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Friday, November 21, 2025

वेलनेस पॉइंट: फेफड़े को हेल्दी रखने हेतु खानपान में शामिल करें ये चीजें

                                               - मिलन  सिन्हा,  स्ट्रेस मैनेजमेंट एंड वेलनेस कंसलटेंट

जाड़े के मौसम में हर साल देश की राजधानी दिल्ली सहित देश के अनेक प्रदेशों में धुन्ध, कुहासा और कोहरा का प्रकोप जारी रहता है. इन इलाकों में प्रदूषण, खासकर वायु प्रदूषण के कारण स्थिति ज्यादा गंभीर हो जाती है. लोगों को सांस लेने में तकलीफ होती है. श्वसन तंत्र में समस्या और खासकर फेफड़े में तकलीफ के कारण लोग ज्यादा परेशान रहते हैं. कोरोना महामारी के लम्बे दौर से गुजरने और खासकर उससे ग्रस्त और त्रस्त रहने के बाद तो अनेक लोगों के लिए लंग्स को हेल्दी रखना और भी ज्यादा जरुरी हो गया है. हेल्थ एक्सपर्ट्स कहते हैं कि फेफड़ों को स्वस्थ रखने के लिए खानपान में कुछ जानी-पहचानी चीजों को शामिल करना बहुत लाभदायक होता है. आइए जानते हैं.


टमाटर:  इसमें लाइकोपीन होता है जो लंग्स को हेल्दी रखने में मदद करता है. कई रिसर्च यह बताते हैं कि फेफड़ों के संक्रमण और अस्थमा की समस्या से ग्रसित लोगों को टमाटर के सेवन से काफी लाभ मिलता है. इसमें फॉस्फोरस, कैल्शियम और विटामिन-सी अच्छी मात्रा में मौजूद रहता है. इसके सेवन से वात व कफ संबंधी विकारों को दूर करने में मदद मिलती है. 

 

गाजरनाश्ते और दोपहर के भोजन के दौरान गाजर या गाजर के रस का सेवन करें, जिससे कि फेफड़ों की सफाई हो सके. दरअसल, गाजर बीटा कैरोटीन का एक अच्छा स्रोत है, जो एक  शक्तिशाली एंटी-ऑक्सिडेंट के रूप में काम करता है. 

 

अदरक: अदरक में एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं जो श्वसन तंत्र से विषाक्त चीजों को बाहर निकलने में सहायता करता है. इसमें पोटेशियम, मैग्नीशियम, बीटा कैरोटीन और जिंक सहित कई विटामिन और खनिज मौजूद हैं. फेफड़ों के कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करने में यह कारगर हैं. अतः व्यंजन आदि  में अदरक को शामिल करें  और सुबह-शाम अदरक की चाय को एन्जॉय करें. 

 

लहसुन: इसमें एलिसिन नामक एक पदार्थ होता है, जो एक शक्तिशाली एंटी-बायोटिक एजेंट के रूप में काम करता है और हमारे फेफड़ों को संक्रमण से निपटने में मदद करता है. यह सूजन को कम करने, अस्थमा में सुधार करने और फेफड़ों के कैंसर के रिस्क को कम करने में मदद करता है. इसके सेवन से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है.


तुलसी का काढ़ा और ग्रीन टी:  तुलसी, अदरक, गोल मिर्च, दालचीनी और लोंग से बने हुए काढ़ा का सेवन करें. इससे लंग्स काफी मजबूत होते हैं. उसी तरह सुबह –शाम ग्रीन टी का सेवन कर सकते हैं. इसमें एंटी-ऑक्सीडेंट और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण पाए जाते हैं जो लंग्स के लिए काफी अच्छे माने गए हैं.


हल्दी
एंटी-ऑक्सीडेंट, एंटी-बायोटिक और  एंटी-इंफ्लेमेटरी गुणों के कारण इसके सेवन से हर तरह के संक्रमण से बचाव होता है. यह हमारे फेफड़ों को साफ करने में मदद करता है. सब्जी और दाल बनाने में इसका थोड़ा ज्यादा उपयोग करने और रात में सोने से पहले दूध में थोड़ा हल्दी डालकर सेवन करने से लाभ होता है.


सेब एवं अनार: यह दोनों ही फल फेफड़ों की सफाई में मदद करता है. इनके सेवन से विटामिन बी, सी, के और ई के साथ-साथ आयरन, पोटेशियम, जिंक और ओमेगा-6 फैटी एसिड जैसे पोषक तत्व मिल जाते हैं. लंग्स कैंसर जैसी गंभीर रोग से बचाव में भी ये कारगर भूमिका अदा करते हैं.


शहद यह एक प्रभावी प्राकृतिक औषधि है. इसमें एंटी-बैक्टीरियल गुण पाए जाते हैं. इसका सेवन करने से हमारे फेफड़े स्वस्थ रहते हैं. सुबह शौच आदि से निवृत होकर एक गिलास गुनगुने पानी में नींबू और शहद डालकर पीना बहुत लाभकारी होता है.


ब्रोकली और अन्य हरी सब्जियांसर्दी के मौसम में उपलब्ध ब्रोकली सहित अन्य हरी सब्जियों में कई ऐसे विटामिन और मिनरल्स मौजूद होते हैं जो सांस से जुड़ी परेशानियों से राहत दिलाने में असरदार  साबित होते हैं. इतना ही नहीं, इनके सेवन से  फेफड़ों की सफाई और उसे हेल्दी बनाए रखना आसान होता है.


काली मिर्चयह विटामिन-सी का एक अच्छा स्रोत है. विटामिन-सी को एक शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट माना जाता है. वात व कफ संबंधी विकारों और श्वास रोगों में इसका सेवन  लाभकारी साबित होता है. इन्हीं गुणों के कारण यह न केवल फेफड़ों को लंबे समय तक स्वस्थ रखने में मदद करता है, बल्कि फेफड़ों के रोग से पीड़ित रोगियों के लिए बहुत फायदेमंद है. 

(hellomilansinha@gmail.com)  

            
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Tuesday, March 26, 2024

बच्चों को दीजिए संस्कार युक्त, रोगमुक्त, सानंद जीवन

                        - मिलन सिन्हा, मोटिवेशनल स्पीकर, वेलनेस कंसलटेंट ... ... 

कहते हैं स्वस्थ जीवन, सुखी जीवन का आधार होता है. यह भी कहा जाता है कि बच्चे देश का भविष्य होते हैं. आंकड़े बताते हैं कि हमारे देश की आबादी का 20 % हिस्सा स्कूली बच्चों का है, यानी 25 करोड़ से भी ज्यादा. लिहाजा, हमारे बच्चों को शिक्षित करने के साथ–साथ तन्दुरस्त बनाए रखना अनिवार्य है, तभी आने वाले समय में वे एक समर्थ इंसान के रूप में जीवन की तमाम चुनौतियों से निबटते एवं अपनी जिम्मेदारिओं को निबाहते हुए समाज एवं देश को भी मजबूत बना पायेंगे. लेकिन ऐसा कैसे संभव होगा?


यह एक तथ्य है कि हमारे देश में आजादी के सात दशक बाद भी हमारे गांवों की  अधिकांश  आबादी  आधुनिक चिकित्सा पद्धति के दायरे से बाहर हैं और वे अब तक  मुख्यतः पारम्परिक चिकत्सा पद्धति पर निर्भर रहे हैं. ऐसा इसलिए कि हमारा देश पारम्परिक ज्ञान के मामले  में अत्यधिक समृद्ध रहा है  और हजारों सालों से चली आ रही पूर्णतः स्थापित परम्पराओं की  एक पूरी श्रृंखला सामाजिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में उपलब्ध रही है.
लेकिन हमारी  शहरी आबादी कारण–अकारण  स्वास्थ्य ज्ञान के इस असीमित स्त्रोत का उपयोग अपने व्यवहारिक जीवन में नहीं करते हैं  और फलतः सामान्य शारीरिक परेशानियों या बीमारियों, जैसे सर्दी-जुकाम, डायरिया –कब्ज, सिर दर्द –बदन दर्द आदि   से ग्रसित होने पर भी आधुनिक चिकित्सा पद्धति (यानी एलोपैथी) को अपनाने को विवश हो जाते हैं, जब कि आज की हमारी  आधुनिक चिकित्सा काफी मंहगी है और उसके कई नकारात्मक आयाम भी हैं.


फिर भी ऐसा क्यों हो रहा है ? दरअसल बाजार आधारित अर्थव्यवस्था के सामाजिक प्रभावों के अलावे लगातार तेजी से संयुक्त परिवारों  के टूटने  और उतनी ही तेजी से एकल परिवारों के बढ़ते जाने के कारण  दादा–दादी , नाना–नानी जैसे बुजुर्गों के मार्फ़त बच्चों में स्वतः हस्तांतरित होने वाले व्यवहारिक स्वास्थ्य ज्ञान का सिलसिला ख़त्म हो रहा है. ऐसे में, घरेलू उपचार की इस समृद्ध धरोहर को फिर से किसी –न- किसी रूप में पुनर्स्थापित करने  की आवश्यकता है, जिससे एक बड़ी आबादी को सामान्य रोगोपचार के मामले में कुछ हद तक आत्मनिर्भर बनाया जा सके.

 
कहना न होगा, इस महती कार्य को प्रभावी ढंग से लक्ष्य  तक ले जाने में स्कूलों की भूमिका अहम है. इसके लिए  एक सुविचारित व सुनियोजित जागरूकता कार्यक्रम के माध्यम से कक्षा -7 से लेकर  कक्षा -12 तक के बच्चों को प्रेरित कर उनसे अपने घर के बुजुर्गों से सामान्य बिमारियों में किये जाने वाले घरेलू  उपचारों की जानकारी प्राप्त करने के लिए कहा जाएगा  और फिर उन तमाम जानकारियों पर चर्चा कर उन्हें उसके वैज्ञानिक आधार से परिचित करवाया जाएगा.
इससे एक तो स्वास्थ्य के प्रति उनकी जागरूकता बढ़ेगी, घरेलू उपचारों की जानकारी होगी और उनका परिवार के बुजुर्गों के साथ जुड़ाव बढ़ेगा. साथ ही बढ़ेगा बुजुर्गों के प्रति बच्चों का सम्मान भी. इसके फलस्वरूप परिवार संस्कारयुक्त, रोग मुक्त, स्वस्थ एवं सानन्द रहेगा. बच्चों के सर्वांगीण विकास में इसका अहम योगदान तो रहेगा ही.                            (hellomilansinha@gmail.com)


             और भी बातें करेंगे, चलते-चलते. असीम शुभकामनाएं.            "प्रभात खबर हेल्दी लाइफ " में   प्रकाशित   

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Saturday, December 24, 2022

वर्ल्ड कप से सीखें प्रबंधन के सबक

                       - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर एंड स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट 

अभी-अभी क़तर में 2022 फीफा वर्ल्ड कप का रोमांचक और यादगार समापन हुआ है.  फाइनल मैच में खेल के 79वें मिनट तक दो गोल से आगे रहने वाले अर्जेंटीना को जिस तरह अगले दो मिनटों में फ्रांस के युवा खिलाड़ी एम्बापे के दो गोल का स्वाद चखना पड़ा, इसकी कल्पना शायद ही किसी  ने की होगी. लेकिन सम्प्रति फुटबॉल के जादूगर कहे जानेवाले लियोनेल मेसी की टीम अर्जेंटीना के मन में जीत का जज्बा कायम था. फलतः उस ऐतिहासिक मैच में अगले दस मिनट और फिर एक्स्ट्रा टाइम के उपरान्त पेनल्टी स्ट्रोक के माध्यम से अर्जेंटीना को  फुटबॉल का विश्व विजेता बनने का गौरव हासिल हुआ. यह यकीनन अभूतपूर्व था.  रैंकिंग में टॉप दस टीमों के प्रदर्शन पर गौर करने पर यह बात साफ हो जाती है कि तमाम उतार-चढ़ाव  के बावजूद फाइनल में पहुंचने वाले दोनों देशों के खिलाड़ियों के  मन में यह विश्वास बना रहा कि हम होंगे कामयाब और फलतः बेहतर कोशिश के जरिए उन्होंने इस मुकाम को हासिल किया. सवाल है कि आखिर ऐसे टीम के खिलाड़ी  कौन सी रणनीति अपनाते हैं जो उन्हें सफलता के अंतिम मुकाम तक पहुंचाता है. इन बातों से शिक्षा सहित हर क्षेत्र में सक्रिय सभी युवाओं को लाभ मिलेगा. तो आइए इस पर थोड़ी चर्चा करते हैं.



लक्ष्य के प्रति समर्पण: बिना पूर्ण समर्पण की भावना के लक्ष्य तक पहुंचना बहुत मुश्किल होता है, कई बार तो असंभव भी. स्वामी विवेकानंद युवाओं से बराबर यही बात तो कहा करते थे. खैर, फुटबॉल, हॉकी, वॉलीबॉल जैसे खेलों में जैसे गोलपोस्ट निर्धारित रहता है वैसे ही आपका गोल यानी लक्ष्य निर्धारित होना अनिवार्य है . स्पोर्टस आपको यह बखूबी सिखाता है और अपने लक्ष्य के प्रति समर्पण हेतु प्रेरित भी करता है. लुईस ग्रीज़र्ड ने सही कहा है कि "ज़िन्दगी का खेल काफी कुछ फुटबॉल की तरह है. आपको अपनी समस्याओं से जूझना पड़ता है, अपने डर को ब्लॉक करना पड़ता है, और जब मौका मिले तब अपना पॉइंट स्कोर करना होता है."  खेल सहित जीवन के हर क्षेत्र में कमोबेश यही सिद्धांत लागू होता है. 


उत्साह और ऊर्जा: अपने काम के प्रति सदैव बहुत उत्साहित रहना  सफलता का एक अहम पायदान होता है. उत्साह का स्पष्ट मतलब होता है लक्ष्य के प्रति आपका लगाव और समर्पण. और जब किसी चीज के प्रति यह लगाव और समर्पण रहता है तो उस चीज को हासिल करने के लिए आगे की कार्ययोजना आप खुद बनाने में जुट जाते हैं. हां, केवल उत्साह से काम संपन्न नहीं होता. इसके लिए अपेक्षित ऊर्जा की जरुरत होती है. ऐसे अनेक उदाहरण  मिल जायेंगे जब कोई युवा अभीष्ट कार्य तो करना चाहता है, लेकिन ऊर्जा की कमी के कारण उसे कर नहीं पाता है. अतः अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित  सभी युवा खुद को मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ और ऊर्जावान बनाए रखते हैं. यहां सिर्फ वर्ल्ड कप फाइनल मैच की ही बात करें तो आपको कभी भी मेसी, एम्बापे, मार्टिनेज या दोनों टीमों के किसी भी खिलाड़ी में उत्साह और ऊर्जा की कमी दिखाई दी?   

 
योजना और कार्यान्वयन: सब जानते हैं कि किसी लक्ष्य को हासिल करने के लिए यथोचित कर्म करना बहुत जरुरी होता है. इसके लिए पहले फुलप्रूफ योजना बनाना और फिर उस योजना  को सही ढंग से कार्यान्वित करना उतना ही अनिवार्य होता है. अनेक उदाहरण आसपास ही मिल जायेंगे जहां युवा विशेष ने लक्ष्य तो बड़ा तय कर लिया, लेकिन उसे हासिल करने के लिए अपेक्षित प्लानिंग  एंड एग्जिक्युसन के मामले में वह सही कदम नहीं उठा पाया. खुशी की बात  है कि फुटबॉल के इस महाकुम्भ में सभी टीम कमोबेश प्रबंधन के इस अहम सूत्र का पालन करते नजर आए. 

 
समय प्रबंधन और आत्मविश्वास:  किसी भी खेल में इनका अतिशय महत्व होता है. यह अकारण नहीं है. अगर 90 मिनट के फुटबॉल मैच में या 70 मिनट के हॉकी मैच में तय समय के अन्दर गोल कर सकें तो यह बेहतर खेल का परिचायक होता है. आपकी टीम ने शुरुआती कुछ मिनटों में या मध्यांतर से पहले दो-तीन गोल करके बढ़त हासिल कर ली तो प्रतिद्वंदी टीम पर दवाब बनाना आसान हो जाता है, जिसका असर खेल के अंत तक रहता है. बेहतर समय प्रबंधन  से हासिल सफलता से आपका और पूरी टीम का आत्मविश्वास भी बढ़ता है. अर्जेंटीना की टीम ने शुरूआती 36 मिनट के भीतर ही दो गोल करके इसे चरितार्थ किया.   


टीम वर्क एवं समावेशी सोच: फुटबॉल, हॉकी, वॉलीबॉल,  क्रिकेट जैसे सभी  खेल टीम के रूप में खेले जाते हैं. आप कितने भी योग्य हों और आपका व्यक्तिगत योगदान कितना भी  महत्वपूर्ण हो , लेकिन उसकी कीमत तब कम हो जाती है जब आप एक टीम के रूप में अपना 100 % नहीं दे पाते हैं.  देखा गया है कि व्यक्तिगत रूप से सभी खिलाड़ियों का स्तर बेहतर होते हुए भी टीम मैच नहीं जीत पाती है, क्यों कि खिलाड़ियों में टीम भावना की कमी थी. कहने की जरुरत नहीं कि खेल के मैदान में हमें यह अहम सीख मिलती है कि हम कैसे टीम वर्क और समावेशी सोच के साथ न केवल खेल प्रतियोगिताओं में सफलता हासिल करें, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में सफल हो सकें. फाइनल मैच में नियमित 90 मिनट और बाद के एक्स्ट्रा टाइम के 30 मिनट के खेल में अर्जेंटीना के एक और फ्रांस के दो पेनल्टी स्ट्रोक की बात छोड़ दें तो अन्य तीनों  गोल में टीम वर्क और आपसी तालमेल का अदभुत प्रदर्शन हुआ. 


नियमित कड़ी मेहनत: सब जानते हैं कि कड़ी मेहनत का कोई विकल्प नहीं है. फिर भी सभी युवा क्या ऐसा करते हैं ? ज्ञानीजन सही कहते हैं कि जैसा करेंगे, वैसा भरेंगे. कहने का तात्पर्य यह कि बिना अपेक्षित मेहनत के अपेक्षित रिजल्ट की कामना बेमानी है. सफलता को अपनी मुट्ठी में करने के लिए सजगता के साथ लक्षित कार्य  में अपना अधिकांश समय लगाना है. सफलता का परचम लहराने वाले युवा अपने कार्य से संबंधित हर पहलू को न केवल बहुत अच्छी तरह समझते  हैं, बल्कि उसकी कड़ी प्रैक्टिस करते रहते हैं. खुद को निरंतर उन्नत करने के मामले में अपने टीचर, कोच या मेंटर द्वारा दिए गए सुझाव, दिशानिर्देश एवं मार्गदर्शन का गंभीरता से पालन  करते हैं. अपने काम से जुड़े हर संभावित सवाल का सही उत्तर पाने और उसे लागू करने में वे बराबर आगे रहते हैं. ऐसा नहीं कि वे परीक्षा या किसी मैच से से कुछ दिन या हफ्ते पहले खूब मेहनत करते हैं. उनके लिए तो नियमित रूप से कड़ी मेहनत करना दिनचर्या का अभिन्न हिस्सा होता है. फीफा वर्ल्ड कप में क्वार्टर फाइनल और उससे आगे जाने वाले हरेक टीम के खिलाड़ियों द्वारा दैनिक रूटीन के तहत वर्क-आउट हो या प्रैक्टिस मैच या एक्चुअल मैच, हर स्थान पर कड़ी मेहनत के प्रति उनकी पूर्ण प्रतिबद्धता रही. 


असफलता से न घबराना: देखा गया है कि असफल होने पर ज्यादातर युवा दूसरे लोगों के आलोचना को बहुत गंभीरता से लेने की भूल करते हैं. अच्छे युवा  ऐसा नहीं करते. ऐसे समय उन्हें भी बुरा तो लगता है लेकिन वे बिना घबराए और कंफ्यूज हुए असफलता के कारणों का स्वयं निरपेक्ष विश्लेषण करके लक्ष्य के प्रति अपने संकल्प को और दृढ़ बनाना जरुरी समझते हैं. बिना समय गंवाए और बिना किसी पर दोषारोपण किए अपनी गलती का पता लगाते हैं, उससे सीख लेते हैं और बेहतरी के प्रयास में जी-जान से जुट जाते हैं. जरा सोचिए,  फ्रांस की टीम 79वें मिनट तक दो गोल से पीछे रहने के बाद अगर यथोचित प्रयास न करती तो क्या आगे एक्स्ट्रा टाइम के बाद 3-3 गोल की बराबरी कर पाती ?  अगर फीफा वर्ल्ड कप विजेता अर्जेंटीना की टीम सऊदी अरब से अपना पहला मैच हारने के बाद वाकई हार मान जाती तो क्या 36 साल बाद ऐसा इतिहास रच पाती?  दरअसल, जीवन में सदा इस जज्बे को बनाए रख कर आगे बढ़ने का प्रयास करना जरुरी होता है. तभी तो कामयाबी आपके  कदम चूमती है. 


अंत में एक बात और. फाइनल मैच के दौरान तनाव और संघर्ष के उन पलों में भी मेसी के चेहरे पर तैरती मुस्कान, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों का हार के गम में डूबे एम्बापे को एक अभिभावक के रूप में सांत्वना देना, फिर अर्जेंटीना के गोलकीपर मार्टिनेज का एम्बापे को हाथ पकड़ कर उठाना जैसे अनेक दृश्य दिल को छू गए. आपने भी ऐसा ही महसूस किया ना?

      
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 
# दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में  24 दिसम्बर , 2022 को प्रकाशित 

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Saturday, October 29, 2022

ब्रेन स्ट्रोक समस्या है बड़ी, समाधान आसान

                                    - मिलन  सिन्हा, हेल्थ मोटिवेटर  एंड वेलनेस  कंसलटेंट

देश में ब्रेन स्ट्रोक के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. बीते वर्षों में बड़ी संख्या में युवा भी इसके चपेट में आ रहे हैं. यह गंभीर चिंता का विषय है. दुःख की बात है कि समुचित जागरूकता के अभाव में ब्रेन स्ट्रोक के लक्षण की समय रहते पहचान नहीं हो पाती है जिसके कारण अधिकतर लोग अस्पताल या डॉक्टर तक नहीं पहुंच पाते हैं और फलतः विकलांगता  या मौत के शिकार हो जाते हैं. आंकड़े बताते हैं कि देश में हर साल 18 लाख से ज्यादा लोग ब्रेन स्ट्रोक से पीड़ित होते हैं. दरअसल, ब्रेन में ब्लड क्लोटिंग या धमनियों के फटने पर होने वाले अधिक रक्तस्राव के कारण ऐसा होता है. इससे ब्रेन में ऑक्सीजन और अन्य पोषक तत्वों की कमी हो जाती है  और ब्रेन का कार्य प्रणाली बाधित होती है. मिनटों में ब्रेन सेल्स को बहुत क्षति होती है. यह एक मेडिकल इमरजेंसी है और त्वरित उपचार से समस्या का निराकरण संभव है. 


ब्रेन स्ट्रोक से शारीरिक नुकसान 
ब्रेन स्ट्रोक के कारण व्यक्ति को चलने, बोलने, सुनने, खाने-पीने, हंसने, याद रखने, शरीर के अंगों पर नियंत्रण रखने में समस्या हो सकती है. ब्रेन स्ट्रोक के गंभीर मामलों में मौत का खतरा भी रहता है.


ब्रेन स्ट्रोक के कुछ मुख्य कारण
उच्च रक्त चाप, मधुमेह, मानसिक तनाव, डिप्रेशन, धुम्रपान व शराब की लत इसके मुख्य कारण हैं. 


ब्रेन स्ट्रोक के प्रमुख लक्षण 
शारीरिक संतुलन न रख पाना, अचानक देखने में दिक्कत होना, चेहरे में विकार या टेड़ापन होना, हाथों को ऊपर न उठा पाना, बोलने या हंसने में तकलीफ होना. 


ब्रेन स्ट्रोक से बचे रहने के उपाय 
संतुलित जीवनशैली अपनाएं, जिसमें संतुलित आहार, शारीरिक व्यायाम, योगाभ्यास व ध्यान, रात में 7-8 घंटे की अच्छी नींद शामिल हो. इसके साथ-साथ स्ट्रेस को मैनेज करना और खुश रहना सीखें. पोटैशियम और मैग्नीशियम युक्त फल और सब्जियों, जैसे पालक, टमाटर, शकरकंद, सेब, अनार, तरबूज,  अखरोट, आलमंड को दैनिक आहार का अहम हिस्सा बनाएं. फ्रोजेन, प्रोसेस्ड, जंक, पैकेज्ड एवं  फ्राइड फ़ूड से बचें. 

 
ब्रेन स्ट्रोक के मामले का मेडिकल उपचार
जाने-माने न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. यू. के. मिश्रा के अनुसार ब्रेन स्ट्रोक दो प्रकार के होते हैं. पहले को   ब्रेन हैमरेज और दूसरे को इसकेमिक स्ट्रोक कहते हैं. ब्रेन स्ट्रोक के ज्यादातर मामले दवाओं और इंजेक्शन से ठीक कर लिए जाते है. लेकिन इसके अच्छे परिणाम तभी मिलते हैं, जब रोगी को चार घंटे के अंदर उपचार मिल जाता है.

(hellomilansinha@gmail.com)

                  
             और भी बातें करेंगे, चलते-चलते. असीम शुभकामनाएं.              # "दैनिक भास्कर " में 29.10.22 को प्रकाशित   

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Tuesday, July 19, 2022

इतना मुश्किल भी नहीं खुश रहना

                            - मिलन  सिन्हा, मोटिवेशनल स्पीकर एंड वेलनेस  कंसलटेंट

यह सच है कि कोरोना महामारी के कारण उत्पन्न विषम एवं अप्रत्याशित परिस्थिति के कारण कमोबेश विश्व भर में खुशी का सूचकांक दुष्प्रभावित हुआ.
लेकिन यह भी तो सर्वकालिक तथ्य है कि जीवन चलते रहने का नाम है और खुशी का सीधा सम्बन्ध हमारी अपनी सोच से जुड़ा है. काबिले गौर बात है कि एक समान परिस्थिति में अलग-अलग लोग भिन्न तरीके से सोचते हैं, रियेक्ट करते हैं और खुशी-नाखुशी आदि का इजहार भी करते हैं. यह भी शाश्वत सत्य है कि जीवन में खुशी सबको चाहिए और खुश रहना हमारी स्वभाविक प्रवृति भी है. कवि गुरु रबींद्रनाथ ठाकुर कहते हैं, "खुश रहना बहुत सिंपल है, लेकिन सिंपल रहना कठिन है." वाकई ऐसा ही अधिकतर  लोग व्यवहारिक स्तर पर फील भी कर रहे हैं. कारण तलाशना कठिन नहीं है. दरअसल, आजकल बड़ी संख्या में लोग आवश्यकता और विलासिता में फर्क नहीं कर पा रहे हैं. आमतौर पर हम सरलता को छोड़कर या भूलकर जाने-अनजाने जटिलता की ओर बढ़े जा रहे हैं. "संतोषम परम सुखम या साईं इतना दीजिए, जामे कुटुंब समाय; मैं भी भूखा ना रहूं, साधु ना भूखा जाय" जैसे हमारे पारंपरिक भारतीय जीवन मूल्यों से आज हम "यह दिल मागे मोर" या "अपना सपना मनी-मनी" के तथाकथित आधुनिक सोच एवं जीवनशैली तक पहुंच गए हैं. ये हमारी लाइफस्टाइल हो गई है और हम सब कुछ फास्ट-फास्ट चाहते हैं. वह भी येनकेन प्रकारेण. चाहत असीमित हैं पर प्रयास और उपलब्धि उसकी तुलना में काफी कम. जीवन में संतुलन और सामंजस्य का अभाव स्पष्ट दिख रहा है. नतीजतन जीवन में तनाव बढ़ता जा तरह है और खुशी कम होती जा रही है. महात्मा गांधी कहते हैं कि खुशी  तब मिलेगी जब आप जो सोचते हैं, जो कहते हैं और जो करते हैं, वे सामंजस्य में हों. तो आइए "जहां चाह, वहां राह" वाले सिद्धांत को मानते हुए इन पांच बातों पर अमल करने का संकल्प लेते हैं, जिससे कि खुश रहना मुश्किल न हो.

  
गतिशीलता एवं संतुलन बनाए रखें:
प्रख्यात वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्टीन की यह बात हमेशा याद रखें कि जीवन साइकिल की सवारी करने के समान है यानी सोच और कर्म के स्तर पर गतिशीलता एवं संतुलन बनाए रखें. कहने का सीधा अर्थ यह कि अतिरेक से बचते हुए आपको अपने लक्ष्य की ओर निरंतर बढ़ते जाना है. इसके लिए पॉजिटिव माइंडसेट एवं समुचित प्रयास की जरुरत होगी. दुःख की बात है कि हम सोचने और चिंता करने में बहुत समय व्यतीत करते हैं, जब कि करने के मामले में सक्रियता अहम होती है. अतः सोचने और करने में एक अच्छा संतुलन बनाए रखना है और सही समय पर सही काम करते जाना है.

  
खुद के कार्यों की निरपेक्ष समीक्षा जरुरी:
खुद के कामों की सतत समीक्षा जरुरी होती है,  क्यों कि खुद से बेहतर समीक्षक कोई नहीं हो सकता. आप दूसरों से झूठ बोल सकते हैं, लेकिन खुद से झूठ नहीं बोल सकते. निरपेक्ष समीक्षा कर अपनी कमियों को पहचानें और उन्हें निरंतर दूर करने का प्रयास करते रहें. इससे आपके व्यक्तित्व में निखार आएगा, आपका आत्मविश्वास बढ़ेगा और आप वास्तविक रूप से खुश रह पायेंगे. याद रखें,  यदि  आपकी  खुशी इस  बात  पर  निर्भर  करती है कि कोई और क्या करता  या कहता है तो  यक़ीनन आपकी सोच में कोई-न-कोई समस्या है. अतः खुद पर फोकस कीजिए और बराबर अच्छाई से जुड़ते रहिए.


दूसरों के अच्छे काम की तारीफ करें:
  हमेशा दूसरों के अच्छे कामों की सच्ची तारीफ करें. तारीफ करने में कंजूसी बिल्कुल नहीं बरतनी चाहिए. यदि आप अपने परिजन, सहयोगी या मित्र के काम की तारीफ करते हैं, तो इससे उन्हें मोटिवेशन और पॉजिटिव एनर्जी मिलेगा. नतीजतन अगली  बार वे पहले से भी बेहतर करने का प्रयास करेंगे. लेकिन, यदि आप छोटी से कमी या गलती पर शिकायत या आलोचना करेंगे या सार्वजनिक रूप से डाटेंगे, तो उनका मनोबल गिरेगा. इसका असर उनकी कार्यक्षमता पर पड़ना निश्चित है. बेशक हम अलग से उनकी काउंसलिंग करेंगे. कहने का अभिप्राय यह कि हमें तो बस छोटी-बड़ी उपलब्धियों पर खुश होना सीखना चाहिए और घर-बाहर खुशी के मौके में दिल से शरीक होना चाहिए जिससे कि हम हैप्पीनेस साइकिल का अभिन्न हिस्सा बने रह सकें.


परिवारजनों और दोस्तों के साथ क्वालिटी टाइम बिताएं:
अमूमन व्यस्तता या अन्य किसी कारण से हम यह काम नहीं करते हैं. यहां यह नहीं भूलना चाहिए कि सुख-दुःख हर हाल में ये लोग ही हमारे साथ खड़े रहते हैं. हम उन्हें समय नहीं देंगे तो उनसे समय की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं. दरअसल, किसी को भी सामान्यतः समय की कमी नहीं होती. सवाल सिर्फ समय प्रबंधन और प्राथमिकता का होता है. एक विचारणीय बात और. अगर परिवार के लोग और दोस्त भी हमारी प्राथमिकता में नहीं हैं और उनके लिए भी हमारे पास समय नहीं है तो हमारा खुश रहना मुश्किल होगा ही. हमने महसूस किया है कि उनके साथ दिनभर में एक घंटा भी हम बिता लेते हैं, बेशक रात को खाने के टेबल पर ही सही, तो मन प्रसन्न हो जाता है.  


वर्तमान को एंजॉय करने की आदत डालें:
पूर्व प्रधान मंत्री और विचारक-कवि अटल बिहारी वाजपेयी अपनी एक कविता में कहते हैं "कल-कल करते आज हाथ से निकले सारे, भूत-भविष्य की चिंता में वर्तमान की बाजी हारे." ज्यादातर लोगों के साथ यही होता है. अतीत में जो नहीं कर पाए, उसे लेकर अवसाद और पश्चाताप की स्थिति में रहते हैं या भविष्य की चिंता या अनिश्चितता को लेकर कन्फ्यूज्ड और परेशान, जब कि जीवन का सर्वश्रेष्ठ समय वर्तमान होता है और उसी का भारी नुकसान होता रहता है. भारतीय ओलिंपिक महिला हॉकी टीम के सदस्यों  सहित कई अन्य खिलाड़ियों ने इस बात को रेखांकित किया कि उन्हें माइंडफुलनेस की ट्रेनिंग दी गई यानी भूत-भविष्य की बातों को भूलकर सिर्फ वर्तमान क्षण में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के लिए प्रेरित किया गया. सचमुच वर्तमान को एन्जॉय करने और बीते हुए कल से बेहतर प्रदर्शन की भरपूर कोशिश करने की आदत से हम स्वास्थ्य और सफलता के साथ-साथ खुशी को भी सुनिश्चित कर सकते हैं.  

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             और भी बातें करेंगे, चलते-चलते. असीम शुभकामनाएं.              # "प्रभात खबर -सुरभि " में 16.01.22 को प्रकाशित   

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Tuesday, March 15, 2022

शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य के लिए नियमित व्यायाम जरुरी

                                        - मिलन  सिन्हा,  स्ट्रेस मैनेजमेंट एंड वेलनेस कंसलटेंट 

आम तौर पर व्यायाम और खेलकूद को फिजिकल फिटनेस के साथ जोड़ कर देखा जाता है;  मसल्स और हड्डियों को मजबूती प्रदान करने में अहम माना जाता है. लेकिन कोविड 19 महामारी के इस लम्बे और बेहद चुनौतीपूर्ण दौर में अपने मेंटल  हेल्थ को सही रखना ज्यादा मुश्किल हो गया है. आशंका-कुशंका, चिंता, तनाव और अवसाद से ग्रस्त लोगों की संख्या में इस बीच एक बड़ा उछाल देखा जा रहा है. इसके कई कारण हैं. समाधान की बात करें तो  शारीरिक  के साथ-साथ  मानसिक हेल्थ को भी बेहतर बनाए रखने का एक बड़ा प्रभावी उपाय है नियमित व्यायाम करना. आइए जानते है.

जब हम व्यायाम करते हैं  तब हमारे शरीर में सेरोटोनिन, एंडोर्फिन और डोपामाइन नामक फील गुड और फील हैप्पी केमिकल का स्राव होता है. परिणाम स्वरुप हम अच्छा, आनंदित और उत्साहित महसूस करते हैं. यह ब्रेन हेल्थ के लिए एक बेहतर पोषण है.

नियमित व्यायाम से शरीर में ब्लड सर्कुलेशन अच्छे तरीके से होता है. इससे ब्लड प्रेशर यानी बीपी को नियंत्रण में रखना आसान होता है. इतना ही नहीं एकाधिक मेडिकल सर्वे बताते हैं कि व्यायाम करने वाले लोगों में हाई बीपी का जोखिम 75 फीसदी तक कम हो जाता है. दरअसल एक्सरसाइज करने से हमारे शरीर में एचडीएल यानी गुड कोलेस्ट्रॉल की मात्रा बढ़ती है और एलडीएल यानी हानिकारक कोलेस्ट्रॉल की मात्रा कम होती है और नतीजतन हमारा हार्ट हेल्दी रहता है. इसके कई अन्य हेल्थ बेनिफिट हैं.

यह पाया गया है कि चिंता, तनाव और अवसाद से ग्रस्त लोगों में कोर्टिसोल नामक केमिकल का स्तर ज्यादा होता है. नियमित व्यायाम करने से कोर्टिसोल का लेवल काफी कम हो जाता है. आपका मूड फ्रेश हो जाता है. मेडिकल एक्सपर्ट्स कहते हैं कि रेगुलर एक्सरसाइज दिमाग के लिए एंटीडिप्रेशन की दवा की तरह काम करता है. 

व्यायाम करने से हमारे शरीर के सारे अंग सक्रिय होते हैं. हम अधिक मात्रा में ऑक्सीजन ग्रहण कर पाते हैं. इससे न केवल ब्रेन सेल्स काफी एक्टिव रहते हैं, बल्कि नए ब्रेन सेल्स का निर्माण भी होता है.  हमारा एनर्जी लेवल भी उन्नत होता है. दिनभर काम करने में मन लगा रहता है. पाया गया है कि ऐसे लोगों को रात में अच्छी नींद आती है. इससे उनका मेटाबोलिज्म और इम्यून सिस्टम भी स्ट्रांग  बना रहता है. 

मोटापा के दुष्परिणामों से हम अपरिचित नहीं हैं. इसका असर हमारे मेंटल हेल्थ पर लाजिमी है. नियमित एक्सरसाइज के परिणाम स्वरुप कैलरी  तेजी से बर्न होता है और वजन नियंत्रण में रहता है. हमारी मेमोरी में भी गुणात्मक सुधार होता है. इसके पीछे अच्छी नींद और बेहतर मूड का योगदान भी अहम है जो व्यायाम से सम्बद्ध है. 

चूँकि नियमित व्यायाम से हमें एक स्वस्थ और अनुशासित जीवन जीने की आदत हो जाती है. नतीजतन हमारा शरीर और ब्रेन दोनों ज्यादा स्ट्रांग और सक्रिय रहता है. इससे हम अपना हर काम उत्साह से करते हैं और स्वाभाविक रूप से बेहतर प्रोडक्टिविटी भी दर्ज कर पाते हैं. 
  
अंत में दो और अहम बातें. सुबह का समय व्यायाम के लिए सबसे उपयुक्त होता है. तेज गति से व्यायाम करने से पहले अपने शरीर के सारे अंगों को वार्मअप एक्सरसाइज से लचीला और सक्रिय कर लेना बहुत जरुरी है.   

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             और भी बातें करेंगे, चलते-चलते. असीम शुभकामनाएं.              # "प्रभात खबर हेल्दी लाइफ " में 22.12.21 को प्रकाशित   

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Tuesday, February 8, 2022

तीन आसन व तीन प्राणायाम से फेफड़ों को रखें स्वस्थ

                                            - मिलन  सिन्हा,  स्ट्रेस मैनेजमेंट एंड वेलनेस कंसलटेंट 

जाड़े के मौसम में हर साल देश की राजधानी दिल्ली सहित देश के अनेक प्रदेशों में धुन्ध, कुहासा और कोहरा का प्रकोप जारी रहता है. इन इलाकों में प्रदूषण, खासकर वायु प्रदूषण के कारण स्थिति ज्यादा गंभीर हो जाती है. लोगों को सांस लेने में तकलीफ होती है. श्वसन तंत्र में समस्या और खासकर फेफड़े में तकलीफ के कारण लोग ज्यादा परेशान रहते हैं. कोरोना महामारी के इस दौर में तो लंग्स को हेल्दी रखना और भी ज्यादा जरुरी है. हेल्थ एक्सपर्ट्स कहते हैं कि फेफड़ों को स्वस्थ रखने के लिए खानपान में कुछ जानी-पहचानी चीजों को शामिल करने के साथ-साथ कुछ योग क्रियाओं का नियमित अभ्यास करना बहुत लाभदायक होता है. आइए जानते हैं उन योग क्रियाओं के बारे में. 

तीन आसन: 
1. हस्त उत्तानासन:  पंजों को मिलकर सीधा खड़ा हो जाएं और हाथों को पेट के सामने कैंचीनुमा आकार में रखें. अब हाथों को इसी स्थिति में ऊपर ले जाते हुए गर्दन को पीछे झुकाएं. तत्पश्चात बाहों को कंधों की सीध में दोनों ओर फैलाएं. अब हाथों को कैंचीनुमा बनाकर पहली अवस्था में आ जाएं. हाथों को ऊपर उठाते समय श्वास लें और  नीचे लाते हुए श्वास छोड़ें. हाथ उठी हुई स्थिति में श्वास को अंदर रोकें. इस क्रिया को कम-से-कम 5 बार दोहराएं.

2. पाद हस्तासन:  हाथों को बगल में रखकर सीधे खड़े हो जाएं. अब श्वास छोड़ते हुए धीरे-धीरे आगे झुकें और अंगुलियों को फर्श के जितना संभव हो उतना नजदीक ले जाएं. सिर को घुटनों से लगाने का प्रयास करें. धीरे-धीरे श्वास लेते हुए पूर्व स्थिति में लौटें. इसे कम-से-कम 5 से 10 बार करें. 

3. भुजंगासन: पांव को सीधा करके पेट के बल लेट जाएं. माथे को जमीन से सटने दें. हथेलियों को कंधे के नीचे जमीन पर रखें. अब श्वास लेते हुए धीरे-धीरे सिर तथा कंधे को हाथों के सहारे जमीन से ऊपर उठाइए. सिर और कंधे को जितना पीछे की ओर ले जा सकें, ले जाएं. ऐसा लगे कि सांप अपना फन उठाये हुए है. श्वास छोड़ते हुए धीरे-धीरे वापस प्रथम अवस्था में लौटें. इस क्रिया का अभ्यास  कम-से-कम 5 बार करें. 

इनके लाभ: इन आसनों के नियमित अभ्यास से श्वसन प्रणाली स्वस्थ रहता है.  इनके अभ्यास  से  शरीर में ऑक्सीजन की सप्लाई बढ़ती है और रक्त संचार में सुधार होता है. ये सीने की मांसपेशियों को मजबूत करता है और फेफड़ों को हेल्दी रखता है.  

तीन  प्राणायाम: 
1. भस्त्रिका: सुखासन, अर्धपद्मासन या पद्मासन किसी भी आसन में आराम से बैठें. आँखें बंद कर लें और मेरुदंड सीधा रखें. गहरी सांस फेफड़े में भरें. जितना गहरा सांस लें, उतना ही  दबाव के साथ सांस बाहर निकलने दें. पूरक और रेचक समानान्तर चलने दें. सांस लेने-छोड़ने में करीबन बराबर समय लगे, इसका ध्यान रखें. 

2. कपालभाति: ध्यान के किसी भी आसन में आराम से सीधा बैठ जाएं. आँखें बंद कर लें और शरीर को ढीला छोड़ दें. रेचक यानी श्वास छोड़ने की प्रमुखता रखते हुए श्वसन क्रिया करें. पूरक यानि श्वास लेने की क्रिया सहज और सामान्य रखें. केवल रेचक क्रिया में थोड़ा जोर लगाएं. 

3. अनुलोम-विलोम: सुखासन, अर्धपद्मासन या पद्मासन में सीधा बैठ जाएं. शरीर को ढीला छोड़ दें. हाथों को घुटने पर रख लें. आँख बंद कर लें और श्वास को आते-जाते महसूस करें. अब दाहिने हाथ के प्रथम और द्वितीय अंगुलियों को ललाट के मध्य बिंदु पर रखें और तीसरी अंगुली (अनामिका) को नाक के बायीं छिद्र के पास और अंगूठे को दाहिने छिद्र के पास रखें. अब अंगूठे से दाहिने छिद्र को बंद कर बाएं छिद्र से दीर्घ श्वास लें और फिर अनामिका से बाएं छिद्र को बंद करते हुए दाहिने छिद्र से श्वास को छोड़ें. इसी भांति अब दाहिने छिद्र से श्वास लेकर बाएं से छोड़ें. यह एक आवृत्ति है.

इनके लाभ: शरीर में पहुंची अतिरिक्त ऑक्सीजन और कार्बन डाईऑक्साइड के निष्कासन से फेफड़ों का पोषण होता है. यह आपके फेफड़ों की क्षमता को बढ़ाता है, और उन्हें मजबूत करता है. कपालभाती को शरीर से विषाक्त पदार्थों और अन्य अपशिष्ट पदार्थों को निकालने के लिए जाना जाता है.

(इन योग क्रियाओं के अभ्यास में सावधानी यह बरतें कि इन क्रियाओं को जल्दबाजी या बलपूर्वक न करें. प्राणायाम के अभ्यास के दौरान  मन पूरक-रेचक पर केन्द्रित हो. अभ्यास का समय शुरुआत में अधिकतम 5 मिनट रखें. आगे  सुविधा और सामर्थ्य के अनुसार इसमें धीरे-धीरे वृद्धि करें.)  

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                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 
# "प्रभात खबर - हेल्दी लाइफ " में 29.12.2021 को प्रकाशित 

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Friday, December 10, 2021

जीवन और सेहत को ऊर्जा से भर देता है ब्रह्ममुहूर्त

                                          - मिलन  सिन्हा,  स्ट्रेस मैनेजमेंट एंड वेलनेस कंसलटेंट 

आजकल अनेक  लोग जरुरत-बेजरूरत और जाने-अनजाने रात में देर तक जागते हैं और सुबह देर से सोकर उठते हैं. कई मेडिकल रिसर्च और सर्वे में पाया गया है कि बराबर रात में देर से सोनेवाले लोगों को ह्रदय रोग सहित कई अन्य रोगों का शिकार होना पड़ता है. हाल ही में यूरोपियन हार्ट जर्नल में एक सर्वे के हवाले से बताया गया है कि रात के बारह बजे के बाद सोनेवालों में दिल की बीमारी का खतरा करीब 25 प्रतिशत ज्यादा होता है, जब कि 10 से 11 बजे के बीच सोनेवालों को इसका खतरा सबसे कम होता है. स्वाभाविक रूप से देर से सोनेवाले सुबह देर से उठेंगे भी. इससे बायोलॉजिकल क्लॉक का संतुलन  बिगड़ता है और नतीजतन कई अन्य शारीरिक व मानसिक समस्याएं पैदा हो जाती हैं.


अंग्रेजी में कहते हैं, “अर्ली टू बेड एंड अर्ली टू राइज मेक्स ए मैन हेल्दी, वेल्दी एंड वाइज” अर्थात रात में जल्दी सोनेवाले और सुबह जल्दी उठनेवाले लोग स्वस्थ, समृद्ध और बुद्धिमान होते हैं. सदियों पहले आयुर्वेद में ब्रह्ममुहूर्त अर्थात सूर्योदय से पहले सोकर उठने को स्वास्थ्य की दृष्टि से उत्तम बताया गया है. आइए, इसके पीछे जो रोचक और ज्ञानवर्धक तर्क और तथ्य हैं, उस पर थोड़ी चर्चा करते हैं. 


दिनभर के 24 घंटों में से हर 48वें मिनट में मुहूर्त बदलता है. इस हिसाब से हर एक दिन में कुल 30 मुहूर्त होते हैं. इन्हीं तीस मुहूर्तों में से एक मुहूर्त है ब्रह्म मुहूर्त जो  सुबह के 4.24 बजे से 5.12 के मध्य का समय होता है. ज्ञानीजन कहते हैं कि इस समय उठनेवाले लोगों को आंतरिक शक्ति, बुद्धि, सेहत आदि के मामले में अप्रत्याशित लाभ मिलता है.


धर्मग्रंथों की बात करें तो ऋग्वेद के अनुसार 'प्रातारत्नं प्रातरिष्वा दधाति तं चिकित्वा प्रतिगृनिधत्तो, तेन प्रजां वर्धयुमान आय यस्पोषेण सचेत सुवीर:” अर्थात सूर्योदय से पहले उठनेवाला व्यक्ति स्वस्थ रहता है. कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति  इस समय को सोकर बर्बाद नहीं करेगा. इस समय उठने वाले लोग हमेशा सुखी, ऊर्जावान बने रहते हैं और उनकी आयु लंबी होती है. सामवेद में लिखा गया है, “यद्य सूर उदितो नागा मित्रो र्यमा,  सुवाति सविता भग:”. अर्थात व्यक्ति को सूर्योदय से पहले ही शौच और स्नान आदि करके ईश्वर की उपासना करनी चाहिए. इस समय व्याप्त अमृत तुल्य हवा से स्वास्थ्य और लक्ष्मी दोनों में वृद्धि होती है. तभी तो इसे सिख धर्म में अमृत बेला कहा गया है.


सामान्य ज्ञान और चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि से देखें तो इस समयावधि में वातावरण शांत और ज्यादा ऑक्सीजनयुक्त होता है. वायु और ध्वनि प्रदूषण कम होता है. शुद्ध   हवा   में  सांस   लेने से फेफड़े स्वस्थ रहते हैं. पूरे शरीर में अतिरिक्त ऊर्जा का संचार होता है. ब्लड सर्कुलेशन बेहतर होता है. परिणाम स्वरुप मस्तिष्क की सक्रियता बढ़ती है, पाचन तंत्र मजबूत होता है और रोगप्रतिरोधक क्षमता उन्नत होती  है. इतना ही नहीं, ब्रह्ममुहूर्त में उठनेवाले लोगों में वात, पित्त और कफ में बेहतर संतुलन बना रहता है, जिससे शरीर को निरोगी रखने में बहुत मदद मिलती है. 


क्या है वात, पित्त और कफ


आयुर्वेद के अनुसार, मानव शरीर की प्रकृति तीन मुख्य तत्व के अनुसार होती है - 1. वात (वायु व आकाश), 2. पित्त (अग्नि व जल) और 3. कफ (पृथ्वी व जल) हैं. इन तत्वों की मात्रा समय के अनुसार घटती-बढ़ती रहती है.
वात- मांसपेशियों, सांस प्रणाली, ऊत्तकों की गतिविधियों से जुड़ा है.
पित्त- पाचन, उत्सर्जन, चयापचय और शरीर के तापमान प्रक्रियाओं से जुड़ा है.
कफ- शरीर की संरचना यानी हड्डियों, तंत्रिका तंत्र और मांसपेशियों से संबंधित है, जो कोशिकाओं के बेहतर संचालन और जोड़ों को लूब्रिकेशन में अहम भूमिका निभाता है.


शौच आदि से निवृत होकर योग, मेडिटेशन, प्रार्थना और अध्ययन  करने के मामले में यह समय सबसे अच्छा  माना गया है. इससे अपने शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखना आसान होता है जिसके बहुआयामी लाभ हैं. वैज्ञानिक तथ्य है कि इस समय उठनेवालों एवं सकारात्मक एक्टिविटी में समय बिताने वालों का मेमोरी पॉवर और एकाग्रता उन्नत होता है. यही कारण है कि विद्यार्थियों को इस समय अध्ययन करने को प्रेरित किया जाता है. इसके अलावे यह भी पाया गया है कि ब्रह्ममुहूर्त में उठने लोग अपना समय प्रबंधन बेहतर ढंग से कर पाते हैं, जिससे उनकी कार्यक्षमता में उछाल देखा जाता है. हां, यहां इस बात का ध्यान रखना निहायत जरुरी है कि ब्रह्ममुहूर्त में उठने के लिए और खुद को तरोताजा महसूस करने के लिए आप रात में कम-से-कम छह से सात घंटे की अच्छी नींद का आनंद उठाएं. सार संक्षेप यह कि आयुर्वेद के अनुसार ब्रह्म मुहूर्त में जागने और  पॉजिटिव सोच के साथ काम करने से हम लोग  ज्यादा सक्रिय एवं रोग मुक्त रह कर लम्बी उम्र तक जीवन का आनंद ले सकते हैं. 

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Tuesday, November 9, 2021

नशा को कहें ना और जिंदगी को हां

                              - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर एंड स्ट्रेस मैनेजमेंट  कंसलटेंट

नशे के शिकार विद्यार्थियों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है. नशे के अवैध व्यवसाय में संलिप्त लोगों और अपराधी तत्वों के लिए स्कूल-कॉलेज-यूनिवर्सिटी के विद्यार्थी सॉफ्ट टारगेट हैं. देश को आर्थिक, सामजिक, शैक्षणिक और सामरिक दृष्टि  से कमजोर करना भी उनके एजेंडा में शामिल है. यह बहुत चिंता का विषय है. हाल ही में मुंबई में नारकोटिक्स कण्ट्रोल ब्यूरो ने छापेमारी करके जिस तरह कुछ युवक-युवतियों को पकड़ा है और उनके पास से जो जानकारी मिल रही है, उससे इस भयानक संक्रमण के बढ़ते दायरे का अनुमान लगाया जा सकता है. बताते चलें कि नशीला पदार्थ विद्यार्थियों के शारीरिक तथा मानसिक स्थिति को बहुत दुष्प्रभावित  करता है. आमतौर  पर इसकी शुरूआत मौजमस्ती, उत्सुकता, मजबूरी या प्रलोभन, दोस्तों के दबाव या बहकावे जैसे एकाधिक कारणों से होती है, जो धीरे-धीरे आदत में बदलने के बाद व्यक्ति इसका आदी हो जाता है. आंकड़े बताते हैं कि  चरस, गांजा, अफीम, कोकीन, हेरोइन जैसे खतरनाक नशीली चीजों  के सेवन से लाखों विद्यार्थियों की जिंदगी बर्बाद हो रही है. इसी सन्दर्भ में आइए आज उन अहम बिन्दुओं पर चर्चा करते हैं जिससे छात्र-छात्राएं नशीले पदार्थों के सेवन से बचे रह सकें. 


किसी भी प्रलोभन में न पड़ें. अधिकतर मामलों में यह पाया गया है कि छात्र-छात्राएं किसी-न-किसी  प्रलोभन के चक्कर में नशे का शिकार होते हैं. प्रलोभन आर्थिक सहित कुछ भी हो सकता है. प्रलोभन देनेवाला व्यक्ति विद्यार्थी विशेष की मजबूरी और कमजोरी का आकलन कर उसे अपने जाल में आसानी से फंसाता है. यह व्यक्ति आपका कोई दोस्त, सहपाठी या परिचित हो सकता है. अतः इस पर विचार करना अनिवार्य है कि कोई यूँ ही रुपया-पैसा या अन्य प्रलोभन क्यों दे रहा है? 

 
क्षणिक मौज-मस्ती के लिए अपने भविष्य को दांव पर न लगाएं. आजकल रात में दोस्तों के साथ पार्टी में जाना कोई अनहोनी बात नहीं रह गई है. पहली बार इन पार्टियों में जानेवाले विद्यार्थियों पर अपराधी तत्वों की पैनी नजर रहती है और उनकी यह कोशिश होती है कि किसी तरह उन्हें नशीले पदार्थ का सेवन करवाया जाय, बेशक मुफ्त में ही सही. सिगरेट, गांजा, बीयर, शराब आदि आम नशीले पदार्थों से शुरुआत होती है और एक बार जब नशा न करने का बंधन टूट जाता है तो फिर आगे नशे की अंधेरी सुरंग में विचरण में कोई संकोच नहीं रहता है. शातिर अपराधी तत्व इन अवसरों का विडियोग्राफी कर लेते है और जरुरत पड़ने पर ब्लैकमेलिंग के लिए उसका बखूबी इस्तेमाल करते हैं. लिहाजा ऐसे मौज-मस्तीवाले पार्टी और ऐसे दोस्तों से बराबर दूर रहें. 

 
अध्ययन पर पूरा फोकस  बनाए रखें. आजकल पढ़ाई का इतना प्रेशर होता है कि अगर कोई भी विद्यार्थी अपने अध्ययन के लक्ष्य को सामने रखकर आगे बढ़े तो  मौज-मस्ती और नशाखोरी की ओर उसका ध्यान कतई नहीं जा सकता है. उसके लिए तो अच्छी तरह पढ़ना किसी नशे से कम नहीं होता. खुद को इस कार्य में संलग्न रखने के लिए वह शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रखने की कोशिश करता है. इसके लिए वह पौष्टिक खानपान और व्यायाम के प्रति भी गंभीर रहता है.  

 
बराबर घरवालों के संपर्क में रहें. कई सर्वेक्षणों में यह बात उभर कर आई है कि भावनात्मक रूप से परिवारजनों से जुड़े रहनेवाले विद्यार्थी अपेक्षाकृत कम संख्या में नशे के शिकार होते है. एकाकीपन और घर-परिवार से दुराव की भावना नशे की ओर किसी-न-किसी रूप से प्रेरित  करती है, ऐसा देखने में आता है. अपने घर से दूर दूसरे शहर और वह भी हॉस्टल में रहकर पढ़नेवाले विद्यार्थियों को पर्व-त्यौहार और लम्बी छुट्टियों में घर जरुर जाना चाहिए, जिससे कि उन्हें रिश्तों की महत्ता की अनुभूति हो और वे खुशी के पलों को  भरपूर जी सकें. 

  
भूल-चूक हो जाए तो तुरत स्वीकार कर सही रास्ते पर चलना शुरू करें. सावधानी बरतने के बावजूद भी कोई दुर्घटना हो जाए और आप नशा करने लगें, तो उस चक्कर से यथाशीघ्र निकलें. इसमें किसी दोस्त से कुछ पूछने या खुद किसी दुविधा में रहने की कोई जरुरत नहीं है. बेहतर यह होगा कि तुरत घर जाएं और अपने अभिभावक से सब कुछ साफ-साफ बता दें. वे नाराज हों या गुस्सा करें तो सब कुछ सहन करें और उनके सुझाए रास्ते पर चलें. पीछे मुड़कर देखने और उस आत्मघाती मार्ग पर लौटने की बात सोचना भी गलत होगा. जीवन से बड़ा कुछ भी नहीं होता. नशे की लत क्षणिक मजा दे सकता है, लेकिन यह जीवन को नरक बनाने का अहम जरिया है. 

 (hellomilansinha@gmail.com)

                  

             और भी बातें करेंगे, चलते-चलते. असीम शुभकामनाएं.            पाक्षिक पत्रिका "यथावत" के 01-15 नवम्बर, 2021 अंक में प्रकाशित  

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Tuesday, August 17, 2021

खेलकूद और व्यक्तित्व विकास

                        - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर एंड स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट 

टोक्यो ओलिंपिक में विभिन्न खेल प्रतियोगिताओं का दौर जारी है. विश्व व्यापी कोरोना महामारी के घटते-बढ़ते ग्राफ के बीच खेल के इस महाकुम्भ का आयोजन खेल भावना के बुनियादी मूल्यों को बखूबी दर्शाता है. कोरोना महामारी के कारण छाए मायूसी, उदासी, चिंता और आशंका के माहौल में ओलिंपिक का आयोजन आशा और उत्साह का एक बड़ा परिवर्तन लेकर आया है.
सच्चाई यह है कि वास्तविक एवं संभावित सभी तरह की चुनौतियों से मुकाबला करते हुए अपने लक्ष्य की ओर बढ़ना छात्र-छात्राएं खेल के मैदान में अनायास ही सीख लेते है. इससे उनका स्वस्थ मनोरंजन भी होता है. लेकिन क्या विश्व के सबसे युवा देश के सभी विद्यार्थी  इसका समुचित लाभ उठा पा रहे हैं? यह बहुत विचारणीय विषय है. बहरहाल, यह जानना सभी विद्यार्थियों के लिए जरुरी है कि खेलकूद के जरिए वे कौन-कौन सी अहम बातों से लाभान्वित हो सकते हैं, जो उनके व्यक्तित्व विकास में बहुत सहायक होंगी. हां, इसके लिए उन्हें निष्ठापूर्वक इंडोर या आउटडोर किसी भी खेल का नियमित अभ्यास करना पड़ेगा. 


1. शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य: अध्ययन सहित हर क्षेत्र में अपेक्षित ऊर्जा और उत्साह से जुटे रहना अनिवार्य होता है. इसके लिए शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत होना आवश्यक है. खेलकूद के जरिए यह हासिल करना आसान होता है.  रोजाना एक घंटे के नियमित अभ्यास से भी आपके शरीर का हर अंग सक्रिय हो जाता है, आपका मेटाबोलिज्म और इम्यून सिस्टम बेहतर होता है और आपमें ऊर्जा व उत्साह की कमी नहीं रहती. जीवन के प्रति आपका दृष्टिकोण व्यापक और सकारात्मक बनता है. आपके खानपान में भी एक बेहतर अनुशासन दिखाई पड़ता है. आपको रात में नींद भी अच्छी आती है. कुल मिलाकर इससे आपका मानसिक स्वास्थ्य भी बेहतर बना रहता है. तनाव प्रबंधन सहित इसके अन्य कई लाभ आपको बराबर मिलते रहते हैं.  

   
2. लक्ष्य के प्रति समर्पण:
बिना समर्पण की भावना के लक्ष्य तक पहुंचना बहुत मुश्किल होता है, कई बार तो असंभव भी. स्पोर्टस आपको अपने लक्ष्य के प्रति समर्पण हेतु प्रेरित करता है. लुईस ग्रीज़र्ड ने सही कहा है कि "ज़िन्दगी का खेल काफी कुछ फुटबॉल की तरह है. आपको अपनी समस्याओं से जूझना पड़ता है, अपने डर को ब्लॉक करना पड़ता है, और जब मौका मिले तब अपना पॉइंट स्कोर करना होता है." सभी खेलों में कमोबेश यही सिद्धांत लागू होता है. 


3. योजना और कार्यान्वयन: सब जानते हैं कि किसी लक्ष्य को हासिल करने के लिए यथोचित कर्म करना बहुत जरुरी होता है. इसके लिए पहले फुलप्रूफ योजना बनाना और फिर उस योजना  को सही ढंग से कार्यान्वित करना उतना ही अनिवार्य होता है. अनेक उदाहरण आसपास ही मिल जायेंगे जहां विद्यार्थी विशेष ने लक्ष्य  तो बड़ा तय कर लिया लेकिन उसे हासिल करने के लिए अपेक्षित प्लानिंग  एंड एग्जिक्युसन के मामले में सही कदम नहीं उठा पाए. खुशी की बात  है कि खेलते-खेलते आप प्रबंधन के ये अहम सूत्र  मैदान में स्वतः सीखते रहते हैं. 

  
4. समय प्रबंधन और आत्मविश्वास:
  किसी भी खेल में इनका अतिशय महत्व होता है. यह अकारण नहीं है. अगर 90 मिनट के फुटबॉल मैच में या 70 मिनट के हॉकी मैच में तय समय के अन्दर गोल कर सकें तो यह बेहतर खेल का परिचायक होता है. आपकी टीम ने शुरुआती कुछ मिनटों में या मध्यांतर से पहले दो-तीन गोल करके बढ़त हासिल कर ली तो प्रतिद्वंदी टीम पर दवाब बनाना आसान हो जाता है, जिसका असर खेल के अंत तक रहता है. बेहतर समय प्रबंधन  से हासिल सफलता से आपका और पूरी टीम का आत्मविश्वास भी बढ़ता है.  


5. टीम वर्क एवं समावेशी सोच:
क्रिकेट से लेकर कबड्डी तक ज्यादातर खेल टीम के रूप में खेले जाते हैं. आप कितने भी योग्य हों और आपका व्यक्तिगत योगदान कितना भी  महत्वपूर्ण हो , लेकिन उसकी कीमत तब कम हो जाती है जब आप एक टीम के रूप में अपना 100 % नहीं दे पाते हैं.  ऐसे एकल प्रतियोगिताओं में भी कोच, मैनेजर और कई सहायक होते हैं जो आपकी एक्सटेंडेड टीम होती है. देखा गया है कि व्यक्तिगत रूप से सभी खिलाड़ियों का स्तर बेहतर होते हुए भी टीम मैच नहीं जीत पाती है क्यों कि खिलाड़ियों में टीम भावना की कमी थी. कहने की जरुरत नहीं कि खेल के मैदान में हमें यह अहम सीख मिलती है कि हम कैसे टीम वर्क और समावेशी सोच के साथ न केवल खेल प्रतियोगिताओं में सफलता हासिल करें, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में सफल हो सकें.

 (hellomilansinha@gmail.com)      

      
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 
# लोकप्रिय पाक्षिक "यथावत" के 01-15 अगस्त, 2021 अंक में प्रकाशित

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Tuesday, June 29, 2021

वेलनेस पॉइंट : योग और आयुर्वेद से रहें निरोग

                               - मिलन  सिन्हा, मोटिवेशनल स्पीकर एवं स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट

यह सही है कि असंतुलित जीवनशैली भी बढ़ते स्ट्रेस का एक बड़ा कारण रहा है, जिसे सुधारना हमारे कंट्रोल में होता है और वह बहुत कठिन भी नहीं है. लेकिन कोविड-19 वैश्विक महामारी के लम्बे और कठिन दौर ने स्ट्रेस की स्थिति को वाकई जटिल बना दिया है. लिहाजा मानसिक तनाव से पीड़ितों की संख्या में बड़ा उछाल देखा जा रहा है. एकाधिक सर्वे इस बात को रेखांकित कर रहे हैं. हम सभी जानते हैं कि लगातार मानसिक तनाव में रहने के दुष्परिणाम बहुआयामी और कष्टकर होते हैं. हाल के महीनों में डिप्रेशन, आत्महत्या आदि के मामलों में जो वृद्धि देखी जा रही है, वह इस बात का प्रमाण है. संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भी हाल ही में कोरोना महामारी से उत्पन्न स्थिति के सन्दर्भ में कहा है कि "परिजनों को खोने का गम, नौकरी छूटने का दुःख, आइसोलेशन या अकेले रहने की दिक्कतें, आवागमन की असुविधा, आर्थिक तंगी तथा पारिवारिक रिश्तों में परेशानी, भविष्य को लेकर अनिश्चितता और भय जैसे कारणों से  बड़ी संख्या में लोग मानसिक तनाव से ग्रस्त हो रहे हैं... ...."

खैर, जहां समस्या है वहां समाधान भी होता है और निःसंदेह, हर परिस्थिति में स्ट्रेस से राहत दिलाने के लिए योग और आयुर्वेद में दसाधिक अभ्यास - उपाय  बताए गए हैं, जिन्हें अमल में लाना आसान है और जो बहुत लाभकारी भी हैं. इन पर चर्चा करने से पहले यह मुनासिब होगा कि हम संक्षेप में ही सही, मोटे तौर पर स्ट्रेस के लक्षण और दुष्परिणामों के विषय में जानते चलें.

लक्षण: यदि आपका मन आपके काम में नहीं लग रहा है, आप हर समय खुद को थका हुआ महसूस कर रहे हैं और दिमाग में हर समय कुछ ना कुछ नकारात्मक विचार चलता रहता है, आप बेवजह क्रोधित या नाराज हो रहे हैं, नशा करने लगे हैं या नींद की गोली खा रहे हैं, आप जरुरत से ज्यादा या कम सो रहे हैं या भोजन कर रहे हैं, अपेक्षाकृत बहुत ज्यादा देर तक बस यूँ ही टीवी देख रहे हैं, अपने दोस्तों तक से बात करने में कतराने लगे हैं या ऐसे ही कुछ अनबुझ कार्यों में शामिल हैं या असामान्य व्यवहार कर रहे हैं तो आप किसी-न-किसी वजह से स्ट्रेस में हैं.

दुष्परिणाम: दरअसल, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विशेषज्ञों की मानें तो लगातार तनावग्रस्त  रहने से लोगों के मेटाबोलिज्म और इम्यून सिस्टम पर बुरा असर पड़ता है. इससे आजकल कोविड संक्रमित होने का खतरा बहुत बढ़ जाता है. इतना ही नहीं, लोग एकाग्र हो कर अपना कोई भी काम - यहां तक कि खाना और सोना तक, ठीक से नहीं कर पाते हैं और परिणामस्वरूप दूसरे तनाव-जनित अनेक बीमारियों के शिकार भी होते हैं. इन बीमारियों में अनिद्रा, सिरदर्द, माइग्रेन,  डिप्रेशन से लेकर ह्रदय रोग, मधुमेह, कैंसर आदि शामिल हैं. स्वाभाविक तौर पर यह किसी भी व्यक्ति और उनके परिवार के लिए असहज और चिंताजनक स्थिति होती है. 

ऐसे तो आयुर्वेद और योग दोनों ही अपने आप में सम्पूर्ण हैं, लेकिन ये एक दूसरे के पूरक भी माने गए हैं. प्रकृति से जुड़ने-जोड़ने और सकारात्मक सोच को मजबूत करने में इनका अहम योगदान रहा है. 

योगाभ्यास के लाभ अनेक 

योग अर्थात आसन, प्राणायाम, ध्यान आदि का विज्ञान कहता है कि हम योग से जुड़कर अपने शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक क्षमताओं के बीच बेहतर संतुलन कायम कर न केवल  खुद को आज और भविष्य में भी स्ट्रेस फ्री और प्रसन्न रख सकते है, बल्कि तमाम तरह की व्याधियों से दूर रखकर ज्यादा स्वस्थ और उत्पादक भी रह सकते हैं. योग सिर्फ कुछ क्रियाओं का अभ्यास नहीं, सम्पूर्ण जीवनशैली है. जितनी सकारात्मकता, नियमितता और तन्मयता से योगाभ्यास करेंगे, उतना  ही अधिक लाभ होगा. 

योगाभ्यास हमेशा खुले और साफ-सुथरे परिवेश में करें. सारी योग क्रियाएं सामान्य गति से करें, किसी झटके से नहीं. योग कोई धार्मिक कर्म-काण्ड नहीं है. यह स्वस्थ जीवन जीने की प्राकृतिक कला है. योगाभ्यास से पूर्व शौच आदि से निवृत हो लें. खाली पेट और खुले मन से योगाभ्यास करना बेहतर. हां, किसी योग प्रशिक्षक के मार्गदर्शन में योगाभ्यास की शुरुआत उचित होता है.

यहां हम ऐसे योग क्रियाओं के विषय में चर्चा करेंगे जिनके अभ्यास से मानसिक तनाव के साथ-साथ शारीरिक थकान भी दूर होगा, आपका विचलित मन शांत रह पायेगा और नींद भी अच्छी आएगी. हमारे स्वास्थ्य को ठीक रखने में इन योग क्रियाओं से अन्य कई लाभ भी मिलेंगे. आइए, इन योग क्रियाओं के बारे में जानते हैं. 

वज्रासान : घुटनों के बल पंजों को फैला कर सीधा ऐसे बैठें कि  घुटने पास-पास एवं एड़ियां अलग-अलग रहे. हथेलियों को घुटनों पर रखें. मेरुदंड सीधा रखें. शरीर को ढीला छोड़ दें. आंख बंद कर लें. अब दीर्घ श्वास लेते और छोड़ते हुए उसे महसूस करें. इस मुद्रा में 10 मिनट और उससे ज्यादा अवधि तक अपनी सुविधा अनुसार रहने का प्रयास करें. पूरी तरह सचेत रहकर दीर्घ श्वास-प्रश्वास करते रहें.  

पश्चिमोत्तानासन : दोनों हथेलियों को जांघ पर रखते हुए पांवों को सामने फैला कर सीधा बैठ जाएं. श्वास छोड़ते हुए और सिर को धीरे-धीरे आगे की ओर झुकाते हुए हाथ की अंगुलियों से पैर के अंगूठों को पकड़ने की कोशिश करें. माथे को घुटने से स्पर्श करने दें. शुरू में जितना झुक सकते हैं, उतना ही झुकें. थोड़ी देर अंतिम स्थिति में रहें और फिर श्वास लेते हुए प्रथम अवस्था में लौटें. रोजाना कम-से-कम पांच मिनट करें. पीठ दर्द, साइटिका और उदार रोग से पीड़ित लोग इसे न करें.

भुजंगासन : पांव को सीधा करके पेट के बल लेट जाएं. माथे को जमीन से सटने दें. हथेलियों को कंधे के नीचे जमीन पर रखें. अब श्वास लेते हुए धीरे-धीरे सिर तथा कंधे को हाथों के सहारे जमीन से ऊपर उठाइए. सिर और कंधे को जितना पीछे की ओर ले जा सकें, ले जाएं. ऐसा लगे कि सांप अपना फन उठाये हुए है. श्वास छोड़ते हुए धीरे-धीरे वापस प्रथम अवस्था में लौटें. इसे कम-से-कम 5 बार दोहरायें. हर्निया, आंत संबंधी रोग से ग्रसित लोग इसे न करें.

अनुलोम-विलोम प्राणायाम : सुखासन, अर्धपद्मासन या पद्मासन में सीधा बैठ जाएं. शरीर को ढीला छोड़ दें. हाथों को घुटने पर रख लें. आँख बंद कर लें और श्वास को आते-जाते महसूस करें. अब दाहिने हाथ के प्रथम और द्वितीय अंगुलियों को ललाट के मध्य बिंदु पर रखें और तीसरी अंगुली (अनामिका) को नाक के बायीं छिद्र के पास और अंगूठे को दाहिने छिद्र के पास रखें. अब अंगूठे से दाहिने छिद्र को बंद कर बाएं छिद्र से दीर्घ श्वास लें और फिर अनामिका से बाएं छिद्र को बंद करते हुए दाहिने छिद्र से श्वास को छोड़ें. इसी भांति अब दाहिने छिद्र से श्वास लेकर बाएं से छोड़ें. यह एक आवृत्ति है. इसे कम –से-कम 10 बार करें. सावधानी यह बरतें कि इस अभ्यास को जल्दबाजी या बलपूर्वक  न  करें और  मन पूरक-रेचक पर केन्द्रित हो.

भ्रामरी प्राणायाम : किसी भी आरामदायक आसन जैसे सुखासन, अर्धपद्मासन में बैठ जाएं. मेरुदंड सीधा रखें. शरीर को ढीला छोड़ दें. आंख बंद कर लें. अब प्रथम अँगुलियों से दोनों कान बंद कर लें. दीर्घ श्वास ले और भौंरे की तरह ध्वनि करते हुए रेचक करें और मस्तिष्क में इन ध्वनि तरंगों का अनुभव करें. यह एक आवृत्ति है. इसे 5 आवृत्तियों से शुरू कर यथासाध्य रोज बढ़ाते रहें. रोजाना 10 मिनट तक करें तो बेहतर परिणाम मिलेंगे. सावधानी यह बरतें कि जल्दबाजी  न करें और श्वास क्रिया व  ध्वनि लयबद्ध हो, इसका ध्यान रखें.

शीतली प्राणायाम : ध्यान के किसी आसन यानी सुखासन, अर्धपद्मासन या पद्मासन में बैठ जाएं. अपने सिर और मेरुदंड यानी रीढ़ की हड्डी सीधी रखें और दोनों हाथ घुटने पर किसी ध्यान मुद्रा में रखें. आँख बंद कर लें और श्वास को सामान्य करते हुए आते-जाते महसूस करें. अब जीभ को मुंह से बाहर निकालकर उसे इस प्रकार मोड़ें कि जीभ की आकृति एक नलिका सी हो जाए. इस नलिका से धीरे-धीरे दीर्घ श्वास लें और फिर मुंह बंद कर लें. अब नाक से धीरे-धीरे श्वास को छोड़ें. इस अभ्यास को रोजाना कम-से-कम पांच मिनट तक करें.

शवासन : शिथिलीकरण यानी रिलैक्सेशन के इस  प्रमुख योगाभ्यास में दोनों हाथों को शरीर के बगल में रखते हुए पीठ के बल सीधा लेट जाएं. हथेलियों को ऊपर की ओर खुला रखें. पैरों को थोड़ा अलग कर लें. आखें बंद कर शरीर को बिल्कुल ढीला छोड़ दें. शरीर को शव की तरह पड़ा रहने दें. श्वास को सामान्य करते हुए आते-जाते महसूस करें. अब श्वास-प्रश्वास पर मन को केन्द्रित करते हुए उनकी गिनती शुरू कर दें. यानी श्वास को आते-जाते सजगता से अनुभव करें और गिनें भी. मन भटके तो उसे पुनः इस काम में लगाएं. कुछ मिनटों तक ऐसा करने पर तन-मन शिथिल हो जाएगा और आप बहुत रिलैक्स्ड फील करेंगे. इस अभ्यास को रोजाना कम-से-कम पांच मिनट तक करें. ऐसे आपको जब जरुरत महसूस हो इस क्रिया को करें. बस लेटने का स्थान समतल हो और आप श्वास-प्रश्वास के प्रति सचेत रहें. हां, इस योगाभ्यास को ऊपर बताये गए योगक्रियाओं के अंत में करें, जिससे मानसिक और शारीरिक रूप से रिलैक्स्ड महसूस कर सकें. अचानक तनाव या चिंताग्रस्त होने पर भी कुछ देर शवासन में लेटना सुखकर होता है. 

आयुर्वेद बहुत लाभकारी

हमारी भारतीय परंपरा और संस्कृति में आयुर्वेद को मानव शरीर को निरोगी रखने और रोग हो जाने पर उससे मुक्त करने तथा आयु बढ़ाने का चिकित्सा विज्ञान माना गया है. आयुर्वेद संतुलित जीवनशैली, पारम्परिक खानपान तथा हर्बल उपचार पर ज़ोर देता है. प्राकृतिक चिकित्सा का यह मूल आधार है. 

स्ट्रेस को अच्छी तरह मैनेज करने में आयुर्वेद की अहम भूमिका है. खासकर ऐसे वक्त वात, पित्त और कफ में संतुलन स्थापित करने में यह बहुत सहायक होता है. हल्का व ताजा खाओ, तरोताजा रहो का संदेश आयुर्वेद के सिद्धांत में निहित है. 

स्ट्रेस मैनेजमेंट की दृष्टि से सुबह-सुबह शरीर को अच्छी तरह जल और ऑक्सीजन युक्त कर लेना बेहतर है. इससे शरीर स्वच्छ होता है और रक्त संचरण बेहतर होता है. 

कहते हैं जैसा अन्न, वैसा मन. अतः आयुर्वेद में राजसिक और तामसिक आहार के बजाय सात्विक भोजन को श्रेष्ठ माना गया है. तनाव की अवस्था में सात्विक, संतुलित और पौष्टिक आहार से हमारे शरीर को प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, फैट, विटामिन, मिनिरल जैसे पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में मिल जाता है जिससे हम ज्यादा ऊर्जावान बने रहते हैं. फलतः शारीरिक व मानसिक रूप से स्वस्थ रहना आसान होता है. 

मानसिक तनाव की स्थिति में अपने आहार में विशेषकर संतरा, नींबू, आंवला, केला, दूध, अखरोट, आलमंड, वेजिटेबल सूप, हर्बल चाय आदि को शामिल करना बहुत फायदेमंद होता है. आयुर्वेद में तनाव या चिंताग्रस्त होने पर तुलसी, अश्वगंधा, ब्राह्मी, शंखपुष्पी आदि का सेवन भी काफी उपयोगी माना गया है. काढ़ा या हर्बल टी से तो लोग अनेक लाभ के भागी बनते रहे हैं.   

इन सबके समेकित प्रभाव से शरीर में फील गुड और फील हैप्पी होरमोंस का स्राव भी सुनिश्चित होता है, जिससे स्ट्रेस कम होता है और हम बेहतर महसूस करते हैं. 

 (hellomilansinha@gmail.com)      

      
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 
# लोकप्रिय पाक्षिक "यथावत" के 16 -30 जून, 2021 योग विशेषांक में प्रकाशित

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