Friday, January 12, 2018

स्वामी विवेकानन्द- कर्म, विचार व व्यक्तित्व

                                                                                                      - मिलन सिन्हा 
नरेन यानी नरेंद्र नाथ दत्त जिन्हें दुनिया आज स्वामी विवेकानन्द के नाम से जानती और सराहती है, का जन्म कलकत्ता के एक कुलीन और संभ्रांत परिवार में 12 जनवरी, 1863 के दिन हुआ था. उनके पिता विश्वनाथ दत्त कलकत्ता हाई कोर्ट के नामी वकील थे. उनके दादा जी दुर्गाचरण दत्त बांग्ला के अलावे संस्कृत तथा फारसी के विद्वान् थे और मात्र 25 वर्ष की उम्र में गृहस्थ जीवन को त्यागकर साधू बन गए थे. नरेन की मां भुवनेश्वरी देवी  धार्मिक विचारों से ओतप्रोत एक कर्तव्य निष्ठ महिला थी.

नरेन पढ़ने-लिखने में तेज थे तो खेलने और बाल सुलभ अन्य मामलों में भी. उनके घर में पूजा -पाठ, भजन-कीर्तन, पठन -पाठन आदि का अच्छा परिवेश था जिसका समग्र सकारात्मक असर नरेन के स्वभाव एवं संस्कार पर पड़ना स्वभाविक था. सब कुछ बढ़िया चल रहा था कि अचानक 1884 में उनके पिता का देहांत हो गया. उस समय नरेन 21 वर्ष के थे और उसी वर्ष उन्होंने बीए की परीक्षा पास की थी. पिता के गुजरने के बाद पूरा परिवार आर्थिक तंगी का शिकार हो गया. आगे के चार वर्ष काफी कठिन गुजरे. 1881 में उनकी मुलाक़ात रामकृष्ण परमहंस से हुई. युवा नरेन अपने गुरु से बेहद प्रभावित थे. फलतः उन्होंने  अपना जीवन रामकृष्ण परमहंस को समर्पित कर दिया. 

इस बीच जीवन में अनेक उतार-चढ़ाव आये. अप्रत्याशित आर्थिक तंगी के बीच सामाजिक विरोध-बहिष्कार के शिकार हुए; एकाधिक जगहों पर नौकरी की.  1893 में अमेरिका के शिकागो में आयोजित विश्व धर्म संसद में भारत के प्रतिनिधि के रूप में अपना ऐतिहासिक भाषण देने से पूर्व करीब पांच वर्षों तक वे देश के विभिन्न भागों का एक सामान्य सन्यासी के रूप में  पैदल भ्रमण  करते रहे. इस व्यापक यात्रा में उन्होंने  देश के लोगों की वास्तविक स्थिति को अपनी आँखों से देखा, उसे खुद महसूस किया.  

स्वामी विवेकानन्द ने 1897 में अपने गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस के नाम पर  'रामकृष्ण मिशन' की स्थापना की जो दशकों से आम देशवासियों के  सामजिक-सांस्कृतिक-आध्यात्मिक उन्नति के लिए सतत कार्य करता रहा है.

स्वामी जी मनुष्य को श्रेष्ठतम जीव मानते थे.  देखिए क्या थे स्वामी जी के विचार:
  • मनुष्य सब प्रकार के प्राणियों से - यहाँ तक कि देवादि से भी श्रेष्ठ है. मनुष्य से श्रेष्ठतर कोई और नहीं. देवताओं को भी ज्ञान-लाभ के लिए मनुष्यदेह धारण करनी पड़ती है.... .... भगवान मनुष्य के भीतर रहते हैं; मानव शरीर में स्थित आत्मा ही एकमात्र उपास्य ईश्वर है; अगर  मैं उसकी उपासना नहीं कर सका, तो अन्य किसी भी मंदिर में जाने से कुछ भी उपकार नहीं होगा. 
  • जिस क्षण मैंने यह जान लिया कि भगवान हरेक मानव शरीर रुपी मंदिर में विराजमान हैं, जिस क्षण मैं हर व्यक्ति के सामने श्रद्धा से खड़ा हो सकूँगा और उसके भीतर भगवान को देखने लगूंगा – उसी क्षण मैं बन्धनों से मुक्त हो जाऊँगा....
स्वामी जी मनुष्य के कर्त्तव्य पर कहते हैं :
  • हमारा पहला कर्त्तव्य यह है कि अपने प्रति घृणा न करें; क्योंकि आगे बढ़ने के लिए यह आवश्यक है कि पहले हम स्वयं में विश्वास रखें और फिर ईश्वर में. जिसे स्वयं में विश्वास नहीं, उसे ईश्वर में कभी भी विश्वास नहीं हो सकता...
  • प्रत्येक मनुष्य का कर्त्तव्य है कि वह अपना आदर्श लेकर उसे चरितार्थ करने का प्रयत्न करें. दूसरों के ऐसे आदर्शों को लेकर चलने की अपेक्षा, जिनको वह पूरा ही नहीं कर सकता, अपने ही आदर्श का अनुसरण करना सफलता का अधिक निश्चित मार्ग है..... 
  • जब तुम कोई कर्म करो, तब अन्य किसी बात का विचार ही मत करो. उसे एक उपासना के रूप में करो और उस समय उसमें अपना सारा तन-मन लगा दो.
स्वामी विवेकानन्द ने यह भी कहा: 
  • पहले रोटी और तब धर्म चाहिए. गरीब बेचारे भूखों मर रहे हैं और हम उन्हें आवश्यकता से अधिक धर्मोपदेश दे रहे हैं ...
  • मैं समझता हूँ कि हमारा सबसे बड़ा राष्ट्रीय पाप जनसमुदाय की उपेक्षा है, और वह भी हमारे पतन का कारण है. हम कितनी ही राजनीति बरतें, उससे उस समय तक कोई लाभ नहीं होगा, जब तक कि भारत का जनसमुदाय एक बार फिर सुशिक्षित, सुपोषित और सुपालित नहीं होता.....
आज जरुरत इस बात की है कि हम स्वामी जी के कर्म, विचार और व्यक्तित्व से सच्ची प्रेरणा लें और देश के सभी लोगों, खासकर करोड़ों गरीब जनता (स्वामी जी के शब्दों में 'दरिद्रनारायण') की भलाई के लिए सच्चे मन एवं सम्पूर्ण समर्पण से काम करें.                (hellomilansinha@gmail.com)                                                                                                
                       और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Monday, January 1, 2018

मोटिवेशन : नये साल का संकल्प

                                                                      -मिलन  सिन्हा, मोटिवेशनल स्पीकर... 
एक और साल  बीत  गया. एक नया साल दस्तक दे रहा है. सब जानते हैं कि गुजरा हुआ वक्त कभी लौट कर नहीं आता, आती रहती हैं तो केवल गुजरे वक्त की खट्टी -मीठी यादें. पर क्या सिर्फ यादों के सहारे  दुनिया में जी पाना मुमकिन है या यथार्थ को स्वीकार कर आगे की यात्रा तय करनी पड़ती है ? हमारे व्यक्तिगत जीवन में बीते साल भी बहुत कुछ अच्छा हुआ ही होगा, कुछ नहीं भी. ऐसे मिश्रित अनुभव–अनुभूति से हमारा सरोकार रहा है और आगे भी रहेगा. यही तो जीवन का सतरंगी शाश्वत रूप है, क्यों? 

सच कहें तो हमारे देश की यात्रा भी हमारे सम्मिलित जीवन यात्रा का प्रतिरूप ही तो  है. सब मानते हैं कि पिछले 70 वर्षों से हमारा देश विकास की यात्रा पर तो जरुर चलता रहा है, लेकिन गति अपेक्षा से धीमी रही है. तभी तो आजादी के करीब सात दशक बाद आज भी हमारे करोड़ों भाई-बहनों को गरीबी, बीमारी, बेकारी, भूखमरी जैसे आर्थिक–सामाजिक समस्याओं से जूझना  पड़ रहा है. कारण अनेक हैं, पर एक बड़ा कारण देश के अनेक भागों में कारण-अकारण अशांति का माहौल बना कर विकास की यात्रा में व्यवधान उपस्थित करने वाले तत्वों की कोशिशों के कामयाब होते रहने का है. 

हम सब जानते हैं कि हमारा देश विविधताओं से भरा एक विशाल देश है. ‘अनेकता में एकता’ विश्व के इस सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश की अनूठी पहचान रही है. हम यह भी जानते हैं कि किसी भी देश को मजबूत बनाने के लिए व्यक्ति व समाज का मजबूत होना अनिवार्य है. इसके लिए देश में होने वाले सामाजिक-आर्थिक विकास का लाभ समाज के सभी तबके को मिलना जरुरी है. और विकास के रफ़्तार को बनाये रखने के लिए समाज के विभिन्न वर्गों–समुदायों के बीच एकता और भाईचारा का होना आवश्यक है. 

हर अमन पसंद एवं विकासोन्मुख देश की तरह हमारे देश में भी अधिकांश लोग शान्ति, एकता और विकास के पक्षधर हैं; न्यायपालिका सहित देश के सभी संवैधानिक संस्थाओं पर उनका विश्वास है; वे तोड़-फोड़ या दंगे-फसाद में शामिल नहीं होते हैं और कानून का सम्मान करते हैं. विवाद को बेहतर संवाद से सुलझाना चाहते हैं. विरोध की नौबत आने पर वे गाँधी जी द्वारा बताये गए सत्याग्रह जैसे अचूक माध्यम का सहारा लेते हैं.  

इसके विपरीत, कुछ मुट्ठी भर लोग हर घटना–दुर्घटना के वक्त येन-केन प्रकारेण समाज में विद्वेष व  घृणा का माहौल बनाने की चेष्टा करते हैं, जिससे वे अपना निहित स्वार्थ सिद्ध कर सकें. ऐसे ही लोग देश के विभिन्न हिस्सों में छोटी -बड़ी घटनाओं–दुर्घटनाओं के बाद अकारण ही निजी एवं सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने में आगे रहते हैं; समाज में उन्माद एवं अविश्वास का बीज बो कर विकास के गति को क्षति पहुंचाते हैं. इससे सबसे ज्यादा  नुकसान समाज के सबसे गरीब लोगों को होता है. इसके अन्य अनेक अनिष्टकारी आयाम भी हैं, जिनसे हम अपरिचित नहीं हैं.

‘नये साल के संकल्प’ की चर्चा अगले कुछ दिनों तक होती रहेगी. होनी भी चाहिए. अच्छे संकल्पों-कार्यों की सही चर्चा जितनी ज्यादा होगी, हमारे समाज में उतना ही सकारात्मक माहौल बनेगा, उतनी ही तीव्रता से अच्छाई भी फैलेगी. कहने का अभिप्राय यह कि आज का समय समाज के करोड़ों अमन पसंद एवं जागरूक लोगों, खासकर युवाओं के लिए यह संकल्प लेने का है कि हम हर अच्छे काम में एक दूसरे की यथा संभव मदद करेंगे. साथ ही साथ सामाजिक सौहार्द और भाईचारे को बिगाड़ने की चेष्टा करनेवाले चंद लोगों  के नापाक इरादों को नाकाम करने में स्थानीय प्रशासन की मदद करेंगे, जिससे प्रशासन को इन असामाजिक लोगों के विरुद्ध त्वरित कार्रवाई करने में कुछ आसानी हो जाय. 

सच मानिए, तभी जाकर हम सब शान्ति व खुशहाली के साथ रहते हुए देश और समाज को तीव्र गति से उन्नत व मजबूत बना पायेंगे. तभी भारत एक विश्व शक्ति बन भी पायेगा और सच्चे मायने में ऐसा देश कहलाने का हकदार भी. 

“हैप्पी न्यू इयर” कहने की सार्थकता भी तो इसी में है, क्यों ?  

           और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 

Saturday, December 30, 2017

आज की बात : दुष्यन्त कुमार को याद करते हुए




आज दुष्यन्त कुमार की पुण्य तिथि है. मात्र 42 साल की छोटी-सी जिंदगी जीनेवाले वही कवि- गजलकार जिनकी ये पंक्तियां हम लोग संसद से सड़क तक समय-समय पर सुनते रहे हैं:

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए.

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए.

01 सितम्बर,1933 को उत्तर प्रदेश में बिजनौर जनपद के राजपुर नवादा गाँव में दुष्यन्त कुमार त्यागी का जन्म हुआ. इलाहाबाद विश्वविद्द्यालय में शिक्षा ग्रहण करने के बाद वे आकाशवाणी के भोपाल केन्द्र से जुड़े. दुष्यन्त कुमार के नाम से प्रसिद्ध होने से पहले अपने लेखन के शुरूआती दौर में वे दुष्यन्त कुमार परदेशी नाम से लिखा करते थे. 30 दिसम्बर,1975 को वे दुनिया से विदा हो गए, अपने परिजनों, मित्रों और लाखों-करोड़ों पाठकों-प्रशंसकों को छोड़ कर.

दुष्यन्त ने  गज़ल, कवितागीतकाव्य नाटक आदि कई विधाओं में लिखा, किन्तु उन्हें अपने गजलों के कारण ही साहित्य में वह मुकाम मिला जो विरले कलमकारों को मिलता है. सच कहें तो दुष्यन्त की अपार लोकप्रियता और प्रसिद्धि का मुख्य सबब उनकी बेमिसाल रचनाएं रहीं. लीजिये प्रस्तुत है कुछ और पंक्तियां:

कैसे आकाश में सूराख नहीं हो सकता,
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो.

रहनुमाओं की अदाओं पे फ़िदा है दुनिया,
इस बहकती हुई दुनिया को संभालो यारो.

अपने बेहद लोकप्रिय गजल संग्रह, 'साए में धूप' के प्रस्तावना में वे लिखते हैं : "मैं स्वीकार करता हूँ कि उर्दू और हिन्दी अपने-अपने सिंहासन से उतारकर जब आम आदमी के पास आती है तो उनमें फर्क कर पाना बड़ा मुश्किल होता है. मेरी नीयत और कोशिश यह रही है कि इन दोनों भाषाओँ को ज्यादा से ज्यादा करीब ला सकूं. इसलिए ये गजलें उस भाषा में कही गई हैं, जिसे मैं बोलता हूँ." 

दुष्यन्त ने प्रशासन, राजनीति, भ्रष्टाचार, सामाजिक-आर्थिक  विसंगतियों आदि पर अपने तरीके से खुलकर लिखा. आपात काल पर उनकी प्रतिक्रिया देखिए:

मत कहो आकाश में कुहरा घना है,
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है.

भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चलनेवाले "सम्पूर्ण क्रांति" आन्दोलन के वे समर्थक थे और लोकनायक से प्रभावित भी. ये पंक्तियां जेपी के लिए ही तो लिखे गए:

एक बूढ़ा आदमी है मुल्क में या यों कहो,
इस अंधेरी  कोठरी में एक  रोशनदान है. 

निजी जीवन में दुष्यन्त सहज, सरल, स्वाभिमानी और बेहद संवेदनशील इंसान थे. उनके अभिन्न मित्रों में नामचीन संपादक एवं लेखक कमलेश्वर सहित कई बड़े रचनाकार थे. उनके लेखन के मुरीद तो असंख्य लोग रहे हैं और रहेंगे. जाने-माने कवि-शायर निदा फाजली ने उनके बारे में लिखा है, "दुष्यन्त की नजर उनके युग की नई पीढ़ी के गुस्से और नाराजगी से सजी बनी है... ..." 
तभी तो वे ऐसा लिख सकते थे:

जिन आंसुओं का सीधा तआल्लुक था पेट से,
उन आंसुओं के साथ तेरा नाम जुड़ गया. 

....मौका मिले तो दुष्यन्त को जरुर पढ़ें. मेरे तो ये पसंदीदा रचनाकार रहे हैं.
                   
                   और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Sunday, December 24, 2017

आज की बात : किसी को जेल, किसी को बेल और कुछ मासूम सवाल

                                                                                             - मिलन सिन्हा 

पिछले दो-तीन दिनों से  रांची में राजनीतिक सरगर्मी बढ़ गई थी. कारण, बहुचर्चित चारा घोटाले के एक मामले में बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव एवं जगन्नाथ मिश्र सहित कुल 22 अभियुक्तों को सीबीआई कोर्ट के फैसले का इन्तजार था. किन्तु -परन्तु और ऐसा फैसला होगा तो वैसा होगा जैसे अनुमान- अपेक्षा पर गर्मागर्म बहस जारी था. 

अमूमन ऐसी राजनीतिक चर्चाओं में लोग दलगत एवं व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों से चालित होते पाए जाते हैं. ऐसे में, उसमें  तर्क, तथ्य और तारतम्य का अभाव स्वभाविक होता है. तथापि ऐसे तर्क-वितर्क में लोग समय न बिताएं, ऐसा राजनीतिक रूप से अति जागरूक हमारे समाज में कहाँ मुमकिन है ?  

ऐसे आजकल जहाँ भी 10-20 स्कार्पियो -बोलेरो- फार्चुनर गाड़ियां सड़क पर मनचाहे तरीके से खड़ी दिखे, तो समझने में कोई दिक्कत नहीं होती कि पॉलिटिकल लोग आसपास किसी कार्यक्रम के निमित्त जमा हुए हैं. ऊपर से अगर पुलिस बंदोबस्त भी हो तो पॉलिटिकल वीआईपी के शामिल होने का संदेश स्वतः मिल जाता है. 

खैर, एक संगोष्ठी में कल सुबह मुझे भी शामिल होना था. उसी सिलसिले में सुबह करीब 10.40 बजे जब रांची रेलवे स्टेशन के पास अवस्थित आयोजन स्थल 'होटल बीएनआर चाणक्य' के निकट पहुंचा तो पुलिसवाले ने गाड़ी रोक दी. कारण यह था कि लालू जी उक्त होटल के पास ही रेलवे के गेस्ट हाउस में ठहरे हुए थे और उस समय अपने सैकड़ों समर्थकों के साथ सीबीआई कोर्ट के लिए निकल रहे थे. दर्जनों बड़ी-बड़ी गाड़ियां और हजारों की संख्या में वहां मौजूद राजनीतिक लोगों को सम्हालने में अनेक पुलिस अधिकारी और जवान लगे हुए थे. फिर भी, जबतक उनके साथ चल रहे पचासों गाड़ियों का काफिला नहीं निकल गया, हमारी गाड़ी सहित अनेक गाड़ियां रुकी रही - करीब 20 मिनट तक. बहरहाल, इससे यह अनुमान लगाना कठिन नहीं था कि रांची की सड़कों पर सामन्यतः रोज जाम का दंश झेलने को अभिशप्त आम शहरी को कल रांची रेलवे स्टेशन से  सीबीआई कोर्ट तक उनके (लालू जी) काफिले के गुजरने के क्रम में क्या कुछ झेलना पड़ा होगा. कोर्ट परिसर में क्या-क्या हुआ और किसके पक्ष या विपक्ष में फैसला आया, इसका व्यापक विवरण तो टीवी चैनलों और आज के अखबार के रिपोर्ट से सबको मालूम हो चुका है, लिहाजा उस पर और कुछ कहने की यहाँ कोई जरुरत नहीं.  

बस चलते-चलते कुछ  मासूम एवं स्वभाविक सवाल :
  • राजनीतिक नेताओं के खिलाफ चलने वाले सभी क्रिमनल केसों के स्पीडी ट्रायल की औपचारिक कानूनी व्यवस्था क्यों नहीं की जाती, जब कि  इसके एकाधिक फायदे हैं - समाज और सरकार के साथ-साथ आरोपी नेताओं के लिए भी ? 
  • रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड जैसे ज्यादा भीड़-भाड़ वाले स्थानों के बिल्कुल निकट नेताओं के ठहरने और उनके हजारों समर्थकों के जमा होने से जुड़े जोखिम और संभावित उपद्रव को कम करके आंकना क्या उचित है?
  • आम जनता, बड़े नेता और उनके समर्थकों के लिए क्या यह बेहतर नहीं होता कि लालू जी जैसे  नेता को कोर्ट के नजदीक किसी स्थान पर ठहराया जाता या उनसे किसी ऐसे स्थान पर ठहरने का आग्रह प्रशासन द्वारा किया जाता ? 
  • क्या किसी भी नेता- राजनीतिक या धार्मिक,  के पक्ष में कथित समर्थकों की असीमित भीड़ को किसी भी शहर की रोजमर्रा की जिंदगी को दुष्प्रभावित करने की छूट प्रशासन को देनी चाहिए, खासकर ऐसे ही एक प्रकरण में हाल ही में चंडीगढ़-पंचकुला में हुए व्यापक उपद्रव-तोड़फोड़ के मद्देनजर ?  
  • क्या ऐसे अवसरों पर स्थानीय पुलिस प्रशासन को अपने सबसे अच्छे कर्मियों को भीड़ प्रबंधन एवं कानून - व्यवस्था सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी नहीं देनी चाहिए, जिससे वे बिना भय और पक्षपात के निष्पक्ष होकर कानून सम्मत कार्य कर सकें ?  
  • क्या मीडिया के लिए, खासकर ऐसे मामलों में स्व-निर्धारित मानदंड के तहत संतुलित एवं तथ्यपरक समाचार संप्रेषित करने की अतिरिक्त जिम्मेदारी नहीं होनी चाहिए ?
आशा है, ऐसे और कई सवाल आपके मन में भी हैं. तो साझा करें जिससे कि हम सब मिलकर उनका सही उत्तर और समाधान निकालने का प्रयास कर सकें. 

                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Saturday, December 23, 2017

आज की कविता : आकलन

                                                                                                           - मिलन सिन्हा 

कोई चारा अब नहीं.
गलत तो आखिर गलत है
कैसे कहें उसे सही.
हर काम का आकलन
होना है बस यहीं.
मानें - न - मानें
हर ख़ुशी, हर गम  के लिए
जिम्मेदार बस हम ही !

और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

आज की बात : ऊर्जा संवाद और हम

                                                                                                  - मिलन सिन्हा 
इधर कई दिनों से प्रसिद्ध न्यूज़ एजेंसी 'हिन्दुस्थान समाचार' द्वारा आज के दिन रांची में आयोजित होनेवाले पंडित दीनदयाल उपाध्याय 'ऊर्जा संवाद' में झारखण्ड के मुख्यमंत्री सहित भाजपा के कई बड़े नेताओं के भाग लेने की चर्चा  चल रही थी. ऊर्जा संवाद कार्यक्रम में मुझे भी शामिल होना था. कार्यक्रम स्थल में पुलिस गेट से लेकर पूरे परिसर में मुस्तैद थी. कारण स्पष्ट था. 

खैर, 'ऊर्जा संवाद' संगोष्ठी में जब मैं पहुंचा, तब तक कुर्सियां लगभग भर चुकीं थी, लेकिन मुख्यमंत्री के आगमन की प्रतीक्षा में कार्यक्रम प्रारंभ होना बाकी था. पंजीकरण की औपचारिकता के बाद हॉल में बाकी आगंतुक भी अपना-अपना स्थान ग्रहण करते जा रहे थे. एकाएक बाहर हलचल बढ़ी तो पता चला कि मुख्यमंत्री आ रहे हैं. वे आ गए तो फटाफट कार्यक्रम शुरू हो गया. 'हिन्दुस्थान समाचार' के अध्यक्ष रवीन्द्र किशोर सिन्हा के स्वागत भाषण के बाद पद्मश्री बलबीर दत्त ने विषय प्रवेश का कार्य किया और फिर झारखण्ड सरकार के विकास आयुक्त द्वारा ऊर्जा, खासकर प्रदेश में बिजली की स्थिति का संक्षिप्त ब्यौरा प्रस्तुत किया गया. झारखण्ड के मुख्यमंत्री, कोल इंडिया के अध्यक्ष, पॉवर ग्रिड के पूर्व अध्यक्ष सहित बाद के वक्ताओं ने जो बताया उससे निम्नलिखित अहम बातें सामने आई:
  1.  देश में आजादी के वक्त बिजली का कुल उत्पादन 1368 मेगा वाट था जो अभी बढ़कर 3,38,000 मेगा वाट हो गया है. 
  2.  सौर ऊर्जा ही हमारे गांवों के लिए सर्वथा उपयोगी है, जिसके लिए हमें अपना पारम्परिक नजरिया बदलना होगा.
  3.  दिसम्बर,2014 में झारखण्ड के कुल 68 लाख परिवारों में से 30 लाख परिवार को बिजली उपलब्ध नहीं थी. पिछले तीन वर्षों में इसमें बहुत सुधार हुआ है और 2018 के अंत से पहले सभी घरों तक बिजली जरुर पहुंचाई जायेगी. ऐसा झारखण्ड सरकार का दृढ़ विश्वास है और प्रधानमंत्री का निर्देश भी.
  4. प्रधानमंत्री का तो कहना यह है कि देश के हर परिवार को 2018 की समाप्ति से पूर्व विश्वसनीय (reliable) और खर्च वहन करने योग्य (affordable) बिजली मिलने लगे.
  5. ऐसे, आंकड़े बताते हैं कि देश में  प्रति व्यक्ति बिजली खपत विश्व औसत से मात्र एक तिहाई है, और चीनी औसत से भी. 
  6. वर्ल्ड रिज़र्व के मुकाबले देश में गैस रिज़र्व मात्र 0.6 %, तेल रिज़र्व 0.4 % और कोल रिज़र्व 7% है.
  7. ताजा आंकड़ों के मुताबिक़ देश में सम्प्रति 300 बिलियन टन कोल रिज़र्व है. 
  8. वर्तमान में देश में सालाना कोल उत्पादन 660  मिलियन टन होता है.
  9. अभी भी देश में कुल बिजली उत्पादन का करीब 60 % कोयले पर निर्भर है.
  10. बिजली के उत्पादन, संचरण एवं वितरण में जो तमाम तरह की  कमियां और अनियमिततायें हैं, उन पर गंभीरता से ध्यान देने की जरुरत है.
  11. हमें ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों पर ज्यादा ध्यान देने की जरुरत तो है, लेकिन साथ ही ऊर्जा के संरक्षण पर भी उतना ही ध्यान देना आवश्यक  है. 
  12.  झारखण्ड के मुख्यमंत्री के अनुसार झारखण्ड राज्य 'पॉवर हब' बनने की ओर अग्रसर है. 
आशा है, समय - समय पर ऐसे संवाद आयोजित होते रहेंगे, क्यों कि जनसंवाद से समस्या समाधान की ओर अग्रसर होने की प्रक्रिया समावेशी विकास और लोकतंत्र की मजबूती के लिए बेहद जरुरी है. आप क्या कहते हैं? 
                                                                       (hellomilansinha@gmail.com)
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Tuesday, December 19, 2017

आज की बात : ठण्ड में संबंधों की गर्माहट

                                                          - मिलन सिन्हा 
प्याज-लहसुन-अदरख-नींबू आदि बेचनेवाले कलीम की दुकान में आज भीड़ कम है. जाड़े का शुरूआती दौर है. सुबह हल्की बूंदा-बांदी हुई है, सो ठण्ड थोड़ी ज्यादा है. बेशक प्याज का भाव गर्म है, 60 रूपये प्रति किलोग्राम. बाएं हथेली में खैनी (देशी तम्बाकू) दबाये उसने छोटी टोकरी आगे बढ़ा दिया, प्याज चुनकर रखने के लिए. 

प्याज चुनते हुए मैंने पूछा कि आखिर इस मौसम में इतनी मेहनत करने की क्या जरुरत है?

बच्चों -परिवार के भले के लिए, उनके भविष्य के लिए - कलीम ने झट उत्तर दिया.

लेकिन वे लोग तो जल्दी ही सड़क पर आ जायेंगे, आप कितना भी कुछ कर लो - मैंने उसकी आँख में आँख  डालकर कहा.

सुबह-सुबह ऐसा क्यों बोल रहे हैं आप ? ऐसा क्यों होगा ? - कलीम ने नाराज होते हुए पूछा.

कैंसर का नाम सुना है? आज नहीं तो कल तुम कैंसर के शिकार होगे और फिर सोचो तुम्हारा क्या होगा? न कमाने लायक रहोगे और न ही तुम्हारी थोड़ी-बहुत बचत से बहुत कुछ हो पायेगा? बस इस खैनी खाने के कारण! क्यों खाते हो इस जहर को ?- मैंने एक सांस में सब कुछ कह दिया.

आदत हो गयी है, क्या करें? आप बिलकुल ठीक कहते हैं. लीजिये, आज से, अभी से इसे छोड़ता हूँ -  इतना कह कर कलीम ने खैनी को दूर फेंका. फिर मेरे लिए प्याज तौलने लगा.

इस दौरान  मैंने कैंसर के विषय में उसे और कुछ बताया. स्वास्थ्य पर खैनी- तम्बाकू आदि के विभिन्न गंभीर दुष्प्रभावों के बारे में बताया और यह भी कहा कि मैं दो-तीन दिन बाद फिर देखूंगा कि उसने खैनी खाना फिर शुरू तो नहीं कर दिया. 

न जाने मेरी बातों का क्या असर हुआ कि कलीम ने मुझसे न केवल यह वादा किया कि वह अब कभी खैनी नहीं खायेगा बल्कि हमारे सामने ही खैनी के चुनौटी ( छोटा डब्बा) को बहुत दूर फेंक दिया. 
    
सच कहूँ आपलोगों से, तब से मुझे बहुत अच्छा लग रहा है.

कलीम आप स्वस्थ रहो, बहुत उन्नति करो. तुम्हारे पूरे परिवार को मेरी हार्दिक शुभकामनाएं. और हाँ, अपने आसपास किसी को खैनी खाते देखो, तो उसे भी बताना, टोकना... ....            (hellomilansinha@gmail.com)

                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं