Tuesday, March 12, 2019

मोटिवेशन : सफलता के लिए नियमितता जरुरी

                                                                       - मिलन सिन्हा, मोटिवेशनल स्पीकर, ... ...
कहते हैं कि जोश के साथ होश भी हो और अच्छे काम की अच्छी शुरुआत के साथ उसकी गतिशीलता बनी रहे तो परिणाम बेहतर होने की संभावना से कोई इनकार नहीं कर सकता. परीक्षा से पहले अमूमन सभी विद्यार्थी के पढ़ने की अवधि और नियमितता में सुधार दिखाई पड़ता है. इसका लाभ परीक्षाफल में भी दिखाई पड़ता है. लेकिन परीक्षा ख़त्म होने के बाद ( एक-दो दिन के रिलैक्सेशन को छोड़ दें तब भी ) अधिकांश विद्यार्थी क्या करते  हैं? क्या वे उतने ही घंटे की पढ़ाई नियमित रूप से जारी रखते हैं? यह एक विचारणीय विषय है. 

सभी विद्यार्थी के जीवन में एक परीक्षा ख़त्म होती है तो देर-सबेर आगे दूसरी कोई परीक्षा इन्तजार करती है. हर दिन एक नया दिन होता है. उस दिन को सार्थक तरीके से जीना हर मायने में अच्छा होता है. जो लोग कुछ करते रहते हैं और नियमित रूप से करते रहते हैं, बेशक सकारात्मक सोच और तरीके से, उनकी प्रगति  यात्रा बदस्तूर जारी रहती है. इस मामले में प्रकृति के मूल चरित्र पर थोड़ा गौर करें तो आसानी से बहुत कुछ सीखने को मिलता है.     

सामान्यतः यह पाया गया है कि स्कूल-कॉलेज की सालाना परीक्षा समाप्त होने के बाद  विद्यार्थी अपनी किताबों को उठाकर रख देते हैं, जैसे कि अब उन किताबों से कोई सरोकार ही नहीं. जब कि परीक्षा के दौरान और उससे पहले भी बहुत कम विद्यार्थी ही कोर्स के सभी विषयों के सभी चैप्टर को ठीक से समझ कर पढ़ पाते हैं. ऐसे में अगर परीक्षा के बाद उपलब्ध समय को उस अधूरे ज्ञान को पूर्ण करने में लगा दें तो शायद रिजल्ट आने से पहले ज्ञान के मामले में आप बहुत बेहतर स्थिति में रहेंगे, अलबत्ता आपका रिजल्ट कैसा भी हो.  सभी जानते हैं कि सही ज्ञान से ही सही सम्मान मिलता है, आत्मविश्वास में यथोचित उछाल आता है, सो अलग. एक बात और. इस दौरान अगर कुछ समय अगले क्लास या जिस प्रतियोगिता परीक्षा में शामिल होने की योजना है, उससे संबंधित सिलेबस का अवलोकन कर सकें, कुछ पढ़-समझ सकें तो उसका फायदा आपको ही मिलेगा और समय का सदुपयोग भी होगा. ऐसे भी कहा गया है कि खाली दिमाग शैतान का घर और सकारात्मक व गतिशील दिमाग प्रगति का द्योतक.  

इस विषय का एक और पहलू भी है. उदाहरण के तौर पर दसवीं एवं बारहवीं की परीक्षा को ही लें तो इसमें  विद्यार्थी एक निर्धारित पाठ्यक्रम पर आधारित सवालों का उत्तर देते हैं. अर्थात अधिक-से-अधिक उन्हें उनके सिलेबस में शामिल विषयों का अध्ययन करना पड़ता है. हर बढ़ते क्लास के लिए पाठ्यक्रम थोड़ा भिन्न और उच्च स्तर का होता जाता है और विद्यार्थी उसी अनुरूप खुद को तैयार कर नयी चुनौती का सामना करते हैं. आगे इंजीनियरिंग, मेडिकल या अन्य प्रतियोगिता परीक्षा में पाठ्यक्रम का यह दायरा विस्तारित हो जाता है. यहां सिर्फ उत्तीर्ण होने या अच्छा ग्रेड हासिल करने की बात नहीं होती, बल्कि इतना बेहतर करने की कठिन चुनौती होती है जिससे कि अंततः लाखों प्रतियोगियों में से चुनिन्दा सफल लोगों की सूची में अपना स्थान सुनिश्चित कर सकें. ऐसे में, तैयारी का दायरा बढ़ जाता है और उसकी शैली भी. इसलिए पढ़ने और सीखने के क्रम को जारी रखना बहुत जरुरी होता है. यानी आगे की परीक्षा में बेहतर करने के लिए नियमितता अनिवार्य है - पढ़ने और सीखने के मामले में. 

यहां इस बात को रेखांकित करना भी प्रासंगिक होगा कि कई विद्यार्थी कई बार किसी अच्छे कार्य को  पूरे उत्साह और उल्लास  के साथ शुरू तो करते हैं, लेकिन उन्हें नियमित व योजनानुसार आगे बढ़ाने से चूकते रहते है. सो, उस  कार्य की रफ्तार धीमी हो जाती है और अंततः वह कार्य रुक जाता है या अर्थहीन हो जाता है. परिणामस्वरूप,  एक तो वे  उस अच्छे कार्य को तार्किक परिणिति तक नहीं पहुंचा पाते और उसके फल का उपभोग नहीं कर पाते, बावजूद इसके कि उन्होंने  अपनी ऊर्जा और समय उस कार्य में लगाया है, दूसरे अगला कोई नया काम शुरू करने में उनको डर और शंका शुरू से ही घेरने लगती है.  

जानकार कहते हैं कि अगर किसी भी कार्य को समुचित ढंग से प्रारंभ करके आप अपनी दिनचर्या तथा दैनिक कार्य योजना में शामिल कर लेते हैं और उसे अगले साठ से नब्बे दिनों तक नियमित रूप से जारी रखते हैं तो आगे वह स्वतः चलता रहता है और एक समयावधि के बाद उसके अच्छे फल का आप  भरपूर आनंद उठाते हैं. अपने आसपास देखने पर भी आपको कई ऐसे साथी-सहपाठी मिल जायेंगे जो नियम और निष्ठापूर्वक इस सिद्धांत को अमल में लाकर सफलता और आनंद के हकदार बनते रहे हैं. 
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Saturday, February 23, 2019

मोटिवेशन : खुद से प्रतिस्पर्धा करें !

                                                                    - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर...
हाल ही में 'परीक्षा पर चर्चा' कार्यक्रम में प्रधानमन्त्री ने करीब दो हजार विद्यार्थियों, शिक्षक-शिक्षिकाओं  एवं अभिभावकों से करीब दो घंटे तक रूबरू बातचीत की. करोड़ों विद्यार्थियों ने इस कार्यक्रम  को टीवी और रेडियो पर देखा और सुना. उस दौरान प्रधानमंत्री ने अपने नायाब अंदाज में परीक्षा के प्रति उनका दृष्टिकोण, आम माता-पिता एवं शिक्षकों का व्यवहार, बच्चों की अपेक्षाएं, तनाव-अवसाद, सफलता-असफलता, डिजिटल क्रांति आदि अनेक विषयों पर खुलकर बात की और अपने विचार साझा किए. इसी क्रम में उन्होंने विद्यार्थियों से कहा, "दूसरों के साथ प्रतिस्पर्धा मत कीजिए, बल्कि खुद के साथ अनुस्पर्धा कीजिए."

बिलकुल सही है. ऐसा इसलिए कि किसी स्वस्थ प्रतिस्पर्धा में भी व्यक्ति मूलतः अपनी क्षमताओं का यथोचित उपयोग करने के बजाय बस अपने प्रतिस्पर्धी से आगे रहने की मंशा से कार्य करता है. इस प्रक्रिया में कई बार लोग यह तक भूल जाते हैं कि इस प्रतिस्पर्धा में आगे रहकर वे वस्तुतः क्या पाना चाहते हैं या पाते भी हैं. 

हमारे देश में भी हर वर्ष अनेक विद्यार्थी तनाव और अवसाद के  शिकार हो जाते हैं और एक बड़ी संख्या तो परीक्षा और उसके रिजल्ट के समय जीवन से हारकर मौत को गले लगा लेते हैं, जब कि वे भी भलीभांति जानते हैं कि उनका जन्म जीने के लिए हुआ है, इस तरह  अप्राकृतिक मौत को अंगीकार करने के लिए नहीं.

सभी जानते हैं कि प्रतिस्पर्धा किसी दूसरे से ही की जाती है. आमतौर पर विद्यार्थी अपने साथी -सह्पाठी से प्रतिस्पर्धा करते हैं. उनसे आगे बढ़ने पर अपना सारा ध्यान लगा देता है, अलबत्ता यह आगे बढ़ना कितना छोटा ही क्यों न हो. उसका सहपाठी भी वैसा ही करता है. गौर करनेवाली बात है कि इस प्रतिस्पर्धा के कारण उनके बीच संवाद में खुलापन और सरलता दुष्प्रभावित होने लगती है,  वे एक दूसरे से कई अहम बातें छुपाने लगते हैं, झूठ बोलते हैं और कई लोग तो मित्र से दुश्मन तक बन जाते हैं. कई बार तो यह प्रतिस्पर्धा इतना गलाकाट हो जाती है कि उनके लिए इसे सह पाना मुश्किल हो जाता है. इस सबके कारण उनको समय,उर्जा और एकाग्रता की क्षति उठानी पड़ती है. मानसिक उलझन एवं तनाव में वृद्धि होती है, सो अलग. 

चाहे कोई भी वजह हो या कोई भी इच्छा हो, इसके दवाब में आप प्रतिस्पर्धा के दौड़ में शामिल हो जाते हैं और फिर जायज-नाजायज किसी भी तरीके से जीत हासिल करना चाहते हैं, जब कि आप स्वयं जानते हैं कि प्राप्त जीत से कहीं बड़ी जीत हासिल करने की क्षमता आपमें है और वह भी सही तरीके से. लेकिन प्रतिस्पर्धा के दवाब में आप उतनी सी जीत से ही तात्कालिक रूप से खुद को विजयी मानने की गलती कर बैठते हैं. विचारणीय सवाल है कि कहीं आप इस प्रकार के रेस में फंसकर अपनी स्वभाविक क्षमता धीरे-धीरे कम तो नहीं करते जाते हैं, क्यों कि  इसका सीधा असर आपके आत्मविश्वास और उत्साह पर पड़ना लाजिमी है? 

इसके विपरीत अगर आप अनुस्पर्धा के मार्ग पर चल पड़ें तो आप खुद में छिपी असीम क्षमता के अनुरूप अपने प्रदर्शन को दिन-पर-दिन उन्नत करने को सचेष्ट हो जायेंगे और कालान्तर में आप सफलता की उन ऊँचाइयों पर पहुंचने में सक्षम होंगें जो आपको पहले नामुमकिन और दुरुह लगता था. ऐसा इसलिए कि आपके स्ट्रांग पॉइंट्स, आपकी कमजोरियों, आपके सामने उपलब्ध संभावनाओं और आपके सम्मुख उपस्थित होनेवाले जोखिमों के विषय में आपसे बेहतर कोई और शायद ही जान सकता है और उसका विश्लेषण कर सकता है.

अब अगर उक्त परिप्रेक्ष्य में आप सदैव अपने परफॉरमेंस को बीते हुए कल से बेहतर बनाने का संकल्प ले लें और फिर खुद को उस कसौटी पर कसते हुए यथोचित परिश्रम और लगन से आगे बढ़ते रहें, तो कोई कारण नहीं आप किसी से भी अच्छा मुकाम हासिल न कर पायें. ओलिंपिक खेलों  में अबतक सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करनेवालों में शामिल उक्रेन के सर्गेई बुबका और जमैका के उसैन बोल्ट ने इसको बखूबी साबित किया है. जीवन के हर क्षेत्र में ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं.  

सार संक्षेप यह कि आप दूसरों से स्पर्धा करने के बजाय स्वयं से स्पर्धा करने का संकल्प लीजिए और ऐसा करने की आदत डालिए. अपनी अच्छाइयों को पहचान कर उसमें निरंतर सुधार  सुनिश्चित करें. साथ-ही-साथ अपनी कमजोरियों को भी पहचान कर उसे कम करने और अंततः ख़त्म करने की पूरी कोशिश करें. एक आदत के रूप में रोज कुछ अच्छा और बेहतर जानें, सीखें और अमल में लाएं. नियमित रूप से किसी-न-किसी महान व्यक्ति की आत्मकथा या जीवनवृत पढ़ें. इससे आपका यह मत सुदृढ़ होता जायगा कि अनुस्पर्धा के मार्ग पर चलते हुए किस तरह ऐसे लोगों ने खुद को सतत उन्नत करते हुए असंभव को भी संभव कर दिया. खुद हमारे प्रधानमंत्री इसका ज्वलंत उदाहरण हैं.                 (hellomilansinha@gmail.com) 
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Tuesday, February 12, 2019

मोटिवेशन : समय प्रबंधन से मिलेंगे अच्छे अंक

                                                                            - मिलन  सिन्हामोटिवेशनल स्पीकर...
स्कूल-कॉलेज के छात्र-छात्राओं को मोटिवेट करने के क्रम में मैं "3 आर" को ठीक से साधने की बात करता रहा हूँ. यहाँ "3 आर" का मतलब रीडिंग, रिटेंशन और रिप्रोडक्शन से है. आम तौर पर यह पाया गया है कि पढ़ने, दिमाग में रख पाने तथा इम्तिहान में उसका उपयोग करने का अनुपात यानी  "3 आर"  का अनुपात 10 : 6 : 3 रहता है. इसका मतलब यह हुआ कि आपने 10 पेज पढ़ा, 6 पेज दिमाग में अंकित हुआ और मात्र 3 पेज के बराबर परीक्षा में लिख पाए. इसमें भी तारतम्य की गड़बड़ी रहती है सो अलग. यह कहने की जरुरत नहीं कि अच्छे विद्यार्थी का यह अनुपात यकीनन बेहतर होता है और तारतम्य भी. तो अब सवाल उठता है कि "3 आर" अनुपात को अच्छे ढंग से साधने के लिए वास्तव में क्या करना चाहिए?

पहले तो तन्मयता से पढ़ने की आदत डालनी चाहिए. तन्मयता से पढ़ने का मतलब यह है कि आप जब पढ़ने बैठते हैं, उस समय पूरे मनोयोग से आप उस चैप्टर को पढ़ें. पढ़ते वक्त आपका ध्यान आप जो पढ़ रहे हैं, मुख्यतः उसपर रहे. कोई भी दूसरा काम आपके ध्यान को बाधित नहीं कर पाए. कहने का अभिप्राय यह कि महाभारत में वर्णित श्रेष्ठ धनुर्धर पांडव पुत्र अर्जुन की तरह एकाग्रचित्त हो कर कार्य करें. अगर दो घंटे लगातार पढ़ने का मन बनाकर बैठते हैं तो उन दो घंटों में मोबाइल को साइलेंट मोड में कर लें और उसे पढ़ाई के टेबल से दूर रखें. ऐसे ही दूसरे अवरोधों से बचें. पढ़ने के लिए सुबह का समय कई कारणों से बेहतर माना जाता है. देखा गया है कि शाम तक जो विद्यार्थी दिनभर के लिए निर्धारित पढ़ाई कर लेते हैं, उन्हें रात में नींद भी अच्छी आती है. कारण सोने से पहले वे तनावमुक्त रहते हैं. इसके विपरीत दिनभर दूसरे क्रियाकलाप में व्यस्त रहनेवाले विद्यार्थी के लिए देर रात तक पढ़ने का प्रेशर रहता है, जब कि दिनभर के कार्य से शरीर थका रहता है और आराम खोजता है. ऐसे विद्यार्थियों के अस्वस्थ होने की संभावना भी ज्यादा रहती है. इसके अलावे एक और बात का ध्यान रखना लाभदायक होता है. शोरगुलवाले स्थान से अलग शांत माहौल में पढ़ने से एकाग्रता में खलल नहीं पड़ता है, फलतः चीजों को समझना और याद रखना आसान होता है. इस तरह एक बार विषय पर फोकस करके पढ़ने की आदत हो जाती है तो फिर आगे उसे जारी रखना आसान भी होता जाता है. 

पढ़ी हुई बातों को दिमाग में संजो कर रखने का अर्थ है कि वे बातें आपके दिमागी हार्ड डिस्क में ठीक से अंकित हो जाय. इसके लिए अपने दिमाग को उन बातों के स्वागत के लिए तैयार करने की जरुरत होती है. पढ़ी हुई बातों को दिमाग में अच्छी तरह सहेज कर रखना बहुत फलदायी साबित होता है. इससे जब भी जरुरत हो वह हमारे दिमागी स्क्रीन पर तुरत दिखने लगता है. कहते हैं "प्रैक्टिस मेकस ए मैन परफेक्ट" अर्थात अभ्यास आदमी को पूर्णता प्रदान करता है. जिन चीजों को तन्मयता से एक बार समझ पढ़ा-समझा, उसे छोटे-छोटे अंतराल में अगर फिर पढ़ और समझ लिया जाय, बिना देखे फिर उसको लिखने का अभ्यास कर लें, किसी दूसरे को वही बातें बता दें, पढ़ा दें, सिखा दें, तो यकीन मानिए आपके दिमाग में वह दृढ़ता से अंकित हो जाता है. कविवर वृंद ने सही कहा  है कि "करत-करत अभ्यास ते जड़मति होत सुजान, रसरी आवत जात ते सिल पर परत निसान." लिखने के सतत अभ्यास से आपको यह भी पता चल जाता है कि एक प्रश्न का उत्तर लिखने में कितना समय लगता है, जिससे कि परीक्षा के समय सब कुछ बेहतर ढंग से संपन्न हो सके. 

अब बात करते हैं किसी भी परीक्षा में अपेक्षानुसार या तैयारी के अनुरूप परफॉर्म करने की यानी पढ़ी और समझी हुई बातों की बुनियाद पर प्रश्नों का उत्तर लिखने की. इसके लिए पहले तो आपको शारीरिक एवं मानसिक रूप से संयत, संतुलित और शांत रहने की आवश्यकता होगी. अंतिम समय में पढ़कर या रटकर कुछ बेहतर हासिल करने की कवायद इच्छित फल नहीं देता है. इसके उलट ज्यादातर मामलों में आपका कनफूजन बढ़ जाता और साथ में उत्तेजना भी. परिणामस्वरूप, पहले जो कुछ अच्छे से पढ़ा है, उसे भी याद रखना मुश्किल लगने लगता है. फिर तो परीक्षा हॉल में नियत समय में सारे प्रश्नों का उत्तर देना नामुमकिन हो जाता है, जब कि प्रश्नों का उत्तर आपको मालूम होता है. इसलिए हर विषय की परीक्षा से पहली रात को जल्दी सो जाएं, 10 बजे से 11 बजे के बीच. सबेरे उठकर कर सामान्य दिनचर्या पर अमल करें. परीक्षा सेंटर पर समय से थोड़ा पहले पहुंचें. प्रश्नपत्र मिलने पर सभी प्रश्नों को पहले अच्छी तरह पढ़ें और हर प्रश्न के उत्तर पर कितने अंक मिलेंगे उस पर ध्यान देकर समय प्रबंधन की रुपरेखा बना लें. इसमें सभी प्रश्नों का जवाब लिखने के बाद अंत में 10-15 मिनट का समय रिवीजन के लिए रखें. अब उन सवालों को हल करते चलें जिन्हें कम समय में कर सकते हैं. जैसे-जैसे आप सवाल हल करते जायेंगे, आपका आत्मविश्वास बेहतर होता जाएगा और साथ में आपका दिमागी कंप्यूटर ज्यादा प्रभावी ढंग से काम भी करने लगेगा. रिप्रोडक्शन प्रक्रिया बेहतर होगी और अंतिम परिणाम भी. 
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Tuesday, February 5, 2019

मोटिवेशन : प्लान करके चलें, सपनों को साकार करें

                                                                     - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर...
स्कूल, कॉलेज और  यूनिवर्सिटी में आपने भी शिक्षकों को यह कहते सुना होगा कि बेहतर परिणाम पाना चाहते हैं तो प्लान करके चलें. यही बात कॉरपोरेट जगत में बॉस और विशेषज्ञों भी कहते पाए जाते हैं. किसी खास समय जैसे कि इम्तिहान के वक्त हर विद्यार्थी आम दिनों से कुछ ज्यादा प्लान करके चलता है. बुद्धिमान और अच्छा रिजल्ट करनेवाले तो सामान्य  तौर पर बराबर ही प्लान करके चलते हैं. सच कहें तो प्लानिंग उनके दैनंदिन जिन्दगी का अभिन्न अंग हो जाता है; आदत का हिस्सा बन जाता है. वे इसके लिए हमेशा जागरूक रहते हैं. कल कौन-कौन से काम कब और कैसे करना है, उसे वे पहले से ही सूचीबद्ध कर लेते हैं और कमोबेश उसी के अनुसार कार्य संपादित करते हैं. उन्हें आप कदाचित ही फायर फाइटिंग मोड में देखेंगे. जब कि प्लान करके नहीं चलनेवालों को आप अधिकतर समय फायर फाइटिंग मोड में ही पायेंगे अर्थात घर में आग लग जाने पर उसे बुझाने के लिए भागमभाग करना, हो-हल्ला मचाना, अस्त-व्यस्त रहना. ऐसे लोग कम सफल और कम उत्पादक तो होते ही हैं, अनावश्यक तनाव में भी रहते हैं. और सभी जानते हैं, बराबर तनाव में रहना सेहत के लिए बिलकुल ही ठीक नहीं. इसके बहुआयामी दुष्प्रभाव हैं.

अन्तरिक्ष वैज्ञानिकों की प्लानिंग से बहुत कुछ सीखा जा सकता है. कैसे सब कुछ निर्धारित समय में पूरी सूक्ष्मता एवं गुणवत्ता के उच्चतम मानकों के साथ होता है जिससे काउंट डाउन ख़त्म होते ही अन्तरिक्ष यान अपने गंतव्य की ओर चल पड़ता है. कितनी प्लानिंग से सब कुछ आगाज से अंजाम तक पहुंचाया जाता है; एक बड़ी टीम में कितने लोग किस तरह प्लान करके चलते हैं कि एक नियत तिथि को सब कुछ सफलतापूर्वक संपन्न किया जाता है. वास्तव में,  हर प्रोजेक्ट प्लानिंग अपने आप में एक अनोखी एवं विचार समृद्ध प्रक्रिया होती है.

बेंजामिन फ्रैंकलिन कहते हैं, ‘अगर आप प्लान करने में असफल रहते हैं तो आप वाकई असफल होने का प्लान कर रहे हैं.’ सपनों को साकार करने के लिए तथा अपने लक्ष्यों को हासिल करने के लिए हमारे युवा जितनी मेहनत और लगन से लगे रहते हैं, उन्हें फ्रैंकलिन की बात की अहमियत अच्छी तरह समझने की आवश्यकता है. 

हम यह सब जानते और मानते हैं कि जहां भी संसाधनों की किल्लत रहती है, चाहे वह समय, उर्जा, धन, अवसर, मशीन, श्रमिक आदि ही क्यों न हो, वहां प्लान करके चलना निहायत जरुरी है. दूसरे शब्दों में कहें तो जब भी, जहाँ भी सीमित संसाधनों से एक नियत समयावधि में किसी भी कार्य को संपन्न करने की चुनौती होती है, तब-तब योजना की अनिवार्यता और स्पष्ट होती है. लेस्टर राबर्ट बिटल तो  कहते हैं, ‘अच्छी योजना अच्छे निर्णय का द्योतक है जिससे सपनों को साकार करना आसान हो जाता है.’ 

युवाओं के साथ -साथ यह बात नौकरी पेशा लोगों सहित उन सब पर लागू होता है, जो सहज और सुचारू ढंग से अपने दैनंदिन जीवन में अपने लक्ष्य को हासिल करना चाहते हैं. यह तब और अहम हो जाता है जब प्रतिस्पर्धा के इस युग में युवाओं को कई बार मल्टी-टास्किंग से रूबरू होना पड़ता है यानी एक साथ एकाधिक कार्य करने का प्रेशर होता है. तभी तो प्रसिद्ध फुटबॉल कोच पॉल ब्रायंट कहते हैं, ‘योजना बनायें, उसे ईमानदारी से अमल में लायें और फिर देखें कि आप कितने सफल हो सकते हैं. अधिकतर लोगों के पास कोई योजना नहीं होती. इसी कारण उन्हें हराना आसान  होता है.’ 

तो प्रश्न यह है कि विद्यार्थी इम्तिहान के इस मौसम में कैसे प्लान करें कि वे अपेक्षा के अनुरूप परीक्षा में परफॉर्म कर सकें ? 

परीक्षा से पहले अब जितना दिन बचा है और किसी दो विषयों की परीक्षा के बीच जो अंतराल है, उस दौरान जितना घंटा मिलता है, सबको जोड़ लें. अब उसमें से सोने के औसतन 7-8 घंटे तथा अन्य दैनिक दिनचर्या के लिए 3-4 घंटे  रोज के हिसाब से निकालने के बाद जितने घंटे बचते हैं, उसे विषय विशेष की जरुरत के मुताबिक़ आबंटित कर उस प्लान पर अमल करना शुरू करें. इस प्लान में कुछ घंटे खाली भी रखें यानी प्लान में थोड़ा लचीलापन रखें जिससे कि सभी विषयों पर यथोचित ध्यान दिया जा सके. ऐसे बनाए गए प्लान को पहले दो -तीन तक अमल में लाने के बाद आपकी  शारीरिक घड़ी एवं मन-मानस इस प्लान से एडजस्ट हो जाती है. फिर तो आगे उस प्लान के अमल से होनेवाले फायदे आपको खुद पता चलने लगते हैं और आपके उर्जा, उत्साह और उमंग में उछाल स्वतः आता रहता है. निःसंदेह, प्लान करके चलने की मानसिकता परीक्षा हॉल में भी आपको बहुत लाभ पहुंचाता है.  
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Tuesday, January 29, 2019

युवा कैसे करें तनाव प्रबंधन?

                                                               - मिलन  सिन्हामोटिवेशनल स्पीकर...
वास्तव में हमारे युवाओं, खासकर विद्यार्थियों को सुबह से शाम तक  तनाव से परेशान देखना आम बात हो गई है. यह सही है क्यों कि निरंतर बढ़ते प्रतिस्पर्धा के मौजूदा दौर में उनके लिए अपेक्षा, उत्पादकता, आनंद आदि के बीच तालमेल बिठाना कठिनतर होता जा रहा है. परिणामस्वरूप, वे अक्सर थके-हारे, मायूस और अस्वस्थ नजर आते हैं. इससे उनका उत्साह, आत्मविश्वास और उत्पादकता तो प्रभावित होता है, इसका नकारात्मक असर पारिवारिक सुख-शान्ति पर भी पड़ता है. 

दरअसल, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विशेषज्ञों की मानें तो तनावग्रस्त रहने और उसी अवस्था में कार्य करते रहने की बाध्यता के कारण ऐसे युवा तनाव-जनित अनेक बीमारियों के शिकार भी हो रहे हैं, और वह भी बड़ी संख्या में. इन बीमारियों में सिरदर्द, माइग्रेन, डिप्रेशन से लेकर ह्रदय रोग, मधुमेह, कैंसर आदि शामिल हैं. स्वाभाविक तौर पर यह किसी भी व्यक्ति और उनके परिवार के लिए सुखद स्थिति नहीं कही जा सकती. तो फिर सवाल है कि बिना किसी डॉक्टर के पास गए और बिना दवाइयों के सेवन के इस स्थिति से कैसे पार पाया जाय.

जोर देने की जरुरत नहीं कि इन सभी स्वास्थ्य समस्याओं का एक मात्र सटीक समाधान हमें योग से जुड़ कर मिल सकता है. योग के विषय में विश्व प्रसिद्ध ‘बिहार योग विद्द्यालय, मुंगेर’ के संस्थापक स्वामी सत्यानन्द सरस्वती ने बहुत सही कहा है, “योग मानवता की प्राचीन पूंजी है, मानव द्वारा संग्रहित सबसे बहुमूल्य खजाना है. मनुष्य तीन वस्तुओं से बना है – शरीर, मन व आत्मा. अपने शरीर पर नियंत्रण, मन पर नियंत्रण और अपने अन्तरात्मा की आवाज को पहचानना – इस प्रकार शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक इन तीनों अवस्थाओं का संतुलन ही योग है.  योग एक ऐसा रास्ता है, जो मनुष्य को स्वयं को पहचानने में मदद करता है. मानव शरीर को स्वस्थ और निरोग बनाता है एवं मनुष्य को बाहरी तनावों, शारीरिक विकारों से मुक्ति दिलाता है जो मनुष्य की स्वाभाविक क्रियाओं में अवरोध उत्पन्न करते हैं.  योग द्वारा मनुष्य अपने मन तथा व्यक्तित्व की अवस्थाएं तथा दोषों का सामना करता है.  यह मनुष्य को उसके संकुचित और निम्न विचारों से मुक्ति दिलाता है... …”

कहने का अभिप्राय यह कि योग अर्थात आसन, प्राणायाम,  ध्यान आदि का विज्ञान कहता है कि हम योग से जुड़कर अपने शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक क्षमताओं के बीच बेहतर संतुलन कायम कर न केवल खुद को आज और भविष्य में भी ज्यादा स्वस्थ, उत्पादक और खुश रख सकते हैं,  बल्कि अपने परिवारजनों को सही रूप में योग से जुड़ने और उसके असीमित सकारात्मक पहलुओं को जानने –समझने को प्रेरित कर सकते हैं. इस तरह हम खुद के अलावे अपने परिवार, समाज और देश को सही अर्थों में मजबूत, समर्थ, संपन्न और खुशहाल बना सकते हैं. 

हां, इसे मूर्तरूप देने के लिए स्वामी विवेकानन्द के इस कथन कि “सब शक्ति हमारे अन्दर है. हम सब कुछ कर सकते हैं” पर पूर्ण विश्वास करते हुए पूरी आस्था और निष्ठा से किसी योग्य प्रशिक्षक की देखरेख में योगाभ्यास प्रारंभ करना मुनासिब होगा. 

सूर्योदय के आसपास शौच आदि से निवृत होकर पहले आसन, फिर प्राणायाम और अंत में ध्यान – इस क्रम में पूरे योगाभ्यास को 30-40 मिनट में भी पूरा किया जा सकता है. 

आसन में पवनमुक्तासन से शुरू करके सूर्य नमस्कार तक की क्रिया की जा सकती है. सच कहें तो सूर्य नमस्कार का 8-10 राउंड अपने-आप में सम्पूर्ण आसन अर्थात व्यायाम है. इसके विकल्प के रूप में कुछ देर के सामान्य वार्मअप एक्सरसाइज के बाद पवनमुक्तासन श्रेणी के चार-पांच आसन जैसे ताड़ासन, कटि-चक्रासन, भुजंगासन, शशांकासन, नौकासन नियमित रुप से करें, तब भी अपेक्षित लाभ मिलेगा. 

प्राणायाम यानी ब्रीदिंग एक्सरसाइज में अनुलोम-विलोम, कपालभाती, उज्जायी, शीतली और भ्रामरी से शुरू कर सकते हैं. इसके बाद ध्यान मुद्रा यानी मेडिटेशन में कम-से-कम 5-10 मिनट बैठें. 

संक्षेप में कहें तो 10-15 मिनट का आसन, 10-15 मिनट का प्राणायाम और 5-10 का ध्यान अगर नियमितता, तन्मयता और निष्ठा से करें तो अप्रत्याशित लाभ के हकदार बनेंगे.      (hellomilansinha@gmail.com)

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Monday, January 21, 2019

मोटिवेशन : परीक्षा तो जीवन का हिस्सा है

                                                  - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर...
कुछ ही दिनों में सीबीएसइ की दसवीं तथा बारहवीं की परीक्षा सहित प्रादेशिक बोर्ड की परीक्षाएं भी   प्रारंभ हो रही हैं. छात्र–छात्राएं तैयारी में पूरी तरह जुट गए हैं. अभिभावक–शिक्षक की व्यस्तता भी बढ़ गई है. सही है. 

जरा सोचें कि परीक्षा आखिर है क्या, तो पायेंगे कि यह तो वाकई विद्यार्थियों के धैर्य, दिमागी संतुलन, ज्ञान एवं समय प्रबंधन का एक टेस्ट मात्र है.  दूसरे शब्दों में, उन्होंने अबतक जो कुछ पढ़ा है, सीखा है, जाना है, समझा है, और अगले कुछ दिनों तक उसमें जो कुछ जोड़ेंगे, उसके आधार पर परीक्षा में एक नियत समय सीमा के भीतर पूछे गए प्रश्नों का सटीक जबाव देना है.

कुछ लोग परीक्षा को ‘पर इच्छा’ भी कहते हैं. अगर यह सही है तो  परीक्षा में सब कुछ अपनी इच्छा के अनुरूप हो, यह जरूरी  नहीं. इसलिए, परीक्षा के पहले यह अपेक्षित है कि कूल -कूल और नार्मल रहते हुए यथासाध्य प्रयास करते रहें. इसके लिए संतुलित जीवनशैली अपनाकर खुद को फिट एवं जीवंत बनाए रखना बहुत लाभकारी होता है. हालांकि इस दौरान अमूमन यह देखने में आता है  कि अध्ययन के नार्मल रूटीन के साथ -साथ छात्र-छात्राओं की अन्य सामान्य दिनचर्या तक अस्त-व्यस्त हो जाती है. कहने का मतलब  यह  कि उन्हें न तो समय पर खाने की फ़िक्र रहती  है और न ही समय पर सोने  की,  जब  कि  परीक्षा की पूरी अवधि में  खाने और सोने पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता होती है, जितना कि पढ़ने पर.  ऐसा  इसलिए कि यथासमय आहार व नींद से  दूर रहने पर वे पर्याप्त शारीरिक एवं मानसिक शक्ति से युक्त नहीं रह सकते हैं. इसके एक दुष्प्रभाव  के रूप में उनमें नकारात्मक विचारों में वृद्धि हो जाती है  और वे अचानक ही खुद को अनेक समस्याओं से घिरे पाते हैं; परीक्षा के दौरान बीमार पड़ने की संभावना भी बढ़ जाती है; और फिर परीक्षा में बेहतर परफॉर्म करना कठिन हो जाता है. तो क्या करें?

रात में जल्दी सोयें और सुबह जल्दी उठें. नित्यक्रिया से निवृत होकर कम-से-कम 15 मिनट वार्मअप एक्सरसाइज एवं प्राणायाम –ध्यान कर लें.  सुबह नाश्ता खूब बढ़िया से करें यानी पौष्टिक आहार लें. सच पूछें तो घर में  उपलब्ध एवं तैयार पौष्टिक नाश्ते से  प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, फैट, विटामिन, मिनिरल आदि पर्याप्त मात्रा में मिल जाता है जो हमें शारीरिक एवं मानसिक रूप से स्वस्थ रखने के लिए काफी है. दोपहर के खाने में चावल या रोटी के साथ दाल, मौसमी हरी सब्जी, दही, सलाद का सेवन करें. अपने आहार  में मौसमी फलों को भी शामिल करें. रात के खाने को सादा एवं सबसे हल्का रखें और  नौ बजे तक खाना खा भी लें.  हाँ, जंक, बाजारू एवं प्रोसेस्ड चीजों से बचने की हरसंभव कोशिश करें. डिनर पार्टी आदि से दूर रहें. परीक्षा के दिन यथासंभव सादा एवं सुपाच्य भोजन करें, मसलन दाल–रोटी, दही–चूड़ा, खिचड़ी, इडली-सांभर  आदि. खाना खूब चबाकर खाएं और शरीर को बराबर हाइड्रेटेड रखें, अर्थात पानी पीते रहें.

चिकित्सा विज्ञान कहता है कि रात में अपर्याप्त नींद के कारण हमारा स्वास्थ्य खराब हो जाता है. ऐसे लोगों का स्ट्रेस हॉर्मोन्स काफी बढ़ जाता है जिसके चलते वे एकाधिक रोगों की चपेट में आ जाते हैं. लिहाजा, रात में सात–आठ घंटा जरुर सोयें. रात की अच्छी नींद सुबह आपके लिए ताजगी, उमंग व उत्साह का उपहार लेकर आती है. हाँ, सोने से पहले  अपना  मोबाइल बंद कर लें तो उत्तम, नहीं तो कम से कम साइलेंट मोड पर जरूर कर लें. मोबाइल को सोने के स्थान से दूर रखें. एक और बात. ध्वनि तथा प्रकाश अच्छी नींद को बाधित करते हैं.  सोने से पहले इसका  ध्यान रखें तो बेहतर. मौका मिले तो दोपहर में भी थोड़ी देर (घंटा भर) सो लें – रीफ्रेशड फील करेंगे. 

सार-संक्षेप यह कि परीक्षा से पहले अब जितने दिन शेष है, उसका बेहतर उपयोग करें. किस विषय में और कितना समय दे सकते हैं, उसका सही आकलन कर एक स्मार्ट कार्ययोजना बनाकर उस पर अमल करें. जो समय बीत गया, उसकी चिंता इस वक्त कतई न करें. प्रख्यात कवि हरिवंश राय बच्चन ने लिखा है न, 'जो बीत गयी सो बात गयी ….'  बेहतर तो यह है कि अब जो कर सकते हैं  उसी पर फोकस करें.  यथासाध्य और यथासंभव रीविजन करें, लिखने का अभ्यास भी करें.  कहते हैं न, ‘प्रैक्टिस मेक्स ए मैन परफेक्ट’. फार्मूला, महत्वपूर्ण पॉइंट्स आदि पर विशेष ध्यान दें, उन्हें अंडरलाइन करें, हाईलाइट करें.

परीक्षा जैसे नाजुक अवसर पर यह भी देखा  गया है कि ज्यादातर स्टूडेंट यह सोच-सोच कर  परेशान  रहते हैं कि दोस्त क्या पढ़ रहे हैं, क्या कर रहें हैं. ऐसा सोचना बहुमूल्य समय की बेवजह बर्वादी है.  ऐसे वक्त दोस्त को फ़ोन करना नाइंसाफी  से कम नहीं.  ऐसे में अपना  मोबाइल बंद कर लें तो उत्तम, नहीं तो कम से कम साइलेंट मोड पर जरूर कर लें.  फेस बुक आदि से इस समय दूर ही रहें तो अच्छा. बस खुद पर और परीक्षा की अपनी तैयारी  पर ध्यान केन्द्रित करें.

अंत में एक छोटी-सी बात और.  परीक्षा के दौरान  “टेक-इट-इजी”  सिद्धांत को फॉलो करें. इस सिद्धांत के तहत प्रश्नों को पहले ठीक से पढ़ना, समझना और फिर उत्तर देना चाहिए.  इस अवसर पर ‘स्मार्ट समय प्रबंधन’ आपके परफॉरमेंस और परीक्षाफल को बेहतर बनाता है.      (hellomilansinha@gmail.com)

                        और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं
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Tuesday, January 15, 2019

मोटिवेशन : बड़े उद्देश्य को हासिल करना होगा आसान

                                                                - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर...
बीते दिनों मीडिया में इस बात की खूब चर्चा हुई कि 35 वर्षीय भारतीय महिला मुक्केबाज एम.सी. मैरी कॉम ने 10वीं एआईबीए महिला विश्व मुक्केबाजी चैंपियनशिप में शानदार जीत हासिल की. इस तरह उन्होंने 6 विश्व चैंपियनशिप जीतकर भारतीय खेल इतिहास में स्वर्णाक्षर में अपना नाम दर्ज करवाया. 

अंतरराष्ट्रीय खेलों में त्रिपुरा की जिमनास्ट दीपा करमाकर और असम की धाविका हीमा दास के अभूतपूर्व प्रदर्शन को भी हम भूले नहीं हैं. हाल ही में वर्ल्ड टूर बैडमिंटन फाइनल में पी. वी. सिंधु ने जापान की नोजोमी ओकुहारा को पराजित कर जो विश्व खिताब हासिल किया, उससे पूरा देश गौरवान्वित महसूस कर रहा है. 

खेलकूद की दुनिया में ध्यानचंद, प्रकाश पादुकोणे, माइकल फरेरा से लेकर अविनव बिंद्रा, सुनील क्षेत्री और महेंद्र सिंह धोनी तक हमारे देश के अनेक खिलाड़ियों ने सैकड़ों नए मानदंड बनाए. 

‘भाग मिल्खा भाग’ नाम से चर्चित फिल्म आपने भी देखी होगी, जिसमें अपने उद्देश्य के प्रति समर्पित मिल्खा सिंह के जोश, जूनून और मेहनत को बखूबी दर्शाया गया है. तमाम अवरोधों एवं परेशानियों के बावजूद मिल्खा सिंह  कैसे एक के बाद एक रिकॉर्ड तोड़ते गए. तभी तो वे आज भी  देश –विदेश के लाखों –करोड़ों युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत बने हुए हैं.

विज्ञान के क्षेत्र से एक उदाहरण लेते है, जिन्होंने अपने तय मुकाम को पाने के लिए आशा, दृढ़ निश्चय और अथक परिश्रम के बलबूते अविश्वसनीय सफलता हासिल की और नए कीर्तिमान स्थापित किये. हां, मैडम क्यूरी की जिन्दगी संघर्षों से निरंतर लड़ते हुए अपने लक्ष्य तक पहुंचने की  गौरव गाथा है. रेडियम जैसे महत्वपूर्ण धातु का आविष्कार करने वाली इस वैज्ञानिक को दो बार नोबेल पुरस्कार विजेता होने की असाधारण ख्याति मिली. दरअसल, मैडम क्यूरी के नाम से प्रसिद्ध होने से पहले उन्हें लोग मार्जा स्क्लोदोव्स्का के नाम से जानते थे जो पोलैंड की राजधानी वारसा की रहनेवाली थी. उनके पिता विज्ञान के शिक्षक थे. घर की कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण युवा मार्जा को भी एक बच्ची को उसके घर जा कर पढ़ाना पड़ता था. बावजूद इसके परिस्थिति कुछ यूँ बिगड़ी कि उसे मजबूरन वारसा से पेरिस आना पड़ा जिससे वह अपनी विज्ञान की पढ़ाई जारी रख सके. लेकिन यहाँ भी उनकी आर्थिक हालत कुछ ऐसी रही कि कमरे का किराया चुकाने के बाद उन्हें खाने –पहनने तक की बड़ी परेशानी से रोज रूबरू होना पड़ता. पेरिस की कड़ाके की सर्दी को झेलने के लिए उनके पास न तो पर्याप्त गर्म कपड़े थे और न ही घर  को गर्म रखने के लिए लकड़ी –कोयला आदि खरीदने के लिए पैसे. लिहाजा वह पढ़ते व सोते हुए सर्दी से ठिठुरती रहती. खाने के मामले में भी बहुत बुरा हाल था. हफ्ते-दर-हफ्ते वह डबल रोटी व चाय पर गुजारा करती. नतीजतन, वह इतनी  कमजोर हो  गयी  कि एक बार तो अपने क्लास में ही बेहोश हो गयी. तथापि पढ़ाई के प्रति उनकी लगन कम नहीं हुई और आगे तो उन्होंने विज्ञान के क्षेत्र में कमाल के काम किये और भौतिक शास्त्र एवं रसायन शास्त्र दोनों में नोबेल पुरस्कार जीता.

वाकई यह जानना मुनासिब और दिलचस्प होगा कि आखिर किस तरह इन लोगों ने अपने-अपने क्षेत्र में सफलता का परचम लहराया. लेकिन उससे ज्यादा यह जानना जरुरी है कि क्या सफलता के पीछे कुछ बुनियादी सिद्धांत कार्य करते हैं? 

हां, बिलकुल करते हैं. पहले तो हमें एक सार्थक या यूँ कहें कि एक स्मार्ट लक्ष्य तय करना पड़ता है. यहां स्मार्ट का मतलब है, एक निश्चित समयावधि में हासिल करने योग्य. इसके बाद उस उद्देश्य तक पहुंचने के लिए सही व समयबद्ध कार्ययोजना की आवश्यकता होती है. कहने की जरुरत नहीं कि उस निर्धारित उद्देश्य की प्राप्ति के लिए पूरे लगन एवं मेहनत से उस दिशा में जुटे रहना भी अनिवार्य है. इसीलिये मिसाइल मैन व जनता के राष्ट्रपति के नाम से विख्यात पूर्व राष्ट्रपति ए. पी. जे. अब्दुल कलाम का कहना है,‘अपने मिशन में कामयाब होने के लिए, आपको अपने लक्ष्य के प्रति पूर्णतः निष्ठावान होना पड़ेगा.’

वाकई इस सिद्धांत पर चलते रहने पर पारिवारिक जीवन हो या नौकरी या व्यवसाय या कोई अन्य क्षेत्र हो, हमारे सफल होने की संभावना बहुत बढ़ जाती है, साथ ही आगे और बड़े मुकाम को प्राप्त करने के प्रति हमारा आत्मविश्वास भी. गुणीजनों का भी स्पष्ट मत है कि जीवन में एक बड़े उद्देश्य को लेकर शिद्दत से आगे बढ़ना सफलता का सोपान बनता है.          (hellomilansinha@gmail.com)

                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं
   
#लोकप्रिय साप्ताहिक "युगवार्ता" के 13 जनवरी, 2019 अंक में प्रकाशित 
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