- मिलन सिन्हा, स्ट्रेस मैनेजमेंट एंड वेलनेस कंसलटेंट
Friday, November 21, 2025
Friday, July 4, 2025
स्वामी विवेकानन्द - संकल्प, संयम, कर्म व देशप्रेम के प्रतीक
- मिलन सिन्हा, मोटिवेशनल स्पीकर एवं स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट
संकल्प, संयम, कर्म के प्रति निष्ठा और देशप्रेम की भावना स्वामी विवेकानंद (जन्म : 12 जनवरी, 1863, देहावसान : 4 जुलाई, 1902) के जीवन की कहानी खुद कहता है. इन विषयों पर उनके विचार हर व्यक्ति के लिए हमेशा प्रेरणादायक थे, हैं और रहेंगे. आइए, इन विषयों पर व्यक्त उनके विचारों से प्रेरणा लेते हैं.
संकल्प: जिस समय जिस काम का संकल्प करो, उस काम को उसी समय पूरा करो, अन्यथा लोग आप पर विश्वास नहीं करेंगे... ... जब तुम कोई कर्म करो, तब अन्य किसी बात का विचार ही मत करो. उसे एक उपासना के रूप में करो और उस समय उसमें अपना सारा तन-मन लगा दो... ...उठो, जागो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य ना प्राप्त हो जाये.
संयम: किसी भी काम को अच्छी तरह करने के लिए जरूरी है एकाग्रता.... ....हम इन्द्रियों पर संयम रखकर एकाग्रता प्राप्त कर सकते है.... .... मन का विकास करो तथा उसका संयम करो. उसके बाद जहां इच्छा हो, वहां इसका प्रयोग करो. इससे जल्दी सफलता मिलेगी.
कर्म: मनुष्य के रूप में हमारा पहला कर्तव्य यह है कि अपने प्रति घृणा न करें, क्योंकि आगे बढ़ने के लिए यह आवश्यक है कि पहले हम स्वयं में विश्वास रखें ... ...प्रत्येक मनुष्य का कर्त्तव्य है कि वह अपना आदर्श लेकर उसे चरितार्थ करने का प्रयत्न करें. दूसरों के ऐसे आदर्शों को लेकर चलने की अपेक्षा, जिनको वह पूरा ही नहीं कर सकता, अपने ही आदर्श का अनुसरण करना सफलता का अधिक निश्चित मार्ग है.
देशप्रेम: हमारा पवित्र देश भारत धर्म, दर्शन, अध्यात्म, प्रेम और मधुरता की पुण्य भूमि है. इन बातों में संसार के अन्य देशों की अपेक्षा हमारा देश अब भी श्रेष्ठ है. यहीं अनेक बड़े-बड़े महात्माओं एवं ऋषियों का जन्म हुआ है. यह संन्यास और त्याग की भूमि है. आदिकाल से अबतक यहां मानव जीवन के लिए सर्वोच्च आदर्श का द्वार खुला हुआ है.
आज स्वामी जी को सच्ची श्रद्धांजलि यह होगी कि हर भारतवासी स्वामी जी के व्यक्तित्व से सच्ची प्रेरणा लेकर देश को आत्मनिर्भर, समृद्ध और खुशहाल बनाने में व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से हरसंभव योगदान करें. (hellomilansinha@gmail.com)
Wednesday, September 18, 2024
कामयाब होना मुश्किल नहीं
- मिलन सिन्हा, मोटिवेशनल स्पीकर एंड वेलनेस कंसलटेंट
जीवन के हर क्षेत्र में आजकल चाहे-अनचाहे कई कार्यों या प्रोजेक्ट्स को नियत समय सीमा के अन्दर अंजाम तक पहुंचाने की सामान्य अपेक्षा खुद की और दूसरों की भी होती है. समय सीमित होता है और टास्क अनेक. ऐसे अवसरों पर अनेक लोगों के लिए यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि किस काम को पहले और किसे थोड़ी देर बाद में करें जिससे कि सब कुछ ठीक से निष्पादित हो जाय, खासकर सभी महत्वपूर्ण और आवश्यक कार्य और वह भी यथोचित गुणवत्ता के साथ. सबको मालूम है कि गुणवत्ता दुष्प्रभावित होने का खामियाजा स्वयं के साथ-साथ संस्थान को भी उठाना पड़ता है. ऐसे में मेंटल प्रेशर बढ़ता है और खुद को संयत रखना काफी चुनौतीपूर्ण होता है.
कहने को तो सुबह उठने से लेकर रात में सोने से पहले तक सामान्यतः हर कोई पढ़ाई, परीक्षा, प्रतियोगिता, रोजगार, नौकरी आदि के प्रेशर के बीच किसी-न-किसी काम में व्यस्त रहता है. लेकिन कैसे व्यस्त रहता है, इस पर गौर करना बहुत जरुरी होता है. हममें से कुछ लोग सुबह पहले जो भी सरल एवं आसान काम सामने होता है, उसे निबटाने में लग जाते हैं. लिहाजा, आवश्यक या महत्वपूर्ण या कठिन और मुश्किल काम या तो बिल्कुल नहीं हो पाता है या शुरू तो होता है, लेकिन एकाधिक कारणों से नियत समय में पूरा नहीं हो पाता है. इस वजह से अहम काम या तो छूट जाते हैं या अधूरे रह जाते हैं. वे काम अगले दिन के एजेंडा में आ तो जाते हैं, लेकिन आदतन अगले दिन भी ऐसा ही कुछ होता है. इस तरह अध्ययन हो या अन्य कार्य, छोटे, सरल और कम या गैर-जरुरी काम तो किसी तरह होते रहते हैं, किन्तु महत्वपूर्ण और आवश्यक कार्यों का अम्बार खड़ा होता रहता है. ऐसे में उतने सारे अहम कार्यों को तय सीमा में पूरा करना उन्हें मुश्किल ही नहीं, असंभव लगने लगता है. इसका बहुआयामी दुष्प्रभाव उनके परफॉरमेंस और रेटिंग पर पड़ना लाजिमी है. ऐसी स्थिति में आत्मविश्वास डोलने लगता है; बहानेबाजी और शार्ट-कट का सिलसिला चल पड़ता है. धीरे-धीरे ऐसे लोगों को अपने ज्ञान, कौशल एवं क़ाबलियत पर अविश्वास-सा होने लगता है. उनको कठिन कार्यों से डर और घबराहट होने लगती है. सफलता उनसे दूर होती जाती है. धीरे-धीरे वे लोग खुद को औसत या उससे भी कम क्षमतावान मानने लगते हैं और दूसरों की नजर में भी वैसा ही दिखने लगते हैं.
इसके विपरीत कुछ लोग सुबह पहले आवश्यक, महत्वपूर्ण और कठिन काम को यथाशक्ति अंजाम तक पहुँचाने में लग जाते हैं. अपने प्रयास में कोई कमी नहीं होने देते और अपनी सफलता के प्रति पूरा विश्वास बनाए रखते हैं. पाया गया है कि सामान्यतः उन्हें अपने प्रयास में सफलता मिलती है. अपवाद स्वरुप अगर कभी सफल नहीं होते हैं, तो बिना निराश हुए और अच्छे तरीके के दोबारा प्रयास करते हैं. यकीनन सभी अहम काम पूरा हो जाने पर उन्हें संतोष और खुशी दोनों मिलती है. अंदर से एक फील-गुड फीलिंग उत्पन्न होती है जिससे वे अतिरिक्त उत्साह और उमंग से भर जाते हैं. आत्मविश्वास में इजाफा तो होता ही है. अब वे बहुत आसानी और तीव्रता से आसान कार्यों को कर लेते हैं. शायद ही उनका कोई जरुरी काम छूटता है. इस तरह वे अपने सभी काम को निर्धारित समय सीमा के भीतर निष्पादित करते हैं. अगले दिन काम करने की उनकी यही शैली होती है. वे चुनौतियों से घबराते नहीं, बल्कि उनके स्वागत के लिए पूरी तरह तैयार रहते हैं. उनके लिए हर दिन एक नया दिन होता है और हर बड़ी-छोटी चुनौती से सफलतापूर्वक निबटना उनका मकसद.
दरअसल, आपको जब आज के तेज रफ़्तार कार्य संस्कृति में कई बार सबकुछ फटाफट एवं अच्छी तरह करना होता है, तब प्राथमिकता तय करके कार्य करना अनिवार्य होता है. नोट करने वाली बात यह है कि लगातार अच्छी सफलता अर्जित करनेवाले सभी लोग प्राथमिकता तय करके काम करने को कामयाबी तक पहुंचने का एक महत्वपूर्ण सूत्र मानते हैं. यहां एलन लेकीन की इस बात पर गौर करना फायदेमंद होगा कि अपनी प्राथमिकताओं की समीक्षा करें और यह सवाल पूछें – "हमारे समय का इस वक्त सबसे अच्छा उपयोग क्या है." इससे यह बात स्पष्ट होती है कि अगर अगले कुछेक घंटे में कई विषयों को पढ़ने या कई टास्क को पूरा करने की चुनौती हमारे सामने होती है, तो उसमें से कौन-सा पहले करें और कौन-सा बाद में, अपनी समझदारी से 'प्राथमिकता के सिद्धांत' को लागू करते हुए हम उन सबको को अति महत्वपूर्ण, महत्वपूर्ण और कम महत्वपूर्ण की तीन श्रेणी में बांट लेते हैं. और फिर प्राथमिकता के उसी क्रम को सामने रखकर न केवल सभी टास्क को यथासमय निबटाते हैं, बल्कि आगे उसके परिणाम में बेहतरी भी सुनिश्चित करते रहते हैं. हां, ऐसे समझदार लोग जरुरत पड़ने पर प्राथमिकता में थोड़ा-बहुत परिवर्तन के लिए मानसिक रूप से पूरी तरह तैयार भी रहते हैं, जिससे कि सभी काम उसके टाइमलाइन के हिसाब से पूरा हो जाय. कहना न होगा, जीवन के हर क्षेत्र में अत्यंत सफल, सफल और कम सफल लोगों के बीच एक बड़ा फर्क प्राथमिकता प्रबंधन में उनकी दक्षता से भी तय होता है.
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Saturday, April 15, 2023
जुनून है जरुरी
- मिलन सिन्हा, मोटिवेशनल स्पीकर एंड वेलनेस कंसलटेंट
1. लक्ष्य के प्रति समर्पण: रिंकू की जिन्दगी पर नजर डालने पर एक बात बिल्कुल साफ हो जाती है कि वह शुरू से ही क्रिकेट के प्रति पूर्णतः समर्पित रहा है. उसने क्रिकेट को अपना लक्ष्य बनाया और उस दिशा में तन -मन से लग गया. सच कहें तो उसने स्वामी विवेकानन्द की उस कथन को अपने जीवन में उतार लिया जिसमें स्वामी जी कहते हैं कि एक समय में एक काम करो, और ऐसा करते समय अपनी पूरी आत्मा उसमे डाल दो और बाकी सब कुछ भूल जाओ. उठो, जागो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य ना प्राप्त हो जाये.
2. कठिनाइयों से घबराना नहीं: हिन्दी फिल्म इम्तिहान का एक गाना है - रुक जाना नहीं तू कहीं हार के, काँटों पे चलके मिलेंगे साये बहार के. रिंकू सिंह की पारिवारिक पृष्ठभूमि पर गौर करें तो पता चलेगा कि आर्थिक तंगहाली के बीच कैसे एक लड़के ने कभी हिम्मत नहीं हारी और तमाम कठिनाइयों के बीच क्रिकेट के प्रति अपने जुनून को बनाए रखा और न केवल खुद निरंतर आगे बढ़ते रहे, बल्कि हमेशा अपने परिवार की आर्थिक उन्नति का जरिया बने.
3. कड़ी मेहनत करना: क्रिकेट हो या अन्य कोई भी खेल, राष्ट्रीय -अंतर राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचना और वहां अपनी एक पहचान बनाना कोई आसान काम नहीं है, क्यों कि हर खेल में आजकल बहुत प्रतिस्पर्धा है. इसके लिए कोई शॉर्टकट तरीका नहीं है. बस लगातार कड़ी मेहनत करनी पड़ती है. प्रसिद्ध अमेरिकी फुटबॉल खिलाड़ी तथा कोच विन्सेंट थॉमस लोम्बार्डी सही कहते हैं कि लीडर पैदा नहीं होते, खुद बनते हैं - कड़ी मेहनत की वजह से. और यही वो कीमत है जो इस या किसी और लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए चुकानी पड़ती है. उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले के इस लड़के ने इस बात को गांठ बांध ली और कभी कड़ी मेहनत से जी नहीं चुराया.
4. संयम रखना: इतिहास के पन्ने संयम से सफलता तक पहुंचनेवाले नायकों से भरे पड़े हैं. अब उसमें एक नाम रिंकू का भी जुड़ गया है. ऐसा इसलिए कि रिंकू ने हमेशा संयम का दामन थामे रखा. वह कई बार अपनी टीम के फाइनल सोलह में तो रहता था लेकिन फाइनल प्लेयिंग ग्यारह में आने से वंचित रह जाता. टीम में होने के बावजूद मैदान में मैच खेलने के बजाय बाहर बैठा खेल देखता, उससे सबक लेता, रेगुलर प्रैक्टिस करता और अपने सीनियर्स पर भरोसा करता. 9 अप्रैल को खेले गए मैच के अंतिम ओवर में उसने जिस संयम का परिचय दिया उसकी तारीफ सब लोग कर रहे हैं.
5. अवसर का सही उपयोग: सबके जीवन में ऐसे अवसर आते हैं जब आप कुछ नायाब और अदभुत काम कर सकते हैं. अगर आपने रिकू की तरह उस अवसर का सही उपयोग किया तो यकीनन आप सबको प्रभावित करेंगे और अभूतपूर्व उपलब्धि के हकदार बनेंगे. इससे आपकी एक अलग पहचान बनेगी, आर्थिक फायदे मिलेंगे, आप मोटिवेटेड फील करेंगे, आपका आत्मविश्वास बहुत बढ़ जाएगा और भविष्य में अवसर ने नए-नए द्वार खुलने लगेंगे. इन सबका प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष लाभ आपके परिवार, टीम या संस्था को भी होगा. निसंदेह रिकू सिंह जैसे युवा इसका ज्वलंत उदाहरण हैं.
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Saturday, October 29, 2022
ब्रेन स्ट्रोक समस्या है बड़ी, समाधान आसान
- मिलन सिन्हा, हेल्थ मोटिवेटर एंड वेलनेस कंसलटेंट
देश में ब्रेन स्ट्रोक के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. बीते वर्षों में बड़ी संख्या में युवा भी इसके चपेट में आ रहे हैं. यह गंभीर चिंता का विषय है. दुःख की बात है कि समुचित जागरूकता के अभाव में ब्रेन स्ट्रोक के लक्षण की समय रहते पहचान नहीं हो पाती है जिसके कारण अधिकतर लोग अस्पताल या डॉक्टर तक नहीं पहुंच पाते हैं और फलतः विकलांगता या मौत के शिकार हो जाते हैं. आंकड़े बताते हैं कि देश में हर साल 18 लाख से ज्यादा लोग ब्रेन स्ट्रोक से पीड़ित होते हैं. दरअसल, ब्रेन में ब्लड क्लोटिंग या धमनियों के फटने पर होने वाले अधिक रक्तस्राव के कारण ऐसा होता है. इससे ब्रेन में ऑक्सीजन और अन्य पोषक तत्वों की कमी हो जाती है और ब्रेन का कार्य प्रणाली बाधित होती है. मिनटों में ब्रेन सेल्स को बहुत क्षति होती है. यह एक मेडिकल इमरजेंसी है और त्वरित उपचार से समस्या का निराकरण संभव है.
ब्रेन स्ट्रोक से शारीरिक नुकसान
ब्रेन स्ट्रोक के कारण व्यक्ति को चलने, बोलने, सुनने, खाने-पीने, हंसने, याद रखने, शरीर के अंगों पर नियंत्रण रखने में समस्या हो सकती है. ब्रेन स्ट्रोक के गंभीर मामलों में मौत का खतरा भी रहता है.
ब्रेन स्ट्रोक के कुछ मुख्य कारण
उच्च रक्त चाप, मधुमेह, मानसिक तनाव, डिप्रेशन, धुम्रपान व शराब की लत इसके मुख्य कारण हैं.
ब्रेन स्ट्रोक के प्रमुख लक्षण
शारीरिक संतुलन न रख पाना, अचानक देखने में दिक्कत होना, चेहरे में विकार या टेड़ापन होना, हाथों को ऊपर न उठा पाना, बोलने या हंसने में तकलीफ होना.
ब्रेन स्ट्रोक से बचे रहने के उपाय
संतुलित जीवनशैली अपनाएं, जिसमें संतुलित आहार, शारीरिक व्यायाम, योगाभ्यास व ध्यान, रात में 7-8 घंटे की अच्छी नींद शामिल हो. इसके साथ-साथ स्ट्रेस को मैनेज करना और खुश रहना सीखें. पोटैशियम और मैग्नीशियम युक्त फल और सब्जियों, जैसे पालक, टमाटर, शकरकंद, सेब, अनार, तरबूज, अखरोट, आलमंड को दैनिक आहार का अहम हिस्सा बनाएं. फ्रोजेन, प्रोसेस्ड, जंक, पैकेज्ड एवं फ्राइड फ़ूड से बचें.
ब्रेन स्ट्रोक के मामले का मेडिकल उपचार
जाने-माने न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. यू. के. मिश्रा के अनुसार ब्रेन स्ट्रोक दो प्रकार के होते हैं. पहले को ब्रेन हैमरेज और दूसरे को इसकेमिक स्ट्रोक कहते हैं. ब्रेन स्ट्रोक के ज्यादातर मामले दवाओं और इंजेक्शन से ठीक कर लिए जाते है. लेकिन इसके अच्छे परिणाम तभी मिलते हैं, जब रोगी को चार घंटे के अंदर उपचार मिल जाता है.
Thursday, November 5, 2020
आज की बात: बिहार चुनाव - मेरे विचार
- मिलन सिन्हा, मोटिवेशनल स्पीकर व लेखक
बिहार में सबकुछ है - अत्यन्त गौरवशाली अतीत, जिसका उल्लेख वेदों, पुराणों एवं महाकाव्यों तक में प्रचुरता में मिलता है; उर्वरा जमीन, नदियों का जाल और पानी की बहुलता; बिहारियों की मेधा और सादगी, मेहनत व संघर्ष के बूते आगे बढ़ने की क्षमता व जज्बा, राजनीतिक जागरूकता आदि. फिर भी अपेक्षाकृत बेहतर स्टेट जीडीपी दर का अपेक्षित फायदा गरीबी उन्मूलन, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, रोजगार आदि क्षेत्रों और राज्य के सभी इलाकों और समुदायों को समावेशी रूप में नहीं मिल पाया है; बिहार की प्रति व्यक्ति आय पिछले एक दशक में बेहतर तो हुई है, परन्तु यह अब भी देश के अग्रणी राज्यों के मुकाबले आधे से भी कम है. लिहाजा बिहार में मानव विकास सूचकांक कमजोर है. इस स्थिति में गुणात्मक बदलाव के लिए यह जरुरी है कि प्रशासन की कार्यशैली पूर्णतः पारदर्शी, जनोन्मुख और भ्रष्टाचारमुक्त - व्यक्तिगत और संस्थागत हो. समाज को भी जागरूक और सचेत रहकर गलत करनेवालों को टोकने और रोकने के मामले में आगे आना पड़ेगा.
पिछले दो विधानसभा चुनाव (2010 और 2015) में वोटिंग 60 प्रतिशत से कम रहा है. इस बार भी पहले दो चरणों में वोटिंग लगभग 56 प्रतिशत रही. लोकतंत्र के इस बड़े उत्सव में करीब 44 प्रतिशत वोटरों की भगीदारी न होना गंभीर चिंता का विषय है. सभी संबंधित पक्ष - समाज, सरकार, राजनीतिक दल, चुनाव आयोग आदि को इस पर सार्थक चर्चा-विमर्श करने और इसमें गुणात्मक सुधार (वोटिंग प्रतिशत कम-से-कम 80%) करने हेतु ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है. बहरहाल, बिहारवासियों से यही अपेक्षा है कि वे तीसरे चरण के मतदान में बड़ी संख्या में मताधिकार का प्रयोग करें तथा अच्छे व सच्चे प्रतिनिधि का चुनाव सुनिश्चित करें. तभी लोकतंत्र मजबूत और सफल होगा और बिहार का भविष्य बेहतर भी.
मुझे विश्वास है कि बिहार के लोग जो ठान लेंगे, उसे कर लेंगे और सरकार से करवा भी लेंगे.
Monday, October 26, 2020
आजादी का सही मतलब
- मिलन सिन्हा, मोटिवेशनल स्पीकर, स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट ... ...
सभी देशवासी आजादी की 73वीं वर्षगांठ मना रहे हैं. युवाबहुल हमारे देश में यह एक ख़ास अवसर होता है, जब आजादी के सही मतलब और उसकी सार्थकता पर विचार-विमर्श का दौर भी चल पड़ता है. ऐसे देश के कुछ कॉलेज - यूनिवर्सिटी में यह सालोंभर बहस का बड़ा विषय होता है. वहां के अनेक विद्यार्थी इस बहस में अपना बड़ा समय व्यतीत करते हैं, फिर भी आजादी के सही अर्थ को समझने में सफल नहीं हो पाते हैं. उनमें से कई विद्यार्थी तो स्वार्थी तत्वों द्वारा निर्मित अंतहीन वाद-विवाद के चक्रव्यूह में भी फंस जाते हैं. जीवन के प्राइम टाइम को वे जाने-अनजाने यूँ ही गंवा देते हैं, जिसका नुकसान उनके साथ-साथ उनके परिवार-समाज को भी उठाना पड़ता है. ब्रिटिश इतिहासकार, समाज सुधारक और उपन्यासकार चार्ल्स किंग्सले कहते हैं कि "संसार में बस दो तरीके की आजादी है – एक झूठी जिसमें व्यक्ति वह करने के लिए स्वतंत्र है, जो वह चाहता है और दूसरी सच्ची जिसमें व्यक्ति वह करने के लिए स्वतंत्र है, जो उसे करना चाहिए." चाहने और चाहिए के बीच के महत्वपूर्ण अंतर को समझना सभी विद्यार्थियों के लिए निहायत जरुरी है.
दरअसल, छात्र जीवन हर विद्यार्थी को यह जानने-समझने का स्वर्णिम अवसर देता है कि आजादी का सही मतलब क्या है. ज्ञानीजन कहते हैं कि अज्ञानता, रूढ़िवादिता, गुलामी, अन्याय, आडम्बर आदि से निकलने के फायदों को जानना और उससे आजाद होने के उपाय तलाशने में दक्ष होना सभी छात्र-छात्राओं के लिए शिक्षित होने के साथ-साथ आजाद होने का वास्तविक प्रमाणपत्र है. स्वामी विवेकानंद सहित कई महान लोगों ने स्पष्ट रूप से यह बात कही है कि सिर्फ कुछ डिग्रियां प्राप्त करने, अच्छा कपड़ा पहनने या अच्छा भाषण देने से ही किसी को शिक्षित नहीं कहा जा सकता. वास्तव में शिक्षा विद्यार्थियों को जीवन संग्राम में समर्थ बनाती है, उनमें चारित्रिक शक्ति और परहित की भावना विकसित करती है. मतलब, जो कुछ बुरा है उससे आजादी.
व्यक्ति की आजादी का सबसे सरल अर्थ लोग यह लगाते हैं कि वह जो करना चाहते हैं, उसे कर सकें. विद्यार्थियों को फोकस में रखकर बात करें तो इसमें मुख्यतः पढ़ने-लिखने, खेलने-कूदने, घूमने-फिरने, खाने-पीने, बोलने-सुनने की आजादी जैसी बातें शामिल है. ख़ुशी की बात है कि भारत के संविधान के अनुसार चलनेवाले हमारे लोकतंत्र में छात्र-छात्राओं को यह आजादी उपलब्ध है. लेकिन क्या आजादी के नाम पर कई विद्यार्थियों का कई प्रकार के अवांछित और गैर-कानूनी कार्यों में लिप्त रहने को सही माना जा सकता है? बहरहाल, आजादी के पक्षधर सभी विद्यार्थियों के लिए इस समय सबसे जरुरी है ज्ञान अर्जन करना, अपनी समझदारी विकसित करना और अपनी शारीरिक-मानसिक कमजोरी से आजाद होना. हां, इसके लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार विजेता प्रसिद्ध फ्रेंच लेखक और दार्शनिक अल्बर्ट कामू के इस बात को हमेशा याद रखना पड़ेगा कि "आजादी और कुछ नहीं, बस बेहतर होने का एक अवसर है." कहने का तात्पर्य यह कि हर विद्यार्थी आजादी को एक ऐसे औजार के रूप में उपयोग करे जिससे कि वे अज्ञानता, बुराई और कमजोरी के अंधकार से निकलकर प्रकाशवान व्यक्तित्व का मालिक बन सके. इसके लिए उन्हें संकल्प से सिद्धि के मार्ग पर चलते रहना पड़ेगा; हर मौके का भरपूर उपयोग करना पड़ेगा; एक-एक पल का सदुपयोग सुनिश्चित करना पड़ेगा और बातों का बादशाह बनने के बजाय कर्मयोगी बनना पड़ेगा. इसके अनेकानेक लाभ हैं.
देश की स्वतंत्रता के सात दशक गुजर जाने और विकास पथ पर आगे बढ़ते रहने के बावजूद हमारा देश अब भी रोटी, कपड़ा और मकान के सबसे बुनियादी आवश्यकताओं से आजाद नहीं हो पाया है. शिक्षा, स्वास्थ्य और बेरोजगारी जैसे अन्य बुनियादी मसले भी सामने हैं. समाज की इन समस्याओं का हल निकालने में शिक्षित युवाओं के आगे आकर सार्थक प्रयास करने की अपेक्षा उनके घरवालों के साथ-साथ समाज और सरकार को भी है. देश की सीमाओं पर भी तनाव है. बाढ़ जैसी आपदा के साथ-साथ कोरोना महामारी से निबटना भी कम बड़ी चुनौती नहीं है. ऐसे अनेक तात्कालिक और दीर्घकालिक समस्याओं से खुद को, समाज को और देश को आजाद करने का सतत प्रयास करना ही आजादी को सार्थक करना है. दक्षिण अफ्रीका के महान स्वतंत्रता सेनानी और नोबेल पुरस्कार विजेता भारत रत्न नेल्सन मंडेला इसे इन शब्दों में व्यक्त करते है : "आजाद होना सिर्फ अपनी जंजीरों को उतार देना नहीं होता, बल्कि इस तरह से जीवन जीना होता है कि दूसरों के सम्मान और स्वतंत्रता में वृद्धि हो."
(hellomilansinha@gmail.com)
# लोकप्रिय साप्ताहिक "युगवार्ता" के 30.08.2020 अंक में प्रकाशित
Wednesday, August 22, 2018
आज की बात : मानव तस्करी और हम
रांची से प्रकाशित आज के कई अखबारों में मानव तस्करी से जुड़ी खबर है. यह बात सामने आ रही है कि झारखण्ड राज्य की 15 हजार बालिकाएं ट्रैफिकिंग की शिकार हो रहीं हैं. द ट्रैफिकिंग ऑफ़ पर्सन बिल, 2018 की चर्चा भी हो रही है. यह बिल लोकसभा में पारित हो चुका है. आशा करनी चाहिए कि राज्यसभा से भी पारित होने के बाद इस कानून के तहत मानव तस्करी पर लगाम लगाने में प्रशासन को कुछ और आसानी होगी.दरअसल, पिछले कई वर्षों से मानव तस्करी की घटनाएं उत्तरोत्तर बढ़ती रही है. उसमें भी चाइल्ड ट्रैफिकिंग, खासकर गर्ल्स ट्रैफिकिंग में चिंताजनक वृद्धि दर्ज हुई है. अपेक्षाकृत पिछड़े प्रदेशों में ये घटनाएं अप्रत्याशित रूप से बढ़ी है. झारखण्ड प्रदेश इनमें शामिल है. अखबारों में यहाँ की लड़कियों जिनमें आदिवासी लड़कियों की संख्या अधिक होती है, के अन्य प्रदेशों एवं महानगरों में ले जाकर बेचने तथा कई अवांछित कार्य में ढकेलने की ख़बरें छपती रही हैं. अब तो मानव तस्करी के घृणित अपराध के पीछे के एक अन्य कारण के रूप में अंग विक्रय भी शुमार हो चुका है.
कहने की जरुरत नहीं कि समाज में व्याप्त गरीबी, बेकारी, बीमारी, अशिक्षा आदि तो जाने-अनजाने मानव तस्करी में लिप्त असामाजिक तत्वों का काम आसान कर देती है, तथापि इस बात से कौन इन्कार कर सकता है कि पुलिस प्रशासन की निष्क्रियता, अनेक मामलों में संलिप्तता और घटनाओं के प्रकाश में आने के बाद भी कार्रवाई में शिथिलता के साथ-साथ कई राजनीतिक एवं सफेदपोश लोगों को बचाने के चक्कर में मानव तस्करी की घटनाएं इस हद तक बढ़ पाई है.
विचारणीय प्रश्न यह है कि सिर्फ नए कानून बना देने मात्र से इन घटनाओं को रोकना संभव हो पायेगा? मेरे विचार से तो नहीं. इसके लिए सोशल डेवलपमेंट इंडेक्स में उत्तरोत्तर तीव्र गुणात्मक सुधार की आवश्यकता तो है ही, पुलिस प्रशासन को संवेदनशील बनाने और उनकी जिम्मेदारी तय करने की भी उतनी ही आवश्यकता है. मानव तस्करी के सभी लंबित मामलों को एक समयावधि में निपटाने के लिय न्यायपालिका को भी कोई रास्ता निकालना पड़ेगा. तस्करी के शिकार बच्चों, खासकर लड़कियों को समुचित काउंसलिंग तथा सामाजिक पुनर्वास की सुविधा सुलभ हो, ऐसी व्यवस्था सरकार एवं समाज को मिलकर करनी पड़ेगी.
Saturday, December 30, 2017
आज की बात : दुष्यन्त कुमार को याद करते हुए
इस अंधेरी कोठरी में एक रोशनदान है.
तभी तो वे ऐसा लिख सकते थे:
जिन आंसुओं का सीधा तआल्लुक था पेट से,
और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।
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Sunday, December 24, 2017
आज की बात : किसी को जेल, किसी को बेल और कुछ मासूम सवाल
अमूमन ऐसी राजनीतिक चर्चाओं में लोग दलगत एवं व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों से चालित होते पाए जाते हैं. ऐसे में, उसमें तर्क, तथ्य और तारतम्य का अभाव स्वभाविक होता है. तथापि ऐसे तर्क-वितर्क में लोग समय न बिताएं, ऐसा राजनीतिक रूप से अति जागरूक हमारे समाज में कहाँ मुमकिन है ?
बस चलते-चलते कुछ मासूम एवं स्वभाविक सवाल :
- राजनीतिक नेताओं के खिलाफ चलने वाले सभी क्रिमनल केसों के स्पीडी ट्रायल की औपचारिक कानूनी व्यवस्था क्यों नहीं की जाती, जब कि इसके एकाधिक फायदे हैं - समाज और सरकार के साथ-साथ आरोपी नेताओं के लिए भी ?
- रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड जैसे ज्यादा भीड़-भाड़ वाले स्थानों के बिल्कुल निकट नेताओं के ठहरने और उनके हजारों समर्थकों के जमा होने से जुड़े जोखिम और संभावित उपद्रव को कम करके आंकना क्या उचित है?
- आम जनता, बड़े नेता और उनके समर्थकों के लिए क्या यह बेहतर नहीं होता कि लालू जी जैसे नेता को कोर्ट के नजदीक किसी स्थान पर ठहराया जाता या उनसे किसी ऐसे स्थान पर ठहरने का आग्रह प्रशासन द्वारा किया जाता ?
- क्या किसी भी नेता- राजनीतिक या धार्मिक, के पक्ष में कथित समर्थकों की असीमित भीड़ को किसी भी शहर की रोजमर्रा की जिंदगी को दुष्प्रभावित करने की छूट प्रशासन को देनी चाहिए, खासकर ऐसे ही एक प्रकरण में हाल ही में चंडीगढ़-पंचकुला में हुए व्यापक उपद्रव-तोड़फोड़ के मद्देनजर ?
- क्या ऐसे अवसरों पर स्थानीय पुलिस प्रशासन को अपने सबसे अच्छे कर्मियों को भीड़ प्रबंधन एवं कानून - व्यवस्था सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी नहीं देनी चाहिए, जिससे वे बिना भय और पक्षपात के निष्पक्ष होकर कानून सम्मत कार्य कर सकें ?
- क्या मीडिया के लिए, खासकर ऐसे मामलों में स्व-निर्धारित मानदंड के तहत संतुलित एवं तथ्यपरक समाचार संप्रेषित करने की अतिरिक्त जिम्मेदारी नहीं होनी चाहिए ?
और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।
Saturday, December 23, 2017
आज की बात : ऊर्जा संवाद और हम
- देश में आजादी के वक्त बिजली का कुल उत्पादन 1368 मेगा वाट था जो अभी बढ़कर 3,38,000 मेगा वाट हो गया है.
- सौर ऊर्जा ही हमारे गांवों के लिए सर्वथा उपयोगी है, जिसके लिए हमें अपना पारम्परिक नजरिया बदलना होगा.
- दिसम्बर,2014 में झारखण्ड के कुल 68 लाख परिवारों में से 30 लाख परिवार को बिजली उपलब्ध नहीं थी. पिछले तीन वर्षों में इसमें बहुत सुधार हुआ है और 2018 के अंत से पहले सभी घरों तक बिजली जरुर पहुंचाई जायेगी. ऐसा झारखण्ड सरकार का दृढ़ विश्वास है और प्रधानमंत्री का निर्देश भी.
- प्रधानमंत्री का तो कहना यह है कि देश के हर परिवार को 2018 की समाप्ति से पूर्व विश्वसनीय (reliable) और खर्च वहन करने योग्य (affordable) बिजली मिलने लगे.
- ऐसे, आंकड़े बताते हैं कि देश में प्रति व्यक्ति बिजली खपत विश्व औसत से मात्र एक तिहाई है, और चीनी औसत से भी.
- वर्ल्ड रिज़र्व के मुकाबले देश में गैस रिज़र्व मात्र 0.6 %, तेल रिज़र्व 0.4 % और कोल रिज़र्व 7% है.
- ताजा आंकड़ों के मुताबिक़ देश में सम्प्रति 300 बिलियन टन कोल रिज़र्व है.
- वर्तमान में देश में सालाना कोल उत्पादन 660 मिलियन टन होता है.
- अभी भी देश में कुल बिजली उत्पादन का करीब 60 % कोयले पर निर्भर है.
- बिजली के उत्पादन, संचरण एवं वितरण में जो तमाम तरह की कमियां और अनियमिततायें हैं, उन पर गंभीरता से ध्यान देने की जरुरत है.
- हमें ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों पर ज्यादा ध्यान देने की जरुरत तो है, लेकिन साथ ही ऊर्जा के संरक्षण पर भी उतना ही ध्यान देना आवश्यक है.
- झारखण्ड के मुख्यमंत्री के अनुसार झारखण्ड राज्य 'पॉवर हब' बनने की ओर अग्रसर है.
Tuesday, November 21, 2017
Thursday, October 12, 2017
प्रेरक प्रसंग : कैसे पहुंचे लोहिया मद्रास से कलकत्ता ?
और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।
# डॉ. राममनोहर लोहिया की पुण्यतिथि के अवसर पर
#For Motivational Articles in English, pl. visit my site : www.milanksinha.com









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