Monday, October 26, 2020

आजादी का सही मतलब

                                - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर, स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट ... ...

सभी देशवासी आजादी की 73वीं वर्षगांठ मना रहे हैं.  युवाबहुल हमारे देश में यह एक ख़ास अवसर होता है, जब आजादी के सही मतलब और उसकी सार्थकता पर विचार-विमर्श का दौर भी चल पड़ता है. ऐसे देश के कुछ कॉलेज - यूनिवर्सिटी में यह सालोंभर बहस का बड़ा विषय होता है. वहां के अनेक विद्यार्थी इस बहस में अपना बड़ा समय व्यतीत करते हैं, फिर भी आजादी के सही अर्थ को समझने में सफल नहीं हो पाते हैं. उनमें से कई विद्यार्थी तो स्वार्थी तत्वों द्वारा निर्मित अंतहीन वाद-विवाद के चक्रव्यूह में भी फंस जाते हैं. जीवन के प्राइम टाइम को वे जाने-अनजाने यूँ ही गंवा देते हैं, जिसका नुकसान उनके साथ-साथ उनके परिवार-समाज को भी उठाना पड़ता है.
ब्रिटिश इतिहासकार, समाज सुधारक और उपन्यासकार चार्ल्स किंग्सले कहते हैं कि "संसार में बस दो तरीके की आजादी है – एक झूठी जिसमें व्यक्ति वह करने के लिए स्वतंत्र है, जो वह चाहता है और दूसरी सच्ची जिसमें व्यक्ति वह करने के लिए स्वतंत्र है, जो उसे करना चाहिए." चाहने और  चाहिए के बीच के महत्वपूर्ण अंतर को समझना सभी विद्यार्थियों के लिए निहायत जरुरी है.  


दरअसल, छात्र जीवन हर विद्यार्थी को यह जानने-समझने का स्वर्णिम अवसर देता है कि आजादी का सही मतलब क्या है.
ज्ञानीजन कहते हैं कि अज्ञानता, रूढ़िवादिता, गुलामी, अन्याय, आडम्बर आदि से निकलने के फायदों को जानना और उससे आजाद होने के उपाय तलाशने में दक्ष होना सभी छात्र-छात्राओं के लिए शिक्षित होने के साथ-साथ आजाद होने का वास्तविक प्रमाणपत्र है. स्वामी विवेकानंद सहित कई महान लोगों ने स्पष्ट रूप से यह बात कही है कि सिर्फ कुछ  डिग्रियां  प्राप्त  करने, अच्छा कपड़ा पहनने  या अच्छा भाषण देने से ही किसी को शिक्षित नहीं कहा जा सकता. वास्तव में शिक्षा विद्यार्थियों को जीवन संग्राम में समर्थ बनाती है, उनमें चारित्रिक शक्ति और परहित की भावना विकसित करती है. मतलब, जो कुछ बुरा है उससे आजादी. 


व्यक्ति की आजादी का सबसे सरल अर्थ लोग यह लगाते हैं कि वह जो करना चाहते हैं, उसे कर सकें. विद्यार्थियों को फोकस में रखकर बात करें तो इसमें मुख्यतः  पढ़ने-लिखने, खेलने-कूदने, घूमने-फिरने, खाने-पीने, बोलने-सुनने की आजादी जैसी बातें शामिल है. ख़ुशी की बात है कि भारत के संविधान के अनुसार चलनेवाले हमारे लोकतंत्र में छात्र-छात्राओं को यह आजादी  उपलब्ध है. लेकिन क्या आजादी के नाम पर  कई विद्यार्थियों का कई प्रकार के अवांछित और गैर-कानूनी कार्यों में लिप्त रहने को सही माना जा सकता है?  बहरहाल, आजादी के पक्षधर सभी विद्यार्थियों के लिए इस समय सबसे जरुरी है ज्ञान अर्जन करना, अपनी समझदारी विकसित करना और अपनी शारीरिक-मानसिक कमजोरी से आजाद होना. हां, इसके लिए उन्हें
नोबेल पुरस्कार विजेता प्रसिद्ध फ्रेंच लेखक और दार्शनिक अल्बर्ट कामू के इस बात को हमेशा याद रखना पड़ेगा कि "आजादी और कुछ नहीं, बस बेहतर होने का एक अवसर है." कहने का तात्पर्य यह कि हर विद्यार्थी आजादी को एक ऐसे औजार के रूप में उपयोग करे जिससे कि वे अज्ञानता, बुराई और कमजोरी के अंधकार से निकलकर प्रकाशवान व्यक्तित्व का मालिक बन सके. इसके लिए उन्हें संकल्प से सिद्धि के मार्ग पर चलते रहना पड़ेगा; हर मौके का भरपूर उपयोग करना पड़ेगा; एक-एक पल का सदुपयोग सुनिश्चित करना पड़ेगा और  बातों का बादशाह बनने के बजाय कर्मयोगी बनना पड़ेगा. इसके अनेकानेक लाभ हैं. 


देश की स्वतंत्रता के सात दशक गुजर जाने और विकास पथ पर आगे बढ़ते रहने के बावजूद हमारा  देश अब भी रोटी, कपड़ा और मकान के सबसे बुनियादी आवश्यकताओं से आजाद नहीं हो पाया है. शिक्षा, स्वास्थ्य और बेरोजगारी जैसे अन्य बुनियादी मसले भी सामने हैं. समाज की इन समस्याओं का हल निकालने में शिक्षित युवाओं के आगे आकर सार्थक प्रयास करने की अपेक्षा उनके घरवालों के साथ-साथ समाज और सरकार को भी है.
देश की सीमाओं पर भी तनाव है. बाढ़ जैसी आपदा के साथ-साथ कोरोना महामारी से निबटना भी कम बड़ी चुनौती नहीं है. ऐसे अनेक तात्कालिक और दीर्घकालिक समस्याओं से खुद को, समाज को और देश को आजाद करने का सतत प्रयास करना ही आजादी को सार्थक करना है. दक्षिण अफ्रीका के महान स्वतंत्रता सेनानी और नोबेल पुरस्कार विजेता भारत रत्न नेल्सन मंडेला इसे इन शब्दों में व्यक्त करते है : "आजाद  होना सिर्फ अपनी जंजीरों को उतार देना नहीं होता, बल्कि इस तरह से जीवन जीना होता है कि दूसरों के  सम्मान और स्वतंत्रता में वृद्धि हो."

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                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं। 
# लोकप्रिय साप्ताहिक "युगवार्ता" के 30.08.2020 अंक में प्रकाशित
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Tuesday, October 20, 2020

सोचने और करने में रहे संतुलन

                          - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर, स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट ... ...

बचपन से लेकर बुढ़ापे तक सोचने का सिलसिला चलता रहता है. दिनभर में हजारों बातें हर विद्यार्थी के दिमाग में आती हैं और अधिकांश बाहर निकल भी जाती है. हां, छात्र जीवन में  अध्ययन, कोर्स, रिजल्ट, खेलकूद, खानपान, साथी, घर-परिवार, मनोरंजन जैसी कुछ बातों पर सभी प्रायः रोज सोचते है. यह सामान्य बात है. सोचना मानव स्वभाव है. दिलचस्प बात है कि सोचने और करने के बीच गहरा रिश्ता होता है जो हमारे कार्यकलाप और उसके परिणाम में साफ़ परिलक्षित होता है. इसके असंख्य उदाहरण हमारे आसपास अनायास ही मिल जायेंगे.
स्वामी विवेकानंद कहते हैं कि "हम वो हैं जो हमें हमारी सोच ने बनाया है, इसलिए इस बात का ध्यान रखो  कि तुम  क्या सोचते हो. जो तुम सोचते हो वो हो जाओगे. यदि तुम खुद को कमजोर सोचते हो, तुम कमजोर हो जाओगे, अगर खुद को ताकतवर सोचते हो, तुम ताकतवर हो जाओगे." 


दरअसल, सोचना और करना दोनों बहुत अहम है. इस  मामले में विद्यार्थियों को मोटे तौर पर तीन केटेगरी में रखकर इस चर्चा को आगे बढ़ाना बेहतर होगा. पहले केटेगरी  में वे विद्यार्थी आते हैं जो सोचने में बहुत समय गुजारते हैं. उनके रूटीन में सोचना और सोचते रहना एक बड़ा काम होता है. मसलन अगर केमिस्ट्री की एक किताब खरीदनी है जो उनके लिए बिलकुल जरुरी है, तो अब किस राइटर की या किस पब्लिकेशन की किताब कहां से खरीदें,  ऑनलाइन या ऑफलाइन खरीदें, ऑफलाइन खरीदना हो तो उसके लिए कब और कहां जाएं, ऑनलाइन हो तो कैसे मंगवाएं आदि न जाने कितनी बातों पर सोचते हैं और कन्फ्यूज्ड होकर उस विषय को  वहीँ  छोड़कर फिर किसी दूसरे विषय पर सोचने लगते हैं. सोचने का यह क्रम कई बार कई दिनों तक चलता है, फिर भी वह फैसला नहीं कर पाते हैं. इस श्रेणी के विद्यार्थी ईगो या हीन भावना के कारण दूसरे से सलाह नहीं लेते हैं या अगर किसी कारणवश सलाह लेने के लिए जाते हैं तो इस क्रम में साथी-सहपाठी को भी अपनी सलाह और सोच से परेशान और कंफ्यूज कर देते हैं.
दरअसल, ऐसे विद्यार्थी सोचने में अपना ज्यादातर समय व्यय कर देते हैं. लिहाजा, जो काम करना है उसे नहीं कर पाते हैं. ज्ञानीजन सही कहते हैं कि जब सोच को कार्यान्वित नहीं करेंगे तो परिणाम शून्य ही होगा. 


दूसरे केटेगरी में वैसे विद्यार्थी हैं जो किसी भी विषय में खुद बहुत कम सोचते हैं. वे या तो बिना ज्यादा सोचे कोई भी फैसला कर लेते हैं या किसी दूसरे की सलाह को आंख बंद कर अपना लेते हैं. माना जाता है कि ऐसे विद्यार्थी हड़बड़ी में रहते हैं और किसी भी तरह अपना काम निबटाने की कोशिश करते हैं. काम के क्वालिटी से उंनका खास लेना-देना नहीं रहता. वे केमिस्ट्री की वही किताब जो पहले श्रेणी के विद्यार्थी सोच-सोच कर भी नहीं खरीद पाए, उसे  एक दिन में कहीं से भी किसी भी मूल्य में खरीद कर ले आते हैं. वह किताब उनके लिए वाकई उपयुक्त और उपयोगी है या नहीं, इसके विषय में भी वे  नहीं सोचते. नतीजतन, उसे एक-दो घंटे उलट-पुलट कर रख देते हैं और फिर हड़बड़ी में किसी दूसरे विषय पर जम्प कर जाते हैं.
सोचने और करने में  कुछ सही नहीं होता है. हां, धीरे-धीरे  सब कुछ  इसी तरह जैसे-तैसे निबटाने की उनकी एक आदत जरुर बन जाती है. परिणामस्वरूप, बराबर औसत या बुरे परिणाम के भागी बनते हैं.  


तीसरे केटेगरी के विद्यार्थी वे होते हैं जो हर विषय पर यथाबुद्धि सोच-विचार करते हैं. जरुरी होने पर अपने अभिभावक, शिक्षक या किसी जानकार व्यक्ति से सलाह लेते हैं या परामर्श करते हैं. इस प्रक्रिया में वे अनावश्यक समय नहीं लगाते. निर्णय  वे खुद ही लेते हैं और उसकी जिम्मेदारी  भी. निर्णय हो जाने पर उसे फिर  बढ़िया से कार्यान्वित करते हैं.
वे स्वामी विवेकानंद के ऊपर बताए गए विचार को मानते हुए उनकी इस बात को भी गंभीरता से अमल में लाने की कोशिश करते हैं कि "एक समय में एक काम करो, और ऐसा करते समय अपनी पूरी आत्मा उसमें डाल दो और बाकी सब कुछ भूल जाओ." कहने का अर्थ यह कि वे अच्छा सोचने और अच्छा करने पर पूरा फोकस करते हैं. किताब खरीदने को ही यदि  उदाहरण के रूप में लें तो इस श्रेणी के विद्यार्थी अच्छी तरह सोचकर सबसे उपयुक्त किताब, सबसे वाजिब मूल्य पर जहां से भी सबसे जल्दी प्राप्त हो सके, इसका पता लगाकर उसे हासिल करते हैं. फिर उस विषय की अपनी पढ़ाई पर ध्यान केन्द्रित करने का काम करते हैं. निसंदेह, ऐसे सभी विद्यार्थी सोचने और करने में बेहतर संतुलन बनाकर चलते हैं और जीवन में बराबर अच्छे परिणाम हासिल करते हैं. शिक्षा का मूल उद्देश्य भी तो यही है. 

  (hellomilansinha@gmail.com) 


            और भी बातें करेंगे, चलते-चलते. असीम शुभकामनाएं.               
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Thursday, October 15, 2020

गहरे हैं नींद और इम्युनिटी के रिश्ते

                                       - मिलन  सिन्हा, स्ट्रेस मैनेजमेंट एंड वेलनेस कंसलटेंट ... ...

कोविड महामारी के मौजूदा दौर में अपने इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाए रखना कितना आवश्यक है, यह सब हम लोग जानते हैं. अपर्याप्त नींद या अनिद्रा के कारण हम शारीरिक थकान और मानसिक तनाव से ग्रस्त होते हैं. इसका बुरा असर हमारे मेटाबोलिज्म पर पड़ता है और धीरे-धीरे हमारा इम्यून सिस्टम कमजोर होने लगता है. इसका दुष्प्रभाव बहुआयामी है. 


नींद और इम्युनिटी के रिश्ते काफी गहरे हैं, जिन्हें जानना-समझना दिलचस्प है और ज्ञानवर्धक भी. तो आइए जानते हैं. हां, नींद का मतलब अच्छी नींद.


1) नींद के कारण हमारे शरीर में
व्हाइट ब्लड सेल्स (डब्लू बी सी)  नामक शरीर की प्रतिरक्षा सेना मजबूत होती है. यह डब्लू बी सी का रीजेनरेशन टाइम होता है. कहने का अर्थ यह कि इससे हमारा इम्यून सिस्टम स्ट्रांग होता है और परिणाम स्वरुप हमें किसी भी तरह के संक्रमण से बचाने में यह सेल्स अहम भूमिका निभाते हैं. 


2) नींद के दौरान
साइटोकिन्स नामक एक विशेष प्रोटीन का स्राव होता है, जिसमें खास प्रकार  के टी- सेल्स पाए जाते हैं, जो हमारे इम्यून सिस्टम के लिए बहुत अहम है. ये टी -सेल्स  शरीर में मौजूद किसी भी संक्रमित कोशिका पर आक्रमण कर उन्हें ख़त्म कर देती है. मतलब साफ़ है कि यदि हम अच्छी नींद लेते हैं तो इम्युनिटी सैनिक अच्छी संख्या में पैदा होंगे, जिससे शरीर को वायरस आदि के संक्रमण से बचाना आसान होगा.


 3) नींद के कारण हमारे शरीर में
मेलाटोनिन नामक हॉर्मोन का स्राव बढ़ता है. मेलाटोनिन बायोलॉजिकल क्लॉक को दुरुस्त रखता है. यह हार्मोन अपने एंटीऑक्सिडेंट क्वालिटी के लिए  भी प्रसिद्ध है. एंटीऑक्सीडेंट हमारे शरीर की कोशिकाओं को मजबूत और स्फूर्तिवान बनाए रखता है. इससे इम्यून सिस्टम मजबूत होता है. इससे शरीर सक्रिय और स्वस्थ रहता है. विशेषज्ञों के अनुसार  मेलाटोनिन  का अधिकांश स्राव नींद के दौरान ही होता है. रोचक बात है कि अनियमित नींद या कम नींद से इस हॉर्मोन का स्राव दुष्प्रभावित होता है.


4) नींद हमारे स्ट्रेस को कम करता है और हमारे लिए
मूड-बूस्टर का काम भी करता है. इससे हमारा मानसिक और भावनात्मक संतुलन बेहतर बना रहता है. हम बेहतर फील करते है. फील गुड और फील हैप्पी हॉर्मोन स्रावित होते हैं. सबका समेकित असर इम्यून सिस्टम को स्ट्रांग बनाता है.


5) नींद
कोशिकाओं के पुनर्निर्माण में मदद करती है. अच्छी नींद के कारण हमारे सारे ऑर्गन अच्छे ढंग से काम करते हैं. उनकी रेसेटिंग और रिपेयरिंग अच्छे से हो जाती है. ब्रेन को जरुरी ब्रेक और रेस्ट मिल जाता है. इसका पॉजिटिव असर मेटाबोलिज्म पर पड़ता है और अंततः हमारे इम्यून सिस्टम पर. 

 (hellomilansinha@gmail.com) 


            और भी बातें करेंगे, चलते-चलते. असीम शुभकामनाएं.               
# प्रभात खबर हेल्दी लाइफ में 26.08.2020 को प्रकाशित
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Tuesday, October 13, 2020

कोशिश में कमी न हो कभी

                    - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर, स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट ... ...

जीवन जीने का बेहतरीन अंदाज गिरने या असफल होने में नहीं, बल्कि हर बार ज्यादा जोश से फिर कोशिश करने में होती है, ऐसा हर क्षेत्र के लगभग सभी उत्कृष्ट व्यक्तियों ने अपने-अपने तरीके से कहा है. यह बिलकुल सत्य बात है.
कोशिश करते रहने का कोई और विकल्प नहीं है. अगर कोशिश करना ही छोड़ देंगे या कोशिश में कमी कर देंगे तो अपनी असफलता की कहानी तो हम खुद ही लिखेंगे. इम्तिहान से पहले ही उसका अंजाम जान लेंगे. है न? चींटी और मधुमक्खी जैसे छोटे जीवों की कोशिश के प्रति जुनून को अगर गौर से नहीं देखा है तो एक बार जरुर देखें. अपने काम के प्रति उनकी प्रतिबद्धता और तमाम असफलताओं  के बाद भी अपने लक्ष्य की ओर चलते रहने की चेष्टा बहुत ही प्रेरणादायक है. चीटियों के कार्यकलाप से तो एकाधिक राजाओं के प्रेरणा लेने, फिर से उठ खड़े होने और बेहतर कोशिश करके रणक्षेत्र में विजयी होने की कहानी इतिहास के पन्नों में दर्ज है. मधुमक्खियों के जीवन से प्रेरणा लेने की भी अनेक कथाएं हैं. 

छात्र-छात्राएं अपने आसपास नजर दौड़ाएंगे तो पायेंगे कि उनके कई सहपाठी-साथी ऐसे हैं जिन्हें पिछले वर्षों में बराबर अच्छी सफलता मिली थी, पर अपनी कोशिशों में कमी के कारण अब उन्हें वैसी सफलता नहीं मिल रही है. इसके विपरीत कुछ दूसरे विद्यार्थी हैं, जो पहले औसत माने जाते थे, पर अब रैंकिंग में लगातार आगे चल रहे हैं, क्यों कि वे किसी से तुलना किए बगैर बस अपने प्रयास को लगातार बेहतर करते रहे. कहते हैं न कि एक्सीलेंस इज ए जर्नी, नॉट दि डेस्टिनेशन अर्थात खुद को बेहतर करते रहना एक यात्रा है, न कि कोई मंजिल. कहने का अभिप्राय यह कि छात्र-छात्राएं पढ़ने-लिखने-सीखने के मामले में अपने प्रयासों को बढ़ाते जाएं. छोटे-बड़े किसी भी असफलता से हताश-निराश हो कर हथियार न डाल दें, बल्कि दोगुने उत्साह से फिर से अपने काम में लग जाएं. महान आविष्कारक थॉमस अल्वा एडिसन कहते हैं कि "हमारी सबसे बड़ी कमजोरी हार मान लेने में है. सफल होने का सबसे सटीक तरीका है हमेशा एक बार और कोशिश करना." 

आगे बढ़ने से पहले उस महान व्यक्ति के विषय में जानते चलें जिन्होंने अमेरिका में दास प्रथा का अंत किया और गृह युद्ध को समाप्त किया. हां, उनका नाम अब्राहम लिंकन है.

लिंकन 1861 में संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के 16वें राष्ट्रपति के रूप में निर्वाचित हुए. वे अमेरिका के पहले अश्वेत राष्ट्र प्रमुख बने. अपनी कोशिशों के बलबूते हार को हरा कर देश के सर्वोच्च पद पर आसीन होने और अमेरिका के सबसे लोकप्रिय और प्रभावी राष्ट्रपति के रूप में मशहूर होने से पहले उनकी कोशिशों और असफलताओं की जो जुगलबंदी थी, वह सभी विद्यार्थियों के लिए आज भी प्रेरणा का विषय है. लिंकन जब नौ साल के थे, उसी समय उनकी मां का देहांत हो गया. उनका  बचपन काफी गरीबी में गुजरा. उस दौरान उन्होंने  अनेक छोटे-मोटे काम किए, लेकिन पढ़ने के प्रति उनकी रूचि कभी कम नहीं हुई. उन्होंने वकालत को अपना पेशा बनाया. 23 साल की उम्र  में उनका राजनीतिक जीवन प्रारंभ हुआ और एक के बाद दूसरी हार का सिलसिला भी. लेकिन उन्होंने कभी अपनी कोशिश में कमी नहीं आने दी और हर हार के बाद ज्यादा बड़े निश्चय के साथ फिर प्रयास किया. इस बीच वे सीनेट एवं उप-राष्ट्रपति का चुनाव भी हारे. असफलता का यह  सिलसिला उनके 54 वें साल में राष्ट्रपति के रूप में चुने जाने के साथ ख़त्म हुआ. अब्राहम लिंकन बराबर कहते थे कि इस बात का हमेशा ख्याल रखें कि सिर्फ आपका सतत प्रयास और दृढ़ निश्चय ही आपकी सफलता के लिए मायने रखता है, बाकी कोई और चीज नहीं. 

कोरोना लॉकडाउन के समय करीब 1200 किलोमीटर की दूरी तय करते हुए ज्योति  नाम की जो  किशोरी अपने अनथक प्रयास से अपने बीमार पिता को एक साइकिल पर बिठाकर हरियाणा के गुरुग्राम से बिहार के दरभंगा ले आई, उसके विषय में जानकर आपको भी जरुर अच्छा लगा होगा. बिहार के गया जिले के दशरथ मांझी के नाम से भी विद्यार्थीगण अपरिचित नहीं हैं. उन्हें  देश-विदेश में लोग अब "माउंटेन मैन" के नाम से जानते हैं. मात्र एक छेनी-हथोड़ी के सहारे  करीब 22 साल के कठिन प्रयास से उन्होंने एक बड़े पहाड़ को काट कर करीब 30 फीट चौड़ी सड़क बना दी, जिससे उस इलाके के आम लोगों को अनेक लाभ मिला. निसंदेह,  बिलकुल असंभव-सा  प्रतीत होनेवाले कार्य को संभव करके दशरथ मांझी जैसे लोग यह साबित करते रहे हैं कि कोशिश करनेवालों की  कभी हार नहीं होती. जीवन में बड़ी जीत के भी वही हकदार होते हैं.

 (hellomilansinha@gmail.com)  

      
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं। 
# लोकप्रिय साप्ताहिक "युगवार्ता" के 09.08.2020 अंक में प्रकाशित
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Tuesday, October 6, 2020

कभी हंसना न छोड़ें

                     - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर, स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट ... ...

मेरा मानना है कि हंसना-मुस्कुराना बड़े-छोटे भाई के समान होता है. दोनों ख़ुशी नामक परिवार के अहम सदस्य हैं. अतः आगे की चर्चा में हंसना-मुस्कुराना दोनों के लिए एक शब्द हंसना का प्रयोग करेंगे. खैर, जीवन में हंसना कौन नहीं चाहता, फिर भी सर्वे बताते हैं कि हम दिन भर में बहुत कम हंसते हैं. छात्र-छात्राएं खुद अपने जीवन में झांक कर देख लें कि दिनभर में वे औसतन कितनी बार हंसते हैं. विद्यार्थी जीवन जानने, सीखने, समझने और अपना रास्ता बनाने का महत्वपूर्ण समय होता है. इसमें हंसी एक बहुत कारगर औजार साबित होता है, जिससे कठिन से कठिन रास्ता भी आसान लगने लगता है. अपने परिजनों-मित्रों के साथ मिलकर हंसी के क्षणों  को जीना सबसे सुखद अनुभव होता है. साथ ही दूसरों पर हंसने के बजाय अपनी गलतियों और कमियों पर हंसना किसी भी विद्यार्थी के लिए उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है.
महान दार्शनिक और राजनेता बेंजामिन फ्रैंकलिन कहते हैं, "अगर आप चाहते हैं कि लोग आप पर हंसे नहीं तो खुद पर हंसने वाला पहला व्यक्ति बनिए." विचारणीय बात है कि कितने विद्यार्थी खुद की गलतियों पर पहले हंसते हैं और वैसी गलती फिर नहीं करते कि फिर हंसना और इस बार दुखी होने या लज्जित होने की जरुरत पड़े? 


ज्ञानीजन कहते हैं कि जब तक जीवन है, तभी तक चुनौती व संघर्ष है. जीवन समाप्त, चुनौती व संघर्ष भी समाप्त. सच्चाई तो यह भी है कि जो कर्मयोगी होता है, उसी पर यह बात शब्दशः लागू होती है कि रोते हुए तो सभी आते हैं इस दुनिया में, लेकिन जो हंसते हुए  जीवन जी पायेगा, वही तो सचमुच विजेता माना जाएगा. अपने क्लास या स्कूल-कॉलेज में सबकी इच्छा होती है कि वह सबसे आगे रहे, उसे लोग विजेता के रूप में जाने. लेकिन विजेता के इस संस्कार को कि हर चुनौती को हंसकर स्वीकार करो और पूरी शिद्दत से अपने काम को अंजाम दो, कितने विद्यार्थी अपना संस्कार बना पाते हैं?
गौर करनेवाली बात है कि ख़ुशी और हंसी के बीच एक गहरा रिश्ता है. खुश होते हैं तो हंसते हैं अर्थात हंसते हैं तो ख़ुशी झलकती है. हां, कई बार यह ख़ुशी और हंसी व्यक्ति के भीतर चलती रहती है और साधारणतः दूसरे लोगों को पता नहीं चलता. दिनभर में अगर कोई इस अवस्था में अधिक समय तक रहता है, इसका मतलब वह निर्मल आनंद की अनुभूति कर रहा है. मुझे विश्वास है कि सभी विद्यार्थियों ने कभी-न-कभी इसकी अनुभूति की है.  

 
सब जानते हैं कि सूर्य के प्रकाश से पूरा संसार प्रकाशित होता है. दुनिया को अंधकार से मुक्त करने लिए सूर्य को निरंतर जलना पड़ता है, फिर भी वे बिना छुट्टी लिए हंसी-ख़ुशी साल-दर-साल पूरे ब्रह्माण्ड को उजाले और ऊर्जा से लाभान्वित करते रहते हैं. इस विचारणीय तथ्य पर विद्यार्थीगण  ध्यान दें तो उन्हें और समाज को बहुत लाभ होगा.
अंग्रेजी उपन्यासकार विलियम मेकपीस  थैकरे ने बहुत अच्छी बात कही है कि एक अच्छी हंसी घर में सूरज की रौशनी के समान है. सोचनेवाली बात है कि घर कितना भी बड़ा और कीमती हो, उसमें  प्रकाश न रहे तो वह भूतबंगला लगता है, डरावना लगता है और वह रहने योग्य नहीं रहता. लेकिन वही घर अगर प्रकाश से भरा हो तो फिर बात ही कुछ और होती है. प्रत्येक विद्यार्थी के व्यक्तित्व के साथ यह बात लागू होती है. 


हेल्थ की दृष्टि से हंसी को देखें-परखें तो बहुत सारी रोचक और जानने योग्य बातें सामने आती हैं.
जाने-माने ब्रिटिश कवि लार्ड बायरन कहते हैं कि 'जब भी हंस सको हंसो. यह एक सस्ती दवा है.' सचमुच हंसी अनेक मर्जों की दवा है, जो मुख्यतः आपकी मर्जी से आपके शरीर रूपी फैक्ट्री में उत्पादित होता है. लिहाजा, विद्यार्थियों को हंसने का मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहिए, खासकर साथ मिलकर हंसने का. इससे वे चिंता, तनाव आदि से भी मुक्त रह पायेंगे. दरअसल, हंसी के कारण हमारे शरीर में एंडोर्फिन एवं सेरोटोनिन नामक होरमोंस का स्राव होता है, जिससे हम अच्छा फील करते हैं. इस फीलिंग के कारण हमारे अंदर रोग प्रतिरक्षक क्षमता मजबूत होती है. इतना ही नहीं, हमारे अंदर उर्जा और उत्साह का अतिरिक्त संचार होता है, जिससे हम बेहतर तरीके से कार्य संपादित कर पाते हैं. चुनौतियों से भरे छात्र जीवन में जब खुद को मानसिक और शारीरिक रूप से बहुत फिट एंड फाइन रखना पड़ता है, हंसी की महत्ता और बढ़ जाती है. विश्व विख्यात हास्य अभिनेता चार्ली चैप्लिन का तो यहां तक कहना है कि “हंसी के बिना बिताया  हुआ दिन बर्बाद किया हुआ दिन है.”  रबीन्द्रनाथ ठाकुर और अब्राहम लिंकन सहित संसार के अनेक महान लोगों ने हंसी की महत्ता पर अपने विचार खुलकर व्यक्त किए हैं. 

 (hellomilansinha@gmail.com)  


                       और भी बातें करेंगे, चलते-चलते. असीम शुभकामनाएं. 
#  लोकप्रिय साप्ताहिक "युगवार्ता" में 02.08.20 को प्रकाशित

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Tuesday, September 29, 2020

दोस्ती के मायने

                      - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर, स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट ... 

कई अवसरों पर गुरुजनों को आपने यह कहते हुए सुना होगा कि हम बाकी सभी रिश्तों के साथ पैदा होते हैं, लेकिन  दोस्ती ही एक मात्र रिश्ता है जिसे हम खुद बनाते हैं. बिलकुल सही बात है. दोस्त हम खुद बनाते हैं, कारण कई हैं. औपचारिक रूप से यह सिलसिला अमूमन स्कूल में एडमिशन के बाद शुरू हो जाता है, जो किशोरावस्था में थोड़ा तेज हो जाता है. उस समय हार्मोनल चेंज के साथ घरेलू रिश्ते में बदलाव दिखने लगता है. माता-पिता, भाई-बहन और अन्य रिश्तेदार से कहीं ज्यादा प्रगाढ़ता दोस्तों के साथ नजर आने लगती है. ऐसा कमोबेश सभी छात्र-छात्राओं  के साथ होता है. शहरों-महानगरों में पढ़नेवाले विद्यार्थियों में यह चेंज काफी साफ़ नजर आता है. इसके एकाधिक सामाजिक-मनोवैज्ञानिक कारण हैं.
कुछ लोग सहपाठी को दोस्त की संज्ञा दे  देते हैं, पर हर सहपाठी दोस्त नहीं होता और न ही सब दोस्त सहपाठी. हां, यह पाया गया है कि कई सालों तक एक साथ पढ़ाई करने के कारण ज्यादातर दोस्त स्कूल-कॉलेज में ही बनते हैं और सबसे ज्यादा टिकाऊ और भरोसेमंद होते हैं. इसके पीछे का मनोविज्ञान भी साफ़ और सरल है.
 
ऐसे तो दोस्ती का दायरा बहुआयामी होता है, तथापि आमतौर पर घर के लोगों के अलावे अधिकांश विद्यार्थी सबसे ज्यादा समय अपने दोस्तों के साथ बिताते हैं और यह उनकी स्वाभाविक इच्छा भी होती है. सिनेमा हॉल हो या मॉल या पिकनिक स्पॉट या स्पोर्ट्स स्टेडियम, हर जगह अपने दोस्तों के साथ विद्यार्थियों को देखना आम बात है. दरअसल, हर विद्यार्थी सामान्यतः अपनी हर छोटी-बड़ी बात पहले दोस्त से ही शेयर करता है. दोस्त नजदीक न भी हो तो करीब ही लगता है. कहते हैं कि एक मजबूत दोस्ती के लिए हर रोज बात करने या आसपास रहने की ज़रुरत नहीं होती. दोस्ती का यह संबंध जब तक  दिल में जिंदा रहता है, दोस्ती बनी रहती है. दिलचस्प बात है कि हर विद्यार्थी किसी-न-किसी मामले में दूसरे से अलग होता है. कई मामलों में तो उनके मत बिलकुल भिन्न होते हैं, फिर भी वे एक दूसरे के बहुत अच्छे दोस्त होते हैं. उनके बीच अमीरी-गरीबी, जाति-धर्म, भाषा-क्षेत्र जैसी कोई बात दीवार नहीं बन पाती है. तभी तो कई बार तकरार और छोटे-मोटे झगड़े के बाद भी उनकी दोस्ती मजबूत बनी रहती है. शायद वे जाने-अनजाने प्रख्यात अंग्रेजी कवि-नाटककार विलियम शेक्सपीयर की इस उक्ति को चरितार्थ करते हैं कि "एक दोस्त वो होता है जो आपको वैसे ही जानता है जैसे आप हैं, आपके बीते हुए कल को समझता है, आप जो बन गए हैं उसे स्वीकारता है और आपकी उन्नति में साथ होता है." लेकिन क्या सबका सबके साथ दोस्ती एक समान चलती है साल-दर-साल? 

जरा सोचिए, बचपन से लेकर अबतक आपके जितने दोस्त बने, क्या सबके साथ आप आज भी जुड़े हुए हैं और वह भी उसी प्रगाढ़ता के साथ. नहीं न. कितने  दोस्तों के नाम तक भूल गए होंगे और कुछ के चेहरे तक. इसका मतलब यह कि समय और परिस्थिति के साथ दोस्ती की परिभाषा और मायने भी कम या ज्यादा बदलते गए. लेकिन इस बीच कुछ दोस्त बराबर आपके साथ बने रहे. कभी मौका निकाल कर इस बात पर सोच-विचार जरुर करें. बहुत सारी बातें  एकदम साफ़ हो जाएंगी. सकारात्मक दृष्टि से सोचें तो आप पायेंगे कि वही दोस्त रह गए और शायद आगे भी रहेंगे जो सच्चे दोस्त हैं. प्रसिद्ध लेखक विलीयम पेन सच्चे दोस्त को इन  शब्दों में परिभाषित करते हैं- एक सच्चा दोस्त उचित सलाह देता है, तुरत मदद करता है, संयम से सब कुछ करता है, हिम्मत से आपकी रक्षा करता है तथा बिना बदले दोस्ती कायम रखता है. कहने का अभिप्राय यह कि सच्चा व अच्छा दोस्त ही आपके दर्द को अपना मानता है, आप पर विश्वास करता है, आपको अच्छाई से जोड़ता है और बिना किसी अपेक्षा के हर मौसम और मुसीबत में आपके साथ रहता है.
 
इसके विपरीत दोस्ती के नाम पर कई विद्यार्थी सिर्फ अपना मतलब साधने का काम करते हैं. मतलब निकल गया तो फिर पहचानने से भी वे इनकार कर देते हैं. ऐसे लोग ही आपको गलत रास्ते पर ले जाते हैं. इससे अच्छे विद्यार्थियों को नाहक बहुत नुकसान होता है. महात्मा बुद्ध का तो इस विषय में स्पष्ट मत है कि "एक जंगली जानवर की अपेक्षा एक धूर्त एवं  दुष्ट दोस्त से अधिक डरना चाहिए. जंगली जानवर तो सिर्फ आपके शरीर को नुकसान पहुंचाएगा, लेकिन एक बुरा दोस्त आपके माइंड को भी दूषित कर देगा." अतः सभी छात्र-छात्राओं को ऐसे कथित दोस्तों को पहचानने और उनसे सावधान रहने की सख्त जरुरत है. निसंदेह, जीवन में  दोस्तों की बहुत अहमियत है, लेकिन सिर्फ सच्चे और अच्छे दोस्तों की, बेशक उनकी संख्या कुछ कम ही हो. 

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           और भी बातें करेंगे, चलते-चलते. असीम शुभकामनाएं.               
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Thursday, September 24, 2020

सिर्फ विज्ञापन नहीं

                    - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर, स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट ... ...

बाजारवाद के मौजूदा दौर में कमोबेश सभी विद्यार्थियों के जीवन में विज्ञापन का असर देखा जा सकता है. यह एकदम सामान्य बात है. देश-विदेश की छोटी-बड़ी कम्पनियां अपने प्रोडक्ट्स और सर्विसेस को बाजार में स्थापित करने और उस कारोबार के मार्फ़त अच्छा लाभ कमाने के उद्देश्य से विज्ञापन का इस्तेमाल करती हैं.
बोतल बंद पीने के पानी से लेकर टूथपेस्ट, साबुन, जूते, कपड़े, कोल्ड ड्रिंक्स, कलम, मोबाइल, लैपटॉप, साइकिल, स्कूटर, कार, आटा, दाल, चावल, मसाला कोई भी ऐसी वस्तु या सेवा नहीं है जिसका विज्ञापन नहीं हो रहा है और विद्यार्थियों सहित सब लोग  उससे कम या ज्यादा प्रभावित नहीं हो रहे हैं. इतना ही नहीं, कोरोना काल में जब क्लास रूम पढ़ाई नहीं हो पा रही है, ऑनलाइन स्टडी और क्लासेज के लिए कई बड़ी कम्पनियां जाने-माने फ़िल्मी कलाकारों से भी विज्ञापन करवा रहीं हैं. 


विज्ञापन का व्यवसाय बहुत बड़ा और अत्यंत डायनामिक होता है. उपभोक्ता की पसंद-नापसंद, उनका मनोविज्ञान, आसपास के लोगों का उनपर असर, उनकी महत्वाकांक्षा, उनकी आर्थिक-सामाजिक स्थिति, मौजूदा परिस्थिति आदि सभी पक्षों का विस्तृत अध्ययन-विश्लेषण किया  जाता है. बाजार में प्रतिस्पर्धी प्रोडक्ट या सर्विसेस की प्राइसिंग, मार्केट शेयर, डिमांड-सप्लाई का अर्थशास्त्र और अन्य स्थिति का आकलन-विवेचन भी गंभीरता से किया जाता है. हां, प्रोडक्ट या सर्विसेस की क्वालिटी का ध्यान भी रखा जाता है, लेकिन विज्ञापन और प्रचार में उसे यथार्थ से ज्यादा अच्छा बताने का प्रचलन आम है. ऐसा इसलिए कि देश में उपभोक्ता संरक्षण कानून और गलत विज्ञापन देने पर दंड का प्रावधान होने के बावजूद प्रोडक्ट या सर्विसेस की विज्ञापित गुणवत्ता को जांचने-परखने की मौजूदा व्यवस्था कारगर तरीके से काम नहीं करती है. परिणाम स्वरुप बहुत सारी सब-स्टैण्डर्ड चीजें और सर्विसेस विज्ञापन और प्रचार के बलबूते बाजार में न केवल कायम है, बल्कि अच्छा बिज़नस भी कर रही हैं. 


सभी विद्यार्थी जानते हैं कि हर कंपनी चाहती है कि उसके ग्राहकों की संख्या निरंतर बढ़े और प्रॉफिट भी.
भारत जैसे युवा देश में छात्र-छात्राएं एक  बड़ा ग्राहक वर्ग है. यह वर्ग कभी भी बाजार में किसी वस्तु या सेवा को मजबूत या कमजोर स्थिति में लाने का बड़ा कारण बन सकता है. अतः कम्पनियां छात्र-छात्राओं द्वारा उपयोग में लानेवाली चीजों के विज्ञापन पर बहुत ज्यादा फोकस करती हैं, जिससे कि उनके अवचेतन मन पर उसकी गहरी छाप पड़े और वे उसे खरीदने को आतुर हो जाएं. यहां सभी विद्यार्थियों के लिए यह जानना जरुरी है कि अच्छी क्वालिटी के प्रोडक्ट्स और सर्विसेस के कारोबार में संलग्न कम्पनियां न्यूनतम विज्ञापन से सालों-साल तक मार्केट में अपना स्थान बनाए रखती हैं, क्यों कि वे इस शाश्वत सत्य को जानते हैं  कि किसी भी उत्पाद या सर्विस का संतुष्ट ग्राहक ही उसका चलता-फिरता एवं अत्यंत प्रभावी विज्ञापन होता है. तो सवाल है कि विज्ञापन से भरे इस बाजार में विद्यार्थियों को क्या करना चाहिए? 


इन पांच अहम बातों को याद रखकर कार्य करें.
1) सिर्फ विज्ञापन और प्रचार से आकर्षित होकर  किसी भी प्रोडक्ट और सर्विस का उपयोग करने के बजाय गुणवत्ता और कीमत के आधार पर उनका इस्तेमाल करने का संकल्प लें. 2) किसी भी दोस्त या सहपाठी के देखादेखी तुरत कोई निर्णय न लें. खुद सोच-विचार और तुलना-विश्लेषण करें और फिर जो उचित लगे, वहां पैसा खर्च करें. 3) शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने के लिए कौन सी चीजें इस समय एकदम जरुरी है, इसका ध्यान रखते हुए क्वालिटी चीजें ही खरीदें. कहने का अभिप्राय यह है कि किसी सेलेब्रिटी को किसी ब्रांड का कोल्ड ड्रिंक्स, चिप्स, कॉस्मेटिक्स आदि का उपयोग करते देख या किसी फिल्म स्टार को किसी ऑनलाइन क्लास को उत्कृष्ट बताने पर बिना सोचे-समझे उन प्रोडक्ट्स का उपयोग करना या उस ऑनलाइन क्लास को ज्वाइन करना कोई समझदारी नहीं  है. 4) सेल या डिस्काउंट के आकर्षण-प्रलोभन में एक साथ बहुत चीजें न खरीदें. सिर्फ वही खरीदें जिसका फिलहाल उपयोग करना है और 5) कभी न भूलें कि जो भी कंपनी अपने प्रोडक्ट या सर्विस के विज्ञापन और प्रचार में बहुत ज्यादा पैसा खर्च करती है, वह सामान्यतः क्वालिटी से समझौता करती है और आखिरकार इस सबकी वसूली उपभोक्ता के पॉकेट से ही करती है. कहने का आशय यह कि छात्र-छात्राएं अपनी शिक्षा का सही उपयोग करते हुए सदा एक जागरूक और समझदार उपभोक्ता का रोल अदा करें और विज्ञापन को जानकारी का सिर्फ एक माध्यम समझें.

  (hellomilansinha@gmail.com)       

      
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं। 
# लोकप्रिय साप्ताहिक "युगवार्ता" के 12.07.2020 अंक में प्रकाशित
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