Monday, January 9, 2017

लघु कथा : नसीहत

                                                     - मिलन  सिन्हा 
जिस वक्त जगत रेलवे टिकट खिड़की पर पहुंचा, वहां काफी भीड़ थी. उसके ट्रेन का समय हो चला था. वह लाइन में खड़ा हो गया. दस–पन्द्रह मिनट गुजर गये, परन्तु अब भी टिकट खिड़की पर उसके आगे एक यात्री  टिकट लेने के लिए खड़ा था.

प्लेटफार्म पर गाड़ी आ गई. वह विचलित हो उठा. टिकट के लिए उसने रूपये दिये. टिकट बाबू ने रूपये ले लिये और टिकट घर के भीतर ही अपने एक मित्र से बातचीत में लग गये. जगत ने टोका, ‘टिकट दीजिए, गाड़ी आ गयी है.’ टिकट बाबू ने उत्तर नहीं दिया. बातचीत में लगे रहे. जगत को जब टिकट मिला, गाड़ी ने सीटी दी. जगत दौड़ा. प्लेटफार्म पर पहुंचा तो गाड़ी सरक रही थी. वह लपक कर सामने के डब्बे में चढ़ गया.

डिब्बे के अंदर पहुंच कर जगत ने गहरी सांस ली और बैठने के लिए तत्पर हुआ. दिन का समय था, लेकिन बैठने के स्थान पर भी लोग सोये हुए थे. जगत एक सीट पर सोये एक यात्री के पांव के पास थोड़ी-सी जगह पर बैठ गया और आंखें बंद कर सोचने लगा कि अगर चलती गाड़ी में चढ़ते हुए कोई दुर्घटना हो जाती तो क्या होता ?

टिकट–टिकट की आवाज सुनकर उसने आंखें खोली तो सामने टी.टी बाबू  को खड़ा पाया. जगत ने झट अपना टिकट निकाल कर दिखाया. टिकट देखते ही  टी.टी बाबू  वहां बैठ गये. काली कोट के जेब से रसीद बुक निकालने का उपक्रम करते हुए कहा, ‘निकालिये एक सौ पचपन रुपये.’ जगत ने विस्मय से कारण जानना चाहा तो टी.टी बाबू   ने झल्लाते हुए बताया, ‘एक तो बिना पूछे, बिना आरक्षण के स्लीपर कोच में सामान्य टिकट लेकर चढ़ गये, फिर सवाल –जवाब भी करते हैं. स्लीपर कोच का भाड़ा एवं फाइन मिलाकर हुआ एक सौ पचपन रुपये.’

जगत ने टी.टी बाबू को समझाने की कोशिश की कि किस परिस्थिति में वह उस डिब्बे में चढ़ा. फिर उसके पास उतने पैसे थे भी नहीं.

टी.टी बाबू  ने उसकी बातें अनसुनी करते हुए कहा कि ऐसे बहाने वे अनेक सुन चुके हैं. टी.टी बाबू  आगे कुछ और कहते, इसी बीच  एक अन्य यात्री ने टी.टी बाबू से कहा, ‘सर, जरा मेरा मामला देख लें. आपके भरोसे ही यात्रा कर रहे हैं हम. चार दिन पूर्व भी इसी ट्रेन में आपके साथ ही गये थे, याद है न सर.’

टी.टी बाबू  ने उस यात्री को देखा, मुस्कराया और फिर उनके टिकट पर एक नजर डाली. तत्पश्चात धीरे से उनसे सौ रूपये मांगे. उस यात्री ने झट सत्तर रूपये टी.टी बाबू  को दिये और धीरे से कहा, सर, इतना ही लिया था आपने पिछले दफे.’

टी.टी बाबू  ने चुपचाप सत्तर रूपये कोट के भीतर वाली जेब में रख लिये और उस व्यक्ति को एक बर्थ  सोने के लिए दे दिया. अच्छी तरह आश्वस्त भी किया उन्हें हर संभावित परेशानी के प्रति.

अगला स्टेशन आ चुका था. टी.टी बाबू  ने जगत को हाथ पकड़ कर डिब्बे से नीचे उतार दिया और यह नसीहत भी दी, ‘देखिए, या तो सही टिकट लेकर चलिए या फिर मेरे भरोसे. हां, मेरे भरोसे चलेंगे तो सोकर आराम से चलेंगे.’
                                                            (hellomilansinha@gmail.com)

                  और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 

# लोकप्रिय अखबार 'हिन्दुस्तान' में 11 दिसम्बर ,1997 को प्रकाशित 

Friday, January 6, 2017

यात्रा के रंग : अब पुरी में -1

                                                                                             - मिलन सिन्हा 

ट्रेन नियत समय के आसपास ही पुरी के तीन नंबर प्लेटफॉर्म पर आ कर रुक गई. कई प्लेटफार्मों वाला पुरी रेलवे स्टेशन साफ़-सुथरा था.  इस दिशा का अंतिम स्टेशन होने के कारण डिब्बे खाली होने लगे और प्लेटफॉर्म पर यात्रियों का बहिर्गमन. आबोहवा में आद्रता की अनुभूति होने लगी. ट्रेन में हमारा डिब्बा पीछे होने के कारण निकास द्वार तक काफी चलना पड़ा, अपना-अपना ट्राली सूटकेस लेकर. ट्रेन के सहयात्रियों के साथ-साथ कुछ दूर तक ही सही, चलना अच्छा लगा. जाति, धर्म, भाषा, जिला-प्रदेश, गरीब-अमीर आदि भावनाओं से इतर सिर्फ मानवता का भाव लिए सभी इस यात्रा के अंत में अपने-अपने  गंतव्य की ओर अग्रसर थे. 

प्लेटफॉर्म से ही ऑटोवाले हमें हमारे रुकने के स्थान तक पहुँचाने के लिए तत्पर दिखे. एक–दो तो निकास द्वार तक आ गए – रेट वगैरह में कमीवेशी के बदलते ऑफर के साथ. बाहर निकला तो और अच्छा लगा. स्टेशन परिसर बहुत बड़ा और अपेक्षाकृत व्यवस्थित एवं साफ़–सुथरा. कुछ और सोचता, तबतक दो-एक रिक्शेवाले ने भी साथ चलने का आग्रह किया. एक क्षण तो ऐसा लगा कि हमें होटल तक पहुंचाने के चक्कर में रिक्शेवाले और ऑटोवाले के बीच झगड़ा न हो जाए. खैर, बात वहां तक पहुंचने से पहले ही ऑटोवाले को दूसरी सवारी मिल गयी और वह उधर लपका. हमें भी दूसरा ऑटोवाला मिल गया. इस सबके बीच मेहनत करके अपना पेट पालने को तत्पर कई लोगों से हमें फिर दो-चार होने का मौका मिला; अपने देश में कितनी बेरोजगारी है, इसका प्रमाण भी.

पुरी स्टेशन से निकलकर होटल के रास्ते हम बढ़ चले. इसी क्रम में पुरी का आकाशवाणी केन्द्र दिखा. इसी रास्ते में  दिखा राजभवन का पुरी परिसर एवं दो सरकारी गेस्ट हाउस. ऑटोवाले ने बताया कि ये सभी बड़े परिसर समुद्र तट पर स्थित हैं. तुरत यह ख्याल आया कि ब्रिटिश राज ख़त्म होने के सात दशक बाद भी जनता के प्रतिनिधि के रूप में उच्च पदों पर कार्यरत लोगों के लिए हर बड़े शहर में एक अलग आलीशान व सुसज्जित परिसर की जरुरत क्यों है ? लोकतंत्र में ऐसे आडम्बर और विलासिता के प्रतीक जिनके रख-रखाव पर हर साल आम जनता के टैक्स का लाखों का खर्च होता है, के स्थान पर करोड़ों गरीब-वंचितों के मुफ्त इलाज के लिए एक अच्छा अस्पताल खोला जा सकता है, अनाथ और अशक्त बच्चों के मुफ्त शिक्षा के लिए एक अच्छा स्कूल खोला जा सकता है या फिर जन कल्याण के ऐसे ही कई अन्य काम किये जा सकते हैं. इसी सोच-विचार में न जाने कब हम पुरी में समुद्र तट के निकट अवस्थित अपने होटल के पास पहुंच गए. 

होटल की सीढ़ियां चढ़ते हुए सोच रहा था कि ऐसी किसी भी यात्रा के दौरान अनायास ही हम-आप आशा-अपेक्षा, करुणा-प्रेरणा, हास-परिहास, सीखने-बताने, देखने-दिखाने, सोचने-विचारने सहित जीवन के  विविध रंग-बिरंगे अनुभवों-अनुभूतियों  से हो कर गुजरते रहते हैं. जीवन को जीवंत और समाजोपयोगी बनाए रखने में इसकी बड़ी भूमिका भी तो होती है!      .... ....आगे जारी 
                                        (hellomilansinha@gmail.com) 
          और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं ।   

Wednesday, January 4, 2017

यात्रा के रंग : अब पुरी की ओर -3

                                                                                                - मिलन सिन्हा  
सुबह जब नींद खुली तो ट्रेन एक छोटे से स्टेशन पर खड़ी थी. नाम था – साक्षी गोपाल.  वहाँ से पुरी की दूरी करीब 20 किलोमीटर थी. यह स्थान एक धार्मिक प्रसंग से जुड़ा है, ऐसा लोग कहते हैं. कथा कुछ ऐसी है : एक बार श्री कृष्ण अर्थात गोपाल दो ब्राह्मणों के बीच एक विवाद के निबटारे के सिलसिले में गवाह यानी साक्षी के रूप में यहाँ आये थे और इस स्थान की प्राकृतिक सुन्दरता से प्रभावित होकर कुछ दिनों तक रुके थे. कहने का तात्पर्य यह कि साक्षी देने के लिए गोपाल यहाँ आये थे, लिहाजा यह स्थान साक्षी गोपाल के नाम से जाना जाता है. स्टेशन से करीब एक किलोमीटर दूर मुख्य मंदिर है जहाँ श्री गोपाल की मूर्ति स्थापित है. इस स्थान को सत्यवादीपुर के नाम से भी जाना जाता है.

खैर, स्टेशन पर चाय, समोसा, चनाचूर आदि के स्थान पर सुबह-सुबह डाब अर्थात नारियल पानी बेचते कई लोग दिखे, वह भी बिलकुल ताजा और सस्ता भी. बहुत अच्छा लगा. शायद आप जानना चाहें, आखिर क्यों? तो बताते चलें कि स्वास्थ्य की दृष्टि से डाब एक बेहतर प्राकृतिक पेय है. इसमें काफी  मात्रा  में विटामिन - सी, मैग्नीशियम, पौटेशियम और दूसरे महत्वपूर्ण खनिज होते हैं. माना जाता है कि सुबह - सुबह नारियल पानी पीना ज्यादा फायदेमंद होता है. यह हमारे पाचन तंत्र को ठीक रखने,  रक्त चाप को नियंत्रित करने और सिरदर्द एवं माइग्रेन को कम  करने के साथ –साथ  हमारी अन्य कई शारीरिक समस्याओं में लाभकारी  सिद्ध  होता है. इसमें अपेक्षाकृत कम शूगर एवं फैट होने के कारण इसे  एक उपयुक्त  एनर्जी और स्पोर्ट्स ड्रिंक भी  माना जाता है.

ट्रेन आगे बढ़ी तो रेलवे लाइन के दोनों ओर दूर तक नारियल के पेड़ दिखते रहे, पूरे फलदार. सागर तट निकट आने का एहसास भी होता गया. हम पुरी पहुंचने को थे. पुरी अर्थात पुरुषोत्तम पुरी अर्थात जगन्नाथ पुरी ओड़िशा का एक छोटा शहर है; जिला मुख्यालय भी है. इसी जिले में विश्व प्रसिद्ध ‘कोणार्क मंदिर’ और ‘चिल्का लेक’ भी है. 
जिले में करीब आधा दर्जन मौसमी नदियों का जाल बिछा है. ये सभी मुख्यतः महानदी की शाखाएं हैं.  पुरी शहर की आबादी करीब तीन लाख है. धान यहाँ का मुख्य फसल है. ज्यादातर लोग छोटे व्यवसाय और कृषि से जुड़े हैं. ओड़िशा की राजधानी भुवनेश्वर से यह ऐतिहासिक शहर करीब 60 किलोमीटर दक्षिण में बंगाल की खाड़ी के समुद्र किनारे अवस्थित है. कई कारणों से पुरी पूरे देशभर के पर्यटकों के लिए बेहद पसंदीदा स्थल रहा है – बारहवीं शताब्दी में बना विश्व विख्यात जगन्नाथ मंदिर, दूर तक फैला खूबसूरत समुद्र तट, वहां के आतिथ्य पसंद लोग के साथ-साथ  रहने एवं खाने-पीने की बेहतर एवं अपेक्षाकृत सस्ती व्यवस्था. निश्चित ही ये सब भी अहम कारण होंगे कि रोजाना यहाँ औसतन 50 हजार पर्यटक आते हैं.

                   और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं