Tuesday, October 9, 2012

गरीबों के लिए आजादी के मायने क्या ?

                                                                                               *  मिलन सिन्हा 
                    पिछले 15 अगस्त को हमने अपना 66वां  स्वतंत्रता दिवस मनाया। बड़े ताम-झाम से मनाया। प्रधान मंत्री से लेकर मुख्य मंत्री  तक सब ने देश/प्रदेश के तरक्की के बारे में विस्तार से लोगों को  बताया, अनेक नए वादे भी किये।  इन  सब  आयोजनों पर करोड़ों का खर्च जनता के नाम गया , विशेष कर उन तीन चौथाई से भी ज्यादा देश की जनता का,  जो आज भी रोटी, कपड़ा, मकान के साथ साथ स्वास्थ्य , शिक्षा और रोजगार की समस्या से बुरी तरह  परेशान है, बेहाल है  -  आजादी के साढ़े छह दशकों  के बाद भी। क्या यह शर्मनाक स्थिति विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र  कहे जानेवाले देश के योजनाकारों, नीति  निर्धारकों और नौकरशाहों को अब भी परेशान  नहीं करती , उन्हें जल्दी कुछ करने को मजबूर नहीं करती ?
                अक्तूबर का महीना  हमारे चार  बड़े नेताओं और देश भक्तों, राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी, लोकनायक जयप्रकाश  नारायण, पूर्व  प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री   तथा  प्रख्यात  समाजवादी जननेता राम मनोहर लोहिया के जन्म दिवस या पुण्य तिथि के साथ जुड़ा है,  जो अपने जीवन काल में सिर्फ  और सिर्फ गरीब,शोषित,दलित जनता के लिए काम करते रहे। तो क्यों न  इस मौके पर हम  अपने सत्तासीन  नेताओं, योजनाकारों, नीति  निर्धारकों आदि से यह पूछें :
  • क्या प्रत्येक भारतीय को रोज दो शाम का भी खाना भी नसीब हो पाता है?  
  • क्या प्रत्येक भारतीय को एक मनुष्य के रूप में रहने लायक कपड़ा उपलब्ध है ?
  • क्या प्रत्येक भारतीय को रहने के लिए अपना मकान नसीब है?
  • क्या प्रत्येक भारतीय को न्यूनतम  स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध है?
  • क्या प्रत्येक भारतीय बच्चे को बुनियादी  स्कूली  शिक्षा उपलब्ध है?
  • क्या प्रत्येक भारतीय  व्यस्क को साल में 180 दिनों का रोजगार भी मिल पाता है?
           इन सभी मौलिक सवालों का जबाव तो बहुत ही निराशाजनक है,फिर भी सत्ता प्रतिष्ठान से सम्बद्ध सारे लोग चीखते हुए कहेंगे कि इन दशकों के दौरान देश ने हर क्षेत्र में प्रगति की है। लेकिन, वही लोग इस तथ्य को नहीं नकार  पाएंगे कि जितने वायदे उन लोगों ने जनता से इन वर्षों  में किया है, उसका दस प्रतिशत  भी वे  पूरा करने में नाकाम रहे।  देखिये, दुष्यंत कुमार क्या कहते हैं :

यहाँ तक आते आते सूख  जाती है कई नदियां 
मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा।

          सभी यह मानेंगे कि किसी भी पैमाने से आजादी के ये 65 साल किसी भी देश को अपनी जनता को बुनियादी जरूरतों  से   चिंतामुक्त करके देश को सम्पन्न और शक्तिशाली बनाने के लिए  बहुत लम्बा अरसा होता है। और वह भी तब, जब कि इस  देश में न तो प्राकृतिक संसाधनों की कोई कमी रही है और न तो   मानव  संसाधन की।  तो फिर यह तो साफ़ है कि भारी  गलती हुई - नीति, योजना,कार्यवाही और सबसे  ऊपर नीयत के मामले में। चुनांचे, हम सभी को देश/ प्रदेश  की सरकारों से पूरी गंभीरता से पूछना पड़ेगा कुछ  बुनियादी सवाल और मिल कर बनानी  पड़ेगी एक समावे शी  कार्य योजना जिसे समयबद्ध तरीके से आम जनता की भलाई  के लिए लागू  किया जा  सकें, तभी हम अपने  को एक मायने में आजाद भारत के नागरिक कह सकेंगे।
  
           और भी बातें करेंगे, चलते चलते असीम शुभकामनाएं
                        

2 comments:

  1. Satta pratishthan se jure logo me prabal echha shakti aur sahas kee kamee hai.Isliye aaj bhee ham apne ko sahi mayno me aajad bharat ke nagrik nahi kah sakte.SG

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  2. sir
    Its will take another 65 year, where we living because our leaders are still thinking just we got the freedom to loot the khajana of India,some are busy in coffin,some are in koyala Not a single leaders busy in development of country all are busy in self development.

    Regards
    pushkar Kumar sinha
    BGP

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