Tuesday, March 31, 2020

अच्छी तैयारी से बेहतर रिजल्ट

                                  - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर, स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट ... ...
सीबीएसई बोर्ड की 10वीं और 12वीं की मुख्य परीक्षा की तारीख घोषित हो चुकी है. प्रादेशिक  बोर्ड की परीक्षाएं भी आगे-पीछे होंगी. माता-पिता, शिक्षक और विशेषकर छात्र-छात्राओं के लिए यह  अधिक व्यस्तता का समय होगा. यह स्वाभाविक है. कहते हैं न कि अंत भला तो सब भला. सभी छात्र-छात्राएं  यह चाहेंगे कि इन अहम परीक्षाओं में वे अपनी अपेक्षाओं के अनुरूप अंक या ग्रेड हासिल कर सकें. निश्चित रूप से इसके लिए विद्यार्थियों को स्पष्ट मानसिकता के साथ एक बेहतर कार्ययोजना बनाकर अपने लक्ष्य तक पहुंचना होगा. आइए इस चर्चा को थोड़ा आगे बढ़ाते हैं.

विद्यार्थियों के लिए यह अच्छा होगा कि परीक्षा शुरू होने से पहले उनके हाथ में अब जितने दिन हैं उसे गिनकर एक कागज़ या नोटबुक में लिख लें. इसमें उन दिनों की गिनती न करें जो दो विषयों की परीक्षा के बीच यानी गैप में हासिल है. उसे सिर्फ रिविजन के लिए रखें. अब जितने विषय का अध्ययन करना है, उसे भी उसी कागज़ या नोट बुक में लिख लें. कुल उपलब्ध दिनों को विषयों  की संख्या से डिवाइड करने पर मोटे तौर पर आपको अंदाज हो जाएगा कि प्रति विषय अध्ययन पूरा करने के लिए आपके पास कितना दिन है. अब सोने और अन्य जरुरी दिनचर्या में प्रति दिन 10-12 घंटे व्यय होने पर 12-14 घंटा ही स्टडी के लिए बचता है. थोड़ा और प्लान करें और सोच कर यह भी लिख लें कि हर विषय में जितने चैप्टर को पढ़ना-दोहराना है, उनकी संख्या कितनी है. काबिलेगौर बात है कि प्रत्येक विद्यार्थी का पढ़ने-दोहराने का अपना तरीका या स्टाइल होता है. उन्हें उसी तरह या अपने हिसाब से बेहतर तरीके से ही पढ़ना चाहिए. किसी की नकल करके नया तरीका अपनाना इस समय लाभ के बजाय नुकसान का कारण बन सकता है. 
  
हर विद्यार्थी को उनकी अबतक की तैयारी के बारे में पता होता है. अगर और अच्छे ढंग से  पता करना हो तो सभी विषयों के कम-से-कम पिछले दो साल के प्रश्नों को लेकर नियत समय (परीक्षा में निर्धारित समय) में उत्तर देने का प्रयास करें. आपको खुद ही अपनी तैयारी का अंदाजा  हो जाएगा. हां, तैयारी कम होने पर भी घबराएं नहीं, और न ही इसको लेकर दोस्तों से चर्चा करें. इससे बहुमूल्य समय की अनावश्यक बर्बादी होगी. कनफूजन बढ़ेगा सो अलग. इसके बजाय आगे उपलब्ध समय का बेहतर उपयोग करने का संकल्प लेकर उसपर अमल करें. सुबह से रात तक जितने घंटे आपके पास हो, उसके हिसाब से किस विषय को पढ़ने में कितना समय देना है, इसका एक टेबुलर चार्ट बना लें. बेहतर समय प्रबंधन में यह चार्ट बहुत मदद करेगा. हां, इसमें आवश्यकतानुसार  कुछ बदलाव करने में कोई दिक्कत नहीं है. 

जब भी पढ़ने बैठें, मन में यह निश्चय करके बैठें कि इस दौरान पूरे मनोयोग से केवल  उस चैप्टर को पढ़ने और समझने का प्रयास करेंगे. छोटे-मोटे व्यवधानों से विचलित नहीं होंगे. दरअसल,  जैसा आप सोचेंगे, वैसा करना आसान होगा. एक सिटींग में 45-60 मिनट तक लगातार पढ़ें.  इस दौरान उस चैप्टर से संबंधित महत्वपूर्ण पॉइंट्स या फार्मूला को नोट कर लें या हाईलाइटर से हाई लाइट कर लें. पढ़ने के बाद 5 मिनट का ब्रेक लें और आंख बंद कर सोचें कि अभी क्या-क्या पढ़ा है. अगर कुछ कमी लगती है तो उस चैप्टर को दुबारा पढ़ें. हर दिन दोपहर के आसपास यानी सुबह की तीन-चार घंटे की पढाई के बाद 1-2 घंटा पिछले दिनों पढ़ी हुई बातों से संबंधित प्रश्नों का उत्तर लिखने में लगाएं. कहते हैं कि लिखने से पढ़ी हुई बातें दिमाग में बेहतर तरीके से अंकित हो जाती हैं और विद्यार्थी को यह भी मालूम पड़ जाता है कि परीक्षा सेंटर में निर्धारित समय में कैसे सारे प्रश्नों को उत्तर लिखा जा सकता है. इस प्रक्रिया से पढ़ने-दोहराने-लिखने पर आप खुद समझ पायेंगे कि पढ़ने-समझने और उसे दिमाग में अंकित करने में और कितने इम्प्रूवमेंट की जरुरत है. किसी भी पॉइंट पर विचलित होने और घबराकर पढ़ाई रोकने या छोड़ने की जरुरत नहीं, क्यों कि आप सही दिशा में प्रयास कर रहे हैं और इसका फल आशातीत होनेवाला है. 

अभी से परीक्षा ख़त्म होने तक डिनर नौ बजे से पहले कर लें और  ग्यारह बजे तक सो जाएं. डिनर अपेक्षाकृत हल्का और सुपाच्य करें. रात में सात घंटे सोने से आप सुबह फ्रेश फील करेंगे और फिर उस दिन के लिए निर्धारित एजेंडा पर अमल करने के लिए उत्साहित भी रहेंगे. अंत में एक बात और. जाड़े के इस मौसम में हो सके तो सुबह एक घंटा धूप में बैठकर पढ़ें. तन-मन दोनों को बहुत लाभ होगा. निःसंदेह, इसका समग्र प्रभाव बेहतर रिजल्ट सुनिश्चित करेगा.
(hellomilansinha@gmail.com)

           
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 

# लोकप्रिय साप्ताहिक "युगवार्ता" के 05.01.2020 अंक में प्रकाशित
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Tuesday, March 24, 2020

विद्यार्थियों के सेहत व खान-पान

                              - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर, स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट ... ...
स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मानस का निवास होता है, ऐसा ज्ञानीजन और हेल्थ एक्सपर्ट दोनों कहते-बताते रहे हैं. परीक्षा के ठीक पहले कई विद्यार्थियों का अस्वस्थ या बीमार होना कोई नयी बात नहीं है. चिंता की जो बात है वह यह कि ऐसे विद्यार्थियों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है. इसके दुष्परिणाम बहुआयामी और व्यापक होते हैं - विद्यार्थी, अभिभावक, परिवार, समाज और  देश, सबके लिए. 

स्कूल-कॉलेज में मेरे हेल्थ मोटिवेशन सेशन के दौरान विद्यार्थियों से बातचीत के क्रम में यह जानने-समझने का सुअवसर मिलता है कि आखिर क्यों पेट भर भोजन करने के बाद भी कई विद्यार्थियों को ताकत और ऊर्जा की कमी महसूस होती है. थोड़ी गहराई में जाकर बात करने पर कई बातें सामने आई. जब आगे इनकी पड़ताल की गई तो कारण और स्पष्ट होते गए. मैंने विद्यार्थियों को बताया कि आप क्या खा रहे हैं और कैसे खा रहे हैं, अच्छी सेहत बनाए रखने में इसका बड़ी भूमिका होती है. आइए, थोड़े विस्तार से इस पर चर्चा करते हैं.

विद्यार्थियों को चार श्रेणी में रख कर बात करते हैं : 1) जो विद्यार्थी अपने घर में रहकर पढ़ाई करते हैं, 2) जो घर से दूर दूसरे कस्बे-शहर-महानगर में हॉस्टल में रहते हैं, 3) जो दूसरे जगह किराए के मकान  में रहते और खुद खाना बनाकर खाते है और 4) वे विद्यार्थी जो किराए के मकान में रहते हैं, लेकिन होटल में या होटल से मंगाकर खाना खाते हैं. सभी जानते हैं कि स्विगी, जोमेटो, मेक्डोनाल्ड आदि से घर बैठे खाना मंगाकर खाने का चलन इन दिनों शहरों-महानगरों में बढ़ रहा है. बहरहाल, गौर करेंगे तो इन चार श्रेणी के विद्यार्थियों के खान-पान में बड़ा अंतर दिखेगा. आगे आकलन-विश्लेषण  करने पर खान-पान का इन सभी के सेहत पर अच्छा-बुरा असर भी साफ़ दिखाई देगा. ऐसा होना बिलकुल स्वाभाविक है.  

मानव शरीर रूपी इस अदभुत मशीन के बारे में जितना जानें, कहें और लिखें, कम ही होगा. बचपन से बुढ़ापे तक अनवरत धड़कने वाला जहां हमारा यह दिल है, वहीं अकल्पनीय सोच, खोज तथा अनुसंधान-आविष्कार का जनक हमारा मस्तिष्क. सोचने से करने तक के सफ़र में निरंतरता को साधे रखने का इस मशीन का कोई जोड़ नहीं है. लेकिन यह सब बस यूँ ही नहीं होता रहता है. सच तो यह है कि इस शरीर को चलाए रखने के लिए आहार रूपी ईंधन की सबको रोजाना जरुरत होती है. यह भी उतना ही  सही है कि जैसे मिलावट वाले तेल से गाड़ी की सेहत खराब हो जाती है, वैसे ही अशुद्ध एवं  मिलावटी खान–पान से हमारा शरीर कमजोर, अस्वस्थ और अंततः बीमार हो जाता है. 

दिलचस्प बात है कि ज्यों ही विद्यार्थियों के बीच उनके खान–पान की चर्चा करते हैं, त्यों ही वे  एक विराट बाजार पर प्रकारांतर से उनकी बढ़ती निर्भरता की बात स्वीकारते हैं.  इस बढ़ते बाजार में  आजकल लाखों नहीं बल्कि करोड़ों खाद्द्य एवं पेय पदार्थ – ब्रांडेड-अनब्रांडेड, प्रोसेस्ड-सेमी प्रोसेस्ड, पैक्ड–अन पैक्ड, नेचुरल–आर्टिफीसियल, कारण-अकारण लुभावने पैकेट या डब्बे में सब जगह उपलब्ध है. आसानी से उपलब्ध होने और स्वाद में चटपटा होने के कारण छात्र-छात्राएं  जाने-अनजाने इनका बहुत मात्रा में सेवन भी कर रहे हैं. इन चीजों का सेवन करते वक्त उन्हें यह याद नहीं रहता कि वे इन कम पौष्टिक या अपौष्टिक वस्तुओं को खाकर अपने शरीर को कितना नुकसान पहुंचा रहे हैं. 

स्कूल-कॉलेज-यूनिवर्सिटी में अगले कुछ महीने परीक्षा को समर्पित रहेंगे. इस दौरान विद्यार्थियों को अपने अध्ययन के साथ-साथ खान-पान पर भी विशेष ध्यान देने की जरुरत होगी. खाद्य पदार्थों के विज्ञापन के बजाय उसके फ़ूड वैल्यू और उसका सेहत पर पड़नेवाले प्रभाव पर  फोकस करना बेहतर होगा. जहां तक संभव हो घर का बना ताजा खाना खाएं. बेशक थोड़ा कम खाएं, लेकिन जो कुछ भी खाएं बिलकुल पौष्टिक खाएं. हरी सब्जी और मौसमी फल को आहार में शामिल करें. सुबह का नाश्ता बहुत पौष्टिक हो, इसका ध्यान जरुर रखें. खाते वक्त, केवल खाने पर फोकस करें और खाने में जल्दबाजी भी न करें. बैठकर आराम से धीरे-धीरे खूब चबाकर और स्वाद लेकर खाएं. इससे आप अपेक्षित ऊर्जा, शक्ति और उत्साह से युक्त रह पायेंगे और तभी बेहतर रिजल्ट हासिल भी कर पायेंगे. इस दौरान सभी अभिभावक, हॉस्टल के अधीक्षक-वार्डन-केयरटेकर को भी विशेष रूप से सचेत रहने की जरुरत होगी. यह उनकी भी बड़ी जिम्मेदारी  है कि वे विद्यार्थियों को रूटीन बनाकर न केवल पढ़ने-लिखने के लिए, बल्कि पौष्टिक भोजन  करने के लिए सतत प्रेरित करते रहें. आखिर यह व्यक्ति-समाज-देश सबके भले की बात है.  
(hellomilansinha@gmail.com) 

           
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 

# लोकप्रिय साप्ताहिक "युगवार्ता" के 29.12.2019 अंक में प्रकाशित
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Tuesday, March 17, 2020

संतुलन का महत्व

                                    - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर, स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट ... ...
अगले कुछ महीने स्कूल-कॉलेज की परीक्षाओं को समर्पित रहेंगे. सालों भर नियमित अध्ययन  न करनेवाले विद्यार्थी भी इस दौरान पढ़ने-लिखने में जुट जायेंगे. सोचनेवाली बात है कि परीक्षा के पहले पूरा कोर्स अच्छी तरह से पढ़ना असंभव नहीं तो बहुत मुश्किल तो जरुर है. ऐसे भी एक साथ सब साधने की कोशिश का परिणाम शायद ही उत्कृष्ट हो पाता है. "एक साधे सब सधे, सब साधे सब जाए वाली सर्वसत्य बात से सभी परिचित हैं. कहने का सीधा मतलब यह कि जो काम जिस समय करना है, उस पर ही फोकस करें. साथ ही इस बात को समझकर और दिल से मानकर चलें कि जीवन को बढ़िया से चलाते रहने के लिए जरुरी सब कार्यों के बीच एक संतुलन भी बनाकर चलना निहायत जरुरी और लाभप्रद होता है.
     
अपनी लंबी यात्रा के दौरान गौतम बुद्ध ने जीवन में मध्यम मार्ग का दर्शन रखा. वाद्य यंत्र वीणा के उदाहरण से इसे समझना आसान है. वीणा के तारों को ढीला छोड़ दें तो संगीत के सुर नहीं निकलेंगे. इसके विपरीत अगर तारों को ज्यादा कस दें तो तार ही टूट जायेंगे, तो संगीत का  सवाल ही नहीं. जब तारों को  न तो ढीला छोड़ेंगे और न ही ज्यादा कसेंगे, तभी संगीत के स्वर फूटेंगे. बुद्ध के अनुसार हमारे जीवन को सुचारू ढंग से चलाने के लिए मध्यम मार्ग अर्थात संतुलन को अपनाना बेहतर होता है.

जीवन में संतुलन की महत्ता को सभी स्वीकारते तो हैं, तथापि अपने आसपास नजर दौड़ाने पर  पता चलता है कि बहुत सारे  विद्यार्थी असंतुलित जीवन जीते हैं. परीक्षा का समय हो तो खाना-पीना-सोना सब भूलकर पढ़ने की कोशिश करते हैं. लेकिन परीक्षा ख़त्म होने के बाद पढ़ना-लिखना भूल जाते हैं और मौज-मस्ती में व्यस्त हो जाते हैं. जाने-अनजाने में अनेक  विद्यार्थी ऐसा करते हैं.  ऐसे विद्यार्थियों के जीवन में झांक कर देखें तो पता लगता है कि समय-समय पर बुद्धि एवं श्रम का यथोचित इस्तेमाल करने के बावजूद उनके जीवन में सफलता, संतुष्टि, सुख तथा  सकून की कमी बनी रहती है. वे इस बात को समझ नहीं पाते कि जीवन में अतिवादी रुख से क्षणिक लाभ तो हो सकता है, लेकिन सतत लाभ के भागी बनने के लिए संतुलन का मार्ग अपनाना ज्यादा अच्छा होता है. 

अनेक महान व्यक्तियों ने समय-समय पर इस बात को रेखांकित किया है  कि  जीवन साइकिल की सवारी करने के समान है. इसमें हमेशा संतुलन की आवश्यकता होती है. ऐसे लोगों ने दिनभर के चौबीस घंटे में पढाई-लिखाई, अन्य कामकाज, खेलकूद, मनोरंजन और आराम में संतुलन बनाने में सफलता पाई और परिणामस्वरुप वे असाधारण कार्यों को करने में सफल होते रहे. सोचिए जरा कि अगर कोई विद्यार्थी खाना-पीना, आराम करना आदि पर बिलकुल ध्यान न देकर सिर्फ पढ़ता रहे  है तो इसका परिणाम अंततः यही होगा कि वह अस्वस्थ और कमजोर हो जाएगा और आगे चाहकर भी वह कुछ घंटों की पढ़ाई तक नहीं कर पायेगा. नतीजतन, वह चाहकर भी अपने निर्धारित लक्ष्य तक नहीं पहुंच पायेगा. मजेदार बात यह है कि इसका उलटा भी उतना ही सच है. कहने का तात्पर्य यह कि अगर कोई विद्यार्थी चौबीस घंटे में अधिकांश समय सोता रहे या आराम करता रहे या मनोरंजन-मौजमस्ती-खानपान में व्यतीत करता रहे, उसका भी दुष्प्रभाव उसके सेहत और परीक्षा के रिजल्ट पर जरुर पड़ेगा.   

विश्वविख्यात प्रबंधन विशेषज्ञ तथा ट्रेनर डेल कार्नेगी भी कहते है, "यह हम सबके लिए बेहद महत्वपूर्ण है कि हम अपनी जिंदगी को संतुलित बनाएं और काम के अलावे दूसरी चीजों के लिए भी जगह रखें. इससे हमारा व्यक्तिगत जीवन ज्यादा सुखी और संतुष्टिदायक बन जाएगा. लगभग हमेशा ही इससे लोग ज्यादा ऊर्जावान, ज्यादा एकाग्र और काम में ज्यादा उत्पादक बन जाते हैं." कार्नेगी ने कई जानेमाने लोगों का उदहारण देकर इसे समझाने का प्रयास  किया है. उनकी स्पष्ट मान्यता है कि काम और फुरसत के बीच संतुलन से ही निरंतर उच्च प्रदर्शन करना संभव होता है. ऐसे भी जिंदगी एक लंबी यात्रा है और सबको रोज कुछ अच्छा करने की चाहत भी रहती है और उसके अनुरूप काम करने प्रेशर भी. कोई चाहकर भी एक दिन, एक हफ्ते, एक महीने या एक साल में सब कुछ नहीं हासिल कर सकता. इसके लिए संतुलन का दामन थामकर समयबद्ध और नियमबद्ध तरीके से काम करते हुए ही बड़े लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सकता है.  (hellomilansinha@gmail.com)

             
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 

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Tuesday, March 10, 2020

नई राहें: अच्छे व्यवहार से बनेगी अच्छी पहचान

                                           - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर, वेलनेस  कंसलटेंट ...
सभागार से सड़क तक, स्कूल-कॉलेज से वर्कप्लेस तक कमोबेश हर जगह हमें शिष्टाचार और सद्व्यवहार में कमी दिखाई पड़ती है. कथनी और करनी का अंतर भी बढ़ता जा रहा है, जब कि हम मर्यादा पुरुषोत्तम राम की खूब पूजा-अर्चना और गुणगान भी करते हैं. हायरिंग -फायरिंग  के आम कॉरपोरेट कल्चर में लीडर के स्थान पर बॉस शब्द का प्रयोग भी आम हो चला है. मानवीयता की मूल भावना को भूलकर कार्यस्थल में पद के अहंकार से चालित लोग अपने अधीनस्थ कर्मियों को बात-बेबात डांटते-फटकारते रहते हैं, हालांकि पद (इसका एक अर्थ लात  भी होता है) को सिर पर रखकर चलने से औंधे मुंह गिरना लाजिमी है, ऐसा ज्ञानीजन कहते रहे हैं. बहरहाल, इसके निःसंदेह  बहुआयामी दुष्परिणाम होते  हैं. बहुत सारे भारतीय  कंपनियों में खराब कार्यसंस्कृति का यह एक मुख्य कारण है. स्वाभाविक रूप से इसका बुरा असर कंपनी के बैलेंस शीट सहित उसके मार्केट रेपुटेसन पर स्पष्ट दिखाई पड़ता है. विचारणीय बात यह है कि कंपनी में अगर आपसी रिश्ते ठीक नहीं होंगे  तो इसका प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रभाव कमोबेश सभी कर्मचारियों के घर पर भी पड़ेगा. घरेलू माहौल तनावपूर्ण होगा. लोग अनावश्यक रूप से कई रोगों से ग्रसित होंगे और बेवजह अतिरिक्त आर्थिक बोझ  से कर्मी और कंपनी दोनों परेशान भी होंगे. आइए इस चर्चा को थोड़ा आगे बढ़ाते हैं.

सबसे पहले एक अहम विचारणीय तथ्य. मेडिकल साइंस भी कहता है कि किसी के साथ भी गलत या अमर्यादित व्यवहार से सबसे पहले हम स्वयं नेगेटिव एनर्जी से भर जाते हैं,  जिसका बुरा असर हमारे मेटाबोलिज्म  पर होता है. “जैसा बोयेंगे, वैसा ही काटेंगे” सिद्धांत के अनुसार भी हमें  आज नहीं तो कल ब्याज समेत उसी तरह का  व्यवहार  मिलता  है, जिससे हमारा तनाव बहुत बढ़ता है. और अगर यह सिलसिला बहुत दिनों तक जारी रहता है तो तनाव जनित कई बड़े रोगों का भी हम आसानी से शिकार हो सकते हैं. सेडिस्ट या परपीड़ासुख पानेवाले लोगों की बात छोड़ दें तो भी सोचनेवाली बात यह है कि क्या जानबूझकर गलत व्यवहार करनेवाले (या बॉस प्रवृति वाले)  लोग इस तथ्य से अनभिज्ञ होते हैं? आखिर ऐसे सभी लोग इस तरह का व्यवहार क्यों करते हैं जिससे संस्थान के नए तथा युवा कर्मी सबसे ज्यादा दुष्प्रभावित होते हैं?

अंदर से कमजोर लोग, असुरक्षा की भावना या हीन भावना से ग्रसित लोग या बहुत जल्दी सब कुछ पाने को लालायित लोग या बराबर तनाव से पीड़ित रहनेवाले लोग जाने-अनजाने ऐसा अमानवीय व्यवहार करते पाए जाते हैं. आक्रामक या दबंग या सुपेरिओरिटी काम्प्लेक्स से ग्रसित लोग भी ऐसा खूब करते हैं. पाया गया है कि इस श्रेणी के लोग भी कहीं-न-कहीं अंदर से दुर्बल और अनजाने भय के शिकार होते हैं. बुद्धि के मामले में भी वे कमतर पाए गए हैं. सो, अपनी कमियों को छिपाने और अपने को बड़ा और पावरफुल दिखाने के प्रयास में डराने-धमकाने का तर्कहीन एवं शॉर्टकट तरीका अपनाते हैं. 

एक दिलचस्प बात यह भी है जिसे आपने भी नोटिस किया होगा कि कई लोग बस अपने आसपास के लोगों में अपना अच्छा इम्प्रैशन बनाने के लिए अच्छा होने या अपने आचरण को अच्छा दिखाने का प्रयास करते हैं. इस काम को अंजाम देने के लिए अनेक तथाकथित सेलेब्रिटी पीआर (पब्लिक रिलेशन) फर्म की सेवाएं लेते हैं. इस चालाकी या अभिनय का उन्हें कुछ तात्कालिक लाभ भी हासिल हो जाता है. लेकिन देर-सबेर उनके इस कृत्रिम रूप का पर्दाफाश होना तय होता है. कहते हैं न कि झूठ का मुखौटा सत्य को बाहर आने से ज्यादा दिन तक नहीं रोक पाता है. और जब ऐसा होता है तब उनकी सही ढंग से अर्जित थोड़ी-बहुत  विश्वसनीयता भी ख़त्म हो जाती है. 

कहने का तात्पर्य यह कि हम कितना भी कीमती और सुन्दर कपड़े पहन लें, बहुत अमीर हों या बड़ी-बड़ी डिग्रियों के मालिक हों या दिखने-दिखाने के लिए कुछ भी कर लें,  अगर आम लोगों से हमारा व्यवहार अमानवीय और नकारात्मक है तो अंततः सब कुछ  निरर्थक साबित होता है. महात्मा गांधी कहते हैं, "मानवता की महानता मानव होने में नहीं है, बल्कि मानवीय होने में है." दरअसल, अच्छा और कुशल व्यवहार हमारे जीवन का आईना होता है. तथ्य, तर्क और संयम इसके साथी होते हैं. वस्तुतः  हमारे आचरण से हमारे संस्कार का दर्शन होता है. हमारे व्यवहार से ही घर-बाहर हमारी अच्छी या बुरी छवि बनती है. हमारा अच्छा आचरण ही लोगों द्वारा हमारे चरण स्पर्श करने का स्वाभाविक कारण भी बनता है. चाणक्य तो कहते हैं कि अच्छे व्यवहार से दुश्मन तक को जीता जा सकता है. जटिल राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय विवादों को सुलझाने में वार्ताकारों का शिष्ट व मानवीय व्यवहार निर्णायक भूमिका अदा करता रहा है.  इतिहास के पन्नों में ऐसी हजारों घटनाएं मोटे अक्षरों में दर्ज हैं. वाकई प्रेरक बात यह है कि सभी सच्चे और अच्छे लोगों का आचरण केवल इन भावनाओं  पर आधारित नहीं होता है, बल्कि  वे तो इससे आगे उस भावना से प्रेरित हो कर काम करने की पूरी कोशिश करते हैं जिसका उल्लेख गीता के अध्याय -3 के श्लोक -21 में है. इसमें श्री कृष्ण कहते हैं :
"यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:। 
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।
अर्थात श्रेष्ठ व्यक्ति  जैसा आचरण करते हैं, सामान्य लोग भी वैसा ही आचरण करने लगते हैं. श्रेष्ठ जन जिस कर्म को करते हैं, उसी को प्रमाण या आदर्श मानकर सामान्य जन उसका अनुसरण करते हैं. कहने का अभिप्राय यह कि  श्रेष्ठ पुरुष को सदैव अपने पद और गरिमा के अनुसार ही व्यवहार करना चाहिए, क्योंकि वह जिस प्रकार का व्यवहार करेगा, आम लोग भी उसी का अनुसरण करेंगे. वे अच्छा आचरण करेंगे तो उनके सहकर्मी के साथ-साथ अधीनस्थ कर्मी भी अच्छे आचरण को प्रेरित होंगे, जिससे व्यक्ति, समाज, देश और अंततः विश्व का कल्याण होगा. 

इसी कारण हम पाते है कि बड़े पदों पर बैठे जो भी अच्छे एवं सच्चे लोग हैं उनका व्यवहार बहुत ही शालीन और हृदयस्पर्शी होता है. वे मूलतः 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' तथा "बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय" के सिद्धान्त पर चलते हैं. इसके परिणाम स्वरुप वे दूसरों की तुलना में ज्यादा परफार्मिंग , सरल, सोशल, मिलनसार एवं लोकप्रिय होते हैं. 
(hellomilansinha@gmail.com)

                 
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# दैनिक जागरण के सभी संस्करणों में प्रकाशित
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Friday, March 6, 2020

इंटरव्यू में संवाद कौशल है अहम

                              - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर, स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट ... ...
हम सबने देखा-सुना-पढ़ा है कि देश-विदेश के सारे महान लोगों - वैज्ञानिक, डॉक्टर, इंजीनियर, उद्योगपति, राजनेता आदि संवाद करने में असाधारण रूप से सक्षम रहे हैं. अलग-अलग क्षेत्र और तबके के लोगों के साथ वे बहुत आसानी से सार्थक और मधुर संवाद कर लेते हैं. लाखों लोग उनकी बातों से प्रभावित और प्रेरित होकर देशहित के अनेक कार्यों में अनायास ही सक्रियता से जुड़ जाते हैं. इतिहास गवाह है कि बड़े से बड़ा विवाद भी सार्थक संवाद से ही हल किए जाते हैं.  

उदारीकरण के मौजूदा दौर में नौकरी हो या स्व-रोजगार या कोई व्यापार-व्यवसाय, हर स्थान  पर प्रतिस्पर्धा से रूबरू होना स्वाभाविक है और इस परिस्थिति में विद्यार्थियों के लिए संवाद कौशल में पारंगत होना सफलता का प्रभावी कारण बनता है. घर-बाहर हर जगह यह स्किल हमारे कठिन  से कठिन काम को आसान बनाने में अहम भूमिका अदा करता है. लिहाजा, संवाद कौशल में दक्षता न केवल विद्यार्थियों को अपनी बात अच्छी तरह रखने में मदद करता है, बल्कि दूसरों की बातों को ठीक से सुनने, सराहने और अंततः उनके साथ एक सार्थक रिश्ता कायम करने में सहायक होता है.

कई कैंपस सिलेक्शन और जॉब इंटरव्यू  के दौरान छात्र-छात्राओं के संवाद कौशल को जानने-परखने का अवसर मिलता रहा है. जीडी यानी ग्रुप डिस्कशन के दौरान प्रतिभागियों को परफॉर्म करते देखा है. 10-15 मिनट के साक्षात्कार या लगभग 60 मिनट के जीडी प्रक्रिया में यह साफ़ देखने में आता है कि कई प्रतिभागी ज्ञान समृद्ध होने के बावजूद अपनी बात या पॉइंट को प्रभावी रूप से प्रस्तुत नहीं  कर पाते हैं. कारण वे संवाद कौशल के मामले में थोड़े कमजोर होते हैं. 

जोर देने की जरुरत नहीं कि रातोंरात इस कौशल में पूर्णतः दक्ष होना संभव नहीं है, क्यों कि इस कला में दक्षता हासिल करने के लिए हमेशा विद्यार्थी बने रहना और रोज कुछ-न-कुछ नया सीखते रहना जरुरी होता है. यह एक सतत प्रक्रिया है. मजेदार और बहुत अहम बात है कि आप इस विधा में कितना भी निपुण हो जाएं, आपको आगे और निपुण होने की जरुरत महसूस होती रहती है. इस कार्य में उत्तमता महज एक यात्रा है, न कि कोई अंतिम मंजिल. बहरहाल, छात्र-छात्राएं अपने संवाद कौशल को बेहतर बनाने के लिए कई बातों पर अमल करना शुरू कर सकते हैं. इसका लाभ उन्हें जीवन के हर मोड़ पर मिलेगा, खासकर इंटरव्यू या ग्रुप डिस्कशन में. 
पहली दो बात यह कि छात्र-छात्राएं अपना नजरिया बराबर सकारात्मक रखें और जानने व  सीखने को हमेशा तत्पर रहें. यह  याद रखें कि किसी भी चर्चा या विचार-विमर्श या साक्षात्कार में सरल और सटीक शब्दों का चयन अहम रोल अदा करता है. अर्थात अपने शब्द भंडार को उन्नत करते रहना और उनका यथोचित उपयोग करना जरुरी है. साथ-ही-साथ  इस बात को भी ध्यान  में रखें कि इंटरव्यू बोर्ड के सदस्यों या सेलेक्टर्स को  उनके द्वारा पूछे गए सवाल के संबंध में जरुरी जानकारी देना और उन्हें अच्छी तरह चीजों को समझाना आपका पहला उद्देश्य है. इसके लिए मध्यम गति और साफ़ आवाज में अपनी बात शालीनता और आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत करें.
  
सभी विद्यार्थी जानते हैं कि प्रश्नों को ठीक से सुनना, ठीक से उत्तर देने के लिए अनिवार्य शर्त है. दिलचस्प एवं महत्वपूर्ण बात यह भी है कि इंटरव्यू देनेवाले विद्यार्थी का ऐसा आचरण चयनकर्ताओं और नियोक्ताओं को बहुत पसंद आता है. ऐसे भी, जब तक आप सवाल को ठीक से सुनेंगे नहीं, अच्छी तरह कैसे समझेंगें और अगर सवाल ठीक से समझ में नहीं आएगा तो सटीक और तर्कसंगत उत्तर देना कैसे संभव होगा?

इंटरव्यू या जीडी के दौरान जब भी बात करें सोच-समझकर और तथ्यों के साथ बात करें. आवेग या उत्तेजनावश कुछ भी न बोलें. दूसरों के विचार को सुनना और उसे महत्व देते हुए अपनी बात को आगे बढ़ाना सबको अच्छा लगता  है. हां, आंख में आंख मिलाकर बात करना कम्युनिकेशन को प्रभावी बनाता है. आपके चेहरे पर हल्की मुस्कुराहट हो तो और भी अच्छा. इससे एक तो आप तनाव मुक्त रहेंगे और दूसरे सामनेवाले को अपने संयत और सामान्य होने का एहसास भी करवा पायेंगे. संक्षेप में कहें तो  ऐसे समय  पर आपके हाव-भाव और बॉडी लैंग्वेज का रोल भी अहम होता है. एक अहम बात और. इन अवसरों पर इस बात के प्रति भी सचेत रहने की जरुरत होती है कि आप समय सीमा के भीतर अपनी मुख्य बातों को रख पा रहें हैं. इसके लिए बात की शुरुआत और समापन बहुत अच्छी तरह से होना सुनिश्चित करें.
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                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 

# लोकप्रिय साप्ताहिक "युगवार्ता" के 15.12.2019 अंक में प्रकाशित
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