Monday, March 10, 2014

बेरोजगार युवाओं के सामने चुनाव

                                                                            - मिलन सिन्हा 
16वीं लोक सभा का चुनाव सामने है।  चुनावी माहौल गर्मा रहा है। केंद्र में सत्तासीन होने के उद्देश्य से जबर्दस्त जोड़ -तोड़ करने एवं  नायाब रणनीतियां  आजमाने का दौर शुरू हो गया है।  पहली बार वोटर बनने  वाले युवाओं पर हर दल के पैनी नजर है। देश का हर बड़ा राजनीतिक नेता चुनाव में युवाओं का समर्थन हासिल करने के लिए अनेक लुभावने बयान दे रहे हैं , चुनावी वादे कर रहे हैं। सही भी है।  हमारा देश विश्व का सबसे युवा देश जो है। भारत दुनिया का ऐसा देश है, जहां युवाओं की संख्या सबसे अधिक है। 2011 के जनगणना के अनुसार 15 से 29 वर्ष के आयु वर्ग के युवाओं के संख्या 33 करोड़ है जो देश के कुल आबादी का 27.5 % है।

कहना न होगा, किसी देश का भविष्य तभी बेहतर हो सकता है जब उस देश के युवाओं को बेहतर शिक्षा, ज्ञान , कौशल आदि  के आधार पर सहज व उपयुक्त  रोजगार उपलब्ध हों। लेकिन क्या हम अपने युवाओं के लिए ऐसा करना चाहते हैं और वाकई कर भी रहे हैं?

गौरतलब  है कि जहां भारत में दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी रहती है , वहीँ यह भी एक कड़वा सच  है कि दुनिया में सबसे अधिक बेरोजगार युवा भी हमारे देश में हैं। इससे भी अधिक चिंताजनक विषय यह है कि युवाओं में जैसे-जैसे शिक्षा का स्तर बढ़ रहा है, वैसे- वैसे ही बेरोजगारी की दर भी बढ़ रही है। उत्तर प्रदेश, बिहार जैसे बड़े एवं  राजनीतिक रूप से ज्यादा संवेदनशील, लेकिन औद्योगिक रूप से पिछड़ते जा रहे  राज्यों में यह स्थिति और भी गंभीर है। 

 राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण  संगठन द्वारा वर्ष 2009-10 के आंकड़ों के आधार पर जारी रपट के मुताबिक    ग्रामीण क्षेत्र के स्नातक डिग्रीधारी लड़कों  में बेरोजगारी दर 16.6 % और लड़कियों में 30.4 % रही। शहरी क्षेत्रों के ऐसे युवकों में यह  दर 13.8 % और युवतियों में 24.7 % दर्ज की गई। सेकेंडरी लेवल के सर्टिफिकेट धारक  ग्रामीण इलाके के युवकों में बेरोजगारी दर 5 % और लड़कियों  में करीब 7 %   रही जब कि शहरी क्षेत्रों के युवकों में बेरोजगारी दर 5.9 % और महिलाओं में 20.5 % पाई गई। गत तीन वर्षों में इस स्थिति में सुधार के बजाय गिरावट ही हुई  है। 

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन ( आई एल ओ ) के हाल के रपट ने देश के नौकरी बाजार की स्थिति को कमजोर बताया है।  उक्त रपट में पिछले दो साल में बेरोजगारों के संख्या में वृद्धि के बात कही गयी है जो जमीनी हकीकत से मेल खाते हैं। यह तो हमें मालूम ही है कि भारतीय अर्थ व्यवस्था में वर्ष 2004 -09 के दौरान औसतन 9 % जी डी पी ( सकल घरेलू उत्पाद ) ग्रोथ दर था जो कि विश्व के कई उन्नतशील देशों से बेहतर था, लेकिन इस अवधि में केवल दस लाख नौकरियां ही सृजित की जा सकी जो बेरोजगारों के विशाल फ़ौज के सामने बहुत ही नगण्य  है। यू पी ए -II  के चालू कार्यकाल के पांच वर्षों में नौकरियां और भी कम सृजित हुई, जब कि इसी दौरान  में इंजीनिरिंग  व मैनेजमेंट का  डिग्री हासिल करने वाले युवाओं की  संख्या बेतहाशा बढ़ी। 

विडम्बना यह है कि तकनीकी शिक्षा क्षेत्र में भी बेरोजगारी दर में बेतहाशा वृद्धि हो रही है। इससे  इस धरना को बल मिलना स्वाभाविक है कि  युवाओं के लिए चलाए जा रहे स्किल डेवलमेंट मिशन के  प्रयास भी रोजगार गारंटी का सर्टिफिकेट नहीं बन पा रहे हैं। 

तो सवाल है कि आखिर कोरी घोषणाओं का क्या अर्थ है हमारी युवा पीढ़ी के लिए ? क्या यह उनके लिए भी एक चुनाव का मौका नहीं है ? क्या इस बड़े पढ़े - लिखे युवा वर्ग को अपने अपने क्षेत्र के उम्मीदवारों से आसन्न लोक सभा चुनाव से पहले  इस मुद्दे पर खुल कर चर्चा  नहीं करनी चाहिए ; एक ठोस कार्ययोजना पर अमल के लिए  प्रतिबद्धता  सुनिश्चित नहीं करनी चाहिए ?

                     और भी बातें करेंगे, चलते-चलते असीम शुभकामनाएं
#  प्रवासी दुनिया .कॉम पर प्रकाशित

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