Sunday, August 11, 2019

मोटिवेशन : उन्माद व हिंसा से सिर्फ नुकसान

                                                                       - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर... ....
विविधताओं से भरे हमारे विशाल देश में प्रायः रोज कहीं-न-कहीं कारण-अकारण हिंसा की छोटी-बड़ी घटनाएं होती रहती है. लोगों के घायल होने, मरने से लेकर निजी एवं सार्वजनिक संपत्ति का नुकसान भी होता है. विद्यार्थियों के बीच बात-बेबात लड़ाई-झगड़े-मारपीट आदि की खबरें भी मिलती रहती है. इस सबसे सामाजिक व शैक्षणिक माहौल बिगड़ता है. विभिन्न सर्वेक्षणों में पाया गया है कि ऐसे अधिकांश  मामलों में चाहे-अनचाहे कुछ विद्यार्थी शामिल रहते हैं. कारण कई हैं.

विद्यार्थी जीवन उतार-चढ़ाव से भरा होता है. गतिशीलता का यह पर्याय है. उर्जा, उमंग और उत्साह विद्यार्थी जीवन के सहचर होते हैं. इन्हें सम्हालना और अच्छे कार्य में लगाना विद्यार्थियों के  उज्जवल भविष्य की दिशा निर्धारित करता है. हां, यह भी सच है कि इस उम्र में उतावलापन और उन्माद कुछ ज्यादा होता है जो हिंसा, तोड़फोड़ आदि का सहज कारण बनता है. ऊपर से खाली  दिमाग तो शैतान का घर होता ही है. यह बात निहित स्वार्थी तत्व बहुत अच्छी तरह जानते-समझते हैं. ऐसे तत्वों को अपने समाज और देश की भलाई से कोई मतलब नहीं होता. उनका एक मात्र उद्देश्य किसी भी तरह द्वेष व भ्रम फैलाकर आपसी सदभाव एवं भाईचारा को नष्ट करना और अंततः हिंसा और तोड़फोड़ के जरिए अपना उल्लू सीधा करना होता है. और इन कार्यों को अंजाम देने के लिए वे  विद्यार्थी और युवा वर्ग को सॉफ्ट टारगेट मानते हैं. जानकार बताते हैं कि इन असामाजिक तत्वों के बहकावे या प्रलोभन में आकर कई विद्यार्थी हिंसा सहित अन्य अवांछित कार्यों में शामिल हो जाते हैं और अंततः पुलिस के गिरफ्त में आ जाते हैं. स्वाभाविक रूप से गैर-कानूनी काम में संलिप्तता साबित होने पर जेल तक की सजा होती है. फिर पुलिस रिकॉर्ड में एक बार नाम दर्ज हो जाने का दुष्परिणाम  विद्यार्थी को लम्बे समय तक भोगना पड़ता है. अहम सवाल यह है कि जीवन के इस महत्वपूर्ण कालखंड में हमारे विद्यार्थी उन्माद, हिंसा आदि से कैसे बचें?

पहले तो हर विद्यार्थी हमेशा यह याद रखें कि इस समय यानी जीवन के इस प्राइम टाइम में उनका मूल मकसद क्या है? पढ़ाई -लिखाई, खेल-कूद और व्यक्तित्व विकास के अन्य कार्य. यही न. तो फिर इससे इतर कोई अन्य काम, खासकर ऐसा कोई काम जो प्रथम दृष्टया ही गैर-कानूनी लगता हो या अनैतिक हो, करने से सर्वथा दूर रहें. दूसरे, कोई भी कनफूजन हो तो अपने अभिभावक-शिक्षक से बात कर लें. और तीसरे, ऐसी किसी स्थिति में इस बात का भी स्मरण कर लें कि महात्मा बुद्ध, महात्मा गांधी, लियो टॉलस्टॉय से लेकर आज तक के सभी महान लोगों ने स्पष्ट रूप से बारबार कहा है कि किसी भी समस्या का समाधान उन्माद और हिंसा से नहीं हो सकता है.

इन सब बातों का मतलब यह नहीं कि छात्र-छात्राएं अन्याय, शोषण या अत्याचार को चुपचाप सहते रहें और उसका प्रतिकार न करें. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी या लोकनायक जयप्रकाश नारायण द्वारा बताया गया शांतिपूर्ण सत्याग्रह तथा अहिंसक आन्दोलन का मार्ग तो हमेशा खुला है. 

एक बात और. सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के इस दौर में किसी भी घटना-दुर्घटना की सच्चाई की सही पड़ताल एवं छानबीन किए बगैर बस किसी प्रतिक्रिया स्वरुप तुरत गुस्से या उन्माद में आने, भीड़ का हिस्सा बनकर सड़क पर उतरने और हिंसा-तोड़फोड़ में शामिल होने का परिणाम विद्यार्थियों के लिए  बहुत घातक हो सकता है. ऐसे हजारों केस हैं जब हिंसक घटना के बाद थाने में पुलिस के सामने विद्यार्थियों एवं उनके अभिभावकों को पश्चाताप करते और रोते-विलखते-माफ़ी मांगते देखा गया है. पर जो हो जाता है, उसे पलटना कहां मुमकिन होता है? कानून के अनुसार उसका दंड तो भुगतना ही पड़ता है.

एक विचारणीय तथ्य यह भी है कि देश के अच्छे शिक्षण संस्थान, मसलन आईआईटी, आईआईएम, एम्स आदि में पढ़नेवाले विद्यार्थियों को आपने कदाचित ही किसी हिंसक आन्दोलन में शामिल होते और तोड़फोड़ करते हुए निजी एवं सार्वजनिक संपत्ति को क्षति पहुंचाते देखा होगा. शायद  इसलिए कि इन संस्थानों के विद्यार्थियों को हर क्षण अपना मूल मकसद याद रहता है. बड़ा सच तो यह भी है कि सभी शिक्षण संस्थान के अच्छे विद्यार्थी न केवल अपने मित्रों को बहकावे एवं प्रलोभन  में आने से रोकते हैं बल्कि विद्यार्थियों को बहकाने, फुसलाने और समाज में अशांति फैलानेवाले तत्वों को प्रशासन के हवाले करने की यथासंभव कोशिश भी करते हैं, जिससे कि समाज में शांति बनी रहे. आखिर शिक्षा के वास्तविक मर्म को समझनेवाले विद्यार्थियों से समाज को भी अपेक्षा तो रहती ही है कि वे एक जागरूक और जिम्मेदार नागरिक का कर्तव्य बखूबी निभाएं. 
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Thursday, August 8, 2019

मोटिवेशन : मन को मना लो

                                                                  - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर... ....
कॉलेज के दिनों की बात है. हमारे एक प्राध्यापक थे. बहुत अच्छा पढ़ाते थे. पढ़ाते वक्त उनकी तल्लीनता के क्या कहने. क्लास में या बाहर कई विद्यार्थियों को अक्सर उन्हें यह कहते सुना था  कि सफल होना है तो मन को मना लो और अच्छे काम में लगा लो. उनके कहने का अभिप्राय यह था कि पढ़ना, खेलना, खाना या अन्य कोई भी काम हो - बस मन लगा कर करो.  सामान्यतः कुछ इसी  तरह की नसीहत बचपन से लेकर बड़े होने तक, घर-स्कूल-कॉलेज-यूनिवर्सिटी तक और उसके बाद भी बड़े-बुजुर्ग-अध्यापक अपने बच्चों-विद्यार्थियों को देते रहते हैं. आपको भी मिली होगी. लेकिन क्या आपने कभी गंभीरता से इस नसीहत पर विचार किया है ?

सभी जानते हैं कि मानव मन चंचल है और मन की चंचलता के मामले में बच्चे-किशोर-युवा स्वभावतः आगे रहते हैं. कभी सिर्फ दो मिनट अपनी आखें बंद कर मन को खुला छोड़ दें और इस बात पर ध्यान दें कि आपका मन कहां-कहां घूम रहा है, क्या-क्या सोच रहा है? ऐसे, बैठे-बिठाए भी मन के विचरण का अंदाजा लगाना आसान है.  ज्ञानीजन भी कहते हैं कि अगर किसी ने अपने मन को मना लिया तथा  मन को अच्छे काम में लगा लिया तो  वे जीवन की तमाम चुनौतियों का अच्छी तरह सामना करते हैं; उनके लिए जीवन के मुश्किल-से-मुश्किल दौर से निकलकर  लक्ष्य तक पहुंचना कठिन नहीं होता है. खासकर विद्यार्थियों के लिए ऐसा करना तो बहुत फायदेमंद है.

 फर्ज कीजिए कि आप किताब खोलकर पढ़ने बैठे हैं, पढ़ भी रहे हैं, पर कुछ देर बाद एकाएक लगता है कि जैसे कुछ पढ़ा ही नहीं या कुछ पढ़ा तो कुछ  वाकई  नहीं पढ़ा. ऐसा भी कई बार  देखा होगा कि क्लास में शिक्षक पूरा चैप्टर पढ़ा गए और अंत में जब उन्होंने एक छोटा-सा प्रश्न पूछा तो कुछ विद्यार्थी उत्तर नहीं दे सके, जब कि अन्य कई छात्र-छात्राओं ने उस सवाल का जवाब आसानी से दे दिया. आखिर ऐसा  क्यों और कैसे होता है? दरअसल, तन से तो सब विद्यार्थी  वहां मौजूद थे और शिक्षक महोदय द्वारा पढ़ाये जाने वाले विषय के प्रति सजग भी दिख रहे थे अथवा खुद भी जब पढ़ रहे थे, दोनों ही स्थिति में क्या आपका  मन भी तब वहां था या  कहीं और भटक रहा था या किसी सोच में व्यस्त था? शर्तिया उस वक्त तन और मन एक साथ उस कार्यविशेष के प्रति समर्पित नहीं था. पढ़ने, काम करने आदि की बात छोड़ें, बहुत लोग तो क्या खा रहे हैं, कितना खा रहे हैं - कुछ देर बाद ही उसकी बाबत पूछने पर बताने में असमर्थ रहते हैं. सोचनेवाली बात है कि पढ़ाई हो या अन्य कोई काम, शरीर से तो वैसे भी वे वहां होते ही हैं, समय, उर्जा आदि भी खर्च करते हैं, लेकिन चूंकि मन को उस काम में नहीं लगा पाते, इसके कारण वे अपेक्षित लाभ नहीं पाते हैं. इसका नकारात्मक असर उनके व्यक्तित्व विकास पर पड़ना लाजिमी है. मन को मनाने और अच्छे काम में लगाने से यह परेशानी नहीं होती है. 

दिलचस्प बात है कि जब आप किसी काम को मन से करते हैं तो न केवल उसमें अपेक्षित रूचि लेते हैं और तन्मयता से उसे अंजाम देने की भरसक कोशिश करते हैं, बल्कि  उस काम को संपन्न  करने का पूरा आनंद भी महसूस करते हैं. इसके विपरीत जब आप उसी काम को बेमन से करते हैं, बोझ समझकर करते हैं तो उस कार्य की गुणवत्ता तो दुष्प्रभावित  होती ही है, कार्य पूरा होने के बाद भी आनंद की अनुभूति नहीं होती है. 

कहने का तात्पर्य यह कि अगर पढ़ने बैठे हैं तो मन को सिर्फ पढ़ने में लगाएं. उस एक-दो घंटे के सीटिंग में मोबाइल को साइलेंट मोड में करके दूर रख दें, ध्वनि प्रदूषण सहित अन्य व्यवधानों से बचें और हर तीस मिनट के बाद एक मिनट का ब्रेक लें और आंख बंद कर यह याद करने की कोशिश करें कि इस बीच क्या पढ़ा, क्या उसे अभी आप लिख पायेंगे? लगातार ऐसा अभ्यास करते रहने पर आप खुद ही मन लगाकर पढ़ने में पारंगत होते जायेंगे. अन्य किसी काम में भी आप इस सिद्धांत को अमल में लाकर लगातार अपने परफॉरमेंस को बेहतर करने में सक्षम हो सकते हैं. ऐसे, हमारे संत-महात्मा ध्यान के नियमित अभ्यास से मन को मनाने और नियंत्रित करने का उपदेश तो देते ही रहे हैं. 

सच तो यह है कि मन लगा कर काम करनेवाले विद्यार्थी अच्छे-बुरे हर  परिस्थिति में  अपने काम को एन्जॉय भी करते हैं. लिहाजा वे ज्यादा स्वस्थ एवं खुश भी रहते हैं. काबिलेगौर बात यह भी है कि इस तरह काम करने से कार्यक्षमता बढ़ती है, आत्मविश्वास में इजाफा होता है, समय का पूरा सदुपयोग होता है और साथ ही आप बेहतर परिणाम के हकदार भी बनते हैं.   (hellomilansinha@gmail.com)

                     
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Thursday, August 1, 2019

मोटिवेशन : संयम को अपना दोस्त बनाएं

                                                                 - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर... ....
आप सभी ने क्रिकेट विश्व कप टूर्नामेंट में भारत के साथ अन्य टीमों के कई खिलाड़ियों को कठिन परिस्थितियों  में भी संयमशीलता का प्रमाण प्रस्तुत करते हुए देखा होगा. उन्होंने अपने-अपने  टीम के लिए बहुत उल्लेखनीय योगदान किया. जरा सोचिए, अगर इन खिलाड़ियों ने उन मैचों में उतावलापन दिखाया होता, जल्दबाजी की होती तो शायद वे ऐसी यादगार पारी नहीं खेल पाते. यह महज विश्व कप की बात नहीं है. संयम का मीठा फल हर क्षेत्र में मिलता है. विलियम शेक्सपियर कहते हैं, "वे कितने निर्धन हैं जिनके पास संयम नहीं है." सही बात है. घर-बाहर हर जगह हमें इसका प्रमाण मिलता है. 

'हड़बड़ से गड़बड़', 'जल्दी काम शैतान का' जैसी कहावतें सभी विद्यार्थी सुनते रहते हैं. बड़े-बुजुर्ग हमेशा कहते हैं कि संयम का फल मीठा होता है. पेड़ पर लगे फल को समय पूर्व अर्थात पकने से पहले तोड़ कर खाने पर वह खट्टा व कसैला लगता है. जो लोग संयम रखते हैं और फल को पकने देते हैं, उन्हें ही मीठा फल खाने को मिलता है. विद्यार्थियों के मामले में भी हमें ऐसा ही  देखने को मिलता है. 

विद्यार्थी जीवन में अमूमन हर कोई  उत्साह, उमंग और उर्जा से भरा रहता है. वह कई तरह के सपने देखता है. उसकी विविध इच्छाएं-आकांक्षाएं होती हैं. वह एक साथ बहुत कुछ हासिल करना चाहता है और वह भी फटाफट. इसके लिए वह कुछ भी करने को तैयार रहता है. वाकई करने की कोशिश भी करता है. हां, यह बात और है कि कई बार चाहकर भी कर नहीं पाता है. इसके एकाधिक कारण हो सकते हैं. लेकिन इस सबमें एक बात तो साफ़ है कि चाहने, करने, होने और फल पाने के बीच संकल्प और मेहनत के साथ-साथ संयम की बहुत अहम भूमिका होती है. सोच कर देखिए, अगर कोई किसान यह सोचे कि आज बीज रोपा और कल फसल काट लेंगे, तो क्या यह संभव होगा? उसी तरह अगर कोई विद्यार्थी यह सोचे कि उसकी आज की पढ़ाई या अध्ययन  का फल  कल ही या उनके इच्छानुसार तुरत मिल जाएगा तो यह क्या सही होगा? इस संबंध में प्रकृति के व्यवहार और चरित्र को समझना दिलचस्प तथा ज्ञानवर्धक होगा.

दरअसल, जीवन में संयम का पालन करना कामयाबी की कुंजी है. असंख्य गुणीजनों ने जीवन  में संयम की अनिवार्यता एवं अहमियत को अपने कर्मों से साबित किया है और रेखांकित भी. लिहाजा, विद्यार्थियों के लिए संयम के महत्व को ठीक से समझना और उसे अपने जीवन में अंगीकार करना बहुत ही जरुरी है. सभी  इस बात को मानेंगे कि जोश के साथ होश में रहकर हर कार्य को ठीक से सम्पन्न करने में संयम की अहम भूमिका होती है. संयम से विद्यार्थियों में धीरता, गंभीरता, समझदारी एवं परिपक्वता आती है. इससे  सही निर्णय लेने में वे ज्यादा सक्षम होते जाते है. इसका बहुआयामी फायदा उनके साथ-साथ समाज और देश को भी मिलता है. ऐसे विद्यार्थी पढ़ाई में बेहतर तो होते ही हैं, अन्य कार्यों में भी बेहतर प्रदर्शन करते हैं. इसके विपरीत जो विद्यार्थी जीवन में संयम का महत्व जानते-समझते हुए भी उसे उपयोग में नहीं लाते हैं, उनके जीवन में अनायास ही अनुशासनहीनता, संवेदनहीनता, उदंडता जैसी बुराइयां घर कर लेती हैं, जिसका दुष्परिणाम उनको और देश-समाज को बराबर भुगतना पड़ता है. 

शोध कार्य में लगे विद्वानों-वैज्ञानिकों को जरा गौर से काम करते हुए देखिए तो आपको पाता चलेगा कि संयम का दामन थामकर वे साल-दर-साल तन्मयता से परिश्रम करते रहते हैं, तब कहीं जाकर वे अपने शोध कार्य को पूरा कर पाते हैं. दुनिया में हुए तमाम आविष्कारों का इतिहास अगर हम पढ़ें तो संयम  की महत्ता का प्रमाण स्वतः मिल जाएगा. इलेक्ट्रिक बल्ब के आविष्कारक थॉमस अल्वा एडिसन इसके ज्वलंत उदाहरण हैं. सार्वजनिक जीवन में असाधारण सफलता हासिल करनेवालों के जीवन पर भी नजर डालें, चाहे वे महात्मा गांधी, सुभाष चन्द्र बोस, लालबहादुर शास्त्री, सरदार पटेल, राजेंद्र प्रसाद, जयप्रकाश नारायण, लोहिया, दीनदयाल उपाध्याय या अब्दुल कलाम हों, तो आपको वाणी से लेकर उनके व्यवहार एवं कार्यशैली में यह  गुण अनायास ही दिख जायेंगे. सच है, उन लोगों ने संयम को हमेशा अपना दोस्त बनाए रखा. 
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Friday, July 26, 2019

मल्टी-टास्किंग के दौर में सफलता के सूत्र

                                            - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर... ....
चाहे-अनचाहे आजकल सभी विद्यार्थीयों को कई बार एक साथ कई काम करने होते हैं. इन कार्यों या प्रोजेक्ट्स को  नियत समय सीमा के अन्दर अंजाम तक पहुंचाने की सामान्य अपेक्षा भी होती  है.  ऐसे भी अवसर आते हैं जब वे सारे कार्य इतने महत्वपूर्ण होते हैं और लगते भी हैं कि किसे पहले एवं किसे थोड़ी देर बाद में करें, फैसला करना मुश्किल हो जाता है. सच कहें तो मल्टी-टास्किंग के मौजूदा दौर में कई काम एक साथ करने का प्रेशर तो रहता है, लेकिन कई बार  एक साथ सब काम करना संभव नहीं होता. और -तो -और, ऐसी परिस्थिति में अगर सारे काम एक साथ करने की ठान भी लें, तथापि  सभी काम को सही तरीके से अंजाम तक पहुंचाना कई बार काफी जोखिमभरा भी साबित होता है. 

बहरहाल, सुबह उठने से लेकर रात में सोने से पहले तक सभी विद्यार्थी किसी-न-किसी काम में व्यस्त रहते हैं. पढ़ाई, परीक्षा, प्रतियोगिता और परिणाम के प्रेशर  के बीच  कई  विद्यार्थी सुबह पहले जो भी सरल एवं आसान काम सामने होता है उसे निबटाने में लग जाते हैं. लिहाजा, आवश्यक या महत्वपूर्ण या कठिन और मुश्किल काम या तो बिल्कुल नहीं हो पाता है या शुरू तो होता है, लेकिन एकाधिक कारणों से पूरा  नहीं हो पाता है. इस वजह से अहम काम या तो छूट जाते हैं या अधूरे रह जाते हैं. वे काम अगले दिन के एजेंडा में आ तो जाते हैं, लेकिन आदतन अगले दिन भी ऐसा ही कुछ होता है. इस तरह पढ़ाई हो या अन्य कार्य, छोटे, सरल और गैर-जरुरी काम तो किसी तरह होते रहते हैं, किन्तु महत्वपूर्ण और आवश्यक  कार्यों का अम्बार खड़ा होता रहता है. और तब उन्हें उतने सारे अहम कार्यों को तय सीमा में पूरा करना मुश्किल ही नहीं, असंभव लगने लगता है. इसका बहुआयामी दुष्प्रभाव उनके परफॉरमेंस पर पड़ना लाजिमी है. ऐसी स्थिति में आत्मविश्वास डोलने लगता है; बहानेबाजी और शार्ट-कट का सिलसिला चल पड़ता है. ऐसे में धीरे-धीरे उन्हें अपने  ज्ञान, कौशल एवं क़ाबलियत  पर अविश्वास-सा होने लगता है. उन्हें कठिन कार्यों  से डर और घबराहट होने लगती है. नतीजतन, ऐसे विद्यार्थी खुद को औसत या उससे भी कम क्षमतावान मानने लगते हैं और लोगों की नजर में भी वैसा ही दिखने लगते हैं.

 इसके विपरीत कुछ विद्यार्थी सुबह पहले आवश्यक, महत्वपूर्ण और कठिन काम को यथाशक्ति   अंजाम तक पहुँचाने में लग जाते हैं. वे सभी काम पूरा हो जाने पर उन्हें  संतोष और खुशी दोनों मिलती है. अंदर से एक फील-गुड फीलिंग उत्पन्न होती है जिससे वे  अतिरिक्त उत्साह और उमंग से भर जाते हैं. आत्मविश्वास में इजाफा तो होता ही है. अब वे  बहुत आसानी और तीव्रता से आसान कार्यों को कर लेते हैं. शायद ही उनका कोई जरुरी काम छूटता है. अगले दिन काम करने की उनकी यही शैली होती है. वे चुनौतियों से घबराते  नहीं, बल्कि उनके स्वागत के लिए पूरी तरह तैयार रहते हैं. उनके लिए हर दिन एक नया दिन होता है और हर बड़ी-छोटी चुनौती से सफलतापूर्वक निबटना उनका मकसद.

 कहना न होगा, आज के तेज रफ़्तार कार्य संस्कृति में जब कई बार सबकुछ फटाफट एवं अच्छी तरह करना होता है, तब प्राथमिकता तय करके कार्य करना अनिवार्य होता है. यहां  एलन लेकीन की इस बात पर गौर करना फायदेमंद होगा कि अपनी प्राथमिकताओं की समीक्षा करें और यह सवाल पूछें – हमारे समय का इस वक्त सबसे अच्छा उपयोग क्या है. 

दरअसल, लगातार अच्छी सफलता अर्जित करनेवाले सभी विद्यार्थी प्राथमिकता तय  करके काम करने को कामयाबी तक पहुंचने का एक महत्वपूर्ण सूत्र मानते हैं. लिहाजा, अगर अगले कुछेक घंटे में कई विषयों को पढ़ने  की चुनौती सामने होती है, तो उसमें से पहले कौन-सा पढ़ें और बाद में कौन-सा, अपनी समझदारी से 'प्राथमिकता के सिद्धांत' को लागू करते हुए वे विषयों को अति महत्वपूर्ण, महत्वपूर्ण और कम महत्वपूर्ण  की श्रेणी में रखकर न केवल सभी विषयों को यथासमय निबटाते हैं, बल्कि आगे उसके  परिणाम में बेहतरी भी सुनिश्चित कर पाते हैं. ऐसे विद्यार्थी आवश्यकता के अनुसार प्राथमिकता में थोड़ा -बहुत परिवर्तन के लिए मानसिक रूप  से पूरी तरह तैयार भी रहते हैं. 

बताने की जरुरत नहीं कि स्कूल, कॉलेज या यूनिवर्सिटी के अत्यंत सफल, सफल और कम सफल विद्यार्थियों के बीच एक बड़ा फर्क इस बात का भी होता है.    (hellomilansinha@gmail.com)
                                                                           
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Sunday, July 14, 2019

मोटिवेशन : पढ़ने के साथ खेलना भी जरुरी

                                                    - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर... ....
सम्प्रति इंग्लैंड में आईसीसी क्रिकेट वर्ल्ड कप टूर्नामेंट चल रहा है. कुल दस टीमों - भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, अफगानिस्तान, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, वेस्टइंडीज, साउथ अफ्रीका और इंग्लैंड के बीच 30 मई से प्रारंभ हुए इस क्रिकेट महाकुम्भ का समापन 14 जुलाई को होगा. विश्व के बड़े भूभाग में रहनेवाले लोग,  खासकर  विद्यार्थी  फिलहाल क्रिकेट का भरपूर आनंद ले रहे हैं. विद्यार्थियों के बीच वर्ल्ड कप क्रिकेट ही चर्चा एवं बहस का बड़ा मुद्दा है. सभी मैचों का लाइव टेलीकास्ट हो रहा है. प्रिंट हो या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, सब जगह क्रिकेट वर्ल्ड कप से जुड़ी ख़बरों को प्रधानता दी जा रही है. भारत के नामचीन पूर्व क्रिकेट खिलाड़ी - सचिन, गावस्कर, कपिलदेव, गांगुली, सहवाग, इरफ़ान, हरभजन, लक्ष्मण आदि न केवल क्रिकेट कमेंटरी कर रहे हैं, बल्कि इसी क्रम में क्रिकेट की बारीकियों पर  रोचक एवं जीवंत चर्चा भी कर रहे हैं. इससे क्रिकेट खेलनेवाले विद्यार्थियों को बहुत लाभ मिल रहा है. रोचक बात है कि इस समय ज्यादा बड़ी संख्या में देश के गांव-कस्बे तक में हर उम्र के विद्यार्थियों को क्रिकेट खेलते हुए देखा जा सकता है. हां, कमोबेश ऐसा माहौल सभी खेलों के बड़े आयोजनों के वक्त देखा जाता है, क्यों कि आम छात्र-छात्राओं में स्वभावतः खेलकूद के प्रति लगाव-जुड़ाव होता है. 

देशभर में सभी मनोवैज्ञानिक स्कूल-कॉलेज के विद्यार्थियों को जीवन में सफल होने और स्वस्थ रहने के लिए पढ़ाई के साथ-साथ नियमित रूप से खेलकूद में सक्रिय रूप से भाग  लेने का सुझाव देते हैं. ऐसा इस सच्चाई के मद्देनजर और भी जरुरी हो गया है कि हमारे देश में भी आजकल बहुत सारे  विद्यार्थी टाइम पास के रूप में या मनोरंजन के लिए कंप्यूटर या मोबाइल गेम में घंटों व्यस्त पाए जाते हैं. कई शोधों में इसे शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक पाया गया है. स्वास्थ्य विशेषज्ञ तो मानते हैं कि यह आदत विद्यार्थियों को कई  रोगों से ग्रसित कर रहा  है. इसी कारण वे अभिभावकों को बचपन से ही अपने बच्चों को इससे बचाने की सलाह  देते हैं. 

बहरहाल, ख़ुशी की बात है कि पहले की अपेक्षा अब केंद्र सरकार एवं ज्यादातर राज्य सरकारें खेलकूद को बढ़ावा तथा प्रोत्साहन देने के लिए कई सकारात्मक कदम उठा रही है. नतीजतन, स्कूल-कॉलेज -यूनिवर्सिटी में भी आउटडोर -इंडोर सभी खेलों का अपेक्षाकृत ज्यादा आयोजन हो रहा है और विद्यार्थियों की भागीदारी भी बढ़ रही है. लड़कियां भी अब ज्यादा संख्या में खेलकूद में भाग ले  रही हैं और राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में अच्छा प्रदर्शन कर पदक भी जीत रही हैं. लेकिन विश्व के सबसे बड़े युवा आबादीवाले हमारे देश के लिए इस दिशा में अभी बहुत काम करने की जरुरत है. खेलकूद को विद्यार्थियों के जीवन का अहम हिस्सा बनाना आवश्यक है. 

विविधताओं से भरे हमारे देश में राष्ट्र को एक सूत्र में बांध कर रखने में खेलकूद की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण है. सच कहें तो भाषा, धर्म, क्षेत्र एवं जाति से परे खेल के मैदान में देश की एकता का हमें हर बार पुख्ता प्रमाण मिलता है.  यह भी सब लोग अच्छी तरह जानते-समझते हैं कि खेलकूद का हमारे बच्चों और युवाओं के सर्वांगीण विकास में कितना सकारात्मक योगदान रहता है. स्कूल-कॉलेज के मैदान या अन्य किसी मैदान या खाली स्थान पर कबड्डी, फुटबॉल, हॉकी, क्रिकेट, वॉलीबॉल, बास्केटबॉल आदि खेल में सुबह या शाम के समय का उपयोग एकाधिक मायनों में विद्यार्थियों के लिए फायदेमंद होता है. खेलने से शरीर में रक्त संचार तीव्र होता है, सारे अंग सक्रिय हो जाते हैं, आलस्य दूर होता है, बुद्धि कुशाग्र होती है  और विद्यार्थी रचनात्मकता व उत्साह से भर जाता है. एक बार बाहर खेलने में जो आनंद  मिलता है, उसकी आदत जब लग जाती है तब विद्यार्थी घर बैठे विडियो गेम आदि में अपना समय बर्बाद नहीं करते हैं. रोज कुछ अच्छा सीखने-सीखाने का सिलसिला भी चल पड़ता है. सामाजिक जुड़ाव एवं सदभाव भी बढ़ता है.

जाहिर-सी बात है कि योजना, कार्यन्वयन, समय प्रबंधन, टीम वर्क, आत्मविश्वास, समावेशी  सोच सरीखे महत्वपूर्ण लीडरशिप क्वालिटी विकसित करने का स्वर्णिम अवसर विद्यार्थियों को  खेल  के मैदान में अनायास ही मिल जाता है. उनको शारीरिक और मानसिक तौर पर स्वस्थ बनाए रखने के अलावे नैतिक, बौद्धिक और भावनात्मक रूप से मजबूत एवं परिपक्व बनाने में स्पोर्ट्स का कोई जोड़ नहीं.  इसके अलावा यदि आपमें किसी खेल को लेकर जुनून है तो उसे भी निखरने का मंच मिल जाता है.                 (hellomilansinha@gmail.com) 

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Tuesday, July 9, 2019

मोटिवेशन : निराशा व अवसाद को कहें बाय-बाय

                                                                      - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर...
हाल ही में एक रिपोर्ट में यह बताया गया कि हमारे स्कूल-कॉलेज के अनेक  विद्यार्थियों में पढ़ाई  के प्रेशर, घरवालों की उनसे परीक्षा में अच्छे परिणाम की अपेक्षा और खुद उनका अपने रिजल्ट के प्रति आशंकित रहना निराशा और अवसाद का कारण बनता है.  कई मामलों में यह भी पाया गया है कि कुछ  विद्यार्थी  येन-केन-प्रकारेण अच्छा ग्रेड या अंक पाने और दूसरे से ज्यादा कामयाब होने के दौड़ और होड़ में जाने-अनजाने शामिल हो जाते हैं. ऐसे में, अपेक्षित परिणाम न आने पर उनका कन्फयूजन बढ़ना और परेशान हो जाना स्वाभाविक है. गौर करनेवाली  बात है कि वे इस विषय पर जितना सोचते हैं, उतना ही उलझते चले जाते हैं. वे अपनी स्थिति को अभिभावकों से साझा करने से भी कतराते हैं. परिणाम स्वरुप कई बार स्थिति चिंताजनक हो जाती है. 

यह सच है कि फ़ास्ट लाइफ और टफ कम्पटीशन के मौजूदा दौर में आम तौर पर निराशा का भाव देश के अनेक छात्र-छात्राओं  के मन–मानस को उलझाए रखता है.  कई विद्यार्थी तो अनिश्चितता और आशंका से ज्यादा कुशंका से जूझते रहते हैं. इससे उनकी सेहत तो खराब होती ही है, वे घर-बाहर कहीं भी चैन व सुकून से कार्य निष्पादित नहीं कर पाते, जिसका स्पष्ट असर उनकी उत्पादकता पर पड़ता है. आरोप लगना शुरू हो जाता है, तंज कसे जाते हैं, कभी-कभार डांट भी पड़ती है. मन और बैचैन हो जाता है. निराशा का भाव और गहराता है. कठिनाई समस्या बनने लगती है. अवसाद के आगोश में जाने की यह प्रारंभिक अवस्था होती है. लिहाजा इससे बचना निहायत जरुरी है. और इसके लिए उम्मीद का दामन थामना श्रेयष्कर साबित होता है. मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने क्या खूब कहा है कि हमें सीमित निराशा को स्वीकार तो करना चाहिए, परन्तु अनंत उम्मीदों का साथ नहीं छोड़ना चाहिए. 

मेरे एक मित्र हैं. निराशा के पल में वे बचपन में पढ़ी प्रख्यात कवि मैथिलीशरण गुप्त की यह कविता एक बार गुनगुना लेते हैं. कहते हैं, इससे उन्हें प्रेरणा मिलती है, उनमें आशा का संचार होता है. कविता की पंक्ति है : नर हो न निराश करो मन को, कुछ काम करो, कुछ काम करो, जग में रहकर कुछ नाम करो ... ....

मनोवैज्ञानिक मानते और कहते हैं कि स्वस्थ एवं प्रसन्न रहने के लिए जीवन में उम्मीद का साथ होना आवश्यक है. हमारे देश के अनेकानेक ऋषि –मुनि तो इस विषय पर अपने अमूल्य विचारों एवं व्याख्यानों के माध्यम से असंख्य लोगों को विंदास जीने को प्रेरित करते रहे हैं. 

विचारणीय प्रश्न यह भी है कि तमाम कोशिशों के बावजूद अगर आप किसी कारण असफल हो भी जाते हैं तो आपके सिर पर आसमान टूट कर तो गिरनेवाला नहीं. अलबत्ता कुछ नुकसान होगा. हां, विश्लेषण करने पर कई बार आप पाते हैं कि आपके प्रयास में कमियां रह गई थी. ऐसे समय सबसे बेहतर होता है, जल्दी-से-जल्दी उसे मन से स्वीकार करना और अपनी कोशिशों में अपेक्षित सुधार लाना. एप्पल कंपनी के संस्थापक स्टीव जाब्स इस बात पर अमल करने में विश्वास करते थे. 

एक बात और. जीवन से बड़ा कुछ भी नहीं. फिर जीवन में आगे और भी मंजिलें तय करनी बाकी है. जरा सोचिए अमेरिका के सोलहवें राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन के जीवन यात्रा के विषय में. एक-के-बाद-एक विफलताओं के बाद भी उम्मीद और सत्प्रयासों के बलबूते वे अमेरिका के सर्वोच्च पद पर आसीन हुए और अमेरिका के गृह युद्ध (अमेरिकन सिविल वार) के कठिनतम  समय में देश का सफल नेतृत्व किया, देश में शान्ति स्थापित की. अमेरिका की पहली बधिर एवं नेत्रहीन कला स्नातक एवं प्रख्यात लेखिका हेलेन केलर हो या विश्वप्रसिद्ध ब्रिटिश भौतिक विज्ञानी स्टीफन विलियम हाकिंग या उनके जैसे अन्य अनेक दिव्यांग विभूति, सबने आशा को हमेशा अपना अभिन्न मित्र बना कर रखा और जीवन में अभूतपूर्व सफलता पाई. यहां यह जानना दिलचस्प तथा प्रेरणादायी है कि एक बार जब किसी ने स्वामी विवेकानन्द से पूछा कि 'सब कुछ खोने से ज्यादा बुरा क्या है' तो स्वामीजी ने उत्तर दिया कि 'उस समय उस उम्मीद को खो देना, जिसके भरोसे पर हम सब कुछ वापस पा सकते हैं.'  सच कहें तो  अपने आसपास देखने पर भी आपको कई लोग मिल जायेंगे जो इस जीवन दर्शन पर अमल करके अपने-अपने कार्यक्षेत्र में उन्नति के नये-नए कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं.       (hellomilansinha@gmail.com) 

               और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं
   
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Monday, July 1, 2019

मोटिवेशन : बेहतर क्षमता प्रबंधन से सफलता

                                                                       - मिलन सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर ...
     हमारे विद्यालय-महाविद्यालय -विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों से मुलाक़ात के क्रम में मैंने यह  पाया   है कि उनमें अपेक्षित संभावना एवं क्षमता की कमी नहीं है. मेधा और मेहनत में भी वे पीछे नहीं हैं. सभी जानते हैं कि उत्साह, उमंग और उर्जा भी व्यक्ति के  सोच और शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य पर निर्भर करता है. आम विद्यार्थियों की संभावना को परफॉरमेंस  में तब्दील करने की स्वभाविक चाहत से भी हम वाकिफ हैं. इसके बावजूद सभी विद्यार्थी अपने मुकाम को हासिल नहीं कर पाते हैं. इसके कई कारण हो सकते हैं. क्षमता प्रबंधन इनमें से एक बड़ा कारण है. इसे एकाधिक ज्वलंत उदाहरण के मार्फत सरलता से समझने की कोशिश करते हैं. 

हाल ही में संपन्न विवो आईपीएल क्रिकेट टूर्नामेंट के दौरान  आंद्रे रसेल, महेन्द्र सिंह धोनी, क्रिस गेल, हार्दिक पंड्या  जैसे कई खिलाड़ियों ने अपने-अपने क्षमता प्रबंधन का शानदार प्रदर्शन करते हुए अपनी टीम को अप्रत्याशित जीत दिलाई. आरसीबी (रॉयल चैलेंजर बंगलोर) टीम के खिलाफ केकेआर (कोलकता नाईटराइडर्स) की ओर से खेलते हुए एक मैच में रसेल ने मात्र तेरह बॉल पर सात छक्का और एक चौके के साथ नाबाद 48 रनों की बदौलत अत्यंत आश्चर्यजनक तरीके से अपनी टीम को विजय दिलाई. सीएसके (चेन्नई सुपर किंग्स) कप्तान धोनी ने राजस्थान रॉयल्स के खिलाफ एक मैच में कुछ ऐसा ही प्रदर्शन कर अपनी टीम को विजयी बनाया. बल्लेबाज के रूप में कब किस बॉल को किस तरह खेलना है जिससे कि अपने विकेट को बचाते हुए मात्र 20 ओवर के मैच में कम से कम गेंदों पर ज्यादा से ज्यादा रन बटोरते हुए विपक्षी टीम के खिलाफ जीत हासिल करें, यही उस खिलाड़ी की उच्च क्षमता प्रबंधन को रेखांकित करता है. उसी प्रकार एक बॉलर अपनी गेंदबाजी के दौरान बल्लेबाज विशेष के बैटिंग स्टाइल, फील्ड सेटिंग, पिच की स्थिति आदि को घ्यान में रखकर जब इंटेलीजेंटली गेंदबाजी करता है तो बल्लेबाज या तो जल्दी आउट हो जाता है या बहुत कम रन बना पाता है. ऐसे सभी खिलाड़ी विपरीत परिस्थिति में भी अपनी  क्षमता का समुचित उपयोग करना जानते हैं और कदाचित ही अपनी क्षमता को जाया होने देते हैं. 

एक बेमिसाल उदाहरण और. हाल ही में जिस एक शख्स की देश के कोने-कोने में खूब चर्चा हुई उसे आप सब अच्छी तरह जानते हैं. हां, मैं वायुवीर  विंग कमांडर अभिनन्दन वर्धमान की बात  कर रहा हूँ. आज अभिनन्दन सभी भारतीयों, खासकर विद्यार्थियों और युवाओं के सुपर हीरो हैं. हो भी क्यों नहीं. उन्होंने देश के सामने जिस धैर्य, संकल्प, संतुलन, वीरता और पराक्रम की मिसाल पेश की है उसका गुणगान स्वाभाविक रूप से सब ओर हो रहा है.  35 वर्षीय इस जाबांज वायुसेना अधिकारी, जो मिग-21 बाइसन जेट उड़ा रहे थे, ने पाकिस्तानी वायुसेना में शामिल अमेरिका में निर्मित आधुनिक एफ-16 में सवार पाक एयर पायलटों के नापाक इरादों को ध्वस्त कर दिया. उनके इस बेमिसाल कार्य से दुश्मन के हौसले पस्त हो गए. 

पूरे प्रकरण में काबिले गौर बात यह रही कि बेहद चुनौतीपूर्ण एवं बाद में बहुत विपरीत परिस्थिति में भी अभिनंदन ने यथोचित निर्णय  लिए और उसे बड़ी कुशलता से कार्यान्वित भी किया. दुर्घटनाग्रस्त मिग -21 से सफलतापूर्वक पैराशूट द्वारा दुर्भाग्यवश सीमा पार पाक इलाके  में उतरने के बाद स्थानीय उग्र भीड़ से खुद को बचाते हुए देश की  सुरक्षा से जुड़े गोपनीय दस्तावेजों को नियोजित ढंग से नष्ट करने में उन्होंने शारीरिक एवं मानसिक दोनों स्तर पर अपनी क्षमता प्रबंधन की उच्चतम मिसाल पेश की.  दुश्मन सेना द्वारा कब्जे में  लिए  जाने के बाद भी उनका आचरण बेहद संतुलित, संयमित और मर्यादित रहा और वे शूरवीर की तरह स्वदेश भी लौटे. 

उपर्युक्त कुछ उदाहरणों से यह बात साफ़ तौर पर उभर कर आती है कि जीवन में अपनी क्षमता पर विश्वास करना और उसे उत्तरोत्तर विकसित करना जितना जरुरी है, उतना ही जरुरी है उसका प्रबंधन. कहते हैं न कि लोहा जब गरम हो तभी चोट करना फायदेमंद होता है. उसी तरह प्रतियोगिता परीक्षा हो या हो खेल का मैदान, अगर "हम कौन-सा बॉल खेलें, कौन-सा बॉल छोड़ें" के तर्ज पर जीवन की छोटी-बड़ी परीक्षाओं में अपनी क्षमता का प्रबंधन करते हुए तदनुरूप प्रदर्शन कर सकें तो कोई भी जीत हमसे दूर नहीं जा सकती है. सार-संक्षेप यह कि हरेक विद्यार्थी के जीवन में उतार-चढ़ाव आता है -कम या ज्यादा. सफलता-असफलता  से भी वे सब रूबरू होते रहते हैं. लेकिन अगर वे बीच-बीच में अपनी क्षमता प्रबंधन की खुद ही गहरी समीक्षा करते हैं और अपनी कमियों में सुधार लाकर आगे बेहतर क्षमता प्रबंधन करते हैं, तो वे भी बेहतर उपलब्धि के हकदार बनते रहेंगे.             (hellomilansinha@gmail.com)
                                                                           
             और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं
   
 # लोकप्रिय साप्ताहिक "युगवार्ता" के 16.06.2019 अंक में प्रकाशित
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