Friday, January 20, 2017

यात्रा के रंग : अब भुवनेश्वर की ओर - 1

                                                                                    - मिलन सिन्हा 
सुबह सात बजे ही निकल पड़े हम पुरी से ओड़िशा या उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर की ओर जिससे भुवनेश्वर तथा उसके आसपास अवस्थित कुछेक पर्यटन स्थलों को देखने एवं उनके विषय में अपना ज्ञानवर्धन करने का मौका मिल सके. धूप खिल चुकी है. मौसम खुशनुमा है ...

पुरी शहर से निकल कर भुवनेश्वर मार्ग पर आने के लिए हम एक पुराने पुल से गुजरते हैं. कार चालाक ने बताया कि  इस पुराने पुल के साथ अब अब एक नया पुल भी बन गया है, पर नाम वही पुराना ही है -  ‘अट्ठारह पाया पुल’.

पुरी –भुवनेश्वर सिक्स लेन सड़क पर चलते हुए हमें आसपास धान के खेत, नारियल के हजारों कतारबद्ध पेड़, कच्चे-पक्के छोटे मकान, मुर्गी-बत्तक, गाय, बकरी, पोखर आदि के साथ-साथ सामन्य देहाती लिबास में औरत, मर्द और बच्चे दिखाई पड़े. सड़क किनारे छोटे चाय दुकानों में या उसके आसपास नारियल पानी यानी डाब सुलभ था.  ताजे और सस्ते. नारियल पानी पीकर एवं उसका मलाई खाकर हमलोग आगे बढे. 

पुरी से भुवनेश्वर के बीच की करीब 60 किलोमीटर की दूरी एक्सप्रेस मार्ग से करीब 75-80 मिनट में आराम से तय की गई. कहना न होगा कि भुवनेश्वर शहर में प्रवेश करते ही हमें यह महसूस होने लगा कि हम पौराणिकता एवं आधुनिकता को समेटे एक बेहतर व विकसित स्थान में भ्रमण  का आनंद  ले पायेंगे.

कुछ ही देर में हम उदयगिरि तथा खंडगिरि गुफाओं के पास थे, जो ऐतिहासिक एवं  धार्मिक रूप से भी महत्वपूर्ण माने जाते हैं. दिलचस्प तथ्य यह है कि सड़क के एक ओर खंडगिरि पर्यटन स्थल है तो दूसरे तरफ उदयगिरि. दोनों के बीच करीब 60-70 फीट की दूरी है. ये दोनों पर्वत गुफाएं भुवनेश्वर शहर के उत्तर-पश्चिमी भाग में है. खंडगिरि पर्वत गुफा की ऊंचाई 133 फीट है, तो उदयगिरि की 110 फीट. उदयगिरि में कुल 44 गुफाएं हैं, जब कि खंडगिरि में 19 गुफाएं. कहा जाता है कि इनमें से  कुछ गुफाएं प्राकृतिक हैं. तो कुछ कृत्रिम रूप से निर्मित. दोनों ही पर्वत गुफाओं के आसपास हजारों छोटे- बड़े पेड़ इनकी खूबसूरती बढ़ाते हैं. आइये देखें दोनों पर्वत गुफाओं के ये फोटो :

खंड गिरि पर चढ़ने- उतरने की व्यवस्था बेहतर है. बच्चों, युवाओं  और  बुजुर्गों को भी पर्वत के शिखर पर चढ़ते और उस स्थान का आनंद लेते देखा जा सकता है. उदय गिरि गुफाओं को देखने के लिए कुछ दूर तक आप सीढ़ियों से चढ़ कर अच्छी तरह ऊपर जा सकते हैं, किन्तु बाकी की चढ़ाई पत्थर की बेतरतीब सीढ़ियों से संभल-संभल कर. उदय गिरि के शिखर पर एक सफ़ेद खूबसूरत दिगम्बर जैन मंदिर  है, जो दूर से ही दिखाई पड़ता है. इस मंदिर के परिसर से भुवनेश्वर शहर का एक विहंगम दृश्य आप देख सकते हैं. 

उदय गिरि पर्वत गुफाओं को देखने के क्रम में आपको कुछेक मिनट तो बंदरों के साथ गुजारना ही पड़ेगा, जो आपके लिए एक सुखद अनुभव होगा. ये बंदर – छोटे-बड़े सभी, आपके साथ कमोबेश शालीनता से ही पेश आयेंगे, अगर आप भी उनके साथ मानवोचित व्यवहार करें. आप उन्हें उपहार स्वरुप खाने के लिए बादाम के दो-चार छोटे पैकेट प्रेम से भेंट करें – उन्हें अच्छा लगेगा और यकीनन आपको भी. 

हाँ, इसी क्रम में हमें उनके बीच के आत्मीय रिश्ते के कई दुर्लभ दृश्य अपने मोबाइल कैमरे में कैद करने का अवसर मिल गया, जिसमे एक वयस्क बंदर दूसरे के शरीर में से ढील यानी जुएँ बीनते दिखता है, तो एक दूसरे दृश्य में माता बंदर अपने छोटे से बच्चे को अपनी गोद में सुरक्षित दूध पिलाते हुए. कुछ ऐसे ही आत्मीय दृश्य हमें हमारे कई प्रदेशों के ग्रामीण इलाकों में दोपहर बाद अनायास ही दिख जायेंगे, बेशक कई फर्क के साथ.


यहाँ हमने कई युवक –युवतियों के अलावे कई बुजुर्गों को बंदर एवं उनके परिजनों  के साथ  सेल्फी लेते भी देखा. अपने पूर्वजों की मौजूदा पीढ़ी के साथ दिखने –दिखाने का अभिनव दृश्य !
 (hellomilansinha@gmail.com)

               और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 

Monday, January 9, 2017

लघु कथा : नसीहत

                                                     - मिलन  सिन्हा 
जिस वक्त जगत रेलवे टिकट खिड़की पर पहुंचा, वहां काफी भीड़ थी. उसके ट्रेन का समय हो चला था. वह लाइन में खड़ा हो गया. दस–पन्द्रह मिनट गुजर गये, परन्तु अब भी टिकट खिड़की पर उसके आगे एक यात्री  टिकट लेने के लिए खड़ा था.

प्लेटफार्म पर गाड़ी आ गई. वह विचलित हो उठा. टिकट के लिए उसने रूपये दिये. टिकट बाबू ने रूपये ले लिये और टिकट घर के भीतर ही अपने एक मित्र से बातचीत में लग गये. जगत ने टोका, ‘टिकट दीजिए, गाड़ी आ गयी है.’ टिकट बाबू ने उत्तर नहीं दिया. बातचीत में लगे रहे. जगत को जब टिकट मिला, गाड़ी ने सीटी दी. जगत दौड़ा. प्लेटफार्म पर पहुंचा तो गाड़ी सरक रही थी. वह लपक कर सामने के डब्बे में चढ़ गया.

डिब्बे के अंदर पहुंच कर जगत ने गहरी सांस ली और बैठने के लिए तत्पर हुआ. दिन का समय था, लेकिन बैठने के स्थान पर भी लोग सोये हुए थे. जगत एक सीट पर सोये एक यात्री के पांव के पास थोड़ी-सी जगह पर बैठ गया और आंखें बंद कर सोचने लगा कि अगर चलती गाड़ी में चढ़ते हुए कोई दुर्घटना हो जाती तो क्या होता ?

टिकट–टिकट की आवाज सुनकर उसने आंखें खोली तो सामने टी.टी बाबू  को खड़ा पाया. जगत ने झट अपना टिकट निकाल कर दिखाया. टिकट देखते ही  टी.टी बाबू  वहां बैठ गये. काली कोट के जेब से रसीद बुक निकालने का उपक्रम करते हुए कहा, ‘निकालिये एक सौ पचपन रुपये.’ जगत ने विस्मय से कारण जानना चाहा तो टी.टी बाबू   ने झल्लाते हुए बताया, ‘एक तो बिना पूछे, बिना आरक्षण के स्लीपर कोच में सामान्य टिकट लेकर चढ़ गये, फिर सवाल –जवाब भी करते हैं. स्लीपर कोच का भाड़ा एवं फाइन मिलाकर हुआ एक सौ पचपन रुपये.’

जगत ने टी.टी बाबू को समझाने की कोशिश की कि किस परिस्थिति में वह उस डिब्बे में चढ़ा. फिर उसके पास उतने पैसे थे भी नहीं.

टी.टी बाबू  ने उसकी बातें अनसुनी करते हुए कहा कि ऐसे बहाने वे अनेक सुन चुके हैं. टी.टी बाबू  आगे कुछ और कहते, इसी बीच  एक अन्य यात्री ने टी.टी बाबू से कहा, ‘सर, जरा मेरा मामला देख लें. आपके भरोसे ही यात्रा कर रहे हैं हम. चार दिन पूर्व भी इसी ट्रेन में आपके साथ ही गये थे, याद है न सर.’

टी.टी बाबू  ने उस यात्री को देखा, मुस्कराया और फिर उनके टिकट पर एक नजर डाली. तत्पश्चात धीरे से उनसे सौ रूपये मांगे. उस यात्री ने झट सत्तर रूपये टी.टी बाबू  को दिये और धीरे से कहा, सर, इतना ही लिया था आपने पिछले दफे.’

टी.टी बाबू  ने चुपचाप सत्तर रूपये कोट के भीतर वाली जेब में रख लिये और उस व्यक्ति को एक बर्थ  सोने के लिए दे दिया. अच्छी तरह आश्वस्त भी किया उन्हें हर संभावित परेशानी के प्रति.

अगला स्टेशन आ चुका था. टी.टी बाबू  ने जगत को हाथ पकड़ कर डिब्बे से नीचे उतार दिया और यह नसीहत भी दी, ‘देखिए, या तो सही टिकट लेकर चलिए या फिर मेरे भरोसे. हां, मेरे भरोसे चलेंगे तो सोकर आराम से चलेंगे.’
                                                            (hellomilansinha@gmail.com)

                  और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 

# लोकप्रिय अखबार 'हिन्दुस्तान' में 11 दिसम्बर ,1997 को प्रकाशित 

Friday, January 6, 2017

यात्रा के रंग : अब पुरी में -1

                                                                                             - मिलन सिन्हा 
पुरी रेलवे प्लेटफॉर्म से ही ऑटोवाले हमें हमारे रुकने के स्थान तक पहुँचाने के लिए तत्पर दिखे. एक–दो तो निकास द्वार तक आ गए – रेट वगैरह में कमीवेशी के बदलते ऑफर के साथ. बाहर निकला तो और अच्छा लगा. स्टेशन परिसर बहुत बड़ा और अपेक्षाकृत व्यवस्थित एवं साफ़–सुथरा. कुछ और सोचता, तबतक दो-एक रिक्शेवाले ने भी साथ चलने का आग्रह किया. एक क्षण तो ऐसा लगा कि हमें होटल तक पहुंचाने के चक्कर में रिक्शेवाले और ऑटोवाले के बीच झगड़ा न हो जाए. खैर, बात वहां तक पहुंचने से पहले ही ऑटोवाले को दूसरा सवारी मिल गया और वह उधर लपका. हमें भी दूसरा ऑटोवाला मिल गया. इस सबके बीच मेहनत करके अपना पेट पालने को तत्पर कई लोगों से हमें फिर दो-चार होने का मौका मिला; अपने देश में कितनी बेरोजगारी है, इसका प्रमाण भी.

पुरी स्टेशन से निकलकर होटल के रास्ते हम बढ़ चले. इसी क्रम में पुरी का आकाशवाणी केन्द्र दिखा और दिखा राजभवन परिसर एवं दो सरकारी गेस्ट हाउस. ऑटोवाले ने बताया कि ये सभी परिसर समुद्र तट पर स्थित हैं. ज्ञातव्य है कि 'पुरी अर्थात पुरुषोत्तम पुरी अर्थात जगन्नाथ पुरी' ओड़िशा का एक छोटा शहर है; जिला मुख्यालय भी है. ओड़िशा की राजधानी भुवनेश्वर से यह ऐतिहासिक शहर करीब 60 किलोमीटर दक्षिण में बंगाल की खाड़ी के समुद्र किनारे अवस्थित है. कई कारणों से पुरी पूरे देशभर के पर्यटकों के लिए बेहद पसंदीदा स्थल रहा है – बारहवीं शताब्दी में बना विश्व विख्यात जगन्नाथ मंदिर, दूर तक फैला खूबसूरत समुद्र तट, वहां के आतिथ्य पसंद लोग के साथ-साथ  रहने एवं खाने-पीने की बेहतर एवं अपेक्षाकृत सस्ती व्यवस्था.

कुछ ही मिनटों में हम समुद्र तट से सटे मार्ग पर थे. पुरी के समुद्र की बात ही कुछ अलग है. साफ़ पानी, दूर तक फैला समुद्र और उसके साफ़ –सुथरे तट. सागर तट पर खाने-पीने की चीजें तो बिक ही रहे थे, साथ में बिक रहे थे मोतियों के हार, भगवान जगन्नाथ, बलराम एवं देवी सुभद्रा के तरह-तरह के आकर्षक फोटो आदि. तट पर सफाई व्यवस्था चाक-चौबंद दिखी. 

समुद्र में स्नान करनेवाले हर उम्र के लोग आपको यहाँ मिल जायेंगे –पूरे उत्साह, उर्जा और उमंग से लबरेज. सागर तट पर ऐसे सैकड़ों लोग भी मिलेंगे जो घंटों रंग-बिरंगे छतरियों के नीचे कुर्सी या रेत पर बैठे  चाय, कॉफ़ी, कोल्ड ड्रिंक, डाब आदि का सेवन करते और समुद्र की लहरों का आनन्द लेते रहते हैं. शायद  उनके यहाँ  आने एवं आनंद के सागर में डुबकी लगाने के पीछे छुपी प्रेरणा-भावना को स्वर देने के लिए  पास ही में एक  झालमूढ़ी बेचने वाले के मोबाइल (एफएम ) पर यह गाना बज रहा था,  'दिल ढूंढ़ता है फिर वही फुर्सत के रात-दिन ....'

कहने की जरुरत नहीं कि सुबह और शाम के वक्त सागर तट पर भीड़ ज्यादा होती है और चहल -पहल  भी . 


स्नानादि करते वक्त कोई दुर्घटना न हो जाए, इसके लिए इहतियाती   इंतजाम के तहत समुद्र तट के पास ही विभिन्न स्थानों पर गोताखोर तथा सुरक्षाकर्मी मौजूद दिखे. साथ ही दिखे, रेत पर अपनी कला का प्रदर्शन करते कई आर्टिस्ट. दिलचस्प बात यह कि ये कलाकार रेत अर्थात बालू पर कई घंटों के मेहनत से किसी कलाकृति का निर्माण करते हैं, जो महज कुछ घंटों तक ही प्रदर्शित हो पाता है. कारण तो आप समझ ही रहे हैं, क्यों?  
                       (hellomilansinha@gmail.com)

                  और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं