Saturday, August 31, 2013

आज की कविता : साधारण - असाधारण

                                                   - मिलन सिन्हा
तुम ताड़ मत बनो
तुम यूकिल्पटस भी मत बनो
इनकी ऊंचाई पर मत जाओ तुम
इनके सीधेपन पर भी मत जाओ तुम
ये सीधे जरूर हैं , पर सीधे सरल नहीं हैं
सभी जानते हैं
ताड़ मादक द्रव पैदा करता है
वैज्ञानिक कहते हैं
यूकिल्पटस   रेगिस्तान फैलाता है
ये किसी को आश्रय नहीं देते
ये हमारे समाज के लायक  नहीं
अच्छाई इनके पास नहीं
सुनो, तुम आम का पेड़ बनो
कटहल का पेड़ बनो
कटहल हम सबका है
आम हम सबका है
यह ख़ास का भी है, आम का भी है
कटहल भी हमारी समस्याओं का हल है
ताड़ और  यूकिल्पटस  की  तरह
न तो इनका कोई ग्रुप है, न कोई दल है
ये आम आदमी की तरह निश्छल है
इनमें ऊंचाई है, फैलाव है और गहराई भी है
ये हमारे मित्र हैं, भाई भी हैं
ये सबको आश्रय देते हैं
इनकी छायातले  यात्री गहरी नींद सोते हैं
ये बराबर हंसते हैं, कभी रोते नहीं हैं
ये जन्म से ही बड़े साहसी, दिलेर होते हैं
ये साधारण होते हुए भी, असाधारण हैं !

                  और भी बातें करेंगे, चलते-चलते असीम शुभकामनाएं

# 'अक्षरपर्व' के जनवरी,2008 अंक में प्रकाशित   

Thursday, August 29, 2013

कहानी : अपना घर

                                                           - मिलन सिन्हा
" अरे मोटू, किधर चला गया रे ?  इधर आ जल्दी " - राजमिस्त्री ने जोर से आवाज लगाई।

नन्द जी ने इधर- उधर नजर घुमाई। मजदूरों में कोई भी डील -डौल से मोटा नहीं कहा जा सकता था। फिर यह मिस्त्री मोटू कहकर किसको बुला रहा था।

" क्या है बे मिस्त्री, काहे गला फाड़ रहा था ? कोई दिल्ली- बम्बे नहीं गया था। जरा पानी पीने गया था " - एक औसत कद-काठी के मजदूर ने मिस्त्री को जवाब दिया। 

"अच्छा मोटू , भाषण खत्म हुआ न तेरा। अब  ईंट - मसाला  बढ़ा। जल्दी -जल्दी काम निबटाना है।  देख, कितनी कड़ी धूप है " - मिस्त्री ने मोटू से कहा।

मोटू ने धड़ाधड़ सब जुगाड़ मिस्त्री को दिया। काम तेजी से चलने लगा। वहाँ दो अन्य मजदूर भी काम कर रहे थे, लेकिन मोटू उनमें सबसे दक्ष एवं फुर्तीला था। दोनों मिस्त्री को जब-जब कोई कठिनाई होती, वे मोटू को आवाज देते। वे मोटू के साथ हंसी- मजाक भी करते। मोटू भी उनको बीच-बीच में छेड़ता एवं रह-रह कर खिलखिला कर हंसता। 


नन्द जी ख्यातिनाम इंजीनियर  थे। अनेक वर्षों से इस  पेशे में थे, परन्तु मोटू जैसा मजदूर उन्होंने अबतक नहीं देखा था। सो, मोटू के प्रति उनकी जिज्ञासा स्वाभाविक थी। आखिर उसका नाम मोटू क्यों पड़ा, वह कहाँ का रहनेवाला है, घर में उसके कौन-कौन है आदि।

पहली पाली का काम खत्म होने के बाद मोटू खाना खा कर लेटा हुआ था पेड़ की छाया में। नन्द जी के वहाँ पहुँचने पर वह हड़बड़ा कर उठ गया और दौड़ कर दो ईंट ले आया। उसपर अपना गमछा बिछा दिया एवं नन्द जी से बैठने का अनुरोध किया।नन्द जी के बैठ जाने पर वह भी पास में बैठ गया।नन्द जी ने उससे इधर-उधर की दो -चार बातें कीं, फिर पूछा की उसका नाम मोटू कैसे पड़ा।


मोटू ने बताया कि वह  बगल के जिले का रहनेवाला था। पहले वह बहुत मोटा - तगड़ा था। वह पहलवानी भी करता था। जो काम  दो मजदूर मिलकर करते, वही काम वह अकेला करता था। इसी सब कारण से ठेकेदार ने उसे मोटू कहकर बुलाना शुरू किया और फिर तब से उसे सभी मोटू कहकर ही बुलाते हैं। उसने  आगे बताया कि पहलेवाला  ठेकेदार उसे बहुत मानता था। शाम  को काम ख़त्म होने पर अपने साथ बिठाकर फोकट में शराब भी पिलाता था, कभी - कभी  खाना भी खिलाता था। 


 लेकिन, उसी   ठेकेदार के कारण ही उसकी आज यह दशा हुई थी, उसका तो जैसे सबकुछ नष्ट हो गया था - मोटू ने  भरे गले से कहा। 
     
'क्या नष्ट हो गया, तुम्हारा?' - नन्द जी ने मोटू से उत्सुकतावश पूछा।

मोटू  संजीदा हो गया। लगा अतीत में चला गया हो।  कहा, "बाबू , उस ठेकेदार ने मुझे शराब की ऐसी आदत लगा दी कि छूटती  ही नहीं। मैं अपनी आधा  ज्यादा मजदूरी शराब में ही  बर्वाद कर देता था।  अपने दो वक्त के खाने के लिए भी बाकी पैसा कम पड़ता तो अपने पत्नी और बेटे को कैसे खिलाता। मेरी पत्नी मुझे बहुत समझाती थी, पर मेरे सर पर तो शराब  भूत  सवार था। तंग  आकर मेरी पत्नी बेटे को लेकर अपने मायके चली गयी और फिर उसने कभी मेरी कोई खोज खबर नहीं ली। मेरा बेटा अब सात साल का हो गया  है, बाबू। " 

कुछ क्षण के लिए मोटू चुप हो गया, फिर कहने लगा,  "बाबू, जानते हैं, मैं सब काम कर सकता हूँ , मिस्त्री का काम भी। पर, अब मन नहीं करता, किसके लिए ज्यादा कमाऊं ?

"तुम क्या अब भी शराब पीते हो " - नन्द जी  ने सवाल किया।  

"हाँ, लेकिन अब कभी-कभी ही पीता हूँ। उसे भी अब छोड़ दूंगा।  एक बार अपनी पत्नी और बेटे से मिलना चाहता हूँ। उनके साथ रहना चाहता हूँ , उनके लिए अब जीना चाहता हूँ.......।"

विश्राम का समय ख़त्म हो गया। मोटू फिर अपने काम में लग गया।  उसके काम में अब अपेक्षाकृत ज्यादा फुर्ती थी। मन शायद थोड़ा हल्का हो गया था। 

यह ठेकेदार नन्द जी की बड़ी कद्र करता था। उन्होंने ठेकेदार से मोटू को  मिस्त्री के रूप में काम करवाने की सलाह दी। नन्द जी ने मोटू के लिए अपने घर के कुछ दूर  ही रहने की व्यवस्था कर दी। मोटू को अपने पुराने पैंट -शर्ट भी पहनने के लिए दिए जिससे कि लिबास से भी वह राज मिस्त्री लगे। नन्द जी ने मोटू के नाम से बैंक में एक बचत खाता खुलवा दिया एवं  उसके बढ़े हुए मजदूरी को जमा करवाने इंतजाम कर दिया। इस बीच मोटू ने शराब पीना बंद कर दिया। उसका स्वास्थ्य ठीक होने  लगा।  मोटू के चेहरे पर रौनक लौट आयी , शरीर पूर्ववत मांसल  हो गया। एक अच्छे मिस्त्री के रूप में उसकी चर्चा होने लगी। 

एक दिन सुबह -सुबह ठेकेदार नन्द जी के पास आया,  शिकायत की कि मोटू दो दिन से काम पर नहीं आया है। मोटू अपने कमरे में भी नहीं था।  नन्द जी बैंक गए तो मालूम हुआ कि मोटू ने अपने खाते से दो  दिन पहले मोटी रकम निकाली है। नन्द जी और ठेकेदार दोनों चिंता में पड़े। मोटू के इस तरह बिना कुछ बताये चले जाने पर उन्हें अंदर -ही -अंदर गुस्सा भी आ रहा था. परन्तु वे करते तो क्या करते।  

सुबह- सुबह  नन्द जी दरवाजे पर जोर - जोर से दस्तक  हुई।  वे हड़बड़ा कर उठे। सोचा कि इस वक्त कौन इस तरह दस्तक दे रहा है। दरवाजा खोला तो एक के बाद एक तीन लोगों ने उनका चरण स्पर्श किया। नन्द जी के सामने मोटू , उसकी पत्नी एवं उसका लड़का तीनों कृतज्ञ भाव से खड़े थे। 

नन्द जी की आँखें ख़ुशी से छलछला गई।  दूसरों का घर बनाते -बनाते मोटू को अपना घर जो मिल गया था। 

              और भी बातें करेंगे, चलते-चलते असीम शुभकामनाएं

प्रवासी दुनिया .कॉम पर प्रकाशित, दिनांक :04.09.2013

Monday, August 26, 2013

आज की कविता : कुछ काम तो करो

                                                                                       – मिलन सिन्हा
worker

बातें हुई तमाम, कुछ काम तो करो
दूर है मुकाम, कुछ काम तो करो।

घड़ी इम्तिहान की, संघर्ष है कठिन
विजय तुम्हे मिलेगी,कुछ काम तो करो।

प्यार का ही दिन हो, प्यार की ही रात
नफरत से न कोई वास्ता, कुछ काम तो करो।

एकता में बल है, प्रेम में भगवान
सोच तुम्हारी सही है, कुछ काम तो करो।

दुःख दर्द सबका दूर हो, ख़ुशी का हो समां
आएगी फिर दिवाली, कुछ काम तो करो ।

               और भी बातें करेंगे, चलते-चलते असीम शुभकामनाएं

प्रवक्ता . कॉम पर प्रकाशित, दिनांक :26.08.2013

Thursday, August 15, 2013

भूख, गरीबी, शोषण … से हमें कब आजादी मिलेगी?

                                                             -मिलन सिन्हा
independence day













आज हम सब  67वां  स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं । बड़े ताम-झाम से राजकीय समारोह मनाया जा रहा है । आज फिर प्रधान मंत्री से लेकर मुख्य मंत्री  तक सब  देश/प्रदेश के तरक्की के बारे में विस्तार से लोगों को  बताएँगे , अनेक नए वादे भी करेंगे।  इन  सब  आयोजनों पर करोड़ों का खर्च जनता के नाम जाएगा , विशेष कर उन तीन चौथाई से भी ज्यादा देश की जनता का,  जो आज भी रोटी, कपड़ा, मकान के साथ साथ स्वास्थ्य , शिक्षा और रोजगार की समस्या से बुरी तरह  परेशान है, बेहाल है  -  आजादी के साढ़े छह दशकों  के बाद भी। क्या यह शर्मनाक स्थिति विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र  कहे जानेवाले देश के योजनाकारों, नीति  निर्धारकों और नौकरशाहों को तनिक  भी परेशान  नहीं करती, उन्हें जल्दी कुछ करने को मजबूर नहीं करती ?

आजादी के लिए लाखों देश भक्तों ने  कुर्बानी दी, भारतवासियों ने  अनेक सपने देखे।  राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी से लेकर  लोकनायक जयप्रकाश  नारायण तक  अनेक नेतागण  अपने पूरे जीवन काल में सिर्फ  और सिर्फ गरीब,शोषित,दलित जनता के लिए काम करते रहे। तो क्यों न स्वतंत्रता के 66 साल  पूरे होने के  इस मौके पर हम  अपने सत्तासीन  नेताओं, योजनाकारों, नीति  निर्धारकों आदि से एक बार फिर यह पूछें :
  • क्या प्रत्येक भारतीय को रोज दो शाम का खाना भी नसीब हो पाता है?
  • क्या प्रत्येक भारतीय को एक मनुष्य के रूप में रहने लायक कपड़ा उपलब्ध है ?
  • क्या प्रत्येक भारतीय को रहने के लिए अपना मकान नसीब है?
  • क्या प्रत्येक भारतीय को न्यूनतम  स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध है?
  • क्या प्रत्येक भारतीय बच्चे को बुनियादी  स्कूली  शिक्षा उपलब्ध है?
  • क्या प्रत्येक भारतीय  व्यस्क को साल में 180 दिनों का रोजगार भी मिल पाता है

हम जानते हैं कि इन सभी मौलिक सवालों का जबाव बहुत ही निराशाजनक है,फिर भी सत्ता प्रतिष्ठान से सम्बद्ध सारे लोग चीखते हुए कहेंगे कि इन दशकों के दौरान देश ने हर क्षेत्र में प्रगति की है। लेकिन, वही लोग इस तथ्य को नहीं नकार  पाएंगे कि जितने वायदे उन लोगों ने जनता से इन वर्षों  में किया है, उसका दस प्रतिशत  भी वे  पूरा करने में नाकाम रहे।  देखिये, दुष्यंत कुमार क्या कहते हैं :

यहाँ तक आते आते सूख  जाती है कई नदियां
मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा ।

सभी यह मानेंगे कि किसी भी पैमाने से आजादी के ये 66  साल किसी भी देश को अपनी जनता को बुनियादी जरूरतों  से   चिंतामुक्त करके देश को सम्पन्न और शक्तिशाली बनाने के लिए  बहुत लम्बा अरसा होता है। और वह भी तब, जब कि इस  देश में न तो प्राकृतिक संसाधनों की कोई कमी रही है और न तो   मानव  संसाधन की।  तो फिर यह तो साफ़ है कि भारी  गलती हुई – नीति, योजना,कार्यवाही और सबसे  ऊपर नीयत के मामले में। चुनांचे, हम सभी को देश/ प्रदेश  की सरकारों से पूरी गंभीरता से पूछना पड़ेगा कुछ  बुनियादी सवाल और मिल कर बनानी  पड़ेगी एक समावेशी  कार्य योजना जिसे समयबद्ध तरीके से आम जनता की भलाई  के लिए लागू  किया जा  सकें, तभी हम अपने  को एक मायने में आजाद भारत के नागरिक कह सकेंगे। अन्यथा  कोई  विदेशी  यह कहते हुए मिलेगा :

कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए
मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिन्दुस्तान है !
                                                                - दुष्यंत कुमार
#  प्रवक्ता . कॉम पर प्रकाशित, दिनांक :15.08.2013

              और भी बातें करेंगे, चलते चलते। असीम शुभकामनाएं। 

Sunday, August 11, 2013

आज की कविता : लोकतंत्र का महापर्व

                                                           - मिलन सिन्हा 
लोकतंत्र का महापर्व था 
गुजर गया शांतिपूर्वक (?)
मात्र सत्रह निर्दोष लोग बलि चढ़े 
घायलों की संख्या जानना जरूरी है ?
महापर्व था 
सब ओर थी पूरी तैयारी 
प्रशासन के स्तर पर 
दु :शासन के स्तर पर 
सड़कें सुनसान थीं 
लोग लुप्त थे 
कुछ जागे, कुछ सुप्त थे 
तो क्या उनके मत 
पड़ चुके थे सुबह ही ?
प्रशासन - दु :शासन
हथियारों से लैस 
मतदान केन्द्र पर साथ बैठा 
चाय की चुस्की ले रहा था 
आम जनता का भविष्य 
पेटियों में बंद हो चुका था 
ऐसे ही चुनाव संपन्न हुआ 
चुनाव आयोग ने 
अपनी पीठ ठोंकी !

                   और भी बातें करेंगे, चलते चलते। असीम शुभकामनाएं। 

Saturday, August 10, 2013

हास्य व्यंग्य कविताएं : नेता- अभिनेता, असरकारी

                                                                                  -मिलन सिन्हा
netaji












नेता-अभिनेता
नेता और अभिनेता
चुनाव  मैदान में  खड़े थे ।
मतदातागण
सोच में पड़े थे ।
उधर, छिड़ा  था  विवाद,
मतदाता देगा
किसका साथ ।
एक के पास था
आश्वासनों और वादों का झोला,
तो  दूसरे  के पास था
भुलावे में रखने का नायाब मसाला ।
ऐसी स्थिति में,
विकट  संकट में था मतदाता
और पुकार रहा था
विधाता-विधाता !

असरकारी
नेताजी अब
रोज यह कहते हैं।
कहते हुए अब
नहीं डरते हैं।
यही  कि
जो काम,
अ-सरकारी होंगे
वही,
असरकारी  होंगे !

प्रवक्ता . कॉम पर प्रकाशित, दिनांक :10.08.2013

                         और भी बातें करेंगे, चलते चलते। असीम शुभकामनाएं। 

Friday, August 9, 2013

आज की कविता : खुद को जानो

                                  - मिलन सिन्हा 
life







कोई बोले 
न बोले 
खुद से 
तू  बोल 
अपने तराजू में 
खुद को 
तू तौल
खुद को पहले जान 
तभी 
खुदा  मिलेंगे
नहीं तो 
तुमसे वो 
जुदा रहेंगे 
खुद से कर प्यार 
जमाने से 
प्यार हो जाएगा 
फिर तो 
जीवन तेरा 
खुशियों से 
भर जाएगा।

प्रवक्ता . कॉम पर प्रकाशित, दिनांक :09.08.2013

                   और भी बातें करेंगे, चलते चलते। असीम शुभकामनाएं। 

Tuesday, August 6, 2013

आज की कविता : अमानवीय खेल

                                                - मिलन सिन्हा 
सब आततायी गए मिल 
लूटने बच्चों का 
मिड -डे -मिल
और शुरू  गया 
एक घोर अमानवीय खेल 
आया सड़ा अनाज 
मिलावटी तेल 
खाना कब बना 
कैसा बना 
कब मिला 
किसको मिला 
कितना मिला
कैसा मिला 
जिसे था देखना
जिसे था करना 
जिसे था टोकना 
जिसे था रोकना 
सब थे मुस्तैद 
कागज पर 
नीचे से ऊपर 
ऐसे में जो हुआ 
वह तो होना ही था 
गरीब परिवारों को तो 
रोना ही था 
अपने नौनिहालों को 
खोना ही था ! 

                 और भी बातें करेंगे, चलते-चलते असीम शुभकामनाएं

Friday, August 2, 2013

आज की कविता : सक्रिय मतदाता

                                    - मिलन सिन्हा 

चारों ओर तेजी से 
जंगल कट रहे हैं 
बेघर होकर बाघ 
मारे जा रहें हैं बेरोकटोक 
बड़ी संख्या में कायर कागजी शेर 
पहनने लगे हैं बाघ की छाल 
फ़िल्मी जवां मर्द 
मासूम हिरणों का शिकार कर 
अपनी नायिकाओं को 
मर्दानगी का सबूत पेश कर रहे हैं 
इधर बड़े पैमाने पर 
सीमेंट कंक्रीट के जंगल 
फैल रहे हैं चारों ओर बेतरतीब 
जिसमें मानव रूपी अनेक जानवर 
विचर रहे हैं बेख़ौफ़ 
ये एक दूसरे के साथ 
खाते हैं, पीते हैं 
नाचते हैं, गाते हैं 
जरूरत - बेजरूरत एक दूसरे का भी 
निःसंकोच शिकार करते हैं 
हम आप तो पहले भी 
घंटों इन पर खूब चर्चा करते थे 
बंद कमरों में बैठकर
बेशक खिड़कियां खुली रहती थीं 
घुप्प अंधेरा होने तक 
पर जबान दबी -दबी ही रहती थी 
अब तो ऐसी चर्चा में 
समय भी जाया नहीं करते हम आप 
शाम होते ही 
मच्छर को घुसने से  रोकने के बहाने 
खिड़कियां भी बंद कर लेते हैं 
नए मकान तक 
कम खिड़कियों, रोशनदानों के 
बनने लगे हैं 
मल्टी चैनल टी वी में
सब कुछ देख लेते हैं हम आप 
पर, सच मानिए 
इस जंगल राज के 
हम आप भी हैं सक्रिय मतदाता ! 

#  हिन्दुस्तान में प्रकाशित 

                 और भी बातें करेंगे, चलते चलते असीम शुभकामनाएं

Thursday, August 1, 2013

मोटिवेशन : खुद से कहें , 'आल इज वेल'

                                                 - मिलन सिन्हा
आम तौर पर यह देखा गया है कि परीक्षा के मौके पर तनाव बढ़  जाता है। यह बिलकुल स्वाभाविक बात है। लेकिन, अगर जरा सोचें कि परीक्षा आखिर है क्या, तो पायेंगे कि  यह तो वाकई हमारे धैर्य, दिमागी संतुलन, ज्ञान व समय प्रबंधन का टेस्ट मात्र है। कहने  का मतलब, हमने जो कुछ पढ़ा है, सीखा है उसके बुनियाद पर एक नियत समय सीमा के भीतर पूछे गए प्रश्नों का सटीक जबाव देना है।

 कुछ लोग इसे 'पर इच्छा' भी कहते हैं। अर्थात परीक्षा में सब कुछ अपनी इच्छा के अनुरूप हो, यह जरूरी नहीं।

 इसलिए, परीक्षा के पहले यह अपेक्षित है कि हम कूल -कूल और नार्मल रहने का प्रयास करें। अब तक जो नहीं पढ़ पाए हैं, उसकी चिंता इस वक्त कतई न करें।प्रख्यात कवि हरिवंश राय  बच्चन ने लिखा है न , " जो बीत गयी सो बात गयी ...." बेहतर तो यह है कि हमने जो पढ़ा है उसी पर फोकस करें। यथासाध्य और यथासंभव उसी का रीविजन करें। फार्मूला, महत्वपूर्ण पॉइंट्स आदि पर विशेष ध्यान दें, उन्हें अंडरलाइन करें , हाईलाइट करें।

 परीक्षा जैसे नाजुक अवसर पर यह भी पाया गया है कि ज्यादातर स्टूडेंट यह सोच सोच कर  परेशान  रहते हैं, अनावश्यक तनाव में रहते हैं कि दोस्त क्या पढ़ रहे हैं, क्या कर रहें हैं। ऐसा सोचना बहुमूल्य समय की बेवजह बर्वादी है। ऐसे वक्त दोस्त को फ़ोन करना गुनाह से कम नहीं। अगर मोबाइल बंद नहीं कर सकते तो कम से कम साइलेंट मोड पर जरूर कर लें। फेस बुक आदि से इस समय दूर ही रहें तो अच्छा। खुद पर और परीक्षा की अपनी तैयारी  पर ध्यान केन्द्रित करें।

 तनाव में थोड़ी हड़बड़ाहट  लाजिमी है। ऐसे में, कई बार  जरूरी काम याद नहीं रहते, जो परीक्षा के ठीक पहले हमारा तनाव बहुत  बढ़ा  देता है। जैसे, जल्दबाजी में एडमिट कार्ड ही छूट गया। तो क्यों न  परीक्षा के पूर्व संध्या को ही एडमिट कार्ड सहित अन्य जरूरी चीजें ठीक से रख लें।

मानसिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए शारीरिक रूप से स्वस्थ रहना अनिवार्य है। इसके लिए पोषक और संतुलित आहार के साथ - साथ अच्छी नींद  जरूरी है। जल और  फल  इस समय बड़े फलदायक साबित होते हैं।  

एक बात और ! परीक्षा के मौसम में रात के नौ बजे तक अवश्य खा लें।  हल्का ही खाएं, जल्दी सो जाएं। रात में कम-से-कम  6 घंटे अवश्य सोएं।

सबेरे नित्य क्रिया से निवृत हो कर कुछ देर फ्री-हैण्ड एक्सरसाइज कर लेने से शारीरिक जकड़न से निजात मिलता है ।  थोड़ी देर  प्राणायाम में अनुलोम विलोम और भ्रामरी कर लेना  फायदेमंद  रहेगा। परीक्षा केंद्र के लिए निकलने से पहले नाश्ता अवश्य करना चाहिए,  अन्यथा  परीक्षा के दौरान रह- रह कर या निरंतर परेशानी होती रहेगी,  जो कतई ठीक नहीं है। परीक्षा केंद्र पर नियत समय से कम से कम आधा घंटा पहले पहुँचना अनावश्यक घबराहट से  हमें बचाता है।साथ में पानी का छोटा बोतल रहे, तो अच्छा।

विशेष कर परीक्षा के दौरान  "टेक-इट- इजी"  सिद्धांत को फॉलो करना चाहिए। इसी सिद्धांत के तहत प्रश्नों को पहले ठीक से पढना, समझना और फिर उत्तर देना चाहिए।इस अवसर पर स्मार्ट समय प्रबंधन न केवल हमारे परफॉरमेंस को बेहतर बनाता है, बल्कि हमारे मानसिक दबाव को भी नियंत्रण में रखता है।

परीक्षा ख़त्म होने के  तुरत बाद  सही गलत के पचड़े में पड़ने के बजाय  हम खुद  से कहें , 'आल इज वेल'  और  उन सबका शुक्रिया अदा करें जिन्होंने हमें इस परीक्षा में शामिल होने लायक बनाया। 

सच मानिए, अगर हम इन  छोटी-छोटी  बातों का  ध्यान रखेंगे, तो हमारा मानसिक दबाव और तनाव स्वतः कम हो जाएगा जिसके फलस्वरूप  परीक्षा में हमारा परफॉरमेंस निश्चित ही बेहतर रहेगा। 

प्रवासी दुनिया .कॉम पर प्रकाशित, दिनांक :04.08.2013  (परीक्षा से पहले मानसिक दबाव को कैसे कम करें? ) 
  
                 और भी बातें करेंगे, चलते-चलते असीम शुभकामनाएं