Tuesday, June 22, 2021

संवेदनशीलता और शालीनता

                                      - मिलन  सिन्हा, मोटिवेशनल स्पीकर एवं  स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट  

मशीनीकरण व मार्केटिंग के मौजूदा दौर में बहुत सारे लोग जाने-अनजाने मशीन बनते जा रहे हैं और अपने व्यवहार को व्यापारिक लाभ-हानि के हिसाब से इस्तेमाल कर रहे  हैं.
इस क्रम में उनकी संवेदनशीलता कम होती जा रही है. इसके बहुआयामी दुष्परिणाम भी स्वाभाविक रूप से सामने आ रहे हैं. विद्यार्थियों के लिए इस पर विचार करना बहुत जरुरी है, क्यों कि मानवीय संवेदना के बिना घर, परिवार, समाज और देश के प्रति अपनी जिम्मेवारियों को निभाना बहुत ही मुश्किल होता है. और तो और खुद उनके सर्वांगीण विकास में यह एक बड़ा अवरोध साबित होता है. हमारे प्रधानमन्त्री अपनी हर सभा में "सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास" की बात दोहराते हैं. कभी आपने सोचा है कि  इसके पीछे की भावना क्या है, लक्ष्य क्या है? भावना व लक्ष्य यह है कि मानव का न केवल मानव के प्रति बल्कि सृष्टि के हर अंग के प्रति संवेदनशीलता का भाव, जिसको चरितार्थ कर हमारा देश मानवता की नई ऊंचाइयों को छू सके और आत्मनिर्भरता की ओर तेजी से बढ़ सके. आइए, चर्चा को आगे बढ़ाने से पहले एक प्रेरक प्रसंग की बात करते हैं.  


कुछ समय पहले की बात है.
एक महात्मा  दूर के एक गांव में प्रवचन देने जा रहे  थे. अपने गंतव्य से थोड़ा पहले रास्ते के बगल में उन्होंने एक बकरी के बच्चे यानी मेमने को कीचड़ के एक  गड्ढे में फंसा हुआ देखा. मेमना तड़पता हुआ मिमिया रहा था. आसपास कोई नहीं था. बकरी के बच्चे की हालत देखकर महात्मा से रहा नहीं गया और वे गड्ढे में जाकर उस मेमने  को गोद में लेकर बाहर आ गए. इस क्रम में उनके वस्त्र बिल्कुल गंदे हो गए. तब तक गांव के कुछ लोग आ गए थे. उन्होंने महात्मा जी को पहचाना और उस हालत में देखकर लज्जित हुए. महात्मा जी ने उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा की यह साधारण घटना है. शुक्र है कि बकरी का बच्चा बच गया. अब आपलोग पहले इस बच्चे को थोड़ा साफ़-सुथरा करके इसकी मां तक पहुँचाने की व्यवस्था करें. इसकी मां आसपास ही होगी और इसकी आवाज सुनकर शायद आती भी होगी. मुझे प्रवचन के लिए समय पर पहुंचना है. यह कहते हुए दो-तीन गांव वालों के साथ वे सभा स्थल पर उसी तरह पहुंच गए. जब आयोजकों ने उनकी हालत देखी तो कुछ समझ नहीं पाए कि आखिर महात्मा जी ऐसे कीचड़ से सने क्यों दिख रहे हैं. उनकी स्थिति को देखते हुए घटना स्थल से उनके साथ आए एक गांववाले ने लोगों को बताया कि किस तरह महात्मा जी ने एक मेमने को बचाया और सभा स्थल पर पहुँचने में देर न हो इस कारण उसी हालत में यहां आ गए. अपनी संवेदनशीलता और दयालुता की चर्चा को बीच में रोकते हुए महात्मा जी ने कहा कि यह एक सामान्य घटना है. दरअसल उस मेमने को कीचड़ में फंसा और तड़पता देख मैं समानुभूति से भर गया. मैं विचलित हो गया. सोचिये अगर मैं उस मेमने को बचाए बगैर  इस सभा में आ जाता तो क्या मैं खुद को माफ़ कर पाता और क्या सब कुछ जानने के बाद आप लोग मुझे महात्मा तो क्या एक अच्छा इंसान भी मान  पाते?   आगे अपने प्रवचन में महात्मा जी ने लोगों को बताया कि किस तरह देश के ऋषि-मुनि, संत-महात्मा व अनेकानेक महान लोगों ने अपनी संवेदनशीलता का परिचय देते हुए आम लोगों की असाधारण एवं निस्वार्थ मदद की. 


उसी तरह मानव जीवन में शालीनता का अतिशय महत्व है.
शालीनता आम शिष्टाचार का अभिन्न अंग होता है. ज्ञानीजन तो कहते हैं कि शालीनता अमूल्य है और जो भी विद्यार्थी इसे अपना साथी बना लेता है, देश-विदेश हर स्थान पर उसका हर काम अपेक्षाकृत आसानी से हो जाता है. बोनस के रूप में वह सम्मान का हकदार भी बनता है. अपने आसपास नजर डालें तो आपको पता चलेगा कि आप अपने उन्हीं दोस्तों को ज्यादा पसंद करते हैं जो शालीन होते हैं अर्थात अपने व्यवहार में शिष्ट, सौम्य और विनम्र होते हैं. इसका मतलब यह नहीं कि वे दोस्त चाटुकार या कमजोर होते हैं. वे तो वाकई अंदर से शांत होते हैं और मानव व्यवहार के मामले में उन्नत. ऐसे भी किसी भी विद्यार्थी का बात-बात पर चिल्लाना, गुस्सा करना, गाली-गलौज तक करना उसके किसी परिजन, साथी या सहपाठी को कभी अच्छा नहीं लगता है. तभी तो जॉब मार्केट हो या बिज़नस वर्ल्ड या शिक्षण संस्थान, हर जगह शालीनता को बहुत अहमियत दी जाती है. दरअसल, जब आप खुद शालीन होते हैं तो आप अपने व्यवहार से अनायास ही दूसरों को भी शालीन बनने के लिए प्रेरित करते है और इस तरह दुनिया को खूबसूरत बनाने में सार्थक भूमिका अदा करते हैं. 

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             और भी बातें करेंगे, चलते-चलते. असीम शुभकामनाएं.               
# "हिन्दुस्थान समाचार समूह" की  पाक्षिक पत्रिका "यथावत" में प्रकाशित   

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Sunday, June 20, 2021

शारीरिक थकान के साथ-साथ मानसिक तनाव दूर करते हैं शिथिलीकरण के ये 5 आसान

                          - मिलन  सिन्हा,  स्ट्रेस मैनेजमेंट एंड वेलनेस कंसलटेंट

देश में कोरोना महामारी का प्रकोप जारी है. कोरोना संक्रमण ने शारीरिक ही नहीं, मानसिक स्वास्थ्य को भी बुरी तरह प्रभावित किया है. एक सरल और प्रभावकारी निवारण के रूप में यहां हम ऐसे योग क्रियाओं के बारे में जानेंगे, जिनके अभ्यास से शारीरिक थकान के साथ-साथ मानसिक तनाव भी दूर होगा. लोगों का विचलित मन शांत रह पायेगा और नींद भी अच्छी आयेगी. स्वयं और परिवार के स्वास्थ्य को ठीक रखने में इन योग क्रियाओं से अन्य कई लाभ भी मिलेंगे. आइए, इन योग क्रियाओं के बारे में जानते हैं.


शवासन
यह रिलैक्सेशन यानी शिथिलीकरण का प्रमुख आसन है. इसमें दोनों हाथों को शरीर के बगल में रखते हुए पीठ के बल सीधा लेट जाएं. हथेलियों को ऊपर की ओर खुला रखें. पैरों को थोड़ा अलग कर लें, जिससे उनके बीच की दूरी करीब 15 इंच रहे. आखें बंद कर शरीर को बिल्कुल ढीला छोड़ दें. शरीर को शव की तरह पड़ा रहने दें. श्वास को सामान्य करते हुए लयबद्ध होने दें और उसे आते-जाते महसूस करें. अब श्वास को भीतर जाते हुए और फिर बाहर आते हुए सजगता से अनुभव करें और गिनें भी. कुछ मिनटों तक ऐसा करने पर तन-मन शिथिल हो जायेगा और आप बहुत रिलैक्स्ड फील करेंगे. इसे रोजाना कम-से-कम पांच मिनट तक करें. बस लेटने का स्थान समतल हो और श्वास-प्रश्वास के प्रति सचेत रहें.


मकरासन
शिथिलीकरण के इस आसन में किसी समतल स्थान में पेट के बल सीधा लेट जाएं. अब कुहनियों के सहारे सिर और कंधे को उठाएं तथा हथेलियों पर ठुड्डी को टिका दें. आखें बंद कर शरीर को बिल्कुल ढीला छोड़ दें. अब श्वास-प्रश्वास पर मन को केंद्रित करते हुए उनकी गिनती शुरू कर दें. लंबी गहरी सांसें लेते हुए कुछ समय तक लगातार इस अवस्था में रहें. इस अभ्यास को भी रोजाना कम-से-कम पांच मिनट तक करें. हां, इस आसन की समयावधि जितनी ज्यादा होगी, उतना ही बेहतर फल मिलेगा. ऐसे आपको जब जरुरत महसूस हो इस क्रिया को करें.


अद्धासन
दोनों हाथों को सिर के सामने सीधा करके पेट के बल सीधा लेट जाएं. ललाट को सतह पर रखें. शरीर को पूरी तरह ढीला छोड़ दें और श्वास-प्रश्वास को दीर्घ, सहज और लयबद्ध कर लें. अब पूरी एकाग्रता से सांस को आते-जाते देखें और हो सके तो गिनती भी करें. लंबी गहरी सांसें लेते हुए जितनी देर संभव हो इस अवस्था में रहने का आनंद लें. शिथिलीकरण के इस आसन से स्लिप डिस्क सहित कई शारीरिक-मानसिक रोगों में आराम मिलता है.


मत्स्य क्रीड़ासन
बायीं ओर करवट लेकर लेट जाएं. अब ऊंगलियों को फंसा कर दोनों हथेलियों को सिरहाने ऐसे रखें कि बायीं कोहनी सिर के ऊपर की ओर रहे और दायीं कोहनी बगल में नीचे की ओर. अब दायें पैर को बगल की तरफ इस तरह मोड़ें कि दायीं कोहनी को दायीं जांघ पर रख सकें. बायें पैर को सीधा रखें. शरीर को ढीला छोड़ दें. इस अवस्था में जितनी देर संभव हो लेटे रहें. श्वास-प्रश्वास को दीर्घ, सहज और लयबद्ध करें. यही क्रिया दायीं करवट लेकर करें. यह स्थिति कीड़ारत मछली के समान है. आंतों को सक्रियता प्रदान करने और साइटिका दर्द से निदान में यह क्रिया बहुत कारगर है.


योगनिद्रा
शरीर और मन को शिथिल करने की इस सरल विधि में शवासन में लेट जाएं. शरीर को ढीला छोड़ दें और शांत मन से आंखें बंद करें. सांस सामान्य लेते रहें. मन में दोहराएं कि 'सोना नहीं है'. अब एकाग्रता से आसपास की सभी चीजों को मन की आंखों से देखना शुरू करें. कमरे के बाहर से घीरे-धीरे दरवाजा, दीवार आदि को देखते हुए भीतर आइए. कमरे के अंदर की एक-एक चीज को देखते जाइए. जहां लेटे हैं, उस स्थान को महसूस करें. 

अब अपने स्वाभाविक श्वास के प्रति सजग होकर उसके आने-जाने की ध्वनि को सुनिए. फिर एक-एक कर शरीर के सारे अंगों को मन की आंखों से देखिए. सिर से लेकर पांव तक छोटे-बड़े सभी अंगों को. पायेंगे कि आप बिलकुल शांत हो रहे हैं. इस क्रिया को करते हुए अनेक लोगों को सचमुच नींद आ जाती है, जबकि आप दोहराते हैं कि सोना नहीं है. इस क्रिया से तन-मन दोनों को अतिशय आराम मिलता है और आप अच्छा फील करते हैं.

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                   और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 
# अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के मौके पर लोकप्रिय अखबार "प्रभात खबर" के सभी संस्करणों में  प्रकाशित 

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Saturday, June 12, 2021

चिंतन-लगन-उद्यम का कमाल

                                 - मिलन  सिन्हा, मोटिवेशनल स्पीकर एवं  स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट 

आइए आज देश के एक महान सपूत के जीवन पर थोड़ी चर्चा करते हैं और इसके माध्यम से हमारे जीवन में चिंतन-लगन-उद्यम के महत्व को समझने का प्रयास भी करते हैं.
पहले उनके जीवन से संबंधित एक रोचक प्रेरक प्रसंग. 


यह घटना देश में ब्रिटिश शासन के समय की है.
एक पैसेंजर ट्रेन में कई अंग्रेज यात्रियों के साथ-साथ कुछ भारतीय भी सफ़र कर रहे थे. उनमें  साधारण वेशभूषा में एक युवक भी था जो किसी सोच-विचार में मग्न था. अंग्रेज उसका मजाक उड़ा रहे थे, पर वह उनकी बातों पर ध्यान नहीं दे रहा था. थोड़ी ही देर के बाद अचानक वह युवक उठा और उसने ट्रेन की जंजीर खींच दी. ट्रेन रुक गई. सब लोग चकित थे कि आखिर युवक ने जंजीर क्यों खींची. अंग्रेज यात्री  तो बहुत क्रोधित थे और उस युवक को डांट रहे थे. तभी ट्रेन का गार्ड आ गए और युवक से इस तरह गाड़ी रोकने का कारण जानना चाहा. युवक ने गंभीरतापूर्वक कहा कि उसका अनुमान है कि थोड़ी दूर पर आगे रेल पटरी क्षतिग्रस्त है और गंभीर ट्रेन एक्सीडेंट की आशंका है. गार्ड और अन्य रेलकर्मी जब उस युवक को लेकर रेल पटरी पर थोड़ी दूर गए तो यह देखकर अवाक रह गए कि रेल पटरी सचमुच क्षतिग्रस्त है. अगर ट्रेन को रोका नहीं जाता तो गंभीर दुर्घटना निश्चित थी जिसमें न जाने जान-माल की कितनी बड़ी क्षति होती. अंग्रेज यात्रियों के साथ-साथ जब गार्ड ने उस युवक की अदभुत समझ की तारीफ़ की और पूछा कि आखिर उसे इसका पूर्वाभास कैसे हुआ तो  युवक ने बताया कि ट्रेन की गति में अंतर आने एवं ट्रेन के चलने पर पटरी से आनेवाली ध्वनि में फर्क पर गौर करने से उसे आगे खतरे का अनुमान हो गया. गार्ड के पूछने पर उस युवक ने बताया कि वह एक इंजीनियर है और उसका नाम डॉ॰ मोक्षगुण्डम विश्वेश्वरैया है. युवक का परिचय पाते ही उनपर कटाक्ष करनेवाले अंग्रेजों को भी शर्मिंदगी महसूस हुई और उन्होंने सॉरी कहा. डॉ॰ विश्वेश्वरैया  का उत्तर था कि आप सब ने मुझे क्या कहा, मुझे तो कुछ भी मालूम नहीं. मैं तो चिंतन कर रहा था. 


एम. विश्वेश्वरैया का जन्म
तत्कालीन मैसूर राज्य के चिक्काबल्लापुर ताल्लुक के मुदेन हल्ली गांव में 15 सितंबर 1861 को हुआ था. उनके पिता संस्कृत के विद्वान् थे और माता एक धार्मिक घरेलू महिला. 12 वर्ष की अवस्था में उनके पिता का देहावसान हो गया. घर की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण उन्हें अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए जूनियर छात्रों को ट्यूशन देकर पैसे जुटाने पड़े. अपने गृह स्थान में स्कूली शिक्षा हासिल करने के बाद उन्होंने बंगलोर के सेंट्रल कॉलेज में दाखिला लिया. लगन के पक्के विश्वेश्वरैया ने एकाधिक  परेशानियों के बावजूद पढ़ाई में कभी कमी नहीं की और ग्रेजुएशन की परीक्षा में अव्वल आए. इसी कारण मैसूर सरकार की आर्थिक सहायता से उन्होंने पूना में इंजीनियरिंग की पढ़ाई उत्तम अंकों से पूरी की. इस बेहतरीन रिजल्ट के कारण उन्हें महाराष्ट्र सरकार ने सहायक इंजीनियर के पद पर नियुक्त किया.


बाद में जब वे मैसूर राज्य में सेवा दे रहे थे,
उस समय राज्य की हालत खराब थी, विशेषकर  अशिक्षा, गरीबी, बेरोजगारी, बीमारी, खेती, सिंचाई आदि के मामले में. इसे सुधारने हेतु उन्होंने राज्य सरकार को अनेक महत्वपूर्ण सुझाव दिए. उनकी देखरेख में मैसूर के कृष्ण राजसागर बांध का निर्माण हुआ जब कि उस समय देश में सीमेंट का उत्पादन नहीं होता था. उनके असाधारण  गुणों के कारण 1912 में विश्वेश्वरैया को मैसूर के महाराजा ने दीवान यानी मुख्यमंत्री  नियुक्त  किया. विश्वेश्वरैया शिक्षा की महत्ता को भलीभांति समझते थे और अशिक्षा को  लोगों की गरीबी   व कठिनाइयों का मुख्य  कारण मानते थे. अतः उन्होंने अपने सेवाकाल में मैसूर राज्य में स्कूलों  की संख्या  को दोगुने से ज्यादा बढ़ा दिया. इतना ही नहीं इसी अवधि में उन्होंने कई कृषि, इंजीनियरिंग व औद्योगिक कालेज  भी खुलवाए. पचास के दशक में बिहार के मोकामा (पटना जिला) में गंगा नदी पर राजेन्द्र सेतु निर्माण के दौरान उन्हें बुलाया गया. उस समय  उनकी उम्र करीब 92 वर्ष थी. तपती धूप थी और साइट पर पहुंचना कष्टकर था, फिर भी वे वह साइट पर गए और इंजीनियरों गाइड किया. वे बराबर कहते थे कि  कार्य जो भी हो उसे  इस ढंग से किया जाय  कि वह सबसे उत्कृष्ट हो. 1955 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया. 101 वर्ष की उम्र में उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कहा. उनके जन्मदिन को  देशभर में इंजीनियर्स डे के रूप में मनाया जाता है. सचमुच, विश्वेश्वरैया चिंतन, लगन और उद्यम के मामले में असाधारण थे. 

  (hellomilansinha@gmail.com)      

      
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 
# लोकप्रिय पाक्षिक "यथावत" के 01-15 मई, 2021 अंक में प्रकाशित

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Friday, May 28, 2021

प्रकृति, प्रवृति और प्रगति

                      - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर, स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट ... ...

छात्र-छात्राएं इन तीन शब्दों - प्रकृति, प्रवृति और प्रगति पर थोड़ा गहराई से विचार करेंगे तो  उन्हें इन शब्दों की महत्ता और आपसी जुड़ाव का पता चलेगा. उनके जीवन में इनकी कितनी अहमियत है, इसके विषय में जानकर उन्हें बहुत अच्छा लगेगा और विस्मय भी होगा. 

  
प्रकृति और हमारा रिश्ता बहुत गहरा और स्वाभाविक है. सभी विद्यार्थी जानते हैं कि
हमारा यह शरीर पंच तत्वों - आकाश, जल, वायु, अग्नि और धरती का समेकित लघु रूप है. यह कहना  गलत नहीं होगा कि हम सभी प्रकृति की  संतान हैं. यही कारण है कि मूल रूप से प्रकृति के सभी गुण हममें विद्यमान हैं. मानव जाति के निरंतर विकास के पीछे प्रकृति की बहुत अहम भूमिका है. हम सबके के लिए धरती घर का आंगन है तो आकाश  उस घर का छत,  चांद, सूरज आदि  प्रकाश और ऊर्जा के स्त्रोत हैं तो नदी, झील, सागर आदि मनुष्य को जलयुक्त रखने के माध्यम और पेड़-पौधे प्राणवायु और आहार के साधन हैं. विश्व प्रसिद्ध दार्शनिक अरस्तु का कहना है कि प्रकृति की सभी चीजों में कुछ ना कुछ अद्भुत है. आप उससे जितना जुड़ेंगे, आपको इसका उतना ही ज्ञान होगा. सभी ज्ञानीजन बराबर कहते हैं कि प्रकृति हर वक्त हमारे लिए अभिभावक, मार्गदर्शक और दोस्त का रोल अदा करती रही है. लेकिन क्या हम प्रकृति का उचित सम्मान करते हैं, उसकी अहमियत को ठीक से समझते हैं? ऐसा प्रतीत होता है कि तथाकथित आधुनिकता के प्रभाव या कतिपय अन्य कारणों से प्रकृति प्रदत्त हमारे ये गुण या तो कमजोर होते जाते हैं या हम उन्हें जाने-अजनाने अपने व्यवहार में शामिल नहीं कर पाते हैं. फलतः इसका बहुत नुकसान हम सबको उठाना पड़ता है. यकीनन, विद्यर्थियों के लिए यह बहुत ही अहम विचारणीय विषय है. 


हम सब जानते हैं कि व्यक्ति की जैसी प्रवृति होती है, वह वैसा ही काम करता है. चोर की प्रवृति दूसरे का सामान चुराने की होती है, सो वह चोरी के काम करता है. इसके विपरीत किसी साधु या अच्छे व्यक्ति को देखें तो वह अपनी अच्छी प्रवृति के अनुरूप बराबर अच्छे  व समाजोपयोगी कार्य में लगा रहता है. अल्बर्ट आइन्स्टीन कहते हैं, "प्रवृत्ति की कमजोरी चरित्र की कमजोरी बन जाती है." यह भी सौ फीसदी सच है कि व्यक्ति की प्रवृति पर प्रकृति के सानिद्ध का गहरा व सकारात्मक असर होता है. प्रकृति की प्रवृति  देने की होती है, अनुकूल और प्रतिकूल प्रतीत होनेवाले समय में भी हंसते हुए संघर्षरत रहने और  हार नहीं मानने की होती है. सब जानते हैं कि पेड़ अपना फल खुद नहीं खाता है. फल और फूल से अत्यंत संपन्न होने के बावजूद भी पेड़ की प्रवृति में न तो अहंकार का भाव रहता है और न ही दूसरों को हानि पहुंचाने का. क्या सभी छात्र-छात्राएं देने की भावना रखते हैं और वाकई उसे दैनंदिन जीवन में अमल में लाते हैं? एक बार आंख बंद कर सोचें कि पिछले एक साल में उन्होंने कितने साथियों-सहपाठियों-परिजनों-पड़ोसियों की किसी-न-किसी रूप से मदद की है. पैसे से मदद करने के अलावे भी लोगों की सहायता करने के अनेक तरीके हैं. कोरोना महामारी के  प्राइम टाइम में फिल्म अभिनेता सोनू सूद द्वारा मजदूरों और उनके परिजनों की हरसंभव सहायता करने का उदाहरण सबके सामने है. श्री राम को शिक्षा प्रदान करने के क्रम में महर्षि वशिष्ठ कहते हैं कि जो मनुष्य  प्रकृति के साथ अपनी प्रवृत्ति को जोडक़र जीवन जीता है, वही सच्चे मायने में जीवन में सफल होता है.   

   
प्रगति एक डायनामिक प्रोसेस है, एक निरंतर यात्रा. मानव जाति का इतिहास प्रगति का दस्तावेज है. हर विद्यार्थी में एकाधिक विशेषताएं होती हैं और सभी विद्यार्थी जीवन में प्रगति करना चाहते हैं. अपनी-अपनी  विशेषताओं का सदुपयोग करते हुए शारीरिक और मानसिक रूप से खुद को निरंतर बेहतर बनाने का उनका प्रयास इस बात को सिद्ध करता है. यह सही और जरुरी भी है. लेकिन प्रगति का सही अर्थ क्या है? क्या दूसरे को कुचलते हुए, उनका शोषण करते हुए, उन्हें धोखा देते हुए आगे बढ़ना क्या प्रगति का सूचक हो सकता है? कदापि नहीं.  प्रगति की सही परिभाषा तो यह है कि छात्र-छात्राएं  इस लोकतांत्रिक और समावेशी विचार के साथ आगे बढ़ने  की कोशिश करते रहें, जिसमें "सबका साथ, सबका विकास" की भावना शमिल हो? कहने का आशय यह कि प्रकृति की संरचना और उसके कार्यशैली को ठीक से समझते हुए विद्यार्थीगण  अपनी प्रवृति को सदैव मानवीय और सकारात्मक रखने का प्रयास करते रहें  तो जीवन में प्रगति पथ पर बढ़ते रहना आसान हो जाएगा और अत्यंत आनंददायक भी.  

  (hellomilansinha@gmail.com)      

      
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 
# लोकप्रिय साप्ताहिक "युगवार्ता" के 28.02.2021 अंक में प्रकाशित
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Friday, May 21, 2021

परीक्षा सीजन में कैसे रहें स्ट्रेस फ्री?

                                          - मिलन  सिन्हा, मोटिवेशनल स्पीकर एवं  स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट 

आजकल परीक्षा और स्ट्रेस में घनिष्ठ रिश्ते की झलक अनायास ही मिल जाती  है. स्कूल-कॉलेज की परीक्षाओं के साथ-साथ प्रतियोगिता परीक्षाओं का दौर प्रारंभ हो चुका है. अधिकतर छात्र-छात्राएं तनाव से गुजर रहे हैं. सब जानते हैं की तनाव शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है. ऐसे में विद्यार्थियों की तैयारी दुष्प्रभावित होना स्वाभाविक है और परिणामस्वरूप उनका रिजल्ट भी. लेकिन समस्या है तो समाधान भी है और कहते हैं न "मुश्किल  नहीं है कुछ भी अगर ठान लीजिए और अपने मन को मना लीजिए." आइए, आज पांच ऐसे आसान उपायों की चर्चा करते हैं, जिससे परीक्षा के दौर में विद्यार्थियों के लिए स्ट्रेस फ्री रहना संभव होगा.


1. तनाव का सीधा संबंध हमारी सोच से है. माइंड मैनेजमेंट से है
. खुद पर भरोसा और पॉजिटिव सोच रखेंगे तो सब कुछ पॉजिटिव दिखेगा और होगा भी. हमारा मेटाबोलिज्म और इम्यून सिस्टम भी बेहतर रहेगा. लिहाजा, कुछ भी हो जाए हमेशा पॉजिटिव नजरिया बनाए रखें. हां, स्ट्रेस  का कारण कागज़ पर लिखें और अपने  हिसाब से संभावित समाधान भी लिखें. अधिकतर मामलों में यह पाया गया है कि दिमाग से उतरकर कागज़ पर लिखते ही तनाव के कारण बहुत हल्के नजर आते हैं और समाधान भी मिल जाते हैं. सदा यह भी याद रखें कि परेशानी-समस्या सबके जीवन में आती-जाती रहती है. बस संयम और शांति से जो भी कर सकते हैं करते रहें. इससे लाभ मिलेगा. 


2. तनाव को मैनेज करने में सही रूटीन की बड़ी भूमिका होती है.
दिनभर के 24 घंटे में से रात की नींद के 7-8 घंटे अलावे स्नान-भोजन आदि के लिए उचित समय छोड़कर बाकी के समय को विषयवार नियत कर उसका पूरा सदुपयोग करें. भोजन पौष्टिक और सुपाच्य हो, इसका ध्यान रखें. सोशल मीडिया से इस समय दूर ही रहें तो बेहतर होगा. मोबाइल का उपयोग भी न्यूनतम हो तो अच्छा. हां, बहुत जरुरी हो तो बस अपने ज्ञानवर्धन और जरुरी कार्यकलाप को सुगम बनाने के लिए ही इनका उपयोग करें. इससे आपका समय बचेगा और तनाव घटेगा. दिन  की अच्छी शुरुआत और उसका समापन स्ट्रेस को कम करने में बहुत कारगर साबित होता है. इसके लिए सुबह-सुबह शरीर को अच्छी तरह जल और ऑक्सीजन युक्त कर लेना जरुरी है. इससे शरीर स्वच्छ और रक्त संचरण बेहतर होता है. उसी तरह सोने से पहले पॉजिटिव माइंडसेट में रहना अच्छी नींद के लिए जरुरी है. अच्छी नींद अपने-आप में मानसिक तनाव का बेहतरीन समाधान है. परिजनों के साथ कुछ क्वालिटी और हैप्पी टाइम बिताने से भी स्ट्रेस काफी घटता है. 


3. अतीत या भविष्य में जीने के बदले आज यानी प्रेजेंट में जीना सीखें.
अबतक क्या नहीं पढ़ पाए, इसके बजाय आज और आगे क्या पढ़ सकते हैं, इसपर ध्यान केन्द्रित करें. हाँ,  जब भी मन अतीत की बातों को सोचकर दुखी हो रहा हो या भविष्य के प्रति दुश्चिंता या आशंका हो तो तुरत मन को प्रेजेंट में लाएं और किसी पॉजिटिव एक्टिविटी में व्यस्त हो जाएं.  अभी तो बस अपने रूटीन को फॉलो करते हुए अपनी पॉजिटिव एक्टिविटी को बढ़ाना बहुत जरुरी है.


4. दोस्त या सहपाठी या कोई अन्य व्यक्ति जो कुछ कहें, बस एक बार उनकी बात शांति से सुन लें.
उनकी अच्छी बात की प्रशंसा जरुर करें. अपने फायदे का जो कुछ हो उसे ग्रहण कर लें. अन्यथा इग्नोर करें. कहने का आशय यह कि आलोचना से विचलित न हों. अतिरेक-आवेग-उत्तेजना में जवाब न दें. इससे कोई लाभ नहीं होता है. विवाद और मानसिक तनाव जरुर बढ़ता है. 


5. हर विद्यार्थी अनोखा है. क्षमता का  किसी में अभाव नहीं.
अतः न तो किसी से अपनी तुलना करें और न ही प्रतिस्पर्धा. बस दृढ़ संकल्प और स्पष्ट लक्ष्य के साथ अपने कर्मपथ पर चलते रहें. अच्छी बातें दूसरों से सीखें जरुर, पर किसी से अपनी तुलना करके मन दुखी न करें. प्रतिस्पर्धा के बजाय अनुस्पर्धा करें. कल से बेहतर आज कैसे परफॉर्म कर सकते हैं, इस पर बस महान धनुर्धर अर्जुन की तरह फोकस करते हुए अध्ययन में मन लगाएं. 


अंत में एक और बात. कभी अचानक बहुत स्ट्रेस फील  हो, तो फ़ास्ट रिलीफ के लिए स्ट्रेस वाले स्थान से अलग किसी खुले जगह पर चले जाएं; कहीं बैठ जाएं और दो मिनट तक दीर्घ श्वास लें और अपने श्वास को आते-जाते महसूस करें; फिर आंख बंद कर थोड़ा पानी धीरे-धीरे सिप करें. लेमन टी या चाकलेट मिले तो एन्जॉय करें; आराम से बैठकर 100 से शून्य तक उल्टी गिनती करें. अच्छा महसूस हो तो दुबारा करें और  अपने माता-पिता, शिक्षक-मेंटर या काउंसेलर से बात करें. 

(hellomilansinha@gmail.com)


             और भी बातें करेंगे, चलते-चलते. असीम शुभकामनाएं.               
# "हिन्दुस्थान समाचार समूह" की  पाक्षिक पत्रिका "यथावत" में प्रकाशित   

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Friday, May 14, 2021

छोटे-छोटे कदम और बड़ा मुकाम

                                    - मिलन  सिन्हा, मोटिवेशनल स्पीकर एवं  स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट 

हाल ही में अहमदाबाद क्रिकेट टेस्ट में भारत ने इंग्लैंड को दो दिनों में ही पराजित कर टेस्ट श्रृंखला में दो-एक की बढ़त बना ली. इस टेस्ट मैच में भारतीय स्पिन गेंदबाज अक्षर पटेल और रविचंद्रन अश्विन का प्रदर्शन बेहतरीन रहा. अश्विन ने तो जोफ्ररा आर्चर का विकेट लेकर टेस्ट मैच में अपना 400वां विकेट हासिल किया. इसके साथ ही वे न केवल टेस्ट क्रिकेट में 400 या उससे अधिक विकेट लेने वाले भारत के चौथे गेंदबाज बन गये, बल्कि वे सबसे तेज 400 विकेट लेने वाले दुनिया के दूसरे गेंदबाज भी बन गये हैं.
जाहिर है टेस्ट क्रिकेट में 400 विकेट लेकर इतिहास रचनेवाले अश्विन ने एक-एक विकेट लेते हुए ही इस बहुत बड़े मुकाम को हासिल किया है. 


यह सच है कि हर विद्यार्थी की इच्छा होती है कि वे जीवन में बड़ा मुकाम हासिल करें. उनके अभिभावक भी उनके लिए यही दुआ करते हैं और उनकी अच्छी परवरिश के लिए हर संभव कोशिश करते हैं. तभी तो अभिभावक गरीब हो या अमीर, सभी अपने बच्चो को अच्छी शिक्षा देने को तत्पर रहते हैं. अधिकतर छात्र-छात्राएं भी इसी भावना से स्कूल-कॉलेज-यूनिवर्सिटी में दाखिल होते हैं और अध्ययन में लगे रहते हैं. लेकिन कुछ विद्यार्थी सब कुछ बहुत जल्दी प्राप्त करना चाहते हैं.
वे संत कबीर  के इस दोहे का भावार्थ नहीं समझ पाते हैं जिसमें उन्होंने लिखा है कि धीरे-धीरे रे मन, धीरे सब कुछ होय, माली सींचें सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय. खैर, सवाल है कि क्या किसी विद्यार्थी के चाहने मात्र से बड़े मुकाम को एक छलांग में हासिल किया जा सकता है  या छोटे-छोटे लक्ष्यों को हासिल करते हुए बड़े मुकाम तक पहुंचना निश्चित होता है और अपेक्षाकृत आसान भी?  विद्यार्थियों ने स्कूल में केमिस्ट्री के क्लास में अवक्षेपण यानी प्रेसिपीटेसन के बारे में पढ़ा होगा. उदाहरण देकर समझाऊं तो पोटैशियम परमैंगनेट के रंगीन घोल में जब सलफ्युरिक एसिड को बूंद-बूंद कर डाला जाता है तो एक समय ऐसा आता है कि बस एक और  बूंद डालते ही  घोल रंगहीन हो जाता है. केमिस्ट्री में इसे प्रेसिपीटेसन पॉइंट कहा जाता है. मान लीजिए कि 24 बूंद एसिड डालने तक घोल का रंग नहीं बदलता है, लेकिन 25वें बूंद के बाद रंग बिलकुल गायब हो जाता है. यानी 25वां बूंद बड़ा अहम है. लेकिन क्या उसके पहले के 24 बूंद कम अहम थे? बिलकुल नहीं. एक-एक बूंद करते-करते ही हम 25वें बूंद तक पहुंचते हैं. हम यह भी जानते हैं कि बूंद-बूंद से घड़ा भरता है. अब अगर हम इसे जीवन में बड़े लक्ष्य को सामने रखकर नियमित रूप से किए जा रहे छोटे-छोटे प्रयास के सन्दर्भ में देखें तो बात ठीक से समझ में आएगी. विद्यार्थियों के लिए इस विषय पर चिंतन-मनन करना जरूरी है और लाभकारी भी. 


आइए, आज एक आपबीती सुनाता हूँ.
कुछ महीने पूर्व मुझे एक उम्रदराज एक्सपर्ट के साथ एक कोयला खदान के निरीक्षण में जाने का मौका मिला. कोयला खदान के बड़े अधिकारी भी हमारे साथ थे. हम सभी आम खदान कर्मी की तरह माथे पर टोपी, हाथ में टॉर्च आदि से सुसज्जित थे. कोयला खदान में टेढ़े–मेढ़े फिसलनभरे सीढ़ियों के रास्ते से सब लोग  करीब पचास फूट नीचे उतरे. इस दौरान साथ चल रहे अधिकारी एक्सपर्ट सर को उस खदान विशेष के परिचालन आदि के विषय में बताते रहे. हमारे लिए यह ज्ञानवर्द्धक एवं रोमांचक अनुभव था. सब कुछ योजनाबद्ध तरीके से हो रहा था. लौटते हुए हमारे सामने अब उन्हीं सीढ़ियों से सुरक्षित ऊपर आने की बड़ी चुनौती थी. खदान के भीतर ऑक्सीजन की कमी सामान्य बात है और नए लोगों का थोड़ी चढ़ाई के बाद दम फूलने की शिकायत स्वाभाविक बात. आधी चढ़ाई पूरी हो चुकी थी.  एक्सपर्ट सर सधे क़दमों से बढ़ रहे थे. उनके उर्जा व उत्साह को देखकर मैंने जब पूछा कि उन्हें कैसा लग रहा है, चढ़ने में कोई तकलीफ तो नहीं हो रही है, तो उनका उत्तर असाधारण रूप से प्रेरणादायी था. उन्होंने कहा, ‘मैं तो सिर्फ एक कदम आगे बढ़ा रहा हूँ. मैं कहां देख रहा हूँ कि और कितना चढ़ना है. ये कदम बढ़ते रहे तो मंजिल तो मिल ही जायेगी. जीवन में भी जरुरी तो यही  है कि हमारा लक्ष्य बड़ा हो और कदम छोटे-छोटे, जिससे कि हम अपने लक्ष्य की ओर लगातार बढ़ते रहें - जब हो सके तो थोड़े तेज गति से भी.’ यकीनन हम कुछ मिनटों में खदान से बाहर निकल आए, एक नए उत्साह और विचार-मंथन के साथ. सार-संक्षेप यह कि जीवन में बड़े-से-बड़ा मुकाम हासिल करनेवाले लोग सीढ़ियों की एक-एक पायदान चढ़ते हुए बड़ी मंजिल तक पहुंचते रहे हैं. इतिहास के पन्नों में ऐसे अनगिनत मिसालें दर्ज हैं. आप भी इस सिद्धांत पर अमल करें, बहुत लाभ होगा.

(hellomilansinha@gmail.com)


             और भी बातें करेंगे, चलते-चलते. असीम शुभकामनाएं.               
# "हिन्दुस्थान समाचार समूह" की  पाक्षिक पत्रिका "यथावत" में प्रकाशित   

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Friday, May 7, 2021

वेलनेस पॉइंट: असफलता से घबराना कैसा

                                        - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर एवं  वेलनेस कंसलटेंट 

आसपास देखने पर अक्सर यह बात ध्यान में आती है कि बचपन से ही असफलता के बाद सफलता का अनुभव प्राप्त  करते रहने के बाद भी कई युवा असफलता से बहुत घबरा जाते हैं. यकीनन यह एक रोचक और विचारणीय विषय है. शायद ही ऐसा भी कोई व्यक्ति होगा जिसने जीवन में कभी असफलता का स्वाद न चखा हो. हाँ, अगर वाकई ऐसा कोई है जिसे कभी भी असफलता नहीं मिली, तो अल्बर्ट आइंस्टीन के अनुसार उसने कोई प्रयास ही नहीं किया होगा.
बास्केटबॉल के सुपर स्टार माइकल जार्डन कहते हैं कि "हर कोई किसी ना किसी चीज में विफल होता है. मैं असफलता को स्वीकार कर सकता हूँ, लेकिन मैं प्रयास ना करना  स्वीकार नहीं कर सकता." 


दरअसल, यही सबसे अहम बात है.
विश्वविख्यात उद्योगपति व मैनेजमेंट एक्सपर्ट हेनरी फोर्ड तो कहते हैं कि "असफलता महज एक अवसर है फिर से शुरुआत करने का, इस बार और ज्यादा बुद्धिमानी से." खुद हेनरी फोर्ड का जीवन शुरूआती असफलताओं की कहानी कहता है. फिर भी  वे हर बार खुद को और व्यवस्थित और बुलंद करने का यथासाद्ध्य प्रयास करते रहे और सफलता का एक के बाद दूसरा मुकाम प्राप्त करने में सफल रहे. सिर्फ हेनरी फोर्ड ही क्यों, महज सात साल की उम्र में अपने पिता को खोने वाले और बाद में कठिन संघर्ष के पांच दशक गुजारने वाले केंटुकी फ्राइड चिकन यानी केएफसी के मालिक कर्नल सैंडर्स, गरीबी में बचपन बितानेवाले और तारघर में एक छोटी नौकरी से शुरुआत करनेवाले अमेरिका के जानेमाने व्यवसायी एवं उद्योगपति एंड्रयू कार्नेगी, एक कार मैकेनिक से हौंडा मोटर्स का मालिक बनने वाले जापान के सोइचिरो होंडा और ऐसे अनेक प्रसिद्ध लोग कई बार की असफलता के बाद सफलता का बड़ा-से बड़ा मुकाम हासिल करके अदभुत मिसाल कायम की. प्रेरणादायक तथ्य यह है कि इन सबने असफल होने के बाद भी आत्मविश्वास को कभी कम नहीं होने दिया. निर्भीक होकर पूरे मनोबल से लगातार प्रयत्न करते रहे और एक-के-बाद-एक बड़ी सफलता के हकदार बने.


काबिलेगौर बात यह भी है कि ऐसे लोग असफल होने पर दूसरों को दोष देने की कतई कोशिश नहीं करते, क्यों कि वे जानते हैं कि दोषारोपण के चक्रव्यूह में फंसने का मतलब है कीमती समय, उर्जा और मानसिक शांति को अनावश्यक रूप से बर्बाद करने के रास्ते खोल देना और स्वयं अपने इम्प्रूवमेंट के रास्ते को बंद कर देना.
इसके बजाय वे उस काम में हुई चूक का पता लगाने और उसको ध्यान में रखकर आगे बेहतर तरीके से काम करना जरूरी समझते हैं. यहां माइक्रोसॉफ्ट के सह संस्थापक बिल गेट्स के विचार भी महत्वपूर्ण हैं. उनका कहना है  कि "सफलता की खुशी मनाना अच्छा है पर उससे जरुरी है अपनी असफलता से सीख लेना." ज्ञानीजन सही कहते हैं कि असफलता से कभी घबराएं नहीं, निराश होकर रुकें नहीं, क्यों कि जैसा हिंदी फिल्म इम्तिहान के एक गाने के बोल हैं, "रुक जाना नहीं, तू कहीं हार के, काँटों पे चलकर मिलेंगे साए बहार के." तो जरुरत बस इस बात की है कि हम इस जीवन दर्शन को अच्छी तरह आत्मसात कर सत्कर्म में सतत जुटे रहें और जीवन को हर पल एन्जॉय करते रहें. बड़ी-से-बड़ी सफलता भी जरुर मिलेगी. 

(hellomilansinha@gmail.com)


             और भी बातें करेंगे, चलते-चलते. असीम शुभकामनाएं.               
# "दैनिक जागरण" में प्रकाशित   
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