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Sunday, April 1, 2018

यात्रा के रंग : भारत-चीन सीमा की ओर -7 (लौटने का क्रम)

                                                                                        - मिलन सिन्हा
गतांग से आगे ... ...  वहां से लौटते हुए भी कई स्थानों पर रुकने की इच्छा हो रही थी, लेकिन ड्राईवर ने यह कह कर मना  किया कि आगे सोमगो अर्थात छान्गू झील पर ज्यादा वक्त गुजारना  बेहतर होगा. सही कहा था उसने.  ऐसा सोमगो अर्थात छान्गू झील पहुंचने पर हमें लगने लगा. 

ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों के बीच में मुख्य सड़क के बिलकुल बगल में है यह लम्बा खूबसूरत  झील. गाड़ी रुकते ही हम उतर कर झील के किनारे पहुंच गए. तुरत ही सामने से बड़ा-सा काला-सफ़ेद याक आ पहुंचा. याक की आंखें कुछ बोल रही थी, शायद यह कि यहां आये हैं तो मेरी सवारी का भी आनन्द ले लीजिए, अच्छा लगेगा आपको और मुझे भी. मेरा मालिक भी खुश होगा और आपके  जाने के बाद मुझे सहलायेगा, प्यार से खिलायेगा .... हमारे मालिक के लिए यह आमदनी का छोटा जरिया है, क्यों कि साल के कुछ ही महीने आप जैसे पर्यटक आ पाते हैं यहाँ... कहते हैं, बच्चे भगवान का रूप होते हैं, मन की बात खूब समझते हैं. याक भी कैसे अपनी भावना उनसे छुपा पाता. तो बच्चे याक की सवारी के लिए मचलने लगे. युवा और महिलायें भी साथ हो लिए. एक-एक कर सब सवारी का मजा ले रहे थे. फोटो सेशन भी हुआ. सेल्फी का दौर तो चलना ही था. बताते चलें कि याक के सींगों को कलात्मक ढंग से रंगीन कपड़ों से सजाया गया था. उसके पीठ पर रखा हुआ गद्दा भी सुन्दर लग रहा था. 


दिन ढल रहा था, पहाड़ों पर फैले बर्फ की चादरों का रंग बदलता जा रहा था, गंगटोक लौटने वाली गाड़ियां लम्बी कतार में खड़ी थीं, ठंढ से ठिठुरते लोगों की भीड़ चाय-काफी की दुकानों में लगी थी, बच्चे दोबारा याक की सवारी की जिद कर रहे थे... सच कहें तो मनोरम दृश्य के बीच ये सारी बातें फील गुड, फील हैप्पी का एहसास करवा रही थी. अंधेरा होने से पहले गंगटोक पहुंचने की बाध्यता नहीं होती तो किसे लौटने की जल्दी होती ! खैर, गाड़ी में आ बैठे हम मन-ही-मन यह दोहराते हुए : जल्दी ही आऊंगा फिर एक बार, देखेंगे-सीखेंगे और भी बहुत कुछ, करेंगे हर किसी से बातें भी दो-चार... …         (hellomilansinha@gmail.com)                                                                                                
                         और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।
# साहित्यिक पत्रिका 'नई धारा' में प्रकाशित 
#For Motivational Articles in English, pl. visit my site : www.milanksinha.com

Friday, March 16, 2018

यात्रा के रंग : भारत-चीन सीमा की ओर -6 (अब बाबा मंदिर...)

                                                                                                 - मिलन सिन्हा 

गतांक से आगे ... ...  ड्राईवर गाड़ी बढ़ा चुका था उल्टी दिशा में यानी गंगटोक की ओर. रास्ते में बाबा मंदिर और सोमगो अर्थात छान्गू झील पर भी तो हमें रुकना था. 
बस दस मिनट में हम आ गए बाबा मंदिर,  बीच में एक स्थान पर रुकते हुए. रुकने का सबब यह था कि सड़क के दोनों ओर पहाड़ की तलहटी तक बर्फ फैला था और हम सबों का मन बच्चों की तरह मचल रहा था, बर्फ से खेलने को; फोटो खिचवाने को. बर्फ की बहुत मोटी परत यहां से वहां सफ़ेद मोटे बिछावन की तरह बिछी हुई थी. अदभुत.



चारों ओर बर्फ ही बर्फ. हिमपात जारी था, सो बहुत दूर तक साफ़ देखना कठिन हो रहा था. ठंढ भी उतनी ही. खैर, बच्चों और युवाओं ने तो बहुत धमाचौकड़ी और मस्ती की. बर्फ के बॉल बना-बनाकर एक-दूसरे पर निशाना साधा गया. कुछ लोग पहाड़ पर थोड़े ऊपर तक फिसलते हुए चढ़े भी. सेल्फी का दौर भी खूब चला. बड़े –बुजुर्गों ने भी बर्फ पर बैठकर-लेटकर उस पल का आनंद लिया और कुछ फोटो खिंचवाए, कुछ खींचे भी.तभी हमारी नजर भारत तिब्बत सीमा पुलिस के एक बोर्ड पर पड़ी. लिखा था, “ ताकत वतन की हमसे है, हिम्मत वतन की हमसे है....” सच ही लिखा है. ऐसे कठिन परिस्थिति में अहर्निश देश सेवा वाकई काबिले तारीफ़ है. 


इधर, सड़क किनारे खड़ी गाड़ी में बैठे ड्राईवर हॉर्न बजा-बजा कर हमें जल्दी लौटने का रिमाइंडर देते रहे. सो इन अप्रतिम दृश्यों को आँखों और कैमरे में समेटे हम लौट आये.
  
बाबा मंदिर के पास पार्किंग स्थल पर बड़ी संख्या में सुस्ताते गाड़ियों को देखकर अंदाजा लग गया था कि मंदिर में काफी भीड़ होगी. अब हम मंदिर के बड़े से प्रांगण में आ गए थे. यहां तीन कमरों के समूह में बीच वाले हिस्से में बाबा हरभजन सिंह के मूर्ति स्थापित है और सामने दीवार पर उनका एक फोटो भी लगा है. बगल के एक कमरे में उनसे जुड़ी सामग्री मसलन उनकी वर्दी, कुरता, जूते, बिछावन आदि बहुत तरतीब से रखे गए हैं. पर्यटक और श्रद्धालु  उन्हें श्रद्धा  सुमन अर्पित कर निकल रहे थे. 



वहां से बाहर आते ही हमें सामने पहाड़ के बीचोबीच  शिव जी की एक बड़ी सी सफ़ेद मूर्ति दिखाई दी. दूर से भी बहुत आकर्षक लग रहा था. कुछ लोग पहाड़ी रास्ते से वहां भी पहुंच रहे थे. समयाभाव के कारण हम वहां न जा सके. हमें ड्राईवर दिलीप ने बताया कि सामान्यतः वैसे पर्यटक जिन्हें सिर्फ बाबा मंदिर तक आने का ही परमिट मिलता है, उनके पास थोड़ा ज्यादा वक्त होता है और उनमें से ही कुछ लोग ऊपर शिव जी की मूर्ति तक जाते हैं.   ...आगे जारी.   (hellomilansinha@gmail.com)                                                                                                
                         और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।
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Tuesday, March 13, 2018

यात्रा के रंग : भारत-चीन सीमा की ओर -5 (अब सीमा पर)

                                                                                                   - मिलन सिन्हा 
गतांक से आगे ...    तो अब गाड़ी से उतर कर हम चले वास्तविक भारत –चीन सीमा पर. इसके लिए सीढ़ियों से होकर ऊपर जाना पड़ता है. चूँकि रास्ते में जो हिमपात का सिलसिला शुरू हुआ था वह यहां पहुंचने पर और तेज हो गया था. सो, सीढ़ियां बर्फ से ढंक चुकी थी और  चलना  कठिन हो गया था. तेज हिमपात के कारण तापमान काफी गिर चुका था. ऑक्सीजन की कमी भी महसूस होने लगी थी. बावजूद इसके हमारा  हौसला बुलंद था. हम एक दूसरे का हाथ पकड़े धीरे –धीरे आगे बढ़ने लगे. बर्फ से ढंकी सीढ़ियों पर ऊपर की ओर जाने का यह अनुभव अपूर्व था. थोड़ा आगे बढ़ने  पर सेना के एक जवान ने हमें सुरक्षा एवं स्वास्थ्य संबंधी कुछ हिदायतें दी और हमारी हौसला आफजाई भी की. हमें अच्छा लगा, उत्साह में इजाफा हो गया. घुमावदार  रास्ते से ऊपर जाना था. बच्चे और युवा तेजी से आगे बढ़ रहे थे. बुजुर्ग धीरे-धीरे और रुक-रुक कर. ऑक्सीजन की कमी से दम फूल रहा था. इस रास्ते चलते हुए बेनीपुरी जी की लिखी एक बात याद आ गई – जवानी की राह फिसलनभरी होती है. हालांकि यहां तो बर्फ के रास्ते  फिसलनभरे साबित हो रहे थे. नीचे बर्फ, निरंतर  हिमपात और ऊपर से बहती ठंढी हवा. कुल मिलाकर हाथ-पांव ही नहीं पूरा शरीर ठंड से ठिठुरने लगा. तभी दो कदम ऊपर एक छोटा- सा कमरा  दिखा जहां लोग अंदर-बाहर कर रहे थे. हम लपक कर उस कमरे के अंदर गए. आश्चर्य हुआ. वह एक छोटा रेस्टोरेंट था जहां चाय-कॉफ़ी के अलावे समोसा, बिस्कुट आदि भी बिक रहा था. देख कर हमें बहुत खुशी हुई. उस मौसम में उस ऊंचाई पर यह सब उपलब्ध होना आशातीत था. झट से कॉफ़ी का गर्म गिलास लिया और पहली चुस्की ली. कॉफ़ी अच्छी थी. बेशक स्वाद कुछ अलग सा लगा. पूछने पर पता चला कि यहां याक के दूध का ही प्रयोग होता है. रास्ते में कई स्थानों पर याक दिखाई तो पड़े थे, पर यह मालूम न था कि इस इलाके में याक के दूध ही बहुतायत में उपलब्ध हैं और सामान्यतः उसी का उपयोग किया जाता है. कहा जाता है कि शारीरिक तापमान एवं रक्तचाप को ठीक बनाए रखने में कॉफ़ी बहुत लाभदायक है.

कॉफ़ी आदि लेने एवं वहां थोड़ी देर रुकने पर शरीर में उर्जा और उत्साह फिर से भर गया और हम निकल पड़े कठिनतर रास्ते से ऊपर पहुंचने को. निकलते ही रास्ते में उक्त रेस्टोरेंट के बगल में एक और कमरा दिखा जिसके बाहर चिकित्सा सुविधा कक्ष लिखा था. वहां सेना के मेडिकल स्टाफ ऑक्सीजन सिलिंडर एवं जरुरी दवाइयों के साथ मुस्तैद थे. हमें  बहुत सकून मिला; हम थोड़ा और आश्वस्त हुए. मन-ही-मन भारतीय सेना के जज्बे को सलाम करते हुए हम आगे बढ़ चले. आगे बढ़ने में दिक्कत तो हो रही थी, परन्तु ऊपर सीमा पर लहराता तिरंगा और उसकी आन-बान-शान को अक्षुण्य बनाये रखने को सर्वदा तत्पर एवं मुस्तैद भारतीय सेना के जवानों को  देखते तथा प्रेरित होते हुए आखिरकार हम पहुंच गए नाथू ला के भारत –चीन सीमा पोस्ट पर. हम सभी बहुत रोमांचित थे. आसपास सिर्फ बर्फ ही बर्फ. दूर जहां तक नजर गई, सभी पहाड़ बर्फ से आच्छादित थे. छोटे-छोटे सफ़ेद-भूरे बादल सर के ऊपर से आ-जा रहे थे. उनके लिए सीमा का बंधन जो नहीं था. इस अभूतपूर्व प्राकृतिक दृश्य के हम भी गवाह बन पाए, इसकी खुशी थी. 

14200 फीट ऊँचे बर्फ से ढंके पहाड़ पर कांटे तार की जाली से सीमा निर्धारित थी. इस पार  हमारे सैनिक गश्त लगा रहे थे तो उस पार चीनी सेना के जवान. वहां तैनात एक-दो जवानों से हमारी थोड़ी बातचीत हुई; देश को सुरक्षित रखने के लिए हमने उनके प्रति आभार व्यक्त किया और उन्हें शुभकामनाएं दी. सच मानिए, वहां खड़े होकर हमारे मन में न जाने कितने अच्छे ख्याल आ रहे थे. मसलन, दुनिया के छोटे-बड़े सभी  देश अगर एक दूसरे की भौगोलिक सीमा का पूरा सम्मान करे तो हर देश के रक्षा बजट में कितनी कमी आ जाय; उन पैसों का इस्तेमाल अगर गरीबी, बीमारी, भूखमारी आदि के उन्मूलन के लिए किया जाय तो विश्व के सारे देश मानव विकास सूचकांक में कितना आगे बढ़ जाएं.... ....

बहरहाल, यथार्थ  में लौटते हुए ध्यान आया कि हमारे गाड़ी के चालक ने घंटे भर के अन्दर लौट आने के लिए कहा था. तो हम लौटने के लिए तत्पर हुए. हिमाच्छादित पहाड़ से नीचे उतरना भी कम जोखिम भरा नहीं होता है. इस अनुभव से हम गुजर रहे थे. हमसे थोड़ा  आगे चलते एक युवा दंपति को अभी-अभी फिसलते एवं चोटिल होते देखा था. वो तो उनके साथ चलते लोगों ने उन्हें बीच में ही सम्हाल लिया, नहीं तो बड़ी क्षति हो सकती थी. खैर, साथी हाथ बढ़ाना की भावना को साकार करते हुए एक दूसरे का हाथ पकड़ कर बहुत धीरे-धीरे हम नीचे तक सुरक्षित आ गए. हमारे सह-यात्री भी आ चुके थे. गाड़ी में बैठे तो शुरू हो गई बातें  सीमा पर  बिताये उन यादगार पलों की.  ...आगे जारी.   (hellomilansinha@gmail.com)                                                                                                
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Monday, March 5, 2018

यात्रा के रंग : भारत-चीन सीमा की ओर -4 (अब नाथू ला के करीब...)

                                                                                     - मिलन सिन्हा 
गतांक से आगे ...     बाबा मंदिर “नाथू ला पास”  से लगभग 4 किलोमीटर की दूरी  पर नाथू ला और जेलेप ला के बीच नाथू ला-गंगटोक मुख्य सड़क के निकट ही है. करीब 13,100 फीट की ऊंचाई पर स्थित  यह किसी देवी –देवता का मंदिर नहीं है. कहा जाता है कि बाबा मंदिर का निर्माण पंजाब  रेजीमेंट के एक जवान हरभजन सिंह की स्मृति में सेना के जवानों ने किया. बताया जाता है कि  वर्ष 1968  के जाड़े के मौसम में एक दिन कुछ पहाड़ी जानवरों को नदी पार करवाते समय एक हादसे में हरभजन सिंह नदी में डूब गए. साथी जवानों ने खोज की, पर वे मिले नहीं. फिर एक रात वे एक जवान के सपने में आये और बताया कि हादसे के बाद बर्फ में दब कर उनकी मौत हो गई है. दिलचस्प बात है कि सपने में बताये गए स्थान पर ही उनका शव मिला. सपने में ही साथी जवान से उन्होंने इच्छा व्यक्त की कि उसी स्थान पर उनकी समाधि बनाई जाय. बाद में सेना के जवानों के द्वारा  उसी स्थान पर उनकी समाधि का निर्माण किया गया. बाबा मंदिर का निर्माण उसके कुछ अरसे बाद समाधि स्थल से थोड़ी दूर पर किया गया. स्वर्गीय हरभजन सिंह से जुड़ी कई बातें वहां के लोग अब तक रूचि लेकर साझा करते हैं.


आगे बढ़ने पर हमें मुख्य रास्ते के बिलकुल पास बैंक ऑफ़ इंडिया का एटीम दिखा -13200 फीट की ऊंचाई पर. बहुत अच्छा लगा. हमारे एक सह यात्री ने ड्राईवर से दो मिनट रुकने का अनुरोध किया. वे एटीम की ओर लपके और जल्द ही पेमेंट लेकर लौटे. वे बेहद खुश थे क्यों कि उन्हें पैसे की जरुरत थी, लेकिन यह उम्मीद नहीं थी कि इस स्थान पर एटीम होगा और बिना किसी दिक्कत के पेमेंट सुलभ होगा. थोड़ी दूर आगे बढ़ने पर सड़क किनारे बॉर्डर रोड आर्गेनाईजेशन (बीआरओ) के एक हरे बोर्ड पर नजर पड़ी. लिखा था - “नाथू ला पास” तीन किलोमीटर दूर अर्थात अब हम अपनी मंजिल पर  पहुंचनेवाले थे. गाड़ी से उतरने से पहले ही ड्राईवर ने बताया कि  आगे बोर्ड पर जो कुछ लिखा है उसको फॉलो करना अनिवार्य है. इसके  मुताबिक़ आपको अपना कैमरा, मोबाइल फ़ोन आदि वहां नहीं ले जाना है अर्थात फोटो लेना वर्जित है. आप अगर बीपी, दमा आदि  के मरीज हैं तो डॉक्टर की सलाह से ही वहां जाएं, क्यों कि 14200 फीट की ऊंचाई पर स्थित इस स्थान पर चारों ओर बर्फ ही बर्फ रहता है, और तापमान एवं ऑक्सीजन काफी कम.

“नाथू ला” कई मामलों में बहुत अहम है. आइये जानते हैं. 1950 में चीन द्वारा कब्ज़ा किये गए देश तिब्बत के दक्षिणी भाग में स्थित चुम्बी घाटी को भारत के सिक्किम प्रदेश से जोड़ने वाला स्थान “नाथू ला” है. यह हिमालय रेंज का पहाड़ी दर्रा है जिसके जरिए भारत  एवं चीन (चीन अधिकृत तिब्बत भी) के बीच अनेक वर्षों से व्यापार होते रहे. यह सिल्क रूट के नाम से जाना जाता रहा है. वर्ष 1958 में देश के प्रथम प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरु ने इस स्थान का दौरा किया. हाँ, 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद यह व्यापार मार्ग करीब 44 वर्षों तक बंद रहा. 2006 में इसे फिर खोला गया. कहते हैं कि प्राचीन काल में भारत आनेवाले ज्यादातर तिब्बती एवं चीनी पर्यटक तथा व्यवसायी इसी रास्ते का इस्तेमाल करते थे. एक बात और. कैलाश मानसरोवर तक जाने का यह ज्यादा सुगम मार्ग है, खासकर बुजुर्ग और बीमार तीर्थ यात्रियों के लिए, क्यों कि इस रास्ते यात्रियों  को कम समय लगता है और वे इस रास्ते मोटर गाड़ी से भी जा सकते हैं. वर्ष 2015 और 2016 में परम्परागत उत्तराखंड के लिपुलेख मार्ग के अलावे इस मार्ग का भी उपयोग किया गया. पिछले कुछ दिनों से भारत-चीन के बीच सीमा पर बढ़ते तनाव के मद्देनजर इस वर्ष (2017) तीर्थ यात्री नाथू ला होकर कैलाश मानसरोवर नहीं जा सके. आशा करनी चाहिए कि भविष्य में इस रास्ते को सामान्य आवागमन के लिए खोला जाएगा.  ...आगे जारी.   (hellomilansinha@gmail.com)                                                                                                
                         और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।
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Wednesday, February 28, 2018

यात्रा के रंग : भारत-चीन सीमा की ओर -3 (अब छान्गू झील के नजदीक...)

                                                                                                        - मिलन सिन्हा 
गतांक से आगे... यहाँ तक पहुंचने में हमें करीब तीन घंटे लगे. गत रात बारिश हुई थी, सो एक-दो जगह पर भू-स्खलन के कारण सड़क में अवरोध था जिसे ठीक करने में बॉर्डर रोड आर्गेनाईजेशन के कर्मी लगे हुए थे, फिर भी गाड़ियां धीरे –धीरे आगे बढ़ रही थी. हां, एक-दो बार गाड़ी थोड़ी देर के लिए रुकी जरुर. अच्छा ही हुआ. नीचे उतर कर चारों ओर देखने का एक मौका जो मिला. आगे –पीछे अनेक गाड़ियां थी, पर कोई हल्ला-गुल्ला नहीं था. ज्यादातर यात्री गाड़ियों  में ही बैठे थे. एक ओर ऊँचे पहाड़ और दूसरी ओर गहरी खाई. नजदीक से देखें तो चक्कर आ जाए. ड्राईवर ने दिखाया और बताया कि वह जो दूर ऊपर अलग-अलग ऊंचाई के सांपनुमा सड़क पर कई गाड़ियों के झुण्ड रेंगते दिख रहे हैं, उधर से ही हमें भी जाना है. सोचकर थोड़ा डर तो लगा, पर रोमांच की अनुभूति ज्यादा हुई.

यहाँ मतलब छान्गू झील के पास तक पहुंचने से कुछ देर पहले ही रिमझिम बारिश शुरू हो चुकी थी. लिहाजा ग्रीष्म काल में भी ठंढ का एह्साह होने लगा और स्वीटर के ऊपर गर्म जैकट भी चढ़ गया; कनटोप और मफलर भी निकल गया. ड्राईवर ने सिर्फ 10 मिनट का ब्रेक दिया जिससे कि लोग वाशरूम जा सकें; चाय-काफी पी सकें. ऐसा इसलिए कि हमारे मुख्य लक्ष्य अर्थात “नाथू ला पास”  तक जल्दी पहुंचना पहली प्राथमिकता थी, जो यहाँ से करीब 16 किलोमीटर की दूरी पर है.  मौसम का कोई भरोसा जो नहीं था और बर्फ़बारी  भी शुरू हो चुकी थी. “नाथू ला पास” से लौटते वक्त छान्गू झील के पास ज्यादा देर तक रुकने का वादा ड्राईवर ने किया और गाड़ी आगे की ओर ले चला.

यहां यह जानना लाभदायक है कि “नाथू ला पास” जल्दी पहुंचने के फायदे भी कम नहीं. पहले तो गाड़ी पार्क करने में सुविधा, दूसरे वहां थोड़ा ज्यादा समय बिताने का अवसर, तीसरे शाम होने से पहले गंगटोक लौटने में आसानी और लौटते हुए बर्फ से आच्छादित कई स्थानों पर रुक कर फोटो खिचवाने का मौका. ऐसे हम भी समझ रहे थे कि सभी ड्राईवर ऐसी बातें करते हैं जिससे कि वे सीमित समय के भीतर यह टूर पूरा कर सकें. ऐसे इसमें गलत भी कुछ नहीं है. यात्री भी तो योजनानुसार टूर पूरा करना चाहते हैं, क्यों?

बहरहाल, चलते-चलते हम सोमगो अर्थात छान्गू झील के बारे में कुछ जान लेते हैं. यह स्थान समुद्र तल से 12300 फीट की ऊंचाई पर अवस्थित है.  करीब एक किलोमीटर लम्बा  एवं लगभग 50 फीट गहरा  छान्गू झील चारों ओर से ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों से घिरा हुआ है. ये पहाड़ साल में छः महीने से ज्यादा समय सफ़ेद बर्फ से आच्छादित रहते हैं. सोमगो का अर्थ होता है जल का स्रोत. पहाड़ों पर जमनेवाले बर्फ के पिघलने से इस झील  में पानी सालों भर रहता है. बेशक जाड़े के मौसम के अलावे भी तापमान ज्यादा गिर जाने से कई बार झील का पानी बर्फ से ढंक जाता है. ग्रीष्म एवं शरद काल में यहाँ कई तरह के मोहक फूल दिखाई पड़ते हैं, जो इस पूरे इलाके को और भी खूबसूरत बना देता है. शीतकाल में बड़ी संख्या में प्रवासी पक्षियों  को यहाँ देखा जा सकता है.

गाड़ी आगे बढ़ चली. पहाड़ों पर अब ज्यादा बर्फ दिखने लगे थे. आगे बीच-बीच में  यहां-वहां  सड़क मरम्मत का काम चल रहा था. बारिश के मौसम में पहाड़ी इलाकों में ऐसे दृश्य सामान्य हैं. आगे बढ़ने पर ड्राईवर ने बताया कि बस पास में ही है प्रसिद्ध बाबा मंदिर. लौटते वक्त यहां भी रुकेंगे, इस मंदिर को  देखेंगे. आइए, तब तक जान लेते है इस मंदिर के विषय में कुछ रोचक बातें. ....आगे जारी...   (hellomilansinha@gmail.com)                                                                                                
                       और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।
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Monday, February 26, 2018

यात्रा के रंग : भारत-चीन सीमा की ओर -2

                                                                                                         - मिलन  सिन्हा
गतांक से आगे...     सीमा सड़क संगठन (बॉर्डर रोड आर्गेनाईजेशन) के अंतर्गत आनेवाले  घुमावदार पहाड़ी सड़क पर अब हम धीरे धीरे भारत-चीन सीमा की ओर बढ़ रहे थे. इस स्थान को “नाथू ला पास” के रूप में जाना जाता है. गंगटोक से यहाँ की दूरी करीब 56 किलोमीटर है और समुद्र तल से इसकी ऊंचाई लगभग 14200 फीट है. बॉर्डर तक जाने के लिए यात्रा से एक दिन पहले सिक्किम सरकार से विशेष परमिट (पास) लेना अनिवार्य है. उधर जाने वाली प्रत्येक गाड़ी को भी परमिट लेना पड़ता है, बेशक गाड़ियां नाथू ला से पहले के एक-दो पर्यटक स्थान से होकर ही क्यों न लौट आये. परमिट बनवाने के लिए गंगटोक के प्रसिद्ध एम. जी. रोड पर स्थित सिक्किम टूरिज्म के ऑफिस या किसी भी अधिकृत टूर ऑपरेटर से संपर्क किया जा सकता है. हमारे ड्राईवर ने बताया कि हर दिन छोटी–बड़ी गाड़ियों का एक बड़ा काफिला, जिसकी संख्या स्थानीय प्रशासन द्वारा सुरक्षा सहित कई अन्य मामलों को ध्यान में रख कर तय किया जाता है, उस दिशा में जाता है. ऐसे, प्रशासन की यह कोशिश होती है कि ज्यादातर बड़ी गाड़ियां – सूमो, बोलेरो, स्कार्पियो आदि को तरजीह दी जाय जिससे कि ज्यादा लोग वहां तक जा सकें और वहां के सीमित पार्किंग स्पेस में गाड़ियों को पार्क किया जा सके; किसी भी तरह के जाम से बचा जा सके. 

जैसे –जैसे हम आगे बढ़ रहे थे, हमें निरंतर एक पहाड़ी सड़क से अगले ऊंची सड़क पर पहुंचने का एहसास और रोमांच हो रहा था. दिलचस्प बात यह थी कि उल्टी दिशा से न के बराबर गाड़ी आ रही थी. कारण यह बताया गया कि सेना या प्रशासन की एक्का-दुक्का गाड़ियों को छोड़ कर सुबह के समय सभी गाड़ियां ऊपर की ओर जाती हैं और अपराह्न में वही गाड़ियां गंगटोक की ओर लौटती हैं. लिहाजा पहाड़ी सड़क में निरंतर घुमावदार रास्ते से चलने की बाध्यता के बावजूद भी गाड़ियां थोड़ी तेज ही चल रहीं थी. चालकों का दक्ष होना भी बड़ा कारण हो सकता है. रास्ते में हमें कहीं- कहीं सेना के पोस्ट एवं छावनी दिखाई पड़े. स्वभाविक रूप से वे इलाके ज्यादा साफ़ और व्यवस्थित लगे. 

पेड़-पौधों से आच्छादित ऊँचें-ऊँचे पहाड़ों के साथ और दूर ऊपर के रास्तों में आगे बढ़ते गाड़ियों की कतार को देख कर यह उम्मीद तो कायम थी कि हम आज “नाथू ला पास” और उसके नजदीक के अन्य दर्शनीय स्थानों का लुफ्त उठा पायेंगे. उस ऊंचाई पर पहाड़ों को हिमाच्छादित देखने का कौतुहल तो था ही. चालक ने बताया कि आज आगे ऊँचे  पहाड़ों पर हिमपात की संभावना है, कारण कल रात भी बारिश  हुई है और मौसम का मिजाज बता रहा है कि आगे हमें इसका आनंद लेने का मौका मिल जाएगा. ऐसे, अगर हिमपात होते हुए और पहाड़ों को बर्फ से ढंका देखने का अवसर मिल जाय, वह भी अप्रैल से सितम्बर के बीच तो समझिये आपका वहां जाना सफल हो गया, पैसा वसूल हो गया.

बहरहाल, नयनाभिराम प्राकृतिक दृश्यों का आनंद उठाते हुए हम आ पहुंचे गंगटोक से करीब 40 किलोमीटर की दूरी और करीब 7000 फीट ज्यादा ऊँचे स्थान पर अवस्थित  “सोमगो अर्थात छान्गू झील” के बिलकुल करीब. और अब हमें ऊँचें पहाड़ों पर यहां-वहां बर्फ के छोटे-छोटे चादर दिखने लगे. मन मचलने लगा ऐसे और भी दृश्य को आँखों और यादों में भरने को.          .... आगे  जारी ...             (hellomilansinha@gmail.com)                                                                                                
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Saturday, February 24, 2018

यात्रा के रंग : भारत-चीन सीमा की ओर -1

                                                                         - मिलन  सिन्हा
...गतांक से आगे... कहते हैं न कि ‘दिल है कि मानता नहीं’ या यूँ कहें कि यह दिल मांगे मोर. आखिर क्यों न मांगे ? सच तो यह है कि आपका, हमारा - सबका दिल कुछ और भी देखना चाहता है. दिल मांगे मोर.... तो हम सुबह-सुबह ही निकल पड़े एक बेहद रोमांचक यात्रा पर.

आज हमारे सारथी थे दिलीप, अपनी टाटा सूमो गाड़ी के साथ. गंगटोक में पले-बढ़े दिलीप अपने कॉलेज के दिनों और उसके बाद भी राजनीतिक कार्यकर्त्ता के रूप में काफी सक्रिय रहे. परिवार की जिम्मेदारी आने के बाद से वे इस काम में लगे हैं, लेकिन राजनीतिक रूप से पूर्णतः जागरूक हैं. उनके पास सिक्किम के सभी बड़े राजनीतिक पार्टियों और उनके सभी बड़े नेताओं के कार्य-कलाप की अच्छी और ताजा जानकारी है. मुझे ये बातें दिलीप से चंद मिनट की बातचीत से पता चल गया. ऐसे अभी उसकी पत्नी एक बड़े पार्टी की सक्रिय मेम्बर है. दिलीप के साथ वार्तालाप से मुझे मोटे तौर पर सिक्किमवासियों के रहन-सहन, खान-पान आदि के बाबत भी काफी जानकारी मिली. मसलन, सामान्यतः आम सिक्किमवासी सफाई पसंद है, बेटा-बेटी में फर्क नहीं करते, बच्चों की शिक्षा के प्रति जागरूक हैं, अधिकांश लोग मांसाहारी हैं, आदि. जानना दिलचस्प है कि 2011 के जनगणना के अनुसार सिक्किम में साक्षरता दर 82 प्रतिशत है, जो कि कर्नाटक, पश्चिम  बंगाल और तमिलनाडू से भी बेहतर है. उत्तर प्रदेश, ओड़िशा, झाड़खंड और  बिहार से तो बहुत आगे है. सिक्किम देश का पहला राज्य है जो खुले में शौच से मुक्त बना. जैविक खेती करने के मामले में भी सिक्किम को देश का पहला राज्य बनने का गौरव प्राप्त है. 

गंगटोक से बाहर निकलते ही जवाहरलाल रोड पर हमें दो चेक पोस्ट पर रुकना पड़ा. सभी गाड़ियों को रुकना पड़ता है वहां.  उस रास्ते से भारत –चीन सीमा की ओर जानेवाले हर यात्री के पहचान पत्र और परमिट की पूरी जांच होती है –नियमपूर्वक बिना किसी भेदभाव के और बिना किसी लेनदेन के. गाड़ी के चालकों के लिए यह उनके रूटीन का हिस्सा है, लेकिन पर्यटकों के लिए एक नया अनुभव. हमारे गाड़ी के मालिक -सह-चालक दिलीप ने बताया कि जितनी गाड़ियां और जितने यात्री सुबह इधर से सीमा की ओर जाते हैं, वे सभी गाड़ियां एवं यात्री शाम को उधर से वापस आये कि नहीं इसका पूरा हिसाब रक्खा जाता है. कहीं  हेरफेर होने पर तुरत उसका संज्ञान लिया जाता है, त्वरित कार्रवाई की जाती है. हो भी क्यों नहीं, आखिर देश की सुरक्षा के साथ-साथ एक-एक यात्री की सुरक्षा-संरक्षा  का सवाल जो है.        .... आगे  जारी ...             (hellomilansinha@gmail.com)                                                                                                
                       और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।
# साहित्यिक पत्रिका 'नई धारा' में प्रकाशित
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Sunday, October 1, 2017

यात्रा के रंग : गंगटोक और आसपास -5- अब शान्ति व्यू पॉइंट और ...

                                                                                          -मिलन सिन्हा
...गतांक से आगे... हल्का नाश्ता करने के बाद हम नीचे उतरने लगे तो राजू ने बताया कि इसी रास्ते में थोड़ी  दूर पर विख्यात ‘जवाहरलाल नेहरु बोटानिकल  गार्डन’ है. जल्द ही हम वहां पहुंच गए. यह गार्डन एक बड़े से परिसर में है, जिसका देखरेख सरकार का वन विभाग करता है. इस परिसर का माहौल खुशनुमा है. यहां आप अनेक प्रकार के आर्किड का आनंद ले सकते हैं. ओक सहित अन्य अनेक दुर्लभ प्रजाति के पेड़-पौधों के बीच वक्त कैसे गुजर जाता है, पता ही नहीं चलता. 

रोचक तथ्य ये भी कि इतना पैदल चलने पर भी आप ज्यादा नहीं थकते, कारण रोजमर्रा की भागदौड़ की जिंदगी से इतर आपको प्रकृति के साथ वक्त गुजरना अच्छा लगता है और आप ऑक्सीजन अर्थात प्राण-वायु से भरे भी तो रहते हैं. 

आगे हमारी गाड़ी “शान्ति व्यू पॉइंट” पर आ कर रुकी. इस स्थान से आप पूरे गंगटोक का एक बेहद खूबसूरत दृश्य देख सकते हैं. पहाड़ों के विस्तारित श्रृंखला में पूरे गंगटोक शहर और उसके आसपास फैले छोटे-बड़े इलाके का ऐसा विहंगम दृश्य शायद शान्ति व्यू पॉइंट  से ही शान्ति और सकून से आप देख सकते हैं. सच कहें तो आप चाय की चुस्की लेते हुए घंटों यहाँ समय बिता सकते हैं. सो, हमने भी थोड़ा ज्यादा समय इस जगह के नाम किया, बेशक बीच-बीच में राजू की  दिलचस्प आपबीती सुनते हुए. 

सचमुच, यात्रा हमें बहुत कुछ दिखाती है, बहुत कुछ सिखाती-समझाती है. तभी तो कई बड़े लोगों ने अलग-अलग तरीके से  कहा है : दुनिया एक बड़ी किताब है और वे जो यात्रा नहीं करते सिर्फ कुछ पेज पढ़ कर ही रह जाते हैं.

शाम हो चली थी. सड़क के दोनों ओर फैले प्रकृति के विभिन्न रूपों को निहारते हुए हम आ गए थे गंगटोक की ह्रदय स्थली महात्मा गांधी रोड के पास. हमने राजू से विदा ली, उसे गले लगाया, शुक्रिया कहा. राजू ने भी थैंक्स कहा और मुस्कुराते हुए बढ़ गया, कल फिर किसी और सैलानी को गंगटोक घुमाने की इच्छा के साथ – एक अच्छे गाइड की तरह. जीते रहो राजू....असीम शुभकामनाएं.  ....आगे जारी...
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Wednesday, September 6, 2017

यात्रा के रंग : गंगटोक और आसपास -4 - आज प्रसिद्ध 'रूमटेक मठ'

                                                                               -मिलन सिन्हा
...गतांक से आगे... आपको जानकर अच्छा लगेगा कि गंगटोक के आसपास कई प्राचीन धार्मिक मठ हैं, जो पर्यटकों एवं अनुयायियों के आकर्षण के केन्द्र रहे हैं . लेकिन किसी कारण से आप इन सभी मठों का दर्शन न भी कर सकें तो कम-से-कम प्रसिद्ध रूमटेक मठ जरुर जाएं, क्यों कि यह सिक्किम का सबसे बड़ा और चर्चित मठ है. यह भी एक कारण था कि हमारे दूसरे दिन के कार्यक्रम में रूमटेक मठ देखना शामिल था, साथ ही  उसके आसपास के दर्शनीय स्थानों को देखना भी. ड्राईवर और गाइड राजू समय पर आ गया था. सो, सुबह–सुबह ही हम गंगटोक शहर से करीब 25 किलोमीटर दूर अवस्थित इस मठ को देखने निकल पड़े. बताते चलें कि धर्मचक्र केन्द्र के रूप में विख्यात  रूमटेक मठ करीब 300 साल पुराना है और तिब्बती वास्तुकला की बेहतरीन मिसाल है. यह करमापा लामा का मुख्य कार्य स्थान रहा है. यह मठ समुद्र तल से 5800 फीट की ऊंचाई पर है. कहा जाता है कि यह मठ तिब्बत स्थित मूल तिब्बती बौद्ध मठ का प्रतिरूप है, जिसका पुनर्निर्माण  1960 के दशक में 16 वें करमापा द्वारा करवाया गया. 

पहाड़ी रास्ते से होते हुए हम करीब घंटे भर में रूमटेक मठ के मेन गेट के पास पहुंच गए. गाड़ी वहीं छोड़नी पड़ी. अन्दर जाने के लिए हम सबको अपना-अपना परिचय कार्ड दिखाना पड़ा, सुरक्षा जांच से गुजरना पड़ा. पता चला कि सुरक्षा कारणों से यहाँ सुरक्षा कर्मी पूरे परिसर की चौबीसों घंटे कड़ी चौकसी करते हैं.  मेन गेट से थोड़ी चढ़ाई करते हुए और एक कतार में लगे प्रार्थना चक्रों ( प्रेयर व्हील्स ) को घुमाते हुए हम मठ के मुख्य द्वार पर पहुंच गए. वहां सुरक्षा कर्मी हर श्रद्धालु की जांच कर उन्हें मठ में प्रवेश की अनुमति दे रहे थे. अन्दर का माहौल भक्तिमय था और पूरा दृश्य अभिभूत कर रहा था. सुबह का समय होने के कारण हमें बौद्ध भिक्षुओं द्वारा पूरे अनुष्ठानपूर्वक एवं परंपरागत तरीके से की जा रही प्रार्थना का गवाह बनने का सौभाग्य मिला. यह हमारे लिए एक अपूर्व अनुभव था. इस प्रार्थना में शामिल छोटे-बड़े करीब 30-35 भिक्षुओं  की तन्मयता और अनुशासन देखने लायक थी.  

प्रार्थना का कार्यक्रम समाप्त होने के बाद हम परिसर के अन्य भागों को देखने चले. मठ के दाहिने हिस्से से हम पीछे की ओर गए जहाँ  ‘करमा श्री नालंदा इंस्टिट्यूट ऑफ़ हायर बुद्धिस्ट स्टडीज’ का खूबसूरत परिसर है. यह अनूठा शिक्षण संस्थान वाराणसी स्थित संस्कृत विश्वविद्यालय से सम्बद्ध है और यहाँ युवा भिक्षुओं को बौद्ध दर्शन व इतिहास, तिब्बती साहित्य व कला के अलावे अंग्रेजी, हिन्दी, पाली, संस्कृत आदि भाषाओँ  की  शिक्षा दी जाती है. इस इंस्टिट्यूट में दुनिया भर से छात्र शिक्षा ग्रहण करने आते हैं. अध्ययनरत सभी भिक्षु यहीं छात्रावास में रहते हैं.  इस परिसर के एक छोटे से हॉल में प्रसिद्ध स्वर्ण स्तूप भी है. कहा जाता है कि इसी स्थान पर 16 वें करमापा की पवित्र अस्थियां रक्खी गई हैं.  

परिसर में आते-जाते कई भिक्षुओं से हमें रोचक वार्तालाप का अवसर भी मिला. जानकारी मिली कि यहां से शिक्षित-प्रशिक्षित बौद्ध भिक्षु जीवनभर धार्मिक-सामाजिक-शैक्षणिक  कार्य में खुद को समर्पित कर देते हैं. सच मानिए, शहर के कोलाहल एवं प्रदूषण से परे पहाड़ पर बसे एवं मनोरम प्राकृतिक परिवेश में समर्पित धर्म गुरुओं एवं विद्वानों  से शिक्षित होना भिक्षुओं के लिए निश्चय ही सौभाग्य की बात है. 

लौटने के क्रम में हमने मठ के निकट कुछ श्रद्धालुओं को शान्ति के प्रतीक ‘कबूतर’ को दाना खिलाते देखा. सैकड़ों की संख्या में कबूतरों को बेख़ौफ़ कई श्रद्धालुओं के हाथ से दाना चुगते देखा, शायद पास खड़े सुरक्षा कर्मी के कारण वे भी आश्वस्त थे, आशंका मुक्त थे. सचमुच, यह दृश्य हमें मंत्र-मुग्ध कर गया. इसी हर्षातिरेक में हम प्रार्थना चक्रों को घुमाते हुए रूमटेक मठ के गेट से बाहर आ गए.  ...आगे जारी...
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                   और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।
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Friday, September 1, 2017

यात्रा के रंग : गंगटोक और आसपास -3- अब बक्थांग वॉटरफॉल और ....

                                                                                          -मिलन सिन्हा
...गतांक से आगे... आप घूमने जाएं, वह भी घरवालों के साथ और फिर वहां कुछ खरीदारी न करें, यह नामुमकिन है. वह भी तब जब आप गंगटोक हस्तशिल्प एवं हैंडलूम प्रतिष्ठान  में आ गए हों. यहाँ हैंडलूम के महिला कारीगरों को पूरी तन्मयता से काम करते हुए एवं कलात्मक चीजों का निर्माण करते हुए देख सकते हैं. देखने पर ही पता चलता है कि यह सब कितनी मेहनत एवं एकाग्रता की मांग करता है. इसके दूसरे हिस्से में एक तरफ हस्तशिल्प प्रदर्शनी लगी है तो दूसरे तरफ चीजें बिक्री के लिए उपलब्ध हैं. मेक इन इंडिया का अच्छा उदहारण. कलाप्रेमी एवं मानव श्रम को महत्व देने वाले लोगों के लिए यहाँ कुछ समय गुजारना एक अच्छा अनुभव साबित होगा. 

यहाँ से बनझकरी जलप्रपात, ताशी व्यू पॉइंट, एंची मठ एवं  लिंग्दुम मठ  का भ्रमण करते हुए और बीच में मुसलाधार बारिश का लुफ्त उठाते हुए हम अब पहुंच गए हैं प्रसिद्ध बक्थांग वॉटरफॉल. यह खूबसूरत वॉटरफॉल वस्तुतः एकाधिक वाटर फॉल का एक समूह है. इस स्थान पर आप ‘रोप स्लाइडिंग’ का भी मजा ले सकते हैं. यहाँ सैलानियों की बहुत भीड़ होती है, कारण यह शहर के नजदीक है; मुख्य सड़क के बिलकुल पास अवस्थित है और बहुत आकर्षक भी है. सही है, पेड़ों से आच्छादित ऊँचे पहाड़ से एक साथ कई जल-प्रपात को नीचे आते देखना किसे विस्मत एवं मंत्र-मुग्ध नहीं करेगा. लिहाजा, यहाँ के प्राकृतिक दृश्यों को कैमरे में कैद करने में लोगों को मशगूल देखना बहुत ही स्वभाविक है. हाँ, कुछ राशि खर्च करके यहाँ आप सिक्किम के पारंपरिक लिबास में फोटो खिचवाने का आनंद उठा सकते हैं. बहरहाल, यहाँ से चलते वक्त स्वतः ही गुनगुना उठा मनोज कुमार एवं जया भादुड़ी अभिनीत चर्चित हिन्दी फिल्म ’शोर’ का वह कर्णप्रिय गाना – पानी रे पानी तेरा रंग कैसा....  

यहाँ से हम आगे बढ़े प्रसिद्ध नामग्याल इंस्टिट्यूट ऑफ़ तिब्ब्तोलाजी  की ओर. यह स्थान  देवराली टैक्सी स्टैंड जो कि राष्ट्रीय उच्च मार्ग-31ए पर अवस्थित है, के निकट है. तिब्बती सभ्यता व संस्कृति का प्रमाणिक परिचय प्राप्त करना हो तो यहाँ आना सार्थक होगा. अपने स्थापना वर्ष 1958 से यह संस्था लगातार तिब्बत के लोगों के धर्म, भाषा, कला, इतिहास आदि से संबंधित अध्ययन तथा शोध-अनुसंधान में जुटा है. इसके पुस्तकालय एवं म्यूजियम  में तिब्बती जन-जीवन से जुड़ी तमाम कलाकृतियों और पुस्तकों-पांडुलिपियों का विराट संग्रह है. शायद यही कारण है कि बड़ी संख्या में शोधार्थी, विद्यार्थी एवं पर्यटक इस संस्थान में आते रहते हैं. 

सुबह से शाम तक के इस लोकल टूर का एक  दिलचस्प पहलू यह रहा कि हमें राजू नामक एक खुश-मिजाज ड्राईवर –सह-गाइड मिला, अन्यथा इन महत्वपूर्ण दस पॉइंट का भ्रमण शायद ही यादगार बन पाता. दरअसल, राजू एक पढ़ा-लिखा नौजवान है जिसकी रूचि हर सम-सामयिक विषयों में है. राजनीति से लेकर फिल्म तक उसकी एक समझ है जिसे व्यक्त  करने में उसे कोई झिझक नहीं, जैसा कि हम सामान्यतः अनेक संभ्रांत लोगों में पाते हैं. लिहाजा, जब राजू ने पूर्व मुख्यमंत्री की चर्चा की तो उसके साथ उनके समय की अच्छी-बुरी दोनों बातों का जिक्र किया, आम सिक्किमवासी  के आशा-आकंक्षा के बारे में बताया. गंगटोक में बेरोजगारी की स्थिति पर जब मैंने उसके विचार जानने चाहे तो बेशक राजू थोड़ा गुस्से में आ गया. उसने शिक्षित बेरोजगारों की बात की और कहा कि उनके लिए स्व-रोजगार के अलावे रोजगार के विकल्प बहुत ही सीमित हैं. स्व-रोजगार भी पर्यटन से जुड़ा है, लेकिन पर्यटन को एक उद्योग के रूप में विकसित करने में सरकार अबतक सफल नहीं हो पाई है. पर्वतीय पर्यटन का एक अलग  मिजाज होता है और एक सीमित अवधि. मसलन, गंगटोक में जाड़े के मौसम में पर्यटन से जुड़े सारे व्यवसाय बिलकुल सुस्त पड़ जाते हैं. नतीजतन, इन पर निर्भर एक बड़ी आबादी ठण्ड और बेरोजगारी के दोहरे मार को झेलने को मजबूर हो जाती है. एक और बात. यहाँ के युवा  सेना और अर्द्ध-सैनिक बलों में जाना चाहते  हैं, लेकिन वहां भी अनजाने कारणों से कुछ ही लोगों की बहाली हो पाती है. बड़े व्यवसाय में गैर-सिक्कमी लोगों, खासकर राजस्थानी, बंगाली एवं बिहारी लोगों के निरंतर बढ़ते वर्चस्व के प्रति भी उसने अपना रोष नहीं छिपाया. राजनीतिक भ्रष्टाचार को बढ़ाने में इन बाहरी लोगों की भूमिका को भी राजू ने रेखांकित किया. 

सूर्यास्त हो गया था. हम अपने होटल लौट आए. राजू से हाथ मिलाया, उसे थैंक्स कहा और उससे अगले दिन सुबह समय पर पहुंचने का आग्रह किया. वह हंसा और ओके कहकर बढ़ गया अपनी गाड़ी के साथ. ...आगे जारी...
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Wednesday, August 30, 2017

यात्रा के रंग : गंगटोक और आसपास -2 - अब हनुमान टोक और ...

                                                                              -मिलन सिन्हा
...गतांक से आगे... गाड़ी बढ़ चली अब अगले पॉइंट- हनुमान टोक यानी हनुमान मंदिर की ओर. गंगटोक शहर से करीब 10 किलोमीटर की दूरी एवं  समुद्र तल से करीब 7200 फीट की ऊंचाई पर स्थित है यह खूबसूरत मंदिर. पार्किंग स्थल से मंदिर तक जाने के लिए सीढियां बनी है, जिसमें बीच-बीच में बैठने-सुस्ताने की व्यवस्था है. मंदिर के रास्ते में लगातार घंटियां लगी हैं, जिन्हें बजाते जाने पर ध्वनि की अदभुत गूंज-अनुगूंज से आप अभिभूत हुए बिना नहीं रह सकते. सारा परिसर इतना साफ़-सुथरा एवं सुरुचिपूर्ण ढंग से सुसज्जित है कि आप स्वतः पूछ बैठेंगे कि ऐसा रख-रखाव तो सेना के देखरेख में ही संभव है. बिलकुल ठीक सोचा है आपने. 

वर्ष 1968 से भारतीय सेना के माउंटेन डिवीज़न के जवान इस हनुमान मंदिर का रख-रखाव करते रहे हैं. इस स्थान से कंचनजंघा पर्वतमाला के अप्रतिम सौन्दर्य का आप आनन्द उठा सकते हैं. कहने की जरुरत नहीँ कि यहाँ आने पर आपको थोड़ा और रुकने का मन जरुर करेगा. लेकिन आगे और भी तो बहुत कुछ देखना है और घड़ी कहाँ तक आपको रुकने देगी. हाँ, एक और जानने योग्य बात. वर्षों से प्रचलित लोकमत के अनुसार राम-रावण युद्ध के दौरान आहत पड़े लक्ष्मण के लिए हिमालय से संजीवनी बुटी ले जाने के क्रम में हनुमान जी कुछ देर  के लिए इस स्थान पर रुके थे. 

पेड़ों से भरे पहाड़ी रास्ते से होकर अब हम हनुमान टोक से करीब 1200 फीट नीचे गणेश टोक के पास आ गए हैं. घुमावदार सीढ़ियों से चढ़ कर इस मंदिर तक पहुँचते हुए आप प्रकृति के विविध रूपों का गवाह बनेंगे, साथ ही मौका मिलेगा गंगटोक शहर के एक  कुछ हिस्सों के विहंगम दृश्य से रूबरू होने का. इस गणेश मंदिर के पार्किंग स्थल के बिलकुल पास में आपको खाने-पीने की सामग्री मिल जायेगी और हस्तशिल्प की कुछ खूबसूरत वस्तुएं भी. कई सीनियर सिटीजन जो शारीरिक कारण से ऊपर मंदिर  तक नहीं जा पाते हैं, नीचे पार्किंग स्थल से भगवान गणेश को प्रणाम कर लेते हैं और ईश्वर का आशीर्वाद  पाने की अनुभूति से खुश हो जाते हैं. चाय-पानी और अन्य खरीदारी बाद में करते रहते हैं. ...आगे जारी...
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Monday, August 28, 2017

यात्रा के रंग : गंगटोक और आसपास -1

                                                                                                         -मिलन सिन्हा
...गतांक से आगे... ऐसे, आप गंगटोक तक आएं और उसके आसपास के दर्शनीय स्थानों को देखे बिना लौट जाएं, यह मुनासिब नहीं. वह भी तब जब कि इस शहर के आसपास के पर्यटक स्थलों को देखने के लिए आप अपने समय एवं बजट के हिसाब से पांच, सात या दस पॉइंट्स में से कोई भी ‘पैकज टूर’ चुन सकते हैं.  इसमें पर्यटन सूचना केन्द्र एवं महात्मा गाँधी मार्ग  स्थित एकाधिक ट्रेवल एजेंसी आपके लिए मददगार साबित होंगे. सच कहें तो हमने इन्ही सूत्रों से पूछताछ करके पिछले दिन ही आज के घूमने के कुल दस स्थानों को तय कर लिया था. इसके बाद इन स्थानों पर जाने के लिए हमने एक छोटी गाड़ी भी दिनभर के लिए बुक कर ली. गाड़ी पहले बुक करना अच्छा रहता है, क्यों कि टूरिस्ट सीजन में कई बार आपको गाड़ी न मिलने के कारण अपना प्रोग्राम कैंसिल करना पड़ जाता है. 

सुबह गाड़ी समय पर आ गयी. ड्राईवर ने मोबाइल पर सूचित किया. होटल से हम निकले तो बाहर झमाझम बारिश हो रही थी. पहाड़ों पर कब घटायें घिर आयें, बारिश होने लगे और कब अचानक धूप खिल उठे, अनुमान लगाना कठिन होता है, खासकर बाहर से आये लोगों के लिए. बहरहाल, कुछ मिनटों के बाद बारिश थमते ही हम चल पड़े गंगटोक शहर के आसपास स्थित दर्शनीय जगहों का आनंद उठाने. 

पहाड़ी जगह होने के कारण बारिश का पानी सड़क पर जमा होने की गुंजाइश कम थी. पुलिस मुख्यालय से पहले ही ड्राईवर ने एक ढलानवाली सड़क पर गाड़ी को मोड़ दिया. यह सड़क कम चौड़ी थी, फिर भी दोनों ओर से वाहनों का आना –जाना लगा था. अगल-बगल होटल एवं गेस्ट हाउस होने के कारण गाड़ियां सुस्त गति से चल रही थी. कुछ दूर आगे जाकर हमारी गाड़ी अचानक रुक गयी. सामने और भी गाड़ियां खड़ी थी. तभी ड्राईवर ने थोड़ी दूर पर सड़क के किनारे खड़े एक सज्जन को दिखा कर कहा, ‘सर देखिए, ये हैं सिक्किम के पूर्व चीफ मिनिस्टर श्री नरबहादुर भण्डारी ’. कोट-पेंट-टाई पहने भण्डारी साहब एक आम शहरी के तरह खड़े थे और किसी को इशारे से बुला रहे थे. कोई तामझाम नहीं, कोई दिखावा नहीं, आसपास कोई सुरक्षा कर्मी भी नहीं. जब तक मै गाड़ी से निकलता और उनसे मिलकर कुछ बातें कर पाता, गाड़ी चल पड़ी. गाड़ी रोक कर बात करना संभव नहीं था, कारण पीछे भी गाड़ियां कतार से चल रही थीं. हां, गाड़ी तो चल रही थी, पर मैं मानसिक रूप से रुका हुआ था भण्डारी साहब के आसपास. बता दें कि नर बहादुर भण्डारी ने 1977 में सिक्किम जनता परिषद् का गठन किया और उसके संस्थापक के रूप में 1979 में चुनाव लड़ा. वे अक्टूबर 1979 से जून 1994 के बीच तीन बार सिक्किम के मुख्य मंत्री रहे और सिक्किम के लोगों के बीच काफी लोकप्रिय भी, बेशक उन पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे. बहरहाल, चलती गाड़ी और चलती घड़ी ने हमें फ्लावर शो सेंटर  पहुंचा दिया. 

एक छोटे से स्थान में संचालित इस सेंटर में अनेक तरह के फूल खूबसूरत तरीके से प्रदर्शित किये गए हैं. रंग –बिरंगे फूलों के साथ अपने प्रियजनों का फोटो खींचने और फोटो खींचवाने में पर्यटकों की बड़ी भीड़ व्यस्त थी. दिन चढ़ते ही सैलानियों से भरी बसें आने लगी एवं यहाँ भीड़ बढ़ने लगी. 

बाहर निकला तो देखा खीरा बिक रहा है. पिताजी की बात याद आ गयी. वे कहा करते  थे कि सेहत के लिए सुबह का खीरा हीरा, रात का खीरा पीड़ा. बस, दो खीरा खरीदा और खाते-खिलाते हुए गाड़ी में बैठ गए. गाड़ी चली तो ड्राईवर ने बताया  कि वो सामने वर्तमान मुख्य मंत्री श्री पवन कुमार चामलिंग  का सरकारी आवास है. श्री चामलिंग पिछले 23 वर्षों से सिक्किम के मुख्यमंत्री हैं.  अगर गाड़ी के चालक ने न बताया होता तो देख कर अनुमान लगाना मुश्किल था कि यह प्रदेश के सबसे प्रभावशाली व्यक्ति का निवासस्थान है. कारण, न कोई आडम्बर, न बेरिकेडिंग  और न ही पुलिसिया तामझाम. आवागमन बिलकुल सामान्य. .... ....आगे जारी...                                                                                   (hellomilansinha@gmail.com)
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Tuesday, July 11, 2017

यात्रा के रंग : अब पुरी में -6 "रथ यात्रा की बात और कुछ"

                                                                                                           -मिलन सिन्हा 
गतांक से आगे... पुरी में रथयात्रा सबसे बड़े  उत्सव के रूप में मनाया जाता है. नौ दिनों तक चलनेवाले इस अदभुत धार्मिक-आध्यात्मिक त्यौहार में स्थानीय लोगों के अलावे देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु पूरे आस्था और उत्साह से शरीक होते हैं. इस मौके पर श्री जगन्नाथ, श्री बलभद्र और देवी सुभद्रा को लाखों श्रद्धालु इतने नजदीक से देख पाते हैं. रथयात्रा उत्सव आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को शुरू होता है. इस दिन अलग-अलग रथों में श्री जगन्नाथ, श्री बलभद्र और उनकी बहन सुभद्रा को पूरे विधि –विधान से बिठाया जाता है और फिर  बड़ी संख्या में भक्तगण रथों को खींच कर दो किलोमीटर दूर गुंडिचा मन्दिर तक ले जाते हैं.

गुंडिचा मन्दिर बहुत ही खूबसूरत है जिसका निर्माण कलिंग वास्तुकला पर आधारित है. यह मंदिर श्री जगन्नाथ के मौसी घर के रूप में भी प्रसिद्ध है. श्री जगन्नाथ मंदिर से गुंडिचा मन्दिर तक की सड़क बहुत ही चौड़ी और अच्छी है. सही है क्यों कि 60 फुट से ज्यादा चौड़े और 40 फुट से ज्यादा ऊँचे तीन रथों के साथ चलनेवाले लाखों श्रद्धालुओं के लिए ऐसी व्यवस्था अनिवार्य है. लकड़ी से बने रथों को तैयार करने का काम हफ़्तों चलता है और फिर अंत में तीनों रथों को अत्यन्त कलात्मक ढंग से सजाया जाता है. इस यात्रा में सबसे आगे श्री बलभद्र का ताल ध्वज रथ, बीच में देवी सुभद्रा का पद्म ध्वज रथ और उसके पीछे श्री जगन्नाथ का गरुड़ ध्वज रथ रहता है. एकादशी को वापसी यात्रा यानी बहुडा के बाद तीनों प्रतिमाओं को जगन्नाथ मंदिर के गर्भ गृह में आस्था और भक्तिभाव से फिर से स्थापित किया जाता है. हर साल इसी समय यह  कार्य पूरे धूमधाम से संपन्न होता है. ऐसे अब तो देश-विदेश में अनेक स्थानों में इसी समय रथ यात्रा का आयोजन किया जाता है. 

पुरी में श्री जगन्नाथ मंदिर और समुद्र तट श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए सबसे बड़े आकर्षण के केन्द्र रहे हैं, तथापि कई अन्य दर्शनीय स्थल भी हैं जहाँ सालों भर पर्यटकों की भीड़ लगी रहती है. श्री लोकनाथ मंदिर इनमें से एक है.  यह श्री जगन्नाथ मंदिर से करीब तीन किलोमीटर है. यह पुरी का सबसे पुराना मंदिर है जहाँ श्री लोक नाथ जी के नाम से भगवान शंकर की पूजा-अर्चना की जाती है. शिव रात्रि के मौके पर तो प्रत्येक वर्ष  यहां एक बड़ा मेला भी लगता है. 


नरेन्द्र या चंदन तालाब भी काफी खूबसूरत और लोकप्रिय पर्यटक स्थल है. यह स्थान श्री जगन्नाथ मंदिर से करीब डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर है. हर वर्ष अक्षय तृतीया से 21 दिनों तक यहां  श्री जगन्नाथ का जल विहार उत्सव मनाया जाता है. यह तालाब 873 फुट लम्बा और 834 फुट चौड़ा है. यह स्थान श्री जगन्नाथ के बुआ के घर के रूप में भी जाना जाता है. इस परिसर में छोटे-छोटे कई मंदिर हैं जिनमें देवी –देवताओं की प्रतिमाएं विराजमान हैं. आपके पास समय हो तो आप बेदी हनुमान मंदिर, सुदर्शन क्राफ्ट म्यूजियम और श्री सोनार गौरांग मंदिर भी जा सकते हैं. 

अंत में एक और बात. पुरी में घूमते हुए हमें बड़े-बड़े शॉपिंग सेंटर या मॉल दिखाई नहीं पड़े. सांस्कृतिक, पारम्परिक, धार्मिक और आध्यात्मिक जड़ें आज भी ज्यादा मजबूत हैं यहां, ऐसा स्पष्ट जान पड़ता है.           (hellomilansinha@gmail.com)   

                         और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं ।
# साहित्यिक पत्रिका 'नई धारा' में प्रकाशित 

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