Tuesday, November 23, 2021

ठान लें तो कुछ भी मुश्किल नहीं

                           - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर एंड स्ट्रेस मैनेजमेंट  कंसलटेंट

कोरोना महामारी से आम जन को सुरक्षा प्रदान करने के असंभव से प्रतीत होने वाले लक्ष्य को सामने रखकर सबसे बड़े टीकाकरण अभियान की शुरुआत इसी साल 16 जनवरी को हुई थी और आश्चर्यजनक रूप से सिर्फ 279 दिनों में विविधताओं और विषमताओं से भरे 135 करोड़ आबादी वाले हमारे देश ने 100 करोड़ वैक्सीन डोज लगाने का एक बड़ा मुकाम हासिल कर लिया. इस ऐतिहासिक अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को संबोधित करते हुए देशवासियों का अभिनन्दन किया और उन्हें हार्दिक बधाई दी. यहां अगर हम पीछे मुड़ कर देखें तो हमें बहुत गर्व होगा कि किन-किन अप्रत्याशित और अत्यंत चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों से एक-एक कर निबटते हुए देश ने यह अपूर्व कीर्तिमान बनाया. कहने की जरुरत नहीं कि प्रधानमन्त्री के कुशल नेतृत्व में केन्द्र सरकार ने इस बात को सिद्ध कर दिया कि मुश्किल नहीं है कुछ भी अगर ठान लीजिए. बेशक इसमें राज्य सरकारों ने भी कमोबेश अपनी-अपनी भूमिका का निर्वहन किया. क्या छात्र-छात्राएं इससे सीख लेकर अपने छात्र जीवन की चुनौतियों से सफलतापूर्वक निबट सकते हैं? अगर हां तो इसके लिए क्या-क्या करना होगा? 


यह बिल्कुल सही बात है कि जितनी बड़ी चुनौती, उतनी बड़ी तैयारी. ऐसे समय अपनी सारी ऊर्जा को एकीकृत और केन्द्रित करने की आवश्यकता होती है. चुनौती बड़ी और तैयारी  छोटी हो तो परिणाम का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है. यह भी उतना ही सही है कि चुनौती कितनी भी बड़ी हो, घबराने से उससे निबटने की पहल ही कमजोर पड़ जाती है. मनोबल ऊँचा रहे तो चुनौती का सामना करने में मजा आता है और राह आसान प्रतीत होता है. इस स्थिति में तैयारी में पूरा मन लगा रहता है. नतीजतन तैयारी बेहतर हो पाती है और परिणाम सुखद.

 
फुल प्रूफ प्लानिंग के बगैर सफलता की कामना बेमानी है. लॉक डाउन हो या अनलॉक की प्रक्रिया, हर समय केन्द्र सरकार ने फुल प्रूफ प्लानिंग से कार्य को अंजाम देने का पूरा प्रयास किया. छिटपुट दुर्घटनाएं बेशक हुई, लेकिन हर बार स्थिति को जल्दी काबू में कर लिया गया.  विद्यार्थियों को अध्ययन काल में कुछ ऐसे ही सब कुछ सुनिश्चित करना चाहिए. मसलन पढ़ाई प्लानिंग के हिसाब से चले, फिर भी अगर किसी अप्रत्याशित कारण से व्यवधान उपस्थित हो जाय तो डैमेज कण्ट्रोल की व्यवस्था अपनाई जा सके. यह भी प्लानिंग का हिस्सा होता है.  

  
व्यवहारिक कार्य योजना का स्पष्ट मतलब है कि प्लानिंग के अनुसार हम हर कार्य को अंजाम दे पाएं. इस मामले में खुद की क्षमता और योग्यता के हिसाब से कार्य योजना बनानी चाहिए. हर विद्यार्थी अपने आप में अनोखा होता है. उसके अध्ययन का तरीका, समय प्रबंधन, शारीरिक संरचना आदि दूसरे से जुदा होती है. ऐसे में देखादेखी करने की कोई जरुरत नहीं है. बस अपनी प्लानिंग के मुताबिक़ कार्य योजना बनाएं और उस पर निष्ठापूर्वक अमल करें. 

 
आंतरिक संसाधनों का समुचित उपयोग किस तरह किया जाय, यह हमें कोरोना महामारी के रोकथाम और रिकॉर्ड टाइम में स्वदेशी वैक्सीन विकसित करने के मामले में अच्छी तरह दिखाई पड़ी. कुछ इसी तरह हर विद्यार्थी अपने पास उपलब्ध संसाधन जैसे पैसे, पाठ्य पुस्तक, रहने-खाने आदि से संबंधित संसाधन का समुचित उपयोग करें. ऐसा पाया गया है कि कई विद्यार्थी हर समय संसाधन के अभाव का रोना रोते रहते हैं, जब कि उनकी जरुरत के लिए जरुरी संसाधन उनके पास पहले से ही उपलब्ध होते हैं. अच्छा करने के लिए और संसाधन चाहिए की मानसिकता से बेहतर है कि जो उपलब्ध है, पहले उसका भरपूर उपयोग सुनिश्चित करें. 

 
देखा गया है कि समावेशी सोच और समयबद्ध कार्यान्वयन से सफलता की राह आसान हो जाती है. कोरोना टीकाकरण के देशव्यापी अभियान में आरम्भ से ही इस बात पर पूरा ध्यान दिया गया है. गरीब-अमीर किसी के साथ कोई भेदभाव किए बगैर सबको नियमानुसार एक निर्धारित टाइम फ्रेम में वैक्सीन लगाने का कार्य किया गया. सभी विद्यार्थियों को अपने जीवन में इसी सोच को उतारने की बहुत जरुरत है. सिर्फ हम ही सुविधा या साधन संपन्न हों, बाकी साथी-सहपाठी नहीं, यह सोच सही नहीं है. सामजिक प्राणी होने के नाते हमें मानवता की कसौटी पर खुद को कसना जरुरी है. तभी हम सही मायने में सफल होंगे और सुखी भी.  

 (hellomilansinha@gmail.com)      

      
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 
# लोकप्रिय पाक्षिक "यथावत" के  16-30 नवम्बर , 2021 अंक में प्रकाशित

#For Motivational Articles in English, pl. visit my site : www.milanksinha.com   

Tuesday, November 9, 2021

नशा को कहें ना और जिंदगी को हां

                              - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर एंड स्ट्रेस मैनेजमेंट  कंसलटेंट

नशे के शिकार विद्यार्थियों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है. नशे के अवैध व्यवसाय में संलिप्त लोगों और अपराधी तत्वों के लिए स्कूल-कॉलेज-यूनिवर्सिटी के विद्यार्थी सॉफ्ट टारगेट हैं. देश को आर्थिक, सामजिक, शैक्षणिक और सामरिक दृष्टि  से कमजोर करना भी उनके एजेंडा में शामिल है. यह बहुत चिंता का विषय है. हाल ही में मुंबई में नारकोटिक्स कण्ट्रोल ब्यूरो ने छापेमारी करके जिस तरह कुछ युवक-युवतियों को पकड़ा है और उनके पास से जो जानकारी मिल रही है, उससे इस भयानक संक्रमण के बढ़ते दायरे का अनुमान लगाया जा सकता है. बताते चलें कि नशीला पदार्थ विद्यार्थियों के शारीरिक तथा मानसिक स्थिति को बहुत दुष्प्रभावित  करता है. आमतौर  पर इसकी शुरूआत मौजमस्ती, उत्सुकता, मजबूरी या प्रलोभन, दोस्तों के दबाव या बहकावे जैसे एकाधिक कारणों से होती है, जो धीरे-धीरे आदत में बदलने के बाद व्यक्ति इसका आदी हो जाता है. आंकड़े बताते हैं कि  चरस, गांजा, अफीम, कोकीन, हेरोइन जैसे खतरनाक नशीली चीजों  के सेवन से लाखों विद्यार्थियों की जिंदगी बर्बाद हो रही है. इसी सन्दर्भ में आइए आज उन अहम बिन्दुओं पर चर्चा करते हैं जिससे छात्र-छात्राएं नशीले पदार्थों के सेवन से बचे रह सकें. 


किसी भी प्रलोभन में न पड़ें. अधिकतर मामलों में यह पाया गया है कि छात्र-छात्राएं किसी-न-किसी  प्रलोभन के चक्कर में नशे का शिकार होते हैं. प्रलोभन आर्थिक सहित कुछ भी हो सकता है. प्रलोभन देनेवाला व्यक्ति विद्यार्थी विशेष की मजबूरी और कमजोरी का आकलन कर उसे अपने जाल में आसानी से फंसाता है. यह व्यक्ति आपका कोई दोस्त, सहपाठी या परिचित हो सकता है. अतः इस पर विचार करना अनिवार्य है कि कोई यूँ ही रुपया-पैसा या अन्य प्रलोभन क्यों दे रहा है? 

 
क्षणिक मौज-मस्ती के लिए अपने भविष्य को दांव पर न लगाएं. आजकल रात में दोस्तों के साथ पार्टी में जाना कोई अनहोनी बात नहीं रह गई है. पहली बार इन पार्टियों में जानेवाले विद्यार्थियों पर अपराधी तत्वों की पैनी नजर रहती है और उनकी यह कोशिश होती है कि किसी तरह उन्हें नशीले पदार्थ का सेवन करवाया जाय, बेशक मुफ्त में ही सही. सिगरेट, गांजा, बीयर, शराब आदि आम नशीले पदार्थों से शुरुआत होती है और एक बार जब नशा न करने का बंधन टूट जाता है तो फिर आगे नशे की अंधेरी सुरंग में विचरण में कोई संकोच नहीं रहता है. शातिर अपराधी तत्व इन अवसरों का विडियोग्राफी कर लेते है और जरुरत पड़ने पर ब्लैकमेलिंग के लिए उसका बखूबी इस्तेमाल करते हैं. लिहाजा ऐसे मौज-मस्तीवाले पार्टी और ऐसे दोस्तों से बराबर दूर रहें. 

 
अध्ययन पर पूरा फोकस  बनाए रखें. आजकल पढ़ाई का इतना प्रेशर होता है कि अगर कोई भी विद्यार्थी अपने अध्ययन के लक्ष्य को सामने रखकर आगे बढ़े तो  मौज-मस्ती और नशाखोरी की ओर उसका ध्यान कतई नहीं जा सकता है. उसके लिए तो अच्छी तरह पढ़ना किसी नशे से कम नहीं होता. खुद को इस कार्य में संलग्न रखने के लिए वह शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रखने की कोशिश करता है. इसके लिए वह पौष्टिक खानपान और व्यायाम के प्रति भी गंभीर रहता है.  

 
बराबर घरवालों के संपर्क में रहें. कई सर्वेक्षणों में यह बात उभर कर आई है कि भावनात्मक रूप से परिवारजनों से जुड़े रहनेवाले विद्यार्थी अपेक्षाकृत कम संख्या में नशे के शिकार होते है. एकाकीपन और घर-परिवार से दुराव की भावना नशे की ओर किसी-न-किसी रूप से प्रेरित  करती है, ऐसा देखने में आता है. अपने घर से दूर दूसरे शहर और वह भी हॉस्टल में रहकर पढ़नेवाले विद्यार्थियों को पर्व-त्यौहार और लम्बी छुट्टियों में घर जरुर जाना चाहिए, जिससे कि उन्हें रिश्तों की महत्ता की अनुभूति हो और वे खुशी के पलों को  भरपूर जी सकें. 

  
भूल-चूक हो जाए तो तुरत स्वीकार कर सही रास्ते पर चलना शुरू करें. सावधानी बरतने के बावजूद भी कोई दुर्घटना हो जाए और आप नशा करने लगें, तो उस चक्कर से यथाशीघ्र निकलें. इसमें किसी दोस्त से कुछ पूछने या खुद किसी दुविधा में रहने की कोई जरुरत नहीं है. बेहतर यह होगा कि तुरत घर जाएं और अपने अभिभावक से सब कुछ साफ-साफ बता दें. वे नाराज हों या गुस्सा करें तो सब कुछ सहन करें और उनके सुझाए रास्ते पर चलें. पीछे मुड़कर देखने और उस आत्मघाती मार्ग पर लौटने की बात सोचना भी गलत होगा. जीवन से बड़ा कुछ भी नहीं होता. नशे की लत क्षणिक मजा दे सकता है, लेकिन यह जीवन को नरक बनाने का अहम जरिया है. 

 (hellomilansinha@gmail.com)

                  

             और भी बातें करेंगे, चलते-चलते. असीम शुभकामनाएं.            पाक्षिक पत्रिका "यथावत" के 01-15 नवम्बर, 2021 अंक में प्रकाशित  

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Friday, October 29, 2021

विवाद, संवाद और समाधान

                            - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर एंड स्ट्रेस मैनेजमेंट  कंसलटेंट

जीवन में कभी विवाद की स्थिति न आए, ऐसा नामुमकिन है. किसी भी विषय पर मतभेद होना  भी बहुत स्वाभाविक है. लेकिन हमेशा या अधिकांश समय विवाद में पड़ना या रहना और मनभेद का शिकार हो जाना विद्यार्थियों के लिए मुनासिब नहीं है. यह भी जानना और उसे आचरण में शामिल करना उतना ही जरुरी है कि हर विवाद का अंत संवाद से ही संभव हो पाता है. संवाद की मानसिकता से काम करने पर जीवन की अनेक समस्याओं का समाधान आसान हो जाता है. यह जानते हुए भी बहुत सारे विद्यार्थी जाने-अनजाने विवाद से घिरे और उसमें उलझे रहते हैं. काबिले गौर बात है कि अच्छे विद्यार्थी इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि विवाद से फायदा कम होता है. बहुमूल्य समय और ऊर्जा की क्षति बहुत होती है. वे यह भी जानते हैं कि बेवजह विवाद पैदा करनेवाले तत्व एक के बाद दूसरे विवाद में विद्यार्थियों को उलझाकर  अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं. उनकी मंशा यह भी होती है कि विद्यार्थियों को किस तरह विवाद के मकड़जाल में फंसाया जाए, जिससे कि उनका ध्यान अध्ययन से हटे और उनका रिजल्ट खराब हो जाए. हर शैक्षणिक संस्थान में मौजूद ऐसे लोगों से आप सभी परिचित होंगे. वे बात-बेबात ज्यादातर विद्यार्थियों के लिए अप्रासंगिक विषयों को  विवाद का मुख्य मुद्दा बनाने की कोशिश करते हैं. बेशक ऐसे विवादों से दूर रहना जरुरी है. यहां यह जानना भी जरुरी है कि छात्र जीवन में छात्र-छात्राएं विवादों से आम तौर पर कैसे निबटें, जिससे कि वे अध्ययन पर ज्यादा फोकस कर सकें? 


अध्ययन से जुड़े विषय पर ही बात करें: मित्र मंडली में या अन्यत्र हर वक्त इसका ध्यान रखें कि चर्चा का विषय अध्ययन से संबंधित हो. वहां भी सीखने-सीखाने पर बात हो तो अच्छा, अन्यथा वहां से प्रस्थान करना बेहतर है. इससे कुछ साथी-सहपाठी बेशक नाराज हो सकते हैं, लेकिन ऐसा करना ही सबके लिए हितकर होता है, क्यों कि इससे आपका फोकस नहीं बिगड़ता और मित्रों को भी सोचने और समीक्षा करने का एक और मौका मिल जाता है. इससे "हम भी रहें अच्छे, तुम भी रहो अच्छे" के सिद्धांत पर अमल भी हो जाता है.   


जाति, धर्म, राजनीति जैसे विषयों से दूर रहें: देखा गया है कि इन विषयों पर विवाद होने पर सार्थक चर्चा कदाचित ही हो पाती है. तर्क और तथ्य से परे भावना, अनुमान, पूर्वाग्रह व  संभावना पर बहस होने लगती है. कमोबेश सब अपने-अपने स्टैंड पर कायम रहते हैं. आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला शुरू हो जाता है. लिहाजा बातचीत का शायद ही कुछ निष्कर्ष निकलता है. 

 
विवाद को सुलझाने पर फोकस करें: अधिकतर मामलों में विवाद पर सिर्फ बहस होती रहती है. उसको सुलझाने या उसका समाधान खोजने पर फोकस नहीं रहता.  कई बार तो मूल मुद्दा ही गौण हो जाता है और अनावश्यक बातों में लोग उलझे रहते है, जैसा कि आम तौर पर आजकल प्राइम टाइम टीवी शो पर अहम मुद्दों पर चर्चा का हश्र होता है. अतः ऐसे अवसरों पर अपने व्यवहार और संवाद कौशल से समाधान तक पहुंचने का रास्ता तलाश लेना बुद्धिमानी है. 

 
असीमित समय खर्च न करें: समय अमूल्य है. बीता हुआ समय लौट कर नहीं आता. इस बात को दिमाग में रखकर चर्चा में शामिल हों. बेहतर यह होता है कि किसी एक मुद्दे पर, चाहे वह कितना ही विवादित हो, चर्चा का समय अधिकतम एक या दो घंटा नियत कर लें. हर विद्यार्थी को बोलने और उन्हें शांतिपूर्वक सुनने की शर्त सख्ती से लागू हो. ऐसा न होने पर पूरी संभावना होती है कि बहस असीमित समय तक चलता रहे, जिसका पश्चाताप बाद में ज्यादातर विद्यार्थियों को होता है.


आपसी कटुता से बचें: किसी विवाद पर बात करते-करते हमलोग  जाने-अनजाने व्यक्तिगत टिप्पणी या आक्षेप करने लगते हैं. इससे माहौल बिगड़ता है और अनावश्यक रूप से आपसी कटुता और मनमुटाव की स्थिति उत्पन्न हो जाती है. इसका बहुआयामी नुकसान सबको कम या अधिक मात्रा  में उठाना पड़ता है. सब जानते हैं कि अच्छे रिश्ते बनाने में बहुत समय लगता है, लेकिन ऐसे मौके पर उसके टूटने-बिखरने में समय नहीं लगता. देखा गया है कि विवादित विषय पर पेशेवर तरीके से चर्चा करने पर न केवल कई बिन्दुओं पर सहमति बन जाती है और आपसी कटुता से बचना संभव होता है, बल्कि आगे संवाद से समाधान तक पहुंचने के दरवाजे खुले रहते हैं. राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हर विवाद को सुलझाने में यही दृष्टिकोण अपनाया जाता है.     

 (hellomilansinha@gmail.com)

      
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 
# लोकप्रिय पाक्षिक "यथावत" के  16-31 अक्टूबर, 2021 अंक में प्रकाशित

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Tuesday, October 12, 2021

होंगे कामयाब की मानसिकता

                         - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर एंड स्ट्रेस मैनेजमेंट  कंसलटेंट

मन में है विश्वास, हम होंगे कामयाब की मानसिकता के साथ जीवनपथ पर चलनेवाले विद्यार्थियों की दिनचर्या और जीवनशैली पर गौर करना दिलचस्प है और सबके लिए लाभदायक भी. किसी भी संस्थान में ऐसे विद्यार्थियों की संख्या हो सकता है कि बहुत ज्यादा न हो, पर यही विद्यार्थी अपने-अपने क्षेत्र में देर-सवेर बड़ी सफलता हासिल करते हैं और नए-नए कीर्तिमान भी बनाते हैं. हाल में ही संघ लोक सेवा आयोग द्वारा घोषित सिविल सर्विसेज का रिजल्ट भी इसी तथ्य को संपुष्ट करता है. रैंकिंग में टॉप फिफ्टी में शामिल सफल लड़के-लड़कियों के बायोडाटा पर गौर करने पर यह बात साफ हो जाती है कि पहले, दूसरे या तीसरे प्रयास में असफल होने के बावजूद उनके मन में यह विश्वास बना रहा कि हम होंगे कामयाब और फलतः बेहतर कोशिश के जरिए उन्होंने इस मुकाम को हासिल किया. सवाल है कि आखिर ऐसे विद्यार्थी जीवन में कौन सी रणनीति अपनाते हैं. आइए जानते हैं. 


लक्ष्य के प्रति अटूट समर्पण: खूब सोच-समझ कर एक बार जो लक्ष्य तय करते हैं उसके प्रति पूर्णतः समर्पित रहते हैं. कोई द्वन्द या दुविधा का फिर कोई सवाल खड़ा नहीं होता. अब बस लक्ष्य को हासिल करने के लिए फुलफ्रूफ कार्ययोजना बनाकर उसपर अमल करने का हर संभव प्रयास करते रहते हैं. दूसरे क्या कर रहे हैं या करेंगे या कहेंगे, इसकी उन्हें कोई चिंता नहीं होती. इसके बजाय वे क्या कर सकते हैं और करेंगे उस पर ही उनका पूरा फोकस होता है. वे सोते-जागते बस अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में ध्यान केन्द्रित करते हैं और तदनुरूप एक्शन लेते हैं.   


खुद पर विश्वास: अपने आत्मविश्वास को हमेशा उच्च स्तर पर बनाए रखने के लिए खुद पर विश्वास करना अनिवार्य है. हर विद्यार्थी यह बेहतर जानता है कि उसके अध्ययन में कहां-कहां कमी है, उसमें कैसे गुणात्मक सुधार किया जा सकता है और यह भी कि उसे अंजाम तक पहुंचाने में वह खुद सक्षम है. किसी परीक्षा, टेस्ट या प्रतियोगिता में असफल होने की स्थिति में यह आकलन और खुद पर विश्वास बनाए रखना आगे की यात्रा को ज्यादा फलदायक बनाने की बुनियादी शर्त है. इसे वे बराबर याद रखते हैं और साथ ही सदा आशावान बने रहते हैं.  


उत्साह और ऊर्जा: अपने अध्ययन के प्रति सदैव बहुत उत्साहित रहना  सफलता का एक अहम पायदान होता है. उत्साह का स्पष्ट मतलब होता है लक्ष्य के प्रति आपका लगाव और समर्पण. और जब किसी चीज के प्रति यह लगाव और समर्पण रहता है तो उस चीज को हासिल करने के लिए आगे की कार्ययोजना आप खुद बनाने में जुट जाते हैं. हां, केवल उत्साह से काम संपन्न नहीं होता. इसके लिए अपेक्षित ऊर्जा की जरुरत होती है. ऐसे अनेक उदाहरण  मिल जायेंगे जब कोई विद्यार्थी अभीष्ट कार्य तो करना चाहता है, लेकिन ऊर्जा की कमी के कारण उसे कर नहीं पाता है. अतः अच्छे विद्यार्थी खुद को मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ और ऊर्जावान बनाए रखते हैं.  

  
नियमित कड़ी मेहनत: सब जानते हैं कि कड़ी मेहनत को कोई विकल्प नहीं है. फिर भी सभी विद्यार्थी ऐसा नहीं करते. ज्ञानीजन सही कहते हैं कि जैसा करेंगे, वैसा भरेंगे. कहने का तात्पर्य यह कि बिना अपेक्षित मेहनत के अपेक्षित रिजल्ट की कामना बेमानी है. सफलता को अपनी मुट्ठी में करने के लिए सजगता के साथ अध्ययन में अपना अधिकांश समय लगाना है. सफलता का परचम लहराने वाले विद्यार्थी हर विषय के एक-एक चैप्टर को न केवल समझ कर पढ़ते हैं,  बल्कि उसे बीच-बीच में दोहराते भी रहते हैं. हर संभावित सवाल का उत्तर लिखकर प्रैक्टिस करना उनकी  मेहनत को चार चाँद लगाता है. ऐसा नहीं कि वे परीक्षा से कुछ दिन या हफ्ते पहले रातभर जगकर पढ़ते हैं. उनके लिए तो नियमित रूप से कड़ी मेहनत करना दिनचर्या का अभिन्न हिस्सा होता है. 


असफलता से कभी घबराते नहीं: देखा  गया है कि असफल होने पर ज्यादातर विद्यार्थी दूसरे लोगों के टिप्पणियों को बहुत गंभीरता से लेने की भूल करते हैं. अच्छे विद्यार्थी  ऐसा नहीं करते. ऐसे समय उन्हें भी बुरा तो लगता है लेकिन वे बिना घबराए और कंफ्यूज हुए असफलता के कारणों का स्वयं विश्लेषण करके लक्ष्य के प्रति अपने संकल्प को और दृढ़ बनाना जरुरी समझते हैं. बिना समय गंवाए और बिना किसी पर दोषारोपण किए अपनी गलती का पता लगाते हैं, उससे सीख लेते हैं और बेहतरी के प्रयास में जी-जान से जुट जाते हैं. तभी तो कामयाबी उनके कदम चूमती है. 

(hellomilansinha@gmail.com)                

      
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 
# लोकप्रिय पाक्षिक "यथावत" के 01-15 अक्टूबर, 2021 अंक में प्रकाशित

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Tuesday, September 28, 2021

स्मरण शक्ति उन्नत करना है आसान

                           - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर एंड स्ट्रेस मैनेजमेंट  कंसलटेंट

आमतौर पर यह पाया जाता है कि ज्यादातर विद्यार्थी अपेक्षित मेहनत करने के बाद भी अपेक्षित रिजल्ट के हकदार नहीं बन पाते. व्यक्तिगत काउंसलिंग में अनेक विद्यार्थी मुझसे  पूछते हैं कि ऐसा क्यों होता है. इस समस्या की गहराई में जाकर विद्यार्थियों से बातचीत करने और फिर उसका विश्लेषण करने पर एक कॉमन बात जो सामने आती है, वह है यादाश्त की समस्या. छात्र-छात्राएं बेशक पढ़ते हैं, पर दो-चार दिन के बाद वह पूर्णतः याद नहीं रहता, कई बार तो बिल्कुल ही याद नहीं रहता. मीडिया में मेमोरी पॉवर को बढ़ाने के लिए कई तरह के उपायों और प्रोडक्ट्स के विज्ञापन हम सब अक्सर देखते रहते हैं. सच मानिए, अपनी स्मरण शक्ति को उन्नत करना हर विद्यार्थी के अपने हाथ में है. प्रस्तुत है कुछ आसान उपाय.    

     
पढ़ाई के समय बस पढ़ना: दिनभर में जब-जब पढ़ने बैठें, बस पढ़ाई पर ध्यान केन्द्रित करें. उस समय कोई दूसरा काम न करें. मोबाइल को ऑफ कर दें. जिस विषय के जिस चैप्टर को पढ़ना है, उसके विषय में पहले दो-चार मिनट चिंतन करें और अपने मन को उस टास्क के लिए तैयार करें. कई बार कोई चीज हमें पहली बार पूरी समझ में नहीं आती है. तो यह सोच कर कि यह विषय कठिन है, उसे छोड़ने की गलती न करें. इसके बजाय इस संकल्प के साथ उसे पूरे मनोयोग से दोबारा पढ़ें. आप पायेंगे कि इस बार आपको ज्यादा समझ में आया है. अब उसी संकल्प और मनोयोग से आप जब उसे फिर पढ़ेंगे तो 100 से 90 फीसदी बात पूरी तरह समझ में आ जाएगी. अगर 10 प्रतिशत बात जो किसी कारणवश समझ में नहीं आई तो उसे चिंतन का हिस्सा बनाने के साथ-साथ एक कॉपी में नोट कर लें, जिससे कि बाद में टीचर से आप उसका समाधान पा सकें. जब पूरी बात एक बार अच्छी तरह समझ में आ जाए तो अगले कदम के रूप में उसे लिखने का प्रयास करें. आप पायेंगे कि अच्छी तरह समझने के बावजूद आप उस चैप्टर को सौ फीसदी उसी रूप में नहीं लिख पा रहे हैं, कहीं अटक रहें हैं तो कभी भटक रहे हैं. यह अस्वाभाविक नहीं है. अतः परेशान होने की जरुरत नहीं है. यहां जरुरत है उसे फिर से पढ़ने, समझने और लिखने का अभ्यास करने की. दिलचस्प बात है कि किसी एक विषय को ठीक से याद कर लेने से यह गारंटी नहीं मिल जाती कि हमेशा आपको वह वैसे ही याद रहे. लिहाजा समय-समय पर इसे टेस्ट करके देखना बेहतर होता है. ऐसे भी कहा जाता है कि दिमाग को आप जिस विषय में जितना सक्रिय रखेंगे, वह चीज उतना ज्यादा याद रहेगी. कहने का तात्पर्य यह कि नियमित अभ्यास से बातें हमारे स्मृति में अच्छी तरह बैठ जाती हैं. 


सुबह जल्दी उठें और रात में अच्छी तरह सोएं: सुबह जल्दी उठें और दिन की शुरुआत पॉजिटिव सोच से करें. शरीर को हाइड्रेटेड करें यानी आराम से बैठकर कम-से-कम आधा लीटर पानी पीएं और फिर नित्य क्रिया से निवृत होकर सुबह एक-दो घंटा पढ़ने की आदत डालें. एकाधिक मेडिकल रिसर्च बताते हैं कि सुबह पढ़ी हुई चीजें हमें ज्यादा अच्छी तरह याद रहती हैं. इसके कई कारण हैं, जैसे दिमाग फ्रेश रहता है, शरीर ऊर्जावान, वातावरण अपेक्षाकृत साफ़ और ऑक्सीजनयुक्त आदि. सच तो यह भी है कि सुबह की बेहतर शुरुआत से मन प्रसन्न हो जाता है और आत्मविश्वास व यादाश्त में वृद्धि. इसका पॉजिटिव असर हमारे दिनभर के सभी एक्टिविटी पर पड़ता है. देर रात तक जगकर पढ़ने की आदत मेमोरी को कमजोर करती हैं और शरीर को दुर्बल. अतः रात में जल्दी सोना चाहिए. रात में सात-आठ घंटे की अच्छी नींद मेमोरी पॉवर को उन्नत करने में अहम भूमिका निभाती है. अंग्रेजी के एक प्रसिद्द कहावत का भावार्थ है कि रात में जल्दी सोने और सुबह जल्दी उठने वाले लोग स्वस्थ, समृद्ध और बुद्धिमान होते हैं.

    
हमेशा कुछ नया सीखने की कोशिश करें: हमारे दिमाग की क्षमता असीमित है, लेकिन  सामान्यतः  हम उसका बहुत कम उपयोग करते हैं. हम एक कम्फर्ट जोन में रहना पसंद करते हैं. अतः अनेक नई चीजें नहीं सीख पाते हैं. पाया गया है कि हम अपने दिमाग को जितना नई चीजों को सीखने में लगायेंगे, दिमाग की सक्रियता उतनी बढ़ेगी और स्मरण शक्ति भी. यह शतरंज जैसा कोई नया खेल हो सकता है या सिलेबस में शामिल कोई नया विषय या शब्द पहेली का नया टास्क या अन्य कोई सकारात्मक विधा. करके देखिए, बहुत लाभ होगा.  

 (hellomilansinha@gmail.com)


             और भी बातें करेंगे, चलते-चलते. असीम शुभकामनाएं.            पाक्षिक पत्रिका "यथावत" के 16-30 सितम्बर, 2021 अंक में प्रकाशित  

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Friday, September 17, 2021

जीवन में एक हॉबी जरुरी है

                              - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर एंड स्ट्रेस मैनेजमेंट  कंसलटेंट

मेरे मोटिवेशनल एवं वेलनेस सेशन में छात्र-छात्राएं अमूमन यह सवाल जरुर पूछते हैं कि अपने खाली समय का सदुपयोग कैसे करें जिससे कि जीवन में खुशी मिलती रहे और तनाव को मैनेज करना आसान हो. वाकई यह सवाल अमूमन हर विद्यार्थी से किसी-न-किसी रूप में जुड़ा है. इस प्रश्न का जवाब यह है कि हर विद्यार्थी का एक-न-एक हॉबी होना जरुरी है, जिसमें उसकी रूचि हो और अध्ययन के बाद बचे हुए समय में उसमें समय बिताने में वह आनंद महसूस करे. यहां यह स्पष्ट करना जरुरी है कि हॉबी का मतलब कोई पॉजिटिव एक्टिविटी जो व्यक्ति और समाज दोनों के लिए हितकारी हो.


इसमें कोई दो मत नहीं है कि विद्यार्थियों के लिए पूरे समय घर के अंदर रहकर केवल पढ़ाई करना कठिन होता है, खासकर इस महामारी के दौर में, जब बाहर जाने में पाबंदी है और गए तो बहुत सावधानी बरतने की बाध्यता होती है. काबिले गौर बात है कि इनमें से अधिकतर विद्यार्थियों के पास अपने खाली समय में करने को ज्यादा कुछ नहीं होता सिवाय अपने स्मार्ट फोन या कंप्यूटर-लैपटॉप पर व्यस्त होने और वह भी ज्यादातर समय नकारात्मक बातों या अप्रासंगिक साइट्स पर घूमते रहने के. इसके विपरीत वे विद्यार्थी जो अपेक्षाकृत स्मार्ट, बुद्धिमान और कुछ हद तक भाग्यवान  भी होते हैं  उनका  एक या ज्यादा हॉबी होता है. वैसे विद्यार्थी एकाधिक तरीके से बहुत फायदे में रहते हैं. ऐसा पाया गया है कि वे ज्यादा स्वस्थ, खुश और सफल भी रहते हैं. खुशी की बात है कि हॉबी की सूची बहुत बड़ी है और इन्हें इंडोर या आउटडोर एक्टिविटी के रूप में एन्जॉय किया जा सकता है. खासकर महामारी जैसे कठिन समय में कोई ऐसा हॉबी जिसे घर में रहकर ही एन्जॉय किया जा सकता है, वाकई  किसी वरदान से कम नहीं है. कहने की जरुरत नहीं कि  संगीत, नृत्य, पेंटिंग, अच्छी किताबें पढ़ना, कार्टून बनाना, सिलाई, कढ़ाई, ब्लॉग लिखना, शतरंज, कैरम बोर्ड जैसे कई अन्य हॉबी को अपना कर इसे अमल में लाया जा सकता है. बाहर जाकर अपने शौक को पूरा करने में हर तरह के मैदानी खेल जैसे हॉकी, फुटबॉल, क्रिकेट से लेकर लॉन टेनिस, कबड्डी, वॉलीबॉल तक कोई खेल या कोई  सामाजिक-सांस्कृतिक एक्टिविटी जैसे अनेकानेक हॉबी में छात्र-छात्राएं खुद को सकारात्मक रूप से व्यस्त रख सकते हैं.  


दिलचस्प तथ्य यह है कि विश्वभर में जितने भी विभूतियों  ने आम लोगों को प्रेरित और प्रोत्साहित किया है और कर रहे हैं, उन लोगों ने अपने मूल कार्यकलाप के अलावे अपने खाली  समय में एक या ज्यादा हॉबी में भी खुद को व्यस्त रखा है. प्रसिद्द वैज्ञानिक और पूर्व राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम को वीणा बजाने का शौक था. महात्मा गांधी को चरखे पर सूत कातना और प्राकृतिक चिकित्सा से जुड़े जन कल्याण का शौक था. महान भौतिकशास्त्री और नोबेल  पुरस्कार विजेता अल्बर्ट आइंस्टीन को वायलिन बजाने और नौकायन की हॉबी थी. कभी-कभार जब वे किसी वैज्ञानिक गुत्थी को सुलझाने के क्रम में उलझ जाते थे, तो माइंड को रिफ्रेश करने के लिए वायलिन बजाते थे. उसी तरह दो बार नोबेल पुरस्कार हासिल करनेवाली महिला  वैज्ञानिक मैरी क्यूरी को लम्बी दूरी तक साइकिल चलाने का शौक था. मजेदार बात है कि अपने हनीमून के दिन क्यूरी दम्पति ने उत्तरी फ्रांस में बहुत देर तक साइकिल चलाकर आनंद उठाया. धोनी, कपिल देव और इआन बोथम जैसे कई क्रिकेटर हॉबी के रूप में नियमित रूप से फुटबॉल खेलते रहे हैं.


दरअसल, अपने हॉबी के माध्यम से छात्र-छात्राएं अपने पसंदीदा एक्टिविटी में क्वालिटी टाइम  बिता सकते हैं और अपने स्ट्रेस को भी अच्छी तरह मैनेज कर सकते हैं. इससे न केवन वे मानसिक   रूप से मजबूत और उन्नत होते हैं, बल्कि दिमाग से नकारात्मक विचारों को कम करने में सक्षम होते  है. बोनस के रूप में उनकी पॉजिटिव सक्रियता बढ़ती है और वे इनोवेटिव, क्रिएटिव और हैप्पी फील करते हैं. प्रसिद्द ब्रिटिश रचनाकार जॉर्ज बर्नार्ड शॉ तो कहते हैं कि जो व्यक्ति अपने हॉबी के साथ जीता है वह वाकई खुश रहता है. तो विद्यार्थियों के लिए संदेश एकदम स्पष्ट है कि अपने दिमाग को खाली मत  छोड़ें क्यों कि कहा जाता है कि खाली दिमाग शैतान का घर होता है; अपने अध्ययन के अलावे किसी हॉबी में रोजाना कुछ समय व्यतीत करें, जिससे कि आप खुद को रिफ्रेश कर सकें और अपने मुख्य एक्टिविटी यानी अध्ययन आदि को ज्यादा उत्साह और उमंग से जारी रख सकें. निसंदेह इससे जीवन में सफलता व खुशी में इजाफा होना निश्चित है.  

  (hellomilansinha@gmail.com)                

      
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 
# लोकप्रिय पाक्षिक "यथावत" के 01-15 सितम्बर, 2021 अंक में प्रकाशित

#For Motivational Articles in English, pl. visit my site : www.milanksinha.com   

Friday, September 10, 2021

स्ट्रेस मैनेजमेंट: कहीं आप बेवजह तो तनावग्रस्त नहीं

                                               - मिलन  सिन्हा,  स्ट्रेस मैनेजमेंट एंड वेलनेस कंसलटेंट 

हाल ही में एक व्यक्ति ने अपनी परेशानी बताते हुए कहा कि जब भी वे मार्केट जाते हैं या किसी ऑफिस आदि में और वहां लोगों को गलत काम या व्यवहार करते देखते हैं, तो गुस्सा आता है. उन्हें कुछ कहना चाहते हैं, पर कह नहीं पाते. खुद अंदर-ही-अंदर उबलते हैं और कई दिन यही सोचकर तनाव में रहते हैं. इससे बचने के लिए क्या करें? 

दरअसल, यह उस व्यक्ति की समस्या मात्र नहीं है. ऐसा अनेक लोग फील करते हैं. विचारणीय बात यह है कि यह स्थिति आपके नियंत्रण क्षेत्र में है या नहीं. अधिकांश मामलों में  नहीं. यह सही है कि आपको कुछ गलत होते हुए देखना अच्छा नहीं लगता. आपका नाराज होना या क्रोधित होना भी गैर वाजिब नहीं है. उस कारण तनाव ग्रस्त होना जरुर गैर मुनासिब है. ऐसे सभी मामलों में जो गलत कर रहा है, उसे न तो आपके बुरा लगने से कोई फर्क पड़ता है और न ही उसमें  कोई सुधार होता है. कई बार तो आपकी नाराजगी का उसे भान भी नहीं होता. इधर आप नाराज, क्रोधित और तनावग्रस्त होकर अपना ढेर सारा नुकसान कर लेते हैं. है कि नहीं? 

लक्ष्मण रेखा तय करें और बहस में न उलझें: ऐसी स्थिति में आपको जो करना चाहिए वह यह कि आप गलत काम में संलग्न व्यक्ति को पूरी शालीनता और शान्ति से बस यह बता दें कि उनका गलत काम या व्यवहार आपको बुरा लगा. इसके रिएक्शन  में वह कुछ भी कहे, आप उससे बहस में न उलझें. यही आपकी लक्ष्मण रेखा है. समझनेवाली बात यह है कि आपका अपने कार्य या आचरण पर तो कंट्रोल हो सकता है, लेकिन बाहर के किसी व्यक्ति पर शायद नहीं. हां, गलत करनेवाले को टोकने की एक जिम्मेदार नागरिक का कर्तव्य जरुर निभाएं. इसके अच्छे परिणाम मिल जाए तो खुश हो लें, न मिले तब भी इस बात से खुश होने का प्रयास करें कि आपने कोशिश तो की. किसी भी अवस्था में खुद तनावग्रस्त होने का तो कोई अर्थ नहीं है. अमेरिकी विचारक रेनहोल्ह निबुहर सही कहते हैं, "हे ईश्वर, मुझे उन चीजों को स्वीकार करने की स्थिरता दें जिन्हें मैं बदल नहीं सकता, उन चीजों को बदलने का साहस दें जिन्हें मैं बदल सकता हूँ और दोनों में अंतर करने की बुद्धि दें."  

  (hellomilansinha@gmail.com) 


             और भी बातें करेंगे, चलते-चलते. असीम शुभकामनाएं.            "प्रभात खबर हेल्दी लाइफ " में  01 सितम्बर , 2021 को प्रकाशित   

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