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Saturday, December 23, 2017
Tuesday, November 21, 2017
Thursday, October 19, 2017
Monday, March 13, 2017
बातों-बातों में : होली के मौके पर थोड़ी तुकबंदी (सन्दर्भ : उत्तर प्रदेश चुनाव-2017)
- मिलन सिन्हा
सब कुछ हो गया शांत,
थम गया चुनाव का शोर.
ढूंढें जरा,कहाँ छुपे हैं पीके,
सबके चहेते प्रशांत किशोर.
जानना चाहते है सभी यूपीवासी,
पीके ने ऐसा करतब कैसे कर दिखाया?
साइकिल पर सवार दो युवाओं को
कैसे हार के गर्त में पहुंचाया?
.....होली की असीम शुभकामनाएं.
(hellomilansinha@gmail.com)
और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।
सब कुछ हो गया शांत,
थम गया चुनाव का शोर.
ढूंढें जरा,कहाँ छुपे हैं पीके,
सबके चहेते प्रशांत किशोर.
जानना चाहते है सभी यूपीवासी,
पीके ने ऐसा करतब कैसे कर दिखाया?
साइकिल पर सवार दो युवाओं को
कैसे हार के गर्त में पहुंचाया?
(hellomilansinha@gmail.com)
और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।
Tuesday, March 22, 2016
आज की कविता: जल का कल ?
- मिलन सिन्हा
और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।
जल का कल ?
‘जल’ ना
तो फिर
‘जलना’ होगा
अंगारों पर
चलना होगा
देती जितना प्रकृति
काफी है
बस उसका
सदुपयोग बाकी है
याद रहे
हर पल
कैसे बचेगा 'कल'
जब न होगा 'जल' !
(विश्व जल दिवस के अवसर पर )और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।
Friday, October 16, 2015
आज की कविता : विस्फोट
- मिलन सिन्हा
विस्फोट
जब
किसी की
जबान बन्द हो
तो सच मानो
वहां
विस्फोट की
अच्छी गुंजाइश है
पर
इसके लिए
वहां
एक खुले
जबान वाले की
उपस्थिति
आवश्यक है !
और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।
विस्फोट
जब
किसी की
जबान बन्द हो
तो सच मानो
वहां
विस्फोट की
अच्छी गुंजाइश है
पर
इसके लिए
वहां
एक खुले
जबान वाले की
उपस्थिति
आवश्यक है !
और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।
Tuesday, September 8, 2015
आज की कविता : बंधक
- मिलन सिन्हा
बंधक
उसने
अपने सारे संबंधों को
बंधक रख दिया
बदले में
ढेर सारा धन जुटा लिया
और
उस धन से
अनेक नश्वर वस्तुएं ले आया
सुख के साधन मिल गए
खुशी नहीं मिली
समय ने करवट ली
न अब इस घाट के रहे
न उस घाट के।
और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।
बंधक
उसने
अपने सारे संबंधों को
बंधक रख दिया
बदले में
ढेर सारा धन जुटा लिया
और
उस धन से
अनेक नश्वर वस्तुएं ले आया
सुख के साधन मिल गए
खुशी नहीं मिली
समय ने करवट ली
न अब इस घाट के रहे
न उस घाट के।
और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।
Tuesday, August 4, 2015
आज की कविता : मोक्ष का मजाक
- मिलन सिन्हा
हत्या के आरोप में
गिरफ्तार
एक कैदी को
अपने पिता की मृत्यु पर
मिलती है इजाजत अदालत से
पिता के अन्तिम संस्कार हेतु
आता है कैदी
घेरे में पुलिस के
बंधा हुआ मोटी रस्सी से
देता है चिता को आग
और
पूरी करता है अन्य रस्में
पिता के मोक्ष के लिए
खुद घोर बंधन में जकड़े हुए !
और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।
गिरफ्तार
एक कैदी को
अपने पिता की मृत्यु पर
मिलती है इजाजत अदालत से
पिता के अन्तिम संस्कार हेतु
आता है कैदी
घेरे में पुलिस के
बंधा हुआ मोटी रस्सी से
देता है चिता को आग
और
पूरी करता है अन्य रस्में
पिता के मोक्ष के लिए
खुद घोर बंधन में जकड़े हुए !
और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।
Friday, May 22, 2015
आज की कविता : यौगिक
- मिलन सिन्हा
यौगिक
यहाँ
प्रत्येक व्यक्ति
एक यौगिक है
जिसके
तत्वों को
अलग -अलग करके
पहचानना
काफी मुश्किल है !
और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।
यौगिक
यहाँ
प्रत्येक व्यक्ति
एक यौगिक है
जिसके
तत्वों को
अलग -अलग करके
पहचानना
काफी मुश्किल है !
और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।
Sunday, March 22, 2015
आज की कविता : सड़क का साथ
- मिलन सिन्हा
सड़क का साथ
तुम
भाग्यशाली नहीं हो
क्यों कि
शाम को
थक-हार कर
घर लौटना
तुम्हारे वश की बात नहीं
सचमुच,
वह घर अब
बहुत पीछे छूट चुका है
या फिर
तुम्हारी स्मृति के
किसी कोने में पड़ा
सिसक रहा है
और फिर
इधर तो तुम
न जाने कितने वर्षों से
सड़कों को नाप रहे हो
कभी अपने शरीर को
पैमाना बना कर
तो कभी अपने डग को
छोटा और लम्बा करते हुए !
और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।
सड़क का साथ
तुम
भाग्यशाली नहीं हो
क्यों कि
शाम को
थक-हार कर
घर लौटना
तुम्हारे वश की बात नहीं
सचमुच,
वह घर अब
बहुत पीछे छूट चुका है
या फिर
तुम्हारी स्मृति के
किसी कोने में पड़ा
सिसक रहा है
और फिर
इधर तो तुम
न जाने कितने वर्षों से
सड़कों को नाप रहे हो
कभी अपने शरीर को
पैमाना बना कर
तो कभी अपने डग को
छोटा और लम्बा करते हुए !
और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।
Thursday, February 19, 2015
आज की कविता : चिन्ता
- मिलन सिन्हा
चिन्ता
मेरे
इस दुनिया में रहने
या
न रहने से
उनका
कुछ नहीं बिगड़ता है
उन्हें तो
चिन्ता है
चारों तरफ हवा में तैरते
मेरे नाम की !
और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।
चिन्ता
मेरे
इस दुनिया में रहने
या
न रहने से
उनका
कुछ नहीं बिगड़ता है
उन्हें तो
चिन्ता है
चारों तरफ हवा में तैरते
मेरे नाम की !
और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।
Tuesday, January 13, 2015
Tuesday, October 14, 2014
आज की कविता : जगत मिलन
- मिलन सिन्हा

जगत मिलन
सख्त चेहरा था उसका
पत्थर जैसा
झांक कर देखा अंदर
बच्चों -सा दिल
मोम -सा पिघलने लगा
संकल्प था उसके मन में
सपना सबका पूरा करूँगा
मिलन का वातावरण होगा
हर होंठ पर स्मिति ला दूंगा
शालीन बनकर साथ रहूँगा।
और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।
# प्रवक्ता . कॉम पर प्रकाशित, दिनांक :07.06.2014
जगत मिलन
सख्त चेहरा था उसका
पत्थर जैसा
झांक कर देखा अंदर
बच्चों -सा दिल
मोम -सा पिघलने लगा
संकल्प था उसके मन में
सपना सबका पूरा करूँगा
मिलन का वातावरण होगा
हर होंठ पर स्मिति ला दूंगा
शालीन बनकर साथ रहूँगा।
और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।
# प्रवक्ता . कॉम पर प्रकाशित, दिनांक :07.06.2014
Friday, October 3, 2014
आज की कविता : जीवन के बीज
- मिलन सिन्हा

जीवन के बीज
बारिश होती है
भागता है शहरी
तलाशता है छत
पीता है चाय
बारिश होती है
झूमता है देहाती
बाहर आता है छोड़कर छत
बोता है जीवन के बीज।
और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।
# प्रवक्ता . कॉम पर प्रकाशित, दिनांक :07.06.2014
जीवन के बीज
बारिश होती है
भागता है शहरी
तलाशता है छत
पीता है चाय
बारिश होती है
झूमता है देहाती
बाहर आता है छोड़कर छत
बोता है जीवन के बीज।
और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।
# प्रवक्ता . कॉम पर प्रकाशित, दिनांक :07.06.2014
Friday, September 19, 2014
आज की कविता : प्रतीक
- मिलन सिन्हा
यह पेड़ है
हम सबका पेड़ है।
इसे मत छांटो
इसे मत तोड़ो
इसे मत काटो
इसे मत उखाड़ो
इसे फलने दो
इसे फूलने दो
इसे हंसने दो
इसे गाने दो
यह पेड़ है
हम सबका पेड़ है।
इस पर सबके घोसले हैं
कौआ का है, मैना का है
बगुला का है, तोता का है
सब मिलकर रहते हैं
सब खुशहाल हैं
सब आबाद हैं
इसे बरबाद मत करो
इनकी भावनाओं को मत छेड़ो
यह पेड़ है
हम सबका पेड़ है।
यह हमारा अतीत है
यह हमारा वर्तमान है
यह हमारा भविष्य है
इसमें ऊंचाई है
इसमें गहराई है
इसमें दूरदृष्टि है
ईश्वर की यह अपूर्व सृष्टि है
यह पेड़ है
हम सबका पेड़ है।
इस पर अनेक अत्याचार हुए
इस पर अनेक आक्रमण हुए
इसे तोड़ने के अनेक षड्यंत्र हुए
फिर भी यह झुका नहीं
टूटा नहीं, उखड़ा नहीं
बलिदान का पर्याय है यह
धैर्य और त्याग का नमूना है यह
इसे आदर दो, प्यार दो
यह पेड़ है
हम सबका पेड़ है।
इसने सिर्फ देना ही सीखा
फल दिया, फूल दिया
संगीत दिया, सुगंध दिया
हमारे जीवन को सुखमय किया
यह हमारी सभ्यता, संस्कृति का प्रतीक है
इसके बिना हमारा क्या अस्तित्व है
हाँ, यह पेड़ नहीं, समझो देश है
अब कहना क्या शेष है
यह पेड़ है
हम सबका पेड़ है।
और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।
यह पेड़ है
हम सबका पेड़ है।
इसे मत छांटो
इसे मत तोड़ो
इसे मत काटो
इसे मत उखाड़ो
इसे फलने दो
इसे फूलने दो
इसे हंसने दो
इसे गाने दो
यह पेड़ है
हम सबका पेड़ है।
इस पर सबके घोसले हैं
कौआ का है, मैना का है
बगुला का है, तोता का है
सब मिलकर रहते हैं
सब खुशहाल हैं
सब आबाद हैं
इसे बरबाद मत करो
इनकी भावनाओं को मत छेड़ो
यह पेड़ है
हम सबका पेड़ है।
यह हमारा अतीत है
यह हमारा वर्तमान है
यह हमारा भविष्य है
इसमें ऊंचाई है
इसमें गहराई है
इसमें दूरदृष्टि है
ईश्वर की यह अपूर्व सृष्टि है
यह पेड़ है
हम सबका पेड़ है।
इस पर अनेक अत्याचार हुए
इस पर अनेक आक्रमण हुए
इसे तोड़ने के अनेक षड्यंत्र हुए
फिर भी यह झुका नहीं
टूटा नहीं, उखड़ा नहीं
बलिदान का पर्याय है यह
धैर्य और त्याग का नमूना है यह
इसे आदर दो, प्यार दो
यह पेड़ है
हम सबका पेड़ है।
इसने सिर्फ देना ही सीखा
फल दिया, फूल दिया
संगीत दिया, सुगंध दिया
हमारे जीवन को सुखमय किया
यह हमारी सभ्यता, संस्कृति का प्रतीक है
इसके बिना हमारा क्या अस्तित्व है
हाँ, यह पेड़ नहीं, समझो देश है
अब कहना क्या शेष है
यह पेड़ है
हम सबका पेड़ है।
और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।
Thursday, September 11, 2014
आज की कविता : सागर में नाव
- मिलन सिन्हा

सागर में नाव
जीवन
एक नाव है
मौत
सागर समान है
कब कोई
उफान आवे
और
लील ले
नाव को
कोई कैसे
कह सकता है ?
और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।
सागर में नाव
जीवन
एक नाव है
मौत
सागर समान है
कब कोई
उफान आवे
और
लील ले
नाव को
कोई कैसे
कह सकता है ?
और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।
Wednesday, July 16, 2014
आज की कविता : अंतःमन
- मिलन सिन्हा

अंतःमन
सूरज उगता है
लालिमा छा जाती है
सूरज डूबता है
लालिमा फिर छा जाती है
मनुष्य के जन्म
एवं
उसके मृत्यु के वक्त
अंतःमन में
कुछ ऐसा ही होता है, क्या?
और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।
# प्रवक्ता . कॉम पर प्रकाशित, दिनांक :07.06.2014
अंतःमन
सूरज उगता है
लालिमा छा जाती है
सूरज डूबता है
लालिमा फिर छा जाती है
मनुष्य के जन्म
एवं
उसके मृत्यु के वक्त
अंतःमन में
कुछ ऐसा ही होता है, क्या?
और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।
# प्रवक्ता . कॉम पर प्रकाशित, दिनांक :07.06.2014
Tuesday, July 8, 2014
आज की कविता : सार्थक कोशिश
- मिलन सिन्हा

सार्थक कोशिश
सागर तट पर
अकेले बैठे
दूर तक
लहरों को आते-जाते देखना
उसमें, फिर खुद में, खो जाना
एक सार्थक कोशिश है
अपने 'स्व' को ढूंढने का
उसे बचाये रखने का
इस कोलाहल भरे
निरंतर बढ़ते महानगर में।
और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।
# प्रवक्ता . कॉम पर प्रकाशित
सार्थक कोशिश
सागर तट पर
अकेले बैठे
दूर तक
लहरों को आते-जाते देखना
उसमें, फिर खुद में, खो जाना
एक सार्थक कोशिश है
अपने 'स्व' को ढूंढने का
उसे बचाये रखने का
इस कोलाहल भरे
निरंतर बढ़ते महानगर में।
और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।
# प्रवक्ता . कॉम पर प्रकाशित
Saturday, June 7, 2014
आज की कविता : सीने में जलती आग
- मिलन सिन्हा
हर मौसम में
देखता हूँ उन्हें
मौसम बारिश का हो
या चुनाव का
रेल पटरियों से सटे
उनके टाट -फूस के
घर भी हैं सटे -सटे
चुनाव से पूर्व उन्हें
एक सपना दिखाई देता है
बारिश से पहले
अपने एक पक्के घर का
लेकिन चुनाव के बाद
बारिश शुरू होते ही
एक दुःस्वप्न दिखाई देता है उन्हें
बारिश के पानी टपकने का
अपने - अपने घर के ढहने का
आंगन में ठेहुना भर पानी जमने का
जमा किये हुए सूखे लकड़ियों का
आग में तब्दील न होने का
फिर भी,
एक आग तब भी देखी है
उन सबके सीने में जलते हुए
यह आग भविष्य को जलाकर
राख करनेवाली नहीं है
बल्कि, हर विपरीत मौसम में भी
आपसी संबंधों को गर्माहट देनेवाली,
जीवन को संघर्षरत रखनेवाली है।
और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।
# प्रवक्ता . कॉम पर प्रकाशित, दिनांक :04.06.2014
हर मौसम में
देखता हूँ उन्हें
मौसम बारिश का हो
या चुनाव का
रेल पटरियों से सटे
उनके टाट -फूस के
घर भी हैं सटे -सटे
चुनाव से पूर्व उन्हें
एक सपना दिखाई देता है
बारिश से पहले
अपने एक पक्के घर का
लेकिन चुनाव के बाद
बारिश शुरू होते ही
एक दुःस्वप्न दिखाई देता है उन्हें
बारिश के पानी टपकने का
अपने - अपने घर के ढहने का
आंगन में ठेहुना भर पानी जमने का
जमा किये हुए सूखे लकड़ियों का
आग में तब्दील न होने का
फिर भी,
एक आग तब भी देखी है
उन सबके सीने में जलते हुए
यह आग भविष्य को जलाकर
राख करनेवाली नहीं है
बल्कि, हर विपरीत मौसम में भी
आपसी संबंधों को गर्माहट देनेवाली,
जीवन को संघर्षरत रखनेवाली है।
और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।
# प्रवक्ता . कॉम पर प्रकाशित, दिनांक :04.06.2014
Thursday, May 29, 2014
आज की कविता : पुराने शहर में
- मिलन सिन्हा
चेहरे से नहीं
अब
चाल से पहचानता हूँ
नाम से नहीं
अब
आवाज से जानता हूँ
काम बहुत मुश्किल है
लेकिन
कोशिश करता हूँ
पुराने शहर में
लौटा हूँ
एक बड़े अन्तराल के बाद
यहाँ -वहाँ जाता हूँ
निगाहें ढूँढ़ती है
अपने स्कूल के सहपाठी को
मुहल्ले के साथी खिलाड़ी को
पहचाने जो मुझे
ऐसे अपने को
निस्वार्थ जो मिले
गले लगे
ऐसे संगी-साथी को
देखता हूँ
इसी बीच
हर तरफ
भीड़ का एक रेला है
घर पीछे हो गए हैं
दुकानें सामने
एक नई पीढ़ी
अनबुझ लिबासों में
आ गई है सड़कों पे
गुम हो गई है जैसे
पुरानी सूरतें
मूंछ, दाढ़ी, झुर्रियों
स्नो, पाउडर, क्रीम, चश्मे. ... में
अथवा
जीवन के संघर्ष
तनाव, अनिश्चतता .....ने
खंडहर बना दिए हैं
घूमता हूँ सुबह -शाम
आँखें थक जाती हैं
बढ़ती भीड़ में
अपनों को तलाशते हुए
अपना शहर
कभी - कभी
पराया-सा लगने लगता है
पर
बाकी है अब भी आस
बुझी नहीं है
प्यार की प्यास
तभी तो
नाम से न सही
चेहरे से न सही
चाल, आवाज ...... से
पहचानने में लगा हूँ मैं
अपने अपनों को
अपने पुराने शहर में !
और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।
# अक्षर पर्व के अक्टूबर'05 अंक में प्रकाशित
चेहरे से नहीं
अब
चाल से पहचानता हूँ
नाम से नहीं
अब
आवाज से जानता हूँ
काम बहुत मुश्किल है
लेकिन
कोशिश करता हूँ
पुराने शहर में
लौटा हूँ
एक बड़े अन्तराल के बाद
यहाँ -वहाँ जाता हूँ
निगाहें ढूँढ़ती है
अपने स्कूल के सहपाठी को
मुहल्ले के साथी खिलाड़ी को
पहचाने जो मुझे
ऐसे अपने को
निस्वार्थ जो मिले
गले लगे
ऐसे संगी-साथी को
देखता हूँ
इसी बीच
हर तरफ
भीड़ का एक रेला है
घर पीछे हो गए हैं
दुकानें सामने
एक नई पीढ़ी
अनबुझ लिबासों में
आ गई है सड़कों पे
गुम हो गई है जैसे
पुरानी सूरतें
मूंछ, दाढ़ी, झुर्रियों
स्नो, पाउडर, क्रीम, चश्मे. ... में
अथवा
जीवन के संघर्ष
तनाव, अनिश्चतता .....ने
खंडहर बना दिए हैं
घूमता हूँ सुबह -शाम
आँखें थक जाती हैं
बढ़ती भीड़ में
अपनों को तलाशते हुए
अपना शहर
कभी - कभी
पराया-सा लगने लगता है
पर
बाकी है अब भी आस
बुझी नहीं है
प्यार की प्यास
तभी तो
नाम से न सही
चेहरे से न सही
चाल, आवाज ...... से
पहचानने में लगा हूँ मैं
अपने अपनों को
अपने पुराने शहर में !
और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।
# अक्षर पर्व के अक्टूबर'05 अंक में प्रकाशित
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