Saturday, October 13, 2012

आज की कविता : आज का मानव

                                                                                - मिलन सिन्हा 
manab









आज का मानव 
आज 
हरेक के जेब में मानव 
हरेक के पेट में मानव 
पेट से निकला है मानव 
पेट से परेशान  है मानव 
अन्तरिक्ष में क्रीड़ा कर रहा है मानव 
सड़क पर लेटा है मानव 
जोड़ - घटाव में व्यस्त है मानव 
वैरागी बन रहा है मानव 
मशीन बन रहा है मानव 
समुद्र की लहरें गिन रहा है मानव 
महामानव बनाने में जुटा है मानव 
न्यूट्रान बम बना रहा है मानव 
विश्व शांति की बात कर रहा है मानव 
अपने ही घर में रोज  लड़ रहा है मानव 
अच्छी-अच्छी बातें कर रहा है मानव 
बुरे-बुरे काम कर रहा है मानव  
सचमुच,
मानव के अस्तित्व के लिए आज 
परेशानी का सबब बन रहा है मानव  !

# प्रवक्ता . कॉम पर प्रकाशित

                  और भी बातें करेंगे, चलते चलते। असीम शुभकामनाएं। 

Thursday, October 11, 2012

आज की कविता : सपनों का गाँव

                                                                               -- मिलन सिन्हा
सपनों  का गाँव
यह गाँव है , सपनों का गाँव है 
हरियाली है, खुशहाली है 
होली है, क्रिसमस है, ईद है, दिवाली है 
पतंग है, उमंग है 
मोहक यहाँ का सब रंग ढंग है 
अपनी धरती, अपना आकाश है 
दूर नहीं, सब आस-पास है
 नदी है, नाव है, धूप  है, छांव है 
फूलों का सुगंध है, धूल-सना पाँव है 
यह गाँव है , सपनों का गाँव है।


अमराई  है, तराई है 

हर चीज अपनी, नहीं कुछ पराई है 
कोयल की कूक है, प्यार की हूक है 
बात मीठी -मीठी, पर दो टूक है 
सम्बन्ध है मधुर, प्रेम है भरपूर 
बुराई है यहाँ से बहुत ही दूर 
गहरा लगाव है, अच्छा स्वभाव है 
पनघट है, नीम की छांव है 
यह गाँव है , सपनों का गाँव है। 


                       और भी बातें करेंगे, चलते चलते। असीम शुभकामनाएं। 


Tuesday, October 9, 2012

आज की बात: गरीबों के लिए आजादी के मायने क्या ?

                                                                                               *  मिलन सिन्हा 
                    पिछले 15 अगस्त को हमने अपना 66वां  स्वतंत्रता दिवस मनाया। बड़े ताम-झाम से मनाया। प्रधान मंत्री से लेकर मुख्य मंत्री  तक सब ने देश/प्रदेश के तरक्की के बारे में विस्तार से लोगों को  बताया, अनेक नए वादे भी किये।  इन  सब  आयोजनों पर करोड़ों का खर्च जनता के नाम गया , विशेष कर उन तीन चौथाई से भी ज्यादा देश की जनता का,  जो आज भी रोटी, कपड़ा, मकान के साथ साथ स्वास्थ्य , शिक्षा और रोजगार की समस्या से बुरी तरह  परेशान है, बेहाल है  -  आजादी के साढ़े छह दशकों  के बाद भी। क्या यह शर्मनाक स्थिति विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र  कहे जानेवाले देश के योजनाकारों, नीति  निर्धारकों और नौकरशाहों को अब भी परेशान  नहीं करती , उन्हें जल्दी कुछ करने को मजबूर नहीं करती ?
                अक्तूबर का महीना  हमारे चार  बड़े नेताओं और देश भक्तों, राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी, लोकनायक जयप्रकाश  नारायण, पूर्व  प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री   तथा  प्रख्यात  समाजवादी जननेता राम मनोहर लोहिया के जन्म दिवस या पुण्य तिथि के साथ जुड़ा है,  जो अपने जीवन काल में सिर्फ  और सिर्फ गरीब,शोषित,दलित जनता के लिए काम करते रहे। तो क्यों न  इस मौके पर हम  अपने सत्तासीन  नेताओं, योजनाकारों, नीति  निर्धारकों आदि से यह पूछें :
  • क्या प्रत्येक भारतीय को रोज दो शाम का भी खाना भी नसीब हो पाता है?  
  • क्या प्रत्येक भारतीय को एक मनुष्य के रूप में रहने लायक कपड़ा उपलब्ध है ?
  • क्या प्रत्येक भारतीय को रहने के लिए अपना मकान नसीब है?
  • क्या प्रत्येक भारतीय को न्यूनतम  स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध है?
  • क्या प्रत्येक भारतीय बच्चे को बुनियादी  स्कूली  शिक्षा उपलब्ध है?
  • क्या प्रत्येक भारतीय  व्यस्क को साल में 180 दिनों का रोजगार भी मिल पाता है?
           इन सभी मौलिक सवालों का जबाव तो बहुत ही निराशाजनक है,फिर भी सत्ता प्रतिष्ठान से सम्बद्ध सारे लोग चीखते हुए कहेंगे कि इन दशकों के दौरान देश ने हर क्षेत्र में प्रगति की है। लेकिन, वही लोग इस तथ्य को नहीं नकार  पाएंगे कि जितने वायदे उन लोगों ने जनता से इन वर्षों  में किया है, उसका दस प्रतिशत  भी वे  पूरा करने में नाकाम रहे।  देखिये, दुष्यंत कुमार क्या कहते हैं :

यहाँ तक आते आते सूख  जाती है कई नदियां 
मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा।

          सभी यह मानेंगे कि किसी भी पैमाने से आजादी के ये 65 साल किसी भी देश को अपनी जनता को बुनियादी जरूरतों  से   चिंतामुक्त करके देश को सम्पन्न और शक्तिशाली बनाने के लिए  बहुत लम्बा अरसा होता है। और वह भी तब, जब कि इस  देश में न तो प्राकृतिक संसाधनों की कोई कमी रही है और न तो   मानव  संसाधन की।  तो फिर यह तो साफ़ है कि भारी  गलती हुई - नीति, योजना,कार्यवाही और सबसे  ऊपर नीयत के मामले में। चुनांचे, हम सभी को देश/ प्रदेश  की सरकारों से पूरी गंभीरता से पूछना पड़ेगा कुछ  बुनियादी सवाल और मिल कर बनानी  पड़ेगी एक समावे शी  कार्य योजना जिसे समयबद्ध तरीके से आम जनता की भलाई  के लिए लागू  किया जा  सकें, तभी हम अपने  को एक मायने में आजाद भारत के नागरिक कह सकेंगे।
  
           और भी बातें करेंगे, चलते चलते। असीम शुभकामनाएं।
                        

Monday, October 8, 2012

आज की कविता : अंतहीन तलाश

                                                                                 -- मिलन सिन्हा
 अंतहीन तलाश 
चारों  ओर  है 
भीड़ ही भीड़
आने  जाने  में भी 
छिल  रहा है शरीर .
मची है भागम भाग 
किसे पड़ी है 
अगर कहीं 
लगी भी हो आग . 
एक दूसरे को धकेलते 
पीछे छोड़ते 
पीछे छूटते भी .
कई बार गिराते 
कई बार गिरते  भी . 
कभी कुचलते 
कभी कुचले जाते भी . 
भाग रहे हैं हम सब 
आसपास के चीजों से, लोगों से 
नहीं कोई मतलब .
चाहे अनचाहे 
और बड़े भीड़ में 
शामिल होने को अभिशप्त .
ऐसे में, 
अपना वजूद तलाशने की बात 
टलती  रहती है 
हर न आनेवाले कल तक 
कौन जाने कब तक ?

# प्रवासी दुनिया .कॉम पर प्रकाशित

                          और भी बातें करेंगे, चलते चलते। असीम शुभकामनाएं।

Saturday, October 6, 2012

हास्य व्यंग्य कविताएं : प्रतियोगिता, क्रिकेट का खेल

                                                                       - मिलन सिन्हा 
प्रतियोगिता 

अगर  ओलम्पिक में 
'घोटाला ' प्रतियोगिता  को 
शामिल किया जाता 
तो निश्चय ही 
हमारे देश, प्रदेश को 
स्वर्ण पदक 
अवश्य मिल जाता !

क्रिकेट का खेल

दादी माँ बाहर घूम रही थी 
और पास ही में रेडियो पर 
क्रिकेट कमेंट्री चल रही थी .
दादी जी ने पूछा मुझसे ,
अरे, यह रेडियो पर 
क्या  हो रहा है?
बतलाया,
भारत -पाकिस्तान के बीच 
क्रिकेट मैच चल रहा है .
तभी कमेंट्रेटर  की आवाज आयी कि  
 गेंद  बल्ले से लग कर 
'गली' में चली गयी .
इतना सुनना था  कि 
दादी माँ  चिल्लाईं ,
कहा, तुम लोग मुझे 
बेवकूफ  मत बनाओ 
क्रिकेट का खेल 
मैदान में हो रहा है या और कहीं 
मुझे सच - सच बतलाओ !

# प्रवासी दुनिया .कॉम पर प्रकाशित

       और भी बातें करेंगे, चलते चलते। असीम शुभकामनाएं। 

Tuesday, October 2, 2012

आज की कविता : जवान और किसान

                                                                           * मिलन  सिन्हा                                  

हरा भरा खेत खलिहान 
फिर भी 
निर्धन क्यों हमारे किसान ?
देश में नहीं 
पानी की कमी 
फिर भी 
क्यों रहती है  सूखी 
यहाँ - वहाँ की जमीं ?
जिसे देखना है वो देखें 
किसान जो उपजाता है 
उसका वह क्या पता है ?
देश को खिलानेवाला 
खुद क्यों भूखा रह जाता है ?
कर्ज के बोझ तले 
क्यों खुदकुशी कर लेता है ? 

देश में लाखों नौजवान 
साहसी,शिक्षित और उर्जावान 
छोड़कर अपना घर-वार 
बनते हैं सीमा के पहरेदार . 
गर्मी हो या सर्दी 
आंधी हो या हो तूफान 
करते हैं देश की सेवा 
देकर आपनी जान .
युद्ध हो या हो कोई आपदा 
रहते हैं तैयार 
हमारे जवान सदा सर्वदा . 
पर, क्या इन जवानों का भविष्य 
सुरक्षित रह पाता है?
देश इनको 
पूरा सम्मान दे पाता  है?

कहाँ हैं वे देश के लाल 
जो लाल बहादुर कहलाएं,
जय जवान, जय किसान का 
वह गौरव फिर से लौटाएं .

(शास्त्रीजी के जन्म दिन के अवसर पर रचित ) 

इस नयी कोशिश में और भी बातें करेंगे, चलते चलते। असीम शुभकामनाएं। 
# प्रवक्ता.कॉम  में प्रकाशित 

आज की कविता : जीवन दर्शन

 (बापू के जन्म दिन के अवसर पर)                                         - मिलन  सिन्हा                                    
अपने मन को 
जोड़ो हर जन से . 
न तोड़ो किसी का दिल 
अपने धन से .
मत बनो तंग दिल 
सबके साथ 
रहो घुल मिल .
हों ऐसे विचार 
जो बन सके 
कर्म का आधार .
न बने व्यवहार तुम्हारा 
व्यापार का सामान 
बढ़ेगा तभी 
तुम्हारा मान सम्मान .
रहे चरित्र 
हमेशा पवित्र पावन 
डिगे नहीं कभी 
कैसा भी हो प्रलोभन .
ऐसा हो 
तुम्हारा जीवन 
जो लोगों के लिए  
बने एक उदाहरण .


इस नयी कोशिश में और भी बातें करेंगे, चलते चलते। असीम शुभकामनाएं।