Monday, November 10, 2014

मोटिवेशन : जो करें, मन से करें

                                                   - मिलन सिन्हा
जो भी करना, मन लगा कर करना - मन लगाकर पढ़ना , मन लगाकर काम  करना  - इस तरह की नसीहत बचपन से लेकर बड़े होने तक, घर-स्कूल से लेकर ऑफिस तक बड़े -बुजुर्ग व वरिष्ठ अधिकारी -सहयोगी हमें हमारी बेहतरी के लिये देते रहे हैं। लेकिन क्या हमने कभी गंभीरता से इस सवाल पर विचार किया है कि काम करने और मन लगाकर काम करने में वाकई कोई बुनियादी फर्क है ? सच मानिए, छोटा -मोटा फर्क नहीं, जमीन -आसमान का फर्क है ! आखिर कैसे ? कुछ वैसे ही जैसे क्लास में शिक्षक पूरा चैप्टर पढ़ा गए और अंत में जब हमसे उन्होंने एक छोटा-सा प्रश्न पूछा तो हम उत्तर नहीं दे सके, जब कि अन्य कई सहपाठियों  ने न केवल उस सवाल का बल्कि उक्त  क्लास में पढ़ाये गए और कई सवालों का जवाब आसानी से दे दिया। ऐसा कैसे सम्भव हुआ ?  दरअसल, तन से तो हम वहां मौजूद थे और शिक्षक महोदय द्वारा पढ़ाये जाने वाले विषय के प्रति तन्मय भी दिख रहे थे, लेकिन क्या हमारा मन वहां था ? शर्तिया नहीं ! पढ़ने, काम करने आदि की बात छोड़ें, बहुत लोग तो क्या खा रहे हैं, कितना खा रहे हैं - उसकी बाबत पूछने पर  कि  क्या -क्या चीजें घंटे भर पहले खाईं, बताने में असमर्थ रहते हैं। किसी भी कार्य में बस यूँ  ही लगे रहने और मन से उसे करने में यही मूलभूत अंतर होता है। जब हम किसी काम को मन से करते हैं तो न केवल उसमें अपेक्षित रूचि लेते हैं, पूरी तन्मयता से उसे अंजाम देने  की भरपूर कोशिश करते हैं, बल्कि  उस काम को संपन्न  करने का पूरा आनंद भी महसूस करते हैं  इसके विपरीत जब हम उसी काम को बेमन से करते हैं, बोझ समझकर करते हैं तो उस कार्य की गुणवत्ता तो प्रभावित होती ही है, कार्य पूरा होने के बाद भी आनंद की अनुभूति नहीं होती है, सिर्फ यह लगता है कि सिर से बोझ उतर गया।  काबिलेगौर बात यह भी है कि मन से काम करने से हमारी कार्यक्षमता बढ़ती है, आत्मविश्वास में इजाफा होता है, समय का पूरा सदुपयोग होता है और साथ में उक्त कार्यक्षेत्र में हमारी एक अच्छी पहचान भी बनती है  

             और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Sunday, November 2, 2014

मोटिवेशन : दिखावा क्यों करें ?

                                                                    - मिलन सिन्हा
 अच्छा होना और अच्छा दिखना तो अच्छी बात है, परन्तु इसके विपरीत सिर्फ दिखावाआडम्बर आदि  से रुतबा बढ़ाने के बढ़ते चलन को क्या कहेंगे । एक नहीं अब तो कई एक  मुखौटे लगा कर चलनेवाले लोगों की कमी नहीं है । असली -नकली की पहचान मुश्किल हो रही है । नकली सामान से लेकर नकली चेहरे दिखाकर  बाजार में खूब खरीद-बिक्री हो रही है । मार्केटिंग की दुनिया का आम जुमला, 'जो दिखता हैवही बिकता हैका असर बाजारवाद के मौजूदा दौर में सब तरफ दिखाई पड़ रहा है । 

कहने का अभिप्राय यह कि दिखाने की ख्वाइश का जोर और दबदबा हर क्षेत्र में सिर चढ़ कर बोल रहा है ।  लेकिन इसका दिलचस्प पहलू यह है कि इस दिखने -दिखाने में छुपाने पर बहुत ध्यान दिया जाता है । बल्कि यूँ कहें तो छुपाना ही दिखाने की कला को सफल बनाने की पहली अहम शर्त बनती जा रही है तमाम तरह के फेयरनेस क्रीम व अन्य सौंदर्य प्रसाधनों से चेहरे आदि को रंगने की कवायद कुछ अलग दिखने -दिखाने की चाहत का एक मजबूत पक्ष  है । 

दिखाने में ही क्योंबोलने में भी यही प्रचलन है - मन में कुछ होता है लेकिन मंच से कुछ अलग ही बोलते हैं । फलतः जब  बोलते हैं तो विषयवस्तु पर फोकस नहीं कर पाते । दुःख की बात है कि  यह सब करते हुए हम अपनी  मौलिकता से दूर जाते रहते हैं और अंततः खुद से कट कर एक अजीब सी शख्सियत के मालिक बन बैठते हैं । 

क्या कभी हमने यह भी सोचा है कि दिखावा करने के चलते हमारे कितने धनसमय और ऊर्जा का अपव्यय होता है । सच पूछिये तो  खुद को छुपाने और जो हम नहीं हैंवह दिखाने की कोशिश हमें झूठ एवं फरेब के रास्ते पर ले जानेवाला  साबित होता हैजुर्म की अंधी गली में पहुंचने को उत्प्रेरित करता है

क्या गांधीलिंकनआइंस्टीनमदर टेरेसामंडेला सरीखे देश -दुनिया के बड़े व सम्माननीय लोग  सरलसादा और मौलिक जीवन जी कर लाखों -करोड़ों लोगों के लिये प्रेरक व अनुकरणीय नहीं बने ?  दरअसलदिखावे से बचना गुड लाइफ की एक अनिवार्य शर्त है । 

                              और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Saturday, October 18, 2014

मोटिवेशन : इस बार पटाखे रहित दीवाली, प्लीज

                                                                                - मिलन सिन्हा 
आनन्द, उल्लास एवं प्रकाश का पर्व दीपावली सामने है। अंधकार पर प्रकाश की विजय के इस  त्योहार को पूरे देश  के हर गाँव -शहर में  मिलजुल कर मनाने की गौरवशाली परम्परा रही है। इस पावन मौके पर बच्चे और युवा ही क्यों, घर के बड़े -बूढ़े भी उत्साह व उमंग से भरे नजर आते हैं। लेकिन पिछले कई वर्षों से इस पावन उत्सव के साथ ध्वनि प्रदूषण एवं वायु प्रदूषण का  गंभीर  जुड़ाव स्पष्ट दिखाई पड़ रहा  है, जो वाकई चिन्ता का विषय है। दरअसल, पटाखे आदि के बढ़ते प्रयोग से शोर तो होता है, साथ में धुंए के रूप में अनेक हानिकारक गैस हमारे पर्यावरण को और भी दूषित करते हैं। ज्ञातव्य है कि अनेक जाने -पहचाने कारणों से हमारे देश में ध्वनि/वायु प्रदूषण जानलेवा स्तर तक पहुँचने लगा है। परिणामस्वरूप, एक बड़ी आबादी दमा, हृदय रोग, कैंसर, चर्म रोग आदि से ग्रस्त हैं । गर्ववती महिलाएं और पांच साल तक के बच्चे ऐसे  प्रदूषण से बुरी तरह प्रभावित होते हैं। इतना ही नहीं, इससे पशु-पक्षी एवं वनस्पति तक को गहरी क्षति होती है। देश की राजधानी दिल्ली तो विश्व के कुछ सबसे बड़े प्रदूषित शहरों में शामिल हो गया है। तो आखिर क्या करें? इस बार भी पटाखे व आतिशबाजी के खेल में चाहे -अनचाहे शामिल रहें  या  इस नुकसानदेह  ट्रेंड को रोकने  के लिए व्यक्तिगत एवं सामजिक स्तर पर कुछ पहल करें और उन तमाम कोशिशों को अंजाम तक पहुँचाने  में बढ़-चढ़ कर भाग लें। हाँ, सरकार को भी इससे संबंधित कानूनी प्रावधानों को  सख्ती से लागू करने के लिए लोकतांत्रिक तरीके से मजबूर करने की जरुरत तो है ही। बहरहाल, ख़ुशी की बात है कि पटना सहित देश के अनेक भागों में हमारे स्कूली बच्चे इस बार और भविष्य में हर बार ग्रीन दीवाली मनाने का संकल्प ले रहे हैं। बच्चों ने प्रदूषण रहित दीवाली मनाने के लिये अन्य लोगों से अपील करने का फैसला भी किया है जो एक सराहनीय शुरुआत है। आशा है, हम सबका सम्मिलित प्रयास "नो क्रैकर" अभियान को आगे बढ़ाने में जरूर कामयाब होगा जिससे सबकी दीवाली स्वस्थ, शुभ और आनन्दमय हो सके 

            और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Tuesday, October 14, 2014

आज की कविता : जगत मिलन

                                                                  - मिलन सिन्हा 
adventurer

जगत मिलन 

सख्त चेहरा था उसका 
पत्थर जैसा 
झांक कर देखा अंदर 
बच्चों -सा दिल 
मोम -सा पिघलने लगा 
संकल्प था उसके मन में 
सपना सबका पूरा करूँगा 
मिलन का वातावरण होगा 
हर होंठ पर स्मिति ला दूंगा 
शालीन बनकर साथ रहूँगा। 

                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

प्रवक्ता . कॉम पर प्रकाशित, दिनांक :07.06.2014

Sunday, October 12, 2014

मोटिवेशन : परिवर्तन स्थायी है

                                                          - मिलन सिन्हा
clipसमय बदलता रहता है और बदलता रहता है हम सबका जीवन। आम तौर पर  परिवर्तन के साथ अनिश्चितता और शंका -आशंका तो होती है, पर साथ होता है अनजाने- अनदेखे के प्रति जिज्ञासा व उत्साह भी। ऐसे में, परिवर्तन निराशा व भय से भरा हो सकता है, तो ऊर्जा एवं उम्मीद से भरा भी। परन्तु, यह जरूर हमारे अख्तियार में होता है कि हम इसे सकारात्मक रूप से लेते हैं या फिर नकारात्मक तौर पर। जो भी हो, दिलचस्प बात यह है कि  परिवर्तन हमें  जड़ता व 'कम्फर्ट जोन' से बाहर निकलने का अवसर देता है और कई बार मजबूर भी करता है। देखिये न, हाल ही में संयुक्त राष्ट्र संघ में दिये गए हमारे प्रधानमंत्री के भाषण में भी परिवर्तन को अंगीकार कर एक बेहतर भविष्य की ओर बढ़ने का आह्वान किया गया। 

शाश्वत सत्य यह है कि परिवर्तन एक स्थायी प्रक्रिया है। लिहाजा, परिवर्तन के प्रति अपने नजरिये को परिवर्तित करना जरुरी होता है। देखें तो ऐसा हम सब सुबह से शाम तक करने की कोशिश भी करते हैं। घर हो या दफ्तर, स्कूल या कॉलेज, अस्पताल  या  बाजार  हर जगह  हमारा रोज कितने प्रकार के बदलावों से सामना होता  है, उनसे हमें निबटना पड़ता है। बेशक ये बदलाव छोटे -मोटे  तथा  जाने-पहचाने  होते हैं, लिहाजा  हमें परेशान नहीं करते। हम इनसे आसानी से पार पा लेते हैं। हाँ, ये सही है कि बड़े परिवर्तन हमारे लिये कठिनाई पैदा करते हैं। लेकिन यह भी तो सही है कि अगर कठिनाई है तो उसका कोई-न-कोई  निदान भी है। और फिर कठिनाई के उस पार संघर्ष से अर्जित उपलब्धि का आनन्द भी तो होता है। सो, करना यह चाहिए कि हर ऐसे बदलाव से जुड़े तथ्यों की जानकारी पाने की कोशिश करें; इसके सकारात्मक पक्ष को देखें; बदलाव को भावनात्मक स्तर पर लेने के बजाय पेशेवर तरीके से लें आदि, आदि । ऐसा पाया गया है कि ऐसे मौकों पर जो लोग व्यक्तिगत हठ छोड़कर मानसिक रूप से लचीला बने रहते हैं, उनके लिये परिवर्तन को एन्जॉय करना आसान हो जाता है देश-विदेश के अनेक राजनीतिक नेता इसके बेहतर उदाहरण रहे हैं।  

              और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

# 'प्रभात खबर' के मेरे संडे कॉलम, 'गुड लाइफ' में प्रकाशित, दिनांक : 12.10.2014

Friday, October 3, 2014

आज की कविता : जीवन के बीज

                                                        - मिलन सिन्हा 
blue sky grass trees hd picture

जीवन के बीज

बारिश होती है 
भागता है शहरी 
तलाशता है छत 
पीता  है चाय 

बारिश होती है
झूमता है देहाती 
बाहर आता है छोड़कर छत 
बोता है जीवन के बीज।


               और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

प्रवक्ता . कॉम पर प्रकाशित, दिनांक :07.06.2014

Sunday, September 28, 2014

मोटिवेशन : सुनने के फायदे

                                                                - मिलन सिन्हा
सुनना एक कला है और एक लोकतांत्रिक सोच भी - यह हमने अनेकों बार सुना है ।  कहा जाता है कि खुली आंख, खुला कान और खुले दिमाग वाले लोग अपेक्षाकृत ज्यादा संतुलित, मर्यादित एवं संयमित होते हैं । अच्छे श्रोता का अच्छा वक्ता होना स्वाभाविक माना गया है ऐसे भी, आम लोगों  की यह धारणा गलत नहीं है कि जो नेता -प्रतिनिधि जनता की बात ठीक से  सुनते तक नहीं हैं उनसे काम करने -करवाने की उम्मीद करना बेकार है । आप भी जानते हैं कि मरीज एवं उनके परिजन ऐसे डॉक्टरों से परेशान व पीड़ित रहते हैं जो रोगी की पूरी बात अच्छी तरह सुनने से पहले ही उपचार पर्ची (प्रिस्क्रिप्शन) लिख देते हैं । अनेक अभिभावकों और शिक्षकों का अपने बच्चों तथा विद्यार्थियों से पेश आने का यही तरीका है । ज्ञातव्य है कि अधिकारियों विशेषकर प्रशासनिक व पुलिस अधिकारियों में  आम तौर पर श्रवण संयम की कमी पाई जाती है । दरअसल, अच्छी तरह सुनना न केवल बोलनेवाले के प्रति सम्मान प्रदर्शित करता है, बल्कि किसी भी सफल संवाद प्रक्रिया की अनिवार्य शर्त भी होती है । अधूरा सुनने एवं उस आधार पर मत बनाने का परिणाम सामान्यतः बहुत घातक और नुकसानदेह होता है । सच पूछिये तो हममें से अधिकांश लोग शरीर से तो वक्ता के साथ दिखाई देते हैं, लेकिन दिमाग से कहीं और होते हैं ।  दूसरे, बहुधा हम बोलनेवाले की बातों को समझने, जानने तथा सीखने के लिये नहीं, अपितु  सवाल -जवाब करने  की मंशा से सुनते हैं । यही हमारे लिये विषय वस्तु से भटकने  और जवाब में ऊलजलूल बोलने का कारण बनता है । आजकल के टीवी बहसों में शामिल लोगों के साथ -साथ एंकरों के भी लगातार चीखते रहने और अंततः बहस को अर्थहीन बनाने का सबब भी यही है । महान व्यक्तियों की जीवनी पढ़ने तथा अपने आसपास के अच्छे लोगों का व्यवहार आदि को देखने से साफ़ हो जाता है कि वे किस तन्मयता से छोटे-बड़े सबकी बात या समस्या सुनते हैं और उन्हीं बातचीत में से समाधान का सूत्र तलाशने में कामयाब होते हैं । 

            और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं