Sunday, April 26, 2015

मोटिवेशन : पुस्तक और हम

                                                                   - मिलन सिन्हा 
clipकिताबें हमारे जीवन में अहम रोल निभाती  रही हैं. दुनिया से हमारा परिचय करवाते रहने का यह एक सशक्त जरिया है. गीता, कुरान, बाइबिल जैसे ग्रंथों की बात न भी करें, तब भी ऐसी बहुत से किताबें हैं जो अनेक महान व्यक्तियों के जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन का माध्यम बनी हैं. गाँधी जी को ही लें. उनके जीवन में जॉन रस्किन एवं लियो टॉलस्टॉय की किताबों की भूमिका  का जिक्र गाँधी जी ने खुद किया है. दूसरी ओर महापुरुषों की जीवन गाथा पढ़ कर लाखों-करोड़ों लोगों ने अपने जीवन में अकल्पनीय बदलाव लाया है, लाते रहेंगे. गाँधी जी आत्म कथा, ‘सत्य के प्रयोग’ को पढ़ कर न जाने कितने ही भटके हुए लोगों ने फिर से एक सार्थक और सम्मानजनक जिंदगी जीना प्रारंभ किया. यह सिलसिला आगे भी चलता रहेगा.

बहरहाल, उदारीकरण के इस दौर में देखने में आता है कि नौकरी या व्यवसाय में जाने के बाद हममें से अनेक लोग जाने-अनजाने पढ़ना छोड़ देते हैं या छुट्टी आदि में भूले-भटके पढ़ लेते हैं. ऐसे भी टीवी, कंप्यूटर, मोबाइल और इंटरनेट के इस दौर में हमारा समय कैसे गुजर जाता है पता ही नहीं चलता. तभी तो गुलजार साहब को लिखना पड़ता है, “किताबें झांकती है बंद अलमारी के शीशे से/ बड़ी हसरत से तकती हैं / महीनों अब मुलाक़ात नहीं होती / जो शामें उनकी शोहबत में होती थीं ....” लेकिन इससे यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि लोगों में पढ़ने, जानने और समझने की प्यास बुझती जा रही है. हर साल देश के विभिन्न शहरों में पुस्तक मेला का आयोजन और उसमें भाग लेनेवाले लाखों–करोड़ों पुस्तक प्रेमियों ने इस बात को स्पष्टतः रेखांकित किया है कि इंटरनेट जैसे संचार तकनीक के बढ़ते प्रभाव और किताबों के डिजिटल फॉर्म में कंप्यूटर के स्क्रीन पर सुलभता के बावजूद किताबों को अपने हाथ में लेकर पढ़ने का जो एक अलग ही आनंद होता है, उससे लोग अपने को वंचित नहीं करना चाहते. हाँ, आवश्यकता तो है ही इस बात की कि हम किताबों के साथ कुछ समय बिताने की आदत डालें जिससे किताबें हमारे घर-परिवार का अभिन्न हिस्सा तथा हमारे सुख-दुःख का साथी बनी रहें. शायद तभी हम अपनी शख्सियत को तलाशने एवं तराशने के काम को निरंतरता प्रदान करते हुए एक बेहतर इंसान बने रह पायेंगे.
                     और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।

Sunday, April 19, 2015

मोटिवेशन : कोर्स बनाम कैरियर

                                                            - मिलन सिन्हा 
clipअमूमन 12वीं यानी प्लस-टू की परीक्षा के बाद छात्र-छात्राओं के लिए अपने कैरियर को ध्यान में रख कर उपयुक्त कोर्स चुनने का मुश्किल वक्त होता है. अच्छे अंक प्राप्त करने वाले विद्यार्थी इंजीनियरिंग या मेडिकल की तैयारी के लिए आंतरिक एवं बाहरी दवाब महसूस करते हैं और  चाहे–अनचाहे इन्हीं दोनों कोर्सेज  में से किसी एक में दाखिला लेने की पुरजोर चेष्टा करते हैं. कॉमर्स और आर्ट्स के अधिकांश विद्यार्थी भी पारम्परिक कोर्सों में ही एडमिशन के लिए प्रयास करते देखे गए हैं. देश में कोचिंग के बाजार के निरंतर फैलने का यह भी एक बड़ा कारण है. कहना न होगा, निम्न एवं मध्यम आय वर्ग के परिवारों के लड़के- लड़कियां औपचारिक शिक्षा ग्रहण करने के बाद एक अच्छी नौकरी की चाहत रखते हैं. लेकिन क्या नौकरी के आज के बाजार में सिर्फ परंपरागत स्नातक या स्नातकोत्तर डिग्री के बूते मनचाही नौकरी पाना आसान है? 

देश में शिक्षित बेरोजगारों से संबंधित आंकड़े बताते हैं कि परंपरागत कोर्सों में अच्छे अंक या ग्रेड के साथ उत्तीर्ण होने के बावजूद ऐसे छात्र-छात्राओं में से अनेक या तो बेरोजगार हैं या कोई ऐसी-वैसी नौकरी कर रहे हैं जिनका उनकी डिग्री से कोई प्रत्यक्ष वास्ता नहीं होता है, जब कि ऐसी डिग्रियां अर्जित करने में काफी वक्त व मोटी रकम खरचने पड़ते हैं. यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि व्यापार एवं उद्योग की बदलती जरूरतों के लिहाज से ऐसे कई कोर्स विभिन्न शिक्षण संस्थानों तथा स्किल डेवलपमेंट इंस्टिट्यूट में अब उपलब्ध हैं जिन्हें  नौकरी के बाजार में अपेक्षाकृत ज्यादा अहमियत दी जा रही है. देखा जा रहा है कि नियोक्ता के तौर पर आजकल निजी क्षेत्र की कम्पनियां आम तौर पर ऐसे उम्मीदवार को तरजीह देते हैं जिनका एकेडमिक बैकग्राउंड तो ठीक-ठाक हो, साथ ही जो नयी चीजें सीखने तथा चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए तत्पर रहे. कारण, ऐसे नए कर्मियों को तीन से छह माह की अवधि का उपयुक्त ऑन-द-जॉब ट्रेनिंग देकर दक्ष बनाना आसान होता है. अतः यह आवश्यक है कि विद्यार्थी अभी से अपने एकेडमिक कोर्स के चयन के साथ-साथ अपने जॉब/बिज़नेस कैरियर की प्लानिंग को भी यथोचित महत्व दें.
                    और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।

Sunday, April 12, 2015

मोटिवेशन : गुस्से को नियंत्रित करना सीख लें

                                        - मिलन सिन्हा 
clipअपने रोजमर्रा की जिंदगी में हम घर-बाहर हर जगह लोगों को बात-बेबात गुस्सा करते देखते हैं, गुस्से में अपशब्द कहते, वस्तुओं को तोड़ते-फोड़ते, खुद अपना भी माथा ठोकते हुए देखते हैं. गुस्से में बेकाबू लोगों के तो कहने ही क्या? हम खुद भी गुस्से में यह सब करते हैं, बेशक कम या ज्यादा, बराबर या कभी-कभी. देखा गया है कि गुस्से की हालत में ‘हम किसी से कम नहीं’ वाली मानसिकता हमारे सिर चढ़ कर बोलने लगती है. मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि उस वक्त हमारा मानसिक संतुलन ठीक नहीं रह पाता है, फलतः चीखने-चिल्लाने के साथ हम अतार्किक एवं हिंसक भी हो जाते हैं. बहरहाल, हमने शायद ही कोई व्यक्ति देखा हो, जिसे गुस्सा आता ही न हो. आम हो या खास, हर मनुष्य को गुस्सा आता है और गुस्सा आना कोई अवगुण नहीं, अनहोनी भी नहीं. पर सवाल तो उठता है कि गुस्सा आता क्यों है और जब चाहे-अनचाहे आ ही जाता है तो फिर गुस्से को काबू में कैसे रखा जाए जिससे कोई बड़ी दुर्घटना न हो जाय?

कहते हैं कि गुस्सा स्वभावतः अन्याय, अत्याचार, शोषण, असफलता, अतृप्त इच्छा, अक्षमता आदि से जुड़ा वह सामान्य भाव है जो मानव ही नहीं जीव मात्र में  उत्पन्न होता है और अधिकांश मामले में किसी न किसी रूप में प्रकट होता है. क्रोध आने पर उसे कैसे नियंत्रित किया जाय, इसके लिए कुछ जाने-पहचाने सिद्धांत व नुस्खें हैं जिसका लाभ प्रयोग की दृढ़ता पर निर्भर करता है. मसलन, गुस्से की स्थिति में उस स्थान विशेष से हट जायें, कहीं बैठ जायें और आँख बंद कर दीर्घ श्वास लें व छोड़ें, एक से दस तक गिनती करें, कुछ समय के लिए शांत रहने की कोशिश करें, किसी अच्छे मित्र से बात करें आदि.  तमाम शोध तथा सर्वेक्षण बताते हैं कि इन छोटे प्रयासों से गुस्से को नियंत्रित करना एवं इसके एकाधिक दुष्प्रभावों से बचना संभव हो जाता है. ऐसे, योग में कई आसन-प्राणायाम बताये गए हैं जिनके नियमित अभ्यास से गुस्से को काबू में रखना और उस विशिष्ट उर्जा को अपने व समाज के फायदे के लिए काम में लाना सहज हो जाता है. 
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।

Sunday, April 5, 2015

मोटिवेशन : रिश्तों की पूंजी

                               -   मिलन सिन्हा
आमतौर पर देखा गया है कि अधिकांश लोग दिन-रात पैसे कमाने और जोड़ने में अपना ज्यादा ध्यान लगाये रहते हैं. इस काम को अंजाम देने के लिए लोग क्या-क्या नहीं करते, कई बार तो गलत-सही का ख्याल भी नहीं रहता. बेशक, पैसा जीवन में अहम रोल अदा करता है, लेकिन सिर्फ पैसे के पीछे भागने वाले लोग जीवन की अन्य मौलिक आवश्यकताओं को भूल जाने की गंभीर गलती करते हैं जिसका मलाल उन्हें बाद में वर्षों तक सालता रहता है. इनमें संबंधों के मायनों को न समझना और उसे अपेक्षित महत्व न देना शामिल है ,जब कि हम अच्छी तरह जानते हैं कि सम्बन्ध बनाना और निभाना सुख और समृधि दोनों के लिए अनिवार्य है. एक अरसे से ‘रिलेशनशिप बियॉन्ड बैंकिंग’, ‘रिलेशनशिप देट काउंट्स’, ‘ओनली रिलेशनशिप मैटर्स’ सरीखे कॉरपोरेट विज्ञापन हमारा ध्यान आकर्षित करते रहे हैं, जो रिश्तों की महत्ता को बखूबी रेखांकित करते हैं. विचारणीय प्रश्न है कि पैसे तो जैसे-तैसे भी बनाए जा सकते हैं, लेकिन अच्छे रिश्ते ऐसे–वैसे या जैसे-तैसे नहीं बनाये जा सकते. इसके लिए सतत ईमानदारी तथा आपसी समझ-बूझ अनिवार्य है. सभी जानते हैं कि संबंधों में आई खटास को मिठास में बदलना कितना मुश्किल होता है.


सच कहें तो जन्म से ही हमारे संबंधों का दायरा बढ़ना शुरू हो जाता है. आगे यह सिलसिला घर-परिवार से निकल कर बन्धु-बान्धव, पड़ोसी-सहकर्मी आदि से लेकर देश-दुनिया तक फैलने की संभावनाओं से भरा होता है. यही कारण है कि सभी प्रबंधन संस्थाओं में रिलेशनशिप बिल्डिंग/पब्लिक रिलेशन  यानी रिश्ते निर्माण/जन-संपर्क को पाठ्यक्रम में महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता है. नेतृत्व क्षमता के समुचित विकास में इसका अतिशय महत्व होता है. तभी तो तमाम ज्ञान, कौशल आदि गुणों से लैस होने के बावजूद रिश्ते बनाने व निभाने में कम निपुण व्यक्ति को किसी भी टीम में कैप्टन की जिम्मेदारी नहीं दी जाती है. 
          और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।

Sunday, March 29, 2015

मोटिवेशन : क्या आप भी युवा हैं ?

                                                                  - मिलन सिन्हा
clipभारत युवाओं का देश है. विश्व की सबसे बड़ी युवा आबादी हमारे देश में रहती है. युवा किसी भी देश का वर्तमान होते हैं और भविष्य भी. लेकिन क्या उम्र ही युवा होने का एकमात्र मापदंड है या युवा कहलाने के लिए हमें कुछ सामान्य युवोचित गुणों से लैस होना चाहिए. जरा सोचिये, क्या आप ऐसे युवा वय के लोगों को वाकई युवा की श्रेणी में रखना चाहेंगे, जिनका शारीरिक स्वास्थ्य तो दुरुस्त हो, तथापि जिनमें उर्जा, उत्साह, उमंग, उद्दमशीलता, प्रयोगधर्मिता, आशावादिता आदि का गंभीर अभाव साफ़ दिखता हो. जो आलस्य से भरे हों, जो संघर्ष से जी चुराते हों या जो सही और गलत में फर्क करने की समझदारी रखते हुए भी आहार, विचार और व्यवहार के मामले में गलती पर गलती कर रहे हों. जिन्हें न फूलों की खुशबू, न प्रकृति का अप्रतिम सौन्दर्य आकर्षित करता हो या जिन्हें सीखने- सिखाने में आनंद की अनुभूति न होती हो. नहीं न ! हेनरी फोर्ड के शब्दों में, ‘जो हमेशा कुछ नया सीखता है, वही युवा है. जैसे ही आप सीखना बंद करते हैं, आपकी गिनती बुजर्गों में होने लगती है.’ 

गौरतलब बात यह है कि तन और मन से युवा होना और बने रहना जीवन का सबसे महत्वपूर्ण समय होता है. इस दरम्यान कोई भी व्यक्ति उत्पादकता एवं उपलब्धियों के नए-नए कीर्तिमान स्थापित कर सकता है, क्यों कि युवाओं में ज्ञानार्जन की भूख होती है, कुछ नया व बेहतर करने का जज्बा होता है, संकल्प व साहस से वह भरा होता है. अतीत के साथ वर्तमान में भी ऐसे अनेक उदहारण विद्द्यमान हैं जो युवाओं द्वारा किये गए असाधारण व प्रेरक कार्यों के गवाह हैं. यहाँ यह कहना अनिवार्य है कि संसार भर में ऐसे लाखों-करोड़ों बुजुर्ग भी हैं जो शारीरिक रूप से अपेक्षाकृत कम क्षमतावान होते हुए भी, संकल्प, उत्साह एवं उमंग के साथ जीवन को समग्रता में जीने के मामले में अपने से आधे उम्र के किसी युवा से कम नहीं हैं. सो उन्हें भी युवा ही कहेंगे न ! 
                   और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।

Sunday, March 22, 2015

आज की कविता : सड़क का साथ

                                              - मिलन सिन्हा  

सड़क का साथ
तुम 
भाग्यशाली नहीं हो 
क्यों कि 
शाम को 
थक-हार कर
घर लौटना 
तुम्हारे वश  की बात नहीं 
सचमुच,
वह घर अब 
बहुत पीछे छूट चुका है 
या फिर 
तुम्हारी स्मृति के 
किसी कोने में पड़ा 
सिसक रहा है 
और फिर 
इधर तो तुम 
न जाने कितने वर्षों से 
सड़कों को नाप रहे हो 
कभी अपने शरीर को 
पैमाना बना कर 
तो कभी अपने डग को 
छोटा और लम्बा करते हुए !

         और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।

Sunday, March 15, 2015

मोटिवेशन : जीवन में संतुलन

                                                                                    - मिलन सिन्हा 
clipजीवन में संतुलन की अनिवार्यता से कोई इन्कार नहीं कर सकता, तथापि ज्यादातर लोग असंतुलित जीवन जीते हैं, कुछ जानबूझ कर तो अधिकतर लोग अनजाने में. ऐसे लोगों के जीवन में झांक कर देखें तो पता लगता है कि बुद्धि एवं श्रम का यथोचित इस्तेमाल करने के बावजूद उनके जीवन में संतुष्टि, सुख व सकून की कमी बनी रहती है, बेशक वे आर्थिक रूप से थोड़े मजबूत बन जाएं. बहरहाल, यह तो सच है कि यदि चौबीस घंटे में अठारह–बीस घंटे मुस्तैदी से काम करेंगे तो कार्य क्षेत्र में आगे तो रह सकते हैं, लेकिन इसके लिए पारिवारिक सुख के अलावे नींद व आराम से समझौता करना पड़ेगा जिसका प्रत्यक्ष असर शीघ्र ही हमारे स्वास्थ्य पर दिखने लगेगा. फलतः हम देर सवेर बीमार पड़ेंगे, काम से छुट्टी लेकर घर पर पड़े रहेंगे. अब बीमार रहने के दौरान चिकित्सा पर हुए खर्च, स्वास्थ्य पर होने वाले प्रतिकूल प्रभाव एवं घर–परिवार की  चिंता–बेचैनी का हिसाब–किताब न भी लगाएं और सिर्फ समय संदर्भित गणना करें तो पायेंगे कि औसतन हमने इस दरम्यान प्रतिदिन सात–आठ घंटे ही काम किया जो कि हम रोजाना नियमपूर्वक आसानी से कर सकते हैं. 

मजेदार बात यह है कि इसका उलटा भी उतना ही सच है. कहने का तात्पर्य यह कि अगर हम चौबीस घंटे में अठारह –बीस घंटे सोते रहें, आराम करते रहें, उसका भी बुरा असर हमारे सेहत व जिंदगी पर लाजिमी है. तो क्या करना चाहिए? दिन के चौबीस घंटे को तीन हिस्से में बांट लें और फिर प्रत्येक आठ घंटे को i) काम ii) नींद व आराम तथा iii) घरेलू- सामाजिक जिम्मेदारी, मनोरंजन आदि के लिए निर्धारित करके उसके अनुरूप चलें. इस तरह हम ‘वर्क–लाइफ बैलेंस’ को व्यवहार में चरितार्थ कर जीवन को सम्पूर्णता में जी भी सकेंगे और उसका भरपूर आनंद भी उठा सकेंगे. 

               और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं।