Sunday, March 30, 2025

रिजल्ट जैसा भी आया है, उसे मन से स्वीकार करें

                         -- मिलन सिन्हा, मोटिवेशनल स्पीकर एंड स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट


बिहार बोर्ड की दसवीं अर्थात मेट्रिक परीक्षा का परिणाम आ गया है, जिसमें
82.11% विद्यार्थी उत्तीर्ण हुए. आमतौर पर रिजल्ट के दिन का माहौल कहीं खुशी, कहीं गम का होता है. खैर, अब जब कि रिजल्ट आ गया है तो खासकर ऐसे विद्यार्थी जिनका रिजल्ट उनकी अपेक्षा के प्रतिकूल या खराब आया है, उन्हें निम्नलिखित बातों पर गंभीरता से सोच-विचार करना चाहिए: 

1) जीवन से बड़ा कुछ भी नहीं. आपका जीवन अनमोल है. सफलता-असफलता सभी के जीवन में आते रहते हैं. जीवन में एक के बाद दूसरी परीक्षा आती रहेगी और आपको बेहतर से बेहतर परिणाम हासिल करने का अवसर भी मिलता रहेगा. इतिहास के पन्ने ऐसे हजारों रियल लाइफ सक्सेस स्टोरी से भरे पड़े हैं, जिसमें हर शख्स ने कंफ्यूशियस के इस विचार को अपने कर्मों से साबित किया है कि 'हमारी महानतम विशालता कभी भी न गिरने में नहीं, बल्कि गिरने पर हर बार फिर उठ जाने में निहित है.'

2) इस बार रिजल्ट जैसा भी आया है, उसे मन से स्वीकार करें. 'टेक-इट-इजी' सिद्धांत का पालन करते हुए किसी के भी डांट- फटकार, कटाक्ष, आलोचना, व्यंग्य आदि को दिल से न लें.

3) किस दोस्त या सहपाठी को कितने मार्क्स आए, इसको जानने और इसकी विवेचना-आलोचना  से बचें क्यों कि इससे आपके मार्क्स तो इम्प्रूव नहीं होंगे, उलटे समय की बर्बादी होगी और नेगेटिव थॉट्स में वृद्धि.

4) दूसरे को दोष देने के बजाय मन ही मन यह दोहरायें - जो हुआ, ठीक ही हुआ. मैंने जैसी परीक्षा दी, परिणाम कमोबेश उसी के अनुरूप आया; आगे सुधार करेंगे तो बेहतर होगा रिजल्ट.

5) अगर रीचेकिंग या इम्प्रूवमेंट का प्रावधान या व्यवस्था है, तो उसका उपयोग करें. अगर मार्क्स या रिजल्ट में सुधार होता है तो बोनस के रूप में अतिरिक्त ख़ुशी के हकदार बनेंगे.

6) किसी भी स्थिति में निराश, हताश या तनावग्रस्त होने की बिलकुल जरुरत नहीं है. आवेग या आवेश में किसी भी प्रकार के आत्मघाती कदम उठाने का विचार तक मन में न लायें.

7) इसके बावजूद भी अगर तनाव महसूस हो तो थोड़ी देर खुली हवा में आँख बंद कर बैठें और डीप ब्रीदिंग करें; घर में आपके सबसे प्रिय व्यक्ति से खुल कर बात करें या अपने सबसे अच्छे दोस्त से बात करें, टीवी आदि पर कॉमेडी शो का आनन्द लें, पर्याप्त पानी/ मौसमी फल का रस पीएं और नींद का पूरा लाभ उठाएं. आपका तनाव स्वतः बहुत कम हो जाएगा.

8) इस समय बस शांति और संयम से खुद को रीऑर्गनाइज करें और एक संकल्प लें कि पीछे कोई भूल  हुई है तो उसे आगे नहीं दोहराएंगे, खूब मेहनत करेंगे और एक प्रभावी रूटीन फॉलो करते हुए आगे जरुर कामयाब होंगे.

9) माता-पिता सहित घर के सभी बड़ों के सामने अपनी गलती को स्वीकारते हुए उन्हें आगे बेहतर रिजल्ट का आश्वासन दें और उनका मार्गदर्शन और आशीर्वाद प्राप्त करें. यकीन मानिए, आपका कल आज से जरुर बेहतर होगा. आप सफल तो होंगे ही, स्वस्थ और आनंदित भी रहेंगे.            (hellomilansinha@gmail.com)

                   और भी बातें करेंगे,
 चलते-चलते. असीम शुभकामनाएं.         

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Saturday, January 4, 2025

खुद को परखें खरी कसौटी पर

                    - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर एंड स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट

जीवन गतिशील है. छात्र जीवन की यात्रा रोमांचक होती है और फ़ास्ट भी. इस यात्रा में हर युवा को जीवन के कई मार्गों और कई चौराहों से होकर गुजरना पड़ता है. इस क्रम में कई बार ट्रैफिक सिग्नल पर रुकना भी पड़ता है. यह सही भी है, क्यों कि इस क्रम में उसे सोच-विचार का एक मौका मिलता है. दरअसल, हर युवा को खुद ही सही दिशा में गतिशील या स्थिर रखने में पारंगत होना पड़ता है, जो थोड़ा कठिन तो है, पर असंभव नहीं. बहरहाल, भागमभाग के मौजूदा दौर में कई बार वे बहुत तेज गति से कई चौराहों को पार करते हुए जीवन पथ पर बहुत दूर निकल जाते हैं, तब कहीं जा कर अपनी यात्रा पर कुछ सोच-विचार करते हैं और अधिकतर मामलों में उन्हें यह पता चलता है कि वे सही दिशा में आगे नहीं बढ़ रहे हैं. स्वाभाविक है, वे निराश होते है क्यों कि वे अपेक्षा के विपरीत सफलता से दूर खड़े होते हैं.  

साल 2024 की विदाई और साल 2025 के शुभागमन के साथ ही संसार के सभी देशों के सभी कार्यक्षेत्रों - स्वास्थ्य, शिक्षा, उद्योग, व्यापार, आर्थिक -सामाजिक सेक्टर, अंतरराष्ट्रीय संबंध आदि में समीक्षा और संकल्प का सिलसिला प्रारंभ हो चुका है. अपनी-अपनी स्थिति-परिस्थिति के अनुसार हर सेक्टर अपनी उपलब्धियों तथा नाकामियों की गंभीर समीक्षा कर रहा है और बेहतर विकास सुनिश्चित करने हेतु नए संकल्प भी ले रहा है. सभी युवाओं के लिए भी बीते वर्ष के अपने कार्यकलापों की समीक्षा और नए वर्ष के लिए संकल्प लेने का यह विशेष अवसर है. तो आइए आज 'स' अक्षर से शुरू होनेवाले दो शब्दों - समीक्षा और संकल्प की अहमियत पर चर्चा करते हैं.

अपने अंदर देखने की डालें आदत: अच्छी बात है कि समीक्षा का भाव हर विद्यार्थी में बुनियादी रूप से विद्दमान होता है. पुस्तक समीक्षा, फिल्म समीक्षा या भाई-बहन से लेकर दोस्त-सहपाठी-सहकर्मी  तक के ड्रेस और स्टाइल पर समीक्षा की बात हो, युवा इनमें शामिल रहते हैं. उसी तरह हर युवा अपने कार्यकलाप की समीक्षा भी करते रहते हैं, बेशक यदाकदा. ऐसा इसलिए कि आमतौर पर उन्हें बाहर देखने की आदत अधिक होती है, अंदर देखने की कम. खैर, खुद को सुधारने और निखारने के लिए यह बहुत जरूरी है कि हर युवा बीते वर्ष में अपनी कार्यशैली और कार्यकलापों की गंभीर और निरपेक्ष समीक्षा खुद ही करें. इसके लिए बीते वर्ष के सभी मुख्य कार्यकलापों को एक स्थान पर नोट करें और फिर इसके सामने अपने प्रयासों के परिणामों – पॉजिटिव और नेगेटिव दोनों  को लिखें. स्वाभाविक रूप से पॉजिटिव और नेगेटिव परिणामों के पीछे के कुछ तो स्पष्ट कारण होंगे, जो उन्हें अच्छी तरह मालूम होते हैं – मसलन मेहनत, निष्ठा, जुनून, नियमितता, एकाग्रता आदि. अब अगर हरेक युवा अपनी इस समीक्षा प्रक्रिया के दौरान निरपेक्ष विश्लेषण और विवेचना करके अपनी अच्छाइयों को और उन्नत करने तथा अपनी कमजोरियों या गलतियों को सुधारने का सबक ले सके तो साल 2025 में उसे अपना बेस्ट देने से कोई रोक नहीं सकता है. हाँ, इस पूरी प्रक्रिया में अगर कहीं बड़ा कनफूजन हो तो अपने अभिभावक या मेंटर से सलाह लेने में संकोच न करें.     

बढ़ती है आतंरिक शक्ति: ज्ञानीजन बराबर कहते रहे हैं कि जो युवा सोच-विचार कर संकल्प लेता है और उससे  पूर्णतः प्रतिबद्ध रहता है, उसके लिए कर्मपथ पर चलना एक साधना के समान हो जाता है और फिर तो उसके लिए कुछ भी असम्भव नहीं होता है. ऐसा इसलिए कि संकल्पित होते ही वह पॉजिटिव फील करने लगता है और उसकी आंतरिक शक्ति बढ़ने लगती है, फुलप्रूफ कार्य योजना बनती है और उसपर अमल शुरू हो जाता है, जो कार्य विशेष को सफ़ल बनाने में बहुत सहायक होता है. दरअसल, किसी भी युवा में शक्ति की कमी नही होती, बस दृढ़ संकल्प की कमी होती हैं. इसके अभाव में युवा सफ़लता के निकट पहुंच कर भी असफल हो जाते हैं. कहने का अभिप्राय यह कि किसी कार्य का असंभव  या संभव होना युवा विशेष के संकल्प पर निर्भर करता हैं. इसलिए पिछले साल को भूलते हुए इस साल अपने हर दिन को एक विशेष दिन बनाने पर ध्यान दें. 

स्वतंत्र भारत के पहले गृह मंत्री व महान स्वतंत्रता सेनानी सरदार पटेल हों या हॉकी के जादूगर कहे जानेवाले महान खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद  या दक्षिण अफ्रीका के महान नेता व पूर्व राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला या सिंगापुर के युगपुरुष व पूर्व प्रधानमन्त्री ली कुआन यू  या देश के महान स्पेस साइंटिस्ट विक्रम साराभाई या विश्व प्रसिद्ध भारतीय क्रिकेट आलराउंडर कपिल देव, सबने अपने-अपने क्षेत्र में अपने संकल्प को  निष्ठापूर्वक साधते हुए तथा निरंतर अपने प्रदर्शन की बेबाक समीक्षा करते हुए देश-विदेश में अपनी सफलता का झंडा बुलंद किया. मेरी तो स्पष्ट मान्यता है कि हमारे युवाओं  में असीम क्षमता है और उनमें अनेक खूबियां भी मौजूद हैं. बस जरुरत इस बात की है कि नववर्ष के मौके पर समीक्षा और संकल्प को यथोचित महत्व देते हुए वे अपने निर्धारित लक्ष्य को हासिल करने हेतु कर्मपथ पर दृढ़ता से सतत आगे बढ़ें और अपने व देश के लिए वर्ष 2025 को हर तरह से बेस्ट साबित करें. नववर्ष की असीम शुभकामनाएं.    (hellomilansinha@gmail.com) 

             और भी बातें करेंगे, चलते-चलते. असीम शुभकामनाएं.           

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Wednesday, September 18, 2024

कामयाब होना मुश्किल नहीं

                           - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर एंड वेलनेस  कंसलटेंट


जीवन के हर क्षेत्र में आजकल चाहे-अनचाहे कई कार्यों या प्रोजेक्ट्स को नियत समय सीमा के अन्दर अंजाम तक पहुंचाने की सामान्य अपेक्षा खुद की और दूसरों की भी होती है. समय सीमित होता है और टास्क अनेक. ऐसे अवसरों पर अनेक लोगों के लिए यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि किस काम को पहले और किसे थोड़ी देर बाद में करें जिससे कि सब कुछ ठीक से निष्पादित हो जाय, खासकर सभी महत्वपूर्ण और आवश्यक कार्य और वह भी यथोचित गुणवत्ता के साथ. सबको मालूम है कि गुणवत्ता दुष्प्रभावित होने का खामियाजा स्वयं के साथ-साथ संस्थान को भी उठाना पड़ता है. ऐसे में मेंटल प्रेशर बढ़ता है और खुद को संयत रखना काफी चुनौतीपूर्ण होता है. 


कहने को तो सुबह उठने से लेकर रात में सोने से पहले तक सामान्यतः हर कोई पढ़ाई, परीक्षा, प्रतियोगिता, रोजगार, नौकरी आदि के प्रेशर  के बीच किसी-न-किसी काम में व्यस्त रहता है. लेकिन कैसे व्यस्त रहता है, इस पर गौर करना बहुत जरुरी होता है. हममें से कुछ लोग सुबह पहले जो भी सरल एवं आसान काम सामने होता है, उसे निबटाने में लग जाते हैं. लिहाजा, आवश्यक या महत्वपूर्ण या कठिन और मुश्किल काम या तो बिल्कुल नहीं हो पाता है या शुरू तो होता है, लेकिन एकाधिक कारणों से नियत समय में पूरा  नहीं हो पाता है. इस वजह से अहम काम या तो छूट जाते हैं या अधूरे रह जाते हैं. वे काम अगले दिन के एजेंडा में आ तो जाते हैं, लेकिन आदतन अगले दिन भी ऐसा ही कुछ होता है. इस तरह अध्ययन  हो या अन्य कार्य, छोटे, सरल और कम या गैर-जरुरी काम तो किसी तरह होते रहते हैं, किन्तु महत्वपूर्ण और आवश्यक  कार्यों का अम्बार खड़ा होता रहता है. ऐसे में उतने सारे अहम कार्यों को तय सीमा में पूरा करना उन्हें  मुश्किल ही नहीं, असंभव लगने लगता है. इसका बहुआयामी दुष्प्रभाव उनके परफॉरमेंस और रेटिंग पर पड़ना लाजिमी है. ऐसी स्थिति में आत्मविश्वास डोलने लगता है; बहानेबाजी और शार्ट-कट का सिलसिला चल पड़ता है. धीरे-धीरे ऐसे लोगों को अपने  ज्ञान, कौशल एवं क़ाबलियत पर अविश्वास-सा होने लगता है. उनको कठिन कार्यों से डर और घबराहट होने लगती है. सफलता उनसे दूर होती जाती है. धीरे-धीरे वे लोग खुद को औसत या उससे भी कम क्षमतावान मानने लगते हैं और दूसरों की नजर में भी वैसा ही दिखने लगते हैं.


इसके विपरीत कुछ लोग सुबह पहले आवश्यक, महत्वपूर्ण और कठिन काम को यथाशक्ति अंजाम तक पहुँचाने में लग जाते हैं. अपने प्रयास में कोई कमी नहीं होने देते और अपनी सफलता के प्रति पूरा विश्वास बनाए रखते हैं. पाया गया है कि सामान्यतः उन्हें अपने प्रयास में सफलता मिलती है. अपवाद स्वरुप अगर कभी सफल नहीं होते हैं, तो बिना निराश हुए और अच्छे तरीके के दोबारा प्रयास करते हैं. यकीनन सभी अहम काम पूरा हो जाने पर उन्हें  संतोष और खुशी दोनों मिलती है. अंदर से एक फील-गुड फीलिंग उत्पन्न होती है जिससे वे अतिरिक्त उत्साह और उमंग से भर जाते हैं. आत्मविश्वास में इजाफा तो होता ही है. अब वे बहुत आसानी और तीव्रता से आसान कार्यों को कर लेते हैं. शायद ही उनका कोई जरुरी काम छूटता है. इस तरह वे अपने सभी काम को निर्धारित समय सीमा के भीतर निष्पादित करते हैं. अगले दिन काम करने की उनकी यही शैली होती है. वे चुनौतियों से घबराते  नहीं, बल्कि उनके स्वागत के लिए पूरी तरह तैयार रहते हैं. उनके लिए हर दिन एक नया दिन होता है और हर बड़ी-छोटी चुनौती से सफलतापूर्वक निबटना उनका मकसद.


दरअसल, आपको जब आज के तेज रफ़्तार कार्य संस्कृति में कई बार सबकुछ फटाफट एवं अच्छी तरह करना होता है, तब प्राथमिकता तय करके कार्य करना अनिवार्य होता है. नोट करने वाली बात यह है कि लगातार अच्छी सफलता अर्जित करनेवाले सभी लोग प्राथमिकता तय करके काम करने को कामयाबी तक पहुंचने का एक महत्वपूर्ण सूत्र मानते हैं. यहां  एलन लेकीन की इस बात पर गौर करना फायदेमंद होगा कि अपनी प्राथमिकताओं की समीक्षा करें और यह सवाल पूछें – "हमारे समय का इस वक्त सबसे अच्छा उपयोग क्या है." इससे यह बात स्पष्ट होती है कि अगर अगले कुछेक घंटे में कई विषयों को पढ़ने या कई टास्क को पूरा करने की चुनौती हमारे  सामने होती है, तो उसमें से  कौन-सा पहले करें और कौन-सा बाद में, अपनी समझदारी से 'प्राथमिकता के सिद्धांत' को लागू करते हुए हम उन सबको को अति महत्वपूर्ण, महत्वपूर्ण और कम महत्वपूर्ण  की तीन श्रेणी में बांट लेते हैं. और फिर प्राथमिकता के उसी क्रम को सामने रखकर न केवल सभी टास्क को यथासमय निबटाते हैं, बल्कि आगे उसके परिणाम में बेहतरी भी सुनिश्चित करते रहते हैं. हां, ऐसे समझदार लोग जरुरत पड़ने पर प्राथमिकता में थोड़ा-बहुत परिवर्तन के लिए मानसिक रूप से पूरी तरह तैयार भी रहते हैं, जिससे कि सभी काम उसके टाइमलाइन के हिसाब से पूरा हो जाय. कहना न होगा, जीवन के हर क्षेत्र में अत्यंत सफल, सफल और कम सफल लोगों  के बीच एक बड़ा फर्क प्राथमिकता प्रबंधन में उनकी दक्षता से भी तय होता है. 

(hellomilansinha@gmail.com) 

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Tuesday, March 26, 2024

बच्चों को दीजिए संस्कार युक्त, रोगमुक्त, सानंद जीवन

                        - मिलन सिन्हा, मोटिवेशनल स्पीकर, वेलनेस कंसलटेंट ... ... 

कहते हैं स्वस्थ जीवन, सुखी जीवन का आधार होता है. यह भी कहा जाता है कि बच्चे देश का भविष्य होते हैं. आंकड़े बताते हैं कि हमारे देश की आबादी का 20 % हिस्सा स्कूली बच्चों का है, यानी 25 करोड़ से भी ज्यादा. लिहाजा, हमारे बच्चों को शिक्षित करने के साथ–साथ तन्दुरस्त बनाए रखना अनिवार्य है, तभी आने वाले समय में वे एक समर्थ इंसान के रूप में जीवन की तमाम चुनौतियों से निबटते एवं अपनी जिम्मेदारिओं को निबाहते हुए समाज एवं देश को भी मजबूत बना पायेंगे. लेकिन ऐसा कैसे संभव होगा?


यह एक तथ्य है कि हमारे देश में आजादी के सात दशक बाद भी हमारे गांवों की  अधिकांश  आबादी  आधुनिक चिकित्सा पद्धति के दायरे से बाहर हैं और वे अब तक  मुख्यतः पारम्परिक चिकत्सा पद्धति पर निर्भर रहे हैं. ऐसा इसलिए कि हमारा देश पारम्परिक ज्ञान के मामले  में अत्यधिक समृद्ध रहा है  और हजारों सालों से चली आ रही पूर्णतः स्थापित परम्पराओं की  एक पूरी श्रृंखला सामाजिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में उपलब्ध रही है.
लेकिन हमारी  शहरी आबादी कारण–अकारण  स्वास्थ्य ज्ञान के इस असीमित स्त्रोत का उपयोग अपने व्यवहारिक जीवन में नहीं करते हैं  और फलतः सामान्य शारीरिक परेशानियों या बीमारियों, जैसे सर्दी-जुकाम, डायरिया –कब्ज, सिर दर्द –बदन दर्द आदि   से ग्रसित होने पर भी आधुनिक चिकित्सा पद्धति (यानी एलोपैथी) को अपनाने को विवश हो जाते हैं, जब कि आज की हमारी  आधुनिक चिकित्सा काफी मंहगी है और उसके कई नकारात्मक आयाम भी हैं.


फिर भी ऐसा क्यों हो रहा है ? दरअसल बाजार आधारित अर्थव्यवस्था के सामाजिक प्रभावों के अलावे लगातार तेजी से संयुक्त परिवारों  के टूटने  और उतनी ही तेजी से एकल परिवारों के बढ़ते जाने के कारण  दादा–दादी , नाना–नानी जैसे बुजुर्गों के मार्फ़त बच्चों में स्वतः हस्तांतरित होने वाले व्यवहारिक स्वास्थ्य ज्ञान का सिलसिला ख़त्म हो रहा है. ऐसे में, घरेलू उपचार की इस समृद्ध धरोहर को फिर से किसी –न- किसी रूप में पुनर्स्थापित करने  की आवश्यकता है, जिससे एक बड़ी आबादी को सामान्य रोगोपचार के मामले में कुछ हद तक आत्मनिर्भर बनाया जा सके.

 
कहना न होगा, इस महती कार्य को प्रभावी ढंग से लक्ष्य  तक ले जाने में स्कूलों की भूमिका अहम है. इसके लिए  एक सुविचारित व सुनियोजित जागरूकता कार्यक्रम के माध्यम से कक्षा -7 से लेकर  कक्षा -12 तक के बच्चों को प्रेरित कर उनसे अपने घर के बुजुर्गों से सामान्य बिमारियों में किये जाने वाले घरेलू  उपचारों की जानकारी प्राप्त करने के लिए कहा जाएगा  और फिर उन तमाम जानकारियों पर चर्चा कर उन्हें उसके वैज्ञानिक आधार से परिचित करवाया जाएगा.
इससे एक तो स्वास्थ्य के प्रति उनकी जागरूकता बढ़ेगी, घरेलू उपचारों की जानकारी होगी और उनका परिवार के बुजुर्गों के साथ जुड़ाव बढ़ेगा. साथ ही बढ़ेगा बुजुर्गों के प्रति बच्चों का सम्मान भी. इसके फलस्वरूप परिवार संस्कारयुक्त, रोग मुक्त, स्वस्थ एवं सानन्द रहेगा. बच्चों के सर्वांगीण विकास में इसका अहम योगदान तो रहेगा ही.                            (hellomilansinha@gmail.com)


             और भी बातें करेंगे, चलते-चलते. असीम शुभकामनाएं.            # "प्रभात खबर हेल्दी लाइफ " में   प्रकाशित   

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Saturday, April 15, 2023

जुनून है जरुरी

                                    - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर एंड वेलनेस  कंसलटेंट









9 अप्रैल, 2023 को अहमदाबाद के नरेन्द्र मोदी स्टेडियम में गुजरात टाइटन्स   और कोलकाता नाईट राइडर्स (केकेआर) के बीच खेले गए आईपीएल 20-20 मैच का समापन बेहद रोमांचक और अविस्मरणीय रहा. हो भी क्यों नहीं? जीत के लिए केकेआर को अंतिम पांच गेंद पर 28 रन बनाने थे, जो नामुमकिन प्रतीत हो रहा था, लेकिन केकेआर टीम के एक कम ज्ञात बल्लेबाज रिंकू सिंह ने एक के बाद एक पांच छक्के जड़ कर अपनी टीम की जीत को मुमकिन बना दिया. 

आईपीएल के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ जब किसी टीम ने मैच के आखिरी ओवर में इतने रन बनाकर जीत हासिल की हो. इस तरह रिंकू ने एक नया इतिहास रच दिया और रातोंरात आईपीएल क्रिकेट का हीरो बन गया. सोशल मीडिया में बॉलीवुड के सितारों सहित हजारों लोगों ने रिंकू सिंह के क्रिकेट के प्रति जुनून के बारे लिखा और उसकी भरपूर प्रशंसा की. दरअसल रिंकू ने अपने इन पांच छक्कों के माध्यम से युवा पीढ़ी को पांच संदेश दिए हैं, ऐसा मैं मानता हूँ . क्या हैं वे पांच संदेश, आइए जानते हैं. 

1. लक्ष्य के प्रति समर्पण: रिंकू की जिन्दगी पर नजर डालने पर एक बात बिल्कुल साफ हो जाती है कि वह शुरू से ही  क्रिकेट के प्रति पूर्णतः समर्पित रहा है. उसने क्रिकेट को अपना लक्ष्य बनाया और उस दिशा में तन -मन से लग गया. सच कहें तो उसने स्वामी विवेकानन्द की उस कथन को अपने जीवन में उतार लिया जिसमें स्वामी जी कहते हैं कि एक समय में एक काम करो, और ऐसा करते समय अपनी पूरी आत्मा उसमे डाल दो और बाकी सब कुछ भूल जाओ. उठो, जागो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य ना प्राप्त हो जाये.

2. कठिनाइयों से घबराना नहीं: हिन्दी फिल्म इम्तिहान का एक गाना है - रुक जाना नहीं तू कहीं हार के, काँटों पे चलके मिलेंगे साये बहार के. रिंकू सिंह की पारिवारिक पृष्ठभूमि पर गौर करें तो पता चलेगा कि आर्थिक तंगहाली के बीच कैसे एक लड़के ने कभी हिम्मत नहीं हारी और तमाम कठिनाइयों के बीच क्रिकेट के प्रति अपने जुनून को बनाए रखा और न केवल खुद निरंतर आगे बढ़ते रहे, बल्कि हमेशा अपने परिवार की आर्थिक उन्नति का जरिया बने. 

3. कड़ी मेहनत करना: क्रिकेट हो या अन्य कोई भी खेल, राष्ट्रीय -अंतर राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचना और वहां अपनी एक पहचान बनाना कोई आसान काम नहीं है, क्यों कि हर खेल में आजकल बहुत प्रतिस्पर्धा है. इसके लिए कोई शॉर्टकट तरीका नहीं है. बस लगातार कड़ी मेहनत करनी पड़ती है. प्रसिद्ध अमेरिकी फुटबॉल खिलाड़ी तथा कोच विन्सेंट थॉमस लोम्बार्डी सही कहते हैं कि लीडर  पैदा  नहीं  होते, खुद बनते हैं - कड़ी मेहनत की वजह से. और  यही  वो  कीमत  है  जो  इस  या  किसी  और  लक्ष्य   को  प्राप्त  करने  के  लिए  चुकानी  पड़ती  है. उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले के इस लड़के ने इस बात को गांठ बांध ली  और कभी कड़ी मेहनत से जी नहीं चुराया. 

4. संयम रखना: इतिहास के पन्ने संयम से सफलता तक पहुंचनेवाले नायकों से भरे पड़े हैं. अब उसमें एक नाम रिंकू का भी जुड़ गया है. ऐसा इसलिए कि रिंकू ने हमेशा संयम का दामन थामे रखा. वह कई बार अपनी टीम के फाइनल सोलह में तो रहता था लेकिन फाइनल प्लेयिंग ग्यारह में आने से वंचित रह जाता. टीम में होने के बावजूद मैदान में मैच खेलने के बजाय बाहर बैठा खेल देखता, उससे सबक लेता,  रेगुलर प्रैक्टिस करता और अपने सीनियर्स पर भरोसा करता. 9 अप्रैल को खेले गए मैच के अंतिम ओवर में उसने जिस संयम का परिचय दिया उसकी तारीफ सब लोग कर रहे हैं. 

5. अवसर का सही उपयोग: सबके जीवन में ऐसे अवसर आते हैं जब आप कुछ नायाब और अदभुत काम कर सकते हैं. अगर आपने रिकू की तरह उस अवसर का सही उपयोग किया तो यकीनन आप सबको प्रभावित करेंगे और अभूतपूर्व उपलब्धि के हकदार बनेंगे. इससे आपकी एक अलग पहचान बनेगी, आर्थिक फायदे मिलेंगे, आप मोटिवेटेड फील करेंगे, आपका आत्मविश्वास बहुत बढ़ जाएगा और भविष्य में अवसर ने नए-नए द्वार खुलने लगेंगे. इन सबका प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष लाभ आपके परिवार, टीम या संस्था को भी होगा. निसंदेह रिकू सिंह जैसे युवा इसका ज्वलंत उदाहरण हैं. 

  (hellomilansinha@gmail.com)

      
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं। 

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Thursday, February 2, 2023

जानें, सीखें और आगे बढ़ें

                              - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर एंड स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट 


हाल ही में  पराक्रम दिवस पर आयोजित "अपने नेता को जानो" कार्यक्रम के दौरान देश भर से आए युवाओं के साथ संवाद करते हुए प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने उन्हें महान एवं विख्यात लोगों  की बायोग्राफी-ऑटोबायोग्राफी यानी जीवनी-आत्मकथा पढ़ने की बहुत अच्छी सलाह दी.
  मेरा  मत है कि युवाओं के साथ-साथ हरेक व्यक्ति को  इस सुझाव पर अमल करना चाहिए. यकीनन इसके बहुआयामी फायदे हैं. आइए, कुछ महत्वपूर्ण फायदों की चर्चा करते हैं. 


जीवन परिचय:
इसके जरिए आपको महान लोगों का विस्तृत जीवन परिचय मिलता है. जन्म से लेकर मृत्यु तक उनकी जीवन यात्रा में आए उतार-चढ़ाव, विभिन्न पडावों और छोटे-बड़े मुकामों की जानकारी मिलती है. आप उनकी पारिवारिक स्थिति के साथ-साथ उस समय की शैक्षणिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक-प्रशासनिक परिवेश से अवगत होते हैं. इन जानकारियों से वर्तमान में खुद की  स्थिति-परिस्थिति से उसकी तुलना करना और उनमें से अच्छी बातों को जानना-समझना और उसे अपने जीवन में उतारना आसान हो जाता है. आप उनके व्यक्तित्व से प्रभावित होते हैं और धीरे-धीरे उनसे जुड़ते चले जाते हैं. सच कहें तो "वे कर सकते हैं तो हम भी कर सकते हैं" जैसी सकारात्मक भावना आपके अन्दर भी आ जाती है. 


प्रेरणा:
उनके जीवनी के अध्ययन से आपको उनके व्यक्तित्व के अनेक अनजाने महत्वपूर्ण पहलुओं से परिचित होने का मौका मिलता है. आप अनायास ही यह जान पाते हैं कि ऐसे लोगों ने  किस तरह बड़े-बड़े लक्ष्यों को प्राप्त किया, जब कि उसी परिस्थिति में और उसी काल खंड में उनके जैसे अन्य हजारों-लाखों लोग वैसा कुछ नहीं कर पाए. इन बातों को जानकार आपको बहुत अच्छा लगता है और आप खुद को कुछ वैसा ही विशिष्ट कार्य करने के प्रति उत्साहित और प्रेरित महसूस करते हैं. अपने देश के सार्वजनिक जीवन में असाधारण सफलता हासिल करनेवालों के जीवन पर नजर डालें, चाहे वे महात्मा गांधी, सुभाष चन्द्र बोस, लालबहादुर शास्त्री, सरदार पटेल, राजेंद्र प्रसाद, जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया, दीनदयाल उपाध्याय या अब्दुल कलाम हों, सबने किसी-न-किसी महान व्यक्ति से प्रेरणा ग्रहण की और अपने जीवन पथ पर दृढ़ संकल्प और समर्पण से आगे बढ़ते गए. 

  
प्रयास करते रहें:
महान लोगों के बारे में पढ़ने से आपका यह विश्वास और मजबूत होता है कि यथाशक्ति और यथाबुद्धि हमेशा प्रयास करते रहना चाहिए, क्यों कि सतत प्रयास से ही सफलता हासिल होती है. जो प्रयास ही नहीं करेगा उसके सफल होने का तो कोई सवाल ही नहीं उठता. दूसरी बात यह कि प्रयास करनेवाले ही असफल होते हैं. जिसने प्रयास तक नहीं किया, उसकी सफलता-असफलता की तो कोई चर्चा ही नहीं करता, जैसे कि जो खिलाड़ी मैच खेलने मैदान में उतरा ही न हो, उसके जीतने-हारने की चर्चा बेमानी होती है. एक अहम बात और. ऐसे विभूतियों के जीवन से आपको यह सबक मिलती है कि अपने प्रयास के प्रति वे कितनी  निष्ठा, प्रतिबद्धता और नियमितता का आस्थापूर्वक पालन करते थे. इलेक्ट्रिक बल्ब के आविष्कारक थॉमस अल्वा एडिसन इसके ज्वलंत उदाहरण हैं. देश भर में जिस नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के जन्म दिवस को पराक्रम दिवस के रूप मनाया जाता है, उनका जीवन भी उत्कृष्ट प्रयास की पराकाष्ठा की कहानी कहता है. 



चुनौतियों व समस्याओं  से निबटने की सीख:
सबको अपने जीवन में कम या ज्यादा चुनौतियों और समस्याओं का सामना करना पड़ता है. उनसे निबटने के सबके तरीके एक जैसे नहीं होते. महान लोगों के जीवन की चुनौतियां एवं समस्याएं स्वाभाविक रूप से बड़ी और कई बार असाधारण होती है. प्रतिकूल परिस्थिति में भी वे उनसे सफलतापूर्वक निबटने के लिए जाने जाते हैं. उनकी जीवनी के अध्ययन से आप उनके ऐसे अनुभवों से परिचित होते हैं. कहते हैं कि एक साधारण व्यक्ति केवल अपने अनुभवों से सीखता है, जब कि एक बुद्धिमान व्यक्ति दूसरों के अनुभवों से भी सीखता रहता है. कहने का अभिप्राय यह कि देश-विदेश के विभूतियों के जीवनवृत्त से परिचित होकर आप अपने जीवन की चुनौतियों और समस्याओं का बेहतर ढंग से सामना कर सकते हैं और सफलता के नए-नए कीर्तिमान बना सकते हैं.  

   
संयम बनाए रखें:
संयम के बिना सफलता नहीं मिलती है. दरअसल, जीवन में संयम का पालन करना कामयाबी की कुंजी है. असंख्य गुणीजनों ने जीवन  में संयम की अनिवार्यता एवं अहमियत को अपने कर्मों से साबित किया है और रेखांकित भी. शोध कार्य में लगे विद्वानों-वैज्ञानिकों को जरा गौर से काम करते हुए देखिए  या उनके विषय में पढ़िए तो आपको पता  चलेगा कि संयम का दामन थामकर वे साल-दर-साल तन्मयता से परिश्रम करते रहते हैं, तब कहीं जाकर वे अपने शोध कार्य को पूरा कर पाते हैं. दुनिया में हुए तमाम आविष्कारों का इतिहास अगर हम पढ़ें तो संयम  की महत्ता का प्रमाण स्वतः मिल जाएगा. विलियम शेक्सपियर कहते हैं, "वे कितने निर्धन हैं जिनके पास संयम नहीं है." सही बात है. अपने देश के ही महान वैज्ञानिकों जैसे जगदीश चन्द्र बोस, सी.वी. रमण, सत्येन्द्र बोस, होमी भाभा, विक्रम साराभाई, राजा रमन्ना आदि की ही  बात करें तो वे सभी अदभुत संयम से असाधारण सफलता तक की यात्रा के ज्वलंत उदाहरण रहे हैं.   (hellomilansinha@gmail.com) 

 
      
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं। 

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Saturday, December 24, 2022

वर्ल्ड कप से सीखें प्रबंधन के सबक

                       - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर एंड स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट 

अभी-अभी क़तर में 2022 फीफा वर्ल्ड कप का रोमांचक और यादगार समापन हुआ है.  फाइनल मैच में खेल के 79वें मिनट तक दो गोल से आगे रहने वाले अर्जेंटीना को जिस तरह अगले दो मिनटों में फ्रांस के युवा खिलाड़ी एम्बापे के दो गोल का स्वाद चखना पड़ा, इसकी कल्पना शायद ही किसी  ने की होगी. लेकिन सम्प्रति फुटबॉल के जादूगर कहे जानेवाले लियोनेल मेसी की टीम अर्जेंटीना के मन में जीत का जज्बा कायम था. फलतः उस ऐतिहासिक मैच में अगले दस मिनट और फिर एक्स्ट्रा टाइम के उपरान्त पेनल्टी स्ट्रोक के माध्यम से अर्जेंटीना को  फुटबॉल का विश्व विजेता बनने का गौरव हासिल हुआ. यह यकीनन अभूतपूर्व था.  रैंकिंग में टॉप दस टीमों के प्रदर्शन पर गौर करने पर यह बात साफ हो जाती है कि तमाम उतार-चढ़ाव  के बावजूद फाइनल में पहुंचने वाले दोनों देशों के खिलाड़ियों के  मन में यह विश्वास बना रहा कि हम होंगे कामयाब और फलतः बेहतर कोशिश के जरिए उन्होंने इस मुकाम को हासिल किया. सवाल है कि आखिर ऐसे टीम के खिलाड़ी  कौन सी रणनीति अपनाते हैं जो उन्हें सफलता के अंतिम मुकाम तक पहुंचाता है. इन बातों से शिक्षा सहित हर क्षेत्र में सक्रिय सभी युवाओं को लाभ मिलेगा. तो आइए इस पर थोड़ी चर्चा करते हैं.



लक्ष्य के प्रति समर्पण: बिना पूर्ण समर्पण की भावना के लक्ष्य तक पहुंचना बहुत मुश्किल होता है, कई बार तो असंभव भी. स्वामी विवेकानंद युवाओं से बराबर यही बात तो कहा करते थे. खैर, फुटबॉल, हॉकी, वॉलीबॉल जैसे खेलों में जैसे गोलपोस्ट निर्धारित रहता है वैसे ही आपका गोल यानी लक्ष्य निर्धारित होना अनिवार्य है . स्पोर्टस आपको यह बखूबी सिखाता है और अपने लक्ष्य के प्रति समर्पण हेतु प्रेरित भी करता है. लुईस ग्रीज़र्ड ने सही कहा है कि "ज़िन्दगी का खेल काफी कुछ फुटबॉल की तरह है. आपको अपनी समस्याओं से जूझना पड़ता है, अपने डर को ब्लॉक करना पड़ता है, और जब मौका मिले तब अपना पॉइंट स्कोर करना होता है."  खेल सहित जीवन के हर क्षेत्र में कमोबेश यही सिद्धांत लागू होता है. 


उत्साह और ऊर्जा: अपने काम के प्रति सदैव बहुत उत्साहित रहना  सफलता का एक अहम पायदान होता है. उत्साह का स्पष्ट मतलब होता है लक्ष्य के प्रति आपका लगाव और समर्पण. और जब किसी चीज के प्रति यह लगाव और समर्पण रहता है तो उस चीज को हासिल करने के लिए आगे की कार्ययोजना आप खुद बनाने में जुट जाते हैं. हां, केवल उत्साह से काम संपन्न नहीं होता. इसके लिए अपेक्षित ऊर्जा की जरुरत होती है. ऐसे अनेक उदाहरण  मिल जायेंगे जब कोई युवा अभीष्ट कार्य तो करना चाहता है, लेकिन ऊर्जा की कमी के कारण उसे कर नहीं पाता है. अतः अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित  सभी युवा खुद को मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ और ऊर्जावान बनाए रखते हैं. यहां सिर्फ वर्ल्ड कप फाइनल मैच की ही बात करें तो आपको कभी भी मेसी, एम्बापे, मार्टिनेज या दोनों टीमों के किसी भी खिलाड़ी में उत्साह और ऊर्जा की कमी दिखाई दी?   

 
योजना और कार्यान्वयन: सब जानते हैं कि किसी लक्ष्य को हासिल करने के लिए यथोचित कर्म करना बहुत जरुरी होता है. इसके लिए पहले फुलप्रूफ योजना बनाना और फिर उस योजना  को सही ढंग से कार्यान्वित करना उतना ही अनिवार्य होता है. अनेक उदाहरण आसपास ही मिल जायेंगे जहां युवा विशेष ने लक्ष्य तो बड़ा तय कर लिया, लेकिन उसे हासिल करने के लिए अपेक्षित प्लानिंग  एंड एग्जिक्युसन के मामले में वह सही कदम नहीं उठा पाया. खुशी की बात  है कि फुटबॉल के इस महाकुम्भ में सभी टीम कमोबेश प्रबंधन के इस अहम सूत्र का पालन करते नजर आए. 

 
समय प्रबंधन और आत्मविश्वास:  किसी भी खेल में इनका अतिशय महत्व होता है. यह अकारण नहीं है. अगर 90 मिनट के फुटबॉल मैच में या 70 मिनट के हॉकी मैच में तय समय के अन्दर गोल कर सकें तो यह बेहतर खेल का परिचायक होता है. आपकी टीम ने शुरुआती कुछ मिनटों में या मध्यांतर से पहले दो-तीन गोल करके बढ़त हासिल कर ली तो प्रतिद्वंदी टीम पर दवाब बनाना आसान हो जाता है, जिसका असर खेल के अंत तक रहता है. बेहतर समय प्रबंधन  से हासिल सफलता से आपका और पूरी टीम का आत्मविश्वास भी बढ़ता है. अर्जेंटीना की टीम ने शुरूआती 36 मिनट के भीतर ही दो गोल करके इसे चरितार्थ किया.   


टीम वर्क एवं समावेशी सोच: फुटबॉल, हॉकी, वॉलीबॉल,  क्रिकेट जैसे सभी  खेल टीम के रूप में खेले जाते हैं. आप कितने भी योग्य हों और आपका व्यक्तिगत योगदान कितना भी  महत्वपूर्ण हो , लेकिन उसकी कीमत तब कम हो जाती है जब आप एक टीम के रूप में अपना 100 % नहीं दे पाते हैं.  देखा गया है कि व्यक्तिगत रूप से सभी खिलाड़ियों का स्तर बेहतर होते हुए भी टीम मैच नहीं जीत पाती है, क्यों कि खिलाड़ियों में टीम भावना की कमी थी. कहने की जरुरत नहीं कि खेल के मैदान में हमें यह अहम सीख मिलती है कि हम कैसे टीम वर्क और समावेशी सोच के साथ न केवल खेल प्रतियोगिताओं में सफलता हासिल करें, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में सफल हो सकें. फाइनल मैच में नियमित 90 मिनट और बाद के एक्स्ट्रा टाइम के 30 मिनट के खेल में अर्जेंटीना के एक और फ्रांस के दो पेनल्टी स्ट्रोक की बात छोड़ दें तो अन्य तीनों  गोल में टीम वर्क और आपसी तालमेल का अदभुत प्रदर्शन हुआ. 


नियमित कड़ी मेहनत: सब जानते हैं कि कड़ी मेहनत का कोई विकल्प नहीं है. फिर भी सभी युवा क्या ऐसा करते हैं ? ज्ञानीजन सही कहते हैं कि जैसा करेंगे, वैसा भरेंगे. कहने का तात्पर्य यह कि बिना अपेक्षित मेहनत के अपेक्षित रिजल्ट की कामना बेमानी है. सफलता को अपनी मुट्ठी में करने के लिए सजगता के साथ लक्षित कार्य  में अपना अधिकांश समय लगाना है. सफलता का परचम लहराने वाले युवा अपने कार्य से संबंधित हर पहलू को न केवल बहुत अच्छी तरह समझते  हैं, बल्कि उसकी कड़ी प्रैक्टिस करते रहते हैं. खुद को निरंतर उन्नत करने के मामले में अपने टीचर, कोच या मेंटर द्वारा दिए गए सुझाव, दिशानिर्देश एवं मार्गदर्शन का गंभीरता से पालन  करते हैं. अपने काम से जुड़े हर संभावित सवाल का सही उत्तर पाने और उसे लागू करने में वे बराबर आगे रहते हैं. ऐसा नहीं कि वे परीक्षा या किसी मैच से से कुछ दिन या हफ्ते पहले खूब मेहनत करते हैं. उनके लिए तो नियमित रूप से कड़ी मेहनत करना दिनचर्या का अभिन्न हिस्सा होता है. फीफा वर्ल्ड कप में क्वार्टर फाइनल और उससे आगे जाने वाले हरेक टीम के खिलाड़ियों द्वारा दैनिक रूटीन के तहत वर्क-आउट हो या प्रैक्टिस मैच या एक्चुअल मैच, हर स्थान पर कड़ी मेहनत के प्रति उनकी पूर्ण प्रतिबद्धता रही. 


असफलता से न घबराना: देखा गया है कि असफल होने पर ज्यादातर युवा दूसरे लोगों के आलोचना को बहुत गंभीरता से लेने की भूल करते हैं. अच्छे युवा  ऐसा नहीं करते. ऐसे समय उन्हें भी बुरा तो लगता है लेकिन वे बिना घबराए और कंफ्यूज हुए असफलता के कारणों का स्वयं निरपेक्ष विश्लेषण करके लक्ष्य के प्रति अपने संकल्प को और दृढ़ बनाना जरुरी समझते हैं. बिना समय गंवाए और बिना किसी पर दोषारोपण किए अपनी गलती का पता लगाते हैं, उससे सीख लेते हैं और बेहतरी के प्रयास में जी-जान से जुट जाते हैं. जरा सोचिए,  फ्रांस की टीम 79वें मिनट तक दो गोल से पीछे रहने के बाद अगर यथोचित प्रयास न करती तो क्या आगे एक्स्ट्रा टाइम के बाद 3-3 गोल की बराबरी कर पाती ?  अगर फीफा वर्ल्ड कप विजेता अर्जेंटीना की टीम सऊदी अरब से अपना पहला मैच हारने के बाद वाकई हार मान जाती तो क्या 36 साल बाद ऐसा इतिहास रच पाती?  दरअसल, जीवन में सदा इस जज्बे को बनाए रख कर आगे बढ़ने का प्रयास करना जरुरी होता है. तभी तो कामयाबी आपके  कदम चूमती है. 


अंत में एक बात और. फाइनल मैच के दौरान तनाव और संघर्ष के उन पलों में भी मेसी के चेहरे पर तैरती मुस्कान, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों का हार के गम में डूबे एम्बापे को एक अभिभावक के रूप में सांत्वना देना, फिर अर्जेंटीना के गोलकीपर मार्टिनेज का एम्बापे को हाथ पकड़ कर उठाना जैसे अनेक दृश्य दिल को छू गए. आपने भी ऐसा ही महसूस किया ना?

      
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं। 
# दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में  24 दिसम्बर , 2022 को प्रकाशित 

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