Friday, September 17, 2021

जीवन में एक हॉबी जरुरी है

                              - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर एंड स्ट्रेस मैनेजमेंट  कंसलटेंट

मेरे मोटिवेशनल एवं वेलनेस सेशन में छात्र-छात्राएं अमूमन यह सवाल जरुर पूछते हैं कि अपने खाली समय का सदुपयोग कैसे करें जिससे कि जीवन में खुशी मिलती रहे और तनाव को मैनेज करना आसान हो. वाकई यह सवाल अमूमन हर विद्यार्थी से किसी-न-किसी रूप में जुड़ा है. इस प्रश्न का जवाब यह है कि हर विद्यार्थी का एक-न-एक हॉबी होना जरुरी है, जिसमें उसकी रूचि हो और अध्ययन के बाद बचे हुए समय में उसमें समय बिताने में वह आनंद महसूस करे. यहां यह स्पष्ट करना जरुरी है कि हॉबी का मतलब कोई पॉजिटिव एक्टिविटी जो व्यक्ति और समाज दोनों के लिए हितकारी हो.


इसमें कोई दो मत नहीं है कि विद्यार्थियों के लिए पूरे समय घर के अंदर रहकर केवल पढ़ाई करना कठिन होता है, खासकर इस महामारी के दौर में, जब बाहर जाने में पाबंदी है और गए तो बहुत सावधानी बरतने की बाध्यता होती है. काबिले गौर बात है कि इनमें से अधिकतर विद्यार्थियों के पास अपने खाली समय में करने को ज्यादा कुछ नहीं होता सिवाय अपने स्मार्ट फोन या कंप्यूटर-लैपटॉप पर व्यस्त होने और वह भी ज्यादातर समय नकारात्मक बातों या अप्रासंगिक साइट्स पर घूमते रहने के. इसके विपरीत वे विद्यार्थी जो अपेक्षाकृत स्मार्ट, बुद्धिमान और कुछ हद तक भाग्यवान  भी होते हैं  उनका  एक या ज्यादा हॉबी होता है. वैसे विद्यार्थी एकाधिक तरीके से बहुत फायदे में रहते हैं. ऐसा पाया गया है कि वे ज्यादा स्वस्थ, खुश और सफल भी रहते हैं. खुशी की बात है कि हॉबी की सूची बहुत बड़ी है और इन्हें इंडोर या आउटडोर एक्टिविटी के रूप में एन्जॉय किया जा सकता है. खासकर महामारी जैसे कठिन समय में कोई ऐसा हॉबी जिसे घर में रहकर ही एन्जॉय किया जा सकता है, वाकई  किसी वरदान से कम नहीं है. कहने की जरुरत नहीं कि  संगीत, नृत्य, पेंटिंग, अच्छी किताबें पढ़ना, कार्टून बनाना, सिलाई, कढ़ाई, ब्लॉग लिखना, शतरंज, कैरम बोर्ड जैसे कई अन्य हॉबी को अपना कर इसे अमल में लाया जा सकता है. बाहर जाकर अपने शौक को पूरा करने में हर तरह के मैदानी खेल जैसे हॉकी, फुटबॉल, क्रिकेट से लेकर लॉन टेनिस, कबड्डी, वॉलीबॉल तक कोई खेल या कोई  सामाजिक-सांस्कृतिक एक्टिविटी जैसे अनेकानेक हॉबी में छात्र-छात्राएं खुद को सकारात्मक रूप से व्यस्त रख सकते हैं.  


दिलचस्प तथ्य यह है कि विश्वभर में जितने भी विभूतियों  ने आम लोगों को प्रेरित और प्रोत्साहित किया है और कर रहे हैं, उन लोगों ने अपने मूल कार्यकलाप के अलावे अपने खाली  समय में एक या ज्यादा हॉबी में भी खुद को व्यस्त रखा है. प्रसिद्द वैज्ञानिक और पूर्व राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम को वीणा बजाने का शौक था. महात्मा गांधी को चरखे पर सूत कातना और प्राकृतिक चिकित्सा से जुड़े जन कल्याण का शौक था. महान भौतिकशास्त्री और नोबेल  पुरस्कार विजेता अल्बर्ट आइंस्टीन को वायलिन बजाने और नौकायन की हॉबी थी. कभी-कभार जब वे किसी वैज्ञानिक गुत्थी को सुलझाने के क्रम में उलझ जाते थे, तो माइंड को रिफ्रेश करने के लिए वायलिन बजाते थे. उसी तरह दो बार नोबेल पुरस्कार हासिल करनेवाली महिला  वैज्ञानिक मैरी क्यूरी को लम्बी दूरी तक साइकिल चलाने का शौक था. मजेदार बात है कि अपने हनीमून के दिन क्यूरी दम्पति ने उत्तरी फ्रांस में बहुत देर तक साइकिल चलाकर आनंद उठाया. धोनी, कपिल देव और इआन बोथम जैसे कई क्रिकेटर हॉबी के रूप में नियमित रूप से फुटबॉल खेलते रहे हैं.


दरअसल, अपने हॉबी के माध्यम से छात्र-छात्राएं अपने पसंदीदा एक्टिविटी में क्वालिटी टाइम  बिता सकते हैं और अपने स्ट्रेस को भी अच्छी तरह मैनेज कर सकते हैं. इससे न केवन वे मानसिक   रूप से मजबूत और उन्नत होते हैं, बल्कि दिमाग से नकारात्मक विचारों को कम करने में सक्षम होते  है. बोनस के रूप में उनकी पॉजिटिव सक्रियता बढ़ती है और वे इनोवेटिव, क्रिएटिव और हैप्पी फील करते हैं. प्रसिद्द ब्रिटिश रचनाकार जॉर्ज बर्नार्ड शॉ तो कहते हैं कि जो व्यक्ति अपने हॉबी के साथ जीता है वह वाकई खुश रहता है. तो विद्यार्थियों के लिए संदेश एकदम स्पष्ट है कि अपने दिमाग को खाली मत  छोड़ें क्यों कि कहा जाता है कि खाली दिमाग शैतान का घर होता है; अपने अध्ययन के अलावे किसी हॉबी में रोजाना कुछ समय व्यतीत करें, जिससे कि आप खुद को रिफ्रेश कर सकें और अपने मुख्य एक्टिविटी यानी अध्ययन आदि को ज्यादा उत्साह और उमंग से जारी रख सकें. निसंदेह इससे जीवन में सफलता व खुशी में इजाफा होना निश्चित है.  

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                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 
# लोकप्रिय पाक्षिक "यथावत" के 01-15 सितम्बर, 2021 अंक में प्रकाशित

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Friday, September 10, 2021

स्ट्रेस मैनेजमेंट: कहीं आप बेवजह तो तनावग्रस्त नहीं

                                               - मिलन  सिन्हा,  स्ट्रेस मैनेजमेंट एंड वेलनेस कंसलटेंट 

हाल ही में एक व्यक्ति ने अपनी परेशानी बताते हुए कहा कि जब भी वे मार्केट जाते हैं या किसी ऑफिस आदि में और वहां लोगों को गलत काम या व्यवहार करते देखते हैं, तो गुस्सा आता है. उन्हें कुछ कहना चाहते हैं, पर कह नहीं पाते. खुद अंदर-ही-अंदर उबलते हैं और कई दिन यही सोचकर तनाव में रहते हैं. इससे बचने के लिए क्या करें? 

दरअसल, यह उस व्यक्ति की समस्या मात्र नहीं है. ऐसा अनेक लोग फील करते हैं. विचारणीय बात यह है कि यह स्थिति आपके नियंत्रण क्षेत्र में है या नहीं. अधिकांश मामलों में  नहीं. यह सही है कि आपको कुछ गलत होते हुए देखना अच्छा नहीं लगता. आपका नाराज होना या क्रोधित होना भी गैर वाजिब नहीं है. उस कारण तनाव ग्रस्त होना जरुर गैर मुनासिब है. ऐसे सभी मामलों में जो गलत कर रहा है, उसे न तो आपके बुरा लगने से कोई फर्क पड़ता है और न ही उसमें  कोई सुधार होता है. कई बार तो आपकी नाराजगी का उसे भान भी नहीं होता. इधर आप नाराज, क्रोधित और तनावग्रस्त होकर अपना ढेर सारा नुकसान कर लेते हैं. है कि नहीं? 

लक्ष्मण रेखा तय करें और बहस में न उलझें: ऐसी स्थिति में आपको जो करना चाहिए वह यह कि आप गलत काम में संलग्न व्यक्ति को पूरी शालीनता और शान्ति से बस यह बता दें कि उनका गलत काम या व्यवहार आपको बुरा लगा. इसके रिएक्शन  में वह कुछ भी कहे, आप उससे बहस में न उलझें. यही आपकी लक्ष्मण रेखा है. समझनेवाली बात यह है कि आपका अपने कार्य या आचरण पर तो कंट्रोल हो सकता है, लेकिन बाहर के किसी व्यक्ति पर शायद नहीं. हां, गलत करनेवाले को टोकने की एक जिम्मेदार नागरिक का कर्तव्य जरुर निभाएं. इसके अच्छे परिणाम मिल जाए तो खुश हो लें, न मिले तब भी इस बात से खुश होने का प्रयास करें कि आपने कोशिश तो की. किसी भी अवस्था में खुद तनावग्रस्त होने का तो कोई अर्थ नहीं है. अमेरिकी विचारक रेनहोल्ह निबुहर सही कहते हैं, "हे ईश्वर, मुझे उन चीजों को स्वीकार करने की स्थिरता दें जिन्हें मैं बदल नहीं सकता, उन चीजों को बदलने का साहस दें जिन्हें मैं बदल सकता हूँ और दोनों में अंतर करने की बुद्धि दें."  

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             और भी बातें करेंगे, चलते-चलते. असीम शुभकामनाएं.            "प्रभात खबर हेल्दी लाइफ " में  01 सितम्बर , 2021 को प्रकाशित   

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Monday, August 30, 2021

स्वतंत्रता और देशप्रेम

                            - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर एंड स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट

हर साल पन्द्रह अगस्त को देशभर के विद्यार्थी भी ब्रिटिश शासन से देश की आजादी का उत्सव मनाते हैं. देश के हर भाग में राष्ट्रगान के साथ-साथ तिरंगा फहराने का कार्यक्रम हर्ष व उल्लास  से संपन्न होता है. देशप्रेम की भावना से ओतप्रोत गीत दिनभर आपको आल्हादित, उत्साहित  और उत्प्रेरित करते रहते हैं. कहने की जरुरत नहीं कि देशप्रेम की भावना साधारण लोगों को असाधारण कार्य करने को सदा प्रोत्साहित और प्रेरित करती रही है. देश आजादी के 75वें साल में प्रवेश कर रहा है. इस वर्ष को बड़े स्तर पर और यादगार तरीके से सेलिब्रेट करने की योजना सरकार और समाज की प्राथमिकता में है.
इस ऐतिहासिक अवसर पर आइए देश के उन तीन सपूतों को याद करते चलें जिन्होंने देश की आजादी के लिए सब कुछ न्योछावर कर दिया, पर आजादी के जश्न में शामिल नहीं हो सके. अगर वे लोग कुछ और वर्ष जीवित रहते तो शायद देश को 1947 से पहले ही आजादी मिल जाती. ऐसा मेरे अलावे करोड़ों अन्य देशवासियों की मान्यता है. 


भगत सिंह एक ऐसे क्रांतिकारी थे जो मात्र  साढ़े 23 वर्ष के छोटे से जीवन में ही ब्रिटिश शासन को आजादी के मुत्तलिक अपने फौलादी इरादे बता दिए. भगत सिंह का जन्म 28 सितम्बर 1907 को पंजाब प्रांत के बावली गाँव मे हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है. उनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती कौर था. 1919 में हुए जलियांवाला बाग नरसंहार ने उन्हें काफी दुखी और विचलित किया था. भगत सिंह का कहना था कि "यदि बहरों को सुनाना  है तो आवाज़ को बहुत जोरदार होना होगा. जब हमने विधान सभा में बम फेंका तो हमारा लक्ष्य  किसी को मारना नहीं था. हमने अंग्रेजी हुकूमत पर बम गिराया था. अंग्रेजों को भारत छोड़ना चाहिए और देश को तुरत आजाद  करना चाहिए." देश की आजादी के लिए जान की परवाह किये बिना लड़ने वाला यह  नायाब योद्द्धा अपने साथी राजगुरु और सुखदेव के साथ 23 मार्च 1931 को फांसी पर चढ़ गया, पर दुनिया के लिए स्वतंत्रता और देशप्रेम की एक प्रेरक मिसाल छोड़ गया.  


चंद्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश के भाबरा में पंडित सीताराम तिवारी के घर हुआ था. मां जगरानी देवी उन्हें संस्कृत का विद्वान बनाना चाहती थीं. इसी कारण किशोरावस्था में ही शिक्षा ग्रहण हेतु उन्हें  बनारस भेजा गया. जलियावाला बाग नरसंहार सहित ब्रिटिश शासन के अन्य दमनकारी कृत्यों से आजाद का युवा मन काफी उद्वेलित था. गांधी जी के असहयोग आंदोलन में भाग लेने के दौरान उन्हें  गिरफ्तार कर जज के समक्ष प्रस्तुत किया गया. जज ने जब उनका नाम पूछा तो उन्होंने कहा, आजाद है मेरा नाम. पिता का नाम पूछने पर बोले, 'स्वतंत्रता'. घर का पता पूछने पर कहा, "जेल." उन्हें सरेआम 15 कोड़े लगाने की सजा सुनाई गई. जब उनकी पीठ पर कोड़े बरस रहे थे तब वे "वंदे मातरम्" का उदघोष कर रहे थे. तभी से उन्हें सब लोग आजाद के नाम से जानने लगे. आजाद कहते थे कि "दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे, आजाद ही रहे हैं, आजाद ही रहेंगे." इस बात को उन्होंने 27 फरवरी, 1931 को साबित कर दिया, जब इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में अंग्रेज पुलिस ने उनपर अचानक हमला कर दिया.उस समय वे साथी क्रांतिकारी सुखदेव राज के साथ कुछ विचार–विमर्श कर रहे थे. आजाद ने पुलिस पर गोलियां चलाईं ताकि उनके साथी सुखदेव बचकर निकल सकें. पुलिस से लोहा लेते हुए उन्होंने पिस्तौल की आखिरी गोली खुद को मार ली और देश के लिए प्राण की आहुति दे दी. 


लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का जन्म 23 जुलाई 1856 को  महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले में हुआ. पिता गंगाधर रामचंद्र तिलक अपने समय के नामचीन शिक्षक थे. दुर्भाग्यवश युवा तिलक 16 वर्ष की उम्र में अनाथ हो गए, लेकिन कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने अध्ययन जारी रखा और आगे बी.ए. आनर्स की डिग्री पूना के डेक्कन कॉलेज से और कानून की डिग्री बंबई विश्वविद्यालय से हासिल की. वे कई विषयों के ज्ञाता थे. 'स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और इसे मैं लेकर रहूँगा' का नारा देनेवाले और उसे जन-जन तक पहुँचानेवाले तिलक ताउम्र  देश को आजाद करने में तन-मन से जुटे रहे. वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के पहले लोकप्रिय नेता थे जिनसे ब्रिटिश सरकार खौफ खाती थी. स्वतंत्रता संग्राम के संघर्षभरे दौर में उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा. 1 अगस्त 1920 को उनका देहांत हुआ. लोकमान्य तिलक कहते थे कि अगर आपके विचार सही, लक्ष्य ईमानदार और प्रयास संवैधानिक हों तो मुझे पूर्ण विश्वास है कि आपकी सफलता निश्चित है. 

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                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 
# लोकप्रिय पाक्षिक "यथावत" के 16-31 अगस्त, 2021 अंक में प्रकाशित

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Tuesday, August 24, 2021

बच्चों को दीजिए संस्कार युक्त, रोगमुक्त, सानंद जीवन

                                     - मिलन सिन्हा, मोटिवेशनल स्पीकर, वेलनेस कंसलटेंट ... ... 

कहते हैं स्वस्थ जीवन, सुखी जीवन का आधार होता है. यह भी कहा जाता है कि बच्चे देश का भविष्य होते हैं. आंकड़े बताते हैं कि हमारे देश की आबादी का 20 % हिस्सा स्कूली बच्चों का है, यानी 25 करोड़ से भी ज्यादा. लिहाजा, हमारे बच्चों को शिक्षित करने के साथ–साथ तन्दुरस्त बनाए रखना अनिवार्य है, तभी आने वाले समय में वे एक समर्थ इंसान के रूप में जीवन की तमाम चुनौतियों से निबटते एवं अपनी जिम्मेदारिओं को निबाहते हुए समाज एवं देश को भी मजबूत बना पायेंगे. लेकिन ऐसा कैसे संभव होगा?


यह एक तथ्य है कि हमारे देश में आजादी के करीब सात दशक बाद भी हमारे गांवों की   अधिकांश  आबादी  आधुनिक चिकित्सा पद्धति के दायरे से बाहर हैं और वे अब तक  मुख्यतः पारम्परिक चिकत्सा पद्धति पर निर्भर रहे हैं. ऐसा इसलिए कि हमारा देश पारम्परिक ज्ञान के मामले  में अत्यधिक समृद्ध रहा है  और हजारों सालों से चली आ रही पूर्णतः स्थापित परम्पराओं की  एक पूरी श्रृंखला सामाजिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में उपलब्ध रही है. लेकिन हमारी  शहरी आबादी कारण–अकारण  स्वास्थ्य ज्ञान के इस असीमित स्त्रोत का उपयोग अपने व्यवहारिक जीवन में नहीं करते हैं  और फलतः सामान्य शारीरिक परेशानियों या बीमारियों, जैसे सर्दी-जुकाम, डायरिया –कब्ज, सिर दर्द –बदन दर्द आदि   से ग्रसित होने पर भी आधुनिक चिकित्सा पद्धति (यानी एलोपैथी) को अपनाने को विवश हो जाते हैं, जब कि आज की हमारी  आधुनिक चिकित्सा काफी मंहगी है और उसके कई नकारात्मक आयाम भी हैं.


फिर भी ऐसा क्यों हो रहा है ? दरअसल बाजार आधारित अर्थव्यवस्था के सामाजिक प्रभावों के अलावे लगातार तेजी से संयुक्त परिवारों  के टूटने  और उतनी ही तेजी से एकल परिवारों के बढ़ते जाने के कारण  दादा–दादी , नाना–नानी जैसे बुजुर्गों के मार्फ़त बच्चों में स्वतः हस्तांतरित होने वाले व्यवहारिक स्वास्थ्य ज्ञान का सिलसिला ख़त्म हो रहा है. ऐसे में, घरेलू उपचार की इस समृद्ध धरोहर को फिर से किसी –न- किसी रूप में पुनर्स्थापित करने  की आवश्यकता है, जिससे एक बड़ी आबादी को सामान्य रोगोपचार के मामले में कुछ हद तक आत्मनिर्भर बनाया जा सके.

 
कहना न होगा, इस महती कार्य को प्रभावी ढंग से लक्ष्य  तक ले जाने में स्कूलों की भूमिका अहम है. इसके लिए  एक सुविचारित व सुनियोजित जागरूकता कार्यक्रम के माध्यम से कक्षा -7 से लेकर  कक्षा -12 तक के बच्चों को प्रेरित कर उनसे अपने घर के बुजुर्गों से सामान्य बिमारियों में किये जाने वाले घरेलू  उपचारों की जानकारी प्राप्त करने के लिए कहा जाएगा  और फिर उन तमाम जानकारियों पर चर्चा कर उन्हें उसके वैज्ञानिक आधार से परिचित करवाया जाएगा. इससे एक तो स्वास्थ्य के प्रति उनकी जागरूकता बढ़ेगी, घरेलू उपचारों की जानकारी होगी और उनका परिवार के बुजुर्गों के साथ जुड़ाव बढ़ेगा. साथ ही बढ़ेगा बुजुर्गों के प्रति बच्चों का सम्मान भी. इसके फलस्वरूप परिवार संस्कारयुक्त, रोग मुक्त, स्वस्थ एवं सानन्द रहेगा. बच्चों के सर्वांगीण विकास में इसका अहम योगदान तो रहेगा ही.

 (hellomilansinha@gmail.com)


             और भी बातें करेंगे, चलते-चलते. असीम शुभकामनाएं.            "प्रभात खबर हेल्दी लाइफ " में  11 अगस्त , 2021 को प्रकाशित   

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Tuesday, August 17, 2021

खेलकूद और व्यक्तित्व विकास

                        - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर एंड स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट 

टोक्यो ओलिंपिक में विभिन्न खेल प्रतियोगिताओं का दौर जारी है. विश्व व्यापी कोरोना महामारी के घटते-बढ़ते ग्राफ के बीच खेल के इस महाकुम्भ का आयोजन खेल भावना के बुनियादी मूल्यों को बखूबी दर्शाता है. कोरोना महामारी के कारण छाए मायूसी, उदासी, चिंता और आशंका के माहौल में ओलिंपिक का आयोजन आशा और उत्साह का एक बड़ा परिवर्तन लेकर आया है.
सच्चाई यह है कि वास्तविक एवं संभावित सभी तरह की चुनौतियों से मुकाबला करते हुए अपने लक्ष्य की ओर बढ़ना छात्र-छात्राएं खेल के मैदान में अनायास ही सीख लेते है. इससे उनका स्वस्थ मनोरंजन भी होता है. लेकिन क्या विश्व के सबसे युवा देश के सभी विद्यार्थी  इसका समुचित लाभ उठा पा रहे हैं? यह बहुत विचारणीय विषय है. बहरहाल, यह जानना सभी विद्यार्थियों के लिए जरुरी है कि खेलकूद के जरिए वे कौन-कौन सी अहम बातों से लाभान्वित हो सकते हैं, जो उनके व्यक्तित्व विकास में बहुत सहायक होंगी. हां, इसके लिए उन्हें निष्ठापूर्वक इंडोर या आउटडोर किसी भी खेल का नियमित अभ्यास करना पड़ेगा. 


1. शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य: अध्ययन सहित हर क्षेत्र में अपेक्षित ऊर्जा और उत्साह से जुटे रहना अनिवार्य होता है. इसके लिए शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत होना आवश्यक है. खेलकूद के जरिए यह हासिल करना आसान होता है.  रोजाना एक घंटे के नियमित अभ्यास से भी आपके शरीर का हर अंग सक्रिय हो जाता है, आपका मेटाबोलिज्म और इम्यून सिस्टम बेहतर होता है और आपमें ऊर्जा व उत्साह की कमी नहीं रहती. जीवन के प्रति आपका दृष्टिकोण व्यापक और सकारात्मक बनता है. आपके खानपान में भी एक बेहतर अनुशासन दिखाई पड़ता है. आपको रात में नींद भी अच्छी आती है. कुल मिलाकर इससे आपका मानसिक स्वास्थ्य भी बेहतर बना रहता है. तनाव प्रबंधन सहित इसके अन्य कई लाभ आपको बराबर मिलते रहते हैं.  

   
2. लक्ष्य के प्रति समर्पण:
बिना समर्पण की भावना के लक्ष्य तक पहुंचना बहुत मुश्किल होता है, कई बार तो असंभव भी. स्पोर्टस आपको अपने लक्ष्य के प्रति समर्पण हेतु प्रेरित करता है. लुईस ग्रीज़र्ड ने सही कहा है कि "ज़िन्दगी का खेल काफी कुछ फुटबॉल की तरह है. आपको अपनी समस्याओं से जूझना पड़ता है, अपने डर को ब्लॉक करना पड़ता है, और जब मौका मिले तब अपना पॉइंट स्कोर करना होता है." सभी खेलों में कमोबेश यही सिद्धांत लागू होता है. 


3. योजना और कार्यान्वयन: सब जानते हैं कि किसी लक्ष्य को हासिल करने के लिए यथोचित कर्म करना बहुत जरुरी होता है. इसके लिए पहले फुलप्रूफ योजना बनाना और फिर उस योजना  को सही ढंग से कार्यान्वित करना उतना ही अनिवार्य होता है. अनेक उदाहरण आसपास ही मिल जायेंगे जहां विद्यार्थी विशेष ने लक्ष्य  तो बड़ा तय कर लिया लेकिन उसे हासिल करने के लिए अपेक्षित प्लानिंग  एंड एग्जिक्युसन के मामले में सही कदम नहीं उठा पाए. खुशी की बात  है कि खेलते-खेलते आप प्रबंधन के ये अहम सूत्र  मैदान में स्वतः सीखते रहते हैं. 

  
4. समय प्रबंधन और आत्मविश्वास:
  किसी भी खेल में इनका अतिशय महत्व होता है. यह अकारण नहीं है. अगर 90 मिनट के फुटबॉल मैच में या 70 मिनट के हॉकी मैच में तय समय के अन्दर गोल कर सकें तो यह बेहतर खेल का परिचायक होता है. आपकी टीम ने शुरुआती कुछ मिनटों में या मध्यांतर से पहले दो-तीन गोल करके बढ़त हासिल कर ली तो प्रतिद्वंदी टीम पर दवाब बनाना आसान हो जाता है, जिसका असर खेल के अंत तक रहता है. बेहतर समय प्रबंधन  से हासिल सफलता से आपका और पूरी टीम का आत्मविश्वास भी बढ़ता है.  


5. टीम वर्क एवं समावेशी सोच:
क्रिकेट से लेकर कबड्डी तक ज्यादातर खेल टीम के रूप में खेले जाते हैं. आप कितने भी योग्य हों और आपका व्यक्तिगत योगदान कितना भी  महत्वपूर्ण हो , लेकिन उसकी कीमत तब कम हो जाती है जब आप एक टीम के रूप में अपना 100 % नहीं दे पाते हैं.  ऐसे एकल प्रतियोगिताओं में भी कोच, मैनेजर और कई सहायक होते हैं जो आपकी एक्सटेंडेड टीम होती है. देखा गया है कि व्यक्तिगत रूप से सभी खिलाड़ियों का स्तर बेहतर होते हुए भी टीम मैच नहीं जीत पाती है क्यों कि खिलाड़ियों में टीम भावना की कमी थी. कहने की जरुरत नहीं कि खेल के मैदान में हमें यह अहम सीख मिलती है कि हम कैसे टीम वर्क और समावेशी सोच के साथ न केवल खेल प्रतियोगिताओं में सफलता हासिल करें, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में सफल हो सकें.

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                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 
# लोकप्रिय पाक्षिक "यथावत" के 01-15 अगस्त, 2021 अंक में प्रकाशित

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Tuesday, August 10, 2021

लाइफ स्किल: पहचानें अपनी क्षमता

                          -मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर एंड स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट

मनुष्य की हार तब होती है, जब वह खुद पर यकीन करना छोड़ देता है.  वास्तविकता यह है कि  आप जैसा दूसरा कोई नहीं है; आप किसी का कॉपी-पेस्ट वर्सन नहीं हैं; आप में असीम क्षमताएं हैं, केवल उनका समुचित दोहन किया जाना शेष है. इस तथ्य को अच्छी तरह जान लें और मान लें तो एक अच्छी शुरुआत स्वतः हो जाएगी. दरअसल अपनी क्षमताओं को जो पहचान लेगा और उसके अनुरूप काम करने लगेगा, सफलता का साथ उसे मिलता रहेगा.

 
क्षमताओं को उपलब्धियों में तब्दील करने के लिए जरुरी है कि आप जीवन को सजगता से जीएं और इसके हर मिनट का आनंद लें.
सदा सीखने की कोशिश करते रहें और खुद को हमेशा युवा ही समझें. ऐसे भी रोचक तथ्य तो यही है कि मनुष्य कभी भी बूढ़ा नहीं होता, सिर्फ उसकी उम्र बढ़ती है. अगर आप खुद को तन-मन से स्वस्थ रखेंगे तो न सिर्फ सकारात्मक ऊर्जा का विकास होगा, बल्कि आपका जीवन भी उत्साह, उमंग और आनंद से भर उठेगा. 


खुद के अंदर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करने के लिए एक सरल मंत्र है. इसे आजमाकर जरुर देखें. सुबह सो कर उठने के बाद सबसे पहले कुछ पल आईने के सामने खड़े होकर खुद को निहारें और एक प्यारभरी मुस्कान से खुद का अभिवादन करें.  इसके बाद खुद से कई बार कहें "आइ एम द बेस्ट", "आई केन एंड आई विल." अर्थात मैं सबसे अच्छा हूँ, मैं कर सकता हूँ और मैं करूंगा. इससे न सिर्फ शरीर में स्फूर्ति महसूस होगी, बल्कि आत्मविश्वास बढेगा और विचार भी बेहतर बनेंगे. दरअसल, मन को जैसा समझाएंगे, मानस भी वैसा बनेगा और व्यक्तित्व भी वैसा ही बनेगा. 


एक और दिलचस्प बात.
संघर्ष और सफलता दोनों बहुत अच्छे दोस्त हैं और करीब-करीब साथ ही चलते हैं. दुनिया के किसी भी सफलतम व्यक्ति का इतिहास उठाकर अगर हम देखेंगे तो पायेंगे कि उन्होंने जीवन में संघर्ष का मार्ग कभी नहीं छोड़ा और न ही कभी असफलता से घबराए. कई बार तो ऐसा भी हुआ है कि एकाधिक असफलताओं के बाद ही उन्होंने सफलता का स्वाद चखा है. कहने का सीधा अर्थ यह है कि यदि आप असफलता से बिना डरे, संघर्ष का दामन थामे रहे तो सफलता ज्यादा दिनों तक दूर नहीं रह सकती है. फल मिलने में वक्त लग सकता है, लेकिन मिलता जरूर है. 

  (hellomilansinha@gmail.com)


             और भी बातें करेंगे, चलते-चलते. असीम शुभकामनाएं.            "दैनिक जागरण" के राष्ट्रीय संस्करण में  7 अगस्त , 2021 को प्रकाशित   

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Friday, July 30, 2021

अपना भविष्य खुद लिखें

                          - मिलन  सिन्हा, मोटिवेशनल स्पीकर एवं स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट 

हर विद्यार्थी की यह चाहत होती है कि वह जीवन में एक अच्छा मुकाम हासिल करे, उसका भविष्य बेहतर हो. उनके अभिभावक की दिली इच्छा भी यही होती है.
सामान्यतः मेरे हर मोटिवेशनल सेशन में एकाधिक विद्यार्थी यह जानना चाहते हैं कि छात्र जीवन में  क्या-क्या करना चाहिए जिससे कि एक बेहतर भविष्य का निर्माण संभव हो सके. यकीनन अपनी क्षमता पर भरोसा करना, जिम्मेदारी लेना, कर्तव्यनिष्ठ होना तथा वर्तमान समय का पूरा  सदुपयोग करना  बुनियादी शर्त है. हां, सलाह और मार्गदर्शन की जरुरत होती है, लेकिन कोई निर्णय लेने और उस पर अमल करने पर दखल मुख्यतः आपका होता है. स्वामी विवेकानंद कहते हैं कि जब तुम कोई काम करो, उस समय अन्य किसी बात का विचार मत करो. उसे एक साधना-उपासना समझकर उसमें अपना सारा तन-मन लगा दो. हरेक व्यक्ति का यह कर्तव्य है कि वह अपना एक लक्ष्य निर्धारित कर उसे पूरा करने का हरसंभव प्रयास करे. दूसरों के लक्ष्य से प्रभावित हुए बिना अपने लक्ष्य के प्रति पूर्ण समर्पण के साथ कर्म करना जीवन में सफलता को सुनिश्चित करता है. 


क्या सभी विद्यार्थी ऐसा करते हैं? अपने आसपास देखने पर छात्र-छात्राओं को अनायास ही कई  विद्यार्थी मिल जायेंगे जो साधारण से काम को भी पूरा करने के लिए सहारे या बैसाखी की तलाश में रहते हैं. पाठ्यक्रम से जुड़ा कोई मामला हो या दैनंदिन जीवन से जुड़ी कोई आम बात, उन्हें आप सपोर्ट मांगते पायेंगे, अकेले दम पर आगे बढ़ने से वे कतरायेंगे, चुनौतियों से घबराएंगे, निर्णय  लेने से बचेंगे और कुछ हासिल न होने पर दूसरे पर दोष डालेंगे. गौर करने वाली बात यह है कि धीरे-धीरे यह उनकी आदत और कार्यशैली बन जाती है.
दुःख की बात है कि इस क्रम में वे यह भूलने की गंभीर गलती कर बैठते हैं कि इस आदत के कारण धीरे-धीरे वे आत्मविश्वास और साहस के मामले में खासे कमजोर होते जा रहे हैं. उनकी समझदारी परिपक्व नहीं हो पाती है. और-तो-और वे अपने वर्तमान को भी खुलकर नहीं जी पाते हैं. उन्हें दूसरों का मुखापेक्षी बन कर जीना पड़ता है और अक्सर उन्हें अपने स्वाभिमान तक से समझौता करना पड़ता है. घरवालों और दोस्तों के बीच उनकी पहचान एक कन्फ्यूज्ड, अक्षम और कमजोर व्यक्ति के रूप में बन जाती है. इसका खामियाजा उन्हें ही बराबर भुगतना पड़ता है. 


जीवन के किसी भी क्षेत्र में संघर्ष और मेहनत के रास्ते सफलता के शिखर तक पहुंचने वाले लोगों से जब भी यह प्रश्न पूछा जाता है कि उनकी सफलता का राज क्या है तो कई कारणों में एक कॉमन कारण जो वे बताते हैं वह है उनकी सही निर्णय लेने की  क्षमता. जब इस क्षमता को प्राप्त करने के पीछे की बात पूछी जाती है तो वे बताते  हैं कि जीवन यात्रा के दौरान अर्जित अनुभव. जिज्ञासावश अनुभव प्राप्त करने का तरीका बताने के अनुरोध पर वे बोलते हैं कि सामान्यतः ये  अनुभव गलत निर्णय लेने के क्रम में हासिल परिणाम से मिलता है. संदेश बिल्कुल साफ है.  स्वतंत्र होने का साहस करें. लकीर के फकीर बने रहने के बजाय अपने अंदर के लीडर को बाहर निकालें.
वास्तव में हर विद्यार्थी में एकाधिक लीडरशिप क्वालिटी होता है. नए और बेहतर रास्ते तलाशने  की ललक होती है. सच यह भी है  कि वह न तो बने-बनाए रास्ते पर चलने को और न ही किसी का पिछलग्गू बनने को मजबूर होता है. वह सुनता तो कई लोगों की है, लेकिन उस पर अमल करने से पहले चिंतन करने को स्वतंत्र होता है और फिर बिना कनफूजन के आगे बढ़ने का फैसला खुद लेने को भी. हां, गलती हो जाय तो वे दोषारोपण नहीं करते, बल्कि विश्लेषण कर उससे सीख और अनुभव हासिल करते हैं. सफल होने पर वे खुशी को एन्जॉय तो करते हैं, पर साथ ही साथियों के प्रति आभार व्यक्त करना नहीं भूलते. 


अंत में एक प्रेरक प्रसंग. एक बड़े कॉरपोरेट लीडर से उनके एक मित्र ने जब यह पूछा कि आपसे  कई बड़े कारोबारी व उद्योगपति कुछ-न-कुछ सलाह लेने और सीखने आते रहते हैं, जिससे कि उनके कामकाज में उन्नति हो, फिर आप क्यों आउट-ऑफ़-बॉक्स सोचने, नई-नई चीजें सीखने और नए-नए प्रयोग करने में निरंतर लगे रहते हैं? उत्तर में उस कॉरपोरेट लीडर ने कहा कि जब तक मुझमें  कुछ बेहतर जानने-सीखने-करने  की इच्छा बची रहेगी तब तक मैं ऐसा करता रहूंगा और शायद तभी तक वे लोग भी मेरे पास आते रहेंगे. जीवन की सार्थकता इसी में है. हां, यह मेरे और मेरे आर्गेनाईजेशन के बेहतर भविष्य के लिए भी बेहद जरुरी है. 

  (hellomilansinha@gmail.com)                        


             और भी बातें करेंगे, चलते-चलते. असीम शुभकामनाएं.               
"हिन्दुस्थान समाचार समूह" की  पाक्षिक पत्रिका "यथावत" के 16-31 जुलाई, 2021 में प्रकाशित   

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Tuesday, July 20, 2021

स्टार्टअप की ओर कैसे बढ़ाएं कदम

                              - मिलन  सिन्हा, मोटिवेशनल स्पीकर एंड  वेलनेस कंसलटेंट

देश में इस समय शिक्षित युवाओं द्वारा व्यवसाय-व्यापार और रोजगार के क्षेत्र में स्टार्टअप के रूप में एक नई पहल साफ़ दिखाई पड़ रही है. कोरोना महामारी के दौरान रोजगार की  प्रतिकूल परिस्थिति ने इस पहल को गति प्रदान की है. जब कोई गंभीर समस्या हमारे युवाओं के सामने आती है तो देखा गया है कि वे नवाचार और रचनात्मक तरीके से सफलता के रास्ते तलाश लेते है. इसके प्रत्यक्ष अनुभव से हाल ही में मुझे गुजरने का अवसर मिला जब देश भर से प्राप्त सैकड़ों स्टार्टअप प्रोजेक्ट्स में से उत्तम दस प्रोजेक्ट्स को सेलेक्ट करनेवाले एक निर्णायक मंडल में सक्रिय रूप से जुड़ा. आईआईएम, आईआईटी, एनआईटी सहित अनेक अच्छे संस्थाओं से शिक्षित छात्र-छात्राओं ने हेल्थ केयर, ट्रेवल मैनेजमेंट, डाइट मैनेजमेंट, लैंग्वेज लर्निंग, डिजिटल हेंडीक्राफ्ट प्रमोशन व मार्केटिंग आदि अनेक विषयों से संबंधित नायाब प्रोजेक्ट्स पेश किए. इनका आकलन-विश्लेषण करने के क्रम में हमने कई बातें नोट की और टॉप टेन प्रोजेक्ट्स के प्रेजेंटेशन सेशन में हमने उन पर चर्चा भी की. बताते चलें कि स्टार्टअप इंडिया भारत सरकार की एक प्रमुख पहल है जिसकी घोषणा 15 अगस्त, 2015 को प्रधान मंत्री, नरेंद्र मोदी ने लाल किले से की थी. इसका  उद्देश्य देश में स्टार्टअप्स और नये विचारों के लिए एक मजबूत इकोसिस्टम  का निर्माण करना है जिससे देश का आर्थिक विकास हो एवं बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर उत्पन्न हो सके. 


अवसर हैं बड़े: दरअसल पिछले कुछ सालों में युवाओं  में एंटरप्रेन्योरशिप के प्रति बढ़ते रुझान के कारण देश में स्टार्टअप इकोसिस्टम में अच्छी उन्नति देखी गई है. नवाचार और जोखिम से जूझने के उनके सकारात्मक जज्बे के कारण यह विश्वास निरंतर मजबूत हो रहा है. टेक्नोलॉजी  का सपोर्ट भी देश में स्टार्टअप की वृद्धि को गति प्रदान कर रहा है.  इंटरनेट की सुलभता, इसका उपयोग करने वालों की संख्या में तेज वृद्धि और इंटरनेट चार्जेज में कमी ने स्टार्टअप इकोसिस्टम के विस्तार में एक अहम भूमिका निभाई है. वर्तमान में पचास करोड़ से ज्यादा भारतीय संपूर्ण देश में इंटरनेट सेवाओं का उपयोग कर रहे हैं. हां, समाज और सरकार का रुख भी इस मामले में उत्साहवर्धक रहा है. हाल ही में नैसकॉम के टेक्नोलॉजी एंड लीडरशिप फोरम को संबोधित करते हुए प्रधान मंत्री ने कहा कि कहा कि इस समय दुनिया भारत की तरफ अधिक भरोसे और उम्मीद से देख रही है. कोरोना महामारी के इस दौर में  भारत के ज्ञान-विज्ञान और टेक्नोलॉजी ने न केवल खुद को साबित किया है बल्कि खुद को इवॉल्व भी किया है. ऐसे में स्टार्टअप को ऐसे इंस्टीट्यूशंस का निर्माण करना चाहिए जो ऐसे विश्व स्तरीय उत्पाद तैयार करे  जो उत्कृष्टता  के मामले में एक बेहतर मानक स्थापित कर सके.


बहरहाल, देश में स्टार्टअप के क्षेत्र में कदम रखने वाले युवाओं के लिए निम्नलिखित पॉइंट्स पर ध्यान देना फायदेमंद साबित होगा. 

 
आइडिया है अहम: यहां आइडिया बहुत अहम होता है. सचमुच इनोवेटिव और क्रिएटिव आईडिया सबको आकर्षित करते है. लेकिन यह भी सच है कि आईडिया में इस आकर्षण  के साथ-साथ इसकी टेक्निकल फिजिबिलिटी यानी इसे जमीन पर उतारना संभव है या नहीं, इसकी स्पष्ट व्याख्या   होनी चाहिए. इतना ही नहीं, प्रस्तावित प्रोजेक्ट की इकनोमिक वायबिलिटी को जांचना भी जरुरी  है. कहने का साफ़ मतलब यह कि आपके प्रोजेक्ट को वास्तव में खड़ा करना न केवल तकनीकी रूप से मुमकिन हो, बल्कि वह आर्थिक दृष्टि से लाभप्रद भी हो. 


प्रोजेक्ट से आपका लगाव:  कई बार यह बात सामने आती है कि प्रोजेक्ट तो प्रथम दृष्टया ठीक है, लेकिन आपका उससे कोई लगाव नहीं है या यह आपके पैशन का हिस्सा नहीं है. प्रोजेक्ट रिपोर्ट आदि आपने किसी मिलते-जुलते सफल प्रोजेक्ट को देखकर तैयार कर लिया है या करवा लिया है. लिहाजा आपका ऐसे सेक्टर के किसी प्रोजेक्ट से वास्तविक जुडाव या उसका अनुभव नहीं है. इससे प्रोजेक्ट की निरंतरता और दीर्घकालिक सफलता संदिग्ध हो जाती है.  


प्रोजेक्ट की खूबियां व खामियां: कहते हैं जो भी प्रोजेक्ट आप स्टार्ट करना चाहते हैं उसके विषय में पूरी जानकारी - छोटी या बड़ी सब आपको होनी चाहिए. कहीं और कभी भी प्रोजेक्ट के प्रेजेंटेशन में उसकी खूबियों और खामियों को स्पष्ट रूप से लोगों को बताना आपको मार्केट में एक अच्छी पहचान दे सकता है. इसके अनेक फायदे हैं. प्रोजेक्ट को संचालित करने में जिनकी प्रमुख भूमिका हो, उनके प्रोफाइल स्ट्रांग और पारदर्शी होना भी जरुरी है, जिससे शुरुआत में इन्वेस्टर या बैंक को कन्विंस करना आसान हो जाए. ऐसे इसका बहुआयामी फायदा प्रोजेक्ट को आगे भी बराबर मिलता रहता है.  


जमीनी हकीकत से परिचित होना जरुरी: इस सम्बन्ध में प्रोजेक्ट को 3-सी यानी  कैपेसिटी, कैपिटल और करैक्टर के चिर स्थापित फार्मूला के कसौटी पर परखना लाजिमी है. कहने का अभिप्राय यह कि आपकी क्षमता क्या है, आपके पास कैपिटल जुटाने के क्या-क्या विकल्प हैं और प्रोजेक्ट को सफल बनाने के पीछे आपकी योजना और सोच क्या है? इसके साथ ही प्रोजेक्ट के सामने उपस्थित और संभावित अवसरों और जोखिमों का विस्तृत आकलन -विश्लेषण करना अनिवार्य है. अपने प्रोडक्ट या सर्विसेज के मामले में मार्केट में डिमांड-सप्लाई और प्रतिस्पर्द्धा की स्थिति से अवगत होना भी अच्छा होता है. इस क्रम में आपको मोटे तौर पर जमीनी हकीकत से परिचित होने का सुअवसर मिलता है. 

 
कानूनी पहलुओं को जानें: प्रोजेक्ट से संबंधित सभी छोटे-बड़े कानूनी पहलुओं को अच्छी तरह जानना अनिवार्य है जिससे कि प्रोजेक्ट शुरू करने से लेकर उसके सफल परिचालन तक सभी कानूनी शर्तों का कंप्लायंस समय से हो सके. जहां पेटेंट आदि करवाना जरुरी है, वहां उस प्रोसेस को फॉलो करें, अन्यथा बाद में बहुत नुकसान हो सकता है. 

 
चुनौतियों से हार न मानें: इस क्षेत्र में ज्ञात-अज्ञात कई चुनौतियां कभी भी सामने आ सकती हैं. अतः अपनी ओर से तैयारी पूरी रखें और यथासंभव प्रो-एक्टिव हो कर काम करें. चुनौतियों से न  तो घबराएं और न ही कभी उनसे हार मानें. देश-विदेश में जितने भी स्टार्टअप आज सफलता का परचम लहरा रहें हैं, कमोबेश उन सभी को इसी परिस्थिति से गुजरना पड़ा है. यहां स्वामी विवेकानंद के इस अनमोल विचार को हमेशा याद रखें कि "जब किसी दिन आपके सामने कोई समस्या ना आये, तो आप सुनिश्चित हो सकते हैं कि आप गलत मार्ग पर चल रहे हैं." इससे आपका आत्मबल स्ट्रांग बना रहेगा और अंततः आप "हार के आगे जीत है" जैसे कथन को वाकई चरितार्थ कर पायेंगे. 

 (hellomilansinha@gmail.com)


             और भी बातें करेंगे, चलते-चलते. असीम शुभकामनाएं.               "दैनिक जागरण" के राष्ट्रीय संस्करण में 17 जुलाई, 2021 को प्रकाशित   

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Tuesday, July 13, 2021

आपका स्वास्थ्य आपके हाथ

                           - मिलन  सिन्हा, मोटिवेशनल स्पीकर एवं स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट 

हाल ही में केन्द्र सरकार ने एक ऐसा निर्णय लिया जिससे प्लस टू के लाखों परीक्षार्थियों के चेहरे खिल गए, उनका मन हल्का हो गया और तनाव काफूर. दरअसल, प्रधानमंत्री  की अध्यक्षता में हुई एक अहम बैठक में विद्यार्थियों में कोरोना संक्रमण के बढ़ने की आशंका और खतरों के मद्देनजर सीबीएसई 12वीं बोर्ड की परीक्षा को रद्द करने का फैसला किया गया. केंद्र सरकार के इस निर्णय  के बाद सीआईएससीई और कई राज्यों के  परीक्षा बोर्ड ने भी अपने यहां की 12वीं बोर्ड की परीक्षा को रद्द करने की घोषणा कर दी. सरकार के इस फैसले के बाद अनेक छात्रों और उनके अभिभावकों ने  प्रधानमन्त्री, शिक्षा मंत्री और बोर्ड अधिकारियों के प्रति आभार व्यक्त किया. बाद में  प्रधानमंत्री ने केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की ओर से आयोजित एक वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम छात्रों और उनके अभिभावकों से खुलकर बात की. उन्होंने कहा कि छात्रों के व्यापक  हित में यह फैसला किया गया, जिससे कि हमारे विद्यार्थियों के स्वास्थ्य के साथ-साथ उनके भविष्य की भी रक्षा हो सके. साफ़ तौर पर प्रधानमंत्री विद्यार्थियों के स्वास्थ्य के प्रति फिक्रमंद रहे और उनको स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों से बचाने हेतु उन्होंने यह अहम कदम उठाया. बहरहाल, अब विद्यार्थियों  के लिए यह विचारणीय सवाल है कि वे कोरोना महामारी या अन्य किसी भी परिस्थिति में कैसे खुद को मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ रख सकें. कहने की जरुरत नहीं कि इस मामले में हजारों चुनौतियों और जोखिमों के बावजूद प्रधानमन्त्री ने पूर्णतः स्वस्थ रहकर उनके सामने एक ज्वलंत उदाहरण पेश किया है. खैर, सच्चाई यह है कि मूल रूप से विद्यार्थियों का स्वास्थ्य खुद उनके हाथ में ही है. कैसे? आइए यहां कुछ आसान उपायों की चर्चा करते हैं.  


कहते हैं न कि मुश्किल नहीं है कुछ भी अगर ठान लीजिए. तो कुछ भी हो जाए, सेहतमंद रहना है, इस संकल्प के साथ दिन की शुरुआत कीजिए. अंग्रेजी में कहते हैं मॉर्निंग शोज दि डे. अर्थात सुबह की अच्छी या बुरी शुरुआत ही दिन के अच्छा या बुरा गुजरने का संकेत होता है. अतः सुबह जल्दी उठने की कोशिश करनी चाहिए. इसके लिए रात में जल्दी सोना अनिवार्य है, क्यों कि 7-8 घंटे की रात में नींद शरीर को स्वस्थ रखने के लिए आवश्यक है. सुबह उठकर पहले शरीर को जलयुक्त यानी हाइड्रेटेड करें. सभी विद्यार्थी जानते हैं कि मानव शरीर में 65-70 प्रतिशत पानी होता है जिसे हर समय कमोबेश उस स्तर पर बनाया रखना बेहतर होता है. रोचक और जानने योग्य बात यह है कि पानी पीने की एक कला होती है, जिसके अंतर्गत बुनियादी तौर पर सुबह-सुबह कम-से-कम आधा लीटर पानी पीना, पानी हमेशा आराम से बैठकर पीना, खाने  के बीच में या खाने से तुरत पहले या तुरत बाद में पानी नहीं पीना शामिल है. दिनभर में मौसम और अपने शारीरिक जरुरत  के हिसाब से ढ़ाई से तीन लीटर पानी जरुर पीएं. पानी पीने में छात्र-छात्राएं इतना भी अनुशासन रख सकें तो न केवल सेहतमंद रह सकते हैं, बल्कि कई रोगों से बचे रह सकते हैं. 


खेलकूद, व्यायाम और योगाभ्यास शरीर को सक्रिय और स्वस्थ रखने में बहुत बड़ी भूमिका अदा करता है. दिनभर के रूटीन में इसे जरुर शामिल कीजिए. और सिर्फ शामिल करके जैसे-तैसे इसे मत निबटाइए. जितना समय इस काम के लिए निर्धारित करें, उसका मनोयोग से आनंदपूर्वक सदुपयोग कीजिए. शरीर के इम्यून सिस्टम एवं मेटाबोलिज्म को मजबूत बनाए रखने के लिए यह बहुत जरुरी है. कुछ न कर सकें या कोरोना काल में बाहर जाना मुनासिब न समझें  तो घर में ही स्पॉट जम्पिंग-रनिंग, फ्री हैण्ड एक्सरसाइज और कुछ योगाभ्यास कर लें. 

 
बुनियादी तौर पर स्वाद के बजाय स्वास्थ्य को केन्द्र में रखकर खानपान करें. खाना खाने में कभी भी जल्दबाजी न करें. आराम से बैठ कर खूब चबाकर और खाने को एन्जॉय करते हुए खाएं. खाना पौष्टिक और सुपाच्य हो, यह बहुत जरुरी है. इसके लिए साबूत अन्न, दाल, मौसमी और हरी सब्जी, मौसमी फल, दूध, दही, ड्राई फ्रूट्स  आदि को भोजन में शामिल करें. सुबह का नाश्ता सबसे पौष्टिक और मात्रा में ज्यादा हो. रात में हल्का भोजन करें और वह भी रात आठ से नौ बजे के बीच. जंक, पैकेज्ड, प्रोसेस्ड, फ्रोजेन फ़ूड और कोल्ड ड्रिंक्स आदि स्वाद में तो अच्छे हो सकते हैं, लेकिन सेहत के लिए यकीनन अच्छे नहीं होते हैं. हाँ, अल्कोहल, सिगरेट, गुटखा और अन्य नशीली चीजों से बराबर दूर रहें. एक बात और. खाते वक्त टीवी, मोबाइल, लैपटॉप आदि पर इंगेज न रहें और न ही आपस में कोई विवादित चर्चा करें. सार संक्षेप यह कि अच्छा सोचेंगे, करेंगे और खायेंगे तो बराबर स्वस्थ  रह पायेंगे.

  (hellomilansinha@gmail.com)                        


             और भी बातें करेंगे, चलते-चलते. असीम शुभकामनाएं.               
"हिन्दुस्थान समाचार समूह" की  पाक्षिक पत्रिका "यथावत" के 01-15 जुलाई, 2021 में प्रकाशित   

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Tuesday, July 6, 2021

अच्छी सोच का कमाल

                         - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर एंड स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट

सम्प्रति देश के कई महानगरों सहित अन्य अनेक स्थानों पर कोविड-19 संक्रमण के एक और बड़े दौर में आशंका, चिंता व भय का माहौल बना हुआ है. बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं भी  हैरान, परेशान और थोड़े तनावग्रस्त हैं, पर निराश या हताश नहीं हैं. दरअसल वे ज्ञानीजनों और मनोवैज्ञानिकों की इस मान्यता से सहमत हैं कि ऐसी परिस्थिति में अच्छी सोच के साथ जीना आसान हो जाता है. ऐसे स्वामी विवेकानंद सहित कई महान लोगों ने भी अलग-अलग शब्दों में साफ़ तौर पर यह कहा है कि "जैसा तुम सोचते हो, घीरे-धीरे वैसा ही बनने लगते हो. यदि तुम खुद को कमजोर सोचते हो, तुम कमजोर हो जाओगे, अगर खुद को ताकतवर सोचते हो, तुम ताकतवर हो जाओगे." आइए जानते हैं अच्छी सोच के कुछ अहम फायदों के बारे में.

 
आत्मविश्वास में वृद्धि: सोच से आत्मविश्वास का गहरा ताल्लुक है. कहते हैं न कि मन के हारे हार, मन के जीते जीत. "हम कर सकते हैं और हम करेंगे" का भाव अच्छी  सोच का परिणाम होता है. इसके विपरीत सोच का असर भी हम अपने आसपास रोजाना देखते हैं, जिसका भाव वही चिरपरिचित "हम नहीं कर सकते और हम नहीं करेंगे" होता है. रोचक बात है कि सही सोच के कारण जैसे ही हम अभीष्ट कार्य को करने का फैसला करते हैं, हमारा तन और मन उसमें स्वतः संलिप्त हो जाता है और  हमारे आत्मविश्वास में स्वतः वृद्धि होने लगती है. ज्ञानीजन कहते हैं कि आत्मविश्वास को साथी बनाकर चलनेवाले विद्यार्थी न केवल बेहतर अध्ययन कर पाते हैं और ज्यादा सफल होते हैं, बल्कि जीवन को बेहतर ढ़ंग से एन्जॉय भी करते हैं. 


कार्य क्षमता में सुधार: कहते हैं अच्छी सोच का व्यापक और बहुआयामी असर हमारी कार्यशैली और कार्य क्षमता पर पड़ता है. "अच्छा करेंगे तो परिणाम अच्छा होगा" की सोच के कारण हम एक प्रभावी कार्ययोजना बनाने और उसे अमल में लाने को प्रेरित होते हैं. इससे अपने निर्धारित लक्ष्य की ओर तेज गति से बढ़ना संभव होता है. अगर हम खुद इस तरह कार्य को संपादित कर पाते है तो हमारी प्रोडक्टिविटी और सक्सेस में बड़ा उछाल दर्ज होता है. इससे अच्छी सोच के प्रति हमारा जुड़ाव और भी स्ट्रांग हो जाता है और हम एक्सीलेंस यानी उत्कृष्टता की यात्रा में निरंतर अग्रसर होते रहते हैं. 


बेहतर स्वास्थ्य:  महात्मा बुद्ध का कहना है कि "अच्छी सेहत के बिना जीवन जीवन नहीं है; बस पीड़ा की एक स्थिति है - मौत की छवि है. अतः तन और मन दोनों को अच्छी सेहत में रखना हमारा कर्तव्य है."  चिकित्सा वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक दोनों मानते और कहते रहे हैं कि  सोच का गंभीर और दूरगामी असर हमारे इमोशनल-मेंटल हेल्थ के साथ-साथ फिजिकल हेल्थ पर पड़ता है. हम सभी जानते हैं कि मानसिक तनाव से पीड़ित होने और रहनेवालों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है और उसके कारण विभिन्न रोगों के चपेट में आनेवाले लोगों की संख्या भी. अच्छी सोच के कारण हमारे लिए दैनंदिन जीवन में आनेवाले तनाव का प्रबंधन आसान हो जाता है. परिणामस्वरूप हमारा मेटाबोलिज्म बेहतर ढंग से काम कर पाता है. इससे हमारा इम्यून सिस्टम मजबूत बना रहता है और हमारा स्वास्थ्य ठीक रहता है. इसके समेकित पॉजिटिव प्रभाव  से हमारे  लिए  कोविड-19 के संक्रमण के अलावे अनिद्रा, सिरदर्द, माइग्रेन, डिप्रेशन से लेकर ह्रदय रोग, मधुमेह, कैंसर आदि रोगों से बचे रहना बहुत आसान हो जाता है.  


खुशी में इजाफा: जीवन में सबसे अहम है खुशी और अच्छी सोच से खुशी का गहरा संबंध है. यह सच है कि हम जो करना चाहते हैं, उसे अगर उसी तरह कर पाते हैं और तदनुरूप परिणाम भी मिलता है, जो कि अधिकांश मामले में पाया जाता है, तो हमें बहुत ख़ुशी मिलती है. यदि असफल भी हुए  तो हायतौबा मचाने के बजाय उसका निरपेक्ष विश्लेषण करते हैं, और ज्यादा मेहनत  करने का संकल्प लेते हैं और उस क्षण को न भूलने के लिए कदाचित उसे सेलिब्रेट भी करते हैं. स्वाभाविक रूप से ऐसे विद्यार्थियों की खुशी दूसरों तक किसी-न-किसी रूप से संप्रेषित  भी होती है. किसी शैक्षणिक संस्थान में जब छात्र-छात्राएं इस तरह अपनी अच्छी सोच को कार्यरूप देकर खुशी का हकदार बनते हैं तो वहाँ सबका मोटिवेशन लेवल कितना ऊंचा रहता है, इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है. लोकप्रिय अमेरिकी लेखक रिचर्ड बाख़ सही कहते हैं कि खुशी वह पुरस्कार है जो हमारी सोच के अनुरूप सबसे सही जीवन जीने पर हासिल होती है. 

 (hellomilansinha@gmail.com) 

      
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 
# लोकप्रिय पाक्षिक "यथावत" के 16 -31 मई, 2021 अंक में प्रकाशित

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Tuesday, June 29, 2021

वेलनेस पॉइंट : योग और आयुर्वेद से रहें निरोग

                               - मिलन  सिन्हा, मोटिवेशनल स्पीकर एवं स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट

यह सही है कि असंतुलित जीवनशैली भी बढ़ते स्ट्रेस का एक बड़ा कारण रहा है, जिसे सुधारना हमारे कंट्रोल में होता है और वह बहुत कठिन भी नहीं है. लेकिन कोविड-19 वैश्विक महामारी के लम्बे और कठिन दौर ने स्ट्रेस की स्थिति को वाकई जटिल बना दिया है. लिहाजा मानसिक तनाव से पीड़ितों की संख्या में बड़ा उछाल देखा जा रहा है. एकाधिक सर्वे इस बात को रेखांकित कर रहे हैं. हम सभी जानते हैं कि लगातार मानसिक तनाव में रहने के दुष्परिणाम बहुआयामी और कष्टकर होते हैं. हाल के महीनों में डिप्रेशन, आत्महत्या आदि के मामलों में जो वृद्धि देखी जा रही है, वह इस बात का प्रमाण है. संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भी हाल ही में कोरोना महामारी से उत्पन्न स्थिति के सन्दर्भ में कहा है कि "परिजनों को खोने का गम, नौकरी छूटने का दुःख, आइसोलेशन या अकेले रहने की दिक्कतें, आवागमन की असुविधा, आर्थिक तंगी तथा पारिवारिक रिश्तों में परेशानी, भविष्य को लेकर अनिश्चितता और भय जैसे कारणों से  बड़ी संख्या में लोग मानसिक तनाव से ग्रस्त हो रहे हैं... ...."

खैर, जहां समस्या है वहां समाधान भी होता है और निःसंदेह, हर परिस्थिति में स्ट्रेस से राहत दिलाने के लिए योग और आयुर्वेद में दसाधिक अभ्यास - उपाय  बताए गए हैं, जिन्हें अमल में लाना आसान है और जो बहुत लाभकारी भी हैं. इन पर चर्चा करने से पहले यह मुनासिब होगा कि हम संक्षेप में ही सही, मोटे तौर पर स्ट्रेस के लक्षण और दुष्परिणामों के विषय में जानते चलें.

लक्षण: यदि आपका मन आपके काम में नहीं लग रहा है, आप हर समय खुद को थका हुआ महसूस कर रहे हैं और दिमाग में हर समय कुछ ना कुछ नकारात्मक विचार चलता रहता है, आप बेवजह क्रोधित या नाराज हो रहे हैं, नशा करने लगे हैं या नींद की गोली खा रहे हैं, आप जरुरत से ज्यादा या कम सो रहे हैं या भोजन कर रहे हैं, अपेक्षाकृत बहुत ज्यादा देर तक बस यूँ ही टीवी देख रहे हैं, अपने दोस्तों तक से बात करने में कतराने लगे हैं या ऐसे ही कुछ अनबुझ कार्यों में शामिल हैं या असामान्य व्यवहार कर रहे हैं तो आप किसी-न-किसी वजह से स्ट्रेस में हैं.

दुष्परिणाम: दरअसल, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विशेषज्ञों की मानें तो लगातार तनावग्रस्त  रहने से लोगों के मेटाबोलिज्म और इम्यून सिस्टम पर बुरा असर पड़ता है. इससे आजकल कोविड संक्रमित होने का खतरा बहुत बढ़ जाता है. इतना ही नहीं, लोग एकाग्र हो कर अपना कोई भी काम - यहां तक कि खाना और सोना तक, ठीक से नहीं कर पाते हैं और परिणामस्वरूप दूसरे तनाव-जनित अनेक बीमारियों के शिकार भी होते हैं. इन बीमारियों में अनिद्रा, सिरदर्द, माइग्रेन,  डिप्रेशन से लेकर ह्रदय रोग, मधुमेह, कैंसर आदि शामिल हैं. स्वाभाविक तौर पर यह किसी भी व्यक्ति और उनके परिवार के लिए असहज और चिंताजनक स्थिति होती है. 

ऐसे तो आयुर्वेद और योग दोनों ही अपने आप में सम्पूर्ण हैं, लेकिन ये एक दूसरे के पूरक भी माने गए हैं. प्रकृति से जुड़ने-जोड़ने और सकारात्मक सोच को मजबूत करने में इनका अहम योगदान रहा है. 

योगाभ्यास के लाभ अनेक 

योग अर्थात आसन, प्राणायाम, ध्यान आदि का विज्ञान कहता है कि हम योग से जुड़कर अपने शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक क्षमताओं के बीच बेहतर संतुलन कायम कर न केवल  खुद को आज और भविष्य में भी स्ट्रेस फ्री और प्रसन्न रख सकते है, बल्कि तमाम तरह की व्याधियों से दूर रखकर ज्यादा स्वस्थ और उत्पादक भी रह सकते हैं. योग सिर्फ कुछ क्रियाओं का अभ्यास नहीं, सम्पूर्ण जीवनशैली है. जितनी सकारात्मकता, नियमितता और तन्मयता से योगाभ्यास करेंगे, उतना  ही अधिक लाभ होगा. 

योगाभ्यास हमेशा खुले और साफ-सुथरे परिवेश में करें. सारी योग क्रियाएं सामान्य गति से करें, किसी झटके से नहीं. योग कोई धार्मिक कर्म-काण्ड नहीं है. यह स्वस्थ जीवन जीने की प्राकृतिक कला है. योगाभ्यास से पूर्व शौच आदि से निवृत हो लें. खाली पेट और खुले मन से योगाभ्यास करना बेहतर. हां, किसी योग प्रशिक्षक के मार्गदर्शन में योगाभ्यास की शुरुआत उचित होता है.

यहां हम ऐसे योग क्रियाओं के विषय में चर्चा करेंगे जिनके अभ्यास से मानसिक तनाव के साथ-साथ शारीरिक थकान भी दूर होगा, आपका विचलित मन शांत रह पायेगा और नींद भी अच्छी आएगी. हमारे स्वास्थ्य को ठीक रखने में इन योग क्रियाओं से अन्य कई लाभ भी मिलेंगे. आइए, इन योग क्रियाओं के बारे में जानते हैं. 

वज्रासान : घुटनों के बल पंजों को फैला कर सीधा ऐसे बैठें कि  घुटने पास-पास एवं एड़ियां अलग-अलग रहे. हथेलियों को घुटनों पर रखें. मेरुदंड सीधा रखें. शरीर को ढीला छोड़ दें. आंख बंद कर लें. अब दीर्घ श्वास लेते और छोड़ते हुए उसे महसूस करें. इस मुद्रा में 10 मिनट और उससे ज्यादा अवधि तक अपनी सुविधा अनुसार रहने का प्रयास करें. पूरी तरह सचेत रहकर दीर्घ श्वास-प्रश्वास करते रहें.  

पश्चिमोत्तानासन : दोनों हथेलियों को जांघ पर रखते हुए पांवों को सामने फैला कर सीधा बैठ जाएं. श्वास छोड़ते हुए और सिर को धीरे-धीरे आगे की ओर झुकाते हुए हाथ की अंगुलियों से पैर के अंगूठों को पकड़ने की कोशिश करें. माथे को घुटने से स्पर्श करने दें. शुरू में जितना झुक सकते हैं, उतना ही झुकें. थोड़ी देर अंतिम स्थिति में रहें और फिर श्वास लेते हुए प्रथम अवस्था में लौटें. रोजाना कम-से-कम पांच मिनट करें. पीठ दर्द, साइटिका और उदार रोग से पीड़ित लोग इसे न करें.

भुजंगासन : पांव को सीधा करके पेट के बल लेट जाएं. माथे को जमीन से सटने दें. हथेलियों को कंधे के नीचे जमीन पर रखें. अब श्वास लेते हुए धीरे-धीरे सिर तथा कंधे को हाथों के सहारे जमीन से ऊपर उठाइए. सिर और कंधे को जितना पीछे की ओर ले जा सकें, ले जाएं. ऐसा लगे कि सांप अपना फन उठाये हुए है. श्वास छोड़ते हुए धीरे-धीरे वापस प्रथम अवस्था में लौटें. इसे कम-से-कम 5 बार दोहरायें. हर्निया, आंत संबंधी रोग से ग्रसित लोग इसे न करें.

अनुलोम-विलोम प्राणायाम : सुखासन, अर्धपद्मासन या पद्मासन में सीधा बैठ जाएं. शरीर को ढीला छोड़ दें. हाथों को घुटने पर रख लें. आँख बंद कर लें और श्वास को आते-जाते महसूस करें. अब दाहिने हाथ के प्रथम और द्वितीय अंगुलियों को ललाट के मध्य बिंदु पर रखें और तीसरी अंगुली (अनामिका) को नाक के बायीं छिद्र के पास और अंगूठे को दाहिने छिद्र के पास रखें. अब अंगूठे से दाहिने छिद्र को बंद कर बाएं छिद्र से दीर्घ श्वास लें और फिर अनामिका से बाएं छिद्र को बंद करते हुए दाहिने छिद्र से श्वास को छोड़ें. इसी भांति अब दाहिने छिद्र से श्वास लेकर बाएं से छोड़ें. यह एक आवृत्ति है. इसे कम –से-कम 10 बार करें. सावधानी यह बरतें कि इस अभ्यास को जल्दबाजी या बलपूर्वक  न  करें और  मन पूरक-रेचक पर केन्द्रित हो.

भ्रामरी प्राणायाम : किसी भी आरामदायक आसन जैसे सुखासन, अर्धपद्मासन में बैठ जाएं. मेरुदंड सीधा रखें. शरीर को ढीला छोड़ दें. आंख बंद कर लें. अब प्रथम अँगुलियों से दोनों कान बंद कर लें. दीर्घ श्वास ले और भौंरे की तरह ध्वनि करते हुए रेचक करें और मस्तिष्क में इन ध्वनि तरंगों का अनुभव करें. यह एक आवृत्ति है. इसे 5 आवृत्तियों से शुरू कर यथासाध्य रोज बढ़ाते रहें. रोजाना 10 मिनट तक करें तो बेहतर परिणाम मिलेंगे. सावधानी यह बरतें कि जल्दबाजी  न करें और श्वास क्रिया व  ध्वनि लयबद्ध हो, इसका ध्यान रखें.

शीतली प्राणायाम : ध्यान के किसी आसन यानी सुखासन, अर्धपद्मासन या पद्मासन में बैठ जाएं. अपने सिर और मेरुदंड यानी रीढ़ की हड्डी सीधी रखें और दोनों हाथ घुटने पर किसी ध्यान मुद्रा में रखें. आँख बंद कर लें और श्वास को सामान्य करते हुए आते-जाते महसूस करें. अब जीभ को मुंह से बाहर निकालकर उसे इस प्रकार मोड़ें कि जीभ की आकृति एक नलिका सी हो जाए. इस नलिका से धीरे-धीरे दीर्घ श्वास लें और फिर मुंह बंद कर लें. अब नाक से धीरे-धीरे श्वास को छोड़ें. इस अभ्यास को रोजाना कम-से-कम पांच मिनट तक करें.

शवासन : शिथिलीकरण यानी रिलैक्सेशन के इस  प्रमुख योगाभ्यास में दोनों हाथों को शरीर के बगल में रखते हुए पीठ के बल सीधा लेट जाएं. हथेलियों को ऊपर की ओर खुला रखें. पैरों को थोड़ा अलग कर लें. आखें बंद कर शरीर को बिल्कुल ढीला छोड़ दें. शरीर को शव की तरह पड़ा रहने दें. श्वास को सामान्य करते हुए आते-जाते महसूस करें. अब श्वास-प्रश्वास पर मन को केन्द्रित करते हुए उनकी गिनती शुरू कर दें. यानी श्वास को आते-जाते सजगता से अनुभव करें और गिनें भी. मन भटके तो उसे पुनः इस काम में लगाएं. कुछ मिनटों तक ऐसा करने पर तन-मन शिथिल हो जाएगा और आप बहुत रिलैक्स्ड फील करेंगे. इस अभ्यास को रोजाना कम-से-कम पांच मिनट तक करें. ऐसे आपको जब जरुरत महसूस हो इस क्रिया को करें. बस लेटने का स्थान समतल हो और आप श्वास-प्रश्वास के प्रति सचेत रहें. हां, इस योगाभ्यास को ऊपर बताये गए योगक्रियाओं के अंत में करें, जिससे मानसिक और शारीरिक रूप से रिलैक्स्ड महसूस कर सकें. अचानक तनाव या चिंताग्रस्त होने पर भी कुछ देर शवासन में लेटना सुखकर होता है. 

आयुर्वेद बहुत लाभकारी

हमारी भारतीय परंपरा और संस्कृति में आयुर्वेद को मानव शरीर को निरोगी रखने और रोग हो जाने पर उससे मुक्त करने तथा आयु बढ़ाने का चिकित्सा विज्ञान माना गया है. आयुर्वेद संतुलित जीवनशैली, पारम्परिक खानपान तथा हर्बल उपचार पर ज़ोर देता है. प्राकृतिक चिकित्सा का यह मूल आधार है. 

स्ट्रेस को अच्छी तरह मैनेज करने में आयुर्वेद की अहम भूमिका है. खासकर ऐसे वक्त वात, पित्त और कफ में संतुलन स्थापित करने में यह बहुत सहायक होता है. हल्का व ताजा खाओ, तरोताजा रहो का संदेश आयुर्वेद के सिद्धांत में निहित है. 

स्ट्रेस मैनेजमेंट की दृष्टि से सुबह-सुबह शरीर को अच्छी तरह जल और ऑक्सीजन युक्त कर लेना बेहतर है. इससे शरीर स्वच्छ होता है और रक्त संचरण बेहतर होता है. 

कहते हैं जैसा अन्न, वैसा मन. अतः आयुर्वेद में राजसिक और तामसिक आहार के बजाय सात्विक भोजन को श्रेष्ठ माना गया है. तनाव की अवस्था में सात्विक, संतुलित और पौष्टिक आहार से हमारे शरीर को प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, फैट, विटामिन, मिनिरल जैसे पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में मिल जाता है जिससे हम ज्यादा ऊर्जावान बने रहते हैं. फलतः शारीरिक व मानसिक रूप से स्वस्थ रहना आसान होता है. 

मानसिक तनाव की स्थिति में अपने आहार में विशेषकर संतरा, नींबू, आंवला, केला, दूध, अखरोट, आलमंड, वेजिटेबल सूप, हर्बल चाय आदि को शामिल करना बहुत फायदेमंद होता है. आयुर्वेद में तनाव या चिंताग्रस्त होने पर तुलसी, अश्वगंधा, ब्राह्मी, शंखपुष्पी आदि का सेवन भी काफी उपयोगी माना गया है. काढ़ा या हर्बल टी से तो लोग अनेक लाभ के भागी बनते रहे हैं.   

इन सबके समेकित प्रभाव से शरीर में फील गुड और फील हैप्पी होरमोंस का स्राव भी सुनिश्चित होता है, जिससे स्ट्रेस कम होता है और हम बेहतर महसूस करते हैं. 

 (hellomilansinha@gmail.com)      

      
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 
# लोकप्रिय पाक्षिक "यथावत" के 16 -30 जून, 2021 योग विशेषांक में प्रकाशित

#For Motivational Articles in English, pl. visit my site : www.milanksinha.com   

Friday, June 25, 2021

संवेदनशीलता और शालीनता

                       - मिलन  सिन्हा, मोटिवेशनल स्पीकर एवं  स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट 

मशीनीकरण व मार्केटिंग के मौजूदा दौर में बहुत सारे लोग जाने-अनजाने मशीन बनते जा रहे हैं और अपने व्यवहार को व्यापारिक लाभ-हानि के हिसाब से इस्तेमाल कर रहे  हैं. इस क्रम में उनकी संवेदनशीलता कम होती जा रही है. इसके बहुआयामी दुष्परिणाम भी स्वाभाविक रूप से सामने आ रहे हैं. विद्यार्थियों के लिए इस पर विचार करना बहुत जरुरी है, क्यों कि मानवीय संवेदना के बिना घर, परिवार, समाज और देश के प्रति अपनी जिम्मेवारियों को निभाना बहुत ही मुश्किल होता है. और तो और खुद उनके सर्वांगीण विकास में यह एक बड़ा अवरोध साबित होता है. हमारे प्रधानमन्त्री अपनी हर सभा में "सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास" की बात दोहराते हैं. कभी आपने सोचा है कि  इसके पीछे की भावना क्या है, लक्ष्य क्या है? भावना व लक्ष्य यह है कि मानव का न केवल मानव के प्रति बल्कि सृष्टि के हर अंग के प्रति संवेदनशीलता का भाव, जिसको चरितार्थ कर हमारा देश मानवता की नई ऊंचाइयों को छू सके और आत्मनिर्भरता की और तेजी से बढ़ सके. आइए, चर्चा को आगे बढ़ाने से पहले एक प्रेरक प्रसंग की बात करते हैं. 

कुछ समय पहले की बात है. एक महात्मा  दूर के एक गांव में प्रवचन देने जा रहे  थे. अपने गंतव्य से थोड़ा पहले रास्ते के बगल में उन्होंने एक बकरी के बच्चे यानी मेमने को कीचड़ के एक  गड्ढे में फंसा हुआ देखा. मेमना तड़पता हुआ मिमिया रहा था. आसपास कोई नहीं था. बकरी के बच्चे की हालत देखकर महात्मा से रहा नहीं गया और वे गड्ढे में जाकर उस मेमने  को गोद में लेकर बाहर आ गए. इस क्रम में उनके वस्त्र बिल्कुल गंदे हो गए. तब तक गांव के कुछ लोग आ गए थे. उन्होंने महात्मा जी को पहचाना और उस हालत में देखकर लज्जित हुए. महात्मा जी ने उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा की यह साधारण घटना है. शुक्र है कि बकरी का बच्चा बच गया. अब आपलोग पहले इस बच्चे को थोड़ा साफ़-सुथरा करके इसकी मां तक पहुँचाने की व्यवस्था करें. इसकी मां आसपास ही होगी और इसकी आवाज सुनकर शायद आती भी होगी. मुझे प्रवचन के लिए समय पर पहुंचना है. यह कहते हुए दो-तीन गांव वालों के साथ वे सभा स्थल पर उसी तरह पहुंच गए. जब आयोजकों ने उनकी हालत देखी तो कुछ समझ नहीं पाए कि आखिर महात्मा जी ऐसे कीचड़ से सने क्यों दिख रहे हैं. उनकी स्थिति को देखते हुए घटना स्थल से उनके साथ आए एक गांववाले ने लोगों को बताया कि किस तरह महात्मा जी ने एक मेमने को बचाया और सभा स्थल पर पहुँचने में देर न हो इस कारण उसी हालत में यहां आ गए. अपनी संवेदनशीलता और दयालुता की चर्चा को बीच में रोकते हुए महात्मा जी ने कहा कि यह एक सामान्य घटना है. दरअसल उस मेमने को कीचड़ में फंसा और तड़पता देख मैं समानुभूति से भर गया. मैं विचलित हो गया. सोचिये अगर मैं उस मेमने को बचाए बगैर  इस सभा में आ जाता तो क्या मैं खुद को माफ़ कर पाता और क्या सब कुछ जानने के बाद आप लोग मुझे महात्मा तो क्या एक अच्छा इंसान भी मान  पाते?   आगे अपने प्रवचन में महात्मा जी ने लोगों को बताया कि किस तरह देश के ऋषि-मुनि, संत-महात्मा व अनेकानेक महान लोगों ने अपनी संवेदनशीलता का परिचय देते हुए आम लोगों की असाधारण एवं निस्वार्थ मदद की. 

उसी तरह मानव जीवन में शालीनता का अतिशय महत्व है. शालीनता आम शिष्टाचार का अभिन्न अंग होता है. ज्ञानीजन तो कहते हैं कि शालीनता अमूल्य है और जो भी विद्यार्थी इसे अपना साथी बना लेता है, देश-विदेश हर स्थान पर उसका हर काम अपेक्षाकृत आसानी से हो जाता है. बोनस के रूप में वह सम्मान का हकदार भी बनता है. अपने आसपास नजर डालें तो आपको पता चलेगा कि आप अपने उन्हीं दोस्तों को ज्यादा पसंद करते हैं जो शालीन होते हैं अर्थात अपने व्यवहार में शिष्ट, सौम्य और विनम्र होते हैं. इसका मतलब यह नहीं कि वे दोस्त चाटुकार या कमजोर होते हैं. वे तो वाकई अंदर से शांत होते हैं और मानव व्यवहार के मामले में उन्नत. ऐसे भी किसी भी विद्यार्थी का बात-बात पर चिल्लाना, गुस्सा करना, गाली-गलौज तक करना उसके किसी परिजन, साथी या सहपाठी को कभी अच्छा नहीं लगता है. तभी तो जॉब मार्केट हो या बिज़नस वर्ल्ड या शिक्षण संस्थान, हर जगह शालीनता को बहुत अहमियत दी जाती है. दरअसल, जब आप खुद शालीन होते हैं तो आप अपने व्यवहार से अनायास ही दूसरों को भी शालीन बनने के लिए प्रेरित करते है और इस तरह दुनिया को खूबसूरत बनाने में सार्थक भूमिका अदा करते हैं. 

  (hellomilansinha@gmail.com)      

      
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 
# लोकप्रिय पाक्षिक "यथावत" के 16 -30 अप्रैल, 2021 अंक में प्रकाशित

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