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Tuesday, December 28, 2021

स्टार्टअप - संभावना ही संभावना

                             - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर एंड स्ट्रेस मैनेजमेंट  कंसलटेंट

135 करोड़ की आबादीवाले हमारे देश में युवाओं की संख्या सबसे ज्यादा है. स्वाभाविक रूप से उनके लिए शिक्षा के साथ-साथ नौकरी, रोजगार, व्यवसाय, व्यापार, उद्यमिता आदि के मायने अहम हैं. हर दृष्टि से बदलाव के स्वर्णिम दौर से गुजरते भारत में विकास की गति अपेक्षाकृत ज्यादा तेज है. युवाओं में नौकरी से स्व-रोजगार की ओर उन्मुख होने के मामले में भी यह स्पष्ट है और स्टार्टअप की बढ़ती संख्या इसका प्रमाण. गौर करनेवाली बात है कि पिछले कुछ वर्षों  में युवाओं में एंटरप्रेन्योरशिप के प्रति बढ़ते रुझान के कारण देश में स्टार्टअप इकोसिस्टम में अच्छी उन्नति देखी गई है.
अवसर, जोखिम, संभावना, नवाचार आदि के प्रति उनके सकारात्मक जज्बे के कारण यह विश्वास निरंतर मजबूत हो रहा है. टेक्नोलॉजी  का सपोर्ट भी देश में स्टार्टअप की वृद्धि को गति प्रदान कर रहा है.  इंटरनेट की सुलभता, इसका उपयोग करने वालों की संख्या में तेज वृद्धि और इंटरनेट चार्जेज में कमी ने स्टार्टअप इकोसिस्टम को मजबूती प्रदान की है. 


खुशी और गर्व की बात है कि  देश में तकनीक का समावेश और उपयोग  जितनी तेजी से बढ़ रहा है, उतनी ही तेजी से यूनिकॉर्न स्टार्टअप की संख्या में भी वृद्धि हो रही है.
यूनिकॉर्न स्टार्टअप का मतलब ऐसा स्टार्टअप है जिसका वैल्यूएशन एक अरब डॉलर तक पहुंच गया हो. 10 अरब डॉलर के वैल्यूएशन से अधिक के स्टार्टअप को डेकाकॉर्न कहा जाता है और 100 अरब डॉलर के वैल्यूएशन तक पहुंचने वाले स्टार्टअप को हेक्टोकॉर्न. वेंचर कैपिटल इंडस्ट्री में इन शब्दों का प्रयोग किया जाता है. उपभोक्ता की जरुरत, सुविधा और प्रोडक्ट की प्राइसिंग को केन्द्र में रख कर उत्तम बदलाव व नवाचार के माध्यम से हर यूनिकॉर्न, डेकाकॉर्न या हेक्टोकॉर्न ने सफलता की उच्च मंजिल को हासिल किया है. कहने की जरुरत नहीं कि देश के स्टार्टअप जैसे फ्लिपकार्ट, पेटीएम, ओला कैब या जोमैटो ने जिस तरह हमारे शॉपिंग, पेमेंट, आवागमन या खाने के सिस्टम व कल्चर को चेंज किया, उससे उनके डायनामिक बिज़नस मॉडल की पुष्टि होती है. 

 
यूनिकॉर्न क्लब में शामिल होने वाला भारत का पहला स्टार्टअप इनमोबी था जिसे 2011 में यह सम्मान हासिल हुआ था. 2011 से 2014 के बीच देश का  केवल चार स्टार्टअप ही यूनिकॉर्न क्लब में शामिल हो पाया. उसके बाद इसमें वृद्धि तेज हुई और 2020 तक यह संख्या बढ़कर 37 तक पहुंच गई. काबिलेगौर तथ्य यह है कि इंडियन स्टार्टअप्स के लिए 2021 का साल अब तक बेहतरीन और बहुत उत्साहवर्धक रहा है. इस साल यानी वर्ष 2021 के पहले दस महीने में फर्स्ट क्राई, मीशो, फार्म इजी, ग्रो, भारत पे, अपग्रेड, ब्लैक बक, ऑफ बिज़नेस, ग्रोफर्स, कारदेखो सहित अब तक भारत के 33 स्टार्टअप यूनिकॉर्न क्लब में शामिल हो चुके हैं.
अगर इसी गति से स्टार्टअप की यात्रा आगे बढ़ती रही तो ये संख्या साल के अंत तक 40 से ज्यादा हो जाएगी. 

 
ज्ञातव्य है कि स्टार्टअप इंडिया भारत सरकार की एक प्रमुख पहल है जिसकी घोषणा 15 अगस्त, 2015 को प्रधान मंत्री, नरेंद्र मोदी ने लाल किले से की थी. इसका  उद्देश्य देश में स्टार्टअप्स और नये विचारों के लिए एक मजबूत इकोसिस्टम का निर्माण करना है जिससे देश का आर्थिक विकास हो एवं बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर उत्पन्न हो सके. हाल ही में नैसकॉम के टेक्नोलॉजी एंड लीडरशिप फोरम को संबोधित करते हुए प्रधान मंत्री ने  कहा कि इस समय दुनिया भारत की तरफ अधिक भरोसे और उम्मीद से देख रही है.
कोरोना महामारी के इस दौर में  भारत के ज्ञान-विज्ञान और टेक्नोलॉजी ने न केवल खुद को साबित किया है बल्कि खुद को इवॉल्व भी किया है. ऐसे में स्टार्टअप को ऐसे इंस्टीट्यूशंस का निर्माण करना चाहिए जो ऐसे विश्व स्तरीय उत्पाद तैयार करे  जो उत्कृष्टता  के मामले में एक बेहतर मानक स्थापित कर सके.


यह सर्वमान्य तथ्य है कि तेज आर्थिक विकास और हमारी विशाल जनसंख्या देश को एक बड़ा उपभोक्ता बाजार बनाती है. स्टार्टअप के लिए यहां अपार अवसर और संभावना है. देश के युवाओं ने इसे पहचाना है और अब बड़ी संख्या में युवा इस दिशा में अग्रसर हो रहे हैं. आज जरुरत इस बात की है कि देशभर के सभी शैक्षणिक संस्थानों में शैक्षणिक व प्रशासनिक कार्य से जुड़े लोगों को स्टार्टअप कल्चर और प्रमोशन की पूरी जानकारी हो, जिससे कि वे न केवल छात्र-छात्राओं को इस दिशा में जागरूक करें, बल्कि उन्हें इस ओर अग्रसर होने को निरंतर प्रोत्साहित भी करें.   

 (hellomilansinha@gmail.com)

                  

             और भी बातें करेंगे, चलते-चलते. असीम शुभकामनाएं.            # पाक्षिक पत्रिका "यथावत" के 01-15 दिसम्बर , 2021 अंक में प्रकाशित  

#For Motivational Articles in English, pl.visit my site : www.milanksinha.com

Tuesday, November 23, 2021

ठान लें तो कुछ भी मुश्किल नहीं

                           - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर एंड स्ट्रेस मैनेजमेंट  कंसलटेंट

कोरोना महामारी से आम जन को सुरक्षा प्रदान करने के असंभव से प्रतीत होने वाले लक्ष्य को सामने रखकर सबसे बड़े टीकाकरण अभियान की शुरुआत इसी साल 16 जनवरी को हुई थी और आश्चर्यजनक रूप से सिर्फ 279 दिनों में विविधताओं और विषमताओं से भरे 135 करोड़ आबादी वाले हमारे देश ने 100 करोड़ वैक्सीन डोज लगाने का एक बड़ा मुकाम हासिल कर लिया. इस ऐतिहासिक अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को संबोधित करते हुए देशवासियों का अभिनन्दन किया और उन्हें हार्दिक बधाई दी. यहां अगर हम पीछे मुड़ कर देखें तो हमें बहुत गर्व होगा कि किन-किन अप्रत्याशित और अत्यंत चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों से एक-एक कर निबटते हुए देश ने यह अपूर्व कीर्तिमान बनाया. कहने की जरुरत नहीं कि प्रधानमन्त्री के कुशल नेतृत्व में केन्द्र सरकार ने इस बात को सिद्ध कर दिया कि मुश्किल नहीं है कुछ भी अगर ठान लीजिए. बेशक इसमें राज्य सरकारों ने भी कमोबेश अपनी-अपनी भूमिका का निर्वहन किया. क्या छात्र-छात्राएं इससे सीख लेकर अपने छात्र जीवन की चुनौतियों से सफलतापूर्वक निबट सकते हैं? अगर हां तो इसके लिए क्या-क्या करना होगा? 


यह बिल्कुल सही बात है कि जितनी बड़ी चुनौती, उतनी बड़ी तैयारी. ऐसे समय अपनी सारी ऊर्जा को एकीकृत और केन्द्रित करने की आवश्यकता होती है. चुनौती बड़ी और तैयारी  छोटी हो तो परिणाम का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है. यह भी उतना ही सही है कि चुनौती कितनी भी बड़ी हो, घबराने से उससे निबटने की पहल ही कमजोर पड़ जाती है. मनोबल ऊँचा रहे तो चुनौती का सामना करने में मजा आता है और राह आसान प्रतीत होता है. इस स्थिति में तैयारी में पूरा मन लगा रहता है. नतीजतन तैयारी बेहतर हो पाती है और परिणाम सुखद.

 
फुल प्रूफ प्लानिंग के बगैर सफलता की कामना बेमानी है. लॉक डाउन हो या अनलॉक की प्रक्रिया, हर समय केन्द्र सरकार ने फुल प्रूफ प्लानिंग से कार्य को अंजाम देने का पूरा प्रयास किया. छिटपुट दुर्घटनाएं बेशक हुई, लेकिन हर बार स्थिति को जल्दी काबू में कर लिया गया.  विद्यार्थियों को अध्ययन काल में कुछ ऐसे ही सब कुछ सुनिश्चित करना चाहिए. मसलन पढ़ाई प्लानिंग के हिसाब से चले, फिर भी अगर किसी अप्रत्याशित कारण से व्यवधान उपस्थित हो जाय तो डैमेज कण्ट्रोल की व्यवस्था अपनाई जा सके. यह भी प्लानिंग का हिस्सा होता है.  

  
व्यवहारिक कार्य योजना का स्पष्ट मतलब है कि प्लानिंग के अनुसार हम हर कार्य को अंजाम दे पाएं. इस मामले में खुद की क्षमता और योग्यता के हिसाब से कार्य योजना बनानी चाहिए. हर विद्यार्थी अपने आप में अनोखा होता है. उसके अध्ययन का तरीका, समय प्रबंधन, शारीरिक संरचना आदि दूसरे से जुदा होती है. ऐसे में देखादेखी करने की कोई जरुरत नहीं है. बस अपनी प्लानिंग के मुताबिक़ कार्य योजना बनाएं और उस पर निष्ठापूर्वक अमल करें. 

 
आंतरिक संसाधनों का समुचित उपयोग किस तरह किया जाय, यह हमें कोरोना महामारी के रोकथाम और रिकॉर्ड टाइम में स्वदेशी वैक्सीन विकसित करने के मामले में अच्छी तरह दिखाई पड़ी. कुछ इसी तरह हर विद्यार्थी अपने पास उपलब्ध संसाधन जैसे पैसे, पाठ्य पुस्तक, रहने-खाने आदि से संबंधित संसाधन का समुचित उपयोग करें. ऐसा पाया गया है कि कई विद्यार्थी हर समय संसाधन के अभाव का रोना रोते रहते हैं, जब कि उनकी जरुरत के लिए जरुरी संसाधन उनके पास पहले से ही उपलब्ध होते हैं. अच्छा करने के लिए और संसाधन चाहिए की मानसिकता से बेहतर है कि जो उपलब्ध है, पहले उसका भरपूर उपयोग सुनिश्चित करें. 

 
देखा गया है कि समावेशी सोच और समयबद्ध कार्यान्वयन से सफलता की राह आसान हो जाती है. कोरोना टीकाकरण के देशव्यापी अभियान में आरम्भ से ही इस बात पर पूरा ध्यान दिया गया है. गरीब-अमीर किसी के साथ कोई भेदभाव किए बगैर सबको नियमानुसार एक निर्धारित टाइम फ्रेम में वैक्सीन लगाने का कार्य किया गया. सभी विद्यार्थियों को अपने जीवन में इसी सोच को उतारने की बहुत जरुरत है. सिर्फ हम ही सुविधा या साधन संपन्न हों, बाकी साथी-सहपाठी नहीं, यह सोच सही नहीं है. सामजिक प्राणी होने के नाते हमें मानवता की कसौटी पर खुद को कसना जरुरी है. तभी हम सही मायने में सफल होंगे और सुखी भी.  

 (hellomilansinha@gmail.com)      

      
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं। 
# लोकप्रिय पाक्षिक "यथावत" के  16-30 नवम्बर , 2021 अंक में प्रकाशित

#For Motivational Articles in English, pl. visit my site : www.milanksinha.com   

Tuesday, July 20, 2021

स्टार्टअप की ओर कैसे बढ़ाएं कदम

                              - मिलन  सिन्हा, मोटिवेशनल स्पीकर एंड  वेलनेस कंसलटेंट

देश में इस समय शिक्षित युवाओं द्वारा व्यवसाय-व्यापार और रोजगार के क्षेत्र में स्टार्टअप के रूप में एक नई पहल साफ़ दिखाई पड़ रही है. कोरोना महामारी के दौरान रोजगार की  प्रतिकूल परिस्थिति ने इस पहल को गति प्रदान की है. जब कोई गंभीर समस्या हमारे युवाओं के सामने आती है तो देखा गया है कि वे नवाचार और रचनात्मक तरीके से सफलता के रास्ते तलाश लेते है. इसके प्रत्यक्ष अनुभव से हाल ही में मुझे गुजरने का अवसर मिला जब देश भर से प्राप्त सैकड़ों स्टार्टअप प्रोजेक्ट्स में से उत्तम दस प्रोजेक्ट्स को सेलेक्ट करनेवाले एक निर्णायक मंडल में सक्रिय रूप से जुड़ा. आईआईएम, आईआईटी, एनआईटी सहित अनेक अच्छे संस्थाओं से शिक्षित छात्र-छात्राओं ने हेल्थ केयर, ट्रेवल मैनेजमेंट, डाइट मैनेजमेंट, लैंग्वेज लर्निंग, डिजिटल हेंडीक्राफ्ट प्रमोशन व मार्केटिंग आदि अनेक विषयों से संबंधित नायाब प्रोजेक्ट्स पेश किए. इनका आकलन-विश्लेषण करने के क्रम में हमने कई बातें नोट की और टॉप टेन प्रोजेक्ट्स के प्रेजेंटेशन सेशन में हमने उन पर चर्चा भी की. बताते चलें कि स्टार्टअप इंडिया भारत सरकार की एक प्रमुख पहल है जिसकी घोषणा 15 अगस्त, 2015 को प्रधान मंत्री, नरेंद्र मोदी ने लाल किले से की थी. इसका  उद्देश्य देश में स्टार्टअप्स और नये विचारों के लिए एक मजबूत इकोसिस्टम  का निर्माण करना है जिससे देश का आर्थिक विकास हो एवं बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर उत्पन्न हो सके. 


अवसर हैं बड़े: दरअसल पिछले कुछ सालों में युवाओं  में एंटरप्रेन्योरशिप के प्रति बढ़ते रुझान के कारण देश में स्टार्टअप इकोसिस्टम में अच्छी उन्नति देखी गई है. नवाचार और जोखिम से जूझने के उनके सकारात्मक जज्बे के कारण यह विश्वास निरंतर मजबूत हो रहा है. टेक्नोलॉजी  का सपोर्ट भी देश में स्टार्टअप की वृद्धि को गति प्रदान कर रहा है.  इंटरनेट की सुलभता, इसका उपयोग करने वालों की संख्या में तेज वृद्धि और इंटरनेट चार्जेज में कमी ने स्टार्टअप इकोसिस्टम के विस्तार में एक अहम भूमिका निभाई है. वर्तमान में पचास करोड़ से ज्यादा भारतीय संपूर्ण देश में इंटरनेट सेवाओं का उपयोग कर रहे हैं. हां, समाज और सरकार का रुख भी इस मामले में उत्साहवर्धक रहा है. हाल ही में नैसकॉम के टेक्नोलॉजी एंड लीडरशिप फोरम को संबोधित करते हुए प्रधान मंत्री ने कहा कि कहा कि इस समय दुनिया भारत की तरफ अधिक भरोसे और उम्मीद से देख रही है. कोरोना महामारी के इस दौर में  भारत के ज्ञान-विज्ञान और टेक्नोलॉजी ने न केवल खुद को साबित किया है बल्कि खुद को इवॉल्व भी किया है. ऐसे में स्टार्टअप को ऐसे इंस्टीट्यूशंस का निर्माण करना चाहिए जो ऐसे विश्व स्तरीय उत्पाद तैयार करे  जो उत्कृष्टता  के मामले में एक बेहतर मानक स्थापित कर सके.


बहरहाल, देश में स्टार्टअप के क्षेत्र में कदम रखने वाले युवाओं के लिए निम्नलिखित पॉइंट्स पर ध्यान देना फायदेमंद साबित होगा. 

 
आइडिया है अहम: यहां आइडिया बहुत अहम होता है. सचमुच इनोवेटिव और क्रिएटिव आईडिया सबको आकर्षित करते है. लेकिन यह भी सच है कि आईडिया में इस आकर्षण  के साथ-साथ इसकी टेक्निकल फिजिबिलिटी यानी इसे जमीन पर उतारना संभव है या नहीं, इसकी स्पष्ट व्याख्या   होनी चाहिए. इतना ही नहीं, प्रस्तावित प्रोजेक्ट की इकनोमिक वायबिलिटी को जांचना भी जरुरी  है. कहने का साफ़ मतलब यह कि आपके प्रोजेक्ट को वास्तव में खड़ा करना न केवल तकनीकी रूप से मुमकिन हो, बल्कि वह आर्थिक दृष्टि से लाभप्रद भी हो. 


प्रोजेक्ट से आपका लगाव:  कई बार यह बात सामने आती है कि प्रोजेक्ट तो प्रथम दृष्टया ठीक है, लेकिन आपका उससे कोई लगाव नहीं है या यह आपके पैशन का हिस्सा नहीं है. प्रोजेक्ट रिपोर्ट आदि आपने किसी मिलते-जुलते सफल प्रोजेक्ट को देखकर तैयार कर लिया है या करवा लिया है. लिहाजा आपका ऐसे सेक्टर के किसी प्रोजेक्ट से वास्तविक जुडाव या उसका अनुभव नहीं है. इससे प्रोजेक्ट की निरंतरता और दीर्घकालिक सफलता संदिग्ध हो जाती है.  


प्रोजेक्ट की खूबियां व खामियां: कहते हैं जो भी प्रोजेक्ट आप स्टार्ट करना चाहते हैं उसके विषय में पूरी जानकारी - छोटी या बड़ी सब आपको होनी चाहिए. कहीं और कभी भी प्रोजेक्ट के प्रेजेंटेशन में उसकी खूबियों और खामियों को स्पष्ट रूप से लोगों को बताना आपको मार्केट में एक अच्छी पहचान दे सकता है. इसके अनेक फायदे हैं. प्रोजेक्ट को संचालित करने में जिनकी प्रमुख भूमिका हो, उनके प्रोफाइल स्ट्रांग और पारदर्शी होना भी जरुरी है, जिससे शुरुआत में इन्वेस्टर या बैंक को कन्विंस करना आसान हो जाए. ऐसे इसका बहुआयामी फायदा प्रोजेक्ट को आगे भी बराबर मिलता रहता है.  


जमीनी हकीकत से परिचित होना जरुरी: इस सम्बन्ध में प्रोजेक्ट को 3-सी यानी  कैपेसिटी, कैपिटल और करैक्टर के चिर स्थापित फार्मूला के कसौटी पर परखना लाजिमी है. कहने का अभिप्राय यह कि आपकी क्षमता क्या है, आपके पास कैपिटल जुटाने के क्या-क्या विकल्प हैं और प्रोजेक्ट को सफल बनाने के पीछे आपकी योजना और सोच क्या है? इसके साथ ही प्रोजेक्ट के सामने उपस्थित और संभावित अवसरों और जोखिमों का विस्तृत आकलन -विश्लेषण करना अनिवार्य है. अपने प्रोडक्ट या सर्विसेज के मामले में मार्केट में डिमांड-सप्लाई और प्रतिस्पर्द्धा की स्थिति से अवगत होना भी अच्छा होता है. इस क्रम में आपको मोटे तौर पर जमीनी हकीकत से परिचित होने का सुअवसर मिलता है. 

 
कानूनी पहलुओं को जानें: प्रोजेक्ट से संबंधित सभी छोटे-बड़े कानूनी पहलुओं को अच्छी तरह जानना अनिवार्य है जिससे कि प्रोजेक्ट शुरू करने से लेकर उसके सफल परिचालन तक सभी कानूनी शर्तों का कंप्लायंस समय से हो सके. जहां पेटेंट आदि करवाना जरुरी है, वहां उस प्रोसेस को फॉलो करें, अन्यथा बाद में बहुत नुकसान हो सकता है. 

 
चुनौतियों से हार न मानें: इस क्षेत्र में ज्ञात-अज्ञात कई चुनौतियां कभी भी सामने आ सकती हैं. अतः अपनी ओर से तैयारी पूरी रखें और यथासंभव प्रो-एक्टिव हो कर काम करें. चुनौतियों से न  तो घबराएं और न ही कभी उनसे हार मानें. देश-विदेश में जितने भी स्टार्टअप आज सफलता का परचम लहरा रहें हैं, कमोबेश उन सभी को इसी परिस्थिति से गुजरना पड़ा है. यहां स्वामी विवेकानंद के इस अनमोल विचार को हमेशा याद रखें कि "जब किसी दिन आपके सामने कोई समस्या ना आये, तो आप सुनिश्चित हो सकते हैं कि आप गलत मार्ग पर चल रहे हैं." इससे आपका आत्मबल स्ट्रांग बना रहेगा और अंततः आप "हार के आगे जीत है" जैसे कथन को वाकई चरितार्थ कर पायेंगे. 

 (hellomilansinha@gmail.com)


             और भी बातें करेंगे, चलते-चलते. असीम शुभकामनाएं.               # "दैनिक जागरण" के राष्ट्रीय संस्करण में 17 जुलाई, 2021 को प्रकाशित   

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Friday, June 5, 2020

आज की बात: कोरोना, निसर्ग और हाथी की हत्या

 आज की बात -5 जून, 2020                                                                 - मिलन सिन्हा


कोरोना की कहानी चैनेल और अखबार में जारी है. अब तक प्रभावित लोगों की संख्या दो लाख पार कर चुका है. लेकिन तसल्ली की बात है कि संक्रमित लोगों में से ठीक होकर घर लौटनेवालों की संख्या एक लाख से ऊपर है और यह प्रतिशत धीरे-धीरे ही सही बेहतर हो रही है. महाराष्ट्र और पड़ोसी प्रदेश गुजरात में संख्या अब भी ज्यादा है. मुंबई की स्थिति अब डराने लगी है. गवर्नेंस का मसला है. दीगर बात है कि राज्य के मुखिया को सत्ता परिचालन का अनुभव नहीं रहा है. ऊपर से यह अप्रत्याशित और अकल्पनीय संकटपूर्ण स्थिति. पर संकल्प की कमी तो नहीं होनी चाहिए. विचारणीय बात यह भी है कि एनसीपी कोटे से मराठा क्षत्रप बड़े पवार के भतीजे उप मुख्यमंत्री न तो अनुभवहीन हैं और न ही उन्हें गाइड करनेवाले उनके चाचा. वे तो सीन से लगभग गायब ही हैं. यह चिंता और खेद का विषय है. 

दो दिनों तक समुद्री तूफ़ान निसर्ग ने कोरोना की गर्मी से खबरनीसों का ध्यान बेशक मोड़ दिया था. शुक्र है कि तूफ़ान ने आशा से कम ही नुकसान किया है. बहरहाल, यह सोचनीय विषय है कि टेस्टिंग किट की उपलब्धता के बावजूद अब भी ज्यादातर प्रदेशों में जांच के लिए हासिल सैंपल 7 से 10 दिनों तक रिजल्ट की प्रतीक्षा में हैं. जिनके सैंपल लिए गए हैं, जरा उनकी मानसिक स्थिति का अनुमान लगाएं और वह भी तब जब कोरोना के विषय में चारों तरफ से न जाने कितने पुष्ट-अपुष्ट डरानेवाली बातें उनके सामने आती हैं. इसमें अविलम्ब सुधार आवश्यक है. 

विश्व पर्यावरण दिवस के इस साल के थीम "जैव विविधता" की भावना के विपरीत केरल में एक गर्भवती हाथी के अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण मौत से चारों ओर स्वाभाविक रोष और चर्चा जोरों पर है. अमानवीयता का इससे ज्यादा घृणित कृत्य और क्या हो सकता है? वन्य जीवों की तस्करी और उनकी हत्या कर उनके अंगों के व्यापार में लिप्त लोग और उन्हें प्रश्रय देनेवाले कानून के तथाकथित रखवाले कठोर दंड के अधिकारी हैं. प्रदेश सरकार और केंद्र सरकार की यह सामूहिक जिम्मेदारी है कि ऐसे लोगों के खिलाफ त्वरित कार्रवाई कर उन्हें सख्त सजा दिलवाए और आगे ऐसी घटना से मानवता शर्मसार न हो यह सुनिश्चित भी करें. यकीनन,  समाज की भी इसमें बड़ी भूमिका है.

गनीमत है कि जिन्हें हम जानवर कहते हैं वे मानव के खिलाफ ऐसे जानलेवा षडयंत्र नहीं करते. 

सबको असीम शुभकामनाएं.

 
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं। 

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Friday, September 14, 2018

आज की बात : बच्चों की शैतानी और प्राचार्य का नजरिया

                                                                                                    -मिलन सिन्हा 
आज रांची के एक बड़े स्कूल में एक कार्यक्रम के सिलसिले में जाने का मौका मिला. स्कूल के गेट पर तैनात गार्ड ने गाड़ी स्कूल के भीतर तब तक जाने नहीं दिया जब तक कि उन्हें ऊपर से अनुमति नहीं मिली. हमें पहले तो बुरा लगा कि हमें स्कूल प्रबंधन ने एक कार्यक्रम के लिए बुलाया है, फिर भी अन्दर जाने में इतनी परेशानी हो रही है. लेकिन बाद में सोचने पर गार्ड के कर्तव्यनिष्ठा की तारीफ़ किये बिना नहीं रह सका. स्कूल के हजारों बच्चों और स्कूल के शिक्षक-शिक्षिकाओं तथा अन्य कर्मियों की सुरक्षा-संरक्षा की जिम्मेदारी आखिर उन दो सुरक्षाकर्मियों पर ही तो है.

प्राचार्य के कक्ष के बाहर एक तरफ कई बच्चे मुंह झुकाए खड़े थे तो दूसरी ओर चार अभिभावक बैठे थे. सभी  प्राचार्य से मिलने की अपनी बारी के इन्तजार में थे. कार्यक्रम शुरू होने में थोड़ी ही देर थे और कार्यक्रम से पहले एक बार प्राचार्य साहब से मिलना हमारे एजेंडे में था. सो, हमें जल्द ही चैम्बर में बुलाया गया. प्राचार्य साहब तपाक से मिले. हमने कार्यक्रम की संक्षिप्त जानकारी उन्हें दी. वे खुश हुए और हमारे साथ कार्यक्रम के लिए ऑडिटोरियम के ओर चल दिए. बाहर निकलने पर उनकी नजर पहले प्रतीक्षारत अभिभावकों पर पड़ी. उनसे क्षमा  मांगते हुए उन्होंने उन लोगों से उप-प्राचार्य से मिलकर अपनी बात रखने को कहा और तुरत मोबाइल से उप-प्राचार्य से उस विषय पर बात भी की. अभिभावक संतोष का भाव लिए उप-प्राचार्य के कक्ष  की ओर चले गए.

अब बारी मुंह झुकाए खड़े बच्चों की थी. अपने प्राचार्य को देखते ही बच्चों के चहरे पर भय का भाव तैरने लगा. प्राचार्य साहब ने सबको पास बुला कर बस इतना कहा कि क्यों यह शैतानी करते हो, पढ़ाई में मन लगाओ. अगली बार ऐसी शिकायत आई तो तुम सबके अभिभावक को बुलाना पड़ेगा. ऐसा न हो, इसका ध्यान रखो.

ऑडिटोरियम की ओर चलते हुए उन्होंने हमसे कहा कि बच्चे हैं, थोड़ी बहुत शैतानी अभी नहीं करेंगे तो कब करेंगे. बड़े हो कर करेंगे तो क्या अच्छा लगेगा. हमारा काम ही है इन्हें अच्छाई की ओर ले जाना. यह सब कहते हुए प्राचार्य के चेहरे पर मंद मुस्कान तैर गई, जो हमें खुश कर गया.

सच कहते हैं अच्छे लीडर के कार्यशैली की छाप संस्था के हर कर्मी पर दिखाई पड़ती है. गार्ड की बात तो कर ही चुके हैं हम, क्यों?
  
            और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।
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Wednesday, August 22, 2018

आज की बात : मानव तस्करी और हम

                                                                                                 -मिलन सिन्हा
रांची से प्रकाशित आज के कई अखबारों में मानव तस्करी  से जुड़ी खबर है. यह बात सामने आ रही है कि झारखण्ड राज्य की 15 हजार बालिकाएं ट्रैफिकिंग की शिकार हो रहीं हैं. द ट्रैफिकिंग ऑफ़ पर्सन बिल, 2018 की चर्चा भी हो रही है. यह बिल लोकसभा में पारित हो चुका है. आशा करनी चाहिए कि राज्यसभा से भी पारित  होने के बाद इस कानून के तहत मानव तस्करी पर लगाम लगाने में प्रशासन को कुछ और आसानी होगी.

दरअसल, पिछले कई वर्षों से मानव तस्करी की घटनाएं उत्तरोत्तर बढ़ती रही है. उसमें भी चाइल्ड ट्रैफिकिंग, खासकर गर्ल्स ट्रैफिकिंग में चिंताजनक वृद्धि दर्ज हुई है. अपेक्षाकृत पिछड़े प्रदेशों में ये घटनाएं अप्रत्याशित  रूप से बढ़ी है. झारखण्ड प्रदेश इनमें शामिल है. अखबारों में यहाँ की लड़कियों जिनमें आदिवासी लड़कियों की संख्या अधिक होती है, के अन्य प्रदेशों एवं महानगरों में ले जाकर बेचने तथा कई अवांछित कार्य में ढकेलने की ख़बरें छपती रही हैं. अब तो मानव तस्करी के घृणित अपराध के पीछे के एक अन्य कारण के रूप में अंग विक्रय भी शुमार हो चुका है.

कहने की जरुरत नहीं कि समाज में व्याप्त गरीबी, बेकारी, बीमारी, अशिक्षा आदि तो जाने-अनजाने मानव तस्करी में लिप्त असामाजिक तत्वों का काम आसान कर देती है, तथापि इस बात से कौन इन्कार कर सकता है कि पुलिस प्रशासन की निष्क्रियता, अनेक मामलों में संलिप्तता और घटनाओं के प्रकाश में आने के बाद भी कार्रवाई में शिथिलता के साथ-साथ कई राजनीतिक एवं सफेदपोश लोगों को बचाने के चक्कर में मानव तस्करी की घटनाएं इस हद तक बढ़ पाई है.

विचारणीय प्रश्न यह है कि सिर्फ नए कानून बना देने मात्र से इन घटनाओं को रोकना संभव हो पायेगा? मेरे विचार से तो नहीं. इसके लिए सोशल डेवलपमेंट इंडेक्स में उत्तरोत्तर तीव्र गुणात्मक सुधार की आवश्यकता तो है ही, पुलिस प्रशासन को संवेदनशील बनाने और उनकी जिम्मेदारी तय करने की भी उतनी ही आवश्यकता है. मानव तस्करी के सभी लंबित मामलों को एक समयावधि में निपटाने के लिय न्यायपालिका को भी कोई रास्ता निकालना पड़ेगा. तस्करी के शिकार बच्चों, खासकर लड़कियों को समुचित काउंसलिंग तथा सामाजिक पुनर्वास की सुविधा सुलभ हो, ऐसी व्यवस्था सरकार एवं समाज को मिलकर करनी पड़ेगी. 
                     और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।

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Friday, July 20, 2018

आज की बात : बैंक, स्थापना दिवस और कस्टमर

                                                                                                    - मिलन सिन्हा 
जन्म दिन के तरह ही स्थापना दिवस मनाने का प्रचलन हमारे देश में भी रहा है. बाजारवाद के मौजूदा दौर में यह मार्केटिंग और विज्ञापन का एक बड़ा जरिया भी हो गया है. ऐसे ही एक स्थापना दिवस के अवसर पर आज एक बड़े बैंक के स्थानीय शाखा में आयोजित समारोह में शामिल होने का मौका मिला. बैंकों में इस बात की भी होड़ लगी रहती है कि कौन कितना  हमेशा अपने कस्टमर का ख्याल रखने का विज्ञापन दे सके और गाहे-बगाहे उसका दावा भी करते रहें. बहरहाल, इस शाखा के प्रबंधक और स्टाफ ने शाखा में अनेक नए-पुराने ग्राहकों  को इस अवसर का गवाह बनाया था. शाखा परिसर को अन्दर-बाहर से सुरुचिपूर्ण ढंग से सजाया गया था. कार्यक्रम का औपचारिक शुभारम्भ बैंक के किसी उच्च अधिकारी के कर-कमलों से सुबह 10.30 बजे होना था, पर कतिपय कारणों से विलम्ब होता रहा. शाखा प्रबंधक के लिए ग्राहकों को समझाना और उन्हें रोके रखना कठिन हो रहा था. लेकिन वे यथासाध्य पूरी शालीनता के साथ ऐसा करने में जुटे थे. खैर, उच्चाधिकारी महोदय 12 बजे पहुंचे  और जल्दी-जल्दी सब कुछ निबटा कर आधे घंटे में विदा हो गए. शायद उन्हें किसी और कार्यक्रम में जाने की जल्दी थी. इस बीच उन्होंने न तो उपस्थित ग्राहकों, जो करीब दो घंटे से उनके आने का इन्तजार कर रहे थे, से अपने लेट आने के लिए  कोई क्षमा याचना की और न ही बैंक के विकास में ग्राहकों के अहम योगदान की चर्चा -प्रशंसा ही की.  बेशक उन्होंने फोटो सेशन में अपनी अच्छी उपस्थिति दर्ज जरुर करवाई. 

शाखा के प्रबंधक के अनुरोध के मुताबिक़ ज्यादातर ग्राहक सुबह 10.15 बजे  तक शाखा में आ चुके थे. आमंत्रित लोग भी शाखा में पहुंच चुके थे. पर जैसा कि बताया गया निर्धारित कार्यक्रम 12 बजे के बाद ही शुरू हुआ. कहते हैं न कि हम दूसरों के समय का कोई मोल नहीं समझते और "चलता है" संस्कृति में विश्वास करते हैं.  खैर, सकारात्मक रूप से सोचें तो शायद अच्छा ही हुआ. इस बीच मुझे कुछ लोगों से बातचीत का अवसर जो मिल गया.

गुरुजन सही कहते हैं कि एक स्थान पर कुछ लोग बैठे हों और बातचीत का सिलसिला शुरू न हो, ऐसा नहीं हो सकता है. सो, बातचीत मौसम को ले कर शुरू हुआ. आज सुबह से छिटपुट बारिश हो रही थी. ऐसे पिछले दो-तीन दिनों से अच्छी बारिश हो रही थी रांची और आसपास के इलाकों में. हर स्थानीय अखबार में बारिश के कारण रांची के कई सड़कों पर जाम की स्थिति की खबर के साथ-साथ कई इलाकों के गली-मोहल्ले में जल-जमाव की तस्वीरें भी थी. साथ बैठे प्रसाद जी ने कहा कि रांची का नगर निगम और प्रदेश की सरकार को बारिश के पानी को संग्रहित करने पर ध्यान देना चाहिए जिससे कई सड़कों-गली-मोहल्ले में जल जमाव को रोका जा सकता है. इसका एक बड़ा फायदा यह होगा कि मच्छर के कारण फैलेनेवाले रोगों की आशंका काफी कम होगी. वर्षा के जल को संग्रहित करने से अंडरग्राउंड वाटर लेवल में सुधार होगा और तालाबों-जलाशयों में संग्रहित जल का उपयोग कई प्रकार से करना भी संभव होगा. बताते चलें कि हर साल फरवरी-मार्च से ही रांची शहर में पानी की किल्लत शुरू हो जाती है जो मानसून के आने के कुछ दिनों बाद तक गंभीर बनी रहती है.

इसी चर्चा में एक अन्य ग्राहक श्री घोष ने बारिश में स्वास्थ्य समस्या के बढ़ने की बात करके यह पूछ लिया कि रांची में ऐसे कितने और कौन से डॉक्टर हैं जो इस मौसम के सामान्य रोगों में दो-तीन दवाइयों से रोगी का उपचार करते हैं. अब तो एक साथ कई लोग इस बातचीत में शामिल हो गए और अपना-अपना अनुभव बताने लगे. एक सज्जन जो दवाई के व्यवसाय से बहुत वर्षों से जुड़े रहे थे, ने स्पष्ट रूप से कहा कि अब बहुत कम डॉक्टर ऐसे हैं जो कम दवाओं और पैथोलॉजिकल टेस्ट के रोग का उपचार करते हैं. इसका मुख्य कारण ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने की लालसा भी है. एक और व्यक्ति ने दवा कंपनी और अधिकांश डॉक्टरों के बीच उत्तरोत्तर बढ़ते मधुर संबंध और साथ ही मरीजों पर बढ़ते आर्थिक बोझ पर चर्चा शुरू की तो अन्य कई ग्राहक भी शामिल हो गए. यह चर्चा परवान चढ़ती उससे पहले ही विराम लग गया क्यों कि मुख्य अतिथि कार्यक्रम का उद्घाटन हेतु आ चुके थे. खैर, स्थापना दिवस के बहाने कई और विषयों पर मेरी स्थापित मान्यताओं को नया आयाम तो मिल ही गया. शाखा प्रबंधन और उसके ग्राहकों को धन्यवाद, बधाई एवं शुभकामनाएं.  

                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।
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Sunday, January 7, 2018

आज की बात : योगदा आश्रम

                                                                                           - मिलन सिन्हा
आज रविवार है. 2018 का पहला महिना है. ठंढ है. आसमान साफ़ और धूप अच्छी है. कहते हैं सुबह की शुरुआत अच्छी हो तो दिन अच्छा गुजरता है. जहां हम नहीं जाते हैं, उस स्थान के विषय में पढ़-सुनकर ही हम अपने विचार बनाते हैं; एक चित्र अपने मानस में बना लेते हैं - अच्छा, सामान्य या बुरा.  रांची रेलवे स्टेशन की ओर जाने-आने के  क्रम में उसके पास स्थित योगदा आश्रम के भीतर जाने का मन कई बार हुआ, लेकिन जाना आज हो सका. योगदा आश्रम के पेड़-पौधों से भरे बड़े से परिसर में नीरवता और स्वच्छता स्पष्ट रूप से दिखती है. सब कुछ जैसे पूरी तरह व्यवस्थित.
हर रविवार को योगदा आश्रम में, जिसकी स्थापना परमहंस स्वामी योगानंद ने 1917 में की थी,  सुबह 10 बजे से करीब 12 बजे तक ध्यान -प्रवचन का सत्र आयोजित होता है. इस दौरान शहर के वैसे लोग भी वहां पहुँचते है जो आश्रम से वैसे जुड़े नहीं हैं. साफ़-सुथरे एक बड़े से हॉल में यह कार्यक्रम होता है, जिसमें लगभग 1000 लोगों के बैठने की व्यवस्था है. बैठने की यह व्यवस्था दो भागों में बंटा था - एक तरफ महिलायें तो दूसरी तरफ पुरुष. हमारे वहां पहुंचने से पहले कुछ लोग आ चुके थे और शान्ति से बैठे थे - कुछ लोग नीचे सामने की ओर और कुछ कुर्सियों पर पीछे की ओर. संभवतः यह व्यवस्था इस बात को ध्यान में रख कर लागू की गयी होगी कि जिन लोगों, खासकर उम्रदराज लोगों को जमीन पर बैठने में शारीरिक परेशानी होती है, उन्हें असुविधा न हो. बहरहाल, थोड़ी देर तक लोग आते रहे और चुपचाप स्थान ग्रहण करते रहे. 
अगले कुछ मिनटों में निर्धारित कार्यक्रम प्रारंभ होने को था. एक नजर पूरे हॉल में घुमाया तो पता चला कि 60 % लोग अधेड़ और बुजुर्ग थे और बाकी उससे कम उम्र के. यानी युवाओं की संख्या भी अच्छी थी. स्वामी जी आ चुके थे. हारमोनियम और माइक आ गया. अभिवादन के आदान-प्रदान के बाद स्वामी जी ने प्रार्थना में सबको जोड़ा. फिर शुरू हुआ उनका रोचक-प्रेरक प्रवचन, जो करीब एक घंटे तक चला. इस बीच करीब आधे घंटे का मेडीटेसन (ध्यान) सत्र भी हुआ. पूरा समय कैसे बीत गया, पता ही नहीं चला. स्वामी जी ने स्वामी योगानंद के विचारों -उक्तियों को आधुनिक सन्दर्भों से जोड़ते हुए बहुत अच्छी तरह बताया-समझाया. प्रवचन के दौरान जो कुछ बातें स्वामी जी ने कही, उनमें से कुछ प्रस्तुत है यहां :
  1. हमें ख़ुशी अपने अन्दर खोजने की जरुरत है, बाहर नहीं.
  2. हमारी आत्मा हमेशा खुश रहना चाहती है
  3. जिस तरह चींटी बालू में से चीनी या मीठी चीज निकाल लेती है, उसी प्रकार हमें भी माया के बीच से खुशी निकाल लेनी  है. अन्यथा अपना जीवन बालू को उलटने-पुलटने में बीत जायेगा. 
  4. यह आप पर निर्भर है कि आप दुखी आत्मा बने रहें या खुशी आत्मा. एक बार इसे तय कर लेगें तो बहुत कुछ स्वतः होते चलेंगे.
  5. नई बातें जानने -सीखने को उत्सुक बच्चे की तरह बने रहें हमेशा. आप बूढ़े होने से बचे रहेंगे.
  6. "हम कर सकते हैं, हम जरुर करेंगे" को जितना दोहराएंगे, आपका आत्म-विश्वास और कार्यक्षमता में उतना ही इजाफा होगा.
  7. क्रोध -घृणा टिकाऊ नहीं होता, प्यार होता है. सोच कर देखिए- कर के देखिए. अच्छा लगेगा.
  8. ज्ञान के दुर्ग में स्वयं को सुरक्षित रखें. इससे अधिक और कोई सुरक्षा नहीं है. 
  9. प्रलोभन चीनी लगा जहर है जो स्वाद में रुचिकर तो जरुर लगता है, पर है वस्तुतः जानलेवा.
  10. ईश्वर ने हमें हमारे जीवन की सभी परीक्षाओं एवं कमियों पर विजय पाने के लिए आवश्यकता से अधिक शक्ति दे रखी है.
  11. बुरी आदतों का त्याग करें और अच्छी बातों को तुरत ग्रहण करें. यह आपको ख़ुशी की ओर ले जाएगा.  
कार्यक्रम ख़त्म होने पर सभी लोग कतारबद्ध हॉल के दोनों बगल के रास्ते धीरे-धीरे निकलने लगे. बाहर मुख्यद्वार पर स्वामीजी स्वयं सबको प्रसाद का छोटा पैकेट देते जा रहे थे - भीतर ज्ञान का प्रसाद और बाहर यह प्रसाद.  .... .... रांची में अगर हैं या कभी आयें तो एक बार जरुर योगदा आश्रम परिसर में जाएं और जीयें निर्मल आनंद के कुछ पल.              (hellomilansinha@gmail.com)                                                                                                
                         और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।

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Saturday, December 30, 2017

आज की बात : दुष्यन्त कुमार को याद करते हुए




आज दुष्यन्त कुमार की पुण्य तिथि है. मात्र 42 साल की छोटी-सी जिंदगी जीनेवाले वही कवि- गजलकार जिनकी ये पंक्तियां हम लोग संसद से सड़क तक समय-समय पर सुनते रहे हैं:

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए.

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए.

01 सितम्बर,1933 को उत्तर प्रदेश में बिजनौर जनपद के राजपुर नवादा गाँव में दुष्यन्त कुमार त्यागी का जन्म हुआ. इलाहाबाद विश्वविद्द्यालय में शिक्षा ग्रहण करने के बाद वे आकाशवाणी के भोपाल केन्द्र से जुड़े. दुष्यन्त कुमार के नाम से प्रसिद्ध होने से पहले अपने लेखन के शुरूआती दौर में वे दुष्यन्त कुमार परदेशी नाम से लिखा करते थे. 30 दिसम्बर,1975 को वे दुनिया से विदा हो गए, अपने परिजनों, मित्रों और लाखों-करोड़ों पाठकों-प्रशंसकों को छोड़ कर.

दुष्यन्त ने  गज़ल, कविता, गीत, काव्य नाटक आदि कई विधाओं में लिखा, किन्तु उन्हें अपने गजलों के कारण ही साहित्य में वह मुकाम मिला जो विरले कलमकारों को मिलता है. सच कहें तो दुष्यन्त की अपार लोकप्रियता और प्रसिद्धि का मुख्य सबब उनकी बेमिसाल रचनाएं रहीं. लीजिये प्रस्तुत है कुछ और पंक्तियां:

कैसे आकाश में सूराख नहीं हो सकता,
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो.

रहनुमाओं की अदाओं पे फ़िदा है दुनिया,
इस बहकती हुई दुनिया को संभालो यारो.

अपने बेहद लोकप्रिय गजल संग्रह, 'साए में धूप' के प्रस्तावना में वे लिखते हैं : "मैं स्वीकार करता हूँ कि उर्दू और हिन्दी अपने-अपने सिंहासन से उतर कर जब आम आदमी के पास आती है तो उनमें फर्क कर पाना बड़ा मुश्किल होता है. मेरी नीयत और कोशिश यह रही है कि इन दोनों भाषाओँ को ज्यादा से ज्यादा करीब ला सकूं. इसलिए ये गजलें उस भाषा में कही गई हैं, जिसे मैं बोलता हूँ." 

दुष्यन्त ने प्रशासन, राजनीति, भ्रष्टाचार, सामाजिक-आर्थिक  विसंगतियों आदि पर अपने तरीके से खुलकर लिखा. आपात काल पर उनकी प्रतिक्रिया देखिए:

मत कहो आकाश में कुहरा घना है,
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है.

भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चलनेवाले "सम्पूर्ण क्रांति" आन्दोलन के वे समर्थक थे और लोकनायक से प्रभावित भी. ये पंक्तियां जेपी के लिए ही तो लिखे गए:

एक बूढ़ा आदमी है मुल्क में या यों कहो,
इस अंधेरी  कोठरी में एक  रोशनदान है. 

निजी जीवन में दुष्यन्त सहज, सरल, स्वाभिमानी और बेहद संवेदनशील इंसान थे. उनके अभिन्न मित्रों में नामचीन संपादक एवं लेखक कमलेश्वर सहित कई बड़े रचनाकार थे. उनके लेखन के मुरीद तो असंख्य लोग रहे हैं और रहेंगे. जाने-माने कवि-शायर निदा फाजली ने उनके बारे में लिखा है, "दुष्यन्त की नजर उनके युग की नई पीढ़ी के गुस्से और नाराजगी से सजी बनी है... ..." 
तभी तो वे ऐसा लिख सकते थे:

जिन आंसुओं का सीधा तआल्लुक था पेट से,
उन आंसुओं के साथ तेरा नाम जुड़ गया. 

....मौका मिले तो दुष्यन्त को जरुर पढ़ें. मेरे तो ये पसंदीदा रचनाकार रहे हैं.
                   
                   और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।
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Sunday, December 24, 2017

आज की बात : किसी को जेल, किसी को बेल और कुछ मासूम सवाल

                                                                                             - मिलन सिन्हा 

पिछले दो-तीन दिनों से  रांची में राजनीतिक सरगर्मी बढ़ गई थी. कारण, बहुचर्चित चारा घोटाले के एक मामले में बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव एवं जगन्नाथ मिश्र सहित कुल 22 अभियुक्तों को सीबीआई कोर्ट के फैसले का इन्तजार था. किन्तु -परन्तु और ऐसा फैसला होगा तो वैसा होगा जैसे अनुमान- अपेक्षा पर गर्मागर्म बहस जारी था. 

अमूमन ऐसी राजनीतिक चर्चाओं में लोग दलगत एवं व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों से चालित होते पाए जाते हैं. ऐसे में, उसमें  तर्क, तथ्य और तारतम्य का अभाव स्वभाविक होता है. तथापि ऐसे तर्क-वितर्क में लोग समय न बिताएं, ऐसा राजनीतिक रूप से अति जागरूक हमारे समाज में कहाँ मुमकिन है ?  

ऐसे आजकल जहाँ भी 10-20 स्कार्पियो -बोलेरो- फार्चुनर गाड़ियां सड़क पर मनचाहे तरीके से खड़ी दिखे, तो समझने में कोई दिक्कत नहीं होती कि पॉलिटिकल लोग आसपास किसी कार्यक्रम के निमित्त जमा हुए हैं. ऊपर से अगर पुलिस बंदोबस्त भी हो तो पॉलिटिकल वीआईपी के शामिल होने का संदेश स्वतः मिल जाता है. 

खैर, एक संगोष्ठी में कल सुबह मुझे भी शामिल होना था. उसी सिलसिले में सुबह करीब 10.40 बजे जब रांची रेलवे स्टेशन के पास अवस्थित आयोजन स्थल 'होटल बीएनआर चाणक्य' के निकट पहुंचा तो पुलिसवाले ने गाड़ी रोक दी. कारण यह था कि लालू जी उक्त होटल के पास ही रेलवे के गेस्ट हाउस में ठहरे हुए थे और उस समय अपने सैकड़ों समर्थकों के साथ सीबीआई कोर्ट के लिए निकल रहे थे. दर्जनों बड़ी-बड़ी गाड़ियां और हजारों की संख्या में वहां मौजूद राजनीतिक लोगों को सम्हालने में अनेक पुलिस अधिकारी और जवान लगे हुए थे. फिर भी, जबतक उनके साथ चल रहे पचासों गाड़ियों का काफिला नहीं निकल गया, हमारी गाड़ी सहित अनेक गाड़ियां रुकी रही - करीब 20 मिनट तक. बहरहाल, इससे यह अनुमान लगाना कठिन नहीं था कि रांची की सड़कों पर सामन्यतः रोज जाम का दंश झेलने को अभिशप्त आम शहरी को कल रांची रेलवे स्टेशन से  सीबीआई कोर्ट तक उनके (लालू जी) काफिले के गुजरने के क्रम में क्या कुछ झेलना पड़ा होगा. कोर्ट परिसर में क्या-क्या हुआ और किसके पक्ष या विपक्ष में फैसला आया, इसका व्यापक विवरण तो टीवी चैनलों और आज के अखबार के रिपोर्ट से सबको मालूम हो चुका है, लिहाजा उस पर और कुछ कहने की यहाँ कोई जरुरत नहीं.  

बस चलते-चलते कुछ  मासूम एवं स्वभाविक सवाल :
  • राजनीतिक नेताओं के खिलाफ चलने वाले सभी क्रिमनल केसों के स्पीडी ट्रायल की औपचारिक कानूनी व्यवस्था क्यों नहीं की जाती, जब कि  इसके एकाधिक फायदे हैं - समाज और सरकार के साथ-साथ आरोपी नेताओं के लिए भी ? 
  • रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड जैसे ज्यादा भीड़-भाड़ वाले स्थानों के बिल्कुल निकट नेताओं के ठहरने और उनके हजारों समर्थकों के जमा होने से जुड़े जोखिम और संभावित उपद्रव को कम करके आंकना क्या उचित है?
  • आम जनता, बड़े नेता और उनके समर्थकों के लिए क्या यह बेहतर नहीं होता कि लालू जी जैसे  नेता को कोर्ट के नजदीक किसी स्थान पर ठहराया जाता या उनसे किसी ऐसे स्थान पर ठहरने का आग्रह प्रशासन द्वारा किया जाता ? 
  • क्या किसी भी नेता- राजनीतिक या धार्मिक,  के पक्ष में कथित समर्थकों की असीमित भीड़ को किसी भी शहर की रोजमर्रा की जिंदगी को दुष्प्रभावित करने की छूट प्रशासन को देनी चाहिए, खासकर ऐसे ही एक प्रकरण में हाल ही में चंडीगढ़-पंचकुला में हुए व्यापक उपद्रव-तोड़फोड़ के मद्देनजर ?  
  • क्या ऐसे अवसरों पर स्थानीय पुलिस प्रशासन को अपने सबसे अच्छे कर्मियों को भीड़ प्रबंधन एवं कानून - व्यवस्था सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी नहीं देनी चाहिए, जिससे वे बिना भय और पक्षपात के निष्पक्ष होकर कानून सम्मत कार्य कर सकें ?  
  • क्या मीडिया के लिए, खासकर ऐसे मामलों में स्व-निर्धारित मानदंड के तहत संतुलित एवं तथ्यपरक समाचार संप्रेषित करने की अतिरिक्त जिम्मेदारी नहीं होनी चाहिए ?
आशा है, ऐसे और कई सवाल आपके मन में भी हैं. तो साझा करें जिससे कि हम सब मिलकर उनका सही उत्तर और समाधान निकालने का प्रयास कर सकें. 

                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।

Saturday, December 23, 2017

आज की बात : ऊर्जा संवाद और हम

                                                                                                  - मिलन सिन्हा 
इधर कई दिनों से प्रसिद्ध न्यूज़ एजेंसी 'हिन्दुस्थान समाचार' द्वारा आज के दिन रांची में आयोजित होनेवाले पंडित दीनदयाल उपाध्याय 'ऊर्जा संवाद' में झारखण्ड के मुख्यमंत्री सहित भाजपा के कई बड़े नेताओं के भाग लेने की चर्चा  चल रही थी. ऊर्जा संवाद कार्यक्रम में मुझे भी शामिल होना था. कार्यक्रम स्थल में पुलिस गेट से लेकर पूरे परिसर में मुस्तैद थी. कारण स्पष्ट था. 

खैर, 'ऊर्जा संवाद' संगोष्ठी में जब मैं पहुंचा, तब तक कुर्सियां लगभग भर चुकीं थी, लेकिन मुख्यमंत्री के आगमन की प्रतीक्षा में कार्यक्रम प्रारंभ होना बाकी था. पंजीकरण की औपचारिकता के बाद हॉल में बाकी आगंतुक भी अपना-अपना स्थान ग्रहण करते जा रहे थे. एकाएक बाहर हलचल बढ़ी तो पता चला कि मुख्यमंत्री आ रहे हैं. वे आ गए तो फटाफट कार्यक्रम शुरू हो गया. 'हिन्दुस्थान समाचार' के अध्यक्ष रवीन्द्र किशोर सिन्हा के स्वागत भाषण के बाद पद्मश्री बलबीर दत्त ने विषय प्रवेश का कार्य किया और फिर झारखण्ड सरकार के विकास आयुक्त द्वारा ऊर्जा, खासकर प्रदेश में बिजली की स्थिति का संक्षिप्त ब्यौरा प्रस्तुत किया गया. झारखण्ड के मुख्यमंत्री, कोल इंडिया के अध्यक्ष, पॉवर ग्रिड के पूर्व अध्यक्ष सहित बाद के वक्ताओं ने जो बताया उससे निम्नलिखित अहम बातें सामने आई:
  1.  देश में आजादी के वक्त बिजली का कुल उत्पादन 1368 मेगा वाट था जो अभी बढ़कर 3,38,000 मेगा वाट हो गया है. 
  2.  सौर ऊर्जा ही हमारे गांवों के लिए सर्वथा उपयोगी है, जिसके लिए हमें अपना पारम्परिक नजरिया बदलना होगा.
  3.  दिसम्बर,2014 में झारखण्ड के कुल 68 लाख परिवारों में से 30 लाख परिवार को बिजली उपलब्ध नहीं थी. पिछले तीन वर्षों में इसमें बहुत सुधार हुआ है और 2018 के अंत से पहले सभी घरों तक बिजली जरुर पहुंचाई जायेगी. ऐसा झारखण्ड सरकार का दृढ़ विश्वास है और प्रधानमंत्री का निर्देश भी.
  4. प्रधानमंत्री का तो कहना यह है कि देश के हर परिवार को 2018 की समाप्ति से पूर्व विश्वसनीय (reliable) और खर्च वहन करने योग्य (affordable) बिजली मिलने लगे.
  5. ऐसे, आंकड़े बताते हैं कि देश में  प्रति व्यक्ति बिजली खपत विश्व औसत से मात्र एक तिहाई है, और चीनी औसत से भी. 
  6. वर्ल्ड रिज़र्व के मुकाबले देश में गैस रिज़र्व मात्र 0.6 %, तेल रिज़र्व 0.4 % और कोल रिज़र्व 7% है.
  7. ताजा आंकड़ों के मुताबिक़ देश में सम्प्रति 300 बिलियन टन कोल रिज़र्व है. 
  8. वर्तमान में देश में सालाना कोल उत्पादन 660  मिलियन टन होता है.
  9. अभी भी देश में कुल बिजली उत्पादन का करीब 60 % कोयले पर निर्भर है.
  10. बिजली के उत्पादन, संचरण एवं वितरण में जो तमाम तरह की  कमियां और अनियमिततायें हैं, उन पर गंभीरता से ध्यान देने की जरुरत है.
  11. हमें ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों पर ज्यादा ध्यान देने की जरुरत तो है, लेकिन साथ ही ऊर्जा के संरक्षण पर भी उतना ही ध्यान देना आवश्यक  है. 
  12.  झारखण्ड के मुख्यमंत्री के अनुसार झारखण्ड राज्य 'पॉवर हब' बनने की ओर अग्रसर है. 
आशा है, समय - समय पर ऐसे संवाद आयोजित होते रहेंगे, क्यों कि जनसंवाद से समस्या समाधान की ओर अग्रसर होने की प्रक्रिया समावेशी विकास और लोकतंत्र की मजबूती के लिए बेहद जरुरी है. आप क्या कहते हैं? 
                                                                       (hellomilansinha@gmail.com)
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।

Tuesday, December 19, 2017

आज की बात : ठण्ड में संबंधों की गर्माहट

                                                          - मिलन सिन्हा 
प्याज-लहसुन-अदरख-नींबू आदि बेचनेवाले कलीम की दुकान में आज भीड़ कम है. जाड़े का शुरूआती दौर है. सुबह हल्की बूंदा-बांदी हुई है, सो ठण्ड थोड़ी ज्यादा है. बेशक प्याज का भाव गर्म है, 60 रूपये प्रति किलोग्राम. बाएं हथेली में खैनी (देशी तम्बाकू) दबाये उसने छोटी टोकरी आगे बढ़ा दिया, प्याज चुनकर रखने के लिए. 

प्याज चुनते हुए मैंने पूछा कि आखिर इस मौसम में इतनी मेहनत करने की क्या जरुरत है?

बच्चों -परिवार के भले के लिए, उनके भविष्य के लिए - कलीम ने झट उत्तर दिया.

लेकिन वे लोग तो जल्दी ही सड़क पर आ जायेंगे, आप कितना भी कुछ कर लो - मैंने उसकी आँख में आँख  डालकर कहा.

सुबह-सुबह ऐसा क्यों बोल रहे हैं आप ? ऐसा क्यों होगा ? - कलीम ने नाराज होते हुए पूछा.

कैंसर का नाम सुना है? आज नहीं तो कल तुम कैंसर के शिकार होगे और फिर सोचो तुम्हारा क्या होगा? न कमाने लायक रहोगे और न ही तुम्हारी थोड़ी-बहुत बचत से बहुत कुछ हो पायेगा? बस इस खैनी खाने के कारण! क्यों खाते हो इस जहर को ?- मैंने एक सांस में सब कुछ कह दिया.

आदत हो गयी है, क्या करें? आप बिलकुल ठीक कहते हैं. लीजिये, आज से, अभी से इसे छोड़ता हूँ -  इतना कह कर कलीम ने खैनी को दूर फेंका. फिर मेरे लिए प्याज तौलने लगा.

इस दौरान  मैंने कैंसर के विषय में उसे और कुछ बताया. स्वास्थ्य पर खैनी- तम्बाकू आदि के विभिन्न गंभीर दुष्प्रभावों के बारे में बताया और यह भी कहा कि मैं दो-तीन दिन बाद फिर देखूंगा कि उसने खैनी खाना फिर शुरू तो नहीं कर दिया. 

न जाने मेरी बातों का क्या असर हुआ कि कलीम ने मुझसे न केवल यह वादा किया कि वह अब कभी खैनी नहीं खायेगा बल्कि हमारे सामने ही खैनी के चुनौटी ( छोटा डब्बा) को बहुत दूर फेंक दिया. 
    
सच कहूँ आपलोगों से, तब से मुझे बहुत अच्छा लग रहा है.

कलीम आप स्वस्थ रहो, बहुत उन्नति करो. तुम्हारे पूरे परिवार को मेरी हार्दिक शुभकामनाएं. और हाँ, अपने आसपास किसी को खैनी खाते देखो, तो उसे भी बताना, टोकना... ....            (hellomilansinha@gmail.com)

                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।

Tuesday, November 14, 2017

आज की बात : आलू -प्याजवाला रिश्ता

                                                                                         - मिलन सिन्हा 
आलू सभी सब्जी का साथी है. हर मौसम में मिलता है, हर जगह मिलता है. गरीब-अमीर सबका पसंदीदा है. कारण-अकारण न जाने कितने तरह के व्यंजन में आलू की उपस्थिति अहम होती है. घर में और कोई सब्जी नहीं हो तब भी आलू का भरता, भुजिया, आलू दम जैसे तुरत तैयार होने वाले व्यंजन से गृहणियां भोजन करनेवाले छोटे-बड़े सबको संतुष्ट कर पाती है. 

आलू -प्याज के चिरंतन दोस्ती से भी हम सब वाकिफ हैं. शायद ही कोई दुकान हो जहाँ दोनों चीजें साथ-साथ बिकती न हों? स्थानीय सब्जी बाजार के ऐसे ही एक दुकान में आज आलू खरीदने के क्रम में मोहन जी का गुस्सेवाला रूप देखा, हँसता हुआ चेहरा तो कई बार देखा है.  

मोहन जी बिहार के भोजपुरी इलाके महाराजगंज के मूल निवासी हैं, पर अब काफी अरसे से रांची में रहकर आलू-प्याज  आदि बेचते हैं. उनकी दुकान में साथ काम करते हैं एक बुजुर्ग व्यक्ति जो अलग-अलग साइज और क्वालिटी के आलू-प्याज  को ग्राहकों के लिए बीन-चुन कर विभिन्न खाने या बड़ी-बड़ी टोकरी में रखते हैं. मोहन जी का काम ग्राहकों को सामान  बेचना और गल्ला मैनेज करने का है. दोनों के बीच मोटे तौर पर श्रम का बंटवारा ऐसा ही है. सामान्यतः मोहन जी मृदुभाषी और हंसमुख हैं, व्यवहारकुशल भी. भोजपुरी में 'का हाल बा' कहते ही उनका चेहरा खिल जाता है. महराजगंज की चर्चा कर दें तो फिर क्या कहना! 

आज सुबह जब मैं पहुंचा तो मोहन जी उन बुजुर्ग सहकर्मी पर बिगड़ रहे थे- 'क्यों नहीं मेरी बात सुनते हैं; कितनी बार एक ही बात कहें; ऐसे दुकानदारी कैसे चलेगी.....'

बुजुर्ग व्यक्ति चुपचाप अपना काम करते रहे, लेकिन उनके चेहरे पर नाराजगी दिख रही थी. मोहन जी के बार-बार वही बात कहने पर धीरे से सिर्फ इतना कहा कि कर ही तो रहे हैं काम जैसे आप कहते हो. 

मैंने मोहन जी को शांत होने को कहा और पूछा कि यह बुजुर्ग कौन है.  वो मेरे सगे बड़े भाई सोहन हैं. इस पर मैंने जब यह कहा कि मोहन जी बचपन में बड़े भाई के डांट-फटकार का हिसाब चुकता कर रहे हो क्या,  तो मोहन हंस पड़े और सोहन भी. 

'कहा, न बाबू वो बात नहीं है. हम लोग में अब बड़ा-छोटा कोई नहीं है. अब तो हम यहाँ घर से दूर दोस्त के तरह रहते हैं. जिससे जब कोई गलती होती है, तब दूसरा उस पर थोड़ा बिगड़ जाता है. फिर तो वही दोस्ती- मस्ती.  बस समझिये तो आलू-प्याज वाला रिश्ता, और क्या?'

आलू -प्याज लेकर लौटते हुए मैं अच्छा महसूस कर रहा था, कारण तनाव प्रबंधन और रिश्तों की गर्माहट के एक छोटे सत्र का हिस्सा जो बन पाया था.
                                                                           (hellomilansinha@gmail.com)
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।