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Saturday, February 4, 2017

लघु कथा : वास्तविकता

                                                                  - मिलन सिन्हा 
clipकुमार साहब एक नामी  वकील थे. जब वे अदालत में जाते तो अपनी दलीलों से सबको निरुत्तर कर देते.

आज वकील साहब ने दहेज़ के खिलाफ  जोरदार दलीलें प्रस्तुत की . जज साहब सहित न्यायालय में उपस्थित सारे लोग वकील साहब के तर्कों से अभिभूत थे. 

बाहर निकलते ही उनके मुवक्किल प्रसाद जी ने उन्हें ख़ुशी –ख़ुशी एक हजार रूपये दिए. वकील साहब ने पैसे रख लिए और फिर प्रसाद जी  को अलग ले जाते हुए कहा, ‘भैया, आप मुझे परसों तक पचास हजार रूपये उधार दे सकते हो ? बड़ा  जरुरी काम है .

‘हाँ, हाँ , वकील साहब. पचास हजार क्यों, और भी रुपये की जरुरत हो तो ले लीजिये......’ प्रसाद जी ने निःसंकोच जवाब दिया .

पूरी रकम के साथ प्रसाद जी दूसरे ही दिन शाम को वकील साहब के घर पहुंच गए . कुमार साहब बाहर बरामदे में चिंतामग्न बैठे थे. प्रसाद जी को देख कर उन्होंने दूसरी कुर्सी मंगवाई. चाय के लिए भी कहा. प्रसाद जी ने रूपये वकील साहब को दे दिए. फिर कुछ सहमते हुए पूछ ही लिया, ‘जनाब, आपको पहले कभी इतना चिंताग्रस्त नहीं देखा है. सब खैरियत तो है ?

वकील साहब के चेहरे पर एक अजीब- सा भाव साफ़ उभर आया. धीरे से कहा उन्होंने, ‘प्रसाद जी, जानते हैं, ये रूपये मैं आपसे क्यों उधार  ले रहा हूँ ? नहीं  न ! दहेज़ के लिए ! कल देना है मुझे दहेज़ की पूरी रकम, तब जाकर कहीं मेरी बेटी की शादी की तिथि तय हो पायेगी.’

चाय आ चुकी थी, पर प्रसाद जी सुन्न बैठे रहे कुछ देर. फिर चुपचाप उठकर चले गए .
  
               और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 
# लोकप्रिय अखबार 'प्रभात खबर - "सुरभि " में  22 जनवरी , 2017 को प्रकाशित 

Monday, January 9, 2017

लघु कथा : नसीहत

                                                     - मिलन  सिन्हा 
जिस वक्त जगत रेलवे टिकट खिड़की पर पहुंचा, वहां काफी भीड़ थी. उसके ट्रेन का समय हो चला था. वह लाइन में खड़ा हो गया. दस–पन्द्रह मिनट गुजर गये, परन्तु अब भी टिकट खिड़की पर उसके आगे एक यात्री  टिकट लेने के लिए खड़ा था.

प्लेटफार्म पर गाड़ी आ गई. वह विचलित हो उठा. टिकट के लिए उसने रूपये दिये. टिकट बाबू ने रूपये ले लिये और टिकट घर के भीतर ही अपने एक मित्र से बातचीत में लग गये. जगत ने टोका, ‘टिकट दीजिए, गाड़ी आ गयी है.’ टिकट बाबू ने उत्तर नहीं दिया. बातचीत में लगे रहे. जगत को जब टिकट मिला, गाड़ी ने सीटी दी. जगत दौड़ा. प्लेटफार्म पर पहुंचा तो गाड़ी सरक रही थी. वह लपक कर सामने के डब्बे में चढ़ गया.

डिब्बे के अंदर पहुंच कर जगत ने गहरी सांस ली और बैठने के लिए तत्पर हुआ. दिन का समय था, लेकिन बैठने के स्थान पर भी लोग सोये हुए थे. जगत एक सीट पर सोये एक यात्री के पांव के पास थोड़ी-सी जगह पर बैठ गया और आंखें बंद कर सोचने लगा कि अगर चलती गाड़ी में चढ़ते हुए कोई दुर्घटना हो जाती तो क्या होता ?

टिकट–टिकट की आवाज सुनकर उसने आंखें खोली तो सामने टी.टी बाबू  को खड़ा पाया. जगत ने झट अपना टिकट निकाल कर दिखाया. टिकट देखते ही  टी.टी बाबू  वहां बैठ गये. काली कोट के जेब से रसीद बुक निकालने का उपक्रम करते हुए कहा, ‘निकालिये एक सौ पचपन रुपये.’ जगत ने विस्मय से कारण जानना चाहा तो टी.टी बाबू   ने झल्लाते हुए बताया, ‘एक तो बिना पूछे, बिना आरक्षण के स्लीपर कोच में सामान्य टिकट लेकर चढ़ गये, फिर सवाल –जवाब भी करते हैं. स्लीपर कोच का भाड़ा एवं फाइन मिलाकर हुआ एक सौ पचपन रुपये.’

जगत ने टी.टी बाबू को समझाने की कोशिश की कि किस परिस्थिति में वह उस डिब्बे में चढ़ा. फिर उसके पास उतने पैसे थे भी नहीं.

टी.टी बाबू  ने उसकी बातें अनसुनी करते हुए कहा कि ऐसे बहाने वे अनेक सुन चुके हैं. टी.टी बाबू  आगे कुछ और कहते, इसी बीच  एक अन्य यात्री ने टी.टी बाबू से कहा, ‘सर, जरा मेरा मामला देख लें. आपके भरोसे ही यात्रा कर रहे हैं हम. चार दिन पूर्व भी इसी ट्रेन में आपके साथ ही गये थे, याद है न सर.’

टी.टी बाबू  ने उस यात्री को देखा, मुस्कराया और फिर उनके टिकट पर एक नजर डाली. तत्पश्चात धीरे से उनसे सौ रूपये मांगे. उस यात्री ने झट सत्तर रूपये टी.टी बाबू  को दिये और धीरे से कहा, सर, इतना ही लिया था आपने पिछले दफे.’

टी.टी बाबू  ने चुपचाप सत्तर रूपये कोट के भीतर वाली जेब में रख लिये और उस व्यक्ति को एक बर्थ  सोने के लिए दे दिया. अच्छी तरह आश्वस्त भी किया उन्हें हर संभावित परेशानी के प्रति.

अगला स्टेशन आ चुका था. टी.टी बाबू  ने जगत को हाथ पकड़ कर डिब्बे से नीचे उतार दिया और यह नसीहत भी दी, ‘देखिए, या तो सही टिकट लेकर चलिए या फिर मेरे भरोसे. हां, मेरे भरोसे चलेंगे तो सोकर आराम से चलेंगे.’
                                                            (hellomilansinha@gmail.com)

                  और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 

# लोकप्रिय अखबार 'हिन्दुस्तान' में 11 दिसम्बर ,1997 को प्रकाशित 

Tuesday, November 8, 2016

लघु कथा : मनीआर्डर

                                                                                          - मिलन सिन्हा
डाकिया आज बहुत खुश था. आज पहली बार पंडित जी के नाम पांच हजार रूपये का मनीआर्डर जो आया था. उसे बख्शीश मिलने की पूरी उम्मीद थी.

डाकिया ने पंडित जी को आवाज दी और उन्हें खुश–खबरी से अवगत कराया. पंडित जी ने बड़े गर्व से डाकिया को बताया कि यह मनीआर्डर उनके लड़के ने उन्हें दिल्ली से भेजा है जहाँ उसे हाल ही में एक शानदार नौकरी मिली है.

मनीआर्डर की राशि प्राप्त करने के बाद पंडित जी ने डाकिया को अपेक्षित बख्शीश दिया. डाकिया खुश हो गया. पंडित जी के कहने पर उसने यह खबर मोहल्ले के कई लोगों को दी. पंडित जी ने भी इधर अपने हर पहचानवालों से अपने लड़के के सदगुणों की खूब चर्चा की, उसके शानदार नौकरी और मनीआर्डर वाली बात विशेष तौर पर बताई.

डाकिया अगले महीने फिर मनीआर्डर देने आया और बख्शीश लेकर लौटा.

पंडित जी एवं उनके लड़के की चर्चा उनके अपने स्वजनों –स्वजातीय लोगों में जोर-शोर से होने लगी. लडकी वाले शादी के लिए पंडित जी के घर आने लगे.

जल्दी ही पंडित जी के लड़के की शादी बड़े धूमधाम से संपन्न हो गयी. पंडित जी की पुत्रवधू देखने में सुन्दर तो थी ही, पंडित जी की मांग एवं अपेक्षा से कहीं अधिक दहेज़ भी लायी थी.

डाकिया को पंडित जी से मनीआर्डर की बख्शीश पाने की एक आदत-सी लग चुकी थी. शादी के लगभग पन्द्रह दिनों के बाद जब उसने पंडित जी के लड़के को वहीं देखा तो बरबस पूछ बैठा, आप अब तक दिल्ली नहीं गये? कब जायेंगे ? लड़के ने पहले तो टालने की कोशिश की, पर जोर डालने पर यह कहते हुए चले  गये कि अब दिल्ली जाने की कोई जल्दी नहीं है. डाकिया को बात जंची नहीं. उसने इधर –उधर पूछताछ की तो पंडित जी के लड़के के एक अभिन्न मित्र ने बताया कि वह तो दिल्ली में नौकरी के तलाश में छः –आठ महीने भटका, नौकरी नहीं मिली सो लौट आया. 

तो फिर वह मासिक पांच हजार रुपये का मनीआर्डर ?

हुआ ऐसा कि लड़के को दिल्ली भेजने के बाद पंडित जी हर महीने के अंत में पांच–छह हजार रूपये उसे भेज देते. उसी राशि में से उनका लड़का अगले महीने के आरम्भ में पंडित जी को मनीआर्डर से पांच हजार रुपये भेज देता. चार –छह महीने के मनीआर्डर के इस आवाजाही से शादी के बाजार में पंडित जी के लड़के की अच्छी बोली लग गयी. सो दिल्ली की यात्रा रुक गयी. और कोई बात नहीं ! 
                    
                    और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

(लोकप्रिय अखबार 'हिन्दुस्तान' में 4 दिसम्बर ,1997 को प्रकाशित)

Friday, October 7, 2016

लघु कथा : इंटरव्यू

                                                                               - मिलन  सिन्हा 
गर्मी  का मौसम, चिलचिलाती धूप एवं दोपहर के बारह बजे का वक्त. किशोर अपने घर से स्टेशन ट्रेन पकड़ने को निकला. मुख्य सड़क पर आकर उसने चारों ओर नजर दौड़ाई, लेकिन कहीं कोई रिक्शा नहीं दिखाई पड़ा.

अपने मम्मी–पापा के हिदायत के बावजूद भी किशोर ऐन वक्त पर ही घर से निकला. सो, रिक्शा न उपलब्ध होने पर वह परेशान हो उठा. इस ट्रेन के छूट जाने पर उसका नौकरी के लिए साक्षात्कार में शामिल हो पाना नामुमकिन था. कई सालों की मेहनत के बाद उसे यह साक्षात्कार नसीब हुआ था.

तनाव  एवं गर्मी से उसका बुरा हाल था. स्टेशन दूर था, समय कम था. परेशानी बढ़ रही थी. ऐसे में उसे दूर एक रिक्शा आता दिखाई दिया. वह उधर लपका. एक बूढ़ा आदमी रिक्शा खींच रहा था. किशोर रिक्शे के पास पहुंच कर रिक्शे वाले से बिना बात किये ही सूटकेश रिक्शे पर रख कर बैठ गया एवं रिक्शे वाले से स्टेशन चलने को बोला. बूढ़े रिक्शे वाले ने किशोर से थोड़ा आराम कर पानी पी कर चलने का अनुरोध किया, परन्तु किशोर ने उसे तुरन्त चलने को बाध्य किया. मुंहमांगा किराया देने का वायदा भी किया.

स्टेशन पहुंच कर किशोर ने पहले एक कुली से ट्रेन की बाबत पूछा. ट्रेन आने में  पांच– दस मिनट देर थी. किशोर ने राहत की सांस ली. अब बड़े इत्मीनान से उसने बूढ़े रिक्शे वाले को दो रूपये दिये और चलने लगा. रिक्शे वाले ने उससे कम से कम उचित भाड़ा चार रुपया देने को कहा. रिक्शे वाले ने किशोर से मुंहमांगा किराया देने के उसके वायदे की दुहाई भी दी . जो किशोर दस –पन्द्रह मिनट पहले मन ही मन इस रिक्शे वाले को भगवान का अवतार मान रहा था, उससे स्टेशन तक चलने का अनुनय–विनय कर रहा था, अब वही किशोर रिक्शे वाले पर बरस पड़ा और रिक्शे वाले को धमकाने लगा.

बूढ़ा रिक्शा वाला पहले ही थक-हारकर चूर–चूर एवं बेहाल था. अपने हक़ के लिए न्यूनतम प्रतिरोध की शक्ति भी जाती रही थी उसकी. इस स्थिति में किशोर को बिना और पैसा दिये चले जाते देख उसने किशोर से हाथ जोड़कर विनती की, “मालिक, गरीब आदमी हूँ, बूढ़ा हूँ, दया कर दो रुपया और दे दें. भगवान आपका भला करेगा.” इस पर किशोर ने एक रुपया जेब से निकाल कर रिक्शे वाले की ओर फेंका और यह कहते हुए चला गया, “ ऐसे न मांगना चाहिए. रेट बताता है मुझे .... ...रोब झाड़ता है मुझ पर....” 
(hellomilansinha@gmail.com)
                               और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

# लोकप्रिय अखबार 'हिन्दुस्तान' में 19 जून, 1997 को प्रकाशित

Thursday, September 1, 2016

लघु कथा : अनुभव

                                                                                   - मिलन  सिन्हा 

Image result for free photo of crowded railway platformधनीराम बहुत तेज गति से अपने लड़के पंकज के साथ प्लेटफार्म पर पहुंचा. वह हांफ रहा था. कुली से पूछताछ की तो उसे झटका लगा. उसकी ट्रेन जा चुकी थी. उन लोगों का आरक्षण प्रथम श्रेणी में था. ट्रेन आज नियत समय पर थी और वह लेट था. धनीराम परेशान हो उठा. उसे पंकज के साथ कल सुबह तक कलकत्ता पहुंचना ही था, लेकिन अब कोई उम्मीद न थी क्यों कि कलकत्ता के लिए और कोई ट्रेन उस वक्त थी नहीं. उसे समझ में नहीं आ रहा था कि आगे क्या किया जाये, तभी घोषणा हुई कि एक सवारी गाड़ी चार घंटे विलम्ब से चलकर आधे घंटे बाद प्लेटफार्म  संख्या –एक पर आने वाली है. धनीराम को कुछ राहत महसूस हुई और वह विस्तृत जानकारी के लिए पूछताछ कार्यालय की ओर लपका. वहां उसे यह जानकार थोड़ी चिंता हुई कि सवारी गाड़ी में न तो कोई प्रथम श्रेणी का डिब्बा है और न ही कोई स्लीपर कोच.

पंकज के साथ अगले दिन सुबह कलकत्ता पहुंचने की मजबूरी के कारण उसने उसी ट्रेन से जाने का मन बनाया. उसने पंकज को सब बातें बतायी. दस वर्षीय पंकज ने झट से पूछा, “ पापा, इस ट्रेन से हम लोग कैसे जायेंगे ? सुना है सवारी गाड़ियों में बहुत भीड़ होती है; यात्री ट्रेन की छत पर बैठकर भी यात्रा करते हैं. हम लोगों को जगह न मिली तो क्या होगा ?”

“ चलो न, भीड़ तो होगी, पर हमें बैठने की जगह मिल जायेगी.” – धनीराम ने बेटे को आश्वस्त किया.

“ पर पापा, भीड़ रहने पर हमें जगह कैसे मिलेगी ?” – पंकज ने सहजता से पूछा. “याद है पापा, एक बार ट्रेन में अचानक भीड़ हो गयी थी. हम लोग अपनी–अपनी सीट पर सोये थे, फिर भी हमने किसी को बैठने की जगह नहीं दी. लोगों ने खड़े–खड़े ही यात्रा की और हम लोग बेफिक्र पसरे रहे.”

“ बेटा, हमारे साथ  ऐसा नहीं होगा. चलो न, हमें बैठने की जगह मिलेगी.”- धनीराम ने बेटे को समझाया. “ जानते हो बेटा, गरीब लोग इस ट्रेन में यात्रा करते हैं. वे लोग हमारे जैसे बड़े लोगों की मजबूरी समझते हैं.”

नन्हे पंकज को पापा का तर्क समझ में न आया, पर वह आगे कुछ न बोला.

ट्रेन आई तो भीड़ देखकर धनीराम भी चिंता में पड़ गया, किन्तु अब सोच –विचार निरर्थक  था. किसी तरह दोनों बाप –बेटा डिब्बे में घुस पाये. भीतर तिल धरने की जगह न थी. दोनों को बमुश्किल पांव टिकाने की जगह मिली. पंकज ने चारों ओर नजर घुमाई तो उसे हर तरफ गरीब आम लोग नजर आये – पोटली, मोटरी आदि के साथ. पंकज ने धनीराम की ओर देखा, पर धनीराम ने कुछ न कहा. 

गाड़ी खुली तो डिब्बे में फिर कुछ हलचल हुई. पंकज उत्सुकतावश मुड़ा, तभी पास की सीट पर बैठे एक यात्री ने पंकज को अपनी गोद में बिठा लिया. उसी समय एक मजदूर अपनी सीट से उठ खड़ा हुआ और धनीराम से वहां बैठने का आग्रह किया. धनीराम के सीट पर बैठते ही वह मजदूर निःसंकोच वहीं नीचे उकडूं बैठ गया. बालक पंकज यह सब देख कर अभिभूत हो गया.

कलकत्ता पहुंचकर धनीराम ने चैन की सांस ली, कहा – “चलो, आखिरकार हम लोग पहुंच गये. भगवान का शुक्र है .....”

“पापा, हमें तो सबसे पहले उन गरीब लोगों का शुक्रिया अदा करना चाहिए, जो वाकई हमसे बहुत बड़े हैं, बहुत ही अच्छे हैं .... ....”- पंकज ने तपाक से जवाब दिया.

धनीराम की आंखें शर्म से झुक गयी. वह कुछ भी नहीं बोल पाया.  
(hellomilansinha@gmail.com)
                              और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

( लोकप्रिय अखबार 'हिन्दुस्तान' में 29 अक्टूबर, 1998 को प्रकाशित)

Sunday, August 14, 2016

लघु कथा : प्रहरी

                                                                       - मिलन सिन्हा 
काम रुक गया था. पांचों मिस्त्री ठेकेदार के पास ही खड़े थे. कालू मिस्त्री  ठेकेदार से बोल रहा था, ‘गांव तो हम लोगों को परसों जाना ही है. हमारे भविष्य का सवाल है ....हम लोगों ने तो आपको पहले भी कहा था.’ अन्य मिस्त्री कालू के समर्थन में अपनी –अपनी गर्दन हिला रहे थे.

ठेकेदार ने उन्हें समझाते हुए कहा, ‘देखो, यह काम जब तक पूरा नहीं होता, तब तक तुमलोगों को कैसे जाने दें ? आखिर अगले एक महीने में इतना बड़ा काम पूरा भी तो करना है ? तुम लोग इस तरह चले जाओगे तो.... फिर इस मालिक को क्या जवाब देंगे ?’

‘हमलोगों को तीन दिनों के लिए जाने दीजिये. हमलोग नहीं जायेंगे  तो बहुत अनिष्ट हो जायेगा. ठेकेदार जी, आप सब जानते हैं, फिर भी हमें क्यों रोकना चाहते हैं ? हम तो कहते हैं कि आप भी हमारे साथ चलिये. अपने बीवी–बच्चों से मिल भी आयेंगे और वह काम भी हो जायेगा’ – कालू ने विनती की. 

‘कालू, तुम इतने समझदार हो फिर भी मेरी कठिनाई नहीं समझते हो. तुम तो इस मालिक को अच्छी तरह जानते हो. समय पर अगर काम नहीं होगा तो मुझे बहुत नुकसान हो जायेगा. यह मालिक आगे हमें फिर कोई काम का ठेका नहीं देगा.’- ठेकेदार ने कालू को अपनी विवशता समझाने के उद्देश्य से कहा.

कालू एवं उसके अन्य साथियों की अपनी विवशता थी तो ठेकेदार की अपनी. दोनों पक्ष एक दूसरे को समझाने के लिए अलग–अलग तर्क दे रहे थे. काम रुका हुआ था. असहमति कायम थी. इसी समय मालिक जगत जी अचानक वहां आ पहुंचे. कालू पुनः ठेकेदार से रोष भरे स्वर में कुछ कह रहा था. सारे मिस्त्री एवं ठेकेदार को एक स्थान पर बहस करते देख पहले तो वे नाराज हुए, फिर ठेकेदार की ओर प्रश्नवाचक मुद्रा में देखा. ठेकेदार ने पहले तो बात को टालना चाहा, परन्तु जगत जी द्वारा दुबारा पूछने पर कहा, ‘ये सारे मिस्त्री परसों अपने –अपने गांव जाना चाहते हैं तीन दिनों के लिए. और मैं इन्हें समझा रहा हूँ कि इस वक्त काम अधूरा छोड़कर घर न जायें.’

‘आखिर ये लोग इसी समय घर क्यों जाना चाहते हैं ‘ – जगत जी ने प्रश्न किया.

‘ इनके गांव में दो दिन बाद पंचायत चुनाव है. ये सभी उसी चुनाव में अपने –अपने गांव जाकर अपना वोट डालना चाहते हैं’ – ठेकेदार ने सहमते हुए उत्तर दिया.

मालिक ने पहले तो सारे मिस्त्री को एक बार गौर से देखा, विशेषकर कालू को और फिर ठेकेदार की ओर मुखातिब होकर बोले, ‘भाई, इन्हें इनके गांव जरुर जाने दो. मेरा काम तीन दिन विलम्ब से ही ख़त्म होगा, तब भी ठीक है, लेकिन इन्हें मत रोको. ठेकेदार, तुम जानते हो, लोकतंत्र के असली प्रहरी ये ही हैं, तुम और हम नहीं.’              (hellomilansinha@gmail.com)

                         और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

( लोकप्रिय अखबार 'हिन्दुस्तान' में 6 अगस्त, 1998 को प्रकाशित) 

Saturday, July 2, 2016

लघु कथा : उदाहरण

                                                                                       - मिलन सिन्हा 


कम्पनी के प्रबंध निदेशक का अचानक क्षेत्रीय कार्यालय के निरीक्षण का कार्यक्रम दोपहर बारह बजे आया. 

क्षेत्रीय  प्रबंधक ने तत्काल कार्यालय के सभी कर्मचारियों को इसकी सूचना दी और सबको अपने–अपने कार्य को बिलकुल अद्दतन करने की हिदायत दी. बैठक के लिए कार्यालय के सभाकक्ष को साफ़–सुथरा एवं टीप-टॉप रखने का निर्देश भी दिया. इस काम की देख-रेख के लिए उन्होंने वरीय अधिकारी भास्कर साहब को विशेष हिदायतें भी दीं.

भास्कर साहब तत्क्षण इस कार्य में लग गये. उन्होंने पहले संबंधित सफाई कर्मचारी की खोज की. वह उस दिन आया ही न था. दूसरा सफाई कर्मचारी सुबह अपना काम करके जा चुका था. भास्कर साहब  ने इस स्थिति में कुछ अन्य वरीय अधिकारियों एवं कर्मचारियों से इस संबंध में बात की. सबने पल्ला झाड़ लिया. 

प्रबंध निदेशक का अपराह्न चार बजे आने का कार्यक्रम था. दो बज चुके थे. भास्कर साहब  को कोई अन्य विकल्प नजर नहीं आ रहा था. 

लगभग तीन बजे  क्षेत्रीय  प्रबंधक स्थिति का जायजा लेने के क्रम में सभाकक्ष में आये तो यह देख कर स्तब्ध रह गये कि भास्कर साहब खुद सभाकक्ष की सफाई में तन्मयता से लगे हैं. सभाकक्ष साफ़–सुथरा एवं बैठक के अनुरूप हो चला था. यह सब देख कर क्षेत्रीय  प्रबंधक अभिभूत हो गये. उन्होंने भास्कर साहब से पूछा कि इतने वरीय अधिकारी होने के बावजूद भी वे ये सब खुद क्यों करने लगे, उन्हें क्यों नहीं बताया एवं अन्य लोगों का सहयोग क्यों नहीं लिया ?

भास्कर साहब ने क्षेत्रीय  प्रबंधक को पूरी पृष्ठभूमि की जानकारी दी और बिलकुल निःसंकोच होकर कहा, ‘सर, हमें ये  काम अपने घर में करने में कोई परेशानी तो नहीं होती है, फिर आज आवश्यकता  पड़ी  है तो इसे करने में संकोच कैसा ? इसके अलावे एक वरीय अधिकारी होने के नाते मुझे  ही पहल करनी थी.’ भास्कर साहब ने आगे कहा, ‘सर, आखिर यह दफ्तर भी तो हमारा घर ही है . हम यहां रोटी कमाते हैं और घर में खाते हैं.’

क्षेत्रीय  प्रबंधक  ने देखा कि यह सब कहते हुए भास्कर साहब का चेहरा उद्दीप्त हो उठा.  
                 और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

( लोकप्रिय अखबार 'हिन्दुस्तान' में 6 अगस्त, 1998 को प्रकाशित) 

Monday, May 2, 2016

लघु कथा : खुशहाली

                                                                                               - मिलन सिन्हा 
मेरा यह मित्र अपने कारोबार में माहिर था. सुबह से रात तक  वह अपने काम में लगा रहता. बहुत धन भी अर्जित किया था उसने. फिर भी और धन अर्जित करने की उसकी इच्छा कम नहीं हुई थी. इस धुन में उसे न तो अपने परिवार का ख्याल रहता और न ही अपने शरीर –स्वास्थ्य का , खान –पान का.

एक दिन दोपहर के वक्त मै उसके दफ्तर में बैठा था. वह मुझसे बीच –बीच में एक –आध बातें कर पाता. बाकी वक्त वह फोन पर कारोबार की बातें करता. कभी –कभी तो वह एक साथ दो फोन  थामे रहता.

इस बीच नौकर घर से उसका खाना ले आया और उसके पास ही छोटे,  पर खूबसूरत से टेबुल पर रख गया . कुछ क्षण बाद उसकी पत्नी का फोन भी आया. गरम-गरम खाना खा लेने का अनुरोध किया, लेकिन वह फिर टेलीफोन पर वार्तालाप में लग गया. मै बैठा यह सब देख रहा था. बातचीत के लिए मैं जब भी कुछ कहने को होता, वह मुझे इशारे से थोड़ी देर और रुकने को कहता और फिर वही फोन.....

काफी वक्त गुजर गया. मैं बैठा रहा, खाना पड़ा रहा . फोन पर उसकी बातचीत जारी थी. अब मुझसे रहा न गया और मैंने उसके हाथ से फोन का चोगा करीब –करीब छीनते हुए पूछा, ‘भाई आखिर यह आपाधापी, इतनी व्यस्तता किस चीज के लिए ?’

‘रोटी कमाने के लिए, रोटी कमाने के लिए. और क्या ?’ – उसने थोड़ा तल्खी से जवाब दिया .

‘तो फिर यह रोटी खा’ - मैंने उसके खाने के तरफ इशारा करते हुए कहा.

उसने तुरन्त खाने का डब्बा खोला. मुझसे भी साथ देने का आग्रह किया .

सुना है , अब वह और उसका परिवार दोनों खुश हैं, सुखी हैं.

                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

# लोकप्रिय  अखबार , 'हिन्दुस्तान' में 26 जून , 1997   को प्रकाशित 

Saturday, April 2, 2016

लघु कथा : मजबूरी

                                                                                  -मिलन सिन्हा 
होली के बाद ट्रेन में बहुत भीड़ थी. सैंकड़ों मजदूर ट्रेन की छत पर सवार थे. सब अपना –अपना गांव छोड़कर अन्य प्रदेशों में रोजगार के लिए जा रहे थे. सबके पास रेल टिकट था, पर डिब्बे में उनके लिए जगह नहीं थी. सो, वे छत पर सवार थे . न कोई गिला, न  कोई शिकवा . न कोई गम था, न कोई उदासी . बड़े इत्मीनान से से छत पर बैठे थे सभी.

पूछने पर उनमें से एक बताता है, ‘घर पर जमीन भी है, मैट्रिक तक पढ़ा भी है, परन्तु न खेतों को पानी है , न खाद. बिजली भी नहीं, सड़क खस्ताहाल. रोजगार का कोई अन्य साधन भी नहीं है. लगभग सारे –के –सारे युवक बेरोजगार हैं.’

दूसरा हस्तक्षेप करता है, है जी, बहुत कुछ है हमारे यहां. जातिवादी उन्माद है, साम्प्रदायिक तनाव है, आतंक का माहौल है. राजनीतिक हल्लेबाजी  है , बूढ़े , बेबस मां-बाप हैं, अनब्याही बहनें हैं, दहेज़ का दानव है ....’

पहला फिर कहता है, ‘परन्तु इस सबके बावजूद जीना तो फिर भी है न. तो इस जहालत में क्यों जीयें, इस जहालत में क्यों मरें. सो , हमलोग रोटी कमाने परदेश जा रहे हैं. चार कमायेंगे, दो बचायेंगे. मां –बाप को भेजेंगे. इसी तरह जियेंगे, शायद इसी तरह मरेंगे. अपनी धरती पर बोझ तो नहीं न बनेंगे.’

               और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

# लोकप्रिय  अखबार , 'हिन्दुस्तान' में 22 मई , 1997 को प्रकाशित 

Saturday, March 12, 2016

लघु कथा : शर्म

                                                                                  - मिलन सिन्हा 
    उस दिन प्लेटफार्म पर बहुत भीड़ थी . शाम हो चली थी. लड़के एक प्रतियोगिता परीक्षा देकर लौट रहे थे. दैनिक मजदूरों की संख्या भी कम न थी. ट्रेन आने की घोषणा हो चुकी थी. प्लेटफार्म पर अफरा –तफरी मची थी.

   ट्रेन प्लेटफार्म पर लगी तो लड़कों ने लपक कर सीट पर कब्ज़ा जमाया. मजदूरों एवं अन्य यात्रियों को नीचे बैठकर या खड़े रहकर संतोष करना पड़ा.

   गाड़ी चली तो आपसी बातचीत का सिलसिला भी जोर पकड़ा. राजनीति से लेकर फिल्मों तक की चर्चा चल पड़ी. तभी रमेश की नजर टी .टी बाबू पर पड़ी जो थोड़ी दूर पर टिकट चेक कर रहे थे. रमेश ने अन्य दो लड़कों को साथ लिया और उल्टी दिशा में चल पड़ा. भीड़ काफी थी. लोग खड़े भी थे, नीचे बैठे भी थे. रमेश एवं उसके साथियों को वहां से जल्दी खिसक जाने में दिक्कत हो रही थी. वे लोग नीचे बैठे यात्रियों पर झल्लाते हुए चले गये.

    इस बीच दूसरा स्टेशन आ गया. रमेश व उसके साथी नीचे उतर गये. गाड़ी जब फिर खुली  वे लोग फिर उसी डिब्बे में चढ़ गये. तब तक टी .टी बाबू  दूसरे डिब्बे में प्रवेश कर गये थे . अपने सीट तक जाने में उन्हें फिर असुविधा हो रही थी.

    रमेश ने अपने साथियों से कहा, ‘पता नहीं, आज यह टी .टी इस भीड़ में भी इस डिब्बे में क्यों आ गया ? बेमतलब की परेशानी हो गई.’ तभी रमेश का पांव एक मजदूर कमलू  से टकरा गया  और वह लड़खड़ा गया. कमलू की ओर रमेश ने गुस्से से देखा और कहा, ‘यह भी कोई बैठने की जगह है ? क्यों  बैठ जाते हो यहां तुम लोग ? उठो यहां से, शर्म  भी नहीं .....’


    कमलू अपनी जगह से नहीं हटा, अपितु बड़ी दृढ़ता के साथ उसने उत्तर दिया, ‘भाई, जैसे तुम लोग बिना टिकट शान से सीट पर बैठे हो, उसी तरह हमलोग टिकट खरीदकर इत्मीनान से यहां जमीन पर बैठे हैं. शर्म किसे आनी चाहिए, तुम खुद समझ लो.’   


   कुछ  क्षण के लिए चुप्पी छा गयी. रमेश और उसके साथी वहां से चुपचाप चले गए.


             और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं


# लोकप्रिय  अखबार , 'हिन्दुस्तान' में 14  मई , 1998  को प्रकाशित 

Monday, February 15, 2016

लघु कथा : योग्यता

                                                                                 - मिलन  सिन्हा  
चारों  मित्र कुशाग्र बुद्धि वाले एवं मेहनती थे. इत्तफाक से चारों ने एक साथ एक ही संस्था में अधिकारी के रूप में योगदान किया.

कुछ ही वर्षों में चारों अधिकारियों की पहचान कुशल एवं अच्छे अधिकारियों के रूप में होने लगी. परन्तु समय के साथ राजन विभागीय प्रमोशन पाता गया. बाकी तीनों पीछे छूट गए.

लोगों के बीच में यह एक पहेली थी. आखिर राजन में क्या है, जो अन्य तीनों में नहीं.


ऐसे ही समय अधिकारी संघ के अध्यक्ष का आगमन हुआ. कई विषयों पर लोगों ने उनसे चर्चा की. एक अधिकारी ने राजन की त्वरित प्रोन्नति के बाबत भी पूछा. अघ्यक्ष ने जवाब दिया, ‘राजन साहब में जो योग्यता है वो आप लोगों में नहीं. जानते हैं, पिछले प्रमोशन से पूर्व साक्षात्कार के दौरान जब उनसे पूछा गया कि अगर उनसे कहा जाये कि पचास कर्मचारियों के खिलाफ बिना जांच के निलम्बन का आदेश देना हो तो वे क्या करेंगे ? जवाब में राजन साहब ने बिना संकोच के ऐसा करने की बात कही. बताइये, आप में से किसी और में ऐसी योग्यता है ?’

               और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

# लोकप्रिय  अखबार , 'हिन्दुस्तान' में 22 मई , 1997 को प्रकाशित 

Tuesday, December 15, 2015

लघु कथा : मतलब

                                                                                                - मिलन  सिन्हा 

रेलवे प्लेटफार्म के मैगेजीन स्टॉल पर एक पत्रिका उलट रहा था कि उसी समय पीठ पर किसी ने हल्की-सी धौल जमायी . मुड़कर देखा तो वह कुमार था , पुराना सहपाठी. हाथ में ब्रीफकेस लिए वह मुस्करा रहा था. ख़ुशी हुई उसे देखकर, उससे मिलकर. करीब पांच वर्षों के बाद हम मिले थे.

“यार, बिज़नेस के सिलसिले में यहाँ आना हुआ है – कुमार सिगरेट सुलगाते हुए बोला. दो दिन यहाँ रुकना पड़ेगा शायद.”

मैं उसे पकड़ कर घर ले आया. दफ्तर से दो दिनों की छुट्टी ले ली. दो दिन बड़ी व्यस्तता में बीत गए. कुमार के आवभगत में मैंने कोई किफायत नहीं की.

कुमार को विदा  करने मैं उसके साथ स्टेशन गया. ट्रेन आने में कुछ देर थी. मैं कुमार के लिए एक पत्रिका लाने गया. लौटा तो देखा कि कुमार अपने किसी परिचित से हंस-हंस कर बातें कर रहा था. लौटते हुए उसने मुझे नहीं देखा था. कुछ दूर पर खड़ा होकर मैं पत्रिका उलटने लगा, तभी मेरे कानों में आवाज गूंजी, “अरे यार, मत पूछो, बड़ा शानदार मुल्ला फंसा था. दो दिनों तक गुलछर्रे उड़ाते रहे. खूब बेवकूफ .....” यह कुमार बोल रहा था.

  
ट्रेन प्लेटफार्म पर आ चुकी थी. जगह खोजकर मैंने कुमार को बिठाया. विदा लेने से पहले कहा, “ कुमार फिर आना, जरुर आना.”

कुमार खामोश रहा, हैरत से मुझे केवल देखता रहा वह. 

         और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

# लोकप्रिय  अखबार , 'हिन्दुस्तान' में 17 अप्रैल, 1997 को प्रकाशित 

Thursday, August 29, 2013

कहानी : अपना घर

                                                           - मिलन सिन्हा
" अरे मोटू, किधर चला गया रे ?  इधर आ जल्दी " - राजमिस्त्री ने जोर से आवाज लगाई।

नन्द जी ने इधर- उधर नजर घुमाई। मजदूरों में कोई भी डील -डौल से मोटा नहीं कहा जा सकता था। फिर यह मिस्त्री मोटू कहकर किसको बुला रहा था।

" क्या है बे मिस्त्री, काहे गला फाड़ रहा था ? कोई दिल्ली- बम्बे नहीं गया था। जरा पानी पीने गया था " - एक औसत कद-काठी के मजदूर ने मिस्त्री को जवाब दिया। 

"अच्छा मोटू , भाषण खत्म हुआ न तेरा। अब  ईंट - मसाला  बढ़ा। जल्दी -जल्दी काम निबटाना है।  देख, कितनी कड़ी धूप है " - मिस्त्री ने मोटू से कहा।

मोटू ने धड़ाधड़ सब जुगाड़ मिस्त्री को दिया। काम तेजी से चलने लगा। वहाँ दो अन्य मजदूर भी काम कर रहे थे, लेकिन मोटू उनमें सबसे दक्ष एवं फुर्तीला था। दोनों मिस्त्री को जब-जब कोई कठिनाई होती, वे मोटू को आवाज देते। वे मोटू के साथ हंसी- मजाक भी करते। मोटू भी उनको बीच-बीच में छेड़ता एवं रह-रह कर खिलखिला कर हंसता। 


नन्द जी ख्यातिनाम इंजीनियर  थे। अनेक वर्षों से इस  पेशे में थे, परन्तु मोटू जैसा मजदूर उन्होंने अबतक नहीं देखा था। सो, मोटू के प्रति उनकी जिज्ञासा स्वाभाविक थी। आखिर उसका नाम मोटू क्यों पड़ा, वह कहाँ का रहनेवाला है, घर में उसके कौन-कौन है आदि।

पहली पाली का काम खत्म होने के बाद मोटू खाना खा कर लेटा हुआ था पेड़ की छाया में। नन्द जी के वहाँ पहुँचने पर वह हड़बड़ा कर उठ गया और दौड़ कर दो ईंट ले आया। उसपर अपना गमछा बिछा दिया एवं नन्द जी से बैठने का अनुरोध किया।नन्द जी के बैठ जाने पर वह भी पास में बैठ गया।नन्द जी ने उससे इधर-उधर की दो -चार बातें कीं, फिर पूछा की उसका नाम मोटू कैसे पड़ा।


मोटू ने बताया कि वह  बगल के जिले का रहनेवाला था। पहले वह बहुत मोटा - तगड़ा था। वह पहलवानी भी करता था। जो काम  दो मजदूर मिलकर करते, वही काम वह अकेला करता था। इसी सब कारण से ठेकेदार ने उसे मोटू कहकर बुलाना शुरू किया और फिर तब से उसे सभी मोटू कहकर ही बुलाते हैं। उसने  आगे बताया कि पहलेवाला  ठेकेदार उसे बहुत मानता था। शाम  को काम ख़त्म होने पर अपने साथ बिठाकर फोकट में शराब भी पिलाता था, कभी - कभी  खाना भी खिलाता था। 


 लेकिन, उसी   ठेकेदार के कारण ही उसकी आज यह दशा हुई थी, उसका तो जैसे सबकुछ नष्ट हो गया था - मोटू ने  भरे गले से कहा। 
     
'क्या नष्ट हो गया, तुम्हारा?' - नन्द जी ने मोटू से उत्सुकतावश पूछा।

मोटू  संजीदा हो गया। लगा अतीत में चला गया हो।  कहा, "बाबू , उस ठेकेदार ने मुझे शराब की ऐसी आदत लगा दी कि छूटती  ही नहीं। मैं अपनी आधा  ज्यादा मजदूरी शराब में ही  बर्वाद कर देता था।  अपने दो वक्त के खाने के लिए भी बाकी पैसा कम पड़ता तो अपने पत्नी और बेटे को कैसे खिलाता। मेरी पत्नी मुझे बहुत समझाती थी, पर मेरे सर पर तो शराब  भूत  सवार था। तंग  आकर मेरी पत्नी बेटे को लेकर अपने मायके चली गयी और फिर उसने कभी मेरी कोई खोज खबर नहीं ली। मेरा बेटा अब सात साल का हो गया  है, बाबू। " 

कुछ क्षण के लिए मोटू चुप हो गया, फिर कहने लगा,  "बाबू, जानते हैं, मैं सब काम कर सकता हूँ , मिस्त्री का काम भी। पर, अब मन नहीं करता, किसके लिए ज्यादा कमाऊं ?

"तुम क्या अब भी शराब पीते हो " - नन्द जी  ने सवाल किया।  

"हाँ, लेकिन अब कभी-कभी ही पीता हूँ। उसे भी अब छोड़ दूंगा।  एक बार अपनी पत्नी और बेटे से मिलना चाहता हूँ। उनके साथ रहना चाहता हूँ , उनके लिए अब जीना चाहता हूँ.......।"

विश्राम का समय ख़त्म हो गया। मोटू फिर अपने काम में लग गया।  उसके काम में अब अपेक्षाकृत ज्यादा फुर्ती थी। मन शायद थोड़ा हल्का हो गया था। 

यह ठेकेदार नन्द जी की बड़ी कद्र करता था। उन्होंने ठेकेदार से मोटू को  मिस्त्री के रूप में काम करवाने की सलाह दी। नन्द जी ने मोटू के लिए अपने घर के कुछ दूर  ही रहने की व्यवस्था कर दी। मोटू को अपने पुराने पैंट -शर्ट भी पहनने के लिए दिए जिससे कि लिबास से भी वह राज मिस्त्री लगे। नन्द जी ने मोटू के नाम से बैंक में एक बचत खाता खुलवा दिया एवं  उसके बढ़े हुए मजदूरी को जमा करवाने इंतजाम कर दिया। इस बीच मोटू ने शराब पीना बंद कर दिया। उसका स्वास्थ्य ठीक होने  लगा।  मोटू के चेहरे पर रौनक लौट आयी , शरीर पूर्ववत मांसल  हो गया। एक अच्छे मिस्त्री के रूप में उसकी चर्चा होने लगी। 

एक दिन सुबह -सुबह ठेकेदार नन्द जी के पास आया,  शिकायत की कि मोटू दो दिन से काम पर नहीं आया है। मोटू अपने कमरे में भी नहीं था।  नन्द जी बैंक गए तो मालूम हुआ कि मोटू ने अपने खाते से दो  दिन पहले मोटी रकम निकाली है। नन्द जी और ठेकेदार दोनों चिंता में पड़े। मोटू के इस तरह बिना कुछ बताये चले जाने पर उन्हें अंदर -ही -अंदर गुस्सा भी आ रहा था. परन्तु वे करते तो क्या करते।  

सुबह- सुबह  नन्द जी दरवाजे पर जोर - जोर से दस्तक  हुई।  वे हड़बड़ा कर उठे। सोचा कि इस वक्त कौन इस तरह दस्तक दे रहा है। दरवाजा खोला तो एक के बाद एक तीन लोगों ने उनका चरण स्पर्श किया। नन्द जी के सामने मोटू , उसकी पत्नी एवं उसका लड़का तीनों कृतज्ञ भाव से खड़े थे। 

नन्द जी की आँखें ख़ुशी से छलछला गई।  दूसरों का घर बनाते -बनाते मोटू को अपना घर जो मिल गया था। 

              और भी बातें करेंगे, चलते-चलते असीम शुभकामनाएं

प्रवासी दुनिया .कॉम पर प्रकाशित, दिनांक :04.09.2013

Tuesday, June 4, 2013

लघु कथा : उदासी

                                     - मिलन सिन्हा 

      जहाँ  उसका कामकाज चल रहा था, उस इलाके में बाढ़ की संभावना बराबर बनी रहती थी। बाढ़  से अब तक न जाने कितने घर तबाह हो चुके थे। वह इसी इलाके में बाढ़ की रोकथाम हेतु कांट्रेक्ट लेता रहा था। इस बार भी उसे ऐसा ही  कांट्रेक्ट  मिला हुआ था। 

     कई वर्ष बाद उससे मेरी भेंट  हुई  थी। संक्षेप  में हाल - चाल का आदान - प्रदान हुआ। छूटते ही मैंने पूछा, 'आजकल काम-धाम  कैसा चल रहा है? '

     उसके  चेहरे पर अचानक उदासी उतर आई, कहा, 'अरे यार,  काम -धाम की क्या पूछते हो ! इस वर्ष तो मैं मारा  गया। बाढ़ तो इस बार आई ही नहीं !'

    आगे और कुछ  मैं न पूछ  सका। 


 # 'प्रभात खबर' में 02.06.2013 को प्रकाशित  

                 और भी बातें करेंगे, चलते चलते। असीम शुभकामनाएं। 

Saturday, May 11, 2013

लघु कथा : साक्षात्कार

                                         - मिलन सिन्हा 

        'मामा जी , साक्षात्कार से पहले  अगर आप कौल साहब से जरा कह दें तो मेरी नौकरी हो ही जायेगी। मुझे मालूम है कि वे आपके अच्छे मित्र हैं। वे आपकी बात कभी नहीं काटेंगे। कुछ रुक कर उसने फिर कहा, मुझे लिखित परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त हुए हैं, मैंने पता कर  लिया है। पर, साक्षात्कार में बिना  सिफारिश के ....'

      मामा जी कुछ देर तक चुप रहे। फिर, धीरे से बोले, ' अच्छा, एक बात बताओ।  अगर कोई जीवन भर भीख की कमाई खाये , तो तुम्हे कैसा लगेगा ?

     'नहीं, मैं यह हरगिज नहीं चाहूँगा कि किसी को ऐसा दिन भी देखना पड़े' - उसने दृढ़ता के साथ कहा। 

     'तो फिर जाओ। नौकरी कभी भीख में मत लो ' - कह कर मामा जी अन्दर चले गए !


 # 'प्रभात खबर' में 02.06.2013 को प्रकाशित  

                      और भी बातें करेंगे, चलते चलते। असीम शुभकामनाएं।