Friday, April 3, 2020

नई राहें: बनना चाहते हैं टीम लीडर?

                                       - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर, वेलनेस कंसलटेंट ... ...
खेल का मैदान हो या ऑफिस या फैक्ट्री, हर व्यक्ति की स्वाभाविक चाहत होती है कि उसे टीम लीडर का पोजीशन मिले. मन में कितनी ही बातें और योजनाएं होती हैं. इस समय यह ठीक नहीं है, वह ठीक नहीं है, यहां ऐसा होता तो अच्छा होता, वहां यह चेंज किया जाता तो कितना बढ़िया होता, काश मैं उनकी जगह होता तो सब कुछ परफेक्ट होता इत्यादि.  जीवन में आगे बढ़ने की इच्छा रखनेवाले अधिकांश लोगों की मानसिकता कमोबेश ऐसी ही होती है. लेकिन क्या सिर्फ इच्छा रखने भर से जो चाहा वह मिल जाता है और अगर संयोगवश मिल भी जाता है तो क्या उस जिम्मेदारी को निभाना उतना ही आसान होता है? सच यह है कि अपवाद को छोड़ दें तो सिर्फ इच्छा करने से इच्छित मुकाम नहीं मिलता है. उसके लिए यथोचित प्रयास करते रहना पड़ता है. फिर वह  पोजीशन मिल जाने पर भी आगे उस जिम्मेदारी को बखूबी निभाने के लिए कई बातों को साधकर चलना पड़ता है. अगर टीम लीडर की बात करें तो अगर आपको वह पद मिल जाता है तो आगे किन-किन बातों में पारंगत होने और उसे अमल में लाने की जरुरत होगी, आइए जानने का प्रयास करते हैं.

अपने रोल को जानें : आप जहां भी काम कर रहे हैं, उसके विषय में अपटूडेट सब जानकारी आपके पास हो. मसलन, अगर आप मोबाइल कंपनी के सेल्स फील्ड में हैं तो अपनी कंपनी के सेल्स पालिसी से लेकर आपके वार्षिक, तिमाही, मासिक एवं साप्ताहिक सेल्स टारगेट से आप पूर्णतः अवगत हों. अपने टारगेट को नियत समय के भीतर पूरा ही नहीं, बल्कि उससे ज्यादा हासिल करने की आपकी कार्ययोजना और उसपर अमल करने का रोडमैप बिलकुल क्लियर हो. इसके प्रति सजग रहें कि आपसे आपके सीनियर्स और जूनियर्स की क्या-क्या अपेक्षाएं हैं. यह जानकार और मानकर काम करें कि प्लान करके चलने, डेलिगेट करने और सबसे काम लेने में दक्ष होने का आपके परफॉरमेंस से सीधा और गहरा रिश्ता होता है. 

अपने टीम के सदस्यों के बारे में जानें : आपकी टीम छोटी है या बड़ी, सब एक लोकेशन पर हैं या अलग-अलग लोकेशन पर, इसे ध्यान में रखकर काम करना लाजिमी है. जो भी स्थिति हो, आपको टीम के सारे मेंबर्स, छोटे-बड़े सब पोजीशन वाले, का नाम और काम मालूम हो तो बेहतर. टीम छोटी हो तो टीम के सभी सदस्यों की पूरी प्रोफाइल - फैमिली बैकग्राउंड से लेकर प्रोफेशनल, एजुकेशनल बैकग्राउंड तक, हो सके तो हॉबी आदि के विषय में भी जानकारी रखनी चाहिए. इससे उनके साथ प्रोफेशनल और इमोशनल रूप से जुड़े रहने के कॉमन पॉइंट्स मिल जाते हैं. इतना ही नहीं, टीम में कौन किस फील्ड में ज्यादा दक्ष है और कौन थोड़ा कम, कौन एक्स्ट्रा टाइम काम कर सकता है और कौन चाहकर भी कई जायज कारणों से  नहीं कर सकता है, इसकी जानकारी होने और जरुरत पड़ने पर इसका उपयोग करने से नियत समय से पहले लक्ष्य तक पहुंचने में कोई दिक्कत नहीं होती है. अच्छे लीडर को अपने टीम मेंबर्स की खूबियों और कमियों दोनों की पूरी जानकारी  होती है और वह पूरी टीम को लक्ष्य के प्रति संकल्पित और समर्पित करने का हर संभव प्रयास करता रहता है जिससे कि नियत लक्ष्य को हासिल करना बहुत आसान हो और साथ में आनंददायक भी. 

अपने टीम द्वारा किए जाने वाले काम का नॉलेज जरुरी : टीम लीडर को अपने टीम द्वारा किए जानेवाले हर छोटे-बड़े काम की बुनियादी समझ तथा जानकारी होनी चाहिए. कहते हैं न कि नॉलेज इस पॉवर. इसके बहुत सारे फायदे हैं. किसी कार्य विशेष को करने में लगने वाले न्यूनतम और अधिकतम समय का पता होता है. इससे उस कार्य विशेष से जुड़े लक्ष्य को पूरा करने में कितना वक्त लगेगा, यह तय कर पाना आसान हो जाता है. इतना ही नहीं, किसी आकस्मिक घटना-दुर्घटना के वक्त कार्य बाधित नहीं होता और टीम बिना पैनिक के सामान्य रूप से कार्य संपादित कर पाती है. इससे लीडर का आत्मविश्वास ऊँचा होता है और उनके सहकर्मियों का उनके प्रति सम्मान भी. 

जब भी टीम को आगे का रास्ता दिखाने की बात हो तो सदा तत्पर रहें : जब भी कोई बड़ा और नया काम शुरू करना हो, उस समय टीम के सभी सदस्यों को मोटीवेट करने, उनके साथ मजबूती से खड़ा होने और उन्हें जरुरी मार्गदर्शन देना बेहतर होता है. इसका मतलब यह नहीं कि लीडर छोटी-छोटी बातों में हस्तक्षेप करे. इरादा सिर्फ टीम को सशक्त और आगे बढ़ने के लिए सब तरह से प्रेरित करना होता है. वह अपने सहकर्मी के अच्छे काम की प्रशंसा सार्वजानिक रूप से करता है और गलती करने पर उसकी अकेले में काउंसलिंग करता है.  वह लगातार मानवीय तरीके से सहकर्मियों को सुधारने की कोशिश करता रहता है. निरंतर सीखने और सीखाना सच्चे लीडर की खासियत होती है. आउट ऑफ़ बॉक्स थिंकिंग भी लीडर की बड़ी क्वालिटी मानी जाती है. 

कोई बड़ा या साहसिक काम हो तो खुद आगे आकर लीड करें: जब भी कोई ऐसा काम करना हो जिसे करना तो जरुरी हो, लेकिन उसमें अपेक्षाकृत जोखिम ज्यादा हो या उसे आगे बढ़कर करने में अतिरिक्त साहस की जरुरत हो तब लीडर को बेझिझक आगे आकर टीम को लीड करना चाहिए. ऐसा करने पर टीम के सदस्यों में पर्याप्त उर्जा और उत्साह का संचार होता है. पूरे टीम का मनोबल बढ़ता है. सेकंड लाइन लीडर्स को बहुत प्रेरणा मिलती है. दरअसल, टीम लीडर असफलता से नहीं डरता. वह तो बस हर काम को पूरी प्लानिंग के साथ निष्ठापूर्वक निष्पादित करने में विश्वास करता है. अच्छा लीडर बातों  का बादशाह नहीं, बल्कि कर्मठ कर्मयोगी होता है. वह जो कहता है, करता है. सोच-विचार-परामर्श कर निर्णय लेता है और उसपर कायम रहता है. वह मसला नहीं खड़ा करता, बल्कि छोटे-बड़े सभी मसले का हल निकालता है और सबके सामने मिसाल कायम करता है. जॉन क्विंसी एडम्स सही कहते हैं, "अगर आपके एक्शन दूसरों को ज्यादा सपने देखने, ज्यादा सीखने, ज्यादा काम करने और ज्यादा विकास करने को प्रेरित करते हैं तो आप सचमुच एक लीडर हैं." 
(hellomilansinha@gmail.com)

                 
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 
# दैनिक जागरण के सभी संस्करणों में प्रकाशित
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Tuesday, March 31, 2020

अच्छी तैयारी से बेहतर रिजल्ट

                                  - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर, स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट ... ...
सीबीएसई बोर्ड की 10वीं और 12वीं की मुख्य परीक्षा की तारीख घोषित हो चुकी है. प्रादेशिक  बोर्ड की परीक्षाएं भी आगे-पीछे होंगी. माता-पिता, शिक्षक और विशेषकर छात्र-छात्राओं के लिए यह  अधिक व्यस्तता का समय होगा. यह स्वाभाविक है. कहते हैं न कि अंत भला तो सब भला. सभी छात्र-छात्राएं  यह चाहेंगे कि इन अहम परीक्षाओं में वे अपनी अपेक्षाओं के अनुरूप अंक या ग्रेड हासिल कर सकें. निश्चित रूप से इसके लिए विद्यार्थियों को स्पष्ट मानसिकता के साथ एक बेहतर कार्ययोजना बनाकर अपने लक्ष्य तक पहुंचना होगा. आइए इस चर्चा को थोड़ा आगे बढ़ाते हैं.

विद्यार्थियों के लिए यह अच्छा होगा कि परीक्षा शुरू होने से पहले उनके हाथ में अब जितने दिन हैं उसे गिनकर एक कागज़ या नोटबुक में लिख लें. इसमें उन दिनों की गिनती न करें जो दो विषयों की परीक्षा के बीच यानी गैप में हासिल है. उसे सिर्फ रिविजन के लिए रखें. अब जितने विषय का अध्ययन करना है, उसे भी उसी कागज़ या नोट बुक में लिख लें. कुल उपलब्ध दिनों को विषयों  की संख्या से डिवाइड करने पर मोटे तौर पर आपको अंदाज हो जाएगा कि प्रति विषय अध्ययन पूरा करने के लिए आपके पास कितना दिन है. अब सोने और अन्य जरुरी दिनचर्या में प्रति दिन 10-12 घंटे व्यय होने पर 12-14 घंटा ही स्टडी के लिए बचता है. थोड़ा और प्लान करें और सोच कर यह भी लिख लें कि हर विषय में जितने चैप्टर को पढ़ना-दोहराना है, उनकी संख्या कितनी है. काबिलेगौर बात है कि प्रत्येक विद्यार्थी का पढ़ने-दोहराने का अपना तरीका या स्टाइल होता है. उन्हें उसी तरह या अपने हिसाब से बेहतर तरीके से ही पढ़ना चाहिए. किसी की नकल करके नया तरीका अपनाना इस समय लाभ के बजाय नुकसान का कारण बन सकता है. 
  
हर विद्यार्थी को उनकी अबतक की तैयारी के बारे में पता होता है. अगर और अच्छे ढंग से  पता करना हो तो सभी विषयों के कम-से-कम पिछले दो साल के प्रश्नों को लेकर नियत समय (परीक्षा में निर्धारित समय) में उत्तर देने का प्रयास करें. आपको खुद ही अपनी तैयारी का अंदाजा  हो जाएगा. हां, तैयारी कम होने पर भी घबराएं नहीं, और न ही इसको लेकर दोस्तों से चर्चा करें. इससे बहुमूल्य समय की अनावश्यक बर्बादी होगी. कनफूजन बढ़ेगा सो अलग. इसके बजाय आगे उपलब्ध समय का बेहतर उपयोग करने का संकल्प लेकर उसपर अमल करें. सुबह से रात तक जितने घंटे आपके पास हो, उसके हिसाब से किस विषय को पढ़ने में कितना समय देना है, इसका एक टेबुलर चार्ट बना लें. बेहतर समय प्रबंधन में यह चार्ट बहुत मदद करेगा. हां, इसमें आवश्यकतानुसार  कुछ बदलाव करने में कोई दिक्कत नहीं है. 

जब भी पढ़ने बैठें, मन में यह निश्चय करके बैठें कि इस दौरान पूरे मनोयोग से केवल  उस चैप्टर को पढ़ने और समझने का प्रयास करेंगे. छोटे-मोटे व्यवधानों से विचलित नहीं होंगे. दरअसल,  जैसा आप सोचेंगे, वैसा करना आसान होगा. एक सिटींग में 45-60 मिनट तक लगातार पढ़ें.  इस दौरान उस चैप्टर से संबंधित महत्वपूर्ण पॉइंट्स या फार्मूला को नोट कर लें या हाईलाइटर से हाई लाइट कर लें. पढ़ने के बाद 5 मिनट का ब्रेक लें और आंख बंद कर सोचें कि अभी क्या-क्या पढ़ा है. अगर कुछ कमी लगती है तो उस चैप्टर को दुबारा पढ़ें. हर दिन दोपहर के आसपास यानी सुबह की तीन-चार घंटे की पढाई के बाद 1-2 घंटा पिछले दिनों पढ़ी हुई बातों से संबंधित प्रश्नों का उत्तर लिखने में लगाएं. कहते हैं कि लिखने से पढ़ी हुई बातें दिमाग में बेहतर तरीके से अंकित हो जाती हैं और विद्यार्थी को यह भी मालूम पड़ जाता है कि परीक्षा सेंटर में निर्धारित समय में कैसे सारे प्रश्नों को उत्तर लिखा जा सकता है. इस प्रक्रिया से पढ़ने-दोहराने-लिखने पर आप खुद समझ पायेंगे कि पढ़ने-समझने और उसे दिमाग में अंकित करने में और कितने इम्प्रूवमेंट की जरुरत है. किसी भी पॉइंट पर विचलित होने और घबराकर पढ़ाई रोकने या छोड़ने की जरुरत नहीं, क्यों कि आप सही दिशा में प्रयास कर रहे हैं और इसका फल आशातीत होनेवाला है. 

अभी से परीक्षा ख़त्म होने तक डिनर नौ बजे से पहले कर लें और  ग्यारह बजे तक सो जाएं. डिनर अपेक्षाकृत हल्का और सुपाच्य करें. रात में सात घंटे सोने से आप सुबह फ्रेश फील करेंगे और फिर उस दिन के लिए निर्धारित एजेंडा पर अमल करने के लिए उत्साहित भी रहेंगे. अंत में एक बात और. जाड़े के इस मौसम में हो सके तो सुबह एक घंटा धूप में बैठकर पढ़ें. तन-मन दोनों को बहुत लाभ होगा. निःसंदेह, इसका समग्र प्रभाव बेहतर रिजल्ट सुनिश्चित करेगा.
(hellomilansinha@gmail.com)

           
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 

# लोकप्रिय साप्ताहिक "युगवार्ता" के 05.01.2020 अंक में प्रकाशित
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Tuesday, March 24, 2020

विद्यार्थियों के सेहत व खान-पान

                              - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर, स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट ... ...
स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मानस का निवास होता है, ऐसा ज्ञानीजन और हेल्थ एक्सपर्ट दोनों कहते-बताते रहे हैं. परीक्षा के ठीक पहले कई विद्यार्थियों का अस्वस्थ या बीमार होना कोई नयी बात नहीं है. चिंता की जो बात है वह यह कि ऐसे विद्यार्थियों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है. इसके दुष्परिणाम बहुआयामी और व्यापक होते हैं - विद्यार्थी, अभिभावक, परिवार, समाज और  देश, सबके लिए. 

स्कूल-कॉलेज में मेरे हेल्थ मोटिवेशन सेशन के दौरान विद्यार्थियों से बातचीत के क्रम में यह जानने-समझने का सुअवसर मिलता है कि आखिर क्यों पेट भर भोजन करने के बाद भी कई विद्यार्थियों को ताकत और ऊर्जा की कमी महसूस होती है. थोड़ी गहराई में जाकर बात करने पर कई बातें सामने आई. जब आगे इनकी पड़ताल की गई तो कारण और स्पष्ट होते गए. मैंने विद्यार्थियों को बताया कि आप क्या खा रहे हैं और कैसे खा रहे हैं, अच्छी सेहत बनाए रखने में इसका बड़ी भूमिका होती है. आइए, थोड़े विस्तार से इस पर चर्चा करते हैं.

विद्यार्थियों को चार श्रेणी में रख कर बात करते हैं : 1) जो विद्यार्थी अपने घर में रहकर पढ़ाई करते हैं, 2) जो घर से दूर दूसरे कस्बे-शहर-महानगर में हॉस्टल में रहते हैं, 3) जो दूसरे जगह किराए के मकान  में रहते और खुद खाना बनाकर खाते है और 4) वे विद्यार्थी जो किराए के मकान में रहते हैं, लेकिन होटल में या होटल से मंगाकर खाना खाते हैं. सभी जानते हैं कि स्विगी, जोमेटो, मेक्डोनाल्ड आदि से घर बैठे खाना मंगाकर खाने का चलन इन दिनों शहरों-महानगरों में बढ़ रहा है. बहरहाल, गौर करेंगे तो इन चार श्रेणी के विद्यार्थियों के खान-पान में बड़ा अंतर दिखेगा. आगे आकलन-विश्लेषण  करने पर खान-पान का इन सभी के सेहत पर अच्छा-बुरा असर भी साफ़ दिखाई देगा. ऐसा होना बिलकुल स्वाभाविक है.  

मानव शरीर रूपी इस अदभुत मशीन के बारे में जितना जानें, कहें और लिखें, कम ही होगा. बचपन से बुढ़ापे तक अनवरत धड़कने वाला जहां हमारा यह दिल है, वहीं अकल्पनीय सोच, खोज तथा अनुसंधान-आविष्कार का जनक हमारा मस्तिष्क. सोचने से करने तक के सफ़र में निरंतरता को साधे रखने का इस मशीन का कोई जोड़ नहीं है. लेकिन यह सब बस यूँ ही नहीं होता रहता है. सच तो यह है कि इस शरीर को चलाए रखने के लिए आहार रूपी ईंधन की सबको रोजाना जरुरत होती है. यह भी उतना ही  सही है कि जैसे मिलावट वाले तेल से गाड़ी की सेहत खराब हो जाती है, वैसे ही अशुद्ध एवं  मिलावटी खान–पान से हमारा शरीर कमजोर, अस्वस्थ और अंततः बीमार हो जाता है. 

दिलचस्प बात है कि ज्यों ही विद्यार्थियों के बीच उनके खान–पान की चर्चा करते हैं, त्यों ही वे  एक विराट बाजार पर प्रकारांतर से उनकी बढ़ती निर्भरता की बात स्वीकारते हैं.  इस बढ़ते बाजार में  आजकल लाखों नहीं बल्कि करोड़ों खाद्द्य एवं पेय पदार्थ – ब्रांडेड-अनब्रांडेड, प्रोसेस्ड-सेमी प्रोसेस्ड, पैक्ड–अन पैक्ड, नेचुरल–आर्टिफीसियल, कारण-अकारण लुभावने पैकेट या डब्बे में सब जगह उपलब्ध है. आसानी से उपलब्ध होने और स्वाद में चटपटा होने के कारण छात्र-छात्राएं  जाने-अनजाने इनका बहुत मात्रा में सेवन भी कर रहे हैं. इन चीजों का सेवन करते वक्त उन्हें यह याद नहीं रहता कि वे इन कम पौष्टिक या अपौष्टिक वस्तुओं को खाकर अपने शरीर को कितना नुकसान पहुंचा रहे हैं. 

स्कूल-कॉलेज-यूनिवर्सिटी में अगले कुछ महीने परीक्षा को समर्पित रहेंगे. इस दौरान विद्यार्थियों को अपने अध्ययन के साथ-साथ खान-पान पर भी विशेष ध्यान देने की जरुरत होगी. खाद्य पदार्थों के विज्ञापन के बजाय उसके फ़ूड वैल्यू और उसका सेहत पर पड़नेवाले प्रभाव पर  फोकस करना बेहतर होगा. जहां तक संभव हो घर का बना ताजा खाना खाएं. बेशक थोड़ा कम खाएं, लेकिन जो कुछ भी खाएं बिलकुल पौष्टिक खाएं. हरी सब्जी और मौसमी फल को आहार में शामिल करें. सुबह का नाश्ता बहुत पौष्टिक हो, इसका ध्यान जरुर रखें. खाते वक्त, केवल खाने पर फोकस करें और खाने में जल्दबाजी भी न करें. बैठकर आराम से धीरे-धीरे खूब चबाकर और स्वाद लेकर खाएं. इससे आप अपेक्षित ऊर्जा, शक्ति और उत्साह से युक्त रह पायेंगे और तभी बेहतर रिजल्ट हासिल भी कर पायेंगे. इस दौरान सभी अभिभावक, हॉस्टल के अधीक्षक-वार्डन-केयरटेकर को भी विशेष रूप से सचेत रहने की जरुरत होगी. यह उनकी भी बड़ी जिम्मेदारी  है कि वे विद्यार्थियों को रूटीन बनाकर न केवल पढ़ने-लिखने के लिए, बल्कि पौष्टिक भोजन  करने के लिए सतत प्रेरित करते रहें. आखिर यह व्यक्ति-समाज-देश सबके भले की बात है.  
(hellomilansinha@gmail.com) 

           
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Tuesday, March 17, 2020

संतुलन का महत्व

                                    - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर, स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट ... ...
अगले कुछ महीने स्कूल-कॉलेज की परीक्षाओं को समर्पित रहेंगे. सालों भर नियमित अध्ययन  न करनेवाले विद्यार्थी भी इस दौरान पढ़ने-लिखने में जुट जायेंगे. सोचनेवाली बात है कि परीक्षा के पहले पूरा कोर्स अच्छी तरह से पढ़ना असंभव नहीं तो बहुत मुश्किल तो जरुर है. ऐसे भी एक साथ सब साधने की कोशिश का परिणाम शायद ही उत्कृष्ट हो पाता है. "एक साधे सब सधे, सब साधे सब जाए वाली सर्वसत्य बात से सभी परिचित हैं. कहने का सीधा मतलब यह कि जो काम जिस समय करना है, उस पर ही फोकस करें. साथ ही इस बात को समझकर और दिल से मानकर चलें कि जीवन को बढ़िया से चलाते रहने के लिए जरुरी सब कार्यों के बीच एक संतुलन भी बनाकर चलना निहायत जरुरी और लाभप्रद होता है.
     
अपनी लंबी यात्रा के दौरान गौतम बुद्ध ने जीवन में मध्यम मार्ग का दर्शन रखा. वाद्य यंत्र वीणा के उदाहरण से इसे समझना आसान है. वीणा के तारों को ढीला छोड़ दें तो संगीत के सुर नहीं निकलेंगे. इसके विपरीत अगर तारों को ज्यादा कस दें तो तार ही टूट जायेंगे, तो संगीत का  सवाल ही नहीं. जब तारों को  न तो ढीला छोड़ेंगे और न ही ज्यादा कसेंगे, तभी संगीत के स्वर फूटेंगे. बुद्ध के अनुसार हमारे जीवन को सुचारू ढंग से चलाने के लिए मध्यम मार्ग अर्थात संतुलन को अपनाना बेहतर होता है.

जीवन में संतुलन की महत्ता को सभी स्वीकारते तो हैं, तथापि अपने आसपास नजर दौड़ाने पर  पता चलता है कि बहुत सारे  विद्यार्थी असंतुलित जीवन जीते हैं. परीक्षा का समय हो तो खाना-पीना-सोना सब भूलकर पढ़ने की कोशिश करते हैं. लेकिन परीक्षा ख़त्म होने के बाद पढ़ना-लिखना भूल जाते हैं और मौज-मस्ती में व्यस्त हो जाते हैं. जाने-अनजाने में अनेक  विद्यार्थी ऐसा करते हैं.  ऐसे विद्यार्थियों के जीवन में झांक कर देखें तो पता लगता है कि समय-समय पर बुद्धि एवं श्रम का यथोचित इस्तेमाल करने के बावजूद उनके जीवन में सफलता, संतुष्टि, सुख तथा  सकून की कमी बनी रहती है. वे इस बात को समझ नहीं पाते कि जीवन में अतिवादी रुख से क्षणिक लाभ तो हो सकता है, लेकिन सतत लाभ के भागी बनने के लिए संतुलन का मार्ग अपनाना ज्यादा अच्छा होता है. 

अनेक महान व्यक्तियों ने समय-समय पर इस बात को रेखांकित किया है  कि  जीवन साइकिल की सवारी करने के समान है. इसमें हमेशा संतुलन की आवश्यकता होती है. ऐसे लोगों ने दिनभर के चौबीस घंटे में पढाई-लिखाई, अन्य कामकाज, खेलकूद, मनोरंजन और आराम में संतुलन बनाने में सफलता पाई और परिणामस्वरुप वे असाधारण कार्यों को करने में सफल होते रहे. सोचिए जरा कि अगर कोई विद्यार्थी खाना-पीना, आराम करना आदि पर बिलकुल ध्यान न देकर सिर्फ पढ़ता रहे  है तो इसका परिणाम अंततः यही होगा कि वह अस्वस्थ और कमजोर हो जाएगा और आगे चाहकर भी वह कुछ घंटों की पढ़ाई तक नहीं कर पायेगा. नतीजतन, वह चाहकर भी अपने निर्धारित लक्ष्य तक नहीं पहुंच पायेगा. मजेदार बात यह है कि इसका उलटा भी उतना ही सच है. कहने का तात्पर्य यह कि अगर कोई विद्यार्थी चौबीस घंटे में अधिकांश समय सोता रहे या आराम करता रहे या मनोरंजन-मौजमस्ती-खानपान में व्यतीत करता रहे, उसका भी दुष्प्रभाव उसके सेहत और परीक्षा के रिजल्ट पर जरुर पड़ेगा.   

विश्वविख्यात प्रबंधन विशेषज्ञ तथा ट्रेनर डेल कार्नेगी भी कहते है, "यह हम सबके लिए बेहद महत्वपूर्ण है कि हम अपनी जिंदगी को संतुलित बनाएं और काम के अलावे दूसरी चीजों के लिए भी जगह रखें. इससे हमारा व्यक्तिगत जीवन ज्यादा सुखी और संतुष्टिदायक बन जाएगा. लगभग हमेशा ही इससे लोग ज्यादा ऊर्जावान, ज्यादा एकाग्र और काम में ज्यादा उत्पादक बन जाते हैं." कार्नेगी ने कई जानेमाने लोगों का उदहारण देकर इसे समझाने का प्रयास  किया है. उनकी स्पष्ट मान्यता है कि काम और फुरसत के बीच संतुलन से ही निरंतर उच्च प्रदर्शन करना संभव होता है. ऐसे भी जिंदगी एक लंबी यात्रा है और सबको रोज कुछ अच्छा करने की चाहत भी रहती है और उसके अनुरूप काम करने प्रेशर भी. कोई चाहकर भी एक दिन, एक हफ्ते, एक महीने या एक साल में सब कुछ नहीं हासिल कर सकता. इसके लिए संतुलन का दामन थामकर समयबद्ध और नियमबद्ध तरीके से काम करते हुए ही बड़े लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सकता है.  (hellomilansinha@gmail.com)

             
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Tuesday, March 10, 2020

नई राहें: अच्छे व्यवहार से बनेगी अच्छी पहचान

                                           - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर, वेलनेस  कंसलटेंट ...
सभागार से सड़क तक, स्कूल-कॉलेज से वर्कप्लेस तक कमोबेश हर जगह हमें शिष्टाचार और सद्व्यवहार में कमी दिखाई पड़ती है. कथनी और करनी का अंतर भी बढ़ता जा रहा है, जब कि हम मर्यादा पुरुषोत्तम राम की खूब पूजा-अर्चना और गुणगान भी करते हैं. हायरिंग -फायरिंग  के आम कॉरपोरेट कल्चर में लीडर के स्थान पर बॉस शब्द का प्रयोग भी आम हो चला है. मानवीयता की मूल भावना को भूलकर कार्यस्थल में पद के अहंकार से चालित लोग अपने अधीनस्थ कर्मियों को बात-बेबात डांटते-फटकारते रहते हैं, हालांकि पद (इसका एक अर्थ लात  भी होता है) को सिर पर रखकर चलने से औंधे मुंह गिरना लाजिमी है, ऐसा ज्ञानीजन कहते रहे हैं. बहरहाल, इसके निःसंदेह  बहुआयामी दुष्परिणाम होते  हैं. बहुत सारे भारतीय  कंपनियों में खराब कार्यसंस्कृति का यह एक मुख्य कारण है. स्वाभाविक रूप से इसका बुरा असर कंपनी के बैलेंस शीट सहित उसके मार्केट रेपुटेसन पर स्पष्ट दिखाई पड़ता है. विचारणीय बात यह है कि कंपनी में अगर आपसी रिश्ते ठीक नहीं होंगे  तो इसका प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रभाव कमोबेश सभी कर्मचारियों के घर पर भी पड़ेगा. घरेलू माहौल तनावपूर्ण होगा. लोग अनावश्यक रूप से कई रोगों से ग्रसित होंगे और बेवजह अतिरिक्त आर्थिक बोझ  से कर्मी और कंपनी दोनों परेशान भी होंगे. आइए इस चर्चा को थोड़ा आगे बढ़ाते हैं.

सबसे पहले एक अहम विचारणीय तथ्य. मेडिकल साइंस भी कहता है कि किसी के साथ भी गलत या अमर्यादित व्यवहार से सबसे पहले हम स्वयं नेगेटिव एनर्जी से भर जाते हैं,  जिसका बुरा असर हमारे मेटाबोलिज्म  पर होता है. “जैसा बोयेंगे, वैसा ही काटेंगे” सिद्धांत के अनुसार भी हमें  आज नहीं तो कल ब्याज समेत उसी तरह का  व्यवहार  मिलता  है, जिससे हमारा तनाव बहुत बढ़ता है. और अगर यह सिलसिला बहुत दिनों तक जारी रहता है तो तनाव जनित कई बड़े रोगों का भी हम आसानी से शिकार हो सकते हैं. सेडिस्ट या परपीड़ासुख पानेवाले लोगों की बात छोड़ दें तो भी सोचनेवाली बात यह है कि क्या जानबूझकर गलत व्यवहार करनेवाले (या बॉस प्रवृति वाले)  लोग इस तथ्य से अनभिज्ञ होते हैं? आखिर ऐसे सभी लोग इस तरह का व्यवहार क्यों करते हैं जिससे संस्थान के नए तथा युवा कर्मी सबसे ज्यादा दुष्प्रभावित होते हैं?

अंदर से कमजोर लोग, असुरक्षा की भावना या हीन भावना से ग्रसित लोग या बहुत जल्दी सब कुछ पाने को लालायित लोग या बराबर तनाव से पीड़ित रहनेवाले लोग जाने-अनजाने ऐसा अमानवीय व्यवहार करते पाए जाते हैं. आक्रामक या दबंग या सुपेरिओरिटी काम्प्लेक्स से ग्रसित लोग भी ऐसा खूब करते हैं. पाया गया है कि इस श्रेणी के लोग भी कहीं-न-कहीं अंदर से दुर्बल और अनजाने भय के शिकार होते हैं. बुद्धि के मामले में भी वे कमतर पाए गए हैं. सो, अपनी कमियों को छिपाने और अपने को बड़ा और पावरफुल दिखाने के प्रयास में डराने-धमकाने का तर्कहीन एवं शॉर्टकट तरीका अपनाते हैं. 

एक दिलचस्प बात यह भी है जिसे आपने भी नोटिस किया होगा कि कई लोग बस अपने आसपास के लोगों में अपना अच्छा इम्प्रैशन बनाने के लिए अच्छा होने या अपने आचरण को अच्छा दिखाने का प्रयास करते हैं. इस काम को अंजाम देने के लिए अनेक तथाकथित सेलेब्रिटी पीआर (पब्लिक रिलेशन) फर्म की सेवाएं लेते हैं. इस चालाकी या अभिनय का उन्हें कुछ तात्कालिक लाभ भी हासिल हो जाता है. लेकिन देर-सबेर उनके इस कृत्रिम रूप का पर्दाफाश होना तय होता है. कहते हैं न कि झूठ का मुखौटा सत्य को बाहर आने से ज्यादा दिन तक नहीं रोक पाता है. और जब ऐसा होता है तब उनकी सही ढंग से अर्जित थोड़ी-बहुत  विश्वसनीयता भी ख़त्म हो जाती है. 

कहने का तात्पर्य यह कि हम कितना भी कीमती और सुन्दर कपड़े पहन लें, बहुत अमीर हों या बड़ी-बड़ी डिग्रियों के मालिक हों या दिखने-दिखाने के लिए कुछ भी कर लें,  अगर आम लोगों से हमारा व्यवहार अमानवीय और नकारात्मक है तो अंततः सब कुछ  निरर्थक साबित होता है. महात्मा गांधी कहते हैं, "मानवता की महानता मानव होने में नहीं है, बल्कि मानवीय होने में है." दरअसल, अच्छा और कुशल व्यवहार हमारे जीवन का आईना होता है. तथ्य, तर्क और संयम इसके साथी होते हैं. वस्तुतः  हमारे आचरण से हमारे संस्कार का दर्शन होता है. हमारे व्यवहार से ही घर-बाहर हमारी अच्छी या बुरी छवि बनती है. हमारा अच्छा आचरण ही लोगों द्वारा हमारे चरण स्पर्श करने का स्वाभाविक कारण भी बनता है. चाणक्य तो कहते हैं कि अच्छे व्यवहार से दुश्मन तक को जीता जा सकता है. जटिल राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय विवादों को सुलझाने में वार्ताकारों का शिष्ट व मानवीय व्यवहार निर्णायक भूमिका अदा करता रहा है.  इतिहास के पन्नों में ऐसी हजारों घटनाएं मोटे अक्षरों में दर्ज हैं. वाकई प्रेरक बात यह है कि सभी सच्चे और अच्छे लोगों का आचरण केवल इन भावनाओं  पर आधारित नहीं होता है, बल्कि  वे तो इससे आगे उस भावना से प्रेरित हो कर काम करने की पूरी कोशिश करते हैं जिसका उल्लेख गीता के अध्याय -3 के श्लोक -21 में है. इसमें श्री कृष्ण कहते हैं :
"यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:। 
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।
अर्थात श्रेष्ठ व्यक्ति  जैसा आचरण करते हैं, सामान्य लोग भी वैसा ही आचरण करने लगते हैं. श्रेष्ठ जन जिस कर्म को करते हैं, उसी को प्रमाण या आदर्श मानकर सामान्य जन उसका अनुसरण करते हैं. कहने का अभिप्राय यह कि  श्रेष्ठ पुरुष को सदैव अपने पद और गरिमा के अनुसार ही व्यवहार करना चाहिए, क्योंकि वह जिस प्रकार का व्यवहार करेगा, आम लोग भी उसी का अनुसरण करेंगे. वे अच्छा आचरण करेंगे तो उनके सहकर्मी के साथ-साथ अधीनस्थ कर्मी भी अच्छे आचरण को प्रेरित होंगे, जिससे व्यक्ति, समाज, देश और अंततः विश्व का कल्याण होगा. 

इसी कारण हम पाते है कि बड़े पदों पर बैठे जो भी अच्छे एवं सच्चे लोग हैं उनका व्यवहार बहुत ही शालीन और हृदयस्पर्शी होता है. वे मूलतः 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' तथा "बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय" के सिद्धान्त पर चलते हैं. इसके परिणाम स्वरुप वे दूसरों की तुलना में ज्यादा परफार्मिंग , सरल, सोशल, मिलनसार एवं लोकप्रिय होते हैं. 
(hellomilansinha@gmail.com)

                 
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 
# दैनिक जागरण के सभी संस्करणों में प्रकाशित
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Friday, March 6, 2020

इंटरव्यू में संवाद कौशल है अहम

                              - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर, स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट ... ...
हम सबने देखा-सुना-पढ़ा है कि देश-विदेश के सारे महान लोगों - वैज्ञानिक, डॉक्टर, इंजीनियर, उद्योगपति, राजनेता आदि संवाद करने में असाधारण रूप से सक्षम रहे हैं. अलग-अलग क्षेत्र और तबके के लोगों के साथ वे बहुत आसानी से सार्थक और मधुर संवाद कर लेते हैं. लाखों लोग उनकी बातों से प्रभावित और प्रेरित होकर देशहित के अनेक कार्यों में अनायास ही सक्रियता से जुड़ जाते हैं. इतिहास गवाह है कि बड़े से बड़ा विवाद भी सार्थक संवाद से ही हल किए जाते हैं.  

उदारीकरण के मौजूदा दौर में नौकरी हो या स्व-रोजगार या कोई व्यापार-व्यवसाय, हर स्थान  पर प्रतिस्पर्धा से रूबरू होना स्वाभाविक है और इस परिस्थिति में विद्यार्थियों के लिए संवाद कौशल में पारंगत होना सफलता का प्रभावी कारण बनता है. घर-बाहर हर जगह यह स्किल हमारे कठिन  से कठिन काम को आसान बनाने में अहम भूमिका अदा करता है. लिहाजा, संवाद कौशल में दक्षता न केवल विद्यार्थियों को अपनी बात अच्छी तरह रखने में मदद करता है, बल्कि दूसरों की बातों को ठीक से सुनने, सराहने और अंततः उनके साथ एक सार्थक रिश्ता कायम करने में सहायक होता है.

कई कैंपस सिलेक्शन और जॉब इंटरव्यू  के दौरान छात्र-छात्राओं के संवाद कौशल को जानने-परखने का अवसर मिलता रहा है. जीडी यानी ग्रुप डिस्कशन के दौरान प्रतिभागियों को परफॉर्म करते देखा है. 10-15 मिनट के साक्षात्कार या लगभग 60 मिनट के जीडी प्रक्रिया में यह साफ़ देखने में आता है कि कई प्रतिभागी ज्ञान समृद्ध होने के बावजूद अपनी बात या पॉइंट को प्रभावी रूप से प्रस्तुत नहीं  कर पाते हैं. कारण वे संवाद कौशल के मामले में थोड़े कमजोर होते हैं. 

जोर देने की जरुरत नहीं कि रातोंरात इस कौशल में पूर्णतः दक्ष होना संभव नहीं है, क्यों कि इस कला में दक्षता हासिल करने के लिए हमेशा विद्यार्थी बने रहना और रोज कुछ-न-कुछ नया सीखते रहना जरुरी होता है. यह एक सतत प्रक्रिया है. मजेदार और बहुत अहम बात है कि आप इस विधा में कितना भी निपुण हो जाएं, आपको आगे और निपुण होने की जरुरत महसूस होती रहती है. इस कार्य में उत्तमता महज एक यात्रा है, न कि कोई अंतिम मंजिल. बहरहाल, छात्र-छात्राएं अपने संवाद कौशल को बेहतर बनाने के लिए कई बातों पर अमल करना शुरू कर सकते हैं. इसका लाभ उन्हें जीवन के हर मोड़ पर मिलेगा, खासकर इंटरव्यू या ग्रुप डिस्कशन में. 
पहली दो बात यह कि छात्र-छात्राएं अपना नजरिया बराबर सकारात्मक रखें और जानने व  सीखने को हमेशा तत्पर रहें. यह  याद रखें कि किसी भी चर्चा या विचार-विमर्श या साक्षात्कार में सरल और सटीक शब्दों का चयन अहम रोल अदा करता है. अर्थात अपने शब्द भंडार को उन्नत करते रहना और उनका यथोचित उपयोग करना जरुरी है. साथ-ही-साथ  इस बात को भी ध्यान  में रखें कि इंटरव्यू बोर्ड के सदस्यों या सेलेक्टर्स को  उनके द्वारा पूछे गए सवाल के संबंध में जरुरी जानकारी देना और उन्हें अच्छी तरह चीजों को समझाना आपका पहला उद्देश्य है. इसके लिए मध्यम गति और साफ़ आवाज में अपनी बात शालीनता और आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत करें.
  
सभी विद्यार्थी जानते हैं कि प्रश्नों को ठीक से सुनना, ठीक से उत्तर देने के लिए अनिवार्य शर्त है. दिलचस्प एवं महत्वपूर्ण बात यह भी है कि इंटरव्यू देनेवाले विद्यार्थी का ऐसा आचरण चयनकर्ताओं और नियोक्ताओं को बहुत पसंद आता है. ऐसे भी, जब तक आप सवाल को ठीक से सुनेंगे नहीं, अच्छी तरह कैसे समझेंगें और अगर सवाल ठीक से समझ में नहीं आएगा तो सटीक और तर्कसंगत उत्तर देना कैसे संभव होगा?

इंटरव्यू या जीडी के दौरान जब भी बात करें सोच-समझकर और तथ्यों के साथ बात करें. आवेग या उत्तेजनावश कुछ भी न बोलें. दूसरों के विचार को सुनना और उसे महत्व देते हुए अपनी बात को आगे बढ़ाना सबको अच्छा लगता  है. हां, आंख में आंख मिलाकर बात करना कम्युनिकेशन को प्रभावी बनाता है. आपके चेहरे पर हल्की मुस्कुराहट हो तो और भी अच्छा. इससे एक तो आप तनाव मुक्त रहेंगे और दूसरे सामनेवाले को अपने संयत और सामान्य होने का एहसास भी करवा पायेंगे. संक्षेप में कहें तो  ऐसे समय  पर आपके हाव-भाव और बॉडी लैंग्वेज का रोल भी अहम होता है. एक अहम बात और. इन अवसरों पर इस बात के प्रति भी सचेत रहने की जरुरत होती है कि आप समय सीमा के भीतर अपनी मुख्य बातों को रख पा रहें हैं. इसके लिए बात की शुरुआत और समापन बहुत अच्छी तरह से होना सुनिश्चित करें.
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                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 

# लोकप्रिय साप्ताहिक "युगवार्ता" के 15.12.2019 अंक में प्रकाशित
#For Motivational Articles in English, pl. visit my site : www.milanksinha.com    

Saturday, February 29, 2020

नई राहें: ज्ञान, नजरिया और अच्छी शुरुआत

                                                 - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर, वेलनेस  कंसलटेंट ...
सफल होना सबकी चाहत होती है. लोग इसके लिए अपने-अपने हिसाब से प्रयास भी करते हैं. सामान्यतः उन्हें इसके अनुरूप फल भी मिलता है. लेकिन अपनी आशा और अपेक्षा के अनुरूप अगर हमें कामयाबी को अपना साथी बनाए रखना है तो कुछ बातों को अपनी आदत का हिस्सा बनाना जरुरी है.

गीता में कहा गया है कि ज्ञान के समान इस संसार में और कुछ भी पवित्र नहीं है. प्रसिद्ध ब्रिटिश दार्शनिक फ्रांसिस बेकन ने भी साफ़ कहा है, "नॉलेज इज पॉवर" यानी ज्ञान ही शक्ति है. सच है कि ज्ञान की शक्ति से मनुष्य अन्धकार से प्रकाश की ओर अग्रसर होता है. ज्ञान से हमारा बौद्धिक विकास होता है,  हममें तर्क व विश्लेषण की शक्ति विकसित होती है. इससे हम रूढ़िवादिता और अन्धविश्वास से मुक्त हो पाते हैं. सही-गलत की समझ पैदा होती है. ज्ञान से बड़ा कोई धन नहीं. सो, हमेशा ज्ञान यात्रा के पथिक बने रहने का प्रयास करें. इसके साथ-साथ यह भी कोशिश करते रहें  कि ज्ञान का यथोचित उपयोग हमारे हर एक्शन में हो. तभी हम कठिन-से-कठिन काम संपन्न कर सकते हैं. यही तो कारण है कि वर्क प्लेस में हर एम्प्लायर को नॉलेज वर्कर की तलाश रहती है, क्योंकि वे जानते हैं कि ऐसे कर्मी को थोड़ी ट्रेनिंग एवं मोटिवेशन मिले तो वह अपने काम को अच्छी तरह समझ कर अपेक्षित समय में अच्छे तरीके से पूरा करता है. इसलिए इस बात का हमेशा रखें हम पूरा ध्यान, ज्ञान से मिले सफलता तथा  मान-सम्मान. 

विख्यात अमेरिकी लेखक और  मोटिवेशनल स्पीकर जिग जिगलर का कहना है कि "योर एटीचुड एंड नॉट एप्टीचुड विल डीसाइड योर एलटीचुड" अर्थात आपका नजरिया, ना कि आपकी अभिरुचि या योग्यता, आपकी उंचाई का निर्धारण करेगी. इस कथन पर विचार करें तो पायेंगे कि हमारे आसपास कितने ही मेधावी और मेहनती लोग केवल सही या सकारात्मक नजरिए के अभाव में कैरियर, नौकरी या व्यवसाय में उस लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाते हैं जिसे उन्हें सामान्यतः हासिल करना चाहिए था. रिलेशनशिप मैनेजमेंट की बात हो  या पोटेंशियल मैनेजमेंट की, हर जगह हमारा नजरिया एक अहम भूमिका अदा करता है. इसी बात  को क्वीन ऑफ़ आल मीडिया के नाम से प्रसिद्ध ओपरा विनफ्रे इन शब्दों में बयां करती हैं, "अब तक की सबसे बड़ी खोज यह है कि व्यक्ति महज अपना नजरिया बदल कर अपना भविष्य बदल सकता है." विनफ्रे सहित देश-विदेश  में हजारों ऐसी रियल लाइफ हीरो हैं जिनका जीवन  इस बात की गवाही देता है कि कैसे  वे लोग  अपने नजरिए को उन्नत बनाए रखकर जीवन में सफलता और समृद्धि के हकदार बनें. मेरा तो स्पष्ट मत है कि सही नजरिया हमारे जीवन को संवारे, नित हमारे व्यक्तित्व को निखारे.

आमतौर पर देश-विदेश में कॉलेज-यूनिवर्सिटी में पढ़नेवाले युवा हों या पेशेवर या नौकरीपेशा व्यक्ति, सभी डे-मैनेजमेंट यानी दिन में क्या-क्या करना है और कैसे करना है, को बहुत महत्व देते हैं और देना भी चाहिए. लेकिन उनमें से कुछ ही लोग मार्निंग मैनेजमेंट को भी उतना या कुछ ज्यादा महत्व देते हैं, क्यों कि वे जानते हैं कि सुबह की अच्छी शुरुआत से दिनभर के काम के लिए अपेक्षित उर्जा, उत्साह और उमंग से आदमी भर जाता है. वाकई, समय का वह हिस्सा जो बहुत रेफ्रेशिंग होने के साथ-साथ सामान्यतः हमारे नियंत्रण में होता है वह है सुबह का समय. ज्यों ही हम घर से कार्यस्थल के लिए चल पड़ते हैं, कमोबेश हम बाहरी फैक्टर्स के अधीन आ जाते हैं. इसलिए  सबको सुबह का कम-से-कम एक से दो घंटा समय खुद पर निवेश करना चाहिए. इस दौरान शॉ (एसएडब्लू)  फैक्टर (सनशाइन, एयर यानी ऑक्सीजन, वाटर) जो हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत अहम हैं, उन पर फोकस करना हमारे लिए आसान होता है. यह तीनों चीजें हमें मुफ्त में उपलब्ध  हैं. ऐसे तो सूर्योदय के आसपास सो कर उठ जाना शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य के लिए उत्तम माना गया है, लेकिन कतिपय कारणों से कई लोगों के लिए ऐसा संभव नहीं होता. इसलिए जब भी उठें तब एक-दो घंटे का निवेश खुद पर करें. इस अवधि  में पहले ठीक से कम-से-कम आधा लीटर पानी पीने के अलावे अपने वाशरूम के नित्यकर्म को निबटाकर शरीर को ऑक्सीजन युक्त करने और धूप का सेवन करने का प्रयास करें. नियमित रूप से सूर्योदय के बाद आधे घंटे तेज गति से  टहलने, प्राणायाम आदि करने से बहुत फायदा होगा. जोर देने की जरुरत नहीं कि मॉर्निंग मैनेजमेंट का अहम हिस्सा है सुबह का पौष्टिक नाश्ता. हमेशा आराम से ब्रेकफास्ट करें, लाइफ कितना भी फ़ास्ट क्यों न हो. नाश्ता करने के बाद तुरत घर से निकलने की जल्दबाजी न करें. 10-15 मिनट आराम से बैठ कर दिन में किए जानेवाले महत्वपूर्ण कार्यों की सूची (प्राथमिकता के आधार पर) बना लें. इससे कार्यस्थल पर पहुंचकर उस एजेंडा के मुताबिक़ तुरत काम शुरू करना आसान होगा. इससे आपकी कार्यक्षमता  और उत्पादकता में गुणात्मक सुधार होगा.  
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# दैनिक जागरण के सभी संस्करणों में प्रकाशित
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Tuesday, February 25, 2020

एक्टिव रहेंगे तो प्रोडक्टिव रहेंगे

                                               - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर... .... 
हम सब अच्छी तरह जानते हैं कि जीवन में सक्रियता का बहुत महत्व है. सक्रियता से मेरा तात्पर्य यहां सकारात्मक सक्रियता से है. जो लोग एक्टिव रहते हैं, देखा गया है कि वे लोग ज्यादा प्रोडक्टिव बने रहते हैं. छात्र-छात्राओं पर भी यह बात लागू होती है. मौजूदा दौर में नियोक्ता ऐसे उम्मीदवार की तलाश में रहते हैं जो संस्थान की प्रोडक्टिविटी में लगातार योगदान करते रहें. इसके मद्देनजर विद्यार्थियों को शुरू से ही एक्टिव रहने की आदत डालने की जरुरत होगी. 

अगले तीन महीने में सीबीएसई की प्लस टू यानी बारहवीं की मुख्य परीक्षा शुरू होगी. प्री बोर्ड की परीक्षा तो जल्द शुरू होगी. स्टेट बोर्ड द्वारा संचालित परीक्षाएं भी कमोबेश इसी दौरान होंगी. बताने की जरुरत नहीं कि हर विद्यार्थी के लिए शारीरिक एवं मानसिक रूप से सक्रिय रहना आगामी परीक्षा के साथ-साथ उनके सर्वांगीण विकास के लिए भी बहुत अहम है. उनकी बुनियाद मजबूत होगी तभी  जाकर  वे जीवन में बड़े लक्ष्यों को प्राप्त करने में खुद को सक्षम रख पायेंगे. 

प्रकृति के मूल चरित्र को देखें या देश-विदेश के महान लोगों की दिनचर्या को, आपको हर जगह सक्रियता दिखाई देगी. इनमें खेलकूद सहित अन्य शारीरिक गतिविधियां शामिल हैं. चौबीस घंटे के समय चक्र में सारे जरुरी कार्यों को सम्पन्न करने के लिए सक्रियता की अनिवार्यता से शायद ही कोई इन्कार  कर सकता है. बावजूद इसके बहुत सारे विद्यार्थी सक्रिय जीवन नहीं जीते हैं. इसके एकाधिक दुष्परिणाम कई रोगों के रूप में विद्यार्थियों को झेलने पड़ते हैं. ऐसा तब होता है जब कि सभी जानते हैं कि शारीरिक सक्रियता से  मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में भी मदद मिलती है. 

सवाल है कि सक्रियता को अपनी आदत में शुमार करने के लिए क्या-क्या  करना जरुरी होता है? सर्वमान्य तथ्य है कि सुबह की शुरुआत अच्छी हो तो दिन अच्छा गुजरता है. सुबह जल्दी उठना इसकी पहली शर्त है. कहा भी गया है कि रात में जल्दी सोने और सुबह जल्दी उठने से व्यक्ति स्वस्थ, समृद्ध और बुद्धिमान होता है. लिहाजा विद्यार्थियों के लिए सुबह उठकर पहले एक घंटे  में अपने शरीर की आन्तरिक सफाई के साथ-साथ फिजिकल एक्सरसाइज और पौष्टिक आहार से शरीर को सक्रिय और इंधनयुक्त करना बहुत लाभकारी होता है. ऐसा पाया गया है कि बहुत सारे विद्यार्थी बगैर नाश्ता किए ट्यूशन या कोचिंग क्लास के लिए निकल जाते हैं और फिर देर-सबेर बाहर समोसा, कचौड़ी,  पिज्जा, बर्गर जैसी कम पौष्टिक या नुकसानदेह चीजें खाकर पेट भरते हैं. यह स्वास्थ्य की दृष्टि से गलत बात है. ऐसे विद्यार्थियों के लिए भी बेहतर तो यह होता है कि सुबह घर में पौष्टिक नाश्ता करने के बाद पिछले दिन जो कुछ भी पढ़ा है,  पहले उसे एक बार लिखने का प्रयास करें. इससे उन्हें अपने दिमाग को सक्रिय करने का मौका मिलेगा और यह भी पता चलेगा कि उन्होंने कल जो पढ़ा था वह कितना समझ में आया और उसमें से कितना वे वाकई कागज़ पर उतार पा रहे हैं. अगर इसमें कुछ कमी रह जाती है तो तुरत उसे फिर से अच्छी तरह पढ़ें और फिर उसे लिखने का प्रयास करें. ऐसा कर लेने के बाद 10-15 मिनट का ब्रेक लें. बाहर निकलें या खिड़की से बाहर देखें या आंख बंद करके दीर्घ श्वास लें या बस आराम से बैठें या लेटे रहें. कहने का आशय यह कि इस दौरान बॉडी और माइंड को रिलैक्स करने दें जिससे कि वे फिर से रिचार्ज हो सकें. इसके बाद आज जो कुछ पढ़ने के लिए तय किया है, उसमें जो सबसे कठिन जान पड़ता है, उसे पहले पढ़ें - तन्मयता और एकाग्रचित्त होकर. फिर भी अगर बातें पूरी तरह समझ में न आए तो एक बार फिर पढ़ें. आप पायेंगे कि अधिकतर मामलों में आपको कठिन विषय भी अपेक्षाकृत ज्यादा आसानी से समझ में आने लगेगी. सुबह के इस बेहतर प्रबंधन से न केवल आपको अपने कोर्स को अच्छी तरह पूरा करने में सफलता मिलेगी बल्कि इससे आपका आत्मविश्वास में बहुत इजाफा होगा. इतना ही नहीं, आप दिनभर के अन्य सभी टास्क को इसी सक्रियता से पूरा करने को उत्साहित और प्रेरित होंगे.  
          
दिलचस्प बात है कि इस तरह सक्रिय रहकर पढ़ाई-लिखाई, खाना-पीना, खेलकूद आदि में व्यस्त रहने से छात्र-छात्राएं प्रोडक्टिव बने रहने के साथ-साथ आनंदित भी रहते हैं, क्यों कि उन्हें अपने लक्ष्य को हासिल और अपने सपनों को साकार करने का विश्वास होने लगता है. इसका परिणाम यह होता है कि वे अमूमन तनावमुक्त रहते हैं और अच्छी नींद का सुख ले पाते हैं. कहने की जरुरत नहीं कि ऐसे विद्यार्थी जीवन में सफल तो होते ही हैं, स्वस्थ और सानंद भी रहते हैं.    
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                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 

# लोकप्रिय साप्ताहिक "युगवार्ता" के 08.12.2019 अंक में प्रकाशित
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Tuesday, February 18, 2020

नई राहें: बनें कामयाबी के हकदार

                                            - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर, वेलनेस  कंसलटेंट ...
जीवन की लम्बी यात्रा में कई उतार-चढ़ाव आते हैं और सफलता-असफलता से हम रूबरू होते हैं. इसमें अस्वाभाविक कुछ भी नहीं. सच कहें तो अनुकूल एवं प्रतिकूल दोनों ही अवस्था में जब हम खुद से प्यार करते रहते हैं, तभी हम सफलता या असफलता का सही आकलन-विश्लेषण कर पाते हैं. और-तो-और इससे हमें आगे की कार्ययोजना को बेहतर बनाकर यथासाध्य कोशिश करते रहने की प्रेरणा भी मिलती है. प्रसिद्ध अमेरिकी गायिका, मॉडल और अभिनेत्री लूसली बॉल का स्पष्ट कहना है, "पहले खुद से प्यार करें. बाकी सबकुछ स्वतः ठीक होते जायेंगे. इस संसार में कुछ भी करने के लिए आपको वाकई खुद से प्यार करना होगा." दरअसल, जीवन में सक्सेस की संख्या को सहजता से बढ़ाते रहने के लिए खुद से प्यार करना तो अनिवार्य शर्त है ही, साथ ही सक्सेस यात्रा में मजबूती से आगे बढ़ते रहने के लिए कुछ और सरल व अहम सूत्र को जानना, समझना और ठीक से आत्मसात करके उस पर अमल करना भी जरुरी है.

पहला है खुद को अच्छी तरह से जानना - हमारे सपने, हमारी इच्छाएं, जीवन का मुख्य लक्ष्य, हमारे व्यक्तित्व की खूबियां और खामियां आदि. इन बातों पर निरपेक्ष भाव से अच्छी तरह गौर करना और उन्हें एक कागज़ पर लिखना अनिवार्य है. इससे हमें अच्छी तरह पता हो जाता है कि हमारे स्ट्रांग पॉइंट्स क्या हैं और हम किन मामलों में कमजोर हैं. खूबियों की संख्या ज्यादा होने पर न तो उससे अंहकार से ग्रस्त हों और न ही कमियां ज्यादा होने पर दुखी या अवसादग्रस्त. हर हाल  में खुद से प्यार करते रहें. हां, उस फैक्ट शीट के आधार पर अगर हम लगातार अपने मजबूत पक्ष को और मजबूत करते रहें और साथ में अपनी कमजोरियों को कम करते रहें, तो कुछ महीनों में ही हमें अपने व्यक्तित्व में सकारात्मक बदलाव साफ़ दिखने लगेगा. स्वाभाविक रूप से हमारी कार्यक्षमता और उत्पादकता पर इसका जबरदस्त असर भी होगा.

रोज सुबह-सुबह अपने अंदर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करने के लिए एक सरल मंत्र है. इसे आजमाकर जरुर देखें. सुबह सो कर उठने के बाद सबसे पहले कुछ देर आईने के सामने खड़े होकर खुद को निहारें. इसके बाद खुद से कई बार कहें 'आइ एम द बेस्ट'; मैं कर सकता हूं और मैं करूंगा.  ऐसा करने से शरीर में सकारात्मक तरंगों का संचार होगा. इससे न सिर्फ शरीर में स्फूर्ति महसूस होगी, बल्कि विचार भी बेहतर बनेंगे. दरअसल, मन को जैसा समझाएंगे, मानस वैसा बनेगा और व्यक्तित्व भी वैसा ही बनेगा. सभी जानते हैं कि कोशिश करने वालों की कभी हार  नहीं होती. केवल क्षमता प्रबंधन के महत्व को समझते हुए परफॉरमेंस को बेहतर करते रहना है.

मार्टिन लूथर किंग जूनियर कहते हैं कि अच्छा कार्य करने के लिए हर समय अच्छा होता है. बीता हुआ वक्त कभी लौट कर नहीं आता. लिहाजा, हमारे शार्ट टर्म और लॉन्ग टर्म एजेंडा में जो भी कार्य शामिल किए गए हैं, उन्हें निर्धारित समय पर शुरू और संपन्न करना जरुरी है. हां, जिस समय जो काम करें पूरे मनोयोग से करें और उसे एन्जॉय करें. चाणक्य का कहना है, "जब भी किसी काम को आरम्भ करें, असफलता से मत डरें और उस काम को बीच में नहीं छोड़ें. जो लोग इमानदारी से काम करते हैं वो ज्यादा खुश रहते हैं." रोचक तथ्य है कि  दुनिया के हर व्यक्ति को 24 घंटे का ही समय मिला है, न एक मिनट ज्यादा और न ही एक मिनट कम. कामयाब लोग इसको बहुत अच्छी तरह समझते है और समय का बेहतर उपयोग करके सफलता के नए-नए मुकाम हासिल करते हैं.

घर हो या बाहर हमें आए दिन किसी-न-किसी समस्या का सामना करना पड़ता है. वर्क प्लेस में तो अमूमन ऐसी स्थिति दिन में कई बार आती है. कभी समस्या  छोटी होती है तो कई बार बड़ी और बहुत गंभीर. हर जगह चुनौती और अपेक्षा यह होती है कि समस्या  से कैसे सफलतापूर्वक निबटा जाय और अंततः समाधान तक पहुंचा जाय. कई सर्वे में यह पाया गया है कि कई लोग किसी भी नए ओपरचुनिटी में कोई-न-कोई प्रॉब्लम देख लेते हैं. इतना ही नहीं वे जाने-अनजाने समस्या को बड़ा बना कर प्रस्तुत करते हैं. इससे कार्यस्थल का वातावरण नेगेटिव बनता है. इसके विपरीत, बस कुछ लोग ऐसे होते हैं जो हर समस्या में कुछ बेहतर करने का एक नया अवसर देखते हैं. कहने की जरुरत नहीं कि हर नियोक्ता या उच्च अधिकारी बस यही तो चाहते  हैं कि उनके कर्मी ऐसे खुले दिमागवाले हों जो हर चुनौती या समस्या को सलूशन फाइंडर की दृष्टि से देखें और सामने आए समस्या को शुरू से ही सुलझाने का हर संभव प्रयास करें. गौरतलब बात है कि ऐसे पॉजिटिव थॉट वाले कर्मी हर ऐसे सहकर्मी से मदद लेने का प्रयास भी करते हैं  जो उस मामले को सुलझाने में उससे बेहतर क्षमता एवं दक्षता रखते हैं. जाहिर है कि तमाम समस्याओं के बावजूद ऐसे लोग ही संस्था को समाधान तक पहुंचाने में सक्रिय और प्रभावी भूमिका निभाते हैं. किसी  सफलता का श्रेय लेना उसका ध्येय नहीं होता. वे तो केवल आस्था व निष्ठा पूर्वक अपनी ड्यूटी करते हैं.  निःसंदेह, ऐसी प्रकृति के लोग हर जगह सक्सेस और सम्मान के हकदार भी बनते हैं. 
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Tuesday, February 11, 2020

युवाओं में नशे की लत घातक

                                                   - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर... .... 
हाल ही में प्रधानमंत्री ने "मन की बात" कार्यक्रम में इ-सिगरेट के खतरे से युवाओं को बचने की सलाह दी. यह अकारण नहीं था. नशीली पदार्थों की किस्में और दायरा दोनों बढ़ रहा है. हाई प्रोफाइल इलाके से लेकर झुग्गी बस्तियों तक के युवा नशे की चपेट में आ रहे हैं. देश के शैक्षणिक संस्थानों में पढ़ रहे विद्यार्थियों में से हजारों  विद्यार्थियों का किसी-न-किसी प्रकार के नशे के प्रति बढ़ता झुकाव बहुत बड़ी  चिंता का कारण है. यह विद्यर्थियों के भविष्य के लिए बहुत बड़ा खतरा है तो देश के  सामने एक  गंभीर चुनौती भी. ऐसा पाया गया है कि 16-18 वर्ष की उम्र में नशे की लत लग जाती है. सिगरेट, शराब, गुटखा, तम्बाकू, भांग और गांजा की ओर युवा सबसे ज्यादा आकर्षित हो रहे है. इससे आगे उन्हें  चरस, अफीम, कोकीन, हेरोइन जैसे नशीले पदार्थ लुभाते  हैं. इस छोटी उम्र में जो विद्यार्थी नशे के शिकार हो जाते हैं, उनके लिए आगे यह केवल मौजमस्ती या फैशन का नहीं, बल्कि बड़ी जरुरत का कारण बन जाती है. "शराब है खराब या नशा करता है आपका नाश या सिगरेट-शराब स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है" जैसी चेतावनी उनके लिए निरर्थक है. आम तौर पर यह देखा गया है कि विद्यार्थियों में इस लत की शुरुआत दूसरों के देखादेखी, विज्ञापन प्रेरित, दोस्तों के दवाब, क्षणिक रोमांच, अकेलापन, हीनभावना, उपेक्षाभाव, भय, तनाव, अवसाद आदि कारणों से होती है. 

जोर देने की जरुरत नहीं कि नशीले पदार्थों के सेवन से कम उम्र के विद्यार्थी न केवल कई रोगों का शिकार होते हैं, बल्कि कई गैर कानूनी एवं असामाजिक कार्यों में शामिल होकर अपना और अपने परिवार-समाज-देश को कई तरह से नुकसान पहुंचाते हैं. पहले तो उनको  पढ़ाई-लिखाई में  मन नहीं लगता है. इससे उनका रिजल्ट खराब होता है. इधर नशे के दुष्प्रभाव से सेहत खराब होने लगती है. झूठ बोलना और छोटी-मोटी चोरी का सिलसिला भी शुरू हो जाता है. शातिर असामाजिक तत्व इस वक्त रहनुमा और हितैषी बनकर अवतरित होते हैं और ऐसे विद्यार्थियों को  अपने जाल में आसानी से फंसा लेते हैं. फिर तो अधिकांश  मामले में उन विद्यार्थियों का जीवन छोटा हो जाने के साथ-साथ किसी-न-किसी अवांछित काम में बर्बाद हो जाता है. अपने आसपास देखने पर विद्यार्थियों को ऐसे अनेक मामले दिखाई पड़ जायेंगे. देश-विदेश की कई फिल्मों में भी इन घटनाक्रमों को दिखाया जाता रहा है. यहां सभी विद्यार्थियों के लिए अहम विचारणीय सवाल है कि आखिर क्यों कोई विद्यार्थी अपने अमूल्य जीवन को नशे की लत में पड़कर नाहक विनाश पथ पर ले जाता है, जब कि बचपन से ही उनके अभिभावक-शिक्षक-परिजन उन्हें अच्छी-अच्छी बातें सिखाते हैं और नशे आदि से हमेशा दूर रहने को कहते हैं? 

दरअसल, किशोरावस्था के संक्रांति काल में जब हार्मोनल बदलाव के साथ-साथ परिवेशजन्य  कई बदलावों से छात्र-छात्राएं गुजरते हैं, तब एक साथ कई परिवर्तनों - शारीरिक, मानसिक, शैक्षणिक तथा सामाजिक, का प्रबंधन एक जरुरी, पर कठिन काम होता है. मन चंचल होता है. इसी समय एकाधिक कारणों, खासकर संस्कार, संयम और संकल्प में कुछ कमी, से छात्र-छात्राएं भटकते हैं और फिर गलत संगत में पड़कर नशे की तथाकथित रोमानी और रोमांचक दुनिया में प्रवेश करते हैं. माता-पिता, भैया-दीदी, शिक्षक तथा अन्य परिजन अगर इस वक्त विद्यार्थियों को अच्छे तरीके से इन बदलावों को समझने और उनका अपने हित में प्रबंधन करने में मदद करें तो विद्यार्थियों के लिए इन बदलावों के अनुरूप खुद को एडजस्ट करना और सम्हाले रखना आसान हो जाता है. हां, इस अवधि में विद्यार्थियों की असामान्य गतिविधियों पर ध्यान देना और उन्हें समझाना अभिभावकों  की बड़ी जिम्मेदारी होती है. 

हां, अगर किसी विद्यार्थी को चाहे-अनचाहे नशे की लत लग गई है तो उन्हें इससे यथाशीघ्र बाहर निकलने का प्रयास करना चाहिए. यकीनन  इसके लिए साहस और संकल्प की दरकार होती है. बस यह मान लें कि जो हुआ सो हुआ. बीत गई सो बात गई.  हर दिन एक नया दिन होता है. जीवन में एक नयी शुरुआत कभी भी और किसी भी परिस्थिति में की जा सकती है. बेशक ऐसे समय घरवालों और अच्छे दोस्तों की भूमिका बहुत अहम होती है. उन्हें नशा करनेवाले विद्यार्थियों से नफरत करने के बजाय उन्हें बढ़िया से समझाने की हर संभव कोशिश करने की विशेष जरुरत होती है, क्यों कि इसी दौरान उनको मोटिवेशन और इमोशनल सपोर्ट की सख्त जरुरत होती है. 
(hellomilansinha@gmail.com)

                 
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 

# लोकप्रिय साप्ताहिक "युगवार्ता" के 24.11.2019 अंक में प्रकाशित
#For Motivational Articles in English, pl. visit my site : www.milanksinha.com  

Sunday, February 2, 2020

रोते हुए नहीं, मुस्कुरा के जिएं

                                                                        - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर... .... 
वर्ष 1967 में आई चर्चित हिन्दी फिल्म 'हमराज़' में साहिर लुधियानवी रचित एक गाना है जिसके बोल हैं : ना मुँह छुपा के जियो और ना सर झुका के जियो,  गमों का दौर भी आए तो मुस्कुरा के जियो... ...मेरी एक बाल कविता की पहली दो पंक्तियां हैं : 'रोना नहीं, हंसना सीखो, मेरे बच्चों जीना सीखो.' दरअसल ऐसी बातें सभी अभिभावक-शिक्षक किसी-न-किसी रूप में सभी विद्यार्थियों को बताते-समझाते रहे हैं. भारतीय संस्कृति और परम्पराओं में भी अनेकानेक सन्दर्भों में इस बात को साफ़ तौर पर रेखांकित किया गया है.
  
ऐसे हर समाज में एक ही तरह की परिस्थिति में रहनेवाले विद्यार्थियों में कुछ तो बराबर किसी-न-किसी चीज के न होने का रोना रोते रहते हैं, वहीँ कुछ विद्यार्थी उसी परिस्थिति में खुश रहते हुए अपने कर्तव्य पथ पर चलने का भरसक प्रयास करते रहते हैं. खेल का मैदान हो या परीक्षा हॉल, हर जगह प्रयास करने से पहले ही हार माननेवालों यानी रोनेवालों का विजयी होना नामुमकिन होता है, जब कि उनको भी कई बार बताया जा चुका  है कि कोशिश करनेवालों की कभी हार नहीं होती. 

जीवन के चौराहे पर खड़े कई विद्यार्थियों के सामने जब चारों दिशाओं में रास्ते खुले होते हैं, वे हर रास्ते में आगे कठिनाई का रोना वहीँ खड़े-खड़े रोते रहते हैं और आगे कदम नहीं बढ़ाते. उनके पास जो रहता है उसका सदुपयोग करने और आनंद उठाने के बजाय जो कुछ नहीं है उसी का राग अलापते रहते हैं. एक उदाहरण से इसे और अच्छी तरह समझते हैं. एक ही कक्षा के दो विद्यार्थी हैं. एक हफ्ते बाद परीक्षा है. एग्जाम के पहले दिन के पेपर से संबंधित कुछ चैप्टर पढ़ना जरुरी है, पर किताब नहीं है. किताब खरीदने का पैसा भी नहीं है. अब पहला विद्यार्थी किताब न होने का रोना रोता है. अपनी परिस्थिति को दोष देता है और अपने भाग्य को कोसता है. किताब हासिल करने और फिर उसे पढ़ने के लिए मौजूद विकल्प की ओर ध्यान नहीं देता है, जब कि विकल्प कई हैं.  परिणाम क्या होगा, इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है. वहीँ  दूसरा विद्यार्थी कॉलेज की लाइब्रेरी या किसी सहपाठी या शिक्षक की मदद से किताब पढ़ लेता है और हंसी-ख़ुशी परीक्षा में शामिल होता है.

जीवन के लम्बे काल खंड में सबके सामने कुछ चीजें होने और कुछ चीजें नहीं होने का सवाल किसी-न-किसी समय सामने आ खड़ा होता है. यह भी सच है कि शायद ही किसी के पास सब चीजें सब समय उपलब्ध होती हैं. छात्र-छात्राएं अगर प्रबंधन के मूल सिद्धांत पर गौर करेंगे तो उन्हें लगेगा कि चीजें कम हो या ज्यादा, उपलब्ध साधनों के ही माध्यम से किसी भी परिस्थिति में लक्ष्य तक पहुंचना कठिन तो हो सकता है, पर असंभव नहीं है. सोचिए जरा, गांधी जी और अन्य स्वतंत्रता सेनानी अगर यह सोचते कि अपने सीमित साधनों से वे कैसे महाशक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ फेकेंगे तो क्या आजादी हासिल करना जल्दी संभव हो पाता?

स्वास्थ्य की दृष्टि से सोचें तो हर बात पर रोने की आदत न केवल आपके मेटाबोलिज्म को दुष्प्रभावित करता हैं, बल्कि आपको मानसिक रूप से नेगेटिव और कमजोर बनाता है. आप तनावग्रस्त रहने लगते हैं. फलतः आप कई बीमारियों के चपेट में भी आ जाते हैं.  धीरे-धीरे "हम नहीं कर सकते हैं, हम नहीं कर पायेंगे" ही  आपका नजरिया बन जाता है. और इस नजरिए से फिर तो सफलता तक पहुँच पाना बहुत ही मुश्किल हो जाता है. "कौन बनेगा करोड़पति" के कर्मवीर नामक एपिसोड में आप  जिन लोगों को देखते हैं और उनकी जीवन यात्रा से परिचित होते हैं, उनसे आपको कौन से प्रेरक संदेश प्राप्त होते हैं? यही न कि कभी ख़ुशी, कभी गम से भरी इस जिंदगी में रोना छोड़ अगर कोई हंसते हुए कोशिश करते रहे तो सफ़र मुश्किल होने के बावजूद भी रोमांचक और मजेदार लगता है और पता भी नहीं चलता कि इस क्रम में कितनी सारी छोटी-बड़ी मंजिलों को वे हासिल भी करते गए. राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर तो यह भी कहते हैं: "विपत्ति जब आती है, कायर को ही दहलाती है, सूरमा नहीं विचलित होते, क्षण एक नहीं धीरज खोते ...."  

रोचक तथ्य है कि जब आप किसी भी परिस्थिति में किसी भी काम को दृढ़ संकल्प के साथ यथाशक्ति और यथाबुद्धि करने में जुट जाते हैं तो अव्वल तो वह काम उतना मुश्किल प्रतीत नहीं होता और दूसरे आपकी आंतरिक शक्ति कई गुना बढ़ जाती है. परिणामस्वरूप, अधिकाश समय असंभव लगनेवाला काम भी संपन्न हो जाता है. निसंदेह,  ऐसी सफलता से आपके आत्मविश्वास में जबरदस्त उछाल आता है और आपको असाधारण ख़ुशी भी मिलती है. 
(hellomilansinha@gmail.com)

                 
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 

# लोकप्रिय साप्ताहिक "युगवार्ता" के 01.12.2019 अंक में प्रकाशित
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Tuesday, January 28, 2020

हेल्थ मोटिवेशन : धूप का रोज लें आनंद, सेहत ठीक रहे हरदम

                                              - मिलन  सिन्हा,   हेल्थ मोटिवेटर  एवं  स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट 
सूर्य के बिना जीवन की कल्पना नामुमकिन है. हमारे देश में हजारों वर्षों से सूर्य को देवता के रूप में पूजा जाता है. सूर्य की पहली किरण हमारे लिए रोज एक नयी सुबह लेकर आती है. हरेक के जीवन में आशा, उत्साह, उर्जा और उमंग को प्रतिबिंबित करती है ये किरणें. दिलचस्प बात  है कि सूर्य हमें सिर्फ प्रकाश और ऊर्जा प्रदान नहीं करते, बल्कि हमारे लिए वायु, जल, अन्न, फल और साग-सब्जी का भी प्रबंधन करते हैं.  इतना ही नहीं, सूर्य की किरणों का हमारी सेहत से गहरा रिश्ता है. हम सभी जानते हैं कि धूप विटामिन-डी का सबसे सशक्त, प्रभावी और आसानी से उपलब्ध प्राकृतिक स्रोत है.

ज्ञातव्य है कि हमारा देश विश्व के ऐसे देशों में शामिल है, जहां लोगों को सूर्य की रोशनी पर्याप्त मात्रा में कमोबेश हर मौसम में उपलब्ध होती है. फिर भी हाल में एक रिसर्च में जो  तथ्य सामने आया है उसके मुताबिक़ देश में बड़ी संख्या में लोगों में विटामिन-डी की कमी पाई गई है, जिसके कारण उन लोगों का कई सारे रोग के चपेट में आने का खतरा स्वतः बढ़ जाता है. 

दरअसल फ़ास्ट लाइफ के वर्तमान दौर में  मुफ्त में मिलनेवाली धूप के विषय में ठीक से जानने, समझने और उसका आनन्द ही नहीं, बल्कि हेल्थ के सन्दर्भ में उसका अपेक्षित लाभ उठाने का अवसर नहीं मिल पाता है या उसके प्रति अपेक्षित जागरूकता का अभाव है. 

दिलचस्प तथ्य है कि सूर्य न केवल हमें बल्कि सम्पूर्ण ब्रह्मांड को ऊर्जा प्रदान करता है. सूर्य की सप्तरंगी किरणें रोगनिवारक होती हैं. धूप के सेवन से हमारा शरीर अनेक प्रकार की बीमारियों से बचा रहता है. प्रकृति विज्ञानी तो कहते हैं कि सूर्य एक प्राकृतिक चिकित्सालय है. ऐसी मान्यता बिलकुल सही है जब हम आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के तराजू पर धूप के असीमित फायदों को तौलते हैं.

1. धूप के कारण हमारे शरीर को उचित मात्रा में विटामिन-डी मिलने पर कैल्शियम शरीर में ठीक से एब्जोर्ब यानी अवशोषित होता है. इसी कारण विटामिन-डी को शरीर में हड्डियों की मजबूती के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है. हड्डियां कमजोर होने से फ्रैक्चर का खतरा बढ़ता है. हम ऑस्टियोपोरोसिस के  शिकार भी हो सकते हैं. 

2. धूप का नियमित सेवन न करने यानी विटामिन-डी की कमी से दिल की बीमारी भी होती है. हार्ट स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है. मांस -पेशियों में दर्द रहता है जिससे कई अन्य दिक्कतें भी पैदा होती हैं.

3. सूरज की किरणों में एंटी कैंसर तत्व होने से कैंसर का खतरा टलता है. जिन्हें कैंसर है, उन्हें धूप से बीमारी में आराम महसूस होता है. कई शोधों से यह बात सामने आई है कि जहां धूप कम समय के लिए होती है या जो लोग धूप में कम समय बिताते हैं, कैंसर की आशंका वहां ज्यादा होती है.

4. धूप के कारण शरीर गर्म होता है. नाड़ियों में रक्त प्रवाह सुचारू रहता है. इससे शरीर के सारे अंग सक्रिय रूप से काम करते हैं. धूप के सेवन से जठराग्नि ज्यादा सक्रिय रहती है. फलतः पाचनतंत्र बेहतर ढंग से काम करता है और खाना ठीक से पचता है. नतीजतन हमारे शरीर को अपेक्षित पोषण मिलता है और सेहत ठीक रहती है.

5. शरीर को अपेक्षित धूप न मिलने के कारण सेरोटोनिन तथा  एंडोर्फिन जैसे फील गुड और फील हैप्पी हार्मोन का यथोचित स्राव नहीं होता है जिससे तनाव और अवसाद से ग्रस्त लोगों को ज्यादा परेशानी होती है. ऐसे भी सुबह की धूप हमारे मन -मष्तिष्क को आनंदित करता है. 

6. धूप का संबंध हमारी नींद से भी है. नींद की क्वालिटी को प्रभावित करनेवाला  मेलाटोनिन नामक हार्मोन का स्राव धूप सेंकने से अच्छी तरह संभव हो पाता  है, क्यों कि धूप का सीधा असर  हमारे शरीर के पीनियल ग्रंथि पर होता है जिससे यह हार्मोन निकलता है. 

7. धूप का सेवन त्वचा संबंधी कई शारीरिक समस्याओं को दूर करने में सहायक होता है. एक्ने, सोरायसिस और एग्जिमा इनमें से कुछ हैं. दरअसल, धूप सेंकने से हमारा खून साफ़ होता है और इम्यून सिस्टम भी मजबूत होता है. धूप के सेवन से कई तरह के संक्रमण अपने-आप ख़त्म हो जाते हैं. 

8. जाड़े के मौसम में धूप में बैठने से  शरीर को गर्मी मिलती है, जिससे शरीर की जकड़न दूर होती है और ठंड के कारण आई अंदरूनी परेशानियां दूर होती है. इससे हड्डियों और मांसपेशियों को बहुत लाभ मिलता है.

9. नियमित रूप से कुछ समय धूप का सेवन करने से सर्दी-जुकाम से बराबर पीड़ित रहनेवाले  लोगों को बहुत फायदा होता है. दरअसल, धूप में बैठने से हमारे शरीर में वाइट ब्लड सेल्स की संख्या तेजी से बढ़ती है जो रोग का प्रतिकार कर पीड़ित व्यक्ति को राहत पहुंचता है.

हां, एक वाजिब सवाल हैं कि किस समय और कितनी देर धूप का सेवन स्वास्थ्य के लिए अच्छा माना जाता है? 
सुबह की धूप हमेशा अच्छी होती है. मौसम के हिसाब से कहें तो जाड़े में सुबह 12 बजे तक आधे घंटे तक धूप का सेवन बेहतर लाभ पहुंचाता है. गर्मी में सुबह 9-10 बजे तक का समय उपयुक्त है. जो लोग सुबह धूप का लाभ नहीं उठा सकते वे अपराह्न सूर्यास्त से पहले यानी 4-6 बजे के बीच इसका आनंद ले सकते हैं.

ध्यान रहे कि किसी भी मौसम में चिलचिलाती धूप में बैठना-लेटना सही नहीं है. जैसे कोई भी चीज बहुत अधिक ठीक नहीं होती, वैसे ही बहुत देर तक धूप में बैठे रहना भी हानिकारक है. इससे स्किन कैंसर, आंख की परेशानी, एलर्जी आदि का खतरा रहता है.

अंत में एक और विचारणीय बात. लाइफ कितना  भी फ़ास्ट हो, प्राथमिकताओं का सही प्रबंधन करते हुए हम सभी अपनी सेहत को ठीक रखने के लिए रोज थोड़ा वक्त तो निकाल ही सकते हैं. कहते हैं न कि जहां चाह, वहां राह. उदाहरण के लिए अगर हम सूर्योदय के बाद वाकिंग करते हैं  तो हमें अनायास ही थोड़ी देर धूप में भी रहने का अवसर मिल जाता है. शनिवार-रविवार या अवकाश के दिन अगर बच्चों के साथ किसी पार्क में चले गए तो बच्चों का मनोरंजन और व्यायाम हो जाएगा तथा साथ  में सबको धूप में रहने का मौका भी मिल जाएगा. उसी तरह जब भी मौका मिले, थोड़ा सन बाथ लेने का प्रयास करेंगें तो सेहत को ठीक रख पायेंगे.   
(hellomilansinha@gmail.com) 

                 
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 

# दैनिक भास्कर में प्रकाशित
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