Tuesday, September 9, 2014

देखना होगा 'न खाऊंगा, न खाने दूंगा' का असर

                                                                                     - मिलन सिन्हा
इस बात से कौन इंकार कर सकता है कि सत्तर के दशक से राजनीति में धन बल और बाहुबल के साथ अनैतिकता का जो नया दौर संगठित  रूप से प्रारम्भ हुआ उसने इस शताब्दी के पिछले दस वर्षों में नई ऊंचाई को छू लिया है। राजनीतिक नेताओं के रहन -सहन व चरित्र में आए बदलाव का व्यापक असर अब साफ़ तौर पर कार्यकर्ताओं के जीवन शैली में भी दिखने लगा है। अपने दल और नेता के प्रति कार्यकर्ताओं की प्रतिबद्धता अब वैचारिक कम, व्यावसायिक ज्यादा होती जा रही है। सिद्धान्त के बदले अब उन्हें व्यक्तिगत नफे -नुकसान की फ़िक्र अधिक है। नतीजतन हमें चुनावों से पूर्व नेताओं के साथ -साथ कार्यकर्ताओं के अपनी पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में निःसंकोच चले जाना  सहज ही दिख जाता है।

 मोटे तौर पर राजनीति व्यवसाय का पर्याय बनती जा रही है। शायद तभी नेता की तरह कार्यकर्ता भी अपनी -अपनी आर्थिक स्थिति को जल्द से जल्द मजबूत बनाने में जुट गए हैं -अधिकतर मामले में अवांछित तरीके से। ऐसे कार्यकर्ताओं पर पंचायत, प्रखंड, जिला व प्रदेश स्तर पर बिचौलिये या एजेंट के रूप में सक्रिय बने रहने के आरोप लगते रहे हैं। ऐसे में क्या  यह कहना अनुचित होगा कि नेता हो या कार्यकर्त्ता, जिसे जहाँ मौका मिलेगा, सार्वजनिक संपत्ति हड़पने में पीछे नहीं रहेगा जैसा कि लोहिया ने कई दशकों पहले भविष्यवाणी की थी। 

सवाल उठता है कि क्या राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नाम पर दशकों से राजनीति की दूकान चलानेवाले लोगों ने साधन एवं साध्य की शुद्धता की उनकी नीति को तिलांजलि दे दी है ? आखिर देश -प्रदेश हर जगह कमोवेश ऐसे हालत क्यों कर हो गए और इससे आगे का रास्ता  क्या  और बुरा होगा ?

आजादी के बाद  राजनीतिक -सामजिक मुद्दों पर आधारित सबसे बड़े आन्दोलन लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चलाया गया जिसमें करीब सभी गैर कांग्रेसी दलों के नेताओं -कार्यकर्ताओं के साथ-साथ बड़ी संख्या में छात्रों ने भाग लिया, जुल्म सहे, यातनाएं झेलीं और  जेल गए। उस दरम्यान पार्टी कार्यकर्ताओं में परिवर्तन के प्रति एक प्रतिबद्धता दिखाई पड़ती थी। आन्दोलन में शामिल होना आर्थिक लाभ -हानि  से कदाचित ही प्रेरित रहा हो। गुजरात से शुरू हुए सम्पूर्ण क्रांति आन्दोलन का केन्द्र बिहार रहा। 

1977 में  केन्द्र सहित कई प्रदेशों में सत्ता परिवर्तन हो गया और जनता पार्टी की सरकार भी बन गयी।   लालू  प्रसाद , नीतीश कुमार, सुशील मोदी, रवि शंकर प्रसाद सरीखे प्रदेश के नेता  उसी आन्दोलन से निकले।  लेकिन  लोकनायक के तमाम प्रयासों के बावजूद सामाजिक क्रांति के महती लक्ष्य को जनता पार्टी की केन्द्र और राज्यों की सरकारें अपने ही नेताओं के बीच महत्वाकांक्षा से प्रेरित टकराव के कारण आगे बढ़ाने में नाकामयाब रही। इसका बड़ा राजनीतिक खामियाजा जनता पार्टी व सरकार को अगले चुनाव में उठाना पड़ा। कहना न होगा, सम्पूर्ण क्रांति जैसे बड़े एवं सफल आन्दोलन के गर्भ से निकली सरकार के गिरने से आन्दोलन से जुड़े लाखों करोड़ों लोगों को गहरा झटका लगा। कार्यकर्त्ता ठगे से महसूस करते रहे। नेतागण तो समय के साथ  अपनी राजनीतिक यात्रा में  बढ़ते गए, आर्थिक रूप से मजबूत बनते गए। पार्टी कार्यकर्ताओं ने यह सब गौर से देखा, जाना और समझा।

आर्थिक उदारीकरण ने बिहार की सत्ता के करीब रहे नेताओं के बड़े वर्ग को आर्थिक रूप से मजबूत होने की प्रेरणा भी दी और मौके भी दिए जिनका भरपूर उपयोग इन लोगों ने अगले कई वर्षों तक धन बल से सम्पन्न होने के लिये किया। 

'हम भी खाते हैं, तुम भी खाओ' वाली नीति पर चलने का मन्त्र कार्यकर्ताओं को अपने नेताओं से ही मिला। सरकारी ठेकेदारी में पार्टी के लोगों का वर्चस्व कायम होने लगा। विधायक एवं सांसद निधि ने इस सिलसिले को आगे ही बढ़ाया। 


 अन्ना के आन्दोलन ने जनता की बुनियादी समस्याओं को आवाज देने का काम प्रभावी ढंग से करने का प्रयास किया जिसे समाज के हर वर्ग का  समर्थन मिला। लेकिन जो कुछ आगे हुआ, उससे लोगों के  विश्वास को आघात पहुंचना स्वाभाविक था।  

प्रधान मंत्री का यह संकल्प कि न खाऊंगा, न खाने दूंगा  वाकई मौजूदा स्थिति में कितना और कैसा बदलाव सुनिश्चित कर पाते हैं, यह  भविष्य में नेताओं और कार्यकर्ताओं के सम्बन्ध और समीकरण  पर निर्भर करेगा। साथ ही सिद्धांत की राजनीति से प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं -समर्थकों की संख्या में इजाफा भी होगा, ऐसी आशा की जा सकती है। बिहार के लिये यह आवश्यक भी है।  

            और भी बातें करेंगे, चलते-चलते असीम शुभकामनाएं ।

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