Monday, May 29, 2017

मोटिवेशन : सफलता और असफलता जीवन का एक हिस्सा है

                                                                      -मिलन सिन्हा, मोटिवेशनल स्पीकर 
सीबीएसई 12वीं के परीक्षार्थियों की प्रतीक्षा ख़त्म हो गई.  रिजल्ट की घोषणा हो चुकी.  स्वभाविक रूप से  कुछ बच्चे खुश हैं, तो कुछ बच्चे नाखुश. माता-पिता, शिक्षक, अभिभावक के लिए भी कहीं खुशी और कहीं गम का माहौल है. जिन बच्चों का रिजल्ट अच्छा नहीं हुआ, वे तो स्वयं मायूस, परेशान और तनाव ग्रस्त होंगे. सोच-विचार कर रहे होंगे कि अपेक्षित मार्क्स क्यों नहीं आये, कहां चूक हो गई, अभिभावक और शिक्षक क्या सोचेंगे, लोग क्या कहेंगे, आगे कहां और क्या पढ़ पायेंगे आदि. बावजूद इसके ज्यादातर अभिभावक अपने ऐसे मायूस बच्चों को पीटने-डांटने-कोसने से बाज नहीं आते हैं, जब कि वे भी जानते हैं कि बच्चे पर इसका नकारात्मक असर होगा और यह भी कि इससे बच्चे के इस रिजल्ट में कोई बदलाव नहीं होने वाला है. जो होना था, हो गया है. अब तो इसे खुले मन से स्वीकारने के अलावा कोई विकल्प भी नहीं. 

बेहतर ये होता है कि ऐसे मौके पर अभिभावक अपने-अपने बच्चे के साथ भावनात्मक रूप से खड़े रहें और दिखें भी. उन्हें प्यार करें; उनकी क्षमता पर भरोसा जताएं. एक काम और करें. ऐसे समय में  'पर-पीड़ा सुख' पाने के इच्छुक ऐसे सभी पड़ोसी और सगे-संबंधी से बच्चों को बचा कर रखना अनिवार्य है. बच्चों को भी गम के दरिया में डुबकियां लगाने, अंधेरे कमरे  में बैठ कर खुद को कोसने और अपने दोस्तों के रिजल्ट से तुलना करने और  दूसरे को दोष देने  के बजाय 'टेक-इट-इजी'  सिद्धांत  का पालन करते हुए शांत रहने की कोशिश करनी चाहिए. 

जीवन से बड़ा कुछ भी नहीं. यह जीवन अनमोल है. अब्राहम लिंकन, महात्मा गांधी, अल्बर्ट आइंस्टीन एवं  ए पी जे अब्दुल कलाम सहित अनेकानेक महान लोगों की जिंदगी असफलताओं के बीच से होकर अकल्पनीय सफलता-उपलब्धि हासिल करने की कहानी कहता है. ऐसे भी, हम सभी जानते हैं कि सफलता-असफलता सभी के जीवन में आते रहते हैं. बेहतर उपलब्धि के लिए सतत कोशिश करते रहना ज्यादा महत्वपूर्ण होता है. 

हां, अब तो अपने देश में 12वीं के बाद बहुत सारे रोजगार उन्मुखी कोर्स शुरू हो गए हैं. सोच-समझ कर दाखिला लेने से भविष्य में कई फायदे होंगे.   

ऐसे, रिजल्ट खराब अथवा आशा के अनुरूप नहीं होने के एक नहीं, अनेक कारण हो सकते हैं.  किसी भी कारण से इस बार अगर अपेक्षित परिणाम नहीं मिले, तो उन कारणों की गहन समीक्षा खुले मन और ठंढे दिमाग से अर्थात निरपेक्ष भाव से तीन-चार  दिनों के बाद करनी चाहिए, तुरन्त तो कदापि  नहीं. 

तो अगले दो दिनों तक क्या करें ? पहला तो, अपने रिजल्ट को पूरी तरह स्वीकार करें. दूसरा, किसी के भी डांट- फटकार, कटाक्ष, आलोचना, व्यंग्य आदि को दिल से न लें. तीसरा, अच्छे से स्नान कर पसंदीदा ड्रेस पहनकर आईने के सामने जाकर मुस्कुराएं और खुद को देर तक निहारते हुए मन ही मन दोहरायें - जो हुआ, ठीक ही हुआ. मैंने जैसी परीक्षा दी, परिणाम कमोबेश उसी के अनुरूप आया. ऐसे भी, मुझे जीवन में अनेक छोटी -बड़ी परीक्षाएं देनी हैं, सफलता-असफलता के अलग-अलग दौर से गुजरना है, तो अब मायूसी किस बात की. पीछे कोई भूल  हुई है तो उसे आगे नहीं दोहराएंगे, खूब मेहनत करेंगे. आगे हम जरुर  कामयाब होंगे, मन में है मेरे यह विश्वास....मन हल्का हो जायगा, हैप्पी-हैप्पी फील होगा. माता-पिता सहित घर के सभी बड़ों का आशीर्वाद  लें और उन्हें आगे बेहतर रिजल्ट का आश्वासन दें. फिर खुशी -खुशी खाना खाएं, टीवी में कॉमेडी शो या फिल्म देखें और रात में जल्दी सो जाएं. यकीन मानिए, आपका कल आज से जरुर बेहतर होगा. आप सफल तो होंगे ही, स्वस्थ भी रहेंगे और आनंदित भी.     
                                                                                       ( hellomilansinha@gmail.com)
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Tuesday, May 16, 2017

यात्रा के रंग : अब पुरी में -5 ‘श्री जगन्नाथ मंदिर’ और उसके आसपास-2

                                                                                          - मिलन सिन्हा 
गतांक से आगे... हमें पुरी के “श्री जगन्नाथ मंदिर” में प्रवेश करते ही एक पंडा जी मिल गए, जो हमें मंदिर के सभी महत्वपूर्ण भागों में न केवल ले गए, बल्कि उसके धार्मिक-आध्यात्मिक पृष्ठभूमि की जानकारी दी. ज्ञातव्य है कि मुख्य मंदिर के आसपास तीस छोटे-बड़े मंदिर भी स्थित हैं. श्री जगन्नाथ मंदिर काम्प्लेक्स में ही माँ लक्ष्मी का भी मंदिर है, जहां जगन्नाथ जी के दर्शन के बाद जाने की परंपरा है.  

कहा जाता है कि चार धामों में शुमार “श्री जगन्नाथ मंदिर” की अनेक विशेषताएं हैं, जिनके विषय में जानकर अचरज में पड़ जाना अस्वाभाविक नहीं है. मसलन, मंदिर का रसोईघर दुनिया का सबसे बड़ा रसोईघर है; इस विशाल रसोईघर में भगवान जगन्नाथ को चढ़ाए जाने वाले महाप्रसाद को तैयार करने के लिए 500 रसोइए एवं उनके 300 सहयोगी एकसाथ काम करते हैं; मिट्टी के बर्तनों में सारा खाना पकाया जाता है; रसोईघर  में प्रसाद पकाने के लिए मिट्टी के सात बर्तन एक-दूसरे पर रखे जाते हैं तथा  इंधन के रूप में लकड़ी का ही इस्तेमाल किया जाता है;  दिन के किसी भी वक्त मंदिर के मुख्य गुंबद की छाया अदृश्य ही रहती है; पुरी शहर के किसी भी भाग से आप मंदिर के शीर्ष पर लगे सुदर्शन चक्र को देखें तो यह चक्र आपको हमेशा सामने से ही लगा हुआ दिखाई पड़ेगा; 214 फुट ऊँचे इस मंदिर के ऊपरी हिस्से में दिखने वाला ध्वज हमेशा हवा के विपरीत दिशा में लहराता रहता है आदि.

जानने योग्य बात यह भी है कि अष्टधातु से निर्मित सुदर्शन चक्र को, जिसकी परिधि करीब 36 फुट है, नीलचक्र भी कहा जाता है एवं इसे बहुत ही पवित्र -पावन माना जाता है. ऐसी और भी अनेक ज्ञानवर्द्धक  बातें इस मंदिर के साथ जुड़ी है.

मंदिर के गर्भ गृह में एक रत्न मंडित चबूतरे पर भगवान जगन्नाथ के साथ उनके बड़े भाई बलभद्र और उनकी बहन सुभद्रा की मूर्तियां विराजमान हैं. ये तीनों मूर्तियां लकड़ी से बनी हैं, जिन्हें अनुष्ठानपूर्वक बारह वर्षों में एक बार बदला जाता है. 

मंदिर के शिखर पर लहराते ध्वज को बदलने का कठिन काम प्रतिदिन अपराह्न काल में करीब चार बजे के आसपास, यानी सूर्यास्त से पहले, किया जाता है. मंदिर के शिखर पर स्थित सुदर्शन चक्र के ऊपर सूर्य और चन्द्र अंकित लगभग 25 फुट लम्बा लाल या पीला एक बड़ा ध्वज लगाया जाता है, जो करीब 12 फुट ऊँचे सुदर्शन  चक्र से करीब 25 फुट और ऊपर सदैव लहराता रहता है. नील चक्र से नीचे की ओर अन्य अनेक छोटे –बड़े ध्वज लटकते –लहराते रहते हैं. सभी ध्वजों को रोज बदला जाता है. सौभाग्य से हमें इस पूरी प्रक्रिया को संपन्न होते हुए देखने का मौका मिला. हमारे तरह हजारों लोग इस रोमांचक दृश्य को देखने वहां मौजूद थे. कहते हैं, ऐसी भीड़ वहां उस वक्त हर रोज देखी जा सकती है. वाकई, इतनी ऊंचाई पर इतने ध्वजों को लेकर चढ़ना-उतरना, उन्हें उतारना–नए ध्वज लगाना,  बहुत ही जोखिम का काम है, तथापि इस कार्य को बड़ी कुशलता से मंदिर द्वारा अधिकृत दो व्यक्ति रोजाना नियमपूर्वक  करते हैं. मंदिर परिसर में ही “श्री जगन्नाथ जी” का प्रसाद प्राप्त करने की सुविधाजनक व्यवस्था कायम है.            ... ....आगे जारी.   (hellomilansinha@gmail.com)

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# साहित्यिक पत्रिका 'नई धारा' में प्रकाशित 
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Tuesday, May 9, 2017

यात्रा के रंग : अब भुवनेश्वर की ओर - 1

                                                                                    - मिलन सिन्हा 
सुबह सात बजे ही निकल पड़े हम पुरी से ओड़िशा या उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर की ओर जिससे भुवनेश्वर तथा उसके आसपास अवस्थित कुछेक पर्यटन स्थलों को देखने एवं उनके विषय में अपना ज्ञानवर्धन करने का मौका मिल सके. धूप खिल चुकी है. मौसम खुशनुमा है ...

पुरी शहर से निकल कर भुवनेश्वर मार्ग पर आने के लिए हम एक पुराने पुल से गुजरते हैं. कार चालाक ने बताया कि  इस पुराने पुल के साथ अब अब एक नया पुल भी बन गया है, पर नाम वही पुराना ही है -  ‘अट्ठारह पाया पुल’.

पुरी –भुवनेश्वर सिक्स लेन सड़क पर चलते हुए हमें आसपास धान के खेत, नारियल के हजारों कतारबद्ध पेड़, कच्चे-पक्के छोटे मकान, मुर्गी-बत्तक, गाय, बकरी, पोखर आदि के साथ-साथ सामन्य देहाती लिबास में औरत, मर्द और बच्चे दिखाई पड़े. सड़क किनारे छोटे चाय दुकानों में या उसके आसपास नारियल पानी यानी डाब सुलभ था.  ताजे और सस्ते. नारियल पानी पीकर एवं उसका मलाई खाकर हमलोग आगे बढे. 

पुरी से भुवनेश्वर के बीच की करीब 60 किलोमीटर की दूरी एक्सप्रेस मार्ग से करीब 75-80 मिनट में आराम से तय की गई. कहना न होगा कि भुवनेश्वर शहर में प्रवेश करते ही हमें यह महसूस होने लगा कि हम पौराणिकता एवं आधुनिकता को समेटे एक बेहतर व विकसित स्थान में भ्रमण  का आनंद  ले पायेंगे.

कुछ ही देर में हम उदयगिरि तथा खंडगिरि गुफाओं के पास थे, जो ऐतिहासिक एवं  धार्मिक रूप से भी महत्वपूर्ण माने जाते हैं. दिलचस्प तथ्य यह है कि सड़क के एक ओर खंडगिरि पर्यटन स्थल है तो दूसरे तरफ उदयगिरि. दोनों के बीच करीब 60-70 फीट की दूरी है. ये दोनों पर्वत गुफाएं भुवनेश्वर शहर के उत्तर-पश्चिमी भाग में है. खंडगिरि पर्वत गुफा की ऊंचाई 133 फीट है, तो उदयगिरि की 110 फीट. उदयगिरि में कुल 44 गुफाएं हैं, जब कि खंडगिरि में 19 गुफाएं. कहा जाता है कि इनमें से  कुछ गुफाएं प्राकृतिक हैं. तो कुछ कृत्रिम रूप से निर्मित. दोनों ही पर्वत गुफाओं के आसपास हजारों छोटे- बड़े पेड़ इनकी खूबसूरती बढ़ाते हैं. आइये देखें दोनों पर्वत गुफाओं के ये फोटो :

खंड गिरि पर चढ़ने- उतरने की व्यवस्था बेहतर है. बच्चों, युवाओं  और  बुजुर्गों को भी पर्वत के शिखर पर चढ़ते और उस स्थान का आनंद लेते देखा जा सकता है. उदय गिरि गुफाओं को देखने के लिए कुछ दूर तक आप सीढ़ियों से चढ़ कर अच्छी तरह ऊपर जा सकते हैं, किन्तु बाकी की चढ़ाई पत्थर की बेतरतीब सीढ़ियों से संभल-संभल कर. उदय गिरि के शिखर पर एक सफ़ेद खूबसूरत दिगम्बर जैन मंदिर  है, जो दूर से ही दिखाई पड़ता है. इस मंदिर के परिसर से भुवनेश्वर शहर का एक विहंगम दृश्य आप देख सकते हैं. 

उदय गिरि पर्वत गुफाओं को देखने के क्रम में आपको कुछेक मिनट तो बंदरों के साथ गुजारना ही पड़ेगा, जो आपके लिए एक सुखद अनुभव होगा. ये बंदर – छोटे-बड़े सभी, आपके साथ कमोबेश शालीनता से ही पेश आयेंगे, अगर आप भी उनके साथ मानवोचित व्यवहार करें. आप उन्हें उपहार स्वरुप खाने के लिए बादाम के दो-चार छोटे पैकेट प्रेम से भेंट करें – उन्हें अच्छा लगेगा और यकीनन आपको भी. 

हाँ, इसी क्रम में हमें उनके बीच के आत्मीय रिश्ते के कई दुर्लभ दृश्य अपने मोबाइल कैमरे में कैद करने का अवसर मिल गया, जिसमे एक वयस्क बंदर दूसरे के शरीर में से ढील यानी जुएँ बीनते दिखता है, तो एक दूसरे दृश्य में माता बंदर अपने छोटे से बच्चे को अपनी गोद में सुरक्षित दूध पिलाते हुए. कुछ ऐसे ही आत्मीय दृश्य हमें हमारे कई प्रदेशों के ग्रामीण इलाकों में दोपहर बाद अनायास ही दिख जायेंगे, बेशक कई फर्क के साथ.


यहाँ हमने कई युवक –युवतियों के अलावे कई बुजुर्गों को बंदर एवं उनके परिजनों  के साथ  सेल्फी लेते भी देखा. अपने पूर्वजों की मौजूदा पीढ़ी के साथ दिखने –दिखाने का अभिनव दृश्य !
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Tuesday, April 25, 2017

मोटिवेशन: खुद पर भरोसा रखें; खुद से प्यार करें

                                         -  मिलन  सिन्हा, मोटिवेशनल स्पीकर...
क्या हम वाकई खुद से प्यार करते हैं ?  एक हिन्दी फिल्म के गाने का मुखड़ा है, प्यार बांटते चलो ... ...सही है. हम नफरत क्यों बांटे, खुद को और अपने समाज को गन्दा क्यों करें; कमजोर क्यों करें ? लेकिन अपने पास प्यार की पूंजी होगी, तभी तो हम बाटेंगे न, क्यों ? क्रिस्टिना पेरी का कहना है, ‘यह जरुरी है कि आप खुद से सौ फीसदी प्यार करें, तभी आप किसी दूसरे को प्यार कर सकते हैं.’

सुबह उठते ही हम सभी अपने –आप को आईने में देखना पसंद करते हैं. देखें, जरुर देखें, पर सिर्फ एक पल के लिए नहीं, बल्कि थोड़ा  रुकें और खुद को गौर से देखते हुए सवाल पूछें कि क्या मुझसे बेहतर मुझे कोई और जानता है या जान भी सकता है ? क्या मै इस संसार में यूँ ही आया हूँ और ऐसे ही एक दिन यहाँ से चला भी जाऊँगा; या कि मेरा भी जन्म एक दिव्य शक्ति के साथ हुआ है; मेरे अन्दर भी असीमित क्षमता है बहुत कुछ अच्छा करने के लिए - जिससे मेरा हित हो और मेरे समाज का भी ? क्या मैं आज को बीते हुए कल से थोड़ा बेहतर बनाने का प्रयास नहीं कर सकता ? 

यकीनन, आपको सकारात्मक उत्तर मिलेगा. और तब एक छोटे से मुस्कान के साथ खुद को सिर्फ गुड मॉर्निंग नहीं, वेरी गुड मॉर्निंग कहें. तत्पश्चात मन ही मन जोर से बोलें, हाँ, मैं कर सकता हूँ और जरुर करूँगा. करके देखिए, बहुत अच्छा लगेगा. आपको  एक अनोखी-सी वेलनेस की फीलिंग महसूस होगी. आप खुद को थोड़ा ज्यादा उत्साहित व उर्जावान पायेंगे और आपका दिन बेहतर गुजरेगा. ऐसे भी अंग्रेजी में कहते हैं, ‘मॉर्निंग शोज दि डे’  और यह भी कि ‘वेल बिगन इज हाफ डन’   

इतिहास गवाह है कि महान व्यक्तियों की जिन्दगी इन्हीं बातों को जानते-समझते हुए कार्य करते रहने और रोज खुद को उन्नत करते जाने की यात्रा रही है. उन्होंने खुद से प्यार करना सीखा और विपरीत परिस्थिति में भी खुद पर भरोसा कम नहीं होने दिया. असफलता के दौर में भी उन्होंने खुद से प्यार करना नहीं छोड़ा, अपितु उन पलों में वे आलोचना, आरोप, अपशब्द आदि से अविचलित रह कर अपने से और ज्यादा जुड़े,  अपने को एक सच्चे दोस्त की भांति संभाला और  खुद की हौसला आफजाई भी की. 

हाँ, यह सही है कि  खुद को  रोज उन्नत करते जाना, खुद अपने साथ हर परिस्थिति में मजबूती से खड़े रहना आसान नहीं है, लेकिन यह नामुमकिन भी नहीं है. तभी तो राष्ट्र कवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ कहते है, 

“ खम ठोक ठेलता है जब नर, पर्वत के जाते पांव उखड़; 
मानव जब जोर लगाता है, पत्थर पानी बन जाता है ....” 

हम सभी जानते हैं कि कुछ पाने के लिए कुछ करना पड़ता है. अतः दिन की शुरुआत आशा और उत्साह के साथ करें ; संकल्प और पूरे सामर्थ्य के साथ करें. सुबह का एक घंटा खुद पर इन्वेस्ट करें – खुद को शारीरिक एवं मानसिक रूप से पूर्णतः तैयार करने के लिए. लेकिन सवाल है, यह सब कैसे करें ? 60 मिनट को तीन हिस्से में बांट लें. सुबह जागने के बाद पहले बीस मिनट में शौच आदि से निवृत हो लें. फिर अगले चरण में शरीर की जड़ता को, जो रात भर सोने के कारण स्वभाविक रूप से महसूस होती है, सामान्य व्यायाम अथवा पवनमुक्तासन से दूर करें. तत्पश्चात अगले बीस मिनट में प्राणायाम और ध्यान का निष्ठापूर्वक अभ्यास कर लें. नियमित रूप से सुबह के इस एक घंटे का आस्थापूर्वक सदुपयोग करने पर आप जल्द ही खुद को काफी बेहतर अवस्था में पायेंगे. रोजमर्रा के जीवन में समस्याओं को देखने एवं उनसे निबटने का आपका नजरिया ज्यादा सकारात्मक होता जाएगा और समाधान तक पहुंचना आसान  भी. इससे आपके कार्यक्षमता में वृद्धि होगी तथा आपकी उत्पादकता में गुणात्मक सुधार भी. परिणाम स्वरुप अव्वल तो आप और ज्यादा अच्छा महसूस करेंगे, दूसरे खुद से और ज्यादा प्यार करने लगेंगे और खुद पर आपका भरोसा और सुदृढ़ होगा. और तब आप अनायास ही गुनगुना उठेंगे : 

हम हैं राही प्यार के ... या यह कविता भी : हममें  भी है दम, बढ़ चले अब हमारे भी कदम ...
                                                                                (hellomilansinha@gmail.com)
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# बैंक ऑफ़ इंडिया की गृह पत्रिका "तारांगण" के दिसम्बर'16 अंक में प्रकाशित 
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Tuesday, April 11, 2017

आज की कविता : क्या होगा ?

                                                                                             - मिलन सिन्हा 

किसी से कुछ लेते वक्त
जरा सोचें तो
किसी को कुछ देते वक्त
जरा भी न सोचें तो
होगा तो कुछ जरुर
क्या होगा ?
फुरसत में कभी सोचें तो.

                                                                           (hellomilansinha@gmail.com)

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यात्रा के रंग : अब पुरी में -4 ‘श्री जगन्नाथ मंदिर’ और उसके आसपास -1

                                                                                           - मिलन सिन्हा 
गतांक से आगे... पुरी में सागर तट के पास स्थित अपने होटल में सुबह-सुबह स्नानादि से निवृत होकर हम चल पड़े विश्व प्रसिद्ध श्री जगन्नाथ मंदिर की ओर. यहां से मंदिर जाने के एकाधिक मार्ग हैं. हमने गलियों से गुजरते रास्ते  को चुना जिससे वहां के सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश की कुछ झलक मिल सके. गलियां आवासीय मकानों के बीच से होती हुई निकलती हैं. कस्बाई रहन-सहन. लोग सीधे-सादे. आपस में सटे-सटे ज्यादातर एक मंजिला- दो मंजिला मकान. कुछेक घरों में सामने के एक-दो कमरों में चलते दुकान. इन दुकानों में आम जरुरत की चीजें सुलभ हैं. यहाँ के निवासियों के अलावे सामान्यतः ऐसे गलियों का इस्तेमाल मंदिर तक पैदल आने-जाने वाले भक्तगण करते हैं. गलियों में टीका-चंदन लगाये खाली पैर चलते अनेक लोग दिखते हैं. स्थानीय उड़िया भाषा के अलावे पुरी के आम लोग हिन्दी और बांग्ला भाषा समझ लेते हैं, कई लोग बोल भी लेते हैं. 

मंदिर के आसपास फैले बाजार में पूजा-अर्चना की सामग्री से लेकर पीतल-तांबा-एलुमिनियम-लोहा-चांदी आदि के बर्तन व सजावट की वस्तुएं फुटपाथ तथा बड़े दुकानों में मिलती हैं. हैंडलूम के कपड़े एवं पोशाक का एक बड़ा बाजार है पुरी. यहां की बोमकई, संबलपुर एवं कटकी साडियां महिला पर्यटकों को काफी पसंद आती हैं. इसके अलावे हेंडीक्राफ्ट के कई अच्छे कलेक्शन भी उपलब्ध हैं. सुबह से रात तक यहाँ बहुत चहल-पहल रहती है. पर्व -त्यौहार  के अवसर पर तो यहाँ बहुत भीड़ और चहल-पहल  होना स्वभाविक है. मंदिर  के सामने यातायात को कंट्रोल करते कई पुलिसवाले हैं. यहां-वहां चौपाया पशु भी दिखते हैं.

बताते चलें कि पुरी में दूध से बनी मिठाइयों की क्वालिटी बहुत अच्छी है और ये सस्ती भी हैं. इससे यह अनुमान लगाना सहज है कि पुरी और उसके आसपास दूध प्रचूर मात्रा में उपलब्ध है. हो भी क्यों नहीं, हमारे श्री जगन्नाथ अर्थात श्री कृष्ण अर्थात श्री गोपाल को दूध, दही, मक्खन इतना पसंद जो रहा है. फिर, उनके असंख्य भक्तों के पीछे रहने का सवाल कहां. हाँ, एक बात और. मौका  मिले तो राबड़ी, रसगुल्ला व दही का स्वाद जरुर लें. मंदिर के आसपास इनकी कई दुकानें हैं.  

करीब चार लाख वर्ग फुट क्षेत्र में फैले श्री जगन्नाथ मंदिर परिसर में प्रवेश के लिए सुरक्षा के मानदंडों का पालन अनिवार्य है. मोबाइल, कैमरा आदि बाहर बने काउंटर पर जमा करके ही अन्दर जाने की अनुमति है. मंदिर में प्रवेश के लिए चार द्वार हैं. पूर्व दिशा में स्थित है सिंह द्वार, जिसे मंदिर का मुख्य द्वार भी कहते हैं. पश्चिम द्वार को बाघ द्वार, उत्तर को हाथी द्वार और दक्षिण ओर स्थित द्वार को अश्व द्वार कहा जाता है.
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Thursday, March 23, 2017

प्रेरक प्रसंग : नमक और सत्याग्रह

                                                                                   - मिलन सिन्हा 
मात्र 11 वर्ष की उम्र में ही राममनोहर लोहिया अपने पिता श्री हीरालाल लोहिया के साथ गाँधी जी से पहली बार मिले थे. पिता तो गाँधी भक्त थे ही, पुत्र  भी प्रथम दर्शन में ही प्रभावित  हुए. फिर तो लोहिया जी ने अपनी शक्ति और बुद्धि के अनुसार राजनीति में प्रवेश के अपने प्रथम चरण में बी. ए. पास करने तक देश में गाँधी जी के नेतृत्व में चल रहे आन्दोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई. उसके बाद बर्लिन में अपने शोधकार्य के दौरान भी उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण अवसरों पर गाँधी जी के कार्यक्रमों एवं देश में चल रहे स्वतंत्रता संग्राम के औचित्य की सशक्त वकालत की. गाँधी जी के प्रति उनकी श्रद्धा एवं उनके कार्यक्रमों के प्रति उनकी आस्था का इससे अच्छा और क्या प्रमाण होगा कि लोहिया जी ने 'नमक और सत्याग्रह' विषय पर वर्ष 1932 में अपना शोध प्रबंध पूरा कर बर्लिन विश्वविद्द्यालय से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की. 
                                                                                 (hellomilansinha@gmail.com)
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डॉ. राममनोहर लोहिया  के  जन्मदिन  के अवसर पर 
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