Monday, June 20, 2016

मोटिवेशन: योग सिर्फ क्रियाओं का अभ्यास नहीं, सम्पूर्ण जीवनशैली है

                                                                        -मिलन  सिन्हा, मोटिवेशनल स्पीकर....                                                                 
clipविश्व योग दिवस निकट है. योग प्रशिक्षण के कार्यक्रम जगह –जगह आयोजित किये जा रहे हैं. योग के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ाने के लिए यह वांछनीय है. ऐसा इसलिए कि शिक्षा व संचार क्रांति के इस युग में योग को लेकर कहीं न कहीं अनेक लोगों को अब भी यह भ्रान्ति  है कि इसके अभ्यासी को संत या सन्यासी जीवन व्यतीत करना पड़ेगा और वह एक पारिवारिक व्यक्ति का सामान्य जीवन नहीं जी पायेगा. मजे की बात यह है कि सच्चाई इसके उलट है. योग तो एक ऐसी जीवनशैली है जो जीवन के प्रति हमारे दृष्टिकोण को व्यापक, समग्र एवं समावेशी बनाता है; जिसके कारण हम खुद अपनी एवं साथ ही  दूसरों की समस्याओं को  अधिक आसानी से  समझने तथा उसका समाधान ढूंढने लायक बन पाते हैं. ऐसा करके हम अपने  परिवार एवं समाज के लिए भी एक बेहतर इंसान साबित होते हैं.

बिहार योग विद्यालय, मुंगेर के संस्थापक स्वामी सत्यानन्द सरस्वती ने अपनी पुस्तक, 'आसान, प्राणायाम मुद्राबंध'  में लिखा है, 'वैज्ञानिक आविष्कारों के इस आधुनिक युग में  जीवन को आराममय बनाने के असंख्य साधन हैं, परन्तु बिरले लोग ही इस बिलास सामग्री का आनंद ले पाते हैं.  यद्द्पि यह बात एकदम उल्टी लगती है, किन्तु है सत्य. बहुत से लोगों के पास धन है, लेकिन वे वास्तव में निर्धनों की सी जिंदगी जीते हैं.  जीवन उनके लिए नीरस हो गया है.  उसे भोगने की शक्ति वे खो चुके हैं.  जीवन के इस नीरस और निर्जीव ढंग को आसनों द्वारा  सुधारा जा सकता है. दिनभर की थकान और तनावों से छुटकारा पाकर अपने आपको स्वस्थ रख सकते हैं.” यही कारण है कि बड़े से बड़ा नेता, अभिनेता, ड़ॉक्टर, अधिकारी, उद्योगपति, शिक्षाविद, वैज्ञानिक, लेखक-पत्रकार  सभी ने योग के  महत्व को स्वीकारते हुए अपनी दिनचर्या में आसान -प्राणायाम को निष्ठापूर्वक शामिल किया है. लिहाजा, उनका सुबह का समय योगाभ्यास में बीतता है जिससे वे दिनभर पूरी जीवंतता के साथ अपनी जिम्मेदारियों का अबाध निर्वहन कर पाते हैं. फिर सवाल है कि हममें से ज्यादातर लोग ऐसा क्यों नहीं करते हैं या दो-चार दिन करके क्यों  छोड़ देते हैं ? 

दरअसल, न्यूटन का जड़ता का सिद्धान्त यहाँ भी लागू होता है. जिस कार्य को हम करते रहते हैं, वह हमें आसान लगता है.  इसके विपरीत किसी नए काम को करने से पहले तमाम तरह की भ्रांतियां तथा शंकायें हमारे सामने अवरोध बन कर खड़ी हो जाती हैं. दूसरी बात यह कि आस्था, विश्वास और निष्ठा से ऐसे कार्य प्रारंभ नहीं करते; दो- चार दिनों के आधे–अधूरे अभ्यास के बाद ही किसी चमत्कार की अपेक्षा के साथ करते हैं.  ऐसा कमोबेश अधिकांश लोगों के साथ होता है. लेकिन खुले दिमाग से सोचने वाले व्यक्ति अच्छे -बुरे का आकलन करते हुए, सब जानते –समझते हुए  एक नए जोश व संकल्प के साथ जड़ता को तोड़ कर सही दिशा में कदम बढ़ाते हैं और अच्छाई के साथ जुड़ते चले जाते हैं. जीवन में यही तो योग है, और क्या ? 

सच पूछें तो योग एक सम्पूर्ण जीवनशैली है, जिसका अनुसरण करते हुए आर्थिक उदारीकरण एवं सामाजिक-आर्थिक विषमता के मौजूदा दौर में भी हम चिंता, तनाव  व शारीरिक अस्वस्थता से अपने को बचाए रख सकते हैं. इसके एकाधिक कारण हैं. नियमित योगाभ्यास से हमारे शरीर को ऑक्सीजन ज्यादा मिलता है, शरीर के सारे अंग सक्रिय हो जाते  हैं, कार्बन डाई ऑक्साइड सहित अन्य विषैले पदार्थ शरीर से निष्कासित होते हैं, मस्तिष्क का शुद्धिकरण होता है, सकारात्मक विचार शक्ति बढ़ती है और उत्साह, उमंग और ऊर्जा में अकल्पनीय उछाल महसूस होने लगता है. परिणाम स्वस्वरूप हम अनेक असाध्य रोगों से बचे रह सकते है और अगर रोगग्रस्त हो भी गए तो उससे मजबूती से लड़कर विजय पा सकते है. 

कहने का अभिप्राय यह कि योग हमें न केवल खुद से जुड़ना सिखाता है, खुद को तलाशने, निरंतर तराशने और बुलंद बने रहने को सतत उत्प्रेरित करता है,  बल्कि अपने भाई-बंधुओं, पेड़–पौधे, पशु–पक्षी आदि से सक्रिय रूप से जुड़ना भी सिखाता है. यह हमारे  आहार, विचार एवं  व्यवहार में संतुलन कायम करने में मदद करता है, जिससे कि हमारा सर्वांगीण व गुणात्मक विकास होता रहे. हम सच्चे अर्थों में मनुष्य के रूप में खुद भी जी सकें और दूसरों को भी जीने का मौका दें, उनकी मदद करें. संक्षेप में, योग के बहुआयामी फायदे हैं. तो फिर क्यों न हम सभी - बच्चे, युवा, वयस्क तथा बुजुर्ग, योग को अपनी दैनिक रूटीन का हिस्सा बनाकर जीवन को स्वस्थ, सरस और सानंद बनाने का सार्थक प्रयास करें.                                                                                  ( hellomilansinha@gmail.com )                                                                              
                    और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Thursday, June 16, 2016

मोटिवेशन : क्या हम पानी पीने की कला में पारंगत हैं ; क्या हम साल्ट स्मार्ट हैं ?

                                                                  -मिलन  सिन्हा, मोटिवेशनल स्पीकर....
विभिन्न अवसरों पर अलग –अलग तबके एवं उम्र के लोगों से मुलाक़ात तथा वार्तालाप के क्रम में यह बात स्पष्ट रूप से सामने आई कि अधिकांश लोग पानी पीने की कला  में पारंगत नहीं हैं, जिसके कारण उन्हें तरह –तरह की शारीरिक परेशानियों से जूझना पड़ता है; डॉक्टर के शरण में जाना पड़ता है; दवा खानी पड़ती है. यह सब तब होता है जब हमें मालूम रहता है कि हमारे जीवन में पानी का कितना  महत्व है. कहने का अभिप्राय यह कि हमें नहीं मालूम कि पानी कैसे पीना चाहिए, कितना पीना चाहिए, कब पीना या कब नहीं पीना चाहिए. ज्ञातव्य है कि सिर्फ पानी पीने की कला में पारंगत हो कर हम कम- से -कम 30 फीसदी ज्यादा स्वस्थ रह सकते हैं; बीमारियों से  बचे रह सकते हैं. 

( हम अलग से इस बात की चर्चा कर सकते हैं  कि आम जनता कैसा पानी पीने को अभिशप्त है और उसका कितना दुष्प्रभाव उन लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ता है – 60% रोग  जल- जनित होते हैं  ) 

ऐसा ही अनुभव तब हुआ जब लोगों से नमक के सेवन के प्रति उनकी जागरूकता के विषय में जानना चाहा. मसलन, प्रोसेस्ड फ़ूड एवं  डिब्बा या पैकेट में बंद नमकीन चीजें कितना खाते हैं, रोजाना खाना खाते समय ऊपर से कितना नमक छिड़कते हैं आदि. दूसरे शब्दों में,  हमारे जीवन में नमक की अहमियत से भी हम सब परिचित हैं, लेकिन जो नमक हम खा रहे हैं और जाने–अनजाने जितनी मात्रा में रोज खा रहे हैं उसके चलते हमारे स्वास्थ्य को होनेवाले  नुकसान से हम जैसे बेफिक्र हैं और गाहे –बगाहे  उच्च रक्त चाप, पेट का कैंसर, किडनी स्टोन, ओस्टियोपोरोसिस  जैसे बड़े शारीरिक समस्याओं को निमंत्रण दे रहे हैं.

(बताते चलें कि एक रिपोर्ट के मुताबिक़ ब्रिटेन में एक जागरूकता अभियान के परिणाम स्वरुप वर्ष 2003 से 2011 के बीच नमक के इस्तेमाल में 15 फीसदी की कमी आई. इसका सीधा व  सकारात्मक असर स्ट्रोक व  ह्रदय रोग के मामले में 40% तक की  कमी के रूप में सामने आया. ) 

सवाल है कि लोगों को इस संबंध में कैसे जानकारी दी जाय; उन्हें इस विषय में कैसे  जागरूक बनाया जाय ? यक़ीनन ‘ जानकारी ही समाधान’ के सिद्धांत  को अमली जामा पहना कर. लेकिन कैसे ? पुरानी अंग्रेजी कहावत है, ‘ चैरिटी बिगिंस एट होम’ अर्थात अच्छे काम की शुरुआत घर से हो अर्थात पहले अपने आसपास के लोगों को टारगेट करें. स्कूल, कॉलेज, ऑफिस आदि में जाकर छोटे-छोटे  समूहों के बीच 30-40 मिनट की चर्चा का आयोजन हो. स्कूल–कॉलेज आदि में पहले चरण में अध्यापकों –प्राध्यापकों के साथ विचार –विमर्श हो. स्कूलों में इस तरह का आयोजन अभिभावक –शिक्षक बैठक (पैरेंट –टीचर्स मीट) के दिन भी हो सकता है. बैंक, बीमा कंपनी, सरकारी-अर्ध सरकारी संस्थान, फैक्ट्री आदि में भी यह आयोजन जरुरी है. इस काम में मीडिया का बहुत बड़ा रोल है – न केवल इसे लोगों तक पहुँचाने में, बल्कि इस अभियान को समर्थन व सहयोग देने में.                                                            (hellomilansinha@gmail.com)
              
पुनश्च : हम इसकी एक छोटी सी शुरुआत आपके ऑफिस / प्रतिष्ठान से भी कर सकते हैं.

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Saturday, June 4, 2016

मोटिवेशन : सिर्फ सोचें नहीं, करें भी

                                                            -मिलन  सिन्हा, मोटिवेशनल स्पीकर...

सोचना एक मानवीय गुण है, लेकिन सोच में पड़े रहना – इसे क्या कहेंगे ? प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी में जुटे कई प्रतिभागियों से पर्सनल काउंसलिंग के दौरान यह बात उभर कर आती रही है. ऐसे देखने पर हमारे–आपके आसपास भी कई लोग अनायास ही मिल जायेंगे जिन्हें आप हमेशा  सोचने की मुद्रा में पायेंगे. ऐसे लोगों के पास कारण –अकारण सोचने के असंख्य विषय होते हैं – आईपीएल से लेकर शराब बंदी तक; शौचालय से लेकर देश की परमाणु नीति तक. घर से लेकर ऑफिस तक वे गंभीरतापूर्वक इस कार्य में मशरूफ पाए जाते हैं. सर्वदा  सोच की मुद्रा में दिखने के कारण कई लोग तो उन्हें चिंतक-विचारक तक समझने लगते हैं,  जब कि उनके  करीबी लोग  जानते हैं कि वे किसी एक विषय पर घंटों सोचने के बाद भी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाते, कोई निर्णय नहीं ले पाते. और चूँकि ऐसे लोग कोई निष्कर्ष या निर्णय पर नहीं पहुंच पाते, तो उन विषयों पर आगे उनके कुछ करने  की बात ही नहीं उठती. कहने का सीधा अभिप्राय यह कि ऐसे श्रेणी के लोग सोचते बहुत हैं, पर करते बहुत कम हैं. लिहाजा घर में उनके अभिभावक और ऑफिस में उनके वरीय अधिकारी उन्हें अक्षम एवं बेकार  की संज्ञा देते हैं और गाहे –बगाहे खरी –खोटी सुनाते रहते हैं. दुर्भाग्यवश,  इससे  वे और भी सोच में पड़ जाते हैं.

बहरहाल, आप सबने भी कई मंत्रियों को सरकारी  अधिकारियों से यह कहते सुना होगा कि सोचिये, सोचिये, जरा बढ़िया से सोचिये, तब तक हम भी बाहर जाकर (अमूमन देश से बाहर) सोचते हैं. इस सोचने में कई हफ़्तों का समय यूँ  ही चला जाता है, पर होता नहीं कुछ.  कोई अगर पूछ ही बैठे तो बड़े गर्व से कहते हैं कि देखिए न कितना सोच रहे हैं; सरकार और जनता का मामला है, आखिर सोचना तो पड़ेगा न ? आम तौर पर यह भी देखा जाता है कि जब  हमारे नेतागण जनता की समस्याओं से रूबरू होते हैं, तो यह कह कर निकलने की कोशिश करते हैं कि अच्छा इस विषय पर सोचेंगे. शायद वे बहुत सोचते भी हों, पर  जनता को समाधान नहीं मिलता.

सोच में पड़े रहने और काम न करने की इस बीमारी से करोड़ों व्यक्ति, हजारों संस्थायें एवं  सरकार के अनेक अंग बुरी तरह प्रभावित हैं. सरकारी दफ्तरों में फाइलों का अम्बार इसका एक ज्वलंत कारण और उदहारण है. इससे घर -बाहर नकारात्मकता बढ़ती है और उत्पादकता घटती है.

ऐसे सोचना कोई बुरी बात नहीं है, अपितु किसी कार्य को प्रारंभ करने से पहले उसके विषय में सोचना तो अच्छी बात है. यूँ कहें कि सोचना  किसी कार्य को ठीक से संपन्न करने के लिए एक जरुरी प्रक्रिया  है. लेकिन अनिवार्य व वांछनीय यह है कि सोचने, निर्णय लेने और उसे कार्यान्वित करने में एक परिभाषित संबंध व सामंजस्य हो. विश्व इतिहास के महान विजेताओं में से एक एवं फ्रांस के महान सम्राट नेपोलियन बोनापार्ट जो ‘असंभव’ शब्द को अपने शब्दकोष का हिस्सा नहीं मानते थे, ने इसी सिद्धांत  को व्यवहार में उतारा और कई उल्लेखनीय कार्य किये. इतिहास के पन्ने महान व्यक्तियों के ऐसे नजीरों से भरे पड़े हैं. देखिए, इस विषय पर प्रसिद्ध मार्शल आर्ट कलाकार एवं फ़िल्म अभिनेता ब्रूस ली क्या कहते हैं : ‘अगर आप किसी चीज के बारे में सोचने में बहुत अधिक वक्त लगाते हैं, तो फिर आप उस काम को कभी नहीं कर पायेंगे.’ 

तो क्यों न हम सब भी  सोचने और करने के बीच बेहतर तारतम्य बिठाकर उसे अपने जीवन में उतारने की हरसंभव कोशिश करें, जिससे हम अपने लक्ष्यों को अपेक्षाकृत आसानी से हासिल कर सकें; पूरी जीवंतता के साथ अपनी जीवन यात्रा में अग्रसर होते रहें.                                                                                                                                                                                         (hellomilansinha@gmail.com)

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Wednesday, June 1, 2016

लघु कथा : प्रहरी

                                                      -मिलन सिन्हा 
काम रुक गया था. पांचों मिस्त्री ठेकेदार के पास ही खड़े थे. कालू मिस्त्री  ठेकेदार से बोल रहा था, ‘गांव तो हम लोगों को परसों जाना ही है. हमारे भविष्य का सवाल है ....हम लोगों ने तो आपको पहले भी कहा था.’ अन्य मिस्त्री कालू के समर्थन में अपनी –अपनी गर्दन हिला रहे थे.

ठेकेदार ने उन्हें समझाते हुए कहा, ‘देखो, यह काम जब तक पूरा नहीं होता, तब तक तुमलोगों को कैसे जाने दें ? आखिर अगले एक महीने में इतना बड़ा काम पूरा भी तो करना है ? तुम लोग इस तरह चले जाओगे तो.... फिर इस मालिक को क्या जवाब देंगे ?’

‘हमलोगों को तीन दिनों के लिए जाने दीजिये. हमलोग नहीं जायेंगे  तो बहुत अनिष्ट हो जायेगा. ठेकेदार जी, आप सब जानते हैं, फिर भी हमें क्यों रोकना चाहते हैं ? हम तो कहते हैं कि आप भी हमारे साथ चलिये. अपने बीवी–बच्चों से मिल भी आयेंगे और वह काम भी हो जायेगा’ – कालू ने विनती की.

‘कालू, तुम इतने समझदार हो फिर भी मेरी कठिनाई नहीं समझते हो. तुम तो इस मालिक को अच्छी तरह जानते हो. समय पर अगर काम नहीं होगा तो मुझे बहुत नुकसान हो जायेगा. यह मालिक आगे हमें फिर कोई काम का ठेका नहीं देगा.’- ठेकेदार ने कालू को अपनी विवशता समझाने के उद्देश्य से कहा.

कालू एवं उसके अन्य साथियों की अपनी विवशता थी तो ठेकेदार की अपनी. दोनों पक्ष एक दूसरे को समझाने के लिए अलग–अलग तर्क दे रहे थे. काम रुका हुआ था. असहमति कायम थी. इसी समय मालिक जगत जी अचानक वहां आ पहुंचे. कालू पुनः ठेकेदार से रोष भरे स्वर में कुछ कह रहा था. सारे मिस्त्री एवं ठेकेदार को एक स्थान पर बहस करते देख पहले तो वे नाराज हुए, फिर ठेकेदार की ओर प्रश्नवाचक मुद्रा में देखा. ठेकेदार ने पहले तो बात को टालना चाहा, परन्तु जगत जी द्वारा दुबारा पूछने पर कहा, ‘ये सारे मिस्त्री परसों अपने –अपने गांव जाना चाहते हैं तीन दिनों के लिए. और मैं इन्हें समझा रहा हूँ कि इस वक्त काम अधूरा छोड़कर घर न जायें.’

‘आखिर ये लोग इसी समय घर क्यों जाना चाहते हैं ‘ – जगत जी ने प्रश्न किया.

‘ इनके गांव में दो दिन बाद पंचायत चुनाव है. ये सभी उसी चुनाव में अपने –अपने गांव जाकर अपना वोट डालना चाहते हैं’ – ठेकेदार ने सहमते हुए उत्तर दिया.

मालिक ने पहले तो सारे मिस्त्री को एक बार गौर से देखा, विशेषकर कालू को और फिर ठेकेदार की ओर मुखातिब होकर बोले, ‘भाई, इन्हें इनके गांव जरुर जाने दो. मेरा काम तीन दिन विलम्ब से ही ख़त्म होगा, तब भी ठीक है, लेकिन इन्हें मत रोको. ठेकेदार, तुम जानते हो, लोकतंत्र के असली प्रहरी ये ही हैं, तुम और हम नहीं.’

                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

लोकप्रिय अखबार 'हिन्दुस्तानमें 6 अगस्त, 1998 को प्रकाशित