऐसे लोग उत्तेजित, क्रोधित, आतंकित या भयभीत होने के बजाय ज्यादा शांत रहने का प्रयत्न करते हैं. 

स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं कि समस्या आने पर जब हम विचलित, असंतुलित व असामान्य हो जाते हैं तब उस समस्या को सुलझाने की हमारी शक्ति कम हो जाती है, कारण ऐसे वक्त मन-मस्तिष्क में उलझन का जाल मजबूत हो जाता है और समाधान आसान होने पर भी नामुमकिन प्रतीत होने लगता है. इसके विपरीत, थोड़ी देर शांत रहने और फिर समस्याविशेष का नए सिरे से विश्लेषण करने एवं उसका समाधान तलाशने की कोशिश करने  पर हमें अधिकांश मौके पर सफलता हाथ लगती है. ऐसा इसलिए भी कि समस्या कैसी भी हो, उसका कोई-न-कोई समाधान तो उपलब्ध होता ही है. और फिर अपने जीवन की समीक्षा करने पर जब वे पाते हैं कि जीवन में असफलताओं से अधिक सफलताएं मिली है तो उसे याद कर खुश हो जाते हैं, उत्साह-उमंग से भर जाते हैं. 

यह भी देखने-सुनने में आता है कि पुरजोर कोशिश करने के बावजूद कई लोग अनबुझ कारणों से बार-बार हारते रहते हैं. लेकिन वे हार नहीं मानते और कोशिश का दामन नहीं छोड़ते, क्यों कि ऐसे लोग मानते हैं कि कोशिश करनेवालों की कभी हार नहीं होती. ऐसे लोग उस कठिन समय में महान आविष्कारक थॉमस अल्वा एडिसन जैसे महान लोगों को याद कर प्रेरित होते हैं. कारण यह है कि एडिसन को बिजली के बल्ब का आविष्कार से पहले हजारों बार असफलता का सामना करना पड़ा था. लेकिन जब किसी ने उनसे इस बाबत पूछा कि आप अपनी हजारों असफलता को कैसे देखते हैं तो एडिसन का उत्तर कम प्रेरणादायी नहीं था. उन्होंने कहा कि मैंने बल्ब के आविष्कार के क्रम में हजारों बार प्रयोग किये जिसका परिणाम बस अनुकूल नहीं रहा. सच है, सफलता और खुशी दोनों ही अच्छाई और सच्चाई के साथ कोशिश करनेवालों के पीछे-पीछे चलती रहती है.     (hellomilansinha@gmail.com) 

                 और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं
# दैनिक जागरण में 16.12.18 को प्रकाशित

#For Motivational Articles in English, pl. visit my site : www.milanksinha.com  

Sunday, December 9, 2018

आत्मविश्वास से मिलेगी मंजिल, बढ़ते रहें आगे

                                  - मिलन  सिन्हामोटिवेशनल स्पीकर एवं स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट ...
ऐसे तो आजकल हर उम्र का आदमी तनाव से थोड़ा या ज्यादा परेशान दिखता है. लेकिन तेज रफ़्तार जिंदगी में ‘यह दिल मांगे मोर’ की अपेक्षा के साथ जीनेवाले लोगों में तनाव का स्तर कुछ ज्यादा ही होता है. वैसे देखा जाए तो तनाव से आदमी का रिश्ता कोई नया नहीं है. समय के हर दौर में लोग कम या अधिक तनाव से ग्रसित रहे हैं, खासकर वे लोग जो अवैध, अनैतिक एवं अवांछित तरीके से सिर्फ अपना मतलब साधने में विश्वास करते हैं. 

बहरहाल, परीक्षा के मौसम में स्कूली बच्चे एवं युवा तनाव से कुछ ज्यादा ही परेशान रहते हैं.  ऐसे समय डर एवं आशंका के कारण तनाव में इजाफा होता है. इसके कई कारण हैं- वास्तविक एवं काल्पनिक दोनों. तनाव की इस अवस्था में उनकी सहजता, सरलता एवं स्वभाविकता दुष्प्रभावित होती है. उलझन, परेशानी और तनाव अनावश्यक रूप से बढ़ जाते हैं. अधिकतर मामलों में अभिभावक–शिक्षक या प्रियजन इसे ठीक से समझ नहीं पाते हैं या समझकर भी तत्काल बच्चे से खुलकर बात नहीं करते. ऐसे में  बच्चे का कॉनफ्यूज़न बढ़ता जाता है. कई बार तो अपनी भावनाओं और परेशानियों को साझा करना संभव नहीं दिखता. तब बच्चे अपने-आप को असहाय, अकेला और लाचार समझने लगते हैं. और कभी-कभी तो कई तरह के आत्मघाती फैसला कर लेते हैं. 

सवाल है कि आखिर इस तरह की स्थिति से बच्चे कैसे बचें और उबरें जिससे  चुनौतियों का डटकर सामना कर सकें, परीक्षा में बेहतर कर सकें?  

जानकार मानते हैं कि थोड़ा तनाव तो अच्छा होता है; एक ड्राइविंग फ़ोर्स की तरह काम करता है जो हमें थोड़ी तीव्रता से कुछ करने को प्रेरित करता है. ऐसे समय शरीर के सारे अंग कुछ ज्यादा सक्रियता एवं नियोजित ढंग से काम को अंजाम देने में जुट जाते हैं. हम असहज या असामान्य होने के बजाय सहज और सामान्य तरीके से कुछ ज्यादा फोकस होकर काम करते हैं क्यों कि पूरा ध्यान लक्ष्य को प्राप्त करने में लगा रहता है. मजे की बात यह कि इस तरह का तनाव अल्पकालिक होता है और काम  के पूरा होने या सफल होने पर ज्यादा ख़ुशी का एहसास भी करवाता है. 

हां, बराबर तनाव ग्रस्त रहना वाकई चिंता का विषय है, वो भी परीक्षा के समय. लिहाजा, तनाव के मूल कारण को जानने–समझने का प्रयास करें और फिर चिंता छोड़कर अपेक्षा प्रबंधन, प्राथमिकता निर्धारण, समय प्रबंधन, योजनाबद्ध तैयारी, नियमित अभ्यास के साथ ही आकस्मिक परिस्थिति एवं परिवर्तन को दिल से स्वीकार करते हुए आगे बढ़ने की यथासाध्य कोशिश करें. इससे आपका आत्मविश्वास बढ़ेगा और तनाव भी बहुत कम होगा. परीक्षा के समय अपनी सामान्य दिनचर्या को तिलांजलि न देकर अपने खाने-सोने आदि को भी यथासंभव ठीक रखें. इससे आपका शरीर उस महत्वपूर्ण समय में यथोचित उर्जा और उत्साह से लबरेज रहेगा. एक बात और. जब भी जरुरत महसूस हो तो सोशल मीडिया में समाधान तलाशने के बजाय अपने अभिभावक-शिक्षक–गुरुजन से अपनी परेशानी साझा करें और उनके सुझावों पर अमल करें. बहुत लाभ होगा.       (hellomilansinha@gmail.com) 


                      और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं
# दैनिक जागरण में 09.12.18 को प्रकाशित

#For Motivational Articles in English, pl. visit my site : www.milanksinha.com                    

Friday, November 23, 2018

मोटिवेशन : सफलता की सीढ़ी है लक्ष्य के प्रति समर्पण

                                                                - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर...
ऐसे देखा जाए तो हर कोई अपने जीवन में सफल होना चाहता है, परन्तु सबको अपेक्षित सफलता मिलती है क्या ? इसके एकाधिक कारण हो सकते हैं, किन्तु एक महत्वपूर्ण कारण एक स्पष्ट लक्ष्य न तय कर पाना होता है. सोचिये जरा, अगर फुटबॉल के मैदान में कोई गोल पोस्ट ही न हो या  क्रिकेट के खेल में विकेट न हो तो क्या होगा? तभी तो ए. एच. ग्लासगो कहते हैं, ‘फुटबाल की तरह ज़िन्दगी में भी आप तब-तक आगे नहीं बढ़ सकते जब तक आपको अपने लक्ष्य का पता ना हो.’ कहने का अभिप्राय यह कि अगर लक्ष्य को सामने से हटा दिया जाय तो फिर न तो खेल के कोई मायने होते हैं और न ही जीवन के.

कुछ दिनों पूर्व प्रदर्शित केतन मेहता निर्देशित फिल्म, ‘मांझी – दि माउंटेन मैन’ की खूब चर्चा हुई. यह अकारण नहीं है. इस फिल्म में बिहार के गरीब -शोषित  समाज के एक ऐसे इंसान के वास्तविक जीवन  को फिल्माने का प्रयास किया गया जिसने गरीबी और सामाजिक विरोध के बावजूद सिर्फ अपने दम पर एक विशाल पहाड़ को चीरकर सड़क बनाने का लक्ष्य अपने सामने रखा. दशरथ मांझी ने इसके निमित्त अनथक परिश्रम किया और रास्ते में आने वाले  तमाम अवरोधों को चीरते हुए  सफलता हासिल की.

सभी जानते हैं कि महाभारत में लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्धता के मिसाल के तौर पर पांडव पुत्र अर्जुन का नाम उभर कर आता है. ऐसा इसलिए कि अर्जुन ने एकाग्र हो कर केवल अपने लक्ष्य पर फोकस किया था और परिणामस्वरूप चिड़िया की आँख पर तीर से निशाना साधने में वही सफल रहे थे.

तभी  तो स्वामी विवेकानन्द कहते हैं, "लक्ष्य को ही अपना जीवन कार्य समझो. हर समय उसका चिंतन करो, उसी का स्वप्न देखो और उसी के सहारे जीवित रहो ." खुद स्वामी जी का जीवन इसका ज्वलंत उदाहरण है.

भारतीय आई टी  उद्द्योग के एक बड़े नामचीन व्यक्ति के रूप में हम सब नारायण मूर्ति का नाम लेते हैं. दरअसल इस मुकाम तक पहुंचने के लिए उन्होंने किन-किन पड़ावों से होकर अपनी यात्रा जारी रखी, उसे जानना –समझना जरुरी भी है और  प्रेरणादायक भी. मध्यम वर्ग परिवार के  युवा नारायण मूर्ति  को 1981 में इन्फोसिस की शुरुआत से पहले साइबेरिया –बुल्गारिया  की  रेल यात्रा के दौरान किसी भ्रमवश गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया,  जहाँ उन्हें करीब तीन दिनों तक भूखा रहना पड़ा और यातनाएं भी झेलनी पड़ी. उस समय उन्हें एक बार ऐसा भी लगा कि शायद  वे अब वहां से निकल भी पायें, लेकिन उन्होंने उम्मीद नहीं छोड़ी और सच्चाई का दामन थामे रखा. सौभाग्य  से उन्हें चौथे दिन जेल से निकाल कर इस्ताम्बुल की ट्रेन में बिठा कर मुक्ति दी गई. वह उनकी जिंदगी का कठिनतम दौर था. कहते है न कि हर सफल  व्यक्ति अपने जीवन के उतार –चढ़ाव से बहुत कुछ सीखता रहता है और अपने लक्ष्य की  ओर अग्रसर होता रहता है. अपने लक्ष्य के प्रति पूर्णतः प्रतिबद्ध  नारायण मूर्ति के साथ भी ऐसा ही हुआ और आज देश –विदेश के करोड़ों लोग उनके  प्रशंसक हैं.

                 और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं
# दैनिक जागरण में 23.11.18 को प्रकाशित

#For Motivational Articles in English, pl. visit my site : www.milanksinha.com  

Friday, September 14, 2018

आज की बात : बच्चों की शैतानी और प्राचार्य का नजरिया

                                                                                                    -मिलन सिन्हा 
आज रांची के एक बड़े स्कूल में एक कार्यक्रम के सिलसिले में जाने का मौका मिला. स्कूल के गेट पर तैनात गार्ड ने गाड़ी स्कूल के भीतर तब तक जाने नहीं दिया जब तक कि उन्हें ऊपर से अनुमति नहीं मिली. हमें पहले तो बुरा लगा कि हमें स्कूल प्रबंधन ने एक कार्यक्रम के लिए बुलाया है, फिर भी अन्दर जाने में इतनी परेशानी हो रही है. लेकिन बाद में सोचने पर गार्ड के कर्तव्यनिष्ठा की तारीफ़ किये बिना नहीं रह सका. स्कूल के हजारों बच्चों और स्कूल के शिक्षक-शिक्षिकाओं तथा अन्य कर्मियों की सुरक्षा-संरक्षा की जिम्मेदारी आखिर उन दो सुरक्षाकर्मियों पर ही तो है.

प्राचार्य के कक्ष के बाहर एक तरफ कई बच्चे मुंह झुकाए खड़े थे तो दूसरी ओर चार अभिभावक बैठे थे. सभी  प्राचार्य से मिलने की अपनी बारी के इन्तजार में थे. कार्यक्रम शुरू होने में थोड़ी ही देर थे और कार्यक्रम से पहले एक बार प्राचार्य साहब से मिलना हमारे एजेंडे में था. सो, हमें जल्द ही चैम्बर में बुलाया गया. प्राचार्य साहब तपाक से मिले. हमने कार्यक्रम की संक्षिप्त जानकारी उन्हें दी. वे खुश हुए और हमारे साथ कार्यक्रम के लिए ऑडिटोरियम के ओर चल दिए. बाहर निकलने पर उनकी नजर पहले प्रतीक्षारत अभिभावकों पर पड़ी. उनसे क्षमा  मांगते हुए उन्होंने उन लोगों से उप-प्राचार्य से मिलकर अपनी बात रखने को कहा और तुरत मोबाइल से उप-प्राचार्य से उस विषय पर बात भी की. अभिभावक संतोष का भाव लिए उप-प्राचार्य के कक्ष  की ओर चले गए.

अब बारी मुंह झुकाए खड़े बच्चों की थी. अपने प्राचार्य को देखते ही बच्चों के चहरे पर भय का भाव तैरने लगा. प्राचार्य साहब ने सबको पास बुला कर बस इतना कहा कि क्यों यह शैतानी करते हो, पढ़ाई में मन लगाओ. अगली बार ऐसी शिकायत आई तो तुम सबके अभिभावक को बुलाना पड़ेगा. ऐसा न हो, इसका ध्यान रखो.

ऑडिटोरियम की ओर चलते हुए उन्होंने हमसे कहा कि बच्चे हैं, थोड़ी बहुत शैतानी अभी नहीं करेंगे तो कब करेंगे. बड़े हो कर करेंगे तो क्या अच्छा लगेगा. हमारा काम ही है इन्हें अच्छाई की ओर ले जाना. यह सब कहते हुए प्राचार्य के चेहरे पर मंद मुस्कान तैर गई, जो हमें खुश कर गया.

सच कहते हैं अच्छे लीडर के कार्यशैली की छाप संस्था के हर कर्मी पर दिखाई पड़ती है. गार्ड की बात तो कर ही चुके हैं हम, क्यों?
  
            और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं
#For Motivational Articles in English, pl. visit my site : www.milanksinha.com

Wednesday, August 22, 2018

आज की बात : मानव तस्करी और हम

                                                                                                 -मिलन सिन्हा
रांची से प्रकाशित आज के कई अखबारों में मानव तस्करी  से जुड़ी खबर है. यह बात सामने आ रही है कि झारखण्ड राज्य की 15 हजार बालिकाएं ट्रैफिकिंग की शिकार हो रहीं हैं. द ट्रैफिकिंग ऑफ़ पर्सन बिल, 2018 की चर्चा भी हो रही है. यह बिल लोकसभा में पारित हो चुका है. आशा करनी चाहिए कि राज्यसभा से भी पारित  होने के बाद इस कानून के तहत मानव तस्करी पर लगाम लगाने में प्रशासन को कुछ और आसानी होगी.

दरअसल, पिछले कई वर्षों से मानव तस्करी की घटनाएं उत्तरोत्तर बढ़ती रही है. उसमें भी चाइल्ड ट्रैफिकिंग, खासकर गर्ल्स ट्रैफिकिंग में चिंताजनक वृद्धि दर्ज हुई है. अपेक्षाकृत पिछड़े प्रदेशों में ये घटनाएं अप्रत्याशित  रूप से बढ़ी है. झारखण्ड प्रदेश इनमें शामिल है. अखबारों में यहाँ की लड़कियों जिनमें आदिवासी लड़कियों की संख्या अधिक होती है, के अन्य प्रदेशों एवं महानगरों में ले जाकर बेचने तथा कई अवांछित कार्य में ढकेलने की ख़बरें छपती रही हैं. अब तो मानव तस्करी के घृणित अपराध के पीछे के एक अन्य कारण के रूप में अंग विक्रय भी शुमार हो चुका है.

कहने की जरुरत नहीं कि समाज में व्याप्त गरीबी, बेकारी, बीमारी, अशिक्षा आदि तो जाने-अनजाने मानव तस्करी में लिप्त असामाजिक तत्वों का काम आसान कर देती है, तथापि इस बात से कौन इन्कार कर सकता है कि पुलिस प्रशासन की निष्क्रियता, अनेक मामलों में संलिप्तता और घटनाओं के प्रकाश में आने के बाद भी कार्रवाई में शिथिलता के साथ-साथ कई राजनीतिक एवं सफेदपोश लोगों को बचाने के चक्कर में मानव तस्करी की घटनाएं इस हद तक बढ़ पाई है.

विचारणीय प्रश्न यह है कि सिर्फ नए कानून बना देने मात्र से इन घटनाओं को रोकना संभव हो पायेगा? मेरे विचार से तो नहीं. इसके लिए सोशल डेवलपमेंट इंडेक्स में उत्तरोत्तर तीव्र गुणात्मक सुधार की आवश्यकता तो है ही, पुलिस प्रशासन को संवेदनशील बनाने और उनकी जिम्मेदारी तय करने की भी उतनी ही आवश्यकता है. मानव तस्करी के सभी लंबित मामलों को एक समयावधि में निपटाने के लिय न्यायपालिका को भी कोई रास्ता निकालना पड़ेगा. तस्करी के शिकार बच्चों, खासकर लड़कियों को समुचित काउंसलिंग तथा सामाजिक पुनर्वास की सुविधा सुलभ हो, ऐसी व्यवस्था सरकार एवं समाज को मिलकर करनी पड़ेगी. 
                     और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

#For Motivational Articles in English, pl. visit my site : www.milanksinha.com

Sunday, July 15, 2018

मेघ आये बड़े बन-ठन के - बच्चों को पढ़ने दें प्रकृति का रंग-रूप

                                                                       -मिलन सिन्हा, मोटिवेशनल स्पीकर...  

आज सुबह से ही मुझे कुछ अच्छा होने का आभास हो रहा था. इसी वजह से बालकनी में बैठा प्रकृति के इस खूबसूरत एहसास को खुद में समेटने की कोशिश कर रहा था. प्रकृति विज्ञानी तो पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों की हरकतों से जान जाते हैं कि प्रकृति आज कौन-सा नया रंग दिखाने वाली है. अचानक तेज हवा चलने लगी. बादल उमड़-घुमड़ आने-जाने लगे और बस बारिश शुरू हो गयी. एकदम झमाझम. बालकनी से घर के सामने और बगल में फैले आम, नीम, यूकलिप्ट्स, सहजन, अमरुद आदि के पेड़ों को बारिश में बेख़ौफ़ हंसते-झूमते देख कर बहुत ही अच्छा लग रहा था. सामने की भीड़ वाली सड़क पर अभी इक्के-दुक्के लोग छाता सहित या रहित आ-जा रहे थे. सड़क किनारे नाले में पानी का बहाव तेज हो गया था, पर सड़क पर कहीं बच्चे नजर नहीं आ रहे थे. यही सब देखते-सोचते पता नहीं कब अतीत ने घेर लिया. 

बचपन में बारिश हो और हम जैसे बच्चे घर में बैठे रहें, नामुमकिन था. किसी न किसी बहाने बाहर जाना था, बारिश की ठंडी फुहारों का आनन्द लेते हुए न जाने क्या-क्या करना था. हां, पहले से बना कर रखे विभिन्न साइज के कागज़ के नाव को बारिश के बहते पानी में चलाना और पानी में छप-छपाक करना सभी बच्चों का पसंदीदा शगल था. नाव को तेजी से भागते हुए देखने के लिए उसे नाले में तेज गति से बहते पानी में डालने में भी हमें कोई गुरेज नहीं होता था. फिर उस नाव के साथ-साथ घर से कितनी दूर चलते जाते, अक्सर इसका होश भी नहीं होता और न ही रहती यह फ़िक्र कि घर लौटने पर मां कितना बिगड़ेंगी .... अनायास ही गुनगुना उठता हूँ, ‘बचपन के दिन भी क्या दिन थे ... ... ...’  

आकाश में बिजली चमकी और गड़गड़ाहट हुई तो वर्तमान में लौट आया. यहाँ तो कोई भी बच्चा बारिश का आनंद लेते नहीं दिख रहा है, न कोई कागज़ के नाव को बहते पानी में तैराते हुए. क्या आजकल बच्चे बारिश का आनंद नहीं लेना चाहते या हम इस या उस आशंका से उन्हें इस अपूर्व अनुभव से वंचित कर रहे हैं या आधुनिक दिखने-दिखाने के चक्कर में बच्चों से उनका बचपन छीन रहे हैं. शायद किसी सर्वे से पता चले कि महानगर और बड़े शहरों में सम्पन्नता में पलनेवाले और बड़े स्कूल में पढ़नेवाले बच्चों के लिए कहीं उनके अभिभावकों ने इसे अवांछनीय तो घोषित नहीं कर रखा है. खैर, अच्छी बात है कि अब तक गांवों तथा कस्बों के आम बच्चे प्रकृति से जुड़े हुए हैं और इसका बहुआयामी फायदा पा रहे हैं. इस सन्दर्भ में मुझे  सर्वेश्वरदयाल सक्सेना  की ये पंक्तियां याद आ जाती हैं :
"मेघ आए 
बड़े  बन-ठन के सँवर के.
आगे-आगे नाचती-गाती बयार चली,
दरवाज़े खिड़कियाँ खुलने लगीं गली-गली,
पाहुन ज्यों आए हों गाँव में शहर के
मेघ आए 
 बड़े  बन-ठन के सँवर के. ... ..."
विचारणीय प्रश्न है कि हम कहीं जाने-अनजाने अपने बच्चों को प्रकृति के अप्रतिम रूपों को देखने-महसूसने से वंचित तो नहीं कर रहे हैं, उन्हें कृत्रिमता के आगोश में तो नहीं  धकेल रहे हैं?  
कहने  का तात्पर्य बस यह कि बच्चों को अपना बचपन जीने दें, उन्हें उसका मजा लेने दें और उन्हें स्वभाविक ढंग से प्रकृति से जुड़ने दें क्यों कि हम सभी जानते और मानते हैं कि हमारे जीवन का सबसे खूबसूरत समय बचपन ही होता है और प्रकृति से बेहतर कोई शिक्षक नहीं होता. 

मेरा तो मानना है कि गर्मी के मौसम के बाद नीले आसमान में उमड़ते-घुमड़ते बादलों में संग्रहित जल-बूंदों का वर्षा की शीतल फुहार के रूप में धरती पर आने के पीछे के मौसम विज्ञान के विषय में बड़े-बुजुर्ग बच्चों को बताएं. बारिश के इस मौसम का खान-पान से लेकर  गाँव, खेत-खलिहान, कृषि कार्य, अन्न उत्पादन, अर्थ व्यवस्था  आदि पर पड़ने वाले सकारात्मक प्रभाव के बारे में हमारे अनुभव व वैज्ञानिक जानकारी से उन्हें लाभान्वित करें. आम, जामुन, कटहल, नाशपाती, अमरुद जैसे मौसमी फलों का हमारे स्वास्थ्य पर होने वाले लाभकारी असर की जानकारी बच्चों को दें. 

बच्चे जो देखते हैं उससे बहुत कुछ सीखते हैं. लिहाजा यह बेहतर होगा कि हम उन्हें बाहर जाने दें, खुद भी ले जाएं - अपने या आसपास के गांव-क़स्बा में और जमीनी हकीकत से रूबरू होने दें, प्रकृति के इस मनमोहक इन्द्रधनुषी रंग-रूप को बढ़िया से देखने, पढ़ने और एन्जॉय करने दें. दिलचस्प बात है कि उन्हें इस मौसम में कई जगह लड़कियों और महिलाओं को लोकगीत गा कर वर्षा के मौसम का स्वागत करते और पीपल, बरगद, आम, कटहल, नीम आदि के पेड़ों की टहनियों में झूला डालकर इस मौसम का आनन्द उठाते देखने और उसमें शिरकत करने का मौका भी मिलेगा. इस तरह वे अपनी संस्कृति व परम्परा से जुड़ते भी जायेंगे. 

एक बात और. सभी जानते हैं, जल नहीं तो कल नहीं; जल ही जीवन है. ऐसे में अगर बच्चे बचपन से ही जल चक्र की पूरी प्रक्रिया को आत्मसात करेंगे और वर्षा के पानी का  हमारे जीवन चक्र पर जो बहुआयामी प्रभाव होता है उसे भी जानेंगे और महसूस करेंगे, तभी वे जल की महत्ता को ठीक से समझेंगे. इस प्रक्रिया में उनका मन-मानस भी परिष्कृत एवं समृद्ध होगा और वे स्वतः "सर्वे भवन्तु सुखिनं" के विचार को जीना सीखेंगे.

कुल मिलाकर देखें तो नभ से झरते बारिश की बूंदों को सन्दर्भ में रखकर हम अपने बच्चों, जो भविष्य के नागरिक भी हैं, को स्वभाविक ढंग से प्रकृति से जुड़ने और जीवन को समग्रता में जीने व एन्जॉय करने का स्वर्णिम अवसर दे सकते हैं. बूंद-बूंद करके ही सही बहुत अच्छी चीजों से उन्हें लैस कर सकते हैं. 

हां, एक और बात. कहा जाता है कि बारिश में स्नान करने से घमौरियां ख़त्म हो जाती हैं, किसी तरह के कूल-कूल पाउडर की जरुरत नहीं होती. हमने तो ऐसा पाया है. क्या आपने भी ?  

                                                                                  ( hellomilansinha@gmail.com)
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं
#For Motivational Articles in English, pl. visit my site : www.milanksinha.com