Wednesday, March 26, 2014

गुड लाइफ : नियमितता है जरूरी

                                                           - मिलन सिन्हा 

Displaying 8384225.jpgबहता हुआ पानी गतिशील जीवन का एहसास करवाता है और ठहरा हुआ पानी प्रदूषण को निमंत्रण देता है। हमारा जीवन भी कुछ ऐसा ही है।  सुनते भी रहते हैं हम -जीवन चलने का नाम, चलते रहें सुबह - शाम; खाली दिमाग शैतान का घर...। समाचार माध्यमों के मार्फ़त हमें रोज खबर मिलती है कि फलां - फलां स्थान पर इन -इन अच्छे कार्यों का शुभारंभ हुआ, वहाँ की जनता ने नेताओं - अधिकारियों का जय -जयकार किया आदि, आदि। कुछ महीनों के बाद  पता करें तो जानकारी मिलती है कि जिस उत्साह व योजना से वे सारे कार्य प्रारम्भ हुए थे, उनमें से अनेक या तो वह अब उस गति से नहीं चल रहे हैं या बिलकुल ही रुक गए हैं। ऐसा हमारे आम जिंदगी में भी अक्सर होता है। हम कई  अच्छे कार्य शुरू तो बड़े उत्साह व उल्लास से करते हैं, लेकिन उन्हें नियमित व योजनानुसार आगे बढ़ाने से चूकते रहते है।  सो, उस  कार्य की रफ्तार धीमी हो जाती है और अंततः रुक जाती है या अर्थहीन हो जाती है। 

उदहारण स्वरुप, हम सुबह उठाना चाहते हैं, उठते भी हैं, अच्छा महसूस भी  करते हैं, परन्तु दो -चार दिन, हफ्ते - दो हफ्ते के बाद फिर वही ' ढाक के तीन पात'। ऑफिस आदि में भी कई नयी चीजें पूरे तामझाम के साथ शुरू तो की जाती है, प्रचार एवं श्रेय भी पूरा मिल जाता है, लेकिन उसे अंजाम तक पहुंचाने में शिथिलता आ जाती है और फिर वही दुखभरी दास्तान। कहने का तात्पर्य, अच्छे से शुरू किये गए काम का अच्छा फल हम भोग नहीं पाते हैं। कारण? कार्य को लक्ष्य तक पहुंचाने के लिए अपेक्षित निष्ठा,  निरंतरता व नियमितता में कमी। अगर हम ऐसे कार्यों को अपनी दिनचर्या व कार्य योजना में शामिल कर लेते हैं तो वह चलता रहता है और एक समयावधि के बाद उसके अच्छे फल का हम भरपूर आनंद उठाते हैं।  


                    और भी बातें करेंगे, चलते-चलते असीम शुभकामनाएं

Sunday, March 16, 2014

गुड लाइफ : अनोखे हैं, अनोखे ही रहें

                                                                                         - मिलन सिन्हा 
Displaying 7905097.jpgहम सब जन्म से ही अलग और अनोखे हैं। विश्व के 721 करोड़ लोगों में से कोई भी एक दूसरे का मिरर इमेज (पूर्णतः एक जैसा) नहीं है, न शारीरिक रूप से और न ही मानसिक रूप से। नाम, जन्म समय, तिथि व स्थान, माँ-पिता का नाम, रंग, रूप, क्षमता, चाहत, रुचि, उपलब्धि आदि से लेकर अंगूठे का निशान व हस्ताक्षर तक में भिन्नताएं देखी गई है। है न रोचक और एकदम सही !  लेकिन सवाल है कि हम अपने इस अनोखेपन से वाकई कितने वाकिफ हैं और इसे कितना तवज्जो देते हैं। 

क्या हम अपनी इस अनमोल जिंदगी में  कुछ करना चाहते हैं, पाना चाहते हैं ? अगर हाँ, तो फिर, क्या हमने निष्ठापूर्वक खुद को देखने, जानने- समझने  का प्रयास किया है ? कहते भी हैं, 'खुद को जानो, तभी खुदा मिलेंगे, नहीं तो खुदा तुमसे जुदा रहेंगे।' वैसे भी क्या यह तर्कसंगत लगता है कि हम वैसा ही सोचें जैसा और लोग सोच रहे है एवं वही करें जो और लोग कर रहें हैं ? हमें दूसरों से जरूर सीखना चाहिए, पर आंख बंद कर दूसरों की नक़ल नहीं करनी चाहिए। जब हम ओरिजिनल हैं तो फिर क्यों डुप्लीकेट बनें या दिखें ? किसी का भी कॉपी-पेस्ट संस्करण क्यों बनें ? 

हमारे विषय में लोग क्या कहते हैं, उसमें सिर खपाने से कहीं ज्यादा आवश्यक है कि हम अपने कार्य आदि की समय -समय पर खुद निरपेक्ष समीक्षा करें, आत्म-विश्लेषण करें।  जहाँ गलती हो रही है, उसे तुरंत सुधारें एवं जहाँ अच्छा कर रहे हैं, उसे और उन्नत करने का प्रयास करते रहें।सच मानिये, सकारात्मक सोच के साथ अगर  आत्म-समीक्षक, आत्म-विश्लेषक की भूमिका निभाते हुए हम 'कल से बेहतर हो आज' के सिद्धान्त पर अमल करते रहेंगे, तो हमारे लिए सफलता की सीढ़ियां चढ़ना काफी आसान हो जायेगा। 

                      और भी बातें करेंगे, चलते-चलते असीम शुभकामनाएं

आज की कविता : कैसे खेलूं फाग

                                                       - मिलन सिन्हा 
holi

कैसे खेलूं  मैं फाग 
जब पड़ोस में लगी हो आग ।

किस पर डालूं मैं रंग 
होली खेलूं किसके संग 
जब कि हो गए हैं 
चेहरे सबके बदरंग ।

कैसे खेलूं  मैं फाग 
जब  पड़ोस में लगी हो आग ।

ईमान  बिक रहा है 
चरित्र बंधक पड़ा है 
शासन जैसे सो रहा है 
सर्वत्र अंधेरा छा रहा है ।

कैसे खेलूं  मैं फाग 
जब पड़ोस में लगी हो आग ।

गाँव  उजड़ रहा है 
कस्बा कराह  रहा है 
शहर भी अब  सड़ रहा है 
मन सबका रो रहा है ।

कैसे खेलूं  मैं फाग 
जब  पड़ोस में लगी हो आग ।

राजनीति जब हो जाए गाली 
आतंकी खेल रहे खून की होली 
बेईमानों की कट रही हो रात 
जैसे हर रोज हो दिवाली ।

कैसे खेलूं  मैं फाग 
जब  पड़ोस में लगी हो आग ।

                 और भी बातें करेंगे, चलते-चलते असीम शुभकामनाएं

 ( प्रवासी दुनिया .कॉम पर 16.03.14 को प्रकाशित)

Monday, March 10, 2014

बेरोजगार युवाओं के सामने चुनाव

                                                                            - मिलन सिन्हा 
16वीं लोक सभा का चुनाव सामने है।  चुनावी माहौल गर्मा रहा है। केंद्र में सत्तासीन होने के उद्देश्य से जबर्दस्त जोड़ -तोड़ करने एवं  नायाब रणनीतियां  आजमाने का दौर शुरू हो गया है।  पहली बार वोटर बनने  वाले युवाओं पर हर दल के पैनी नजर है। देश का हर बड़ा राजनीतिक नेता चुनाव में युवाओं का समर्थन हासिल करने के लिए अनेक लुभावने बयान दे रहे हैं , चुनावी वादे कर रहे हैं। सही भी है।  हमारा देश विश्व का सबसे युवा देश जो है। भारत दुनिया का ऐसा देश है, जहां युवाओं की संख्या सबसे अधिक है। 2011 के जनगणना के अनुसार 15 से 29 वर्ष के आयु वर्ग के युवाओं के संख्या 33 करोड़ है जो देश के कुल आबादी का 27.5 % है।

कहना न होगा, किसी देश का भविष्य तभी बेहतर हो सकता है जब उस देश के युवाओं को बेहतर शिक्षा, ज्ञान , कौशल आदि  के आधार पर सहज व उपयुक्त  रोजगार उपलब्ध हों। लेकिन क्या हम अपने युवाओं के लिए ऐसा करना चाहते हैं और वाकई कर भी रहे हैं?

गौरतलब  है कि जहां भारत में दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी रहती है , वहीँ यह भी एक कड़वा सच  है कि दुनिया में सबसे अधिक बेरोजगार युवा भी हमारे देश में हैं। इससे भी अधिक चिंताजनक विषय यह है कि युवाओं में जैसे-जैसे शिक्षा का स्तर बढ़ रहा है, वैसे- वैसे ही बेरोजगारी की दर भी बढ़ रही है। उत्तर प्रदेश, बिहार जैसे बड़े एवं  राजनीतिक रूप से ज्यादा संवेदनशील, लेकिन औद्योगिक रूप से पिछड़ते जा रहे  राज्यों में यह स्थिति और भी गंभीर है। 

 राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण  संगठन द्वारा वर्ष 2009-10 के आंकड़ों के आधार पर जारी रपट के मुताबिक    ग्रामीण क्षेत्र के स्नातक डिग्रीधारी लड़कों  में बेरोजगारी दर 16.6 % और लड़कियों में 30.4 % रही। शहरी क्षेत्रों के ऐसे युवकों में यह  दर 13.8 % और युवतियों में 24.7 % दर्ज की गई। सेकेंडरी लेवल के सर्टिफिकेट धारक  ग्रामीण इलाके के युवकों में बेरोजगारी दर 5 % और लड़कियों  में करीब 7 %   रही जब कि शहरी क्षेत्रों के युवकों में बेरोजगारी दर 5.9 % और महिलाओं में 20.5 % पाई गई। गत तीन वर्षों में इस स्थिति में सुधार के बजाय गिरावट ही हुई  है। 

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन ( आई एल ओ ) के हाल के रपट ने देश के नौकरी बाजार की स्थिति को कमजोर बताया है।  उक्त रपट में पिछले दो साल में बेरोजगारों के संख्या में वृद्धि के बात कही गयी है जो जमीनी हकीकत से मेल खाते हैं। यह तो हमें मालूम ही है कि भारतीय अर्थ व्यवस्था में वर्ष 2004 -09 के दौरान औसतन 9 % जी डी पी ( सकल घरेलू उत्पाद ) ग्रोथ दर था जो कि विश्व के कई उन्नतशील देशों से बेहतर था, लेकिन इस अवधि में केवल दस लाख नौकरियां ही सृजित की जा सकी जो बेरोजगारों के विशाल फ़ौज के सामने बहुत ही नगण्य  है। यू पी ए -II  के चालू कार्यकाल के पांच वर्षों में नौकरियां और भी कम सृजित हुई, जब कि इसी दौरान  में इंजीनिरिंग  व मैनेजमेंट का  डिग्री हासिल करने वाले युवाओं की  संख्या बेतहाशा बढ़ी। 

विडम्बना यह है कि तकनीकी शिक्षा क्षेत्र में भी बेरोजगारी दर में बेतहाशा वृद्धि हो रही है। इससे  इस धरना को बल मिलना स्वाभाविक है कि  युवाओं के लिए चलाए जा रहे स्किल डेवलमेंट मिशन के  प्रयास भी रोजगार गारंटी का सर्टिफिकेट नहीं बन पा रहे हैं। 

तो सवाल है कि आखिर कोरी घोषणाओं का क्या अर्थ है हमारी युवा पीढ़ी के लिए ? क्या यह उनके लिए भी एक चुनाव का मौका नहीं है ? क्या इस बड़े पढ़े - लिखे युवा वर्ग को अपने अपने क्षेत्र के उम्मीदवारों से आसन्न लोक सभा चुनाव से पहले  इस मुद्दे पर खुल कर चर्चा  नहीं करनी चाहिए ; एक ठोस कार्ययोजना पर अमल के लिए  प्रतिबद्धता  सुनिश्चित नहीं करनी चाहिए ?

                     और भी बातें करेंगे, चलते-चलते असीम शुभकामनाएं
#  प्रवासी दुनिया .कॉम पर प्रकाशित

Tuesday, March 4, 2014

गुड लाइफ : जल का फल

                                                              -मिलन सिन्हा 
आपने भी सुना होगा, सोचा और कहा भी होगा- जल ही जीवन है; जल नहीं तो कल नहीं; हमारे शरीर में 60% जल है; हमारी पृथ्वी पर 71% जल है; जल चक्र पर हमारा बहुत कुछ निर्भर है  आदि, आदि। बिल्कुल सही। बहरहाल,मानव स्वास्थ्य से जल के अदभुत रिश्ते की थोड़ी गहरी विवेचना करने पर पायेंगे  कि मनुष्य जितनी बिमारियों से ग्रसित होते हैं,  उनमें जलजनित बिमारियां 60% से ज्यादा हैं।और ऐसे  बीमार लोगों को जल चढ़ाते हुए देखना भी किसी अस्पताल-नर्सिंग होम का आम दृश्य है, क्यों ?  

सभी जानते हैं कि हमें रोजाना 3-4 लीटर पानी पीना चाहिए। हाँ, पीना चाहिए, गटकना नहीं। पीने का अर्थ है धीरे -धीरे जल ग्रहण करना और वह भी बैठ कर आराम से। इतना ही नहीं, हम कब -कब और कितना पानी पीते हैं, इसका भी हमारे सेहत से गहरा ताल्लुक है। रोज सुबह ब्रश करने के बाद कम से कम आधा लीटर गुनगुना पानी पीना हमारे अंदरूनी सफाई के लिए बहुत कारगर है। अगर इस सफाई प्रक्रिया को और प्रभावी बनाना है तो गुनगुने पानी में आधा नींबू निचोड़ लें। ऐसे, सुबह पानी पीने के अन्य अनेक फायदे हैं।विशेषज्ञ यह भी कहते हैं  कि खाने के तुरत पहले, खाने के बीच में और खाने के तुरत बाद पानी नहीं पीना चाहिए, क्यों कि इससे पाचन क्रिया दुष्प्रभावित होती  है। 

जानकार बताते हैं, शरीर जितना हाइड्रेटेड रहेगा, हम  उतना ही स्वस्थ रहेंगे। खासकर रात में सोने से पूर्व पानी अवश्य पीना चाहिए, इससे हार्ट व ब्रेन स्ट्रोक की संभावना कम हो जाती है। मानसिक तनाव हो तो पानी के दो चार घूंट भी सकून का एहसास करवाता है। सार-संक्षेप यह कि दूसरों को 'पानी पिलाने' के मुहावरे को चरितार्थ करने के बजाय खुद पानी पीने की कला में पारंगत होना हर दृष्टि से गुड लाइफ की गारंटी देता है।

                      और भी बातें करेंगे, चलते-चलते असीम शुभकामनाएं