Tuesday, January 14, 2020

नई राहें / यूजफुल टिप्स : जॉब मार्केट में कैसे रहें डिमांड में ?

                                                - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर, वेलनेस  कंसलटेंट ...
हम सब जानते हैं कि दुनिया परिवर्तनशील है. उदारीकरण के इस दौर में नौकरी का बाजार भी कई प्रकार के परिवर्तन का गवाह रहा है. पिछले दो-तीन दशकों में  नौकरी पाने को इच्छुक लोगों की बढ़ती संख्या के कारण मांग और आपूर्ति का अर्थशास्त्रीय गणित गड़बड़ा गया है. सरकारी  या अर्द्ध सरकारी नौकरी का दायरा सिमटता जा रहा है. अब ज्यादातर नौकरियां निजी क्षेत्र में उपलब्ध हैं. नौकरी का परम्परागत चरित्र भी बदल गया है. अब बहुत कम संख्या में लोग एक संस्थान में नौकरी ज्वाइन करते हैं और वहीँ  से रिटायर यानी सेवानिवृत होते हैं. अब तो नौकरी के बाजार में लोगों को 5-10 साल में तीन-चार नौकरियां  बदलते देखना जैसे आम बात हो गई है, बेशक इस दौरान उन्हें अनिश्चितता और अतिरिक्त तनाव से निबटना पड़ता है. ये सारी  बातें सही हैं. लेकिन इन सब चुनौतियों के बावजूद हमारे देश में आज और भविष्य में भी नौकरी चाहनेवालों और नौकरी करनेवालों की संख्या में न तो कमी आएगी और न ही नौकरी के बदलते मानदंडों और जरूरतों को समझने और साधनेवाले लोगों में कमी होगी. ऐसा इसलिए कि मानव स्वभाव ही चुनौतियों और बदलाव को गले लगाकर सफलता की सीढ़ियां चढ़ते जाने का रहा है. हां, इसके लिए कुछ बुनियादी बातों को दैनंदिन जीवन में अमल में लाने की आवश्यकता होती है, तभी हम नौकरी हासिल  करने के अलावे जॉब या कैरियर  में ग्रोथ को भी सुनिश्चित कर पायेंगे. आइए, पांच अहम बातों पर चर्चा करते हैं. 

1. स्वामी विवेकानंद कहते हैं कि सब शक्तियां हममें मौजूद हैं. हम कोई भी काम संपन्न कर सकते हैं. बस खुद पर विश्वास बनाएं रखें. गिरिजा कुमार माथुर की प्रेरक कविता की पहली पंक्ति इसी भाव को रेखांकित करते हुए कहती है कि हम होंगे कामयाब, हम होंगे कामयाब, मन में है विश्वास, हम होंगे कामयाब. लिहाजा हम खुद पर भरोसा रखें और मन के विश्वास को कभी कमजोर न होने दें. इसके बहुआयामी फायदे हैं. दरअसल, जॉब इंटरव्यू हो या प्रमोशन के लिए साक्षात्कार  या कार्यक्षेत्र में समस्या विशेष का समाधान तलाशने की बात, जॉब नॉलेज के साथ-साथ इसका असर भी हर जगह दिखता है. 
   
2. जीवन में होनेवाले बदलाव से घबराना ठीक नहीं. लम्बी जीवन यात्रा में कुछ बदलाव हमारे कारण होते हैं तो कुछ दूसरों के कारण. कुछ पर हमारा नियंत्रण होगा, कुछ पर कम होगा या बिलकुल नहीं होगा. ऐसा सबके साथ होता है. सफल लोग इन बदलावों को  नए अवसर के रूप में लेते हैं, उनका निष्पक्ष विश्लेषण करते हैं  और तदनुसार  रणनीति बनाकर आगे बढ़ते हैं. सोचिए जरा, सालभर बदलते मौसम के अनुरूप हमारे खान-पान से लेकर पहनावे तक हम कितनी स्वाभाविकता से सब कुछ अंगीकार कर जीवन का आनंद उठाते हैं. कुछ वैसा ही दृष्टिकोण कार्यक्षेत्र में होनेवाले चाहे-अनचाहे परिवर्तनों के प्रति रखें तो कई लाभ होंगे. 

3. सीखने का सिलसिला सदा जारी रखें. बीते हुए कल से आज हमारा कुछ बेहतर हो, इस फलसफे को अमल में लाकर हम खुद को निरंतर उन्नत कर सकते हैं. यह बेहतरी सोच, विचार, व्यवहार, ज्ञानार्जन, स्वास्थ्य आदि किसी भी मामले में हो सकता है. इससे हम सकारात्मक कार्यों से जुड़े रह पायेंगे और परिणामस्वरूप जीवन में सकारात्मक बदलाव के हकदार और भागीदार भी बनते जायेंगे. दुनिया में स्वस्थ, सफल और सुखी लोगों की जीवन यात्रा हमें यही संदेश तो देती है.

4. कुशल कर्मी बने रहने के लिए अपने कौशल को बढ़ाते और निखारते रहना जरुरी होता है. अपने कार्यक्षेत्र से संबंधित वर्तमान और भविष्य की चुनौतियों को ध्यान में रखकर कौशल विकास के पथ पर बढ़ते रहना सर्वथा अच्छा होता है. अगर नौकरी चेंज करने की मंशा है, तो संभावित पोजीशन और संस्थान को ध्यान में रखकर प्रो-एक्टिव प्लानिंग और तैयारी करना बेहतर  है. हम सबको एक और बात का जरुर ख्याल रखना चाहिए और वह यह कि जब भी किसी संस्थान से नौकरी छोड़ें तो विदाई में अपनी तरफ से पूरी शालीनता और सदभाव बनाए रखें; सबके प्रति आभार प्रकट करें. किसी तरह की कटुता न छोड़ कर जाएं और न ही ले कर जाएं.  कहा भी गया है कि आल इज वेल दि एंड्स वेल अर्थात अंत भला तो सब भला. यही नजरिया नए कार्यस्थल पर नौकरी ज्वाइन करते समय रखें. कहते हैं न कि वेल विगन इज हाफ डन अर्थात अच्छी शुरुआत आधा काम आसान कर देती है. खुले मन से अच्छाई के साथ जुड़ते रहना अच्छा है.

5. आज में यानी वर्तमान में जीना श्रेष्ठ माना गया है. यह विज्ञानं नहीं बल्कि एक कला है. जो बीत गई सो बात गई - सुप्रसिद्ध रचनाकार डॉ. हरिवंश राय बच्चन की एक कविता की पहली पंक्ति है. यूं भी जो आनेवाला कल है, वह भी तो एक दिन बाद का वर्तमान ही है. वर्तमान को अंग्रेजी में प्रेजेंट कहते है जिसका एक अर्थ उपहार भी होता है. वाकई वर्तमान हम सबके लिए सर्वोत्तम उपहार है. जिसने वर्तमान को सम्मान नहीं दिया, वह भविष्य में सम्मान का हकदार बनेगा इसकी संभावना क्षीण होती है. बोनस में अवांछित तनाव व दुश्चिंता से जूझना पड़ता है. पूर्व प्रधानमंत्री और कवि अटल बिहारी वाजपेयी की "जीवन बीत चला" शीर्षक  कविता की पहली चार पंक्तियां आज में जीने की महत्ता को बखूबी रेखांकित करती हैं: कल, कल करते, आज / हाथ से निकले सारे, / भूत, भविष्य की चिंता में / वर्तमान की बाजी हारे. कहने का अभिप्राय यह कि अगर हम कार्यक्षेत्र में अपने हर काम को बिना टालमटोल के या बिना देर किए  पूरी निष्ठा और तन्मयता से यथाशक्ति और यथाबुद्धि करने की कोशिश करें तो संतोष, सफलता और सम्मान सबको एन्जॉय कर पायेंगे.   
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Tuesday, January 7, 2020

हेल्थ मोटिवेशन : गुड हेल्थ के लिए साल्ट स्मार्ट होना जरुरी

                             - मिलन  सिन्हा,   हेल्थ मोटिवेटर  एवं  स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट 
आपने भी शायद वह कहानी पढ़ी होगी  जिसमें राजा की छोटी बेटी अपने पिता को नमक जैसा महत्वपूर्ण बताती है. नमक का हक़ अदा करने के सन्दर्भ में नमक हराम, नमक हलाल जैसे जुमले तो हम सब बचपन से सुनते आये हैं. नमक के एकाधिक विज्ञापनों में कई नामचीन लोगों को देश का नमक खाने और उसका हक़ अदा करने का वादा करते भी देखा-सुना है.

सच कहें तो खाने में नमक न हो तो भोजन बेस्वाद लगता है. तभी तो  नमक को सबरस कहा जाता है, सभी रसों के केन्द्र में रखा जाता है. कहने का अभिप्राय यह कि नमक हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. रसायन शास्त्र में नमक को  सोडियम क्लोराइड के नाम से जाना जाता है. सच पूछिए तो सोडियम क्लोराइड में 40 प्रतिशत सोडियम होता है और 60 प्रतिशत क्लोरीन. सोडियम हमारे शरीर के लिए एक जरुरी तत्व है. यह मनुष्य के शरीर में पानी का सही स्तर बनाए रखने से लेकर ऑक्सीजन और दूसरे पोषक तत्वों को शरीर के सभी अंगों तक पहुंचाने के काम में सहायता करता है. हमारे तंत्रिकाओं को सक्रिय बनाए रखने में भी यह अहम भूमिका अदा करता है. 

हमारे देश में आम आदमी आमतौर पर रिफाइंड नमक अर्थात आयोडाइज्ड नमक का इस्तेमाल करते हैं. दरअसल समुद्री नमक को रिफाइंड करने के क्रम में उसे कृत्रिम रूप से आयोडीन युक्त किया जाता है. इस आयोडाइज्ड नमक को घेंघा या गोइटर रोग से बचाव के लिए उपयोग करने की सलाह दी जाती है. ऐसे दूध, केला, सब्जी, अंडा आदि कई आम खाद्द्य पदार्थों के सेवन से भी हमें आयोडीन की पूर्ति होती है और वह भी प्राकृतिक रूप से. ज्ञातव्य है कि एक व्यस्क आदमी को प्रतिदिन एक सुई के नोंक के बराबर आयोडीन (150 mcg) की जरुरत होती है. 

दिलचस्प तथ्य है कि  सोडियम प्राकृतिक रूप से अनाज, सब्जियों, दूध, फल आदि चीजों में अलग-अलग मात्रा में मौजूद होता है. सोडियम युक्त चीजों में मूली, गाजर, मीठा आलू, ब्रोकली, पपीता, प्याज, टमाटर आदि शामिल हैं. कहने का मतलब, जो लोग मोटे तौर पर संतुलित आहार लेते हैं, उन्हें कई वैकल्पिक स्रोतों से भी सोडियम की आपूर्ति हो जाती है. साथ में उन्हें आयोडीन भी प्राकृतिक रूप में मिल जाता है. अतः उन्हें आयोडाइज्ड नमक लेने की खास जरुरत नहीं होती. आजकल ऐसे लोगों को सेंधा नमक इस्तेमाल करने की सलाह दी जाती है, क्यों कि आयोडीन की अधिकता भी हमारे शरीर के लिए नुकसानदेह हैं. रोचक बात यह भी है कि सेंधा नमक में अनेक मिनरल्स प्राकृतिक रूप से मौजूद होते हैं जो हमारे सेहत के लिए बहुत लाभकारी हैं. 

देखा जाए तो आजकल हमलोग नमक और नमकवाली चीजें कुछ अधिक ही खा रहे हैं.  हम अपने मुख्य भोजन में दाल, साग-सब्जी, मांस-मछली-अंडा, आचार, पापड़ आदि का खूब सेवन करते हैं, जिसमें नमक का जमकर प्रयोग होता है. नतीजतन, हमारे शरीर में नमक की मात्रा  यानी सोडियम की मात्रा मानक स्तर से कहीं ज्यादा बढ़ जाती है और इससे हमलोग अनायास ही ह्रदय रोग, हाइपरटेंशन, दमा, ओेस्टोपोरोसिस, किडनी स्टोन जैसी कई  घातक बीमारी की चपेट में आ जाते हैं.

हम सब यह भी जानते हैं कि नमक का व्यापक प्रयोग खाने की चीजों में स्वाद के अलावे परिरक्षक (प्रिज़र्वेटीव) के रूप में भी किया जाता रहा है. मक्खन, आचार, भुजिया, गाठिया, चिप्स, कुरकुरे जैसे अनेक डब्बाबंद एवं पैकेट में मिलनेवाली नमकीन चीजों में नमक यानी सोडियम  की मात्रा अपेक्षाकृत ज्यादा होने का यह भी एक कारण है. काबिलेगौर बात है कि यही अधिक सोडियम युक्त चीजें रोगों को बढ़ानेवाला साबित हो रहा है. 

दिलचस्प तथ्य है कि कई बार डॉक्टर आदि के कहने पर हम नमक तो खाना कम कर देते हैं लेकिन डिब्बाबंद पेय सहित कुछ अन्य चीजों का ज्यादा सेवन करने लगते हैं. जानने योग्य बात है कि इन सबमें बेकिंग सोडा या  प्रिज़र्वेटीव का उपयोग होता है जिसमें सोडियम मौजूद होता है.

पाया गया है कि एक औसत भारतीय वयस्क के दैनिक आहार में 8 ग्राम से ज्यादा नमक होता है अर्थात 3 ग्राम से ज्यादा सोडियम जब कि बेहतर स्वास्थ्य के लिए करीब 4 ग्राम नमक काफी है अर्थात करीब 1.5 ग्राम सोडियम. बताते चलें कि एक रिपोर्ट के मुताबिक़ ब्रिटेन में एक जागरूकता अभियान के परिणाम स्वरुप वर्ष 2003 से 2011 के बीच नमक के इस्तेमाल में 15 फीसदी की कमी आई. इसका सीधा एवं सकारात्मक असर स्ट्रोक तथा  ह्रदय रोग के मामले में 40% तक की  कमी के रूप में सामने आया. जापान, फ़िनलैंड, अमेरिका सहित अन्य कई देशों ने भी समय-समय पर जागरूकता अभियान के जरिए लोगों को इस दिशा में प्रेरित करने का काम किया है और इससे इन देशों में ह्रदय रोग सहित अन्य कई रोगों के मरीजों की संख्या में कमी आई है.

ऐसा भी पाया गया है कि नमक या नमकीन चीजों का ज्यादा सेवन करनेवाले लोग अपेक्षाकृत जल्दी मधुमेह के शिकार होते हैं, क्यों कि ऐसे लोगों को नमकीन चीजें खाने के बाद मीठा खाने की प्रबल इच्छा होती है और सामान्यतः वे लोग जरुरत से ज्यादा मिठाई और मीठे पेय पदार्थ - पेप्सी, थम्स अप, कोकाकोला, स्प्राइट, माजा आदि का सेवन करते हैं.

सार-संक्षेप यह कि नमक या सोडियम हमारे शरीर के लिए जरुरी है, लेकिन इसका अत्यधिक सेवन सेहत के लिए बहुत हानिकारक है. अतः इसके सेवन में बुद्ध का मध्यम मार्ग अपनाना सबसे अच्छा माना गया है. हां, अंत में एक गौरतलब बात और. हर व्यक्ति को अपनी शारीरिक स्थिति एवं जरुरत के साथ-साथ मौसम को ध्यान में रख कर नमक का उपयोग करना चाहिए.   
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Tuesday, December 31, 2019

हेल्थ मोटिवेशन : बेहतर स्वास्थ्य के लिए पानी पीने की कला में पारंगत होना जरुरी

                                    - मिलन  सिन्हा,   हेल्थ मोटिवेटर  एवं  स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट 
हमारी पृथ्वी पर करीब 70% जल है, फिर भी विश्वभर में जल समस्या पर चर्चा आम है, चाहे वह प्रति व्यक्ति जल की उपलब्धता की बात हो, जल जनित बीमारियों से हर साल देश में मरनेवालों की बात या जल को लेकर राज्यों के बीच विवाद. हमारे स्वास्थ्य को सन्दर्भ में रख कर बात करें तब  भी हम सबने सुना है, सोचा है और कभी-न-कभी कहा भी है  कि जल ही जीवन है, जल नहीं तो कल नहीं और बिन पानी सब सून. यह बिलकुल सही है.

रोचक तथ्य है कि एक व्यस्क व्यक्ति के शरीर में करीब 60% जल है, बच्चों में यह प्रतिशत कुछ ज्यादा तो बुजुर्गों में थोड़ा कम होता है. यूँ कहें तो हम सभी चलते फिरते पानी के बोतल है. शरीर में पानी की कमी हो जाए तो हमारा शारीरिक संतुलन बिगड़ने लगता है, कई तरह की स्वास्थ्य समस्या पैदा होने लगती है और कई बार तो पानी चढ़ाने तक की नौबत आ जाती है . तो चलिए, मानव स्वास्थ्य से जल के अदभुत रिश्ते की थोड़ी विवेचना करते हैं. 

विभिन्न अवसरों पर अपने हेल्थ मोटिवेशन सेशन में अलग–अलग तबके एवं उम्र के लोगों से मुलाक़ात तथा चर्चा के क्रम में यह बात स्पष्ट रूप से सामने आई कि अधिकांश लोग पानी पीने की कला  में पारंगत नहीं हैं.  कहने का अभिप्राय यह कि ज्यादातर लोगों को नहीं मालूम कि  पानी कैसे पीना चाहिए, कितना पीना चाहिए, कब पीना या कब नहीं पीना चाहिए. 

दरअसल अधिकांश लोग पानी पीते नहीं, गटकते हैं जैसे कि उन्हें पानी पीने तक की फुर्सत नहीं है. यह भी बताते चलें कि खड़े-खड़े बोतल से मुंह में पानी उड़ेलना और उसे फटाफट गटकना स्वास्थ्य की दृष्टि से सही नहीं है.  पीने का अर्थ है धीरे -धीरे जल ग्रहण करना और वह भी बैठ कर आराम से. सच पूछें तो स्वास्थ्य की दृष्टि से गिलास में मुंह लगाकर आराम से चाय या कॉफ़ी के तरह सिप करते हुए पानी पीना और यह महसूस करना कि इससे हमारा शरीर जलयुक्त हो रहा है या हमारा शरीर रूपी अदभुत पेड़ अच्छी तरह सींचित हो रहा है,  सबसे अच्छा माना गया है. कहते हैं इस तरह पानी पीनेवाले अम्लता और मोटापे से भी बचे रह सकते हैं. 

रोज सुबह नींद से उठने के तुरत बाद कम से कम आधा लीटर गुनगुना पानी पीना हमारे सेहत के लिए बहुत लाभकारी होता है. अगर इसे और प्रभावी बनाना है तो गुनगुने पानी में आधा नींबू निचोड़ लें. अगर आप ह्रदय रोग के मरीज नहीं हैं तो आप उस नींबूयुक्त पानी में थोड़ा सेंधा नमक मिला लें, लाभ ज्यादा मिलेगा. कुछ लोग जो मधुमेह से पीड़ित नहीं हैं, वे नींबू के साथ एक चम्मच शहद मिलाकर पीते हैं. इस तरह से अगर हम सुबह पानी का सेवन करते हैं तो इसका इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाने एवं शरीर से विषैले तत्वों को बाहर निकालने  के अलावे  एकाधिक फायदे हैं. बताते चलें कि सामान्य तापमान से बहुत ज्यादा ठंडा या गर्म पानी हमारे शरीर के लिए अच्छा नहीं होता है. 

विशेषज्ञ यह भी कहते हैं  कि खाने के तुरत पहले, खाना खाने के बीच में और खाने के तुरत बाद पानी नहीं पीना चाहिए, क्यों कि इससे पाचन क्रिया दुष्प्रभावित होती  है. ऐसे, कभी किसी विषम परिस्थिति में दो-चार घूंट पानी पीना असामान्य बात नहीं है. हां, स्वास्थ्य विशेषज्ञ खाना खाने के कम-से-कम 40  मिनट पहले और खाना खाने के 40 मिनट बाद पानी पीने की सलाह देते हैं.  

सभी विशेषज्ञ बताते हैं कि शरीर जितना हाइड्रेटेड रहेगा, हम उतना ही स्वस्थ रहेंगे.  ज्ञातव्य है कि दिनभर में हमारे शरीर से कई तरीके से पानी निकलता रहता है. लिहाजा शरीर में पानी का अपेक्षित स्तर बनाए रखना अनिवार्य है. खासकर रात में सोने से पूर्व पानी अवश्य पीना चाहिए, इससे हार्ट व ब्रेन स्ट्रोक की संभावना कम हो जाती है. तनाव प्रबंधन में पानी की अच्छी भूमिका होती है. कभी मानसिक तनाव हो तो एक गिलास पानी घूंट-दर-घूंट पीकर इसका सुखद अनुभव कर सकते हैं. 

कहने का सीधा अर्थ यह कि सही मात्रा, सही समय और सही तरीके से पानी पीने से हम कब्ज, पिम्पल्स, मोटापा, मधुमेह, किडनी स्टोन, चर्म रोग, आर्थराइटिस, कोलाइटिस, हाई ब्लड प्रेशर, गैस की समस्या, नाक और गले की समस्या, माइग्रेन आदि शारीरिक समस्याओं से बचे रह सकते हैं. सार-संक्षेप यह कि दूसरों को 'पानी पिलाने' के मुहावरे को चरितार्थ करने के बजाय  खुद पानी पीने की कला में पारंगत होना हर दृष्टि से बेहतर स्वास्थ्य की बड़ी गारंटी है.

अंत में एक अहम बात. अगर कोई व्यक्ति किसी रोग विशेष से पीड़ित हैं  और डाक्टरी इलाज में हैं तो डॉक्टर की सलाह के मुताबिक़ ही पानी पीएं.     
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Tuesday, December 24, 2019

निर्णय लेना है लीडरशिप क्वालिटी

                                                                        - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर... .... 
विश्वप्रसिद्ध अमेरिकी रचनाकार मार्क ट्वेन कहते हैं कि अच्छा निर्णय अनुभव से आता है और अनुभव आता है खराब निर्णय से. कहने का मतलब बिलकुल साफ़ है कि हर हालत में निर्णय लेना जरुरी है. जैसे-जैसे हम जीवन पथ पर आगे बढ़ते हैं, हर मोड़ पर या चौराहे पर हमें यह निर्णय करना पड़ता है कि किधर जाएं यानी किस ओर मुड़ें जिससे कि हम अपने लक्ष्य या गंतव्य तक आसानी से पहुंच सकें. विद्यार्थियों के लिए इसकी अहमियत कुछ ज्यादा है क्यों कि वे फिलहाल परिवर्तन के बड़े दौर से गुजर रहे होते हैं. छोटे-बड़े निर्णय उन्हें लेने पड़ते हैं और लेना भी चाहिए. ऐसे भी बिना  निर्णय लिए विकास के रास्ते में अग्रसर होना मुश्किल होता है और आपके जीवन का निर्णय कोई और ले तो फिर  अच्छे-बुरे की आपकी समझ कब विकसित होगी और कब आप सही अर्थों में आत्मनिर्भर बनेंगे. इसका कतई यह मतलब नहीं कि कोई भी विद्यार्थी अपने अभिभावक की बात न सुनें, उनके निर्णय को मानें ही नहीं. अभिभावक तो आपके सबसे बड़े हितैषी होते हैं और आपको शिक्षित करने के पीछे उनका एक बड़ा मकसद यह होता है कि आपमें सही और गलत की समझ विकसित हो जिससे आप धीरे-धीरे सही निर्णय लेने में सक्षम होते जाएं. 
   
देखा गया है कि कुछ विद्यार्थी सोच-समझ कर निर्णय लेते हैं जब कि कई विद्यार्थी निर्णय लेकर सोचते हैं. सब जानते है कि इनमें से बेहतर कौन माने जाते हैं. हां, कुछ विद्यार्थी ऐसे भी होते हैं जो निर्णय करने में नहीं, निर्णय टालने में विश्वास करते हैं. इसके कई मनोवैज्ञानिक कारण हो  सकते हैं. एक आम कारण जो ऐसे विद्यार्थी अपने साथियों को बताते हैं वह यह कि उन्हें कोई निर्णय लेने से पहले और सोचना है. कहने का सीधा अभिप्राय यह कि इस श्रेणी के विद्यार्थी सोचते बहुत हैं, पर करते बहुत कम हैं. सभी जानते हैं कि सोचना एक मानवीय गुण है, लेकिन केवल सोच में पड़े रहने को क्या कहेंगे? वास्तव में सोचना कोई बुरी बात नहीं है, अपितु किसी कार्य को प्रारंभ करने से पहले उसके विषय में सोचना तो अच्छी बात है. यूँ कहें कि सोचना किसी कार्य को ठीक से संपन्न करने के लिए एक जरुरी प्रक्रिया है. लेकिन हर काम की एक समय सीमा तो होती ही है. इस विषय पर प्रसिद्ध मार्शल आर्ट कलाकार एवं फ़िल्म अभिनेता ब्रूस ली का कहना है कि ‘अगर आप किसी चीज के बारे में सोचने में बहुत अधिक वक्त लगाते हैं, तो फिर आप उस काम को कभी नहीं कर पायेंगे.’ मेरा स्पष्ट मत है कि सोचने, निर्णय लेने और उसे कार्यान्वित करने में एक परिभाषित संबंध तथा  सामंजस्य का होना वाकई बहुत जरुरी एवं वांछनीय है. विश्व इतिहास के महान विजेताओं में से एक एवं फ्रांस के महान सम्राट नेपोलियन बोनापार्ट जो ‘असंभव’ शब्द को अपने शब्दकोष का हिस्सा  नहीं मानते थे, ने इसी सिद्धांत को व्यवहार में उतारा और कई उल्लेखनीय कार्य किये. इतिहास के पन्ने महान व्यक्तियों के ऐसे नजीरों से भरे पड़े हैं. 

हाल ही में प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी में जुटे  प्रतिभागियों से पर्सनल काउंसलिंग के दौरान कई विद्यार्थी ने बताया कि उन्हें निर्णय लेने में, खासकर बड़े निर्णय लेने में डर लगता है कि अगर कहीं निर्णय गलत हो गया तो क्या होगा? इसका दोष मेरे सिर पर आएगा आदि आदि. जिम कैंप कहते हैं, "अनावश्यक डर कि फैसला गलत हो जाएगा, सही फैसला लेने के मार्ग में सबसे बड़ा अवरोध है." सही बात है. किसी भी विषय पर कोई भी निर्णय लेने से पहले हर समझदार विद्यार्थी सोच-विचार करते हैं, रिस्क-रिवॉर्ड की विवेचना करते हैं, शंका-आशंका-दुविधा की स्थिति  में  बड़े-बुजुर्गों और जानकारों की राय भी लेते हैं, लेकिन उद्देश्य होता है सही निर्णय लेना, न कि निर्णय को टालना या निर्णय न लेना. विचारणीय तथ्य यह है कि जिनको भी फैसना न लेने या टालने की आदत लग जाती है, उनके व्यक्तित्व में ज्ञान, आत्मविश्वास, दृढ़ निश्चय आदि की कमी साफ़ झलकती है. ऐसे विद्यार्थियों को हर मामले में इसका बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ता है. इसके विपरीत आपके आसपास भी बहुत सारे  विद्यार्थी होंगे  जिन्हें आप निर्णय लेने और ज्यादातर मामले में सही निर्णय लेने में सक्षम पायेंगे. ऐसे विद्यार्थी नॉलेज इज पॉवर को अहम मानते हैं और खुद के अनुभवों के साथ-साथ दूसरों के अनुभवों से बराबर सीख लेते रहते हैं. एक बात और. ऐसे विद्यार्थी निर्णय लेने के बाद उसके साथ हमेशा खड़े रहते है. इतना ही नहीं, अगर कोई फैसला गलत हो जाए तो उसका दोष दूसरों पर कभी नहीं थोपते हैं, बल्कि उसकी पूरी जिम्मेदारी खुद लेते हैं. ऐसे विद्यार्थी ही धीरे-धीरे नेतृत्व के बहुमूल्य गुणों से लैस होते जाते हैं और अपना, अपने परिवार,समाज और देश का कल्याण करने योग्य बनते हैं.  
(hellomilansinha@gmail.com)     

                 
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# लोकप्रिय साप्ताहिक "युगवार्ता" के 10.11.2019 अंक में प्रकाशित
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Tuesday, December 17, 2019

समस्या है तो समाधान भी है

                                                                          - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर... ....
सभी छात्र-छात्राओं के जीवन यात्रा में छोटी-बड़ी समस्या आती रहती है और हर कोई अपनी समझ और शक्ति से उन समस्याओं को सुलझाने का यथासाध्य प्रयास करते हैं. धीरे-धीरे अपने ज्ञान, अनुभव  और बड़ों के मार्गदर्शन से समस्याओं का समाधान पाना आसान होता जाता है. दुनिया में कोई ऐसा विद्यार्थी नहीं होगा जिसके जीवन में कभी कोई समस्या नहीं रही हो या आगे नहीं रहेगी. अनेक महान लोगों का मानना है कि समस्या एक उपहार के तरह है. बिना समस्या के हमारा सही विकास नहीं हो सकता है. दरअसल, समस्या कोई बड़ी समस्या नहीं होती है. इसके प्रति हमारा  नजरिया होता है.

आमतौर पर यह देखा जाता है कि कई विद्यार्थी हर समस्या को एक अवसर के रूप में देखते हैं जब कि कई विद्यार्थी अवसर को भी समस्या मानते हैं. कई विद्यार्थी ऐसे भी होते हैं जिनको  हर चीज में समस्या ही नजर आती है. वे छोटी समस्या को भी बड़ा बनाकर देखते हैं, साथी-सहपाठी को दिखाते भी हैं. इनमें से ज्यादातर विद्यार्थी थोड़े डरपोक और आलसी  होते हैं.  वे अपने अभिभावकों के सामने  छोटी कठिनाई को भी बड़ी समस्या बनाकर पेश करते हैं, जिससे कि उनके अभिभावक उन्हें उनकी गलतियों के लिए डांटे नहीं, बल्कि उनके प्रति सहानुभूति दिखाएं. ऐसे विद्यार्थी अपना तो नुकसान करते हैं, साथ में अपने कुछ सहपाठियों को भी गलत तरीके से अपने पाले में करके उनको भी नुकासान का भागीदार बनाते हैं. हां, इन सबको काउंसलिंग की जरुरत होती है.

मेरी तो स्पष्ट मान्यता रही है कि जहां भी कोई समस्या है, उसका कोई-न-कोई समाधान भी है. इतना ही नहीं, आमतौर पर उस समाधान का संकेत भी समस्या में निहित होता है. एक छोटे उदाहरण से इसे समझते हैं. कई बार सड़क पर वाहन चलाते हुए जब चौराहे या सिग्नल से कुछ पहले ही अप्रत्याशित जाम दिखता है तो सबको यह संकेत मिल जाता है कि आगे जल्दी निकलना बहुत मुश्किल होगा और तब समझदार लोग वैकल्पिक रास्ते तलाश कर, छोटी गली से गुजरकर फिर आगे मुख्य सड़क पर आ जाते हैं. कहने का अभिप्राय यह कि विद्यार्थी जीवन में या आगे भी  समस्या से आमना-सामना होना कोई असामान्य बात नहीं है. असामान्य यह है कि छात्र-छात्राएं  उनसे घबड़ा जाएं, विचलित या उत्तेजित या तनावग्रस्त हो जाएं. देखा यह भी जाता है कि समस्याओं से सामना होने पर कुछ विद्यार्थी तो बस अपना घुटना टेक देते हैं. मैदान ही छोड़ देते हैं अर्थात पढ़ाई-लिखाई या जो काम कर रहे थे उसे ही छोड़ देते हैं.  ऐसे विद्यार्थियों को समझने की जरुरत है कि समस्या जीवन की सामान्य चुनौती है जो उनके ज्ञान, साहस, संयम, क्षमता, आत्मविश्वास आदि की परीक्षा ले रहा  है. वस्तुतः जीवन की हर सफलता उन चुनौतियों को पार कर आगे निकलने का नाम है. लिहाजा समस्या से निजात पाने का सर्वोत्तम तरीका समस्या का समाधान हासिल करना है, उसे छोड़कर भागना नहीं. आइए, आगे बढ़ने से पहले प्रख्यात कवि और लेखक डॉ. हरिवंश राय बच्चन की एक प्रेरक  कविता की कुछ पंक्तियां पढ़ लें : "असफलता एक चुनौती है, स्वीकार करो / क्या कमी रह गयी देखो और सुधार करो / जब तक न सफल हो नींद-चैन को त्यागो तुम / संघर्षों का मैदान छोड़ मत भागो तुम / कुछ किए बिना ही जयजयकार नहीं होती / हिम्मत करने वालों की कभी हार नही होती."

अब सवाल है कि समस्या से समाधान तक पहुंचने के लिए जरुरी योग्यता या क्षमता या दृष्टि  कैसे विकसित करें? सर्वप्रथम तो सोच के स्तर पर हमेशा पॉजिटिव बने रहें. आप जैसा सोचते हैं  आपका शरीर वैसे ही रियेक्ट करता है. अतः "मैं कर सकता हूं और मैं करूंगा" के सोच और आत्मविश्वास से समस्या का सामना करें. खुद को संयत बनाए रखें. आंख, कान और दिमाग खुला रखें जिससे कि आप समाधान के संकेतों को पकड़ और समझ सकें. समस्या के चरित्र के हिसाब से समाधान का तरीका अपनाना बेहतर होता है. परिस्थिति विशेष में उपलब्ध विकल्पों में से जो भी विकल्प सही लगे उस पर विचार कर कदम उठाएं. समस्या बड़ी हो तो उससे जुड़े सभी तथ्यों को इकठ्ठा करके उसकी निष्पक्ष एवं तर्कपूर्ण ढंग से विवेचना करें. मौका मिले तो डिटेल्स एक कागज़ पर लिख लें. इससे समस्या से जुड़ी हर जरुरी बात स्पष्ट रूप से आपके सामने होती है. जरुरत महसूस हो तो बिना संकोच अपने अभिभावक, हितेषी या किसी एक्सपर्ट से मार्गदर्शन  प्राप्त करें. पूरे प्रोसेस में "हम होंगे कामयाब, मन में है विश्वास" की भावना से भरे रहना बहुत ही लाभदायक सिद्ध होगा. समस्याओं  को मौके में तब्दील करते रहने और समाधान की मंजिल तक पहुंचने-पहुंचाने वाले अनेक महान लोगों की जिंदगी से भी हमें यही तो सीख मिलती है.  
(hellomilansinha@gmail.com)     

                 
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 

# लोकप्रिय साप्ताहिक "युगवार्ता" के 03.11.2019 अंक में प्रकाशित
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Tuesday, December 10, 2019

मेहनत का कोई विकल्प नहीं

                                                             - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर... ...
मेहनत का फल मीठा होता है, ऐसा सभी कहते हैं, जानते और मानते भी हैं. कर्म और फल के चिरपरिचित रिश्ते के विषय में सभी को मालूम है. सतत कड़ी मेहनत के सहारे साधारण विद्यार्थियों को असाधारण सफलता हासिल करते हुए देखना कोई असामान्य बात नहीं है. मेधावी छात्र-छात्राओं को औसत रिजल्ट पाते हुए देखना भी उतना ही सच है, क्यों कि वहां मेहनत का अभाव होता है. कछुआ और खरगोश की कहानी सभी विद्यार्थियों ने बचपन में ही पढ़ी है. खरगोश कछुआ की तुलना में बहुत तेज भाग सकता है, लेकिन दोनों के बीच के दौड़ में कछुआ विजयी होता है, खरगोश नहीं. कारण धीमी गति से चलनेवाला कछुआ सतत चलता रहा यानी सतत मेहनत करता रहा, जब कि बहुत तेज गति से दौड़नेवाले खरगोश ने ऐसा नहीं किया. स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी या किसी अन्य संस्थान में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के साथ भी ऐसा ही होता है.

बिना कड़ी मेहनत के जीवन के किसी क्षेत्र में बड़ी सफलता हासिल करना संभव नहीं होता है. क्रिकेट से लेकर कबड्डी तक, संगीत से लेकर नृत्य तक, चिकित्सा विज्ञानं से लेकर अन्तरिक्ष विज्ञानं तक हर क्षेत्र में सफलता का झंड़ा गाड़नेवाले लोगों की जीवन यात्रा कड़ी मेहनत की कहानी कहता है. प्रसिद्ध अमेरिकी फुटबॉल खिलाड़ी तथा कोच विन्सेंट थॉमस लोम्बार्डी सही कहते हैं कि लीडर  पैदा  नहीं  होते, खुद बनते हैं - कड़ी मेहनत की वजह से. और  यही  वो  कीमत  है  जो  इस  या  किसी  और  लक्ष्य   को  प्राप्त  करने  के  लिए  चुकानी  पड़ती  है.

आइए, यहां देश के दो महान सपूतों की थोड़ी चर्चा करते हैं, जिन्होंने कड़ी मेहनत के बलबूते साधारण से असाधारण बनकर इतिहास रचा और देश का नाम रौशन किया. पहले देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के विषय में जानते हैं.  शास्त्री जी जब मात्र डेढ़ वर्ष के थे उस समय ही उनके पिता जी का देहांत हो गया. पैसे के अभाव में उन्हें नंगे पांव ही कई किलोमीटर दूर अपने स्कूल जाना पड़ता था - गर्मी, सर्दी और बरसात हर मौसम में. स्वतंत्रता संग्राम के दिनों की बात हो या बाद में केंद्र में कई मंत्रालयों के मंत्री और अंत में प्रधानमंत्री की बात हो, हमेशा कड़ी मेहनत करके उन्होंने अपनी क्षमता और दक्षता का उत्कृष्ट उदहारण पेश किया. एक प्रश्न के उत्तर में शास्त्री जी ने एक बार कहा था कि मेहनत तो प्रार्थना करने के समान है. अर्थात पूरी निष्ठा और आस्था के साथ मेहनत करने में वे विश्वास करते थे.  

विख्यात वैज्ञानिक एवं देश के पूर्व राष्ट्रपति ए. पी. जे. अब्दुल कलाम का जीवन भी कड़ी मेहनत की प्रेरक  दास्तान है. बचपन में सुबह-सवेरे अखबार वितरित करने के बाद स्कूल में पढ़ने जाने से लेकर घर के अन्य कार्य में सक्रिय रूप से लगे रहना उनका रोज का रूटीन था. पढ़ाई हो या रिसर्च या आम लोगों को अपने भाषण या सुझाव से प्रेरित  करने की बात हो, वे हर जिम्मेदारी को कड़ी मेहनत और लगन से बखूबी निभाते थे. राष्ट्रपति के रूप में भी वे सुबह से लेकर देर रात तक बहुत  मेहनत और लगन से कार्यों का निष्पादन में लगे रहते थे. विद्यार्थियों के साथ अपने वार्तालाप में वे हमेशा उनको भी कड़ी मेहनत के लिए प्रेरित किया करते थे.

विश्वविख्यात एप्पल कंपनी के सह-संस्थापक स्टीव जॉब्स कहते हैं, "कोई भी सफलता एक रात में नहीं मिलती है. उसके पीछे जाने कितने वर्षों की कड़ी मेहनत होती है." सौ फीसदी सही बात है. सभी विद्यार्थियों को इस बात को ठीक से समझने की जरुरत है. तभी वे हर पल का सदुपयोग करते हुए नियमित रूप से कड़ी मेहनत करेंगे - मामला अध्ययन का हो या खेलकूद का या अन्य कैरियर बिल्डिंग एक्टिविटी का. दरअसल, मेहनत को एन्जॉय करनेवाले विद्यार्थी छोटा-बड़ा  सब सवाल या प्रॉब्लम हल करते हैं, खूब प्रैक्टिस करते हैं और बीच-बीच में अपना टेस्ट खुद ही लेते हैं.  ऐसा इसलिए भी कि उन्हें सब चीज अच्छी तरह सीखने की इच्छा रहती है जिससे कि वे परीक्षा या टेस्ट में अच्छे मार्क्स ला सकें और साथ में उस क्षेत्र में काबिल भी बन सकें. हर क्षेत्र में सभी अच्छे विद्यार्थी इसी सिद्धांत पर अमल करके सफल होते रहे हैं.  सच कहें तो ऐसे सभी विद्यार्थी प्रसिद्ध कवि अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ की कर्मवीर शीर्षक कविता की इन पंक्तियों को वास्तव में रोज  जीते हैं : "जो कभी अपने समय को यों बिताते हैं नहीं / काम करने की जगह बातें बनाते हैं नहीं / आज  कल करते हुए जो दिन गँवाते हैं नहीं / यत्न करने से कभी जो जी चुराते हैं नहीं / बात है वह कौन जो होती नहीं उनके लिए / वे नमूना आप बन जाते हैं औरों के लिए."                               (hellomilansinha@gmail.com)       
                 
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 

# लोकप्रिय साप्ताहिक "युगवार्ता" के 27.10.2019 अंक में प्रकाशित
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Tuesday, December 3, 2019

क्रोध प्रबंधन की अहमियत

                                                                 - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर... .... 
हम सबको किसी-न-किसी बात पर कभी-न-कभी गुस्सा आता है, बेशक कम या ज्यादा. विद्यार्थियों में यह कुछ ज्यादा देखा जाता है. उम्र के इस पड़ाव में ऐसा होना असामान्य नहीं कहा जा सकता है. लिहाजा अपने रोजमर्रा की जिंदगी में हम सभी यहां-वहां विद्यार्थियों को  बात-बेबात गुस्सा करते देखते हैं. गुस्सा कुछ ज्यादा हो तो अपशब्द कहते, वस्तुओं को तोड़ते-फोड़ते तथा खुद अपना माथा ठोकते हुए भी देखते हैं. गुस्से में बेकाबू विद्यार्थियों के विषय में ज्यादा कहने की जरुरत नहीं.

क्रोध के बारे में महात्मा बुद्ध का कहना है, "क्रोध को पकड़े या थामे रखना गर्म कोयले को किसी और पर फेंकने की नीयत से पकड़े  रहने के बराबर है. इससे आप स्वयं जलते हैं." इसी बात को विश्व प्रसिद्ध लेखक  मार्क ट्वेन इन शब्दों में कहते हैं, "क्रोध एक तेज़ाब की तरह है जो उस वर्तन को ज्यादा नुकसान पहुंचता है जिसमें उसे रखा जाता है, वनिस्पत उसके जिस पर उसे डाला जाना है." फिर भी कई बार छात्र-छात्राएं छोटी-सी बात पर भी क्रोधित हो जाते हैं. इस तरह वे अपनी ऊर्जा का अपव्यय करते हैं और साथ ही अपने रिश्तों को नुकसान भी पहुंचाते हैं. क्रोधित होने का साफ़ मतलब है उत्तेजित और असंतुलित होना. अंदर जैसे कुछ भावनात्मक उबाल आ गया हो. मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि उस वक्त हमारा मानसिक संतुलन ठीक नहीं रह पाता है, फलतः चीखने-चिल्लाने के साथ हम अतार्किक एवं हिंसक भी हो जाते हैं. मुंह ज्यादा काम करता है और आंख-कान बहुत कम. कई बार गुस्से में कही गई बात दोस्ती के बीच बड़ी दीवार बन जाती है. यहां विद्यार्थियों के लिए जानने-समझने योग्य बात यह भी है कि गुस्से की स्थिति में शरीर के एड्रेनल ग्रंथि से एड्रेनालाईन तथा कॉर्टिसोल नामक स्ट्रेस हार्मोन्स का स्राव शुरू हो जाता है जिसकी अधिकता स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है. अनियंत्रित क्रोध के कारण सिरदर्द, अपच, अनिद्रा,  चिंता,  तनाव, अवसाद, उच्च रक्तचाप, ब्रेन स्ट्रोक, ह्रदय रोग जैसे अल्पकालिक तथा दीर्घकालिक समस्याएं होती हैं. तभी तो विख्यात दार्शनिक अल्फ्रेड अरमंड  मोंटापर्ट कहते हैं कि हर बार जब आप क्रोधित होते हैं, तब आप अपने ही सिस्टम में ज़हर घोलते हैं.

बहरहाल, मूल सवाल  है कि गुस्सा आता क्यों है और जब चाहे-अनचाहे आ ही जाता है तो फिर गुस्से को काबू में कैसे रखा जाए जिससे कोई बड़ी दुर्घटना या अनहोनी न हो जाय? कहते हैं कि गुस्सा स्वभावतः अन्याय, अत्याचार, शोषण, असफलता, अतृप्त इच्छा, अक्षमता, अहंकार आदि से जुड़ा है और अधिकांश मामले में किसी न किसी रूप में प्रकट होता है. क्रोध जनित उत्तेजना में शारीरिक गतिविधियां तेज हो जाती हैं. देखा गया है कि आवेगवश छात्र-छात्राएं अमर्यादित, अवांछित तथा गैरकानूनी काम कर बैठते हैं. कभी-कभी तो आत्मघाती कदम तक उठा लेते हैं जिससे जीवन तक ख़त्म हो जाता है. निरपेक्ष भाव से पीछे मुड़कर देखने पर उन्हें खुद  दुःख, शर्म एवं ग्लानि का एहसास होता है. लेकिन जो हो गया है उसे रिवाइंड तो नहीं किया जा सकता. उससे सीख लेकर आगे बेहतर करने की कोशिश की जा सकती है और वही होना भी चाहिए. 
   
क्रोध आने पर उसे कैसे नियंत्रित किया जाय, इसके लिए कुछ जाने-पहचाने सिद्धांत और  नुस्खें हैं जिसका लाभ प्रयोग की दृढ़ता और निष्ठा पर निर्भर करता है. मसलन, गुस्से की स्थिति में उस स्थान विशेष से हट जाएं; कहीं खुले स्थान में बैठ जाएं और आँखें बंद कर दीर्घ श्वास लें तथा  छोड़ें; धीरे-धीरे एक ग्लास पानी पीएं; एक से दस तक गिनती करें; हल्का एक्सरसाइज करें; पसंदीदा गाना सुनें; स्नान करें, सोने की कोशिश करें या फिर किसी अच्छे मित्र से बात करें. इससे  शारीरिक रूप से स्थिर रहना और मानसिक रूप से शांत रहना आसान होगा. जब बिलकुल स्थिर और शांत हो जाएं तब इस बात की थोड़ी विवेचना कर लें कि आखिर वे कौन-सी बातें या परिस्थिति हैं जब आप सामान्यतः क्रोधित  होते हैं और उसका आपके अनुसार कारण क्या होता है. कारण जानेंगे तो समाधान तक पहुंचना आसान हो जाएगा. और फिर आप भविष्य में क्रोधित होने पर भी अपने व्यवहार को नियंत्रित और संतुलित रख पायेंगे. आप कतई क्रोध से बेकाबू नहीं होंगे.  

तमाम शोध तथा सर्वेक्षण बताते हैं कि इन छोटे प्रयासों से क्रोध  को कंट्रोल और मैनेज करना एवं इसके एकाधिक दुष्प्रभावों से बचना संभव है. ऐसे, आसन-प्राणायाम-ध्यान के नियमित अभ्यास  से भी गुस्से को काबू में रखना सहज हो जाता है. इससे छात्र-छात्राएं शांति और सकून से अपनी पढ़ाई-लिखाई कर बेहतर रिजल्ट के हकदार बनते हैं. बोनस के रूप में खुद और घर-परिवार के लोग स्वस्थ और सानंद भी रह पाते हैं. 
 (hellomilansinha@gmail.com)

                 
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 

# लोकप्रिय साप्ताहिक "युगवार्ता" के 20.10.2019 अंक में प्रकाशित
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