Friday, January 6, 2017

यात्रा के रंग : अब पुरी में -1

                                                                                             - मिलन सिन्हा 
पुरी रेलवे प्लेटफॉर्म से ही ऑटोवाले हमें हमारे रुकने के स्थान तक पहुँचाने के लिए तत्पर दिखे. एक–दो तो निकास द्वार तक आ गए – रेट वगैरह में कमीवेशी के बदलते ऑफर के साथ. बाहर निकला तो और अच्छा लगा. स्टेशन परिसर बहुत बड़ा और अपेक्षाकृत व्यवस्थित एवं साफ़–सुथरा. कुछ और सोचता, तबतक दो-एक रिक्शेवाले ने भी साथ चलने का आग्रह किया. एक क्षण तो ऐसा लगा कि हमें होटल तक पहुंचाने के चक्कर में रिक्शेवाले और ऑटोवाले के बीच झगड़ा न हो जाए. खैर, बात वहां तक पहुंचने से पहले ही ऑटोवाले को दूसरा सवारी मिल गया और वह उधर लपका. हमें भी दूसरा ऑटोवाला मिल गया. इस सबके बीच मेहनत करके अपना पेट पालने को तत्पर कई लोगों से हमें फिर दो-चार होने का मौका मिला; अपने देश में कितनी बेरोजगारी है, इसका प्रमाण भी.

पुरी स्टेशन से निकलकर होटल के रास्ते हम बढ़ चले. इसी क्रम में पुरी का आकाशवाणी केन्द्र दिखा और दिखा राजभवन परिसर एवं दो सरकारी गेस्ट हाउस. ऑटोवाले ने बताया कि ये सभी परिसर समुद्र तट पर स्थित हैं. ज्ञातव्य है कि 'पुरी अर्थात पुरुषोत्तम पुरी अर्थात जगन्नाथ पुरी' ओड़िशा का एक छोटा शहर है; जिला मुख्यालय भी है. ओड़िशा की राजधानी भुवनेश्वर से यह ऐतिहासिक शहर करीब 60 किलोमीटर दक्षिण में बंगाल की खाड़ी के समुद्र किनारे अवस्थित है. कई कारणों से पुरी पूरे देशभर के पर्यटकों के लिए बेहद पसंदीदा स्थल रहा है – बारहवीं शताब्दी में बना विश्व विख्यात जगन्नाथ मंदिर, दूर तक फैला खूबसूरत समुद्र तट, वहां के आतिथ्य पसंद लोग के साथ-साथ  रहने एवं खाने-पीने की बेहतर एवं अपेक्षाकृत सस्ती व्यवस्था.

कुछ ही मिनटों में हम समुद्र तट से सटे मार्ग पर थे. पुरी के समुद्र की बात ही कुछ अलग है. साफ़ पानी, दूर तक फैला समुद्र और उसके साफ़ –सुथरे तट. सागर तट पर खाने-पीने की चीजें तो बिक ही रहे थे, साथ में बिक रहे थे मोतियों के हार, भगवान जगन्नाथ, बलराम एवं देवी सुभद्रा के तरह-तरह के आकर्षक फोटो आदि. तट पर सफाई व्यवस्था चाक-चौबंद दिखी. 

समुद्र में स्नान करनेवाले हर उम्र के लोग आपको यहाँ मिल जायेंगे –पूरे उत्साह, उर्जा और उमंग से लबरेज. सागर तट पर ऐसे सैकड़ों लोग भी मिलेंगे जो घंटों रंग-बिरंगे छतरियों के नीचे कुर्सी या रेत पर बैठे  चाय, कॉफ़ी, कोल्ड ड्रिंक, डाब आदि का सेवन करते और समुद्र की लहरों का आनन्द लेते रहते हैं. शायद  उनके यहाँ  आने एवं आनंद के सागर में डुबकी लगाने के पीछे छुपी प्रेरणा-भावना को स्वर देने के लिए  पास ही में एक  झालमूढ़ी बेचने वाले के मोबाइल (एफएम ) पर यह गाना बज रहा था,  'दिल ढूंढ़ता है फिर वही फुर्सत के रात-दिन ....'

कहने की जरुरत नहीं कि सुबह और शाम के वक्त सागर तट पर भीड़ ज्यादा होती है और चहल -पहल  भी . 


स्नानादि करते वक्त कोई दुर्घटना न हो जाए, इसके लिए इहतियाती   इंतजाम के तहत समुद्र तट के पास ही विभिन्न स्थानों पर गोताखोर तथा सुरक्षाकर्मी मौजूद दिखे. साथ ही दिखे, रेत पर अपनी कला का प्रदर्शन करते कई आर्टिस्ट. दिलचस्प बात यह कि ये कलाकार रेत अर्थात बालू पर कई घंटों के मेहनत से किसी कलाकृति का निर्माण करते हैं, जो महज कुछ घंटों तक ही प्रदर्शित हो पाता है. कारण तो आप समझ ही रहे हैं, क्यों?  
                       (hellomilansinha@gmail.com)

                  और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 

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