Tuesday, November 8, 2016

लघु कथा : मनीआर्डर

                                                                                          - मिलन सिन्हा
Image result for free photo of indian postmanडाकिया आज बहुत खुश था. आज पहली बार पंडित जी के नाम पांच हजार रूपये का मनीआर्डर जो आया था. उसे बख्शीश मिलने की पूरी उम्मीद थी.

डाकिया ने पंडित जी को आवाज दी और उन्हें खुश–खबरी से अवगत कराया. पंडित जी ने बड़े गर्व से डाकिया को बताया कि यह मनीआर्डर उनके लड़के ने उन्हें दिल्ली से भेजा है जहाँ उसे हाल ही में एक शानदार नौकरी मिली है.

मनीआर्डर की राशि प्राप्त करने के बाद पंडित जी ने डाकिया को अपेक्षित बख्शीश दिया. डाकिया खुश हो गया. पंडित जी के कहने पर उसने यह खबर मोहल्ले के कई लोगों को दी. पंडित जी ने भी इधर अपने हर पहचानवालों से अपने लड़के के सदगुणों की खूब चर्चा की, उसके शानदार नौकरी और मनीआर्डर वाली बात विशेष तौर पर बताई.

डाकिया अगले महीने फिर मनीआर्डर देने आया और बख्शीश लेकर लौटा.

पंडित जी एवं उनके लड़के की चर्चा उनके अपने स्वजनों –स्वजातीय लोगों में जोर-शोर से होने लगी. लडकी वाले शादी के लिए पंडित जी के घर आने लगे.

जल्दी ही पंडित जी के लड़के की शादी बड़े धूमधाम से संपन्न हो गयी. पंडित जी की पुत्रवधू देखने में सुन्दर तो थी ही, पंडित जी की मांग एवं अपेक्षा से कहीं अधिक दहेज़ भी लायी थी.

डाकिया को पंडित जी से मनीआर्डर की बख्शीश पाने की एक आदत-सी लग चुकी थी. शादी के लगभग पन्द्रह दिनों के बाद जब उसने पंडित जी के लड़के को वहीं देखा तो बरबस पूछ बैठा, आप अब तक दिल्ली नहीं गये? कब जायेंगे ? लड़के ने पहले तो टालने की कोशिश की, पर जोर डालने पर यह कहते हुए चले  गये कि अब दिल्ली जाने की कोई जल्दी नहीं है. डाकिया को बात जंची नहीं. उसने इधर –उधर पूछताछ की तो पंडित जी के लड़के के एक अभिन्न मित्र ने बताया कि वह तो दिल्ली में नौकरी के तलाश में छः –आठ महीने भटका, नौकरी नहीं मिली सो लौट आया. 

तो फिर वह मासिक पांच हजार रुपये का मनीआर्डर ?

हुआ ऐसा कि लड़के को दिल्ली भेजने के बाद पंडित जी हर महीने के अंत में पांच–छह हजार रूपये उसे भेज देते. उसी राशि में से उनका लड़का अगले महीने के आरम्भ में पंडित जी को मनीआर्डर से पांच हजार रुपये भेज देता. चार –छह महीने के मनीआर्डर के इस आवाजाही से शादी के बाजार में पंडित जी के लड़के की अच्छी बोली लग गयी. सो दिल्ली की यात्रा रुक गयी. और कोई बात नहीं ! 
                    
                    और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

(लोकप्रिय अखबार 'हिन्दुस्तान' में 4 दिसम्बर ,1997 को प्रकाशित)

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