Sunday, September 28, 2014

मोटिवेशन : सुनने के फायदे

                                                                - मिलन सिन्हा
सुनना एक कला है और एक लोकतांत्रिक सोच भी - यह हमने अनेकों बार सुना है ।  कहा जाता है कि खुली आंख, खुला कान और खुले दिमाग वाले लोग अपेक्षाकृत ज्यादा संतुलित, मर्यादित एवं संयमित होते हैं । अच्छे श्रोता का अच्छा वक्ता होना स्वाभाविक माना गया है ऐसे भी, आम लोगों  की यह धारणा गलत नहीं है कि जो नेता -प्रतिनिधि जनता की बात ठीक से  सुनते तक नहीं हैं उनसे काम करने -करवाने की उम्मीद करना बेकार है । आप भी जानते हैं कि मरीज एवं उनके परिजन ऐसे डॉक्टरों से परेशान व पीड़ित रहते हैं जो रोगी की पूरी बात अच्छी तरह सुनने से पहले ही उपचार पर्ची (प्रिस्क्रिप्शन) लिख देते हैं । अनेक अभिभावकों और शिक्षकों का अपने बच्चों तथा विद्यार्थियों से पेश आने का यही तरीका है । ज्ञातव्य है कि अधिकारियों विशेषकर प्रशासनिक व पुलिस अधिकारियों में  आम तौर पर श्रवण संयम की कमी पाई जाती है । दरअसल, अच्छी तरह सुनना न केवल बोलनेवाले के प्रति सम्मान प्रदर्शित करता है, बल्कि किसी भी सफल संवाद प्रक्रिया की अनिवार्य शर्त भी होती है । अधूरा सुनने एवं उस आधार पर मत बनाने का परिणाम सामान्यतः बहुत घातक और नुकसानदेह होता है । सच पूछिये तो हममें से अधिकांश लोग शरीर से तो वक्ता के साथ दिखाई देते हैं, लेकिन दिमाग से कहीं और होते हैं ।  दूसरे, बहुधा हम बोलनेवाले की बातों को समझने, जानने तथा सीखने के लिये नहीं, अपितु  सवाल -जवाब करने  की मंशा से सुनते हैं । यही हमारे लिये विषय वस्तु से भटकने  और जवाब में ऊलजलूल बोलने का कारण बनता है । आजकल के टीवी बहसों में शामिल लोगों के साथ -साथ एंकरों के भी लगातार चीखते रहने और अंततः बहस को अर्थहीन बनाने का सबब भी यही है । महान व्यक्तियों की जीवनी पढ़ने तथा अपने आसपास के अच्छे लोगों का व्यवहार आदि को देखने से साफ़ हो जाता है कि वे किस तन्मयता से छोटे-बड़े सबकी बात या समस्या सुनते हैं और उन्हीं बातचीत में से समाधान का सूत्र तलाशने में कामयाब होते हैं । 

            और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Sunday, September 21, 2014

मोटिवेशन : आहार और स्वास्थ्य

                                                                                  - मिलन सिन्हा 
यह सर्वविदित है कि प्राणी मात्र को जीवित रहने के लिए आहार की आवश्यकता होती है । हम यह भी जानते हैं कि अलग -अलग जीवों के लिये आहार का प्रकार अलग -अलग होता है । लेकिन इनकी संख्या सीमित होती है सिवाय मानव जाति के ।  दिलचस्प तथ्य यह है कि मनुष्य द्वारा निर्मित इस संसार के अलग -अलग देश और समाज में प्राकृतिक और पारम्परिक कारणों से आहार से मुतल्लिक एक  बहुरंगी व अदभुत दुनिया रात-दिन सक्रिय है । अन्न, फल, साग, सब्जी से लेकर दूध, अंडा, मांस, मछली आदि तक इस आहार संसार में शुमार हैं ।  इन चीजों पर आधारित नाना प्रकार के प्राकृतिक व कृत्रिम व्यंजन का सेवन हम घर -बाहर सुबह से रात तक करते हैं, फिर भी हमारे पांच इंच के जीभ की स्वाद पिपासा कम होने का नाम नहीं लेती ।  फलतः गृहणियां और शेफ-कुक नये-नये पकवानों पर न केवल शोध करते रहते हैं, बल्कि उन्हें तैयार भी करते हैं और हमें खिलाते भी हैं । लेकिन  क्या हमने  कभी जानने की कोशिश की  है कि जीभ को संतुष्ट करने के चक्कर में हम दिनभर क्या-क्या और कितना खाते रहते हैं और इसका कैसा असर हमारे स्वास्थ्य पर पड़ता है ? हम क्या, क्यों, कब और कितना  खा रहे हैं - आहार से संबंधित ये बातें अहम व विचारणीय नहीं हैं क्या ? आखिर जो कुछ भी हमारे मुंह से पेट तक जाएगा, उसका लाभ -नुकसान हमें ही उठाना पड़ेगा; उसका अवशेष भी हमारे शरीर से ही निकलेगा ।  हम जानते हैं कि पौष्टिक आहार से  प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, फैट, विटामिन, मिनिरल आदि पर्याप्त मात्रा में मिल जाता है जो हमें शारीरिक एवं मानसिक रूप से स्वस्थ रखने के लिए जरूरी है । इस विषय में  स्वास्थ्य विशेषज्ञों का स्पष्ट मत है कि एक सामान्य इंसान को सुबह का नाश्ता सबसे पौष्टिक और ज्यादा मात्रा में लेना चाहिए । दोपहर का खाना नाश्ते की तुलना में हल्का और रात का खाना तो बिलकुल ही सादा एवं हल्का होना चाहिए । जरा सोचिये, क्या हम ऐसा करते हैं; हमारे बच्चों -युवाओं की खान-पान की शैली कैसी है; क्या हम जीने  के लिये  खाते हैं या  खाने के लिये जीते   हैं ?

        और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Friday, September 19, 2014

आज की कविता : प्रतीक

                                                           - मिलन सिन्हा 















यह पेड़ है 
हम सबका पेड़ है। 

इसे मत छांटो 
इसे मत तोड़ो 
इसे मत काटो 
इसे मत उखाड़ो 
इसे फलने दो 
इसे फूलने दो 
इसे हंसने दो 
इसे गाने दो 

यह पेड़ है 
हम सबका पेड़ है। 

इस पर सबके घोसले हैं 
कौआ का है, मैना का है 
बगुला का है, तोता का है 
सब मिलकर रहते हैं 
सब खुशहाल हैं 
सब आबाद हैं 
इसे बरबाद मत करो 
इनकी भावनाओं को मत छेड़ो 

यह पेड़ है 
हम सबका पेड़ है। 

यह हमारा अतीत है 
यह हमारा वर्तमान है 
यह हमारा भविष्य है 
इसमें ऊंचाई है 
इसमें गहराई है 
इसमें दूरदृष्टि है 
ईश्वर की यह अपूर्व सृष्टि है 

यह पेड़ है 
हम सबका पेड़ है।  

इस पर अनेक अत्याचार हुए
इस पर अनेक आक्रमण हुए 
इसे तोड़ने के अनेक षड्यंत्र हुए 
फिर भी यह झुका नहीं 
टूटा नहीं, उखड़ा नहीं 
बलिदान का पर्याय है यह 
धैर्य और त्याग का नमूना है यह 
इसे आदर दो, प्यार दो 

यह पेड़ है 
हम सबका पेड़ है। 

इसने सिर्फ देना ही सीखा 
फल दिया, फूल दिया 
संगीत दिया, सुगंध दिया 
हमारे जीवन को सुखमय किया 
यह हमारी सभ्यता, संस्कृति का प्रतीक है 
इसके बिना हमारा क्या अस्तित्व है 
हाँ, यह पेड़ नहीं, समझो देश है 
अब कहना क्या शेष है 

यह पेड़ है 
हम सबका पेड़ है। 

      और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Sunday, September 14, 2014

मोटिवेशन : संगीत मन को पंख लगाये

                                                                           - मिलन  सिन्हा 
आज हर आम आदमी की जिन्दगी में शोर, अनिश्चितता और कन्फूयजन  बढ़ रहा है।  कारण एक नहीं, कई हैं - जाने, पहचाने और अनजाने भी। मनुष्य आम बुनियादी समस्याओं के बीच शांति और सकून को तलाशता रहता है, जो जीवन को गतिमान बनाये रखने के लिए अनिवार्य है। विशेषज्ञ भी कहते हैं कि शांति और सकून जीवन में  नई ऊर्जा एवं उत्साह का सृजन करते हैं। और यह भी सही है कि जीवन में शांति, सकून और संगीत का बेहद करीबी रिश्ता रहा है। भाग-दौड़ से भरी तथा द्वेष-वैमनस्य  से रू-ब-रू होती हमारी दैनंदिन जिन्दगी में संगीत मधुरता घोलने का काम करता  है। संगीत के संगत में आदमी व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामजिक तनाव को कम कर सकता है। सामाजिक सदभाव व समरसता बढ़ाने में संगीत की महत्वपूर्ण भूमिका सदियों से रही है । शादी-विवाह से लेकर हर खुशी के मौके पर हम संगीत का आनन्द उठाते हैं। इतना ही नहीं, हर धर्म में ईश्वर की  उपासना-प्रार्थना के लिए लोग गाते है, मौके को संगीतमय बनाते हैं। सच कहें तो, संगीत हमें ईश्वर से जोड़ने का काम बखूबी करता है  शायद यही कारण है कि मनुष्य के अलावे पशु ,पक्षी, पेड़ -पौधे सभी संगीत से प्रभावित होते पाये गए हैं। 

मजेदार बात यह है कि संगीत सुनने, सीखने और समझने की कोई उम्र नहीं होती। यह तो हमारे श्वास से जुड़ा है और अन्तिम श्वास तक साथ रहता है। सो इसे शौक के रूप में कभी भी विकसित किया जा सकता हैसंगीत का साथ  न केवल हमारे व्यक्तित्व में निखार लाता है, बल्कि हमें शारीरिक और मानसिक रूप में स्वस्थ रखने में कारगर भूमिका अदा करता है। मानसिक तनाव से परेशान रहने वाले लोगों के लिए तो संगीत बेहद प्रभावी औषधि का काम करता है ज्ञानीजन कहते हैं कि जिनके जीवन में लय,ताल व सुर का अभाव होता है, उनका स्वभाव असुर जैसा हो, तो इसमें अस्वाभाविक क्या है ? तो आइये गुनगुनाते हैं प्रख्यात गायक मन्ना डे के एक गाने के ये अनमोल बोल : सुर के बिना जीवन सूना ....संगीत मन को पंख लगाये  ....

    और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।

Thursday, September 11, 2014

आज की कविता : सागर में नाव

                                                          - मिलन सिन्हा 
Boat Silhouette Stock Photo

सागर में नाव

जीवन
एक नाव है
मौत
सागर समान है
कब कोई
उफान आवे
और
लील ले
नाव को
कोई कैसे
कह सकता है ?

 और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Tuesday, September 9, 2014

देखना होगा 'न खाऊंगा, न खाने दूंगा' का असर

                                                                                     - मिलन सिन्हा
इस बात से कौन इंकार कर सकता है कि सत्तर के दशक से राजनीति में धन बल और बाहुबल के साथ अनैतिकता का जो नया दौर संगठित  रूप से प्रारम्भ हुआ उसने इस शताब्दी के पिछले दस वर्षों में नई ऊंचाई को छू लिया है। राजनीतिक नेताओं के रहन -सहन व चरित्र में आए बदलाव का व्यापक असर अब साफ़ तौर पर कार्यकर्ताओं के जीवन शैली में भी दिखने लगा है। अपने दल और नेता के प्रति कार्यकर्ताओं की प्रतिबद्धता अब वैचारिक कम, व्यावसायिक ज्यादा होती जा रही है। सिद्धान्त के बदले अब उन्हें व्यक्तिगत नफे -नुकसान की फ़िक्र अधिक है। नतीजतन हमें चुनावों से पूर्व नेताओं के साथ -साथ कार्यकर्ताओं के अपनी पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में निःसंकोच चले जाना  सहज ही दिख जाता है।

 मोटे तौर पर राजनीति व्यवसाय का पर्याय बनती जा रही है। शायद तभी नेता की तरह कार्यकर्ता भी अपनी -अपनी आर्थिक स्थिति को जल्द से जल्द मजबूत बनाने में जुट गए हैं -अधिकतर मामले में अवांछित तरीके से। ऐसे कार्यकर्ताओं पर पंचायत, प्रखंड, जिला व प्रदेश स्तर पर बिचौलिये या एजेंट के रूप में सक्रिय बने रहने के आरोप लगते रहे हैं। ऐसे में क्या  यह कहना अनुचित होगा कि नेता हो या कार्यकर्त्ता, जिसे जहाँ मौका मिलेगा, सार्वजनिक संपत्ति हड़पने में पीछे नहीं रहेगा जैसा कि लोहिया ने कई दशकों पहले भविष्यवाणी की थी। 

सवाल उठता है कि क्या राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नाम पर दशकों से राजनीति की दूकान चलानेवाले लोगों ने साधन एवं साध्य की शुद्धता की उनकी नीति को तिलांजलि दे दी है ? आखिर देश -प्रदेश हर जगह कमोवेश ऐसे हालत क्यों कर हो गए और इससे आगे का रास्ता  क्या  और बुरा होगा ?

आजादी के बाद  राजनीतिक -सामजिक मुद्दों पर आधारित सबसे बड़े आन्दोलन लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चलाया गया जिसमें करीब सभी गैर कांग्रेसी दलों के नेताओं -कार्यकर्ताओं के साथ-साथ बड़ी संख्या में छात्रों ने भाग लिया, जुल्म सहे, यातनाएं झेलीं और  जेल गए। उस दरम्यान पार्टी कार्यकर्ताओं में परिवर्तन के प्रति एक प्रतिबद्धता दिखाई पड़ती थी। आन्दोलन में शामिल होना आर्थिक लाभ -हानि  से कदाचित ही प्रेरित रहा हो। गुजरात से शुरू हुए सम्पूर्ण क्रांति आन्दोलन का केन्द्र बिहार रहा। 

1977 में  केन्द्र सहित कई प्रदेशों में सत्ता परिवर्तन हो गया और जनता पार्टी की सरकार भी बन गयी।   लालू  प्रसाद , नीतीश कुमार, सुशील मोदी, रवि शंकर प्रसाद सरीखे प्रदेश के नेता  उसी आन्दोलन से निकले।  लेकिन  लोकनायक के तमाम प्रयासों के बावजूद सामाजिक क्रांति के महती लक्ष्य को जनता पार्टी की केन्द्र और राज्यों की सरकारें अपने ही नेताओं के बीच महत्वाकांक्षा से प्रेरित टकराव के कारण आगे बढ़ाने में नाकामयाब रही। इसका बड़ा राजनीतिक खामियाजा जनता पार्टी व सरकार को अगले चुनाव में उठाना पड़ा। कहना न होगा, सम्पूर्ण क्रांति जैसे बड़े एवं सफल आन्दोलन के गर्भ से निकली सरकार के गिरने से आन्दोलन से जुड़े लाखों करोड़ों लोगों को गहरा झटका लगा। कार्यकर्त्ता ठगे से महसूस करते रहे। नेतागण तो समय के साथ  अपनी राजनीतिक यात्रा में  बढ़ते गए, आर्थिक रूप से मजबूत बनते गए। पार्टी कार्यकर्ताओं ने यह सब गौर से देखा, जाना और समझा।

आर्थिक उदारीकरण ने बिहार की सत्ता के करीब रहे नेताओं के बड़े वर्ग को आर्थिक रूप से मजबूत होने की प्रेरणा भी दी और मौके भी दिए जिनका भरपूर उपयोग इन लोगों ने अगले कई वर्षों तक धन बल से सम्पन्न होने के लिये किया। 

'हम भी खाते हैं, तुम भी खाओ' वाली नीति पर चलने का मन्त्र कार्यकर्ताओं को अपने नेताओं से ही मिला। सरकारी ठेकेदारी में पार्टी के लोगों का वर्चस्व कायम होने लगा। विधायक एवं सांसद निधि ने इस सिलसिले को आगे ही बढ़ाया। 


 अन्ना के आन्दोलन ने जनता की बुनियादी समस्याओं को आवाज देने का काम प्रभावी ढंग से करने का प्रयास किया जिसे समाज के हर वर्ग का  समर्थन मिला। लेकिन जो कुछ आगे हुआ, उससे लोगों के  विश्वास को आघात पहुंचना स्वाभाविक था।  

प्रधान मंत्री का यह संकल्प कि न खाऊंगा, न खाने दूंगा  वाकई मौजूदा स्थिति में कितना और कैसा बदलाव सुनिश्चित कर पाते हैं, यह  भविष्य में नेताओं और कार्यकर्ताओं के सम्बन्ध और समीकरण  पर निर्भर करेगा। साथ ही सिद्धांत की राजनीति से प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं -समर्थकों की संख्या में इजाफा भी होगा, ऐसी आशा की जा सकती है। बिहार के लिये यह आवश्यक भी है।  

            और भी बातें करेंगे, चलते-चलते असीम शुभकामनाएं ।

Sunday, September 7, 2014

मोटिवेशन : सफलता-असफलता

                                                                                         - मिलन सिन्हा 

सर्वविदित है कि सफलता -असफलता हमारे जीवन के अभिन्न अंग हैं। शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति  होगा जिसे जीवन में केवल सफलता या फिर केवल  असफलता  मिली हो। इसके अलावे  सफलता -असफलता, छोटी अथवा बड़ी कुछ भी हो सकती है और उसका हमारे जीवन पर असर भी अलग -अलग व्यक्ति के लिये अलग-अलग हो सकता  है। लेकिन, एक बात जो सभी व्यक्तियों में अमूमन समान रूप से देखी जा सकती है, वह है सफलता मिलने पर खुश होना और असफलता मिलने पर मायूस होना। हम यह भी जानते हैं कि कामयाबी  या नाकामयाबी से उत्पन्न भावनात्मक  आवेग की तीव्रता कभी -कभी बड़े जोखिम, यथा ब्रेन स्ट्रोक, दिल का दौरा, अवसाद आदि का सबब भी बन जाते हैं । 

बहरहाल, थोड़ा गहराई से सोचने पर आप भी मानेंगे कि सफलता या असफलता एक सापेक्ष स्थिति है जो उस प्रयोजन के निमित्त हमारे द्वारा किये गए परिश्रम के अलावे अन्य कई बातों पर निर्भर करती है। अगर यह  सच  है तो फिर कामयाबी  हमारे सिर चढ़ कर क्यों बोलती है या नाकामयाबी से हमारा दिल क्यों टूट जाता है ? ऐसा इसलिए कि हम सक्सेस को दिमाग में रख लेते हैं और फेलियर को दिल में।   दरअसल, सफलता कोई सिर पर चढ़ा  कर रखने वाली चीज नहीं है और न ही असफलता कोई दिल में बैठा कर रखने वाली चीज। इसके विपरीत हर छोटी -बड़ी सफलता को दिल से लेना चाहिए  एवं हर असफलता को दिमाग से। असफलता के कारणों का सही विश्लेषण तभी हो पाता है और आगे के लिये बेहतर योजना तथा रणनीति भी तभी बन पाती है। उसी तरह सफलता को दिल से लेने पर हम आनन्दित महसूस करते हैं। आनन्द के उन क्षणों को हम सकारात्मक तरीके से दूसरों के साथ साझा भी हम तभी कर सकते हैं। गुणीजन इन अहम बातों को अच्छी तरह जानते -समझते हैं और तदनुसार सफलता-असफलता दोनों ही स्थितियों में सन्तुलित एवं तनावरहित जीवन जीते हैं। सच कहें तो गुड लाइफ का सार इसी में छिपा है। 

   और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं ।

Friday, September 5, 2014

कमजोर रणनीति से हुए कमजोर

                                                              - मिलन सिन्हा
पिछले लोकसभा चुनाव की बात करें या हाल में सम्पन्न हुए बिहार विधान सभा के उपचुनाव की बात करें, वाम दलों की मौजूदा स्थिति पर कोई चर्चा तक  नहीं होना कुछ अटपटा  लगता है। गरीबी, बीमारी, बेकारी, शोषण ,कुपोषण, अशिक्षा , भूमि विवाद , बाल विवाह,  आर्थिक -सामाजिक असमानता, बाढ़ ,सूखा, भ्रष्टाचार आदि के मामले में बिहार देश के चंद पिछड़े राज्यों में से एक बड़ा और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण राज्य रहा है। गौर करें तो  देश -प्रदेश में  दशकों से यही वामपंथी राजनीति के प्रमुख सैद्धान्तिक मुद्दे  रहे हैं। शायद इन्हीं बातों के चलते अब तक राजधानी पटना की सड़कें और मैदान उनके द्वारा आहूत धरना -प्रदर्शन में सर्वहारा वर्ग के लोगों से भरा दिखता है। बिहार के मतदाताओं में आजादी के 67 साल बाद भी इन्हीं दबे -पिछड़े और जीवन की बुनियादी आवश्यकताओं से जूझते लोगों की संख्या ज्यादा है। फिर  ऐसा क्या है जो इन वाम दलों - सीपीआई, सीपीएम, सीपीआई(एमएल)  को भारतीय  लोकतंत्र के चुनावी समर में विजयश्री से वंचित रख रहा है ? क्या धरना -प्रदर्शन में दिखने वाली भीड़ चुनाव में भाग लेनेवाली  भीड़ नहीं  है ? क्या बिहार में इन  दलों खासकर सीपीआई और सीपीएम द्वारा अपनायी जाने वाली बदलती रणनीति से इनके समर्थक भी कन्फ्यूज्ड हो गए हैं जिसका फायदा राजद और जदयू जैसे दल उठा रहे हैं ? ये प्रश्न अहम एवं विचारणीय हैं। 

सच पूछिये तो एक लम्बे अरसे से सीपीआई और सीपीएम जैसे अखिल भारतीय पहचान वाले दल बिहार की राजनीति में साम्प्रदायिकता को मुख्य मुद्दा बता कर राजद और कांग्रेस के छोटे पार्टनर की भूमिका, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप, से निभाते रहे हैं। परिणाम स्वरुप ये दल खुद अपनी आंतरिक व वैचारिक ताकत को कम करते गए और अपनी राजनीतिक जमीन से बेदखल हो कर  हाशिये पर चले गए। 1990 के पहले सूबे में भाकपा काफी मजबूत थी, लेकिन बाद में राजद से नजदीकियों के कारण वह कमजोर होती गई।

कहना न होगा, अगर बदली हुई राजनीतिक, सामजिक व आर्थिक परिस्थितियों के मद्देनजर आज भी वामपंथी विचारधारा वाले प्रमुख दल एकजुट हो कर चलने का फैसला कर लें तो कोई कारण नहीं कि वे अगले कुछ वर्षों में एक मजबूत वैकल्पिक राजनीतिक शक्ति बनकर न उभर सकें। 

कई जाने -पहचाने कारणों से बिहार की राजनीति को सार्थक, सशक्त व जीवंत बनाये रखने के लिए यह अनिवार्य भी है। वाम दलों के मजबूत होने से सूबे की राजनीति में गरीब तबकों को आवाज मिलेगी।

    और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं ।

# लोकप्रिय हिंदी दैनिक, 'दैनिक भास्कर' में  प्रकाशित दिनांक :02.09.2014