Sunday, July 26, 2015

गुड लाइफ: प्रतियोगिता और पढ़ाई

                                                                                    - मिलन सिन्हा
clipप्रतियोगिता परीक्षाओं, खासकर नौकरी से संबंधित परीक्षाओं का रिजल्ट जब आता है, एक अजीब तरह का माहौल आसपास नजर आता है – कहीं ख़ुशी तो ज्यादा जगहों पर गम. कई बार सफल प्रतिभागी और विफल प्रतिभागी के बीच में प्राप्त अंकों का अंतर दशमलव में होता है, लेकिन सफल तो सफल है. चारों ओर उसी का गुणगान होता है. यह अकारण नहीं है. देश में बेरोजगारी की गंभीर समस्या के सन्दर्भ में युवाओं  के एक बड़े वर्ग के लिए  नौकरी पाना जीवन की  बड़ी उपलब्धि जो मानी जाती है. तभी तो बड़ी संख्या में लड़के-लड़कियां प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी में जुटे दिखाई पड़ते  हैं. बहरहाल, कई बार हम देखते हैं कि कमोबेश एक ही तरह के मेधा से लैस और सामान मेहनत करने वाले दो छात्रों में एक सफल हो जाता है, जब कि दूसरा काफी पीछे रह जाता है . देखने वाले सोचते हैं कि दोनों छात्रों ने जब बराबर ही मेहनत की है , दोनों ही पढ़ने में अच्छे रहे हैं, तो आखिर रिजल्ट में ऐसा फर्क कैसे रह गया ? वाकई फर्क पढ़ने के घंटे में नहीं, बल्कि तन्मयता से पढ़ने, पढ़ी हुई बातों को दिमाग में संजो कर रखने एवं परीक्षा में प्रश्नानुसार सही –सही उत्तर देने के बीच के बेहतर समन्वय –सामंजस्य में है . कहने का तात्पर्य यह कि अगर हमने किसी विषय विशेष के लिए 10 पेज पढ़ा , उतना ही समझ कर हम दिमाग में बिठा सके एवं परीक्षा के दौरान उससे संबंधित प्रश्नों का सही–सही उत्तर दे सके, तो उत्तम या अपेक्षित परिणाम न आने का सवाल ही नहीं है. लेकिन क्या ऐसा हो पाता है या होना संभव भी है ? आम तौर पर यह पाया जाता है कि पढ़ने, दिमाग में रख पाने तथा इम्तहान में उसका उपयोग करने का अनुपात 10 : 6 : 3 होता है. अर्थात पढ़ा तो दस पेज, दिमाग में रहा छः पेज, परन्तु उपयोग हो पाया मात्र तीन पेज. अच्छे विद्यार्थी इस अनुपात को बेहतर बनाकर  10 : 8 : 6 या उससे भी ऊपर तक ले जाने की निरंतर कोशिश करते हैं . इसके लिए वे लोग पूरे मनोयोग से पढ़ते हैं, समझते हैं, दोहराते हैं, अच्छी तरह ग्रहण करते हैं और फिर परीक्षा में उसका  यथोचित उपयोग करने में सक्षम हो पाते हैं. वे दूसरे विद्यार्थी के तरह रोजाना पढ़ते तो 8 -10 घंटा ही हैं, लेकिन वे पढ़ते हैं योजनाबद्ध तरीके से जिसमें खाने, सोने आदि को भी पर्याप्त तबज्जो दी जाती है.  ऐसे विद्यार्थी न केवल समय प्रबंधन में कुशल होते हैं, बल्कि आत्मविश्वास से भी भरे होते हैं. 

                    और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Sunday, July 19, 2015

गुड लाइफ: जानकार एवं जागरूक बनें

                                                                                            - मिलन सिन्हा
clip2011 के जनगणना के मुताबिक देश में साक्षर लोगों की संख्या में 9.2 % की वृद्धि दर्ज की गई. वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार यह आंकड़ा कुल जनसंख्या का  64.84 % था तो 2011  में बढ़कर 74.04 % हो गया . निश्चय ही यह देश में शिक्षा के क्षेत्र में हो रही प्रगति का सूचक है. लोग निरंतर साक्षर  व  शिक्षित बनें, यह लोकतान्त्रिक ढांचे को मजबूत बनाए रखने के लिए अनिवार्य  माना जाता है. लेकिन क्या साक्षर, शिक्षित या प्रशिक्षित  होने मात्र से हम स्वतः ही जानकार एवं जागरूक भी माने जायेंगे  या सही मायने में जानकार  तथा जागरूक होना इसके आगे की बड़ी और ज्यादा महत्वपूर्ण सीढ़ी है जिसके माध्यम से हम अच्छे–बुरे की समझदारी से लैस होकर अपने और अपने परिवार –समाज की बेहतरी के लिए काम करते हैं . मसलन,  सिगरेट, गुटखा, खैनी , शराब आदि हमारे स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक हैं , तथापि हममें से अनेक, पढ़े –लिखे होने के बावजूद  इनका सेवन करते रहते हैं क्योंकि हम  इनसे होने वाले दुष्परिणामों के प्रति पूर्णतः जागरूक नहीं हैं . देश में जानलेवा बीमारियों जैसे कैंसर, ह्रदय रोग, गुर्दे की बीमारी आदि से बहुत हद तक बचे रहने के एकाधिक उपाय हैं जो जीवनशैली में अपेक्षित सुधार या बदलाव से संभव हो सकता है और अगर किसी कारण हम ऐसी बीमारी के शिकार हो भी जाते हैं , तब भी ऐसे रोगों के इलाज की व्यवस्था पहले की तुलना में कहीं ज्यादा सुलभ है, बेशक सरकारी एवं प्राइवेट अस्पतालों में खर्च में भारी अंतर है, लेकिन पर्याप्त जागरूकता के अभाव में हम इन सुविधाओं का भरपूर फायदा उठाने से वंचित रह जाते हैं . एम्स, दिल्ली के कैंसर रोग विशेषज्ञ  डॉ. रथ ने हाल ही में एक टीवी प्रोग्राम में इस बात को बखूबी रेखांकित किया . उन्होंने कहा कि कैंसर के ‘स्टेज –वन’ यानी प्रारंभिक अवस्था वाले मरीज के समुचित इलाज के उपरान्त पूर्णतः ठीक होने की संभावना 80 %  होती है. जब कि ‘स्टेज –टू’  यानी इलाज में देरी से  रोग के पुराने व गंभीर अवस्था में पहुंचने के कारण सुमिचित इलाज के बाद भी रोगी के अच्छे होने की संभावना केवल 20 % रह जाती है. कमोबेश ऐसे ही परिणाम अन्य गंभीर रोगों के मामले में भी सामने आते हैं. अतः आवश्यकता इस बात की है कि जीवन की इस खट्टी–मीठी लम्बी यात्रा में हम हर मामले में जानकार एवं जागरूक बनें और अपने आसपास के लोगों को भी इसके लिए प्रोत्साहित एवं प्रेरित करते रहें.

                  और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Saturday, July 11, 2015

गुड लाइफ: जिम्मेवारी की बात

                                                                         - मिलन सिन्हा 
clipहर घर में उस दिन हर्ष और उल्लास का माहौल होता है जिस दिन बच्चा अपने पैरों पर पहली बार चलता है, बेशक लड़खड़ाते हुए बस दो कदम ही क्यों न हो . उससे पहले कई दिनों तक उसे हाथ या अंगुली पकड़ कर चलने को प्रेरित करने की प्रक्रिया सुबह –शाम चलती है. इस क्रम में उत्साहवश  कई बार बच्चा स्वयं खड़ा होने व चलने का प्रयत्न करता है . वह गिरता है, उठता है , फिर चलने की कोशिश करता है और अंततः चल भी पड़ता है . लेकिन कई बार ऐसा भी देखने में आता है कि कमोवेश एक जैसी परिस्थिति में एक ही उम्र के  बच्चे अलग –अलग समय पर चलना शुरू करते हैं, कोई पहले, कोई बाद में और कई तो काफी देर से , जब कि सबके माता –पिता अपने बच्चे को यथासमय चलते हुए देखना चाहते हैं . इसके एक नहीं, कई कारण होते हैं , किन्तु एक सामान्य पर बड़ा कारण यह होता है कि आप अपने बच्चे को इस जिम्मेदारी के लिए कैसे प्रेरित एवं तैयार कर रहे हैं . यही बात घर–दफ्तर प्रत्येक जगह लागू होती है . 

सच पूछें तो जिम्मेदारी देने से सिर्फ बात नहीं बनती, अपितु हमें उस व्यक्ति को जिम्मेदारी के लायक भी बनाना पड़ता है .कई बार यह भी होता है कि व्यक्ति जिम्मेदारी के लायक तो होता है, परन्तु उसे जिम्मेदारी दी नहीं जाती, जिससे उसके अंदर कुंठा और हीन भावना घर करने लगती है. इससे उस व्यक्ति के  आत्म विश्वास, प्रतिबद्धता, कार्य क्षमता आदि पर नकारात्मक असर पड़ता है . 

सर्वमान्य तथ्य यह  है  कि मनुष्य मात्र में जिम्मेदारी लेने की स्वभाविक प्रवृति होती है. वह  दुनिया के सामने यह साबित करना चाहता है कि वह भी उस कार्य के लायक है. और फिर मौका दिए जाने पर व्यक्ति पूरे लगन, उत्साह और उर्जा के साथ अपेक्षा से कहीं बेहतर परिणाम देने की भरपूर कोशिश करता है .  इस क्रम में उस व्यक्ति की सृजनशीलता रंग दिखाती है, उसका काम के प्रति लगाव बढ़ता है और साथ ही अपने सहकर्मियों तथा उस संस्था से जुड़ाव भी. कहते हैं न कि जिस  आदमी को अपनी जिम्मेदारियों का एहसास हो गया, वह जीवन में कुछ आगे बढ़ गया, घर-समाज के लिए कुछ बेहतर करने लायक बन गया. 

यही कारण है कि अच्छी  संस्थाएं अपने कर्मचारियों का नियमित आकलन करती है एवं उन्हें सतत प्रेरित करते हुए जिम्मेदारी लेने लायक बनाती है. इतना ही नहीं, जिम्मेदारी देने के बाद एक मार्गदर्शक की भूमिका का बखूबी निर्वहन भी करती हैं .
                 और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं