Saturday, October 5, 2019

टेंशन को जल्द कहें ना

                                                            - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर... ....
हाल ही में एक शैक्षणिक संस्थान में सिविल सर्विसेस प्रतियोगिता परीक्षा की  तैयारी कर रहे  छात्र-छात्राओं के एक बड़े समूह से बातचीत करने के क्रम में मैंने एकाधिक बार उनसे कहा कि कुछ भी हो, पर टेंशन नहीं लें. चिंता नहीं, चिंतन करें. हेल्दी रहें. विद्यार्थियों के चेहरे पर आए तात्कालिक भाव को पढ़कर लगा कि उन्हें मेरी बात अच्छी लगी. फिर भी सेशन के अंत में कुछ विद्यार्थियों ने पूछ ही लिया कि आखिर टेंशन को कैसे कहें ना? विशेषज्ञ कहते हैं कि कारण जानेंगे तो निवारण भी पा लेंगे. तो पहले मूल बात पर गौर कर लेते हैं  कि टेंशन आखिर होता क्यों है?

निरंतर बढ़ती प्रतिस्पर्धा के मौजूदा समय में बहुत सारे विद्यार्थी टेंशन में रहते हैं और दिखते भी हैं. हां, कई लोग अपना टेंशन छुपाने में सफल भी रहते हैं, यद्दपि ऐसे लोग ऐसा करके  कई बार अपना टेंशन और बढ़ा लेते हैं. आपने भी देखा होगा कि एक जैसी परिस्थिति में दो विद्यार्थी अलग-अलग मानसिक स्थिति में रहते हैं. पहला फ़िक्र और टेंशन से परेशान है तो दूसरा बेफिक्र और मस्त. पहला जहां यह गाना गाता प्रतीत होता है कि जिंदगी क्या है, गम का दरिया है ...तो वहीँ  दूसरा यह गाता हुआ लगता है कि "मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया, हर फ़िक्र को धुंए में उड़ाता चला गया...."  

बहरहाल, प्रतियोगिता परीक्षा में शामिल होनेवाले विद्यार्थियों को केंद्र में रखकर इस चर्चा  को आगे  बढ़ाएं  तो यह कहना मुनासिब होगा कि यहां टेंशन के अनेक कारण हो सकते हैं. प्लस टू , ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन के बेसिक क्वालिफिकेशन के बाद प्रतियोगिता परीक्षा से विद्यार्थियों का वास्तव में सीधा सामना होता है. आईआईटी-एनआईटी, नीट, बैंकिंग, रेलवे, एसएससी, आईआईएम,  सिविल सर्विसेस या अन्य प्रतियोगिता परीक्षा की बात करें, तो  हर जगह  सिलेबस बड़ा हो जाता है.  विषय ऐच्छिक और अनिवार्य दोनों होते हैं. प्रश्नों का पैटर्न भिन्न  होता है. सामान्यतः पास मार्क्स जैसी कोई बात नहीं होती. बस उपलब्ध सीटों  के हिसाब से प्रतियोगिता में शामिल विद्यार्थियों की कुल संख्या में से सबसे अच्छे अंक अर्जित करनेवाले विद्यार्थियों का चयन होता है. ऐसे में दिमागी कनफूजन, सफलता के प्रति संशय, असफलता का डर, घरवालों की अपेक्षा पर खरा न उतरने पर उपेक्षा की आशा, अनहोनी की आशंका आदि टेंशन के आम कारण होते हैं. यूँ तो कई विद्यार्थी कभी-कभी बस बिना कारण भी टेंशन में पाए जाते हैं.

जानकार कहते हैं कि अगर आप केवल एक हफ्ते तक रोज रात को सोने से पहले दिनभर के कार्यों-व्यस्तताओं की निरपेक्ष समीक्षा करें तो आप पायेंगे कि अमूमन कितना समय आपने  रोज टेंशन में गुजारा है. अब खुद ही यह भी विवेचना करें कि जिन बातों को लेकर टेंशन में रहे, उनमें से कितने टेंशन करने लायक थे और कितने बेवजह. सर्वे बताते हैं कि आधा से ज्यादा समय छात्र-छात्राएं अकारण ही टेंशन में रहते हैं. मजे की बात है कि जब भी आप टेंशन में रहते हैं उस समय आप जो भी कार्य करते हैं, मसलन पढ़ना-लिखना, खेलना या और भी कुछ, उसमें आपकी  उत्पादकता या परफॉरमेंस औसत से बहुत कम होता है. मानसिक रूप से आप अशांत और नाखुश रहते हैं. ऐसे में आपका मेटाबोलिज्म दुष्प्रभावित होता है. आपका  पाचनतंत्र से लेकर अन्य ऑर्गन सामान्य ढंग से काम नहीं करते, जो स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह  साबित होता है.

तो फिर टेंशन को ना कहने के लिए क्या करना चाहिए? सबसे पहले अपने लक्ष्य के प्रति खुद को पूर्णतः समर्पित करते हुए जो कुछ कर सकते हैं उसे करने की पूरी कोशिश करें. झूठ-फ़रेब से दूर रहें. दिनभर का एक रुटीन बना लें और उस पर पूरा अमल करें. सही कहा है किसी ने कि कोशिश करनेवालों की कभी हार नहीं होती. देर हो सकती है, पर अगर आप शिद्दत से कोशिश करते रहें तो आप लक्ष्य तक पहुंचेंगे जरुर. इस दौरान महात्मा गांधी के इस कथन को याद रखना आपको उर्जा व प्रेरणा देगा कि हम जो करते हैं और हम जो कर सकते हैं, इसके बीच का अंतर दुनिया की ज्यादातर समस्याओं के समाधान के लिए पर्याप्त होगा. एक बात और. आपके प्रयासों का आकलन आपसे बेहतर शायद ही कोई कर सकता है. अतः दूसरों की राय से न तो बहुत खुश हो और न ही एकदम दुखी. खुद पर और अपनी कोशिशों पर हमेशा भरोसा करें. गलती हो गई हो तो अव्वल तो उसे दोहराएं  नहीं, उसे यथाशीघ्र सुधारें. छोटी-मोटी परेशानियों को तत्काल सुलझाने  या फिर झेलने या इग्नोर करने की आदत बना लें, जिससे कि आप बड़े और महत्वपूर्ण टास्क पर ध्यान केन्द्रित कर सकें. हर समय इस मानसिक सोच से काम करें कि अच्छे तरीके से कोई भी काम करेंगे तो अंततः उसका परिणाम अच्छा ही होगा. इन सरल उपायों से आप टेंशन को एक बड़ा-सा 'ना' कह सकेंगे. 
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Tuesday, October 1, 2019

हमेशा युवा बनें रहें

                                                            - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर... ....
सभी जानते और मानते हैं कि किसी भी देश का युवा उस देश के निर्माण और विकास में अहम रोल अदा करता है. हमारे देश को तो युवाओं का देश कहा जाता है, क्यों कि संसार के सबसे ज्यादा युवा हमारे देश में रहते हैं. कॉलेज एवं यूनिवर्सिटी में पढ़नेवाले छात्र-छात्राओं  के अलावे स्कूल के अनेक विद्यार्थियों को भी युवा की  श्रेणी में रखा जा सकता है. ऐसे, सही अर्थों में उम्र ही युवा होने का एकमात्र मापदंड नहीं होता है. युवा कहलाने के लिए हर विद्यार्थी में  कुछ सामान्य गुणों का होना भी जरुरी माना गया है. स्वामी विवेकानंद इसे इन शब्दों में परिभाषित करते हैं : युवा वह है जो अनीति से लड़ता है; जो दुर्गुणों से दूर रहता है; जो काल की चाल को बदल देता है; जिसमें जोश के साथ होश भी है; जिसमें राष्ट्र के लिए बलिदान की आस्था है; जो समस्याओं का समाधान निकालता है; जो प्रेरक इतिहास रचता है; जो बातों का बादशाह नहीं, बल्कि करके दिखता है. आगे वे यह भी बताते हैं कि यह संसार ही चरित्र-गठन हेतु एक विशाल नैतिक व्यायामशाला है, जिसमें हम सबको नियमित अभ्यास से इसे हासिल करना पड़ता है.

स्वामी जी के इन विचारों की कसौटी पर अगर हरेक विद्यार्थी अपने को कसे तो उन्हें अपने व्यक्तित्व में ऐसे कई गुणों का अभाव दिखेगा. इसमें अस्वाभाविक कुछ नहीं है. कोई भी विद्यार्थी जन्म से ही सभी अच्छे गुणों से युक्त नहीं होता. इसके लिए सतत प्रयासरत रहना आवश्यक माना गया है. उसी तरह कोई भी बच्चा अवगुणों के साथ जन्म नहीं लेता है. सारी बुरी आदत - झूठ बोलना, व्यसन करना अर्थात शराब, ड्रग्स, सिगरेट, गुटका, तम्बाकू आदि का सेवन करना, मारपीट, तोड़फोड़, लूटपाट, छेड़खानी आदि में शामिल रहना, बुजुर्गों का अनादर-अपमान करना या किसी  गैर कानूनी कार्य में संलिप्त रहना, सब कुछ यहीं उनकी आदत में शुमार होता है. इसके लिए किसी दूसरे को दोष देना और आगे उन्हीं आदतों से ग्रसित रहना खुद को धोखा देना है. फिर भी ऐसा कहना ठीक नहीं होगा कि गलत आदतों से ग्रस्त कोई विद्यार्थी उससे बाहर नहीं आ सकता. हां,  इसके लिए उन्हें ही ठोस निर्णय लेकर सही दिशा में बढ़ते रहना होगा. दूसरे लोग इस कार्य में बस उनकी कुछ सहायता कर सकते हैं, उनको अच्छा सीखने एवं करने के लिए मोटीवेट कर सकते हैं और जरुरत हो तो सिखा भी सकते हैं. इसी कारण अभिभावक, शिक्षक, अच्छे दोस्त और प्रकृति भी हर समय उनके साथ होते हैं. जॉन लुब्बोक तो कहते हैं, "पृथ्वी और आकाश, जंगल और मैदान, झीलें और नदियां, पहाड़ और समुद्र ये सभी उत्कृष्ट शिक्षक हैं और हममें से कुछ को इतना सिखाते हैं  जितना हम किताबों से नहीं सीख सकते."  कहने की दरकार नहीं कि देश-विदेश में अनेक विद्यार्थी हैं जिन्होंने गलत कार्य और मार्ग को एक झटके में छोड़ दिया और फिर सही मार्ग पर चलते हुए सच्चे युवा होने का धर्म बखूबी निभाया है.  

सच तो यह है कि यह जिंदगी आपको रोज यह अवसर -छोटा या बड़ा, देती है जिससे आप तमाम परेशानी या समस्या के बावजूद सद्गुणों को समेटते चल सकते हैं. देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने एक भाषण में कहा है, "समस्‍याएं होती है. हर किसी के नसीब में मक्‍खन पर लकीर करने का सौभाग्‍य नहीं होता है. पत्‍थर पर लकीर करने की ताकत होनी चाहिए और अगर हम अपने आप को युवा कहते हैं तो उसकी पहली शर्त यह होती है कि वो मक्‍खन पर लकीर करने के रास्‍ते न ढूंढे, वो पत्‍थर पर लकीर करने की ताकत के लिए सोचे. अगर यही इरादे लेकर के हम चलते हैं तो हम अपनी तो जिन्‍दगी बनाते हैं, साथ ही कइयों की जिन्‍दगी में बदलाव लाने का कारण भी बनते हैं.

जाहिर है कि हर विद्यार्थी को जो खुद को युवा कहता और मानता है, उन्हें स्वामी जी और अन्य महान लोगों की महत्वपूर्ण बातों को एक स्थान पर मोटे अक्षरों में लिखकर रखना चाहिए. रोज एक बार उसे बढ़िया से पढ़ना और उस पर चिंतन करना चाहिए, जिससे कि उस पर दृढ़ता से अमल करना आसान हो जाए. जीवन के इस लम्बे और सबसे अहम दौर में विद्यार्थियों को यह भी सुनिश्चित करते रहने की जरुरत है कि वे  शारीरिक और मानसिक रूप से बराबर स्वस्थ और सजग रहें. आलस्य एवं उदासी को पीछे छोड़ कर्मपथ पर आगे बढ़ते हुए जीवन के इन्द्रधनुषी रंगों का खुद तो आनंद लें ही, दूसरों को भी इसका भरपूर आनंद लेने दें. ऐसे भी फ्रांज काफ्का ने सही कहा है, "युवा खुश रहता है क्यों कि उसमें सौन्दर्य देखने की क्षमता होती है. जो व्यक्ति खूबसूरती को तलाश सकता है, वह कभी बूढ़ा नहीं होता." तो फिर हमेशा युवा बनें रहें.
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Tuesday, September 24, 2019

अपेक्षा प्रबंधन के लाभ अनेक

                                                        - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर... ....
विलियम शेक्सपियर कहते हैं कि अपेक्षा दिल टूटने का बड़ा कारण है. सही है. दूसरे से अपेक्षा कम तो निराशा भी कम, कुछ विद्यार्थी ऐसा भी कहते व मानते हैं. लेकिन अनेक विद्यार्थी दूसरों से अपेक्षा रखते हैं कि वे उनकी मदद करें; उनके काम आएं, बेशक वे खुद दोस्तों-सहपाठियों की मदद करें या नहीं करें. फिर भी जब अपेक्षा के अनुरूप कोई उनको हेल्प करता है तो अच्छा लगता है. लेकिन अनेक मामलों में ऐसा नहीं होता है. तब उनको बहुत बुरा लगता है. ऐसा तब होता है जब हर विद्यार्थी को बचपन से ही घर-बाहर हर जगह  यह बताया और सिखाया जाता है कि हमेशा जरुरतमंदों की मदद करें, लेकिन बदले में उनसे कुछ भी अपेक्षा न करें. मिल गया तो ठीक, नहीं मिला तो भी ठीक. संस्कार युक्त परिवारों में यह सीख भी दी जाती है कि जीवन की सार्थकता पाने से ज्यादा देने में है.  कई विद्यार्थियों के लिए तो देने का सिलसिला ज्ञान दान के रूप में स्कूल से ही शुरू हो जाता है. अपने आसपास आपने भी कई विद्यार्थियों को घर-बाहर के बच्चों को पढ़ाते देखा होगा.

मानव जीवन को गौर से देखें तो बचपन से विद्यार्थी जीवन तक हम सभी  मोटे तौर पर माता-पिता, बड़े-बुजुर्ग, शिक्षकगण और समाज से बहुत कुछ सिर्फ प्राप्त  ही करते हैं. सो, हमें पाने की एक आदत-सी लग जाती है. आगे भी अपेक्षा करने और पाने का यह सिलसिला जारी रहता है, जब कि होना यह चाहिए कि जब विद्यार्थी पढ़-लिखकर अपने पांव पर खड़ा हो जाए; स्वावलंबी, समर्थ और समृद्ध हो जाए, तब वह समाज को यथासाध्य देना-लौटना शुरू कर दे. पाने की अपेक्षा को कम करके देने की भावना को तीव्र करे.

बहरहाल, काबिलेगौर बात यह है कि बाजारवाद की आज की दुनिया में जब रिश्ते लेनदेन यानी गिव एंड टेक पर आधारित होते जा रहे  हैं, तब विद्यार्थियों के लिए यह और भी जरुरी हो जाता है कि वे अपने दोस्तों -रिश्तेदारों के साथ के संबंधों  को अपेक्षा की तराजू पर न तौलें. वास्तविक जीवन जीने का सतत प्रयास करें. ऐसा इसलिए कि अपेक्षा और उपेक्षा का भाव साथ-साथ चलते हैं. हम दूसरों से जितनी ज्यादा अपेक्षा रखते हैं, उतनी ज्यादा उपेक्षा की संभावना भी रहती है. मसलन आप अगर किसी दोस्त से बहुत अपेक्षा रखते हैं, उससे वह नहीं मिलने पर आपको उपेक्षा का गहरा एहसास होता है. परिणामतः आपसी समझबूझ में कमी आती है; मनमुटाव बढ़ता है और अंततः वर्षों के रिश्ते बेवजह टूट जाते हैं. इससे आप भी दुष्प्रभावित होते हैं. इसके विपरीत जिनसे आप कोई अपेक्षा नहीं रखते, वह आपके काम के बदले कुछ करे-न-करे आपको कोई खास फर्क नहीं पड़ता.

हां, हर विद्यार्थी को खुद से बहुत अपेक्षा होती है जो बहुत स्वाभाविक है. ज्ञानीजन कहते हैं कि  वे सभी  विद्यार्थी जो ज्यादा स्वाभिमानी होते हैं, वे खुद से कुछ ज्यादा ही अपेक्षा रखते हैं, क्यों कि उन्हें अपनी क्षमता पर पूरा यकीन होता है. उन्हें किसी बैसाखी के सहारे चलना मंजूर नहीं. वे आंख खोलकर सपने देखने और उन्हें साकार करने में दृढ विश्वास रखते हैं. कड़ा परिश्रम करते हैं. लेकिन यहां भी विद्यार्थियों को कुछ बातों का ध्यान रखने की जरुरत है. 

हर विद्यार्थी को परीक्षा में अच्छा अंक लाने की अपेक्षा रहती है जो कि वास्तव में परीक्षा पूर्व उनकी तैयारी और परीक्षा में उनके वास्तविक प्रदर्शन पर निर्भर करता है. इस सच्चाई के इतर अगर  कोई विद्यार्थी ठीक से अध्ययन न करे और सिर्फ यह अपेक्षा करे कि परिणाम अच्छे होंगे तो उसे निराशा तो होगी ही. प्रतियोगिता परीक्षा में आपको तो यह मालूम होता है कि आपकी  तैयारी  कैसी है, लेकिन आप यह  नहीं जानते कि बाकी हजारों-लाखों प्रतिभागी कितनी तैयारी के साथ परीक्षा में शामिल हो रहे हैं. ऐसे में सेलेक्शन के प्रति आपकी  अपेक्षा यथार्थ पर आधारित होनी चाहिए. ऐसा नहीं होने की स्थिति में आप अनावश्यक निराशा और अवसाद से ग्रस्त हो सकते हैं. जिन प्रतियोगिता परीक्षाओं में लिखित परीक्षा के अलावा इंटरव्यू और ग्रुप डिस्कशन भी रहता है, वहां तो आपका अपेक्षा प्रबंधन बहुत ही यथार्थवादी होना जरुरी है. दूसरे शब्दों में कहें तो आप दूसरों से न्यूनतम अपेक्षा रखें, खुद से जो अपेक्षा हो उसके अनुरूप तैयारी और परफॉर्म करें और हमेशा यथार्थवादी दृष्टिकोण से परिणाम का आकलन और विश्लेषण करें. इससे आपकी उत्पादकता बेहतर होगी और रिजल्ट भी. इसी वर्ष जनवरी में परीक्षा पर चर्चा विषय पर छात्र-छात्राओं से बात करते हुए देश के प्रधान मंत्री ने अपेक्षा प्रबंधन के महत्व को भी रेखांकित किया था. आपने वह कार्यक्रम तो देखा ही होगा, क्यों?
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Friday, September 13, 2019

शॉर्टकट से नहीं मिलेगी मंजिल

                                                           - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर... ....
सभी विद्यार्थी सफल होना चाहते हैं. विद्यार्थी जीवन अनेक नयी बातों को जानने, समझने और सीखने का प्राइम टाइम होता है. जीवन के बुनियादी वसूलों से विद्यार्थी अवगत होते हैं. कहते हैं कि अच्छी शुरुआत से आधा काम संपन्न हो जाता है. सही है. उदाहरण के तौर पर जिन विद्यार्थियों के पढ़ने-लिखने की शुरुआत अच्छी होती है और जो आगे भी निष्ठापूर्वक अध्ययन करते हैं, उनके लिए परीक्षा में अच्छा अंक लाना आसान हो जाता है. ऐसे विद्यार्थी "देयर इज नो शॉर्टकट टू सक्सेस" जैसी उक्ति पर विश्वास करते हैं. रूटीन बनाकर साल-दर-साल नियमित पढ़ाई करते हैं. प्रामाणिक पुस्तकों को पढ़कर विषय की बुनियादी जानकारी अच्छी तरह ग्रहण करते हैं. यही कारण है कि सिविल सर्विसेस परीक्षा के प्रतिभागियों को विषय के बेसिक नॉलेज के लिए एनसीईआरटी की पुस्तकें अच्छी तरह पढ़ने की सलाह दी जाती है. 

क्या सभी विद्यार्थी ऐसा करते हैं? सच तो यह है कि कुछ विद्यार्थियों को ऐसा करना अच्छा नहीं लगता है. वे क्लास में भी सीरियस नहीं रहते हैं. क्लास बंक करके मौज-मस्ती करने में वे अपना समय व्यतीत करते हैं. अभिभावक के प्रेशर में बेमन से पढ़ने बैठते हैं, जो उन्हें अपेक्षित लाभ नहीं देता. बस परीक्षा सिर पर आ जाने पर वे पढ़ना शुरू करते हैं. स्वाभाविक रूप से उस समय सिलेबस में शामिल सभी विषयों को अच्छी तरह पढ़ना संभव नहीं होता है. ऐसे में, किसी दूसरे के बने बनाये नोट्स या अन्य शॉर्टकट रास्ते से वे परीक्षा में अच्छा अंक हासिल करना चाहते हैं. ट्यूशन और कोचिंग पर ऐसे विद्यार्थियों की निर्भरता सबसे ज्यादा होती है.
  
सोचनेवाली बात है कि शॉर्ट-कट के रास्ते एकाध बार ऐसा हो सकता है कि आप परीक्षा में अच्छे नंबर ले आएं, पर ऐसा हर बार कतई संभव नहीं है. यह भी सौ फीसदी सच है कि शार्टकट के रास्ते पर चलकर किसी भी विद्यार्थी को विषय की अच्छी समझ नहीं हो पाती है. लिहाजा, वे अखिल भारतीय स्तर की उन्नत प्रतियोगिता परीक्षाओं में कई प्रयासों के बाद भी सफल नहीं हो पाते हैं. और तो और जीवन की शायद ही किसी बड़ी परीक्षा में सफलता उनके हिस्से आ पाती है. ऐसा भी देखने में आता है कि अंतिम समय में शार्टकट के सहारे मंजिल तक पहुंचने के चक्कर में कई विद्यार्थी अनावश्यक जोखिम उठाते हैं; जाने-अनजाने कुछ गलत कर बैठते हैं. धीरे-धीरे ऐसा करने की उनकी आदत हो जाती है. और सब जानते हैं कि आदत बुरी बला. कहना न होगा, इस प्रवृति के विद्यार्थी न केवल अनेक मौकों पर दुर्घटनाओं के शिकार होते हैं, बल्कि कई बार आपराधिक गतिविधियों और जुर्म में भी शामिल पाये जाते हैं.

आखिर कोई भी विद्यार्थी ऐसा क्यों करता है? विशेषज्ञ बताते हैं कि जिन विद्यार्थियों को आलस्य, आराम और मौज-मस्ती की आदत लग जाती है, वे सामान्यतः मेहनत से भागते हैं और मुश्किलों का सामना करने से घबराते हैं. अभिभावक के सामने झूठ और बहानेबाजी के सहारे वे बच निकलते हैं. और फिर जब कुछ चीजें, चाहे छोटी ही क्यों न हो, शार्टकट के रास्ते से पाने में वे सफल हो जाते हैं, तो बस शॉर्टकट ही उनका एक मात्र रास्ता बन जाता है. लाजिमी है कि तब तक जीवन की सच्चाई को स्वीकारने और सही रास्ते से मंजिल तक की यात्रा पूरी करने के मामले में  ऐसे विद्यार्थियों का आत्मविश्वास पहले की तुलना में काफी नीचे चला जाता है. सोचिए जरा, शॉर्टकट से आजतक किसी को बड़ी सफलता मिली है क्या? तो फिर पढ़ने-लिखने के बजाय रोज मौज-मस्ती, आलस्य या अन्य किसी कारण से समय का दुरुपयोग करने के बाद परीक्षा से पहले परेशान होने और शार्टकट का रास्ता अपनाने में कौन-सी बुद्धिमानी है? 

सार-संक्षेप यह कि शॉर्टकट से हम बड़ी कामयाबी हासिल नहीं कर सकते. इसके विपरीत, लगातार निष्ठापूर्वक किया गया कोई भी काम देर-सबेर हमें इच्छित मंजिल तक  पहुंचाने की गारंटी देता है. ऐसा माननेवाले सभी छात्र-छात्राओं  के लिए सही तरीका और परिश्रम के बलबूते  सफलता के मंजिल पर पहुंचना ही असल उपलब्धि है. वे "लिफ्ट करा दे या एलीवेटर से शिखर तक पहुंचा दे" जैसी बातों में यकीन नहीं करते. बड़े-बुजुर्ग सही कहते हैं कि अच्छा विद्यार्थी हमेशा कठिन पर सही मार्ग चुनता है क्यों कि इस तरह सफल होने पर न केवल वह खुद को उस उपलब्धि के लायक मानता है, बल्कि इससे उसका आत्मविश्वास भी कई गुना बढ़ जाता है. जाहिर है कि उनके प्रेरणा स्रोत विख्यात धाविका हिमा दास, गेंदबाज जसप्रीत बूमराह  या पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम जैसे लोग ही होते हैं.        (hellomilansinha@gmail.com)


                 
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Tuesday, September 3, 2019

कुछ नायाब सोचें

                                                                 - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर... ....
हर शिक्षण संस्थान में कई विद्यार्थी  ऐसे जरुर होते हैं  जो सामान्यतः हर काम लीक से हटकर  या थोड़ा अलग तरीके से करने की चेष्टा करते हैं. उन्हें सीमित दायरे में रह कर काम करने में रूचि नहीं होती. ऐसे विद्यार्थी  नामुमकिन से 'ना' हटाकर न केवल अपनी कार्ययोजना बनाते हैं, बल्कि उस पर अमल भी करते हैं. आम विद्यार्थियों की तुलना में बेशक उन्हें चुनौतियों और परेशानियों  का ज्यादा सामना करना पड़ता है, लेकिन अनुभव, आत्मसंतोष, आत्मविश्वास, कामयाबी आदि के पैमाने पर देखें तो उन्हें दूसरों की अपेक्षा ज्यादा हासिल भी होता है.

आर्यभट्ट, न्यूटन, आइन्स्टाइन, थॉमस एडिसन, ग्राहम बेल, जगदीश चन्द्र बोस, सी.वी. रमण,  विक्रम साराभाई, होमी भाभा, अब्दुल कलाम  से लेकर वर्तमान में इसरो के प्रमुख के. सिवम तक  जितने भी बड़े आविष्कारक एवं वैज्ञानिक हुए हैं, उनके नाम और काम से ज्यादातर विद्यार्थी परिचित हैं. इन सबमें एक चीज कॉमन है. इन सबों ने  अपने-अपने दायरे से बाहर निकल कर कुछ नया और नायाब करने की कोशिश की और अत्यंत सफल भी हुए. इसी तरह राजनीतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्र में काम करनेवाले देश-विदेश के अनेक विभूतियों ने भी अनेक अभिनव तथा असाधारण काम किए.

हम जो काम करते रहते हैं, स्वाभाविक है कि वह काम हमें आसान लगता है. उसी को करने में हम कम्फ़र्टेबल फील करते हैं, अलबत्ता  शुरू में हम वह काम करने से घबराते हैं और उससे बचना भी चाहते हैं. उसी तरह हम जहां रहते हैं, वह जगह हमें अच्छी लगती है, लेकिन वहां आने से पहले अनजाना-अनदेखा से जुड़े अटपटे-असामान्य भाव मन में रहते हैं.  हम जो खेल खेलते हैं, वही खेल खेलना अच्छा लगता है, उसके अलावे दूसरे खेल को आजमाने की शायद ही कोशिश करते हैं. संकोच, शंका, आशंका, आदत आदि के डोर  से बंधे रहते हैं. अधिकांश विद्यार्थी ऐसा ही करते पाए जाते हैं. वे सभी अपने बनाए दायरे में रहना पसंद करते हैं. न्यूटन का जड़ता का सिद्धांत यहां भी लागू होता है. बचे हुए विद्यार्थी ऐसा नहीं सोचते और न ही करते हैं. वे छोटे बच्चों की तरह अपने दायरे से बाहर जाने की कोशिश करते हैं. कुछ नया जानने एवं करने के प्रति उत्साहित रहते हैं. नया विषय, नया माहौल, नए शिक्षक, नए सहपाठी, नया शहर - सब कुछ नया-नया जैसे उन्हें अच्छा लगता है. ऐसे विद्यार्थी खूब मेहनत करते हैं और अनिश्चितता, परेशानी, नाकामयाबी आदि से घबराते और डरते नहीं हैं. उन्हें अपने काम में बोरियत महसूस नहीं होती. वे बदलाव  को स्वीकार करते हुए जीवन यात्रा का आनंद उठाते हैं. इस प्रक्रिया में बोनस के तौर पर उन्हें अनेक खट्टे-मीठे अनुभव प्राप्त होते हैं, जो उन्हें आंतरिक रूप से पहले से ज्यादा मजबूत बनाते हैं. 

जरा सोचिए, अगर किसी स्कूल-कॉलेज के विद्यार्थी को केवल हिन्दी या गणित या भूगोल या केमिस्ट्री या कोई एक ही विषय पढ़ने में अच्छा लगता हो और वह सिर्फ वही पढ़े तो क्या वार्षिक परीक्षा में सभी विषयों में अच्छा अंक लाकर अच्छे ग्रेड से उतीर्ण हो पायेगा? यकीनन, परीक्षा में शानदार अंक व ग्रेड हासिल करने के लिए हर विद्यार्थी को अपने पसंद के विषय के अलावे  कोर्स के अन्य विषयों को भी पढ़ना पड़ेगा और उन विषयों में भी अच्छा अंक अर्जित करना पड़ेगा. अपने ज्ञान को विस्तार देने एवं उसका बहुआयामी उपयोग करने के लिए यह जरुरी भी है. खाने, पहनने, खेलने आदि के मामले में भी अपने आराम की दुनिया से बाहर निकलना बेहतर माना गया है. ब्रायन ट्रेसी, रोबिन शर्मा सहित कई विचारकों -विशषज्ञों ने इस संबंध में बहुत कुछ लिखा है; अनेक फायदे बताए हैं. जीते-जागते मिसाल  के रूप में अपने देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु व योग विशेषज्ञ सदगुरु जग्गी वासुदेव का जिक्र प्रासंगिक होगा.

जाहिरा तौर पर विद्यार्थियों को अगर एक बेहतर जीवन जीना है तो नए रास्ते और नए तरीके भी तलाशने होंगे. अपने लक्ष्य तक पहुंचने के लिए क्रिएटिव और इनोवेटिव सोच के साथ चलना पड़ेगा. दिल से अगर-मगर, किन्तु-परन्तु के भाव को निकाल कर "मैं कर सकता हूँ और मैं करूँगा" के मन्त्र को आत्मसात करते हुए सजगता के साथ नए पथ पर मजबूत क़दमों से आगे बढ़ना होगा. शुरू करके देखें. दो-चार बार ऐसा करने से आपको खुद बहुत कुछ पता चलेगा. अनुभव से सीखेंगे. शायद उसके हिसाब से कुछ कोर्स करेक्शन भी करेंगे. खुद पर विश्वास बढ़ता जाएगा. सच मानिए, आगे आपको जीवन का सफ़र सरस, सुगम और सुखद लगने लगेगा और आप सफलता की सीढ़ियां चढ़ते जायेंगे.                    
(hellomilansinha@gmail.com)

                 
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Sunday, August 11, 2019

मोटिवेशन : उन्माद व हिंसा से सिर्फ नुकसान

                                                                       - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर... ....
विविधताओं से भरे हमारे विशाल देश में प्रायः रोज कहीं-न-कहीं कारण-अकारण हिंसा की छोटी-बड़ी घटनाएं होती रहती है. लोगों के घायल होने, मरने से लेकर निजी एवं सार्वजनिक संपत्ति का नुकसान भी होता है. विद्यार्थियों के बीच बात-बेबात लड़ाई-झगड़े-मारपीट आदि की खबरें भी मिलती रहती है. इस सबसे सामाजिक व शैक्षणिक माहौल बिगड़ता है. विभिन्न सर्वेक्षणों में पाया गया है कि ऐसे अधिकांश  मामलों में चाहे-अनचाहे कुछ विद्यार्थी शामिल रहते हैं. कारण कई हैं.

विद्यार्थी जीवन उतार-चढ़ाव से भरा होता है. गतिशीलता का यह पर्याय है. उर्जा, उमंग और उत्साह विद्यार्थी जीवन के सहचर होते हैं. इन्हें सम्हालना और अच्छे कार्य में लगाना विद्यार्थियों के  उज्जवल भविष्य की दिशा निर्धारित करता है. हां, यह भी सच है कि इस उम्र में उतावलापन और उन्माद कुछ ज्यादा होता है जो हिंसा, तोड़फोड़ आदि का सहज कारण बनता है. ऊपर से खाली  दिमाग तो शैतान का घर होता ही है. यह बात निहित स्वार्थी तत्व बहुत अच्छी तरह जानते-समझते हैं. ऐसे तत्वों को अपने समाज और देश की भलाई से कोई मतलब नहीं होता. उनका एक मात्र उद्देश्य किसी भी तरह द्वेष व भ्रम फैलाकर आपसी सदभाव एवं भाईचारा को नष्ट करना और अंततः हिंसा और तोड़फोड़ के जरिए अपना उल्लू सीधा करना होता है. और इन कार्यों को अंजाम देने के लिए वे  विद्यार्थी और युवा वर्ग को सॉफ्ट टारगेट मानते हैं. जानकार बताते हैं कि इन असामाजिक तत्वों के बहकावे या प्रलोभन में आकर कई विद्यार्थी हिंसा सहित अन्य अवांछित कार्यों में शामिल हो जाते हैं और अंततः पुलिस के गिरफ्त में आ जाते हैं. स्वाभाविक रूप से गैर-कानूनी काम में संलिप्तता साबित होने पर जेल तक की सजा होती है. फिर पुलिस रिकॉर्ड में एक बार नाम दर्ज हो जाने का दुष्परिणाम  विद्यार्थी को लम्बे समय तक भोगना पड़ता है. अहम सवाल यह है कि जीवन के इस महत्वपूर्ण कालखंड में हमारे विद्यार्थी उन्माद, हिंसा आदि से कैसे बचें?

पहले तो हर विद्यार्थी हमेशा यह याद रखें कि इस समय यानी जीवन के इस प्राइम टाइम में उनका मूल मकसद क्या है? पढ़ाई -लिखाई, खेल-कूद और व्यक्तित्व विकास के अन्य कार्य. यही न. तो फिर इससे इतर कोई अन्य काम, खासकर ऐसा कोई काम जो प्रथम दृष्टया ही गैर-कानूनी लगता हो या अनैतिक हो, करने से सर्वथा दूर रहें. दूसरे, कोई भी कनफूजन हो तो अपने अभिभावक-शिक्षक से बात कर लें. और तीसरे, ऐसी किसी स्थिति में इस बात का भी स्मरण कर लें कि महात्मा बुद्ध, महात्मा गांधी, लियो टॉलस्टॉय से लेकर आज तक के सभी महान लोगों ने स्पष्ट रूप से बारबार कहा है कि किसी भी समस्या का समाधान उन्माद और हिंसा से नहीं हो सकता है.

इन सब बातों का मतलब यह नहीं कि छात्र-छात्राएं अन्याय, शोषण या अत्याचार को चुपचाप सहते रहें और उसका प्रतिकार न करें. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी या लोकनायक जयप्रकाश नारायण द्वारा बताया गया शांतिपूर्ण सत्याग्रह तथा अहिंसक आन्दोलन का मार्ग तो हमेशा खुला है. 

एक बात और. सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के इस दौर में किसी भी घटना-दुर्घटना की सच्चाई की सही पड़ताल एवं छानबीन किए बगैर बस किसी प्रतिक्रिया स्वरुप तुरत गुस्से या उन्माद में आने, भीड़ का हिस्सा बनकर सड़क पर उतरने और हिंसा-तोड़फोड़ में शामिल होने का परिणाम विद्यार्थियों के लिए  बहुत घातक हो सकता है. ऐसे हजारों केस हैं जब हिंसक घटना के बाद थाने में पुलिस के सामने विद्यार्थियों एवं उनके अभिभावकों को पश्चाताप करते और रोते-विलखते-माफ़ी मांगते देखा गया है. पर जो हो जाता है, उसे पलटना कहां मुमकिन होता है? कानून के अनुसार उसका दंड तो भुगतना ही पड़ता है.

एक विचारणीय तथ्य यह भी है कि देश के अच्छे शिक्षण संस्थान, मसलन आईआईटी, आईआईएम, एम्स आदि में पढ़नेवाले विद्यार्थियों को आपने कदाचित ही किसी हिंसक आन्दोलन में शामिल होते और तोड़फोड़ करते हुए निजी एवं सार्वजनिक संपत्ति को क्षति पहुंचाते देखा होगा. शायद  इसलिए कि इन संस्थानों के विद्यार्थियों को हर क्षण अपना मूल मकसद याद रहता है. बड़ा सच तो यह भी है कि सभी शिक्षण संस्थान के अच्छे विद्यार्थी न केवल अपने मित्रों को बहकावे एवं प्रलोभन  में आने से रोकते हैं बल्कि विद्यार्थियों को बहकाने, फुसलाने और समाज में अशांति फैलानेवाले तत्वों को प्रशासन के हवाले करने की यथासंभव कोशिश भी करते हैं, जिससे कि समाज में शांति बनी रहे. आखिर शिक्षा के वास्तविक मर्म को समझनेवाले विद्यार्थियों से समाज को भी अपेक्षा तो रहती ही है कि वे एक जागरूक और जिम्मेदार नागरिक का कर्तव्य बखूबी निभाएं. 
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Thursday, August 8, 2019

मोटिवेशन : मन को मना लो

                                                                  - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर... ....
कॉलेज के दिनों की बात है. हमारे एक प्राध्यापक थे. बहुत अच्छा पढ़ाते थे. पढ़ाते वक्त उनकी तल्लीनता के क्या कहने. क्लास में या बाहर कई विद्यार्थियों को अक्सर उन्हें यह कहते सुना था  कि सफल होना है तो मन को मना लो और अच्छे काम में लगा लो. उनके कहने का अभिप्राय यह था कि पढ़ना, खेलना, खाना या अन्य कोई भी काम हो - बस मन लगा कर करो.  सामान्यतः कुछ इसी  तरह की नसीहत बचपन से लेकर बड़े होने तक, घर-स्कूल-कॉलेज-यूनिवर्सिटी तक और उसके बाद भी बड़े-बुजुर्ग-अध्यापक अपने बच्चों-विद्यार्थियों को देते रहते हैं. आपको भी मिली होगी. लेकिन क्या आपने कभी गंभीरता से इस नसीहत पर विचार किया है ?

सभी जानते हैं कि मानव मन चंचल है और मन की चंचलता के मामले में बच्चे-किशोर-युवा स्वभावतः आगे रहते हैं. कभी सिर्फ दो मिनट अपनी आखें बंद कर मन को खुला छोड़ दें और इस बात पर ध्यान दें कि आपका मन कहां-कहां घूम रहा है, क्या-क्या सोच रहा है? ऐसे, बैठे-बिठाए भी मन के विचरण का अंदाजा लगाना आसान है.  ज्ञानीजन भी कहते हैं कि अगर किसी ने अपने मन को मना लिया तथा  मन को अच्छे काम में लगा लिया तो  वे जीवन की तमाम चुनौतियों का अच्छी तरह सामना करते हैं; उनके लिए जीवन के मुश्किल-से-मुश्किल दौर से निकलकर  लक्ष्य तक पहुंचना कठिन नहीं होता है. खासकर विद्यार्थियों के लिए ऐसा करना तो बहुत फायदेमंद है.

 फर्ज कीजिए कि आप किताब खोलकर पढ़ने बैठे हैं, पढ़ भी रहे हैं, पर कुछ देर बाद एकाएक लगता है कि जैसे कुछ पढ़ा ही नहीं या कुछ पढ़ा तो कुछ  वाकई  नहीं पढ़ा. ऐसा भी कई बार  देखा होगा कि क्लास में शिक्षक पूरा चैप्टर पढ़ा गए और अंत में जब उन्होंने एक छोटा-सा प्रश्न पूछा तो कुछ विद्यार्थी उत्तर नहीं दे सके, जब कि अन्य कई छात्र-छात्राओं ने उस सवाल का जवाब आसानी से दे दिया. आखिर ऐसा  क्यों और कैसे होता है? दरअसल, तन से तो सब विद्यार्थी  वहां मौजूद थे और शिक्षक महोदय द्वारा पढ़ाये जाने वाले विषय के प्रति सजग भी दिख रहे थे अथवा खुद भी जब पढ़ रहे थे, दोनों ही स्थिति में क्या आपका  मन भी तब वहां था या  कहीं और भटक रहा था या किसी सोच में व्यस्त था? शर्तिया उस वक्त तन और मन एक साथ उस कार्यविशेष के प्रति समर्पित नहीं था. पढ़ने, काम करने आदि की बात छोड़ें, बहुत लोग तो क्या खा रहे हैं, कितना खा रहे हैं - कुछ देर बाद ही उसकी बाबत पूछने पर बताने में असमर्थ रहते हैं. सोचनेवाली बात है कि पढ़ाई हो या अन्य कोई काम, शरीर से तो वैसे भी वे वहां होते ही हैं, समय, उर्जा आदि भी खर्च करते हैं, लेकिन चूंकि मन को उस काम में नहीं लगा पाते, इसके कारण वे अपेक्षित लाभ नहीं पाते हैं. इसका नकारात्मक असर उनके व्यक्तित्व विकास पर पड़ना लाजिमी है. मन को मनाने और अच्छे काम में लगाने से यह परेशानी नहीं होती है. 

दिलचस्प बात है कि जब आप किसी काम को मन से करते हैं तो न केवल उसमें अपेक्षित रूचि लेते हैं और तन्मयता से उसे अंजाम देने की भरसक कोशिश करते हैं, बल्कि  उस काम को संपन्न  करने का पूरा आनंद भी महसूस करते हैं. इसके विपरीत जब आप उसी काम को बेमन से करते हैं, बोझ समझकर करते हैं तो उस कार्य की गुणवत्ता तो दुष्प्रभावित  होती ही है, कार्य पूरा होने के बाद भी आनंद की अनुभूति नहीं होती है. 

कहने का तात्पर्य यह कि अगर पढ़ने बैठे हैं तो मन को सिर्फ पढ़ने में लगाएं. उस एक-दो घंटे के सीटिंग में मोबाइल को साइलेंट मोड में करके दूर रख दें, ध्वनि प्रदूषण सहित अन्य व्यवधानों से बचें और हर तीस मिनट के बाद एक मिनट का ब्रेक लें और आंख बंद कर यह याद करने की कोशिश करें कि इस बीच क्या पढ़ा, क्या उसे अभी आप लिख पायेंगे? लगातार ऐसा अभ्यास करते रहने पर आप खुद ही मन लगाकर पढ़ने में पारंगत होते जायेंगे. अन्य किसी काम में भी आप इस सिद्धांत को अमल में लाकर लगातार अपने परफॉरमेंस को बेहतर करने में सक्षम हो सकते हैं. ऐसे, हमारे संत-महात्मा ध्यान के नियमित अभ्यास से मन को मनाने और नियंत्रित करने का उपदेश तो देते ही रहे हैं. 

सच तो यह है कि मन लगा कर काम करनेवाले विद्यार्थी अच्छे-बुरे हर  परिस्थिति में  अपने काम को एन्जॉय भी करते हैं. लिहाजा वे ज्यादा स्वस्थ एवं खुश भी रहते हैं. काबिलेगौर बात यह भी है कि इस तरह काम करने से कार्यक्षमता बढ़ती है, आत्मविश्वास में इजाफा होता है, समय का पूरा सदुपयोग होता है और साथ ही आप बेहतर परिणाम के हकदार भी बनते हैं.   (hellomilansinha@gmail.com)

                     
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