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Sunday, March 30, 2025

रिजल्ट जैसा भी आया है, उसे मन से स्वीकार करें

                         -- मिलन सिन्हा, मोटिवेशनल स्पीकर एंड स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट


बिहार बोर्ड की दसवीं अर्थात मेट्रिक परीक्षा का परिणाम आ गया है, जिसमें
82.11% विद्यार्थी उत्तीर्ण हुए. आमतौर पर रिजल्ट के दिन का माहौल कहीं खुशी, कहीं गम का होता है. खैर, अब जब कि रिजल्ट आ गया है तो खासकर ऐसे विद्यार्थी जिनका रिजल्ट उनकी अपेक्षा के प्रतिकूल या खराब आया है, उन्हें निम्नलिखित बातों पर गंभीरता से सोच-विचार करना चाहिए: 

1) जीवन से बड़ा कुछ भी नहीं. आपका जीवन अनमोल है. सफलता-असफलता सभी के जीवन में आते रहते हैं. जीवन में एक के बाद दूसरी परीक्षा आती रहेगी और आपको बेहतर से बेहतर परिणाम हासिल करने का अवसर भी मिलता रहेगा. इतिहास के पन्ने ऐसे हजारों रियल लाइफ सक्सेस स्टोरी से भरे पड़े हैं, जिसमें हर शख्स ने कंफ्यूशियस के इस विचार को अपने कर्मों से साबित किया है कि 'हमारी महानतम विशालता कभी भी न गिरने में नहीं, बल्कि गिरने पर हर बार फिर उठ जाने में निहित है.'

2) इस बार रिजल्ट जैसा भी आया है, उसे मन से स्वीकार करें. 'टेक-इट-इजी' सिद्धांत का पालन करते हुए किसी के भी डांट- फटकार, कटाक्ष, आलोचना, व्यंग्य आदि को दिल से न लें.

3) किस दोस्त या सहपाठी को कितने मार्क्स आए, इसको जानने और इसकी विवेचना-आलोचना  से बचें क्यों कि इससे आपके मार्क्स तो इम्प्रूव नहीं होंगे, उलटे समय की बर्बादी होगी और नेगेटिव थॉट्स में वृद्धि.

4) दूसरे को दोष देने के बजाय मन ही मन यह दोहरायें - जो हुआ, ठीक ही हुआ. मैंने जैसी परीक्षा दी, परिणाम कमोबेश उसी के अनुरूप आया; आगे सुधार करेंगे तो बेहतर होगा रिजल्ट.

5) अगर रीचेकिंग या इम्प्रूवमेंट का प्रावधान या व्यवस्था है, तो उसका उपयोग करें. अगर मार्क्स या रिजल्ट में सुधार होता है तो बोनस के रूप में अतिरिक्त ख़ुशी के हकदार बनेंगे.

6) किसी भी स्थिति में निराश, हताश या तनावग्रस्त होने की बिलकुल जरुरत नहीं है. आवेग या आवेश में किसी भी प्रकार के आत्मघाती कदम उठाने का विचार तक मन में न लायें.

7) इसके बावजूद भी अगर तनाव महसूस हो तो थोड़ी देर खुली हवा में आँख बंद कर बैठें और डीप ब्रीदिंग करें; घर में आपके सबसे प्रिय व्यक्ति से खुल कर बात करें या अपने सबसे अच्छे दोस्त से बात करें, टीवी आदि पर कॉमेडी शो का आनन्द लें, पर्याप्त पानी/ मौसमी फल का रस पीएं और नींद का पूरा लाभ उठाएं. आपका तनाव स्वतः बहुत कम हो जाएगा.

8) इस समय बस शांति और संयम से खुद को रीऑर्गनाइज करें और एक संकल्प लें कि पीछे कोई भूल  हुई है तो उसे आगे नहीं दोहराएंगे, खूब मेहनत करेंगे और एक प्रभावी रूटीन फॉलो करते हुए आगे जरुर कामयाब होंगे.

9) माता-पिता सहित घर के सभी बड़ों के सामने अपनी गलती को स्वीकारते हुए उन्हें आगे बेहतर रिजल्ट का आश्वासन दें और उनका मार्गदर्शन और आशीर्वाद प्राप्त करें. यकीन मानिए, आपका कल आज से जरुर बेहतर होगा. आप सफल तो होंगे ही, स्वस्थ और आनंदित भी रहेंगे.            (hellomilansinha@gmail.com)

                   और भी बातें करेंगे,
 चलते-चलते. असीम शुभकामनाएं.         

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Saturday, April 15, 2023

जुनून है जरुरी

                                    - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर एंड वेलनेस  कंसलटेंट









9 अप्रैल, 2023 को अहमदाबाद के नरेन्द्र मोदी स्टेडियम में गुजरात टाइटन्स   और कोलकाता नाईट राइडर्स (केकेआर) के बीच खेले गए आईपीएल 20-20 मैच का समापन बेहद रोमांचक और अविस्मरणीय रहा. हो भी क्यों नहीं? जीत के लिए केकेआर को अंतिम पांच गेंद पर 28 रन बनाने थे, जो नामुमकिन प्रतीत हो रहा था, लेकिन केकेआर टीम के एक कम ज्ञात बल्लेबाज रिंकू सिंह ने एक के बाद एक पांच छक्के जड़ कर अपनी टीम की जीत को मुमकिन बना दिया. 

आईपीएल के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ जब किसी टीम ने मैच के आखिरी ओवर में इतने रन बनाकर जीत हासिल की हो. इस तरह रिंकू ने एक नया इतिहास रच दिया और रातोंरात आईपीएल क्रिकेट का हीरो बन गया. सोशल मीडिया में बॉलीवुड के सितारों सहित हजारों लोगों ने रिंकू सिंह के क्रिकेट के प्रति जुनून के बारे लिखा और उसकी भरपूर प्रशंसा की. दरअसल रिंकू ने अपने इन पांच छक्कों के माध्यम से युवा पीढ़ी को पांच संदेश दिए हैं, ऐसा मैं मानता हूँ . क्या हैं वे पांच संदेश, आइए जानते हैं. 

1. लक्ष्य के प्रति समर्पण: रिंकू की जिन्दगी पर नजर डालने पर एक बात बिल्कुल साफ हो जाती है कि वह शुरू से ही  क्रिकेट के प्रति पूर्णतः समर्पित रहा है. उसने क्रिकेट को अपना लक्ष्य बनाया और उस दिशा में तन -मन से लग गया. सच कहें तो उसने स्वामी विवेकानन्द की उस कथन को अपने जीवन में उतार लिया जिसमें स्वामी जी कहते हैं कि एक समय में एक काम करो, और ऐसा करते समय अपनी पूरी आत्मा उसमे डाल दो और बाकी सब कुछ भूल जाओ. उठो, जागो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य ना प्राप्त हो जाये.

2. कठिनाइयों से घबराना नहीं: हिन्दी फिल्म इम्तिहान का एक गाना है - रुक जाना नहीं तू कहीं हार के, काँटों पे चलके मिलेंगे साये बहार के. रिंकू सिंह की पारिवारिक पृष्ठभूमि पर गौर करें तो पता चलेगा कि आर्थिक तंगहाली के बीच कैसे एक लड़के ने कभी हिम्मत नहीं हारी और तमाम कठिनाइयों के बीच क्रिकेट के प्रति अपने जुनून को बनाए रखा और न केवल खुद निरंतर आगे बढ़ते रहे, बल्कि हमेशा अपने परिवार की आर्थिक उन्नति का जरिया बने. 

3. कड़ी मेहनत करना: क्रिकेट हो या अन्य कोई भी खेल, राष्ट्रीय -अंतर राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचना और वहां अपनी एक पहचान बनाना कोई आसान काम नहीं है, क्यों कि हर खेल में आजकल बहुत प्रतिस्पर्धा है. इसके लिए कोई शॉर्टकट तरीका नहीं है. बस लगातार कड़ी मेहनत करनी पड़ती है. प्रसिद्ध अमेरिकी फुटबॉल खिलाड़ी तथा कोच विन्सेंट थॉमस लोम्बार्डी सही कहते हैं कि लीडर  पैदा  नहीं  होते, खुद बनते हैं - कड़ी मेहनत की वजह से. और  यही  वो  कीमत  है  जो  इस  या  किसी  और  लक्ष्य   को  प्राप्त  करने  के  लिए  चुकानी  पड़ती  है. उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले के इस लड़के ने इस बात को गांठ बांध ली  और कभी कड़ी मेहनत से जी नहीं चुराया. 

4. संयम रखना: इतिहास के पन्ने संयम से सफलता तक पहुंचनेवाले नायकों से भरे पड़े हैं. अब उसमें एक नाम रिंकू का भी जुड़ गया है. ऐसा इसलिए कि रिंकू ने हमेशा संयम का दामन थामे रखा. वह कई बार अपनी टीम के फाइनल सोलह में तो रहता था लेकिन फाइनल प्लेयिंग ग्यारह में आने से वंचित रह जाता. टीम में होने के बावजूद मैदान में मैच खेलने के बजाय बाहर बैठा खेल देखता, उससे सबक लेता,  रेगुलर प्रैक्टिस करता और अपने सीनियर्स पर भरोसा करता. 9 अप्रैल को खेले गए मैच के अंतिम ओवर में उसने जिस संयम का परिचय दिया उसकी तारीफ सब लोग कर रहे हैं. 

5. अवसर का सही उपयोग: सबके जीवन में ऐसे अवसर आते हैं जब आप कुछ नायाब और अदभुत काम कर सकते हैं. अगर आपने रिकू की तरह उस अवसर का सही उपयोग किया तो यकीनन आप सबको प्रभावित करेंगे और अभूतपूर्व उपलब्धि के हकदार बनेंगे. इससे आपकी एक अलग पहचान बनेगी, आर्थिक फायदे मिलेंगे, आप मोटिवेटेड फील करेंगे, आपका आत्मविश्वास बहुत बढ़ जाएगा और भविष्य में अवसर ने नए-नए द्वार खुलने लगेंगे. इन सबका प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष लाभ आपके परिवार, टीम या संस्था को भी होगा. निसंदेह रिकू सिंह जैसे युवा इसका ज्वलंत उदाहरण हैं. 

  (hellomilansinha@gmail.com)

      
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं। 

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Thursday, February 2, 2023

जानें, सीखें और आगे बढ़ें

                              - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर एंड स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट 


हाल ही में  पराक्रम दिवस पर आयोजित "अपने नेता को जानो" कार्यक्रम के दौरान देश भर से आए युवाओं के साथ संवाद करते हुए प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने उन्हें महान एवं विख्यात लोगों  की बायोग्राफी-ऑटोबायोग्राफी यानी जीवनी-आत्मकथा पढ़ने की बहुत अच्छी सलाह दी.
  मेरा  मत है कि युवाओं के साथ-साथ हरेक व्यक्ति को  इस सुझाव पर अमल करना चाहिए. यकीनन इसके बहुआयामी फायदे हैं. आइए, कुछ महत्वपूर्ण फायदों की चर्चा करते हैं. 


जीवन परिचय:
इसके जरिए आपको महान लोगों का विस्तृत जीवन परिचय मिलता है. जन्म से लेकर मृत्यु तक उनकी जीवन यात्रा में आए उतार-चढ़ाव, विभिन्न पडावों और छोटे-बड़े मुकामों की जानकारी मिलती है. आप उनकी पारिवारिक स्थिति के साथ-साथ उस समय की शैक्षणिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक-प्रशासनिक परिवेश से अवगत होते हैं. इन जानकारियों से वर्तमान में खुद की  स्थिति-परिस्थिति से उसकी तुलना करना और उनमें से अच्छी बातों को जानना-समझना और उसे अपने जीवन में उतारना आसान हो जाता है. आप उनके व्यक्तित्व से प्रभावित होते हैं और धीरे-धीरे उनसे जुड़ते चले जाते हैं. सच कहें तो "वे कर सकते हैं तो हम भी कर सकते हैं" जैसी सकारात्मक भावना आपके अन्दर भी आ जाती है. 


प्रेरणा:
उनके जीवनी के अध्ययन से आपको उनके व्यक्तित्व के अनेक अनजाने महत्वपूर्ण पहलुओं से परिचित होने का मौका मिलता है. आप अनायास ही यह जान पाते हैं कि ऐसे लोगों ने  किस तरह बड़े-बड़े लक्ष्यों को प्राप्त किया, जब कि उसी परिस्थिति में और उसी काल खंड में उनके जैसे अन्य हजारों-लाखों लोग वैसा कुछ नहीं कर पाए. इन बातों को जानकार आपको बहुत अच्छा लगता है और आप खुद को कुछ वैसा ही विशिष्ट कार्य करने के प्रति उत्साहित और प्रेरित महसूस करते हैं. अपने देश के सार्वजनिक जीवन में असाधारण सफलता हासिल करनेवालों के जीवन पर नजर डालें, चाहे वे महात्मा गांधी, सुभाष चन्द्र बोस, लालबहादुर शास्त्री, सरदार पटेल, राजेंद्र प्रसाद, जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया, दीनदयाल उपाध्याय या अब्दुल कलाम हों, सबने किसी-न-किसी महान व्यक्ति से प्रेरणा ग्रहण की और अपने जीवन पथ पर दृढ़ संकल्प और समर्पण से आगे बढ़ते गए. 

  
प्रयास करते रहें:
महान लोगों के बारे में पढ़ने से आपका यह विश्वास और मजबूत होता है कि यथाशक्ति और यथाबुद्धि हमेशा प्रयास करते रहना चाहिए, क्यों कि सतत प्रयास से ही सफलता हासिल होती है. जो प्रयास ही नहीं करेगा उसके सफल होने का तो कोई सवाल ही नहीं उठता. दूसरी बात यह कि प्रयास करनेवाले ही असफल होते हैं. जिसने प्रयास तक नहीं किया, उसकी सफलता-असफलता की तो कोई चर्चा ही नहीं करता, जैसे कि जो खिलाड़ी मैच खेलने मैदान में उतरा ही न हो, उसके जीतने-हारने की चर्चा बेमानी होती है. एक अहम बात और. ऐसे विभूतियों के जीवन से आपको यह सबक मिलती है कि अपने प्रयास के प्रति वे कितनी  निष्ठा, प्रतिबद्धता और नियमितता का आस्थापूर्वक पालन करते थे. इलेक्ट्रिक बल्ब के आविष्कारक थॉमस अल्वा एडिसन इसके ज्वलंत उदाहरण हैं. देश भर में जिस नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के जन्म दिवस को पराक्रम दिवस के रूप मनाया जाता है, उनका जीवन भी उत्कृष्ट प्रयास की पराकाष्ठा की कहानी कहता है. 



चुनौतियों व समस्याओं  से निबटने की सीख:
सबको अपने जीवन में कम या ज्यादा चुनौतियों और समस्याओं का सामना करना पड़ता है. उनसे निबटने के सबके तरीके एक जैसे नहीं होते. महान लोगों के जीवन की चुनौतियां एवं समस्याएं स्वाभाविक रूप से बड़ी और कई बार असाधारण होती है. प्रतिकूल परिस्थिति में भी वे उनसे सफलतापूर्वक निबटने के लिए जाने जाते हैं. उनकी जीवनी के अध्ययन से आप उनके ऐसे अनुभवों से परिचित होते हैं. कहते हैं कि एक साधारण व्यक्ति केवल अपने अनुभवों से सीखता है, जब कि एक बुद्धिमान व्यक्ति दूसरों के अनुभवों से भी सीखता रहता है. कहने का अभिप्राय यह कि देश-विदेश के विभूतियों के जीवनवृत्त से परिचित होकर आप अपने जीवन की चुनौतियों और समस्याओं का बेहतर ढंग से सामना कर सकते हैं और सफलता के नए-नए कीर्तिमान बना सकते हैं.  

   
संयम बनाए रखें:
संयम के बिना सफलता नहीं मिलती है. दरअसल, जीवन में संयम का पालन करना कामयाबी की कुंजी है. असंख्य गुणीजनों ने जीवन  में संयम की अनिवार्यता एवं अहमियत को अपने कर्मों से साबित किया है और रेखांकित भी. शोध कार्य में लगे विद्वानों-वैज्ञानिकों को जरा गौर से काम करते हुए देखिए  या उनके विषय में पढ़िए तो आपको पता  चलेगा कि संयम का दामन थामकर वे साल-दर-साल तन्मयता से परिश्रम करते रहते हैं, तब कहीं जाकर वे अपने शोध कार्य को पूरा कर पाते हैं. दुनिया में हुए तमाम आविष्कारों का इतिहास अगर हम पढ़ें तो संयम  की महत्ता का प्रमाण स्वतः मिल जाएगा. विलियम शेक्सपियर कहते हैं, "वे कितने निर्धन हैं जिनके पास संयम नहीं है." सही बात है. अपने देश के ही महान वैज्ञानिकों जैसे जगदीश चन्द्र बोस, सी.वी. रमण, सत्येन्द्र बोस, होमी भाभा, विक्रम साराभाई, राजा रमन्ना आदि की ही  बात करें तो वे सभी अदभुत संयम से असाधारण सफलता तक की यात्रा के ज्वलंत उदाहरण रहे हैं.   (hellomilansinha@gmail.com) 

 
      
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं। 

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Tuesday, July 19, 2022

इतना मुश्किल भी नहीं खुश रहना

                            - मिलन  सिन्हा, मोटिवेशनल स्पीकर एंड वेलनेस  कंसलटेंट

यह सच है कि कोरोना महामारी के कारण उत्पन्न विषम एवं अप्रत्याशित परिस्थिति के कारण कमोबेश विश्व भर में खुशी का सूचकांक दुष्प्रभावित हुआ.
लेकिन यह भी तो सर्वकालिक तथ्य है कि जीवन चलते रहने का नाम है और खुशी का सीधा सम्बन्ध हमारी अपनी सोच से जुड़ा है. काबिले गौर बात है कि एक समान परिस्थिति में अलग-अलग लोग भिन्न तरीके से सोचते हैं, रियेक्ट करते हैं और खुशी-नाखुशी आदि का इजहार भी करते हैं. यह भी शाश्वत सत्य है कि जीवन में खुशी सबको चाहिए और खुश रहना हमारी स्वभाविक प्रवृति भी है. कवि गुरु रबींद्रनाथ ठाकुर कहते हैं, "खुश रहना बहुत सिंपल है, लेकिन सिंपल रहना कठिन है." वाकई ऐसा ही अधिकतर  लोग व्यवहारिक स्तर पर फील भी कर रहे हैं. कारण तलाशना कठिन नहीं है. दरअसल, आजकल बड़ी संख्या में लोग आवश्यकता और विलासिता में फर्क नहीं कर पा रहे हैं. आमतौर पर हम सरलता को छोड़कर या भूलकर जाने-अनजाने जटिलता की ओर बढ़े जा रहे हैं. "संतोषम परम सुखम या साईं इतना दीजिए, जामे कुटुंब समाय; मैं भी भूखा ना रहूं, साधु ना भूखा जाय" जैसे हमारे पारंपरिक भारतीय जीवन मूल्यों से आज हम "यह दिल मागे मोर" या "अपना सपना मनी-मनी" के तथाकथित आधुनिक सोच एवं जीवनशैली तक पहुंच गए हैं. ये हमारी लाइफस्टाइल हो गई है और हम सब कुछ फास्ट-फास्ट चाहते हैं. वह भी येनकेन प्रकारेण. चाहत असीमित हैं पर प्रयास और उपलब्धि उसकी तुलना में काफी कम. जीवन में संतुलन और सामंजस्य का अभाव स्पष्ट दिख रहा है. नतीजतन जीवन में तनाव बढ़ता जा तरह है और खुशी कम होती जा रही है. महात्मा गांधी कहते हैं कि खुशी  तब मिलेगी जब आप जो सोचते हैं, जो कहते हैं और जो करते हैं, वे सामंजस्य में हों. तो आइए "जहां चाह, वहां राह" वाले सिद्धांत को मानते हुए इन पांच बातों पर अमल करने का संकल्प लेते हैं, जिससे कि खुश रहना मुश्किल न हो.

  
गतिशीलता एवं संतुलन बनाए रखें:
प्रख्यात वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्टीन की यह बात हमेशा याद रखें कि जीवन साइकिल की सवारी करने के समान है यानी सोच और कर्म के स्तर पर गतिशीलता एवं संतुलन बनाए रखें. कहने का सीधा अर्थ यह कि अतिरेक से बचते हुए आपको अपने लक्ष्य की ओर निरंतर बढ़ते जाना है. इसके लिए पॉजिटिव माइंडसेट एवं समुचित प्रयास की जरुरत होगी. दुःख की बात है कि हम सोचने और चिंता करने में बहुत समय व्यतीत करते हैं, जब कि करने के मामले में सक्रियता अहम होती है. अतः सोचने और करने में एक अच्छा संतुलन बनाए रखना है और सही समय पर सही काम करते जाना है.

  
खुद के कार्यों की निरपेक्ष समीक्षा जरुरी:
खुद के कामों की सतत समीक्षा जरुरी होती है,  क्यों कि खुद से बेहतर समीक्षक कोई नहीं हो सकता. आप दूसरों से झूठ बोल सकते हैं, लेकिन खुद से झूठ नहीं बोल सकते. निरपेक्ष समीक्षा कर अपनी कमियों को पहचानें और उन्हें निरंतर दूर करने का प्रयास करते रहें. इससे आपके व्यक्तित्व में निखार आएगा, आपका आत्मविश्वास बढ़ेगा और आप वास्तविक रूप से खुश रह पायेंगे. याद रखें,  यदि  आपकी  खुशी इस  बात  पर  निर्भर  करती है कि कोई और क्या करता  या कहता है तो  यक़ीनन आपकी सोच में कोई-न-कोई समस्या है. अतः खुद पर फोकस कीजिए और बराबर अच्छाई से जुड़ते रहिए.


दूसरों के अच्छे काम की तारीफ करें:
  हमेशा दूसरों के अच्छे कामों की सच्ची तारीफ करें. तारीफ करने में कंजूसी बिल्कुल नहीं बरतनी चाहिए. यदि आप अपने परिजन, सहयोगी या मित्र के काम की तारीफ करते हैं, तो इससे उन्हें मोटिवेशन और पॉजिटिव एनर्जी मिलेगा. नतीजतन अगली  बार वे पहले से भी बेहतर करने का प्रयास करेंगे. लेकिन, यदि आप छोटी से कमी या गलती पर शिकायत या आलोचना करेंगे या सार्वजनिक रूप से डाटेंगे, तो उनका मनोबल गिरेगा. इसका असर उनकी कार्यक्षमता पर पड़ना निश्चित है. बेशक हम अलग से उनकी काउंसलिंग करेंगे. कहने का अभिप्राय यह कि हमें तो बस छोटी-बड़ी उपलब्धियों पर खुश होना सीखना चाहिए और घर-बाहर खुशी के मौके में दिल से शरीक होना चाहिए जिससे कि हम हैप्पीनेस साइकिल का अभिन्न हिस्सा बने रह सकें.


परिवारजनों और दोस्तों के साथ क्वालिटी टाइम बिताएं:
अमूमन व्यस्तता या अन्य किसी कारण से हम यह काम नहीं करते हैं. यहां यह नहीं भूलना चाहिए कि सुख-दुःख हर हाल में ये लोग ही हमारे साथ खड़े रहते हैं. हम उन्हें समय नहीं देंगे तो उनसे समय की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं. दरअसल, किसी को भी सामान्यतः समय की कमी नहीं होती. सवाल सिर्फ समय प्रबंधन और प्राथमिकता का होता है. एक विचारणीय बात और. अगर परिवार के लोग और दोस्त भी हमारी प्राथमिकता में नहीं हैं और उनके लिए भी हमारे पास समय नहीं है तो हमारा खुश रहना मुश्किल होगा ही. हमने महसूस किया है कि उनके साथ दिनभर में एक घंटा भी हम बिता लेते हैं, बेशक रात को खाने के टेबल पर ही सही, तो मन प्रसन्न हो जाता है.  


वर्तमान को एंजॉय करने की आदत डालें:
पूर्व प्रधान मंत्री और विचारक-कवि अटल बिहारी वाजपेयी अपनी एक कविता में कहते हैं "कल-कल करते आज हाथ से निकले सारे, भूत-भविष्य की चिंता में वर्तमान की बाजी हारे." ज्यादातर लोगों के साथ यही होता है. अतीत में जो नहीं कर पाए, उसे लेकर अवसाद और पश्चाताप की स्थिति में रहते हैं या भविष्य की चिंता या अनिश्चितता को लेकर कन्फ्यूज्ड और परेशान, जब कि जीवन का सर्वश्रेष्ठ समय वर्तमान होता है और उसी का भारी नुकसान होता रहता है. भारतीय ओलिंपिक महिला हॉकी टीम के सदस्यों  सहित कई अन्य खिलाड़ियों ने इस बात को रेखांकित किया कि उन्हें माइंडफुलनेस की ट्रेनिंग दी गई यानी भूत-भविष्य की बातों को भूलकर सिर्फ वर्तमान क्षण में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के लिए प्रेरित किया गया. सचमुच वर्तमान को एन्जॉय करने और बीते हुए कल से बेहतर प्रदर्शन की भरपूर कोशिश करने की आदत से हम स्वास्थ्य और सफलता के साथ-साथ खुशी को भी सुनिश्चित कर सकते हैं.  

 (hellomilansinha@gmail.com)

                  
             और भी बातें करेंगे, चलते-चलते. असीम शुभकामनाएं.              # "प्रभात खबर -सुरभि " में 16.01.22 को प्रकाशित   

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Tuesday, January 4, 2022

पूरे करें संकल्प

                                          - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर एंड वेलनेस  कंसलटेंट

कोविड 19 वैश्विक महामारी के बेहद चुनौतीपूर्ण दौर में वर्ष 2021 विदा हो गया और अब करोड़ों लोग एक नई उम्मीद और उत्साह के साथ नए वर्ष 2022 का स्वागत कर रहे हैं. आज जब कि तमाम राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय समस्याओं के बावजूद हमारा देश आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक विकास की नई मिसाल  कायम कर रहा है और आजादी के 75 वें साल को अमृत महोत्सव के रूप में मना रहा है, तब  सभी लोगों, खासकर युवाओं के लिए यह जरुरी हो जाता है कि वे देश को प्रगति की राह पर और तेज गति से आगे ले जाने हेतु निम्नलिखित पांच संकल्पों में से कम-से-कम एक संकल्प लें और उसे पूरा करने का भरपूर  प्रयास करें.

पॉजिटिव सोचेंगे, पॉजिटिव करेंगे: सभी ज्ञानीजन एक मत से यह कहते हैं कि सोच के साथ-साथ कर्म के स्तर पर भी सकारात्मक रहने वाले लोग व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से अध्ययन-अध्यापन, नौकरी-व्यवसाय, खेलकूद, साहित्य-संगीत हर क्षेत्र में असाधारण परिणाम अर्जित करते हैं. ऐसे लोग अच्छी-बुरी हर परिस्थिति में कठिन-से-कठिन समस्याओं का समाधान प्राप्त करने में सफल होते हैं. वे सफलता-असफलता हर हालत में अपना मानसिक संतुलन बनाए रखते हैं. दिशाहीन और भ्रमित नहीं होते. यथासंभव कोशिश करते रहने के वे प्रबल हिमायती होते हैं  और संकल्प से सिद्धि तक की यात्रा को एन्जॉय करते रहते हैं. उनके इस विचार और व्यवहार से जाने-अनजाने अनेक लोग प्रभावित, प्रेरित और लाभान्वित होते रहते हैं. विश्व विख्यात एप्पल कंपनी के सह-संस्थापक स्टीव जॉब इसकी एक बड़ी मिसाल हैं. 
  
स्वस्थ रहेंगे, स्वस्थ रखेंगे: शारीरिक एवं मानसिक रूप से स्वस्थ रहना हमारा सबसे बड़ा कर्तव्य है. हम जीवन में जो कुछ हासिल करना चाहते हैं, वह खुद को स्वस्थ रखे बगैर बहुत ही मुश्किल होता है, कई बार तो बिल्कुल असंभव भी. अस्वस्थ या बीमार रहने पर हमारी कार्य क्षमता घटती  है, इलाज में रूपये खर्च होते हैं और परिजन अनावश्यक रूप से स्ट्रेस में रहते हैं. इतना ही नहीं, खुद स्वस्थ रह कर ही हम अपने परिवार-समाज के बुजुर्गों-बीमारों की सेवा कर सकते  हैं.  इसके लिए अपनी दैनिक दिनचर्या में ज्यादा-से-ज्यादा अच्छे इनपुट्स को शामिल करना बहुत जरुरी है. हां, अपने आसपास के लोगों को स्वस्थ रखने  हेतु उन्हें जागरूक और प्रेरित करना भी उतना ही जरुरी है. सामाजिक  प्राणी होने के नाते यह हमारा सामाजिक और नैतिक दायित्व है. ऐसे भी अगर हमारे आसपास के लोग अस्वस्थ होंगें, तो क्या हम ज्यादा दिनों तक स्वस्थ रह पायेंगे. कोरोना महामारी के लम्बे संकटकाल में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने अपनी असाधारण व्यस्तताओं के बावजूद जिस तरह खुद को फिट और हेल्दी रखने के साथ-साथ 135 करोड़ देशवासियों को स्वस्थ रखने का अथक प्रयास किया है, वह एक अभूतपूर्व उदाहरण है. 

हमेशा युवा बने रहेंगे: हर व्यक्ति हमेशा युवा बना रहना चाहता है, लेकिन क्या सिर्फ देखने में युवा होना युवा होने का प्रमाण होता है ? दरअसल सही मायने में युवा कहलाने के लिए उम्र के इतर हर व्यक्ति में कुछ विशेष गुणों का होना भी जरुरी होता है. स्वामी विवेकानंद के शब्दों में कहें तो युवा वह है जो अनीति से लड़ता है; जो दुर्गुणों से दूर रहता है; जो काल की चाल को बदल देता है; जिसमें जोश के साथ होश भी है; जिसमें राष्ट्र के लिए बलिदान की आस्था है; जो सतत अच्छी बातें सीखता रहता है; जो समस्याओं का समाधान निकालता है; जो प्रेरक इतिहास रचता है; जो बातों का बादशाह नहीं, बल्कि करके दिखता है.  नए साल में हम स्वामी जी के मानदंड पर समय-समय पर अपना मूल्यांकन करते रहें और उतरोत्तर सुधार की ओर बढ़ते रहें तो न उत्साह, ऊर्जा और उमंग की कमी रहेगी और न ही सफलता, संतुष्टि, समृद्धि और सम्मान की. 
 
रिश्ते बनाएंगे और निभाएंगे: रिश्तों की शुरुआत हमारे जन्म से ही हो जाती है और समय के साथ घर-परिवार, आस-पड़ोस, अपना समाज, स्कूल, कॉलेज, नौकरी, व्यवसाय  से होते हुए देश-विदेश तक प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से यह  दायरा व्यापक  होता जाता है. भारतीय संस्कृति में तो  'वसुधैव कुटुम्बकम्' यानी "पूरा संसार है मेरा परिवार" की बात कही जाती है. अच्छी बात है कि रिश्ते बनाने और निभाने में माहिर बहुत सारे लोग आपको हर क्षेत्र में मिल जायेंगे जो बिना किसी अपेक्षा के लोगों से जुड़ने का काम करते रहते हैं, क्यों कि वे मानते हैं कि रिश्तों का जीवन में सबसे अधिक महत्व है. इतना ही नहीं, रिश्ते बनाना और निभाना एक बड़ा लीडरशिप क्वालिटी माना जाता है. अलग-अलग बैकग्राउंड से आए विभिन्न लोगों की छोटी या बड़ी टीम को कप्तान  के रूप में एकजुट रखकर एक कॉमन गोल को हासिल करने का काम वाकई चुनौतीपूर्ण और रोमांचक होता है. तभी तो  देश-विदेश के मैनेजमेंट इंस्टिट्यूट में रिलेशनशिप मैनेजमेंट की पढ़ाई होती है; कॉरपोरेट सेक्टर के साथ-साथ सरकारी विभागों में भी कर्मियों को इस लाइफ स्किल के बहुआयामी पॉजिटिव रिजल्ट के बारे में बताया जाता है. देश-विदेश के कामयाब और सम्मानित लोगों के जीवनवृत पर नजर डालें तो आप पायेंगे कि वे लोगों से अच्छे संबंध कायम करने, निभाने और उसके माध्यम से बड़ी-से-बड़ी समस्या का समाधान निकालने में दक्ष रहे हैं. 
  
शांति और सौहार्द बनाए रखेंगे: अनेक भाषाओं, जातियों और धर्मों वाले हमारे विशाल लोकतान्त्रिक देश में "सब जन हिताय, सब जन सुखाय" के सनातन दर्शन को चरितार्थ करते रहने के लिए यह अनिवार्य है कि देश में शांति और सौहार्द का वातावरण बराबर कायम रहे. अच्छी बात है कि प्राचीन काल  से ही हमारे देश में अधिकतर लोग आपसी भाईचारे और मेलमिलाप की भावना से रहते आए हैं. मूलतः यह हमारे देश का संस्कार है. यह हमारी विशेष पहचान है. इसी के बलबूते हर भारतीय अपने उत्थान के लिए सपने देखता है और उन्हें साकार करने में जुटा रहता है. सब  जानते हैं कि अशांति और आपसी मनमुटाव विकास की गति को बाधित करते हैं. इससे व्यक्ति, समाज और देश सभी कमजोर होते हैं. हां, इसका सबसे ज्यादा नुकसान गरीबों को उठाना पड़ता है. यह सौ फीसदी सच है कि देश में शांति और सौहार्द का माहौल बिगाड़ने में देश के मुट्ठीभर लोगों और चुनिन्दा अंतरराष्ट्रीय  संगठनों की भूमिका होती है. ऐसे निहित स्वार्थी तत्वों का मतलब भारत को अस्थिर एवं अशांत करके आर्थिक और सामरिक हानि  पहुंचाना और इसके माध्यम से अपना उल्लू सीधा करना होता है. ऐसे में सच्चे, अच्छे और समझदार लोगों खासकर युवाओं से यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वे स्वयं शांति और सौहार्द बनाए रखें, दूसरों को इसके लिए सतत प्रेरित करें और अपने आसपास के उन स्वार्थी तत्वों को पहचानने और उन्हें दंडित करवाने  में प्रशासन की मदद करें. 

सच मानिए, ऐसे छोटे-छोटे संकल्प लेकर और उनपर दृढ़ता से अमल करके हम न केवल अपने जीवन को सही अर्थ में उन्नत कर पायेंगे, बल्कि देश को भी मजबूत, समृद्ध और खुशहाल बना पायेंगे. सही मायने में "नया साल मुबारक हो" कहने की सार्थकता भी इसी में है. 

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                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं। 
# दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में 01 जनवरी , 2022 को प्रकाशित 

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Friday, October 29, 2021

विवाद, संवाद और समाधान

                            - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर एंड स्ट्रेस मैनेजमेंट  कंसलटेंट

जीवन में कभी विवाद की स्थिति न आए, ऐसा नामुमकिन है. किसी भी विषय पर मतभेद होना  भी बहुत स्वाभाविक है. लेकिन हमेशा या अधिकांश समय विवाद में पड़ना या रहना और मनभेद का शिकार हो जाना विद्यार्थियों के लिए मुनासिब नहीं है. यह भी जानना और उसे आचरण में शामिल करना उतना ही जरुरी है कि हर विवाद का अंत संवाद से ही संभव हो पाता है. संवाद की मानसिकता से काम करने पर जीवन की अनेक समस्याओं का समाधान आसान हो जाता है. यह जानते हुए भी बहुत सारे विद्यार्थी जाने-अनजाने विवाद से घिरे और उसमें उलझे रहते हैं. काबिले गौर बात है कि अच्छे विद्यार्थी इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि विवाद से फायदा कम होता है. बहुमूल्य समय और ऊर्जा की क्षति बहुत होती है. वे यह भी जानते हैं कि बेवजह विवाद पैदा करनेवाले तत्व एक के बाद दूसरे विवाद में विद्यार्थियों को उलझाकर  अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं. उनकी मंशा यह भी होती है कि विद्यार्थियों को किस तरह विवाद के मकड़जाल में फंसाया जाए, जिससे कि उनका ध्यान अध्ययन से हटे और उनका रिजल्ट खराब हो जाए. हर शैक्षणिक संस्थान में मौजूद ऐसे लोगों से आप सभी परिचित होंगे. वे बात-बेबात ज्यादातर विद्यार्थियों के लिए अप्रासंगिक विषयों को  विवाद का मुख्य मुद्दा बनाने की कोशिश करते हैं. बेशक ऐसे विवादों से दूर रहना जरुरी है. यहां यह जानना भी जरुरी है कि छात्र जीवन में छात्र-छात्राएं विवादों से आम तौर पर कैसे निबटें, जिससे कि वे अध्ययन पर ज्यादा फोकस कर सकें? 


अध्ययन से जुड़े विषय पर ही बात करें: मित्र मंडली में या अन्यत्र हर वक्त इसका ध्यान रखें कि चर्चा का विषय अध्ययन से संबंधित हो. वहां भी सीखने-सीखाने पर बात हो तो अच्छा, अन्यथा वहां से प्रस्थान करना बेहतर है. इससे कुछ साथी-सहपाठी बेशक नाराज हो सकते हैं, लेकिन ऐसा करना ही सबके लिए हितकर होता है, क्यों कि इससे आपका फोकस नहीं बिगड़ता और मित्रों को भी सोचने और समीक्षा करने का एक और मौका मिल जाता है. इससे "हम भी रहें अच्छे, तुम भी रहो अच्छे" के सिद्धांत पर अमल भी हो जाता है.   


जाति, धर्म, राजनीति जैसे विषयों से दूर रहें: देखा गया है कि इन विषयों पर विवाद होने पर सार्थक चर्चा कदाचित ही हो पाती है. तर्क और तथ्य से परे भावना, अनुमान, पूर्वाग्रह व  संभावना पर बहस होने लगती है. कमोबेश सब अपने-अपने स्टैंड पर कायम रहते हैं. आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला शुरू हो जाता है. लिहाजा बातचीत का शायद ही कुछ निष्कर्ष निकलता है. 

 
विवाद को सुलझाने पर फोकस करें: अधिकतर मामलों में विवाद पर सिर्फ बहस होती रहती है. उसको सुलझाने या उसका समाधान खोजने पर फोकस नहीं रहता.  कई बार तो मूल मुद्दा ही गौण हो जाता है और अनावश्यक बातों में लोग उलझे रहते है, जैसा कि आम तौर पर आजकल प्राइम टाइम टीवी शो पर अहम मुद्दों पर चर्चा का हश्र होता है. अतः ऐसे अवसरों पर अपने व्यवहार और संवाद कौशल से समाधान तक पहुंचने का रास्ता तलाश लेना बुद्धिमानी है. 

 
असीमित समय खर्च न करें: समय अमूल्य है. बीता हुआ समय लौट कर नहीं आता. इस बात को दिमाग में रखकर चर्चा में शामिल हों. बेहतर यह होता है कि किसी एक मुद्दे पर, चाहे वह कितना ही विवादित हो, चर्चा का समय अधिकतम एक या दो घंटा नियत कर लें. हर विद्यार्थी को बोलने और उन्हें शांतिपूर्वक सुनने की शर्त सख्ती से लागू हो. ऐसा न होने पर पूरी संभावना होती है कि बहस असीमित समय तक चलता रहे, जिसका पश्चाताप बाद में ज्यादातर विद्यार्थियों को होता है.


आपसी कटुता से बचें: किसी विवाद पर बात करते-करते हमलोग  जाने-अनजाने व्यक्तिगत टिप्पणी या आक्षेप करने लगते हैं. इससे माहौल बिगड़ता है और अनावश्यक रूप से आपसी कटुता और मनमुटाव की स्थिति उत्पन्न हो जाती है. इसका बहुआयामी नुकसान सबको कम या अधिक मात्रा  में उठाना पड़ता है. सब जानते हैं कि अच्छे रिश्ते बनाने में बहुत समय लगता है, लेकिन ऐसे मौके पर उसके टूटने-बिखरने में समय नहीं लगता. देखा गया है कि विवादित विषय पर पेशेवर तरीके से चर्चा करने पर न केवल कई बिन्दुओं पर सहमति बन जाती है और आपसी कटुता से बचना संभव होता है, बल्कि आगे संवाद से समाधान तक पहुंचने के दरवाजे खुले रहते हैं. राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हर विवाद को सुलझाने में यही दृष्टिकोण अपनाया जाता है.     

 (hellomilansinha@gmail.com)

      
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं। 
# लोकप्रिय पाक्षिक "यथावत" के  16-31 अक्टूबर, 2021 अंक में प्रकाशित

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Tuesday, October 12, 2021

होंगे कामयाब की मानसिकता

                         - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर एंड स्ट्रेस मैनेजमेंट  कंसलटेंट

मन में है विश्वास, हम होंगे कामयाब की मानसिकता के साथ जीवनपथ पर चलनेवाले विद्यार्थियों की दिनचर्या और जीवनशैली पर गौर करना दिलचस्प है और सबके लिए लाभदायक भी. किसी भी संस्थान में ऐसे विद्यार्थियों की संख्या हो सकता है कि बहुत ज्यादा न हो, पर यही विद्यार्थी अपने-अपने क्षेत्र में देर-सवेर बड़ी सफलता हासिल करते हैं और नए-नए कीर्तिमान भी बनाते हैं. हाल में ही संघ लोक सेवा आयोग द्वारा घोषित सिविल सर्विसेज का रिजल्ट भी इसी तथ्य को संपुष्ट करता है. रैंकिंग में टॉप फिफ्टी में शामिल सफल लड़के-लड़कियों के बायोडाटा पर गौर करने पर यह बात साफ हो जाती है कि पहले, दूसरे या तीसरे प्रयास में असफल होने के बावजूद उनके मन में यह विश्वास बना रहा कि हम होंगे कामयाब और फलतः बेहतर कोशिश के जरिए उन्होंने इस मुकाम को हासिल किया. सवाल है कि आखिर ऐसे विद्यार्थी जीवन में कौन सी रणनीति अपनाते हैं. आइए जानते हैं. 


लक्ष्य के प्रति अटूट समर्पण: खूब सोच-समझ कर एक बार जो लक्ष्य तय करते हैं उसके प्रति पूर्णतः समर्पित रहते हैं. कोई द्वन्द या दुविधा का फिर कोई सवाल खड़ा नहीं होता. अब बस लक्ष्य को हासिल करने के लिए फुलफ्रूफ कार्ययोजना बनाकर उसपर अमल करने का हर संभव प्रयास करते रहते हैं. दूसरे क्या कर रहे हैं या करेंगे या कहेंगे, इसकी उन्हें कोई चिंता नहीं होती. इसके बजाय वे क्या कर सकते हैं और करेंगे उस पर ही उनका पूरा फोकस होता है. वे सोते-जागते बस अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में ध्यान केन्द्रित करते हैं और तदनुरूप एक्शन लेते हैं.   


खुद पर विश्वास: अपने आत्मविश्वास को हमेशा उच्च स्तर पर बनाए रखने के लिए खुद पर विश्वास करना अनिवार्य है. हर विद्यार्थी यह बेहतर जानता है कि उसके अध्ययन में कहां-कहां कमी है, उसमें कैसे गुणात्मक सुधार किया जा सकता है और यह भी कि उसे अंजाम तक पहुंचाने में वह खुद सक्षम है. किसी परीक्षा, टेस्ट या प्रतियोगिता में असफल होने की स्थिति में यह आकलन और खुद पर विश्वास बनाए रखना आगे की यात्रा को ज्यादा फलदायक बनाने की बुनियादी शर्त है. इसे वे बराबर याद रखते हैं और साथ ही सदा आशावान बने रहते हैं.  


उत्साह और ऊर्जा: अपने अध्ययन के प्रति सदैव बहुत उत्साहित रहना  सफलता का एक अहम पायदान होता है. उत्साह का स्पष्ट मतलब होता है लक्ष्य के प्रति आपका लगाव और समर्पण. और जब किसी चीज के प्रति यह लगाव और समर्पण रहता है तो उस चीज को हासिल करने के लिए आगे की कार्ययोजना आप खुद बनाने में जुट जाते हैं. हां, केवल उत्साह से काम संपन्न नहीं होता. इसके लिए अपेक्षित ऊर्जा की जरुरत होती है. ऐसे अनेक उदाहरण  मिल जायेंगे जब कोई विद्यार्थी अभीष्ट कार्य तो करना चाहता है, लेकिन ऊर्जा की कमी के कारण उसे कर नहीं पाता है. अतः अच्छे विद्यार्थी खुद को मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ और ऊर्जावान बनाए रखते हैं.  

  
नियमित कड़ी मेहनत: सब जानते हैं कि कड़ी मेहनत को कोई विकल्प नहीं है. फिर भी सभी विद्यार्थी ऐसा नहीं करते. ज्ञानीजन सही कहते हैं कि जैसा करेंगे, वैसा भरेंगे. कहने का तात्पर्य यह कि बिना अपेक्षित मेहनत के अपेक्षित रिजल्ट की कामना बेमानी है. सफलता को अपनी मुट्ठी में करने के लिए सजगता के साथ अध्ययन में अपना अधिकांश समय लगाना है. सफलता का परचम लहराने वाले विद्यार्थी हर विषय के एक-एक चैप्टर को न केवल समझ कर पढ़ते हैं,  बल्कि उसे बीच-बीच में दोहराते भी रहते हैं. हर संभावित सवाल का उत्तर लिखकर प्रैक्टिस करना उनकी  मेहनत को चार चाँद लगाता है. ऐसा नहीं कि वे परीक्षा से कुछ दिन या हफ्ते पहले रातभर जगकर पढ़ते हैं. उनके लिए तो नियमित रूप से कड़ी मेहनत करना दिनचर्या का अभिन्न हिस्सा होता है. 


असफलता से कभी घबराते नहीं: देखा  गया है कि असफल होने पर ज्यादातर विद्यार्थी दूसरे लोगों के टिप्पणियों को बहुत गंभीरता से लेने की भूल करते हैं. अच्छे विद्यार्थी  ऐसा नहीं करते. ऐसे समय उन्हें भी बुरा तो लगता है लेकिन वे बिना घबराए और कंफ्यूज हुए असफलता के कारणों का स्वयं विश्लेषण करके लक्ष्य के प्रति अपने संकल्प को और दृढ़ बनाना जरुरी समझते हैं. बिना समय गंवाए और बिना किसी पर दोषारोपण किए अपनी गलती का पता लगाते हैं, उससे सीख लेते हैं और बेहतरी के प्रयास में जी-जान से जुट जाते हैं. तभी तो कामयाबी उनके कदम चूमती है. 

(hellomilansinha@gmail.com)                

      
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं। 
# लोकप्रिय पाक्षिक "यथावत" के 01-15 अक्टूबर, 2021 अंक में प्रकाशित

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Tuesday, September 28, 2021

स्मरण शक्ति उन्नत करना है आसान

                           - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर एंड स्ट्रेस मैनेजमेंट  कंसलटेंट

आमतौर पर यह पाया जाता है कि ज्यादातर विद्यार्थी अपेक्षित मेहनत करने के बाद भी अपेक्षित रिजल्ट के हकदार नहीं बन पाते. व्यक्तिगत काउंसलिंग में अनेक विद्यार्थी मुझसे  पूछते हैं कि ऐसा क्यों होता है. इस समस्या की गहराई में जाकर विद्यार्थियों से बातचीत करने और फिर उसका विश्लेषण करने पर एक कॉमन बात जो सामने आती है, वह है यादाश्त की समस्या. छात्र-छात्राएं बेशक पढ़ते हैं, पर दो-चार दिन के बाद वह पूर्णतः याद नहीं रहता, कई बार तो बिल्कुल ही याद नहीं रहता. मीडिया में मेमोरी पॉवर को बढ़ाने के लिए कई तरह के उपायों और प्रोडक्ट्स के विज्ञापन हम सब अक्सर देखते रहते हैं. सच मानिए, अपनी स्मरण शक्ति को उन्नत करना हर विद्यार्थी के अपने हाथ में है. प्रस्तुत है कुछ आसान उपाय.    

     
पढ़ाई के समय बस पढ़ना: दिनभर में जब-जब पढ़ने बैठें, बस पढ़ाई पर ध्यान केन्द्रित करें. उस समय कोई दूसरा काम न करें. मोबाइल को ऑफ कर दें. जिस विषय के जिस चैप्टर को पढ़ना है, उसके विषय में पहले दो-चार मिनट चिंतन करें और अपने मन को उस टास्क के लिए तैयार करें. कई बार कोई चीज हमें पहली बार पूरी समझ में नहीं आती है. तो यह सोच कर कि यह विषय कठिन है, उसे छोड़ने की गलती न करें. इसके बजाय इस संकल्प के साथ उसे पूरे मनोयोग से दोबारा पढ़ें. आप पायेंगे कि इस बार आपको ज्यादा समझ में आया है. अब उसी संकल्प और मनोयोग से आप जब उसे फिर पढ़ेंगे तो 100 से 90 फीसदी बात पूरी तरह समझ में आ जाएगी. अगर 10 प्रतिशत बात जो किसी कारणवश समझ में नहीं आई तो उसे चिंतन का हिस्सा बनाने के साथ-साथ एक कॉपी में नोट कर लें, जिससे कि बाद में टीचर से आप उसका समाधान पा सकें. जब पूरी बात एक बार अच्छी तरह समझ में आ जाए तो अगले कदम के रूप में उसे लिखने का प्रयास करें. आप पायेंगे कि अच्छी तरह समझने के बावजूद आप उस चैप्टर को सौ फीसदी उसी रूप में नहीं लिख पा रहे हैं, कहीं अटक रहें हैं तो कभी भटक रहे हैं. यह अस्वाभाविक नहीं है. अतः परेशान होने की जरुरत नहीं है. यहां जरुरत है उसे फिर से पढ़ने, समझने और लिखने का अभ्यास करने की. दिलचस्प बात है कि किसी एक विषय को ठीक से याद कर लेने से यह गारंटी नहीं मिल जाती कि हमेशा आपको वह वैसे ही याद रहे. लिहाजा समय-समय पर इसे टेस्ट करके देखना बेहतर होता है. ऐसे भी कहा जाता है कि दिमाग को आप जिस विषय में जितना सक्रिय रखेंगे, वह चीज उतना ज्यादा याद रहेगी. कहने का तात्पर्य यह कि नियमित अभ्यास से बातें हमारे स्मृति में अच्छी तरह बैठ जाती हैं. 


सुबह जल्दी उठें और रात में अच्छी तरह सोएं: सुबह जल्दी उठें और दिन की शुरुआत पॉजिटिव सोच से करें. शरीर को हाइड्रेटेड करें यानी आराम से बैठकर कम-से-कम आधा लीटर पानी पीएं और फिर नित्य क्रिया से निवृत होकर सुबह एक-दो घंटा पढ़ने की आदत डालें. एकाधिक मेडिकल रिसर्च बताते हैं कि सुबह पढ़ी हुई चीजें हमें ज्यादा अच्छी तरह याद रहती हैं. इसके कई कारण हैं, जैसे दिमाग फ्रेश रहता है, शरीर ऊर्जावान, वातावरण अपेक्षाकृत साफ़ और ऑक्सीजनयुक्त आदि. सच तो यह भी है कि सुबह की बेहतर शुरुआत से मन प्रसन्न हो जाता है और आत्मविश्वास व यादाश्त में वृद्धि. इसका पॉजिटिव असर हमारे दिनभर के सभी एक्टिविटी पर पड़ता है. देर रात तक जगकर पढ़ने की आदत मेमोरी को कमजोर करती हैं और शरीर को दुर्बल. अतः रात में जल्दी सोना चाहिए. रात में सात-आठ घंटे की अच्छी नींद मेमोरी पॉवर को उन्नत करने में अहम भूमिका निभाती है. अंग्रेजी के एक प्रसिद्द कहावत का भावार्थ है कि रात में जल्दी सोने और सुबह जल्दी उठने वाले लोग स्वस्थ, समृद्ध और बुद्धिमान होते हैं.

    
हमेशा कुछ नया सीखने की कोशिश करें: हमारे दिमाग की क्षमता असीमित है, लेकिन  सामान्यतः  हम उसका बहुत कम उपयोग करते हैं. हम एक कम्फर्ट जोन में रहना पसंद करते हैं. अतः अनेक नई चीजें नहीं सीख पाते हैं. पाया गया है कि हम अपने दिमाग को जितना नई चीजों को सीखने में लगायेंगे, दिमाग की सक्रियता उतनी बढ़ेगी और स्मरण शक्ति भी. यह शतरंज जैसा कोई नया खेल हो सकता है या सिलेबस में शामिल कोई नया विषय या शब्द पहेली का नया टास्क या अन्य कोई सकारात्मक विधा. करके देखिए, बहुत लाभ होगा.  

 (hellomilansinha@gmail.com)


             और भी बातें करेंगे, चलते-चलते. असीम शुभकामनाएं.            # पाक्षिक पत्रिका "यथावत" के 16-30 सितम्बर, 2021 अंक में प्रकाशित  

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Friday, September 17, 2021

जीवन में एक हॉबी जरुरी है

                              - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर एंड स्ट्रेस मैनेजमेंट  कंसलटेंट

मेरे मोटिवेशनल एवं वेलनेस सेशन में छात्र-छात्राएं अमूमन यह सवाल जरुर पूछते हैं कि अपने खाली समय का सदुपयोग कैसे करें जिससे कि जीवन में खुशी मिलती रहे और तनाव को मैनेज करना आसान हो. वाकई यह सवाल अमूमन हर विद्यार्थी से किसी-न-किसी रूप में जुड़ा है. इस प्रश्न का जवाब यह है कि हर विद्यार्थी का एक-न-एक हॉबी होना जरुरी है, जिसमें उसकी रूचि हो और अध्ययन के बाद बचे हुए समय में उसमें समय बिताने में वह आनंद महसूस करे. यहां यह स्पष्ट करना जरुरी है कि हॉबी का मतलब कोई पॉजिटिव एक्टिविटी जो व्यक्ति और समाज दोनों के लिए हितकारी हो.


इसमें कोई दो मत नहीं है कि विद्यार्थियों के लिए पूरे समय घर के अंदर रहकर केवल पढ़ाई करना कठिन होता है, खासकर इस महामारी के दौर में, जब बाहर जाने में पाबंदी है और गए तो बहुत सावधानी बरतने की बाध्यता होती है. काबिले गौर बात है कि इनमें से अधिकतर विद्यार्थियों के पास अपने खाली समय में करने को ज्यादा कुछ नहीं होता सिवाय अपने स्मार्ट फोन या कंप्यूटर-लैपटॉप पर व्यस्त होने और वह भी ज्यादातर समय नकारात्मक बातों या अप्रासंगिक साइट्स पर घूमते रहने के. इसके विपरीत वे विद्यार्थी जो अपेक्षाकृत स्मार्ट, बुद्धिमान और कुछ हद तक भाग्यवान  भी होते हैं  उनका  एक या ज्यादा हॉबी होता है. वैसे विद्यार्थी एकाधिक तरीके से बहुत फायदे में रहते हैं. ऐसा पाया गया है कि वे ज्यादा स्वस्थ, खुश और सफल भी रहते हैं. खुशी की बात है कि हॉबी की सूची बहुत बड़ी है और इन्हें इंडोर या आउटडोर एक्टिविटी के रूप में एन्जॉय किया जा सकता है. खासकर महामारी जैसे कठिन समय में कोई ऐसा हॉबी जिसे घर में रहकर ही एन्जॉय किया जा सकता है, वाकई  किसी वरदान से कम नहीं है. कहने की जरुरत नहीं कि  संगीत, नृत्य, पेंटिंग, अच्छी किताबें पढ़ना, कार्टून बनाना, सिलाई, कढ़ाई, ब्लॉग लिखना, शतरंज, कैरम बोर्ड जैसे कई अन्य हॉबी को अपना कर इसे अमल में लाया जा सकता है. बाहर जाकर अपने शौक को पूरा करने में हर तरह के मैदानी खेल जैसे हॉकी, फुटबॉल, क्रिकेट से लेकर लॉन टेनिस, कबड्डी, वॉलीबॉल तक कोई खेल या कोई  सामाजिक-सांस्कृतिक एक्टिविटी जैसे अनेकानेक हॉबी में छात्र-छात्राएं खुद को सकारात्मक रूप से व्यस्त रख सकते हैं.  


दिलचस्प तथ्य यह है कि विश्वभर में जितने भी विभूतियों  ने आम लोगों को प्रेरित और प्रोत्साहित किया है और कर रहे हैं, उन लोगों ने अपने मूल कार्यकलाप के अलावे अपने खाली  समय में एक या ज्यादा हॉबी में भी खुद को व्यस्त रखा है. प्रसिद्द वैज्ञानिक और पूर्व राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम को वीणा बजाने का शौक था. महात्मा गांधी को चरखे पर सूत कातना और प्राकृतिक चिकित्सा से जुड़े जन कल्याण का शौक था. महान भौतिकशास्त्री और नोबेल  पुरस्कार विजेता अल्बर्ट आइंस्टीन को वायलिन बजाने और नौकायन की हॉबी थी. कभी-कभार जब वे किसी वैज्ञानिक गुत्थी को सुलझाने के क्रम में उलझ जाते थे, तो माइंड को रिफ्रेश करने के लिए वायलिन बजाते थे. उसी तरह दो बार नोबेल पुरस्कार हासिल करनेवाली महिला  वैज्ञानिक मैरी क्यूरी को लम्बी दूरी तक साइकिल चलाने का शौक था. मजेदार बात है कि अपने हनीमून के दिन क्यूरी दम्पति ने उत्तरी फ्रांस में बहुत देर तक साइकिल चलाकर आनंद उठाया. धोनी, कपिल देव और इआन बोथम जैसे कई क्रिकेटर हॉबी के रूप में नियमित रूप से फुटबॉल खेलते रहे हैं.


दरअसल, अपने हॉबी के माध्यम से छात्र-छात्राएं अपने पसंदीदा एक्टिविटी में क्वालिटी टाइम  बिता सकते हैं और अपने स्ट्रेस को भी अच्छी तरह मैनेज कर सकते हैं. इससे न केवन वे मानसिक   रूप से मजबूत और उन्नत होते हैं, बल्कि दिमाग से नकारात्मक विचारों को कम करने में सक्षम होते  है. बोनस के रूप में उनकी पॉजिटिव सक्रियता बढ़ती है और वे इनोवेटिव, क्रिएटिव और हैप्पी फील करते हैं. प्रसिद्द ब्रिटिश रचनाकार जॉर्ज बर्नार्ड शॉ तो कहते हैं कि जो व्यक्ति अपने हॉबी के साथ जीता है वह वाकई खुश रहता है. तो विद्यार्थियों के लिए संदेश एकदम स्पष्ट है कि अपने दिमाग को खाली मत  छोड़ें क्यों कि कहा जाता है कि खाली दिमाग शैतान का घर होता है; अपने अध्ययन के अलावे किसी हॉबी में रोजाना कुछ समय व्यतीत करें, जिससे कि आप खुद को रिफ्रेश कर सकें और अपने मुख्य एक्टिविटी यानी अध्ययन आदि को ज्यादा उत्साह और उमंग से जारी रख सकें. निसंदेह इससे जीवन में सफलता व खुशी में इजाफा होना निश्चित है.  

  (hellomilansinha@gmail.com)                

      
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं। 
# लोकप्रिय पाक्षिक "यथावत" के 01-15 सितम्बर, 2021 अंक में प्रकाशित

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Friday, September 10, 2021

स्ट्रेस मैनेजमेंट: कहीं आप बेवजह तो तनावग्रस्त नहीं

                                               - मिलन  सिन्हा,  स्ट्रेस मैनेजमेंट एंड वेलनेस कंसलटेंट 

हाल ही में एक व्यक्ति ने अपनी परेशानी बताते हुए कहा कि जब भी वे मार्केट जाते हैं या किसी ऑफिस आदि में और वहां लोगों को गलत काम या व्यवहार करते देखते हैं, तो गुस्सा आता है. उन्हें कुछ कहना चाहते हैं, पर कह नहीं पाते. खुद अंदर-ही-अंदर उबलते हैं और कई दिन यही सोचकर तनाव में रहते हैं. इससे बचने के लिए क्या करें? 

दरअसल, यह उस व्यक्ति की समस्या मात्र नहीं है. ऐसा अनेक लोग फील करते हैं. विचारणीय बात यह है कि यह स्थिति आपके नियंत्रण क्षेत्र में है या नहीं. अधिकांश मामलों में  नहीं. यह सही है कि आपको कुछ गलत होते हुए देखना अच्छा नहीं लगता. आपका नाराज होना या क्रोधित होना भी गैर वाजिब नहीं है. उस कारण तनाव ग्रस्त होना जरुर गैर मुनासिब है. ऐसे सभी मामलों में जो गलत कर रहा है, उसे न तो आपके बुरा लगने से कोई फर्क पड़ता है और न ही उसमें  कोई सुधार होता है. कई बार तो आपकी नाराजगी का उसे भान भी नहीं होता. इधर आप नाराज, क्रोधित और तनावग्रस्त होकर अपना ढेर सारा नुकसान कर लेते हैं. है कि नहीं? 

लक्ष्मण रेखा तय करें और बहस में न उलझें: ऐसी स्थिति में आपको जो करना चाहिए वह यह कि आप गलत काम में संलग्न व्यक्ति को पूरी शालीनता और शान्ति से बस यह बता दें कि उनका गलत काम या व्यवहार आपको बुरा लगा. इसके रिएक्शन  में वह कुछ भी कहे, आप उससे बहस में न उलझें. यही आपकी लक्ष्मण रेखा है. समझनेवाली बात यह है कि आपका अपने कार्य या आचरण पर तो कंट्रोल हो सकता है, लेकिन बाहर के किसी व्यक्ति पर शायद नहीं. हां, गलत करनेवाले को टोकने की एक जिम्मेदार नागरिक का कर्तव्य जरुर निभाएं. इसके अच्छे परिणाम मिल जाए तो खुश हो लें, न मिले तब भी इस बात से खुश होने का प्रयास करें कि आपने कोशिश तो की. किसी भी अवस्था में खुद तनावग्रस्त होने का तो कोई अर्थ नहीं है. अमेरिकी विचारक रेनहोल्ह निबुहर सही कहते हैं, "हे ईश्वर, मुझे उन चीजों को स्वीकार करने की स्थिरता दें जिन्हें मैं बदल नहीं सकता, उन चीजों को बदलने का साहस दें जिन्हें मैं बदल सकता हूँ और दोनों में अंतर करने की बुद्धि दें."  

  (hellomilansinha@gmail.com) 


             और भी बातें करेंगे, चलते-चलते. असीम शुभकामनाएं.            # "प्रभात खबर हेल्दी लाइफ " में  01 सितम्बर , 2021 को प्रकाशित   

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