Saturday, January 24, 2015

मोटिवेशन : शॉर्टकट की मानसिकता

                                                                                       - मिलन सिन्हा 
clipअमूमन परीक्षा सिर पर आ जाने पर हमें पढ़ने की आदत है। ऐसे में, बने बनाये नोट्स आदि के मार्फत शॉर्टकट रास्ते से मंजिल तक पहुंचने की पुरजोर कोशिश की जाती है। हालांकि सोचनेवाली बात है कि  शॉर्टकट के रास्ते यह तो कई बार संभव हो सकता  है कि हम दूसरों से बेहतर नंबर ले आएं, पर विषय की हमारी समझ अपेक्षाकृत कम ही रहती है। लिहाजा, हम उन्नत प्रतियोगिता परीक्षाओं में अंततः असफल होते हैं। और जीवन की बड़ी परीक्षाओं में सफलता कभी-कभार  ही हमारे हिस्से आ पाती है। ऐसा भी देखने में आता है कि अंतिम समय में जल्द-से-जल्द गंतव्य तक पहुंचने की चाहत से प्रेरित अनेक लोग ट्रेन, बस आदि के छतों तक में चढ़ कर अनावश्यक जोखिम उठाते हुए यात्रा करते हैं। कहना न होगा, इस प्रकृति के लोग न केवल अनेक मौकों पर दुर्घटनाओं के शिकार होते हैं, बल्कि कई बार जाने-अनजाने आपराधिक गतिविधियों  और  जुर्म में भी शामिल पाये गए हैं। नतीजतन, उनकी जिन्दगी एक जोखिम  भरे रास्ते पर चल पड़ती है। आखिर लोग ऐसा  क्यों करते हैं ? विशेषज्ञ बताते हैं कि शॉर्टकट की मानसिकता  वाले लोग मुश्किलों का सामना करने से घबराते हैं और जब कुछ चीजें, चाहे छोटी ही क्यों न हो, इस रास्ते से पाने में सफल हो जाते हैं, तो बस शॉर्टकट ही उनका एक मात्र रास्ता बन जाता है, क्यों कि तब तक तो ऐसे लोगों का आत्मविश्वास पहले की तुलना में काफी नीचे चला जाता है। सार-संक्षेप यह कि शॉर्टकट से हम बड़ी कामयाबी हासिल नहीं कर सकते। इसके विपरीत, लगातार निष्ठापूर्वक किया गया कोई भी काम देर-सबेर हमें इच्छित मंजिल तक पहुंचाने की गारंटी देता है। और जब भी ऐसा होता है, हम  न केवल खुद को उस उपलब्धि के लायक मानते हैं, बल्कि इससे हमारा आत्मविश्वास भी कई गुना बढ़ जाता है। ऐसे भी, कोई मेहनत से भाग कर अपने काम करने की शक्ति को कैसे बढ़ा सकता है? इतिहास भी गवाह है कि किस्मत मेहनतकश लोगों का ही साथ देती है।  हेनरी फोर्ड भी ऐसा मानते थे और खूब मेहनत करते थे।

             और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं। 

Monday, January 19, 2015

मोटिवेशन : रोगों की रोकथाम जरूरी

                                                                    - मिलन सिन्हा

clipविविधताओं व विषमताओं से भरे हमारे विशाल देश में डॉक्टर के क्लीनिक में हो या सरकारी एवं निजी अस्पताल या नर्सिंग होम में, हर जगह मरीजों की भीड़ निरन्तर बढ़ती जा रही है । नई -नई बिमारियों के बारे में डॉक्टरों और शोधकर्ताओं को तरह -तरह की जानकारियां मिल रहीं हैं जो पूरे मानव समाज के लिये परेशान  करने वाली बात है । ऐसे तो मौसम के बदलने के साथ ही सर्दी, जुकाम, बुखार आदि रोगों से पीड़ित लोगों की संख्या बढ़ ही जाती है । देश में डॉक्टरों की संख्या भी पर्याप्त नहीं है ।  मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया के आंकड़ों के मुताबिक एक लाख की आबादी पर मात्र 60 प्रशिक्षित डॉक्टर  काम करते हैं जब कि अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में ऐसे डॉक्टरों की संख्या कहीं अधिक है, जब कि इन देशों में स्वच्छता, पोषण आदि की स्थिति भी काफी बेहतर है । मजे की बात यह भी है कि देश में काम करने वाले ऐसे प्रशिक्षित डॉक्टरों में से केवल 30 % ही गांवों में कार्यरत हैं, जब कि अभी भी देश की 70 % आबादी गांवों में रहती है । ऐसी स्थिति में ग्रामीण इलाकों में आम लोगों का नीम -हकीम, ओझा -तांत्रिक आदि  के चंगुल में फंसना अस्वाभाविक नहीं है । ऊपर से तुर्रा यह  कि मिलावटी खाना एवं प्रदूषित पानी से आम आदमी विभिन्न प्रकार के छोटे- बड़े रोग से जूझता रहता है । ऐसी परिस्थिति में आम लोगों को  समय पर सही इलाज के अभाव में असामयिक मौत या असाध्य रोग का शिकार न होना पड़े, इसके लिए सरकारी और गैर सरकारी स्तरों में समुचित उपचार की व्यवस्था सुनिश्चित करना जरूरी है । लेकिन उससे भी आवश्यक है रोगों के रोकथाम के लिये हर स्तर पर लगातार गंभीर प्रयास  करना जिससे आम जनता को मोटे तौर पर स्वस्थ रखा जा सके । इसके लिये हम सभी को, विशेषकर स्कूल-कॉलेज के युवाओं के साथ-साथ महिलाओं को रोगों के रोकथाम के प्रति जानकार और जागरूक बनाना पड़ेगा । आखिर, स्वस्थ लोगों से ही कोई भी समाज एवं देश स्वस्थ और मजबूत बनता और रहता है । 

                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं। 

Tuesday, January 13, 2015

आज की कविता : तैयारी

                                                                         - मिलन  सिन्हा 




तैयारी 
हमें 
'आज' को 
'कल' के लिए 
तैयार करना है ,
क्यों कि 
'कल' के 
भरोसे ही तो 
हमें जीना है !

                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।

Sunday, January 4, 2015

मोटिवेशन : नमक कम, स्वस्थ रहेगा शरीर

                                                  - मिलन  सिन्हा  
clip
 राजा की छोटी बेटी द्वारा अपने पिता को नमक जैसा महत्वपूर्ण बताने वाली कहानी हममें से अनेक लोगों ने पढ़ी होगी ।  नमक हराम, नमक हलाल  जैसे जुमले तो हम सब बचपन से सुनते आये हैं ।  अमिताभ बच्चन अभिनीत 'नमक हराम और  'नमक हलाल' फ़िल्में भी देखी हैं । नमक का हक़ अदा करने की बात जोर -शोर से की जाती है; नमक के एकाधिक  विज्ञापनों में कई नामचीन लोगों को देश का नमक खाने और उसका हक़ अदा करने का वादा करते भी देखा -सुना है । सच है, खाने में नमक न हो तो भोजन बेस्वाद लगता है । तभी तो  नमक को सबरस कहा जाता है, सभी रसों के केन्द्र में रखा जाता है । कहने का अभिप्राय यह कि नमक हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है । इसे  रसायन शास्त्र में  सोडियम क्लोराइड के नाम से जाना जाता है । सच पूछिए  तो सोडियम क्लोराइड में 40 प्रतिशत सोडियम होता है और 60 प्रतिशत क्लोरीन । हम सब जानते हैं कि नमक का व्यापक प्रयोग खाने की चीजों में परिरक्षक (प्रिज़र्वेटीव ) के रूप में किया जाता रहा है । मक्खन, आचार आदि इसके सामान्य उदहारण हैं । डब्बाबंद एवं पैकेट में मिलनेवाली नमकीन चीजों में नमक की मात्रा अपेक्षाकृत ज्यादा होने का यह भी एक कारण है । काबिलेगौर बात है कि यही नमक रोगों को बढ़ानेवाला साबित हो रहा है, क्यों कि आजकल हमलोग नमक और नमकवाली चीजें कुछ अधिक ही खा रहे  हैं ।  हम अपने मुख्य भोजन में दाल, साग-सब्जी, मांस-मछली-अंडा, आचार, पापड़ आदि का खूब सेवन करते हैं, जिसमें नमक का जमकर प्रयोग होता है । नतीजतन, हमारे शरीर में नमक की मात्रा  यानी सोडियम की मात्रा मानक स्तर से कहीं ज्यादा बढ़ जाती है और इससे हमलोग अनायास ही ह्रदय रोग, हाइपरटेंशन, दमा, ओेस्टोपोरोसिस, किडनी स्टोन जैसी कई  घातक बीमारी की चपेट में आ जाते हैं । पाया गया है कि एक औसत भारतीय वयस्क के दैनिक आहार में 8 ग्राम नमक होता है अर्थात करीब 3 ग्राम सोडियम जब कि बेहतर स्वास्थ्य के लिए 3-4 ग्राम नमक काफी है ।

                   और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं। 

Sunday, December 28, 2014

मोटिवेशन : सीखने का संकल्प

                                                     - मिलन सिन्हा 
clipसीखने की न तो  कोई उम्र होती है और न ही इसका कोई समय। सीखना एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है। और इसके फायदे भी अनेक हैं।  'लर्न मोर टू अर्न मोर' वाली प्रबंधनीय उक्ति आपने भी सुनी होगी। अपने भविष्य को सजाने, संवारने और सुखमय बनाने को उद्दत अनेक विद्यार्थी इस सिद्धांत पर चलते हुए एक साथ एकाधिक कोर्स पूरा करने में लगे रहते हैं। जैसे घड़ी की सुई और  समुद्र की लहरें किसी का इंतजार नहीं करती हैं  और अपने काम में लगी रहती हैं, वैसे ही सीखने को आतुर लोग हर पल का  सदुपयोग करने में लगे रहते हैं । कहते हैं चीन के महान नेता माओ-से-तुंग  ने सत्तर साल की उम्र में अंग्रेजी भाषा सीखना प्रारम्भ किया। विश्व की सर्वाधिक प्रसिद्ध एवं लोकप्रिय चित्र के रूप में 'मोनालिसा' का नाम लिया जाता है जिसे प्रख्यात चित्रकार लियोनार्दो दि विंची ने बनाया था। इटली के फ्लोरेंस शहर में जन्मे इस विलक्षण व्यक्ति ने अपनी सीखने की  ललक के कारण चित्रकला के अलावे मूर्तिकला, गणित, सैन्य विज्ञान, संगीत आदि में भी महारत हासिल की। इतिहासकार  कहते हैं कि चित्रकला और मूर्तिकला में निपुणता अर्जित करने  लिए वे इस कदर मशरूफ थे कि उन्होंने  शरीर विज्ञान तक का गहन  अध्ययन किया। कहां संगीत, कहां गणित और कहां चित्रकला-मूर्तिकला, लेकिन लियोनार्दो ने हर क्षेत्र में गहरी पैठ बनाई और यह साबित कर दिया कि सीखने का संकल्प हो तो कुछ भी हासिल किया जा सकता है। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर  में भी सीखने की अद्भुत उत्कंठा थी जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने साहित्य के लगभग सभी विधाओं- कविता, कहानी, नाटक, गीत आदि  में  बहुत लिखा और बहुत उत्कृष्ट लिखा। उनके गीत संग्रह 'गीतांजलि'  के लिए उन्हें 1913 में साहित्य के नोबेल पुरस्कार  से सम्मानित किया गया था। गुरुदेव पहले भारतीय थे जिन्हें इस सर्वोच्च सम्मान से नवाजा गया। तो आइये, हम सब नववर्ष 2015 का स्वागत कुछ नया और अच्छा सीखने के संकल्प के साथ करें।

                  और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं। 

Sunday, December 21, 2014

मोटिवेशन : हम सभी अपनी जीवनशैली सुधारें

                                                                                           - मिलन सिन्हा 
clipदेश की आबादी निरन्तर बढ़ रही है और साथ ही लोगों की स्वास्थ्य सम्बन्धी जरूरतें और समस्याएं। सरकारें व संबंधित एजेंसियां अपना -अपना काम अपने ढंग व रफ़्तार से करने में जुटीं हैं, तथापि रोगों की संख्या और उससे पीड़ित लोगों की तादाद में इजाफा हो रहा है, जो सबके लिये गंभीर चिंता का विषय है। क्या देश की मौजूदा स्वास्थ्य व्यवस्था इस समस्या से प्रभावी रूप से निबट सकती है ? 

देश के जिन करोड़ों लोगों को अभी तक रोटी, कपड़ा, मकान जैसे मूलभूत आवश्यकताओं से जूझना पड़ रहा है, उनकी चर्चा यहाँ  न भी करें  तो भी यह जानना दिलचस्प होगा कि  जिन लोगों के पास खाने, पहनने और रहने की कोई समस्या नहीं है, ऐसे लोग भी कैसी -कैसी  बिमारियों के शिकार हैं और इनकी  संख्या बढ़ती जा रही है। 

ऐसे लोग खाने -पीने के मामले में सुबह से रात तक कितने -कितने और कैसे -कैसे अच्छे -बुरे विज्ञापन देखते रहते हैं और बिना ज्यादा सोचे -समझे विज्ञापित चीजों का सेवन करके अपना स्वास्थ्य खराब करते रहते हैं। अगर इन लोगों से  कुछ आसान से सवाल पूछे जायें  तो कितने लोग संतोषप्रद उत्तर दे पायेंगे। सवाल हैं : क्या आप जानते हैं कि 1) कब, कैसे और कितना पानी पीना चाहिए  2) कब, कितना और क्या -क्या खाना चाहिए 3) स्वस्थ जीवन के लिये टहलना व व्यायाम क्यों अनिवार्य है  4) सोना (स्लीप) सोना (गोल्ड) से ज्यादा अहम क्यों है और 5) योग और ध्यान का जीवन में कितना महत्व है ? सच मानिये, यदि उपर्युक्त सवालों का सही जवाब नहीं मालूम है तो अपने स्वास्थ्य को अच्छा  बनाये रखना मुश्किल होगा। कहने का तात्पर्य, आपके लिये अपनी जीवनशैली में उपयुक्त बदलाव अनिवार्य  है जिससे कि आप सदैव स्वस्थ एवं सानन्द रह सकें। 

आशा करनी चाहिए कि हर वक्त काम और व्यस्तता की दुहाई देने वाले हमारे समाज के ऐसे जानकार तथा संपन्न लोग, जिनमें अच्छी संख्या डॉक्टरों की भी है, आगे से यह नहीं भूलेंगे कि ज्ञान और धन का सदुपयोग स्वास्थ्य को साधने में करना सदा ही सुखद और फलदायक होता है। यह हमारी युवा पीढ़ी के लिये उनका एक प्रेरक सन्देश होगा।
                                                                                     (hellomilansinha@gmail.com)
                 और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं। 

Saturday, December 13, 2014

मोटिवेशन : वादा का दावा

                                                     - मिलन सिन्हा 
clip'जो वादा किया है, निभाना पड़ेगा; प्राण जाये, पर वचन न जाये ' - ऐसे जुमलों से हम दो-चार  होते रहे हैं और किसी -न -किसी रूप में ये हमारे मानवीय संस्कारों के साथ घुलमिल गए हैं। यही कारण है कि वादाखिलाफी हमें पसंद नहीं, यह हमें बुरी लगती है। लगे भी क्यों नहीं। वादा एक प्रकार का अलिखित आपसी अनुबंध है, जिसे पूरा करना कानूनन आवश्यक न भी हो, तथापि नैतिक रूप से अनिवार्य होता है । कहना अप्रासंगिक नहीं होगा कि वादा  करना, उसे निभाने का दावा करना और फिर खुद ही उस वादे के दावे की हवा निकाल देना, भारतीय राजनीति के चरित्र का अभिन्न हिस्सा बनता जा रहा है, जो निश्चय ही गांधी, तिलक, सुभाष जैसे लोगों की राजनीति से बिल्कुल अलग है। ऐसे, अब तो वादाखिलाफी समाज के हर क्षेत्र में किसी-न-किसी रूप में दिखने लगा है। बहरहाल, जानकार ख़ुशी होती है कि इस बदलते हुए राजनीतिक -सामजिक परिवेश में  अभी भी देश-विदेश के कई हिस्सों में व्यवसाय के साथ-साथ सामजिक जीवन में वादा निभाने की गौरवशाली परंपरा न केवल बरकरार व अप्रभावित है, बल्कि आधुनिकता एवं तेज रफ़्तार जिन्दगी के बावजूद सुदृढ़ हो रही  है । बिज़नेस मार्केटिंग में अनेकानेक अच्छी और बड़ी कंपनियां अब भी 'वादा कम, पूर्ति ज्यादा' यानि 'प्रॉमिस लेस, डिलीवर मोर' के सिद्धांत को सख्ती से अमल में लाते हैं। इससे ग्राहकों को अतिशय संतुष्टि मिलती है और अनायास ही कंपनी के उत्पादों के प्रति ग्राहकों का विश्वास अप्रत्याशित रूप से बढ़ जाता है। और हम सब जानते हैं कि 'संतुष्ट ग्राहक चलता-फिरता विज्ञापन होता है '। मार्केट विशेषज्ञ सच ही कहते हैं कि  कंपनी के ब्रांड इमेज में निरन्तर मजबूती के पीछे ये अहम कारण होते हैं। इन सबका गहरा सकारात्मक असर बिज़नेस पर पड़ना लाजिमी है । तभी तो ऐसी कई कंपनियां साल-दर-साल  मार्केट में अच्छा प्रदर्शन के लिये जानी जाती हैं । जाहिर है, इसका बहुआयामी फायदा ऐसी कंपनियों के कर्मचारियों को भी मिलता है । 

                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।