Sunday, October 28, 2012

औचित्य मंत्रिमंडल विस्तार का

                                                                                     - मिलन सिन्हा 
                 आखिर हो ही गया ममोहन सिंह के बड़े मंत्रिमंडल का चिर प्रतीक्षित बड़ा  विस्तार । कई महीनों  से इसके कयास  लगाये  जा रहे थे, तारीखें   तय होने और बदले जाने की ख़बरें भी  आती रही । विभिन्न टीवी चैनेलों ने इन खबरों से लोगों को बाखबर भी रखा कई  अवसरों पर पिछले दिनों।इस बीच हिमाचल प्रदेश और गुजरात विधानसभाओं के लिए चुनाव  प्रक्रिया शुरू होने के साथ वाड्रा तथा गडकरी पर घोटाले के सनसनीखेज  आरोप लगे  जिससे चर्चाओं को नया मुद्दा भी मिला। हाँ, इसी दौरान  डीजल तथा रसोई गैस के बढ़ी कीमतों ने आम लोगों को महंगाई के डायन से और ज्यादा रूबरू  भी करवाया।

                बहरहाल, चर्चा को आज के मंत्रिमंडल  विस्तार तक  ही सीमित रखें तो विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के लोक को क्या मिला इस राजनीतिक कवायद से - सिर्फ कुछ मंत्रियों के पद छोड़ने, कुछ के प्रोन्नत  होने, कुछ का विभाग बदले जाने, दो-चार नए वफादारों को मंत्री बनाने और इस  सब को अंजाम तक पहुँचाने  के लिए अपनायी  गयी  प्रक्रिया में आम करदाता का कई करोड़ रुपया  जाया  करने के अलावे। याद करिए, पिछले विस्तार प्रक्रिया के पश्चात् यही बातें नहीं कही गयी थी  कि इससे सरकार की कार्यकुशलता बढ़ेगी, विकास को  और गति प्रदान की जा सकेगी आदि, आदि .।

               पर, क्या पिछले  कुछ  महीनों में ऐसा कुछ हुआ या, देश कुछ और बदहाल हुआ? तो फिर इस बार के इस प्रयास से क्या हासिल हो जायेगा? क्या हम इतने बड़े-बड़े मंत्रिमंडल का बोझ उठाने में सक्षम हैं? आइये, जरा इस पर भी सोचें और  विचार करें।

              और भी बातें करेंगे, चलते-चलतेअसीम  शुभकामनाएं

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