Friday, September 17, 2021

जीवन में एक हॉबी जरुरी है

                              - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर एंड स्ट्रेस मैनेजमेंट  कंसलटेंट

मेरे मोटिवेशनल एवं वेलनेस सेशन में छात्र-छात्राएं अमूमन यह सवाल जरुर पूछते हैं कि अपने खाली समय का सदुपयोग कैसे करें जिससे कि जीवन में खुशी मिलती रहे और तनाव को मैनेज करना आसान हो. वाकई यह सवाल अमूमन हर विद्यार्थी से किसी-न-किसी रूप में जुड़ा है. इस प्रश्न का जवाब यह है कि हर विद्यार्थी का एक-न-एक हॉबी होना जरुरी है, जिसमें उसकी रूचि हो और अध्ययन के बाद बचे हुए समय में उसमें समय बिताने में वह आनंद महसूस करे. यहां यह स्पष्ट करना जरुरी है कि हॉबी का मतलब कोई पॉजिटिव एक्टिविटी जो व्यक्ति और समाज दोनों के लिए हितकारी हो.


इसमें कोई दो मत नहीं है कि विद्यार्थियों के लिए पूरे समय घर के अंदर रहकर केवल पढ़ाई करना कठिन होता है, खासकर इस महामारी के दौर में, जब बाहर जाने में पाबंदी है और गए तो बहुत सावधानी बरतने की बाध्यता होती है. काबिले गौर बात है कि इनमें से अधिकतर विद्यार्थियों के पास अपने खाली समय में करने को ज्यादा कुछ नहीं होता सिवाय अपने स्मार्ट फोन या कंप्यूटर-लैपटॉप पर व्यस्त होने और वह भी ज्यादातर समय नकारात्मक बातों या अप्रासंगिक साइट्स पर घूमते रहने के. इसके विपरीत वे विद्यार्थी जो अपेक्षाकृत स्मार्ट, बुद्धिमान और कुछ हद तक भाग्यवान  भी होते हैं  उनका  एक या ज्यादा हॉबी होता है. वैसे विद्यार्थी एकाधिक तरीके से बहुत फायदे में रहते हैं. ऐसा पाया गया है कि वे ज्यादा स्वस्थ, खुश और सफल भी रहते हैं. खुशी की बात है कि हॉबी की सूची बहुत बड़ी है और इन्हें इंडोर या आउटडोर एक्टिविटी के रूप में एन्जॉय किया जा सकता है. खासकर महामारी जैसे कठिन समय में कोई ऐसा हॉबी जिसे घर में रहकर ही एन्जॉय किया जा सकता है, वाकई  किसी वरदान से कम नहीं है. कहने की जरुरत नहीं कि  संगीत, नृत्य, पेंटिंग, अच्छी किताबें पढ़ना, कार्टून बनाना, सिलाई, कढ़ाई, ब्लॉग लिखना, शतरंज, कैरम बोर्ड जैसे कई अन्य हॉबी को अपना कर इसे अमल में लाया जा सकता है. बाहर जाकर अपने शौक को पूरा करने में हर तरह के मैदानी खेल जैसे हॉकी, फुटबॉल, क्रिकेट से लेकर लॉन टेनिस, कबड्डी, वॉलीबॉल तक कोई खेल या कोई  सामाजिक-सांस्कृतिक एक्टिविटी जैसे अनेकानेक हॉबी में छात्र-छात्राएं खुद को सकारात्मक रूप से व्यस्त रख सकते हैं.  


दिलचस्प तथ्य यह है कि विश्वभर में जितने भी विभूतियों  ने आम लोगों को प्रेरित और प्रोत्साहित किया है और कर रहे हैं, उन लोगों ने अपने मूल कार्यकलाप के अलावे अपने खाली  समय में एक या ज्यादा हॉबी में भी खुद को व्यस्त रखा है. प्रसिद्द वैज्ञानिक और पूर्व राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम को वीणा बजाने का शौक था. महात्मा गांधी को चरखे पर सूत कातना और प्राकृतिक चिकित्सा से जुड़े जन कल्याण का शौक था. महान भौतिकशास्त्री और नोबेल  पुरस्कार विजेता अल्बर्ट आइंस्टीन को वायलिन बजाने और नौकायन की हॉबी थी. कभी-कभार जब वे किसी वैज्ञानिक गुत्थी को सुलझाने के क्रम में उलझ जाते थे, तो माइंड को रिफ्रेश करने के लिए वायलिन बजाते थे. उसी तरह दो बार नोबेल पुरस्कार हासिल करनेवाली महिला  वैज्ञानिक मैरी क्यूरी को लम्बी दूरी तक साइकिल चलाने का शौक था. मजेदार बात है कि अपने हनीमून के दिन क्यूरी दम्पति ने उत्तरी फ्रांस में बहुत देर तक साइकिल चलाकर आनंद उठाया. धोनी, कपिल देव और इआन बोथम जैसे कई क्रिकेटर हॉबी के रूप में नियमित रूप से फुटबॉल खेलते रहे हैं.


दरअसल, अपने हॉबी के माध्यम से छात्र-छात्राएं अपने पसंदीदा एक्टिविटी में क्वालिटी टाइम  बिता सकते हैं और अपने स्ट्रेस को भी अच्छी तरह मैनेज कर सकते हैं. इससे न केवन वे मानसिक   रूप से मजबूत और उन्नत होते हैं, बल्कि दिमाग से नकारात्मक विचारों को कम करने में सक्षम होते  है. बोनस के रूप में उनकी पॉजिटिव सक्रियता बढ़ती है और वे इनोवेटिव, क्रिएटिव और हैप्पी फील करते हैं. प्रसिद्द ब्रिटिश रचनाकार जॉर्ज बर्नार्ड शॉ तो कहते हैं कि जो व्यक्ति अपने हॉबी के साथ जीता है वह वाकई खुश रहता है. तो विद्यार्थियों के लिए संदेश एकदम स्पष्ट है कि अपने दिमाग को खाली मत  छोड़ें क्यों कि कहा जाता है कि खाली दिमाग शैतान का घर होता है; अपने अध्ययन के अलावे किसी हॉबी में रोजाना कुछ समय व्यतीत करें, जिससे कि आप खुद को रिफ्रेश कर सकें और अपने मुख्य एक्टिविटी यानी अध्ययन आदि को ज्यादा उत्साह और उमंग से जारी रख सकें. निसंदेह इससे जीवन में सफलता व खुशी में इजाफा होना निश्चित है.  

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                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 
# लोकप्रिय पाक्षिक "यथावत" के 01-15 सितम्बर, 2021 अंक में प्रकाशित

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Friday, September 10, 2021

स्ट्रेस मैनेजमेंट: कहीं आप बेवजह तो तनावग्रस्त नहीं

                                               - मिलन  सिन्हा,  स्ट्रेस मैनेजमेंट एंड वेलनेस कंसलटेंट 

हाल ही में एक व्यक्ति ने अपनी परेशानी बताते हुए कहा कि जब भी वे मार्केट जाते हैं या किसी ऑफिस आदि में और वहां लोगों को गलत काम या व्यवहार करते देखते हैं, तो गुस्सा आता है. उन्हें कुछ कहना चाहते हैं, पर कह नहीं पाते. खुद अंदर-ही-अंदर उबलते हैं और कई दिन यही सोचकर तनाव में रहते हैं. इससे बचने के लिए क्या करें? 

दरअसल, यह उस व्यक्ति की समस्या मात्र नहीं है. ऐसा अनेक लोग फील करते हैं. विचारणीय बात यह है कि यह स्थिति आपके नियंत्रण क्षेत्र में है या नहीं. अधिकांश मामलों में  नहीं. यह सही है कि आपको कुछ गलत होते हुए देखना अच्छा नहीं लगता. आपका नाराज होना या क्रोधित होना भी गैर वाजिब नहीं है. उस कारण तनाव ग्रस्त होना जरुर गैर मुनासिब है. ऐसे सभी मामलों में जो गलत कर रहा है, उसे न तो आपके बुरा लगने से कोई फर्क पड़ता है और न ही उसमें  कोई सुधार होता है. कई बार तो आपकी नाराजगी का उसे भान भी नहीं होता. इधर आप नाराज, क्रोधित और तनावग्रस्त होकर अपना ढेर सारा नुकसान कर लेते हैं. है कि नहीं? 

लक्ष्मण रेखा तय करें और बहस में न उलझें: ऐसी स्थिति में आपको जो करना चाहिए वह यह कि आप गलत काम में संलग्न व्यक्ति को पूरी शालीनता और शान्ति से बस यह बता दें कि उनका गलत काम या व्यवहार आपको बुरा लगा. इसके रिएक्शन  में वह कुछ भी कहे, आप उससे बहस में न उलझें. यही आपकी लक्ष्मण रेखा है. समझनेवाली बात यह है कि आपका अपने कार्य या आचरण पर तो कंट्रोल हो सकता है, लेकिन बाहर के किसी व्यक्ति पर शायद नहीं. हां, गलत करनेवाले को टोकने की एक जिम्मेदार नागरिक का कर्तव्य जरुर निभाएं. इसके अच्छे परिणाम मिल जाए तो खुश हो लें, न मिले तब भी इस बात से खुश होने का प्रयास करें कि आपने कोशिश तो की. किसी भी अवस्था में खुद तनावग्रस्त होने का तो कोई अर्थ नहीं है. अमेरिकी विचारक रेनहोल्ह निबुहर सही कहते हैं, "हे ईश्वर, मुझे उन चीजों को स्वीकार करने की स्थिरता दें जिन्हें मैं बदल नहीं सकता, उन चीजों को बदलने का साहस दें जिन्हें मैं बदल सकता हूँ और दोनों में अंतर करने की बुद्धि दें."  

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             और भी बातें करेंगे, चलते-चलते. असीम शुभकामनाएं.            "प्रभात खबर हेल्दी लाइफ " में  01 सितम्बर , 2021 को प्रकाशित   

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Monday, August 30, 2021

स्वतंत्रता और देशप्रेम

                            - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर एंड स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट

हर साल पन्द्रह अगस्त को देशभर के विद्यार्थी भी ब्रिटिश शासन से देश की आजादी का उत्सव मनाते हैं. देश के हर भाग में राष्ट्रगान के साथ-साथ तिरंगा फहराने का कार्यक्रम हर्ष व उल्लास  से संपन्न होता है. देशप्रेम की भावना से ओतप्रोत गीत दिनभर आपको आल्हादित, उत्साहित  और उत्प्रेरित करते रहते हैं. कहने की जरुरत नहीं कि देशप्रेम की भावना साधारण लोगों को असाधारण कार्य करने को सदा प्रोत्साहित और प्रेरित करती रही है. देश आजादी के 75वें साल में प्रवेश कर रहा है. इस वर्ष को बड़े स्तर पर और यादगार तरीके से सेलिब्रेट करने की योजना सरकार और समाज की प्राथमिकता में है.
इस ऐतिहासिक अवसर पर आइए देश के उन तीन सपूतों को याद करते चलें जिन्होंने देश की आजादी के लिए सब कुछ न्योछावर कर दिया, पर आजादी के जश्न में शामिल नहीं हो सके. अगर वे लोग कुछ और वर्ष जीवित रहते तो शायद देश को 1947 से पहले ही आजादी मिल जाती. ऐसा मेरे अलावे करोड़ों अन्य देशवासियों की मान्यता है. 


भगत सिंह एक ऐसे क्रांतिकारी थे जो मात्र  साढ़े 23 वर्ष के छोटे से जीवन में ही ब्रिटिश शासन को आजादी के मुत्तलिक अपने फौलादी इरादे बता दिए. भगत सिंह का जन्म 28 सितम्बर 1907 को पंजाब प्रांत के बावली गाँव मे हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है. उनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती कौर था. 1919 में हुए जलियांवाला बाग नरसंहार ने उन्हें काफी दुखी और विचलित किया था. भगत सिंह का कहना था कि "यदि बहरों को सुनाना  है तो आवाज़ को बहुत जोरदार होना होगा. जब हमने विधान सभा में बम फेंका तो हमारा लक्ष्य  किसी को मारना नहीं था. हमने अंग्रेजी हुकूमत पर बम गिराया था. अंग्रेजों को भारत छोड़ना चाहिए और देश को तुरत आजाद  करना चाहिए." देश की आजादी के लिए जान की परवाह किये बिना लड़ने वाला यह  नायाब योद्द्धा अपने साथी राजगुरु और सुखदेव के साथ 23 मार्च 1931 को फांसी पर चढ़ गया, पर दुनिया के लिए स्वतंत्रता और देशप्रेम की एक प्रेरक मिसाल छोड़ गया.  


चंद्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश के भाबरा में पंडित सीताराम तिवारी के घर हुआ था. मां जगरानी देवी उन्हें संस्कृत का विद्वान बनाना चाहती थीं. इसी कारण किशोरावस्था में ही शिक्षा ग्रहण हेतु उन्हें  बनारस भेजा गया. जलियावाला बाग नरसंहार सहित ब्रिटिश शासन के अन्य दमनकारी कृत्यों से आजाद का युवा मन काफी उद्वेलित था. गांधी जी के असहयोग आंदोलन में भाग लेने के दौरान उन्हें  गिरफ्तार कर जज के समक्ष प्रस्तुत किया गया. जज ने जब उनका नाम पूछा तो उन्होंने कहा, आजाद है मेरा नाम. पिता का नाम पूछने पर बोले, 'स्वतंत्रता'. घर का पता पूछने पर कहा, "जेल." उन्हें सरेआम 15 कोड़े लगाने की सजा सुनाई गई. जब उनकी पीठ पर कोड़े बरस रहे थे तब वे "वंदे मातरम्" का उदघोष कर रहे थे. तभी से उन्हें सब लोग आजाद के नाम से जानने लगे. आजाद कहते थे कि "दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे, आजाद ही रहे हैं, आजाद ही रहेंगे." इस बात को उन्होंने 27 फरवरी, 1931 को साबित कर दिया, जब इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में अंग्रेज पुलिस ने उनपर अचानक हमला कर दिया.उस समय वे साथी क्रांतिकारी सुखदेव राज के साथ कुछ विचार–विमर्श कर रहे थे. आजाद ने पुलिस पर गोलियां चलाईं ताकि उनके साथी सुखदेव बचकर निकल सकें. पुलिस से लोहा लेते हुए उन्होंने पिस्तौल की आखिरी गोली खुद को मार ली और देश के लिए प्राण की आहुति दे दी. 


लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का जन्म 23 जुलाई 1856 को  महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले में हुआ. पिता गंगाधर रामचंद्र तिलक अपने समय के नामचीन शिक्षक थे. दुर्भाग्यवश युवा तिलक 16 वर्ष की उम्र में अनाथ हो गए, लेकिन कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने अध्ययन जारी रखा और आगे बी.ए. आनर्स की डिग्री पूना के डेक्कन कॉलेज से और कानून की डिग्री बंबई विश्वविद्यालय से हासिल की. वे कई विषयों के ज्ञाता थे. 'स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और इसे मैं लेकर रहूँगा' का नारा देनेवाले और उसे जन-जन तक पहुँचानेवाले तिलक ताउम्र  देश को आजाद करने में तन-मन से जुटे रहे. वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के पहले लोकप्रिय नेता थे जिनसे ब्रिटिश सरकार खौफ खाती थी. स्वतंत्रता संग्राम के संघर्षभरे दौर में उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा. 1 अगस्त 1920 को उनका देहांत हुआ. लोकमान्य तिलक कहते थे कि अगर आपके विचार सही, लक्ष्य ईमानदार और प्रयास संवैधानिक हों तो मुझे पूर्ण विश्वास है कि आपकी सफलता निश्चित है. 

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                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 
# लोकप्रिय पाक्षिक "यथावत" के 16-31 अगस्त, 2021 अंक में प्रकाशित

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Tuesday, August 24, 2021

बच्चों को दीजिए संस्कार युक्त, रोगमुक्त, सानंद जीवन

                                     - मिलन सिन्हा, मोटिवेशनल स्पीकर, वेलनेस कंसलटेंट ... ... 

कहते हैं स्वस्थ जीवन, सुखी जीवन का आधार होता है. यह भी कहा जाता है कि बच्चे देश का भविष्य होते हैं. आंकड़े बताते हैं कि हमारे देश की आबादी का 20 % हिस्सा स्कूली बच्चों का है, यानी 25 करोड़ से भी ज्यादा. लिहाजा, हमारे बच्चों को शिक्षित करने के साथ–साथ तन्दुरस्त बनाए रखना अनिवार्य है, तभी आने वाले समय में वे एक समर्थ इंसान के रूप में जीवन की तमाम चुनौतियों से निबटते एवं अपनी जिम्मेदारिओं को निबाहते हुए समाज एवं देश को भी मजबूत बना पायेंगे. लेकिन ऐसा कैसे संभव होगा?


यह एक तथ्य है कि हमारे देश में आजादी के करीब सात दशक बाद भी हमारे गांवों की   अधिकांश  आबादी  आधुनिक चिकित्सा पद्धति के दायरे से बाहर हैं और वे अब तक  मुख्यतः पारम्परिक चिकत्सा पद्धति पर निर्भर रहे हैं. ऐसा इसलिए कि हमारा देश पारम्परिक ज्ञान के मामले  में अत्यधिक समृद्ध रहा है  और हजारों सालों से चली आ रही पूर्णतः स्थापित परम्पराओं की  एक पूरी श्रृंखला सामाजिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में उपलब्ध रही है. लेकिन हमारी  शहरी आबादी कारण–अकारण  स्वास्थ्य ज्ञान के इस असीमित स्त्रोत का उपयोग अपने व्यवहारिक जीवन में नहीं करते हैं  और फलतः सामान्य शारीरिक परेशानियों या बीमारियों, जैसे सर्दी-जुकाम, डायरिया –कब्ज, सिर दर्द –बदन दर्द आदि   से ग्रसित होने पर भी आधुनिक चिकित्सा पद्धति (यानी एलोपैथी) को अपनाने को विवश हो जाते हैं, जब कि आज की हमारी  आधुनिक चिकित्सा काफी मंहगी है और उसके कई नकारात्मक आयाम भी हैं.


फिर भी ऐसा क्यों हो रहा है ? दरअसल बाजार आधारित अर्थव्यवस्था के सामाजिक प्रभावों के अलावे लगातार तेजी से संयुक्त परिवारों  के टूटने  और उतनी ही तेजी से एकल परिवारों के बढ़ते जाने के कारण  दादा–दादी , नाना–नानी जैसे बुजुर्गों के मार्फ़त बच्चों में स्वतः हस्तांतरित होने वाले व्यवहारिक स्वास्थ्य ज्ञान का सिलसिला ख़त्म हो रहा है. ऐसे में, घरेलू उपचार की इस समृद्ध धरोहर को फिर से किसी –न- किसी रूप में पुनर्स्थापित करने  की आवश्यकता है, जिससे एक बड़ी आबादी को सामान्य रोगोपचार के मामले में कुछ हद तक आत्मनिर्भर बनाया जा सके.

 
कहना न होगा, इस महती कार्य को प्रभावी ढंग से लक्ष्य  तक ले जाने में स्कूलों की भूमिका अहम है. इसके लिए  एक सुविचारित व सुनियोजित जागरूकता कार्यक्रम के माध्यम से कक्षा -7 से लेकर  कक्षा -12 तक के बच्चों को प्रेरित कर उनसे अपने घर के बुजुर्गों से सामान्य बिमारियों में किये जाने वाले घरेलू  उपचारों की जानकारी प्राप्त करने के लिए कहा जाएगा  और फिर उन तमाम जानकारियों पर चर्चा कर उन्हें उसके वैज्ञानिक आधार से परिचित करवाया जाएगा. इससे एक तो स्वास्थ्य के प्रति उनकी जागरूकता बढ़ेगी, घरेलू उपचारों की जानकारी होगी और उनका परिवार के बुजुर्गों के साथ जुड़ाव बढ़ेगा. साथ ही बढ़ेगा बुजुर्गों के प्रति बच्चों का सम्मान भी. इसके फलस्वरूप परिवार संस्कारयुक्त, रोग मुक्त, स्वस्थ एवं सानन्द रहेगा. बच्चों के सर्वांगीण विकास में इसका अहम योगदान तो रहेगा ही.

 (hellomilansinha@gmail.com)


             और भी बातें करेंगे, चलते-चलते. असीम शुभकामनाएं.            "प्रभात खबर हेल्दी लाइफ " में  11 अगस्त , 2021 को प्रकाशित   

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Tuesday, August 17, 2021

खेलकूद और व्यक्तित्व विकास

                        - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर एंड स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट 

टोक्यो ओलिंपिक में विभिन्न खेल प्रतियोगिताओं का दौर जारी है. विश्व व्यापी कोरोना महामारी के घटते-बढ़ते ग्राफ के बीच खेल के इस महाकुम्भ का आयोजन खेल भावना के बुनियादी मूल्यों को बखूबी दर्शाता है. कोरोना महामारी के कारण छाए मायूसी, उदासी, चिंता और आशंका के माहौल में ओलिंपिक का आयोजन आशा और उत्साह का एक बड़ा परिवर्तन लेकर आया है.
सच्चाई यह है कि वास्तविक एवं संभावित सभी तरह की चुनौतियों से मुकाबला करते हुए अपने लक्ष्य की ओर बढ़ना छात्र-छात्राएं खेल के मैदान में अनायास ही सीख लेते है. इससे उनका स्वस्थ मनोरंजन भी होता है. लेकिन क्या विश्व के सबसे युवा देश के सभी विद्यार्थी  इसका समुचित लाभ उठा पा रहे हैं? यह बहुत विचारणीय विषय है. बहरहाल, यह जानना सभी विद्यार्थियों के लिए जरुरी है कि खेलकूद के जरिए वे कौन-कौन सी अहम बातों से लाभान्वित हो सकते हैं, जो उनके व्यक्तित्व विकास में बहुत सहायक होंगी. हां, इसके लिए उन्हें निष्ठापूर्वक इंडोर या आउटडोर किसी भी खेल का नियमित अभ्यास करना पड़ेगा. 


1. शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य: अध्ययन सहित हर क्षेत्र में अपेक्षित ऊर्जा और उत्साह से जुटे रहना अनिवार्य होता है. इसके लिए शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत होना आवश्यक है. खेलकूद के जरिए यह हासिल करना आसान होता है.  रोजाना एक घंटे के नियमित अभ्यास से भी आपके शरीर का हर अंग सक्रिय हो जाता है, आपका मेटाबोलिज्म और इम्यून सिस्टम बेहतर होता है और आपमें ऊर्जा व उत्साह की कमी नहीं रहती. जीवन के प्रति आपका दृष्टिकोण व्यापक और सकारात्मक बनता है. आपके खानपान में भी एक बेहतर अनुशासन दिखाई पड़ता है. आपको रात में नींद भी अच्छी आती है. कुल मिलाकर इससे आपका मानसिक स्वास्थ्य भी बेहतर बना रहता है. तनाव प्रबंधन सहित इसके अन्य कई लाभ आपको बराबर मिलते रहते हैं.  

   
2. लक्ष्य के प्रति समर्पण:
बिना समर्पण की भावना के लक्ष्य तक पहुंचना बहुत मुश्किल होता है, कई बार तो असंभव भी. स्पोर्टस आपको अपने लक्ष्य के प्रति समर्पण हेतु प्रेरित करता है. लुईस ग्रीज़र्ड ने सही कहा है कि "ज़िन्दगी का खेल काफी कुछ फुटबॉल की तरह है. आपको अपनी समस्याओं से जूझना पड़ता है, अपने डर को ब्लॉक करना पड़ता है, और जब मौका मिले तब अपना पॉइंट स्कोर करना होता है." सभी खेलों में कमोबेश यही सिद्धांत लागू होता है. 


3. योजना और कार्यान्वयन: सब जानते हैं कि किसी लक्ष्य को हासिल करने के लिए यथोचित कर्म करना बहुत जरुरी होता है. इसके लिए पहले फुलप्रूफ योजना बनाना और फिर उस योजना  को सही ढंग से कार्यान्वित करना उतना ही अनिवार्य होता है. अनेक उदाहरण आसपास ही मिल जायेंगे जहां विद्यार्थी विशेष ने लक्ष्य  तो बड़ा तय कर लिया लेकिन उसे हासिल करने के लिए अपेक्षित प्लानिंग  एंड एग्जिक्युसन के मामले में सही कदम नहीं उठा पाए. खुशी की बात  है कि खेलते-खेलते आप प्रबंधन के ये अहम सूत्र  मैदान में स्वतः सीखते रहते हैं. 

  
4. समय प्रबंधन और आत्मविश्वास:
  किसी भी खेल में इनका अतिशय महत्व होता है. यह अकारण नहीं है. अगर 90 मिनट के फुटबॉल मैच में या 70 मिनट के हॉकी मैच में तय समय के अन्दर गोल कर सकें तो यह बेहतर खेल का परिचायक होता है. आपकी टीम ने शुरुआती कुछ मिनटों में या मध्यांतर से पहले दो-तीन गोल करके बढ़त हासिल कर ली तो प्रतिद्वंदी टीम पर दवाब बनाना आसान हो जाता है, जिसका असर खेल के अंत तक रहता है. बेहतर समय प्रबंधन  से हासिल सफलता से आपका और पूरी टीम का आत्मविश्वास भी बढ़ता है.  


5. टीम वर्क एवं समावेशी सोच:
क्रिकेट से लेकर कबड्डी तक ज्यादातर खेल टीम के रूप में खेले जाते हैं. आप कितने भी योग्य हों और आपका व्यक्तिगत योगदान कितना भी  महत्वपूर्ण हो , लेकिन उसकी कीमत तब कम हो जाती है जब आप एक टीम के रूप में अपना 100 % नहीं दे पाते हैं.  ऐसे एकल प्रतियोगिताओं में भी कोच, मैनेजर और कई सहायक होते हैं जो आपकी एक्सटेंडेड टीम होती है. देखा गया है कि व्यक्तिगत रूप से सभी खिलाड़ियों का स्तर बेहतर होते हुए भी टीम मैच नहीं जीत पाती है क्यों कि खिलाड़ियों में टीम भावना की कमी थी. कहने की जरुरत नहीं कि खेल के मैदान में हमें यह अहम सीख मिलती है कि हम कैसे टीम वर्क और समावेशी सोच के साथ न केवल खेल प्रतियोगिताओं में सफलता हासिल करें, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में सफल हो सकें.

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                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 
# लोकप्रिय पाक्षिक "यथावत" के 01-15 अगस्त, 2021 अंक में प्रकाशित

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Tuesday, August 10, 2021

लाइफ स्किल: पहचानें अपनी क्षमता

                          -मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर एंड स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट

मनुष्य की हार तब होती है, जब वह खुद पर यकीन करना छोड़ देता है.  वास्तविकता यह है कि  आप जैसा दूसरा कोई नहीं है; आप किसी का कॉपी-पेस्ट वर्सन नहीं हैं; आप में असीम क्षमताएं हैं, केवल उनका समुचित दोहन किया जाना शेष है. इस तथ्य को अच्छी तरह जान लें और मान लें तो एक अच्छी शुरुआत स्वतः हो जाएगी. दरअसल अपनी क्षमताओं को जो पहचान लेगा और उसके अनुरूप काम करने लगेगा, सफलता का साथ उसे मिलता रहेगा.

 
क्षमताओं को उपलब्धियों में तब्दील करने के लिए जरुरी है कि आप जीवन को सजगता से जीएं और इसके हर मिनट का आनंद लें.
सदा सीखने की कोशिश करते रहें और खुद को हमेशा युवा ही समझें. ऐसे भी रोचक तथ्य तो यही है कि मनुष्य कभी भी बूढ़ा नहीं होता, सिर्फ उसकी उम्र बढ़ती है. अगर आप खुद को तन-मन से स्वस्थ रखेंगे तो न सिर्फ सकारात्मक ऊर्जा का विकास होगा, बल्कि आपका जीवन भी उत्साह, उमंग और आनंद से भर उठेगा. 


खुद के अंदर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करने के लिए एक सरल मंत्र है. इसे आजमाकर जरुर देखें. सुबह सो कर उठने के बाद सबसे पहले कुछ पल आईने के सामने खड़े होकर खुद को निहारें और एक प्यारभरी मुस्कान से खुद का अभिवादन करें.  इसके बाद खुद से कई बार कहें "आइ एम द बेस्ट", "आई केन एंड आई विल." अर्थात मैं सबसे अच्छा हूँ, मैं कर सकता हूँ और मैं करूंगा. इससे न सिर्फ शरीर में स्फूर्ति महसूस होगी, बल्कि आत्मविश्वास बढेगा और विचार भी बेहतर बनेंगे. दरअसल, मन को जैसा समझाएंगे, मानस भी वैसा बनेगा और व्यक्तित्व भी वैसा ही बनेगा. 


एक और दिलचस्प बात.
संघर्ष और सफलता दोनों बहुत अच्छे दोस्त हैं और करीब-करीब साथ ही चलते हैं. दुनिया के किसी भी सफलतम व्यक्ति का इतिहास उठाकर अगर हम देखेंगे तो पायेंगे कि उन्होंने जीवन में संघर्ष का मार्ग कभी नहीं छोड़ा और न ही कभी असफलता से घबराए. कई बार तो ऐसा भी हुआ है कि एकाधिक असफलताओं के बाद ही उन्होंने सफलता का स्वाद चखा है. कहने का सीधा अर्थ यह है कि यदि आप असफलता से बिना डरे, संघर्ष का दामन थामे रहे तो सफलता ज्यादा दिनों तक दूर नहीं रह सकती है. फल मिलने में वक्त लग सकता है, लेकिन मिलता जरूर है. 

  (hellomilansinha@gmail.com)


             और भी बातें करेंगे, चलते-चलते. असीम शुभकामनाएं.            "दैनिक जागरण" के राष्ट्रीय संस्करण में  7 अगस्त , 2021 को प्रकाशित   

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Friday, July 30, 2021

अपना भविष्य खुद लिखें

                          - मिलन  सिन्हा, मोटिवेशनल स्पीकर एवं स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट 

हर विद्यार्थी की यह चाहत होती है कि वह जीवन में एक अच्छा मुकाम हासिल करे, उसका भविष्य बेहतर हो. उनके अभिभावक की दिली इच्छा भी यही होती है.
सामान्यतः मेरे हर मोटिवेशनल सेशन में एकाधिक विद्यार्थी यह जानना चाहते हैं कि छात्र जीवन में  क्या-क्या करना चाहिए जिससे कि एक बेहतर भविष्य का निर्माण संभव हो सके. यकीनन अपनी क्षमता पर भरोसा करना, जिम्मेदारी लेना, कर्तव्यनिष्ठ होना तथा वर्तमान समय का पूरा  सदुपयोग करना  बुनियादी शर्त है. हां, सलाह और मार्गदर्शन की जरुरत होती है, लेकिन कोई निर्णय लेने और उस पर अमल करने पर दखल मुख्यतः आपका होता है. स्वामी विवेकानंद कहते हैं कि जब तुम कोई काम करो, उस समय अन्य किसी बात का विचार मत करो. उसे एक साधना-उपासना समझकर उसमें अपना सारा तन-मन लगा दो. हरेक व्यक्ति का यह कर्तव्य है कि वह अपना एक लक्ष्य निर्धारित कर उसे पूरा करने का हरसंभव प्रयास करे. दूसरों के लक्ष्य से प्रभावित हुए बिना अपने लक्ष्य के प्रति पूर्ण समर्पण के साथ कर्म करना जीवन में सफलता को सुनिश्चित करता है. 


क्या सभी विद्यार्थी ऐसा करते हैं? अपने आसपास देखने पर छात्र-छात्राओं को अनायास ही कई  विद्यार्थी मिल जायेंगे जो साधारण से काम को भी पूरा करने के लिए सहारे या बैसाखी की तलाश में रहते हैं. पाठ्यक्रम से जुड़ा कोई मामला हो या दैनंदिन जीवन से जुड़ी कोई आम बात, उन्हें आप सपोर्ट मांगते पायेंगे, अकेले दम पर आगे बढ़ने से वे कतरायेंगे, चुनौतियों से घबराएंगे, निर्णय  लेने से बचेंगे और कुछ हासिल न होने पर दूसरे पर दोष डालेंगे. गौर करने वाली बात यह है कि धीरे-धीरे यह उनकी आदत और कार्यशैली बन जाती है.
दुःख की बात है कि इस क्रम में वे यह भूलने की गंभीर गलती कर बैठते हैं कि इस आदत के कारण धीरे-धीरे वे आत्मविश्वास और साहस के मामले में खासे कमजोर होते जा रहे हैं. उनकी समझदारी परिपक्व नहीं हो पाती है. और-तो-और वे अपने वर्तमान को भी खुलकर नहीं जी पाते हैं. उन्हें दूसरों का मुखापेक्षी बन कर जीना पड़ता है और अक्सर उन्हें अपने स्वाभिमान तक से समझौता करना पड़ता है. घरवालों और दोस्तों के बीच उनकी पहचान एक कन्फ्यूज्ड, अक्षम और कमजोर व्यक्ति के रूप में बन जाती है. इसका खामियाजा उन्हें ही बराबर भुगतना पड़ता है. 


जीवन के किसी भी क्षेत्र में संघर्ष और मेहनत के रास्ते सफलता के शिखर तक पहुंचने वाले लोगों से जब भी यह प्रश्न पूछा जाता है कि उनकी सफलता का राज क्या है तो कई कारणों में एक कॉमन कारण जो वे बताते हैं वह है उनकी सही निर्णय लेने की  क्षमता. जब इस क्षमता को प्राप्त करने के पीछे की बात पूछी जाती है तो वे बताते  हैं कि जीवन यात्रा के दौरान अर्जित अनुभव. जिज्ञासावश अनुभव प्राप्त करने का तरीका बताने के अनुरोध पर वे बोलते हैं कि सामान्यतः ये  अनुभव गलत निर्णय लेने के क्रम में हासिल परिणाम से मिलता है. संदेश बिल्कुल साफ है.  स्वतंत्र होने का साहस करें. लकीर के फकीर बने रहने के बजाय अपने अंदर के लीडर को बाहर निकालें.
वास्तव में हर विद्यार्थी में एकाधिक लीडरशिप क्वालिटी होता है. नए और बेहतर रास्ते तलाशने  की ललक होती है. सच यह भी है  कि वह न तो बने-बनाए रास्ते पर चलने को और न ही किसी का पिछलग्गू बनने को मजबूर होता है. वह सुनता तो कई लोगों की है, लेकिन उस पर अमल करने से पहले चिंतन करने को स्वतंत्र होता है और फिर बिना कनफूजन के आगे बढ़ने का फैसला खुद लेने को भी. हां, गलती हो जाय तो वे दोषारोपण नहीं करते, बल्कि विश्लेषण कर उससे सीख और अनुभव हासिल करते हैं. सफल होने पर वे खुशी को एन्जॉय तो करते हैं, पर साथ ही साथियों के प्रति आभार व्यक्त करना नहीं भूलते. 


अंत में एक प्रेरक प्रसंग. एक बड़े कॉरपोरेट लीडर से उनके एक मित्र ने जब यह पूछा कि आपसे  कई बड़े कारोबारी व उद्योगपति कुछ-न-कुछ सलाह लेने और सीखने आते रहते हैं, जिससे कि उनके कामकाज में उन्नति हो, फिर आप क्यों आउट-ऑफ़-बॉक्स सोचने, नई-नई चीजें सीखने और नए-नए प्रयोग करने में निरंतर लगे रहते हैं? उत्तर में उस कॉरपोरेट लीडर ने कहा कि जब तक मुझमें  कुछ बेहतर जानने-सीखने-करने  की इच्छा बची रहेगी तब तक मैं ऐसा करता रहूंगा और शायद तभी तक वे लोग भी मेरे पास आते रहेंगे. जीवन की सार्थकता इसी में है. हां, यह मेरे और मेरे आर्गेनाईजेशन के बेहतर भविष्य के लिए भी बेहद जरुरी है. 

  (hellomilansinha@gmail.com)                        


             और भी बातें करेंगे, चलते-चलते. असीम शुभकामनाएं.               
"हिन्दुस्थान समाचार समूह" की  पाक्षिक पत्रिका "यथावत" के 16-31 जुलाई, 2021 में प्रकाशित   

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