Sunday, May 3, 2020

स्मार्ट फोन और आपका जीवन

                              - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर, स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट ... ...
हाल ही में "परीक्षा पे चर्चा" प्रोग्राम में प्रधानमंत्री ने देशभर से आए स्कूली छात्र-छात्राओं और उनके अभिभावकों-शिक्षकों से बात करते हुए अनेक अनुकरणीय बातें बताईं. बातों-बातों  में  प्रधानमंत्री ने बच्चों से कहा, "स्मार्ट फोन आपका जितना समय चोरी करता है, उसमें से 10 प्रतिशत कम करके आप अपने मां, बाप, दादा, दादी के साथ बिताएं.  तकनीक हमें खींचकर ले जाए, उससे हमें बचकर रहना चाहिए. हमारे अंदर ये भावना होनी चाहिए कि मैं तकनीक को अपनी मर्जी से उपयोग करूंगा." आइए, मोबाइल / स्मार्ट फोन की उपयोगिता पर थोड़े विस्तार से चर्चा करते हैं. 

हाल ही में एक चैनल में एक सर्वे के हवाले से कहा गया कि सामान्य तौर पर एक व्यस्क भारतीय एक साल में 1800 घंटे अपने मोबाइल / स्मार्ट फ़ोन पर बिताता है यानी साल के करीब ढ़ाई महीने. अगर दिनभर के चौबीस घंटों में नींद की अवधि के औसतन आठ घंटे को घटा दिया जाय, तो सालभर में मोबाइल को समर्पित समय लगभग चार महीना होता है. कई बड़े शहरों में किए गए सर्वे में यह बात निकल कर सामने आई है कि छात्र-छात्राएं आम तौर पर सालभर में इससे कहीं ज्यादा समय मोबाइल से चिपके रहते हैं. किसी भी महानगर या बड़े शहर में राह चलते या स्टेशन-बस स्टॉप-एअरपोर्ट पर प्रतीक्षारत विद्यार्थियों को देख लें,  मोबाइल पर उनकी बढ़ती निर्भरता का अंदाजा लग जायगा. देशभर में स्मार्टफ़ोन के कुल खरीददारों  में विद्यार्थियों की बढ़ती संख्या भी इस ओर स्पष्ट संकेत करती हैं. खैर, अगर सालभर में 1800 घंटे को ही लेकर बात करें तो छात्र-छात्राएं दिनभर में करीबन इतने घंटे अध्ययन आदि में व्यतीत करने से चूक जाते हैं. लिहाजा, इसका दुष्परिणाम उनके कैरियर और रिजल्ट में दिखाई पड़ता है.

प्रसंगवश मोबाइल के लगातार और ज्यादा इस्तेमाल से विद्यार्थियों के सेहत - मानसिक और शारीरिक दोनों, को होनेवाले नुकसान पर संक्षिप्त  चर्चा करते चलते हैं. स्वास्थ्य संबंधी एकाधिक रिपोर्ट में कहा गया है कि मोबाइल फोन से निकलने वाली रेडियो तरंगों के दुष्प्रभाव के कारण  अनावश्यक थकान, पाचन की शिकायत, सिर दर्द, स्मरण शक्ति में गिरावट के साथ-साथ श्रवण और नेत्र दोष जैसी आम समस्याएं होती हैं. कालान्तर में इससे ब्रेन ट्यूमर, ह्रदय रोग, आंख-कान -पेट के रोग, डिप्रेशन आदि से ग्रसित होने का खतरा बहुत बढ़ जाता है. 

बताने की जरुरत नहीं कि परीक्षा के मौसम में मोबाइल का सामान्य इस्तेमाल भी (यानी सालभर में 1800 घंटे के हिसाब से) विद्यार्थियों के लिए बहुत नुकसानदेह साबित होता है. इस समय  उन पर परीक्षा में अच्छा करने का प्रेशर रहता है और इस कारण वे बहुत कुछ पढ़ना तो चाहते हैं, लेकिन मोबाइल का मोह और उससे चिपके रहने की बुरी आदत पीछा नहीं छोड़ती है. नतीजतन, संतुलन बिगड़ता है, तनाव बढ़ता है और वे अध्ययन पर फोकस नहीं कर पाते. दोस्तों को फोन करने या उनका फोन आने का सिलसिला भी शायद ही रुकता या कम होता है. हाल के हफ़्तों में स्ट्रेस मैनेजमेंट और मोटिवेशन के सेशन में कई बड़े स्कूलों में दसवीं और बारहवीं क्लास के विद्यार्थियों से बात करते हुए जब मैंने उनसे परीक्षा से कम-से-कम एक महीने पहले से मोबाइल से पूरी तरह दूर रहने के दसाधिक फायदे बताए, तो मेरे सुझावों से लगभग सभी विद्यार्थियों ने सहमति जताई. हां, मैंने उनसे कहा कि मोबाइल से उनके प्रगाढ़ रिश्ते के मद्देनजर इसपर अमल करना थोड़ा कठिन तो है, लेकिन असंभव नहीं. 
  
विद्यार्थियों के लिए यह  विचारणीय सवाल है कि क्या मोबाइल ही उनका जीवन है या उनके जीवन को बस थोड़ा आसान करनेवाला एक छोटा जरिया या उपकरण है? परीक्षा के समय और बाद में भी अगर वे मोबाइल/स्मार्ट फोन को जरुरी संचार और उपयोगी संवाद-जानकारी आदि का  माध्यम बना सकें तो यक़ीनन विद्यार्थियों को बहुत सारे जीवनोपयोगी फायदे होंगें. रिचार्ज  के लिए पैसे कम लगेंगे, समय की बड़ी बचत होगी, अपनी और दोस्तों की सेहत अच्छी रहेगी, मनोरंजन के नाम पर गैर-जरुरी और ज्यादातर नकारात्मक चीजों से बचना संभव होगा, माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी और अन्य परिजनों के साथ क्वालिटी टाइम बिताने और सीखने -सीखाने का अच्छा अवसर मिलेगा, जैसा कि प्रधानमंत्री ने उनसे कहा. इतना ही नहीं, रात में नींद अच्छी आएगी, स्वाद लेकर भोजन कर पायेंगे, अध्ययन के अलावे खेलकूद पर फोकस कर पायेंगे. इस सबका समेकित असर विद्यार्थियों की ख़ुशी, स्वास्थ्य और सफलता में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होगा. अतः मोबाइल को अपना जीवन नहीं, जीवन को थोड़ा सुविधाजनक बनाने का बस एक छोटा साधन मानें. बीच-बीच में बिना मोबाइल के जीवन जी कर तो देखें. वाकई अच्छा लगेगा. 
(hellomilansinha@gmail.com)
       
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं। 

# लोकप्रिय साप्ताहिक "युगवार्ता" के 16.02.2020 अंक में प्रकाशित
#For Motivational Articles in English, pl. visit my site : www.milanksinha.com 

Friday, May 1, 2020

हेल्थ मैनेजमेंट: शरीर को अंदर से सैनीटाइज करते हैं ये प्राणायाम व आसन

                                                - मिलन  सिन्हा,  वेलनेस कंसलटेंट एवं योग विशेषज्ञ 
नोवेल कोरोना वायरस यानी कोविड-19 वैश्विक महामारी से भारत सहित दुनियाभर के 200 से ज्यादा देश दुष्प्रभावित हैं. लाखों लोग संक्रमित हो चुके हैं. यह संख्या निरंतर बढ़ रही है और इससे पीड़ित लोगों की मरने की संख्या भी. विश्व के दूसरे सबसे आबादीवाले देश होने और कोविड-19 के जन्मदाता देश चीन का पड़ोसी होने के बावजूद भारत की स्थिति अबतक अपेक्षाकृत बेहतर है. केंद्र और राज्य सरकारों के साथ-साथ देशभर की सामाजिक और स्वयंसेवी संस्थाएं लोगों को कोरोना वायरस के संक्रमण से बचाए रखने और जो संक्रमित हो चुके हैं उनके उपयुक्त इलाज के लिए मिलकर काम कर रही हैं. केंद्र सरकार का आयुष मंत्रालय भी समय-समय पर लोगों को इसके संबंध में जरुरी जानकारी मुहैया करवा रही है. तथापि एकाधिक कारणों से बड़ी संख्या में आम लोग सशंकित, चिंतित और तनावग्रस्त हैं. इसका बुरा असर शरीर के रोग प्रतिरोधक क्षमता और मेटाबोलिज्म पर पड़ना स्वाभाविक है. इसके दुष्परिणाम बहुआयामी हो सकते हैं. समाज और सरकार के सामने यह एक बड़ी चुनौती है. 

ज्ञातव्य है कि नोवेल कोरोना वायरस यानी कोविड-19 के संक्रमण से हमारी श्वसन प्रणाली बुरी तरह प्रभावित होती है. वायरस का  पहला हमला हमारे गले के आसपास की कोशिकाओं पर होता है  जो जल्दी ही हमारे सांस की नली और फेफड़ों को संक्रमित कर स्थिति को जानलेवा तक बना देती है. नियमित योगाभ्यास, खासकर निम्नलिखित पांच प्राणायाम के अभ्यास से खुद को अन्दर से सेनिटाइज करना और बराबर वायरस से लड़ने में खुद को सक्षम बनाए रखना आसान  हो जाता है, क्यों कि इससे श्वसन नली एवं फेफड़े के प्रोब्लम्स से बचाव के अलावे उच्च रक्तचाप, न्यूरो प्रॉब्लम, ह्रदय रोग, मधुमेह, मानसिक तनाव आदि में भी काफी लाभ मिलता है. 

विश्व प्रसिद्ध योगाचार्य स्वामी सत्यानन्द सरस्वती के अनुसार प्राणायाम प्रक्रियाओं की वह श्रृंखला है जिसका लक्ष्य शरीर की प्राणशक्ति को उत्प्रेरणा देना, बढ़ाना तथा उसे विशेष अभिप्राय से विशेष क्षेत्रों में संचारित करना है. प्राणायाम का अंतिम उद्देश्य सम्पूर्ण शरीर में प्रवाहित 'प्राण' को नियंत्रित करना भी है.

कोशिश करें कि प्राणायाम का अभ्यास अपेक्षाकृत खुले स्थान पर किए जाएं अर्थात ऑक्सीजन और प्रकाश युक्त माहौल में. आइए प्राणायाम के उन पांच अभ्यासों के बारे में  जानते हैं. 

1. योग क्रिया: अनुलोम-विलोम प्राणायाम 
विधि: सुखासन, अर्धपद्मासन या पद्मासन में से ध्यान के किसी आसन में सीधा बैठ जाएं. शरीर को ढीला छोड़ दें. हाथों को घुटने पर किसी ध्यान मुद्रा में रख लें. आँख बंद कर लें. अब दाहिने हाथ के प्रथम और द्वितीय अँगुलियों को ललाट के मध्य बिंदु पर रखें और तीसरी अंगुली (अनामिका) को नाक के बायीं छिद्र के पास और अंगूठे को दाहिने  छिद्र के पास रखें. अब अंगूठे से दाहिने छिद्र को बंद कर बाएं छिद्र से दीर्घ श्वास लें और फिर अनामिका से बाएं छिद्र को बंद करते हुए दाहिने छिद्र से श्वास को छोड़ें. इसी भांति अब दाहिने  छिद्र से श्वास लेकर बाएं से छोड़ें. यह एक आवृत्ति है. 
अवधि:  कम-से-कम 5 मिनट रोजाना
सावधानी: मन को श्वास क्रिया पर केन्द्रित करें. जल्दबाजी या बलपूर्वक न करें.  
लाभ: सर्दी, जुकाम, सायनस, अस्थमा, खांसी, टोन्सिल आदि समस्त कफ रोग दूर होते हैं. सिरदर्द, माइग्रेन, उच्च रक्तचाप, न्यूरो प्रॉब्लम, ह्रदय रोग आदि के लिए भी लाभप्रद. 
  
2. योग क्रिया: कपालभाति प्राणायाम  
विधि: सुखासन, अर्धपद्मासन या पद्मासन में सीधा बैठ जाएं. पेट सहित पूरे शरीर को ढीला छोड़ दें. हाथों को घुटने पर किसी ध्यान मुद्रा में रख लें. आँख बंद कर लें और श्वास को सामान्य करते हुए आते-जाते महसूस करें. अब रेचक यानी श्वास छोड़ने की प्रमुखता रखते हुए श्वसन अभ्यास करें. चूंकि इस प्राणायाम में  रेचक क्रिया में थोड़ा जोर लगाया जाता है, अतः हमारा पेट स्वतः थोड़ा भीतर की ओर जाएगा. आप पूरा ध्यान केवल सांस को बाहर निकालने पर केन्द्रित करें. 
अवधि: कम-से-कम 5 मिनट रोजाना
सावधानी: जो लोग नेत्र रोग से पीडि़त हैं या जिन्हें हाई ब्लड प्रेशर की समस्या है, वे इस प्राणायाम को किसी योग प्रशिक्षक से सलाह लेकर ही करें.
लाभ: इससे फेफड़ा स्वच्छ होता है. दमा, एलर्जी, सायनस, कब्ज, जुकाम आदि रोग के साथ-साथ  ह्रदय एवं मस्तिष्क के रोगों में भी लाभ मिलता है. मधुमेह से पीड़ित लोगों के लिए भी लाभप्रद.

3. योग क्रिया: भस्त्रिका प्राणायाम
विधि: ध्यान के किसी आसन यानी सुखासन, अर्धपद्मासन या पद्मासन में बैठ जाएं. अपने सिर और मेरुदंड यानी रीढ़ की हड्डी सीधी रखें और दोनों हाथ घुटने पर किसी ध्यान मुद्रा में रखें. आँख बंद कर लें और श्वास को सामान्य करते हुए आते-जाते महसूस करें. अब थोड़ी तेज गति से बीस बार पूरक और रेचक यानी श्वास लें और छोड़ें. यह एक आवृति है. तीन आवृति से शुरू करें और अगले कुछ दिनों में सुविधानुसार बीस आवृति तक ले जाएं. इस क्रिया के अभ्यास से फेफड़ों का उपयोग लोहार की धौंकनी के तरह होता है. इससे फेफड़े से ऑक्सीजन से भर जाता है.  
अवधि: कम-से-कम 5 मिनट रोजाना
सावधानी: अगर हाई ब्लड प्रेशर या चक्कर आने संबंधी कोई बीमारी हो तो अपने डॉक्टर के एडवाइस से ही इस क्रिया को करें और वह भी किसी योग्य योग प्रशिक्षक के मार्गदर्शन में. 
लाभ: फेफड़े को स्वच्छ, स्वस्थ और सबल रखने में बहुत लाभकारी. इस क्रिया से बहुत ताजगी और स्फूर्ति का अनुभव होता है. गले के रोग, सर्दी-जुकाम, एलर्जी, दमा आदि में भी लाभप्रद. 

4. योग क्रिया: उज्जायी प्राणायाम 
विधि: आराम के किसी भी आसन में सीधा बैठ जाएं. अपने सिर और मेरुदंड यानी रीढ़ की हड्डी सीधी रखें और दोनों हाथ घुटने पर किसी ध्यान मुद्रा में रखें. शरीर को ढीला छोड़ दें. अब अपने जीभ को मुंह में पीछे की ओर इस भांति मोड़ें कि उसके अगले भाग का स्पर्श ऊपरी तालू से हो. इसके बाद  गले में स्थित स्वरयंत्र को संकुचित करते हुए मुंह से श्वसन करें और और अनुभव करें कि श्वास क्रिया नाक से नहीं, बल्कि गले से संपन्न हो रहा है. ध्यान रहे कि श्वास क्रिया गहरी, पर धीमी हो. इसे 10-20 बार करें.  
अवधि: कम-से-कम 5 मिनट रोजाना 
सावधानी: जल्दबाजी न करें. मन को श्वास क्रिया पर केन्द्रित करें 
लाभ: गले को ठीक और नीरोग रखने के लिए काफी फायदेमंद. सर्दी-खांसी, ह्रदय रोग, अस्थमा, कंठ विकार, टोन्सिल, अनिद्रा, मानसिक तनाव से पीड़ित लोगों के लिए लाभप्रद है.

5. योग क्रिया: भ्रामरी प्राणायाम  
विधि: ध्यान के किसी भी आसन जैसे सुखासन, अर्धपद्मासन आदि में बैठ जाएं. मेरुदंड सीधा रखें. शरीर को ढीला छोड़ दें. आंख बंद कर लें. श्वास को सामान्य करते हुए आते-जाते महसूस करें. अब प्रथम अँगुलियों से दोनों कान बंद कर लें. दीर्घ श्वास ले और भौंरे की तरह ध्वनि करते हुए अविरल रेचक करें तथा मस्तिष्क में ध्वनि तरंगों का अनुभव करें. यह एक आवृत्ति है . इसे 5 आवृत्तियों से शुरू कर यथासाध्य रोज बढ़ाते रहें. रोजाना 10 मिनट तक करें तो बेहतर परिणाम मिलेंगे.
अवधि: कम-से-कम 5 मिनट रोजाना 
सावधानी: जल्दबाजी न करें. श्वास क्रिया तथा ध्वनि लयबद्ध हो, इसका ध्यान रखें.  
लाभ: गले का रोग, मानसिक तनाव, उच्च रक्तचाप, ह्रदय रोग आदि में लाभप्रद. उत्तेजना और  मन की चंचलता दूर होती है. स्मरण शक्ति और सकारात्मक सोच बढ़ाने में सहायक.

तन-मन के रिलैक्सेशन के लिए शिथिलीकरण योग क्रिया :

स्वामी सत्यानन्द सरस्वती कहते हैं कि "आधुनिक वैज्ञानिक युग में लोग अनेक तनावों एवं दुश्चिंताओं के अधीन हैं. उन्हें नींद में भी आराम नहीं मिलता. ऐसे लोगों को जिस प्रकार के विश्राम की आवश्यकता है, उसे वे शिथिलीकरण के आसनों द्वारा निश्चित ही प्राप्त कर सकते हैं." आइए ऐसे दो आसान आसनों के विषय में जानते हैं.

1. योग क्रिया: शवासन 
विधि: दोनों हाथों को शरीर के बगल में रखते हुए पीठ के बल सीधा लेट जाएं. हथेलियों को ऊपर की ओर खुला रखें. पैरों को थोड़ा अलग कर लें. आखें बंद कर शरीर को बिल्कुल ढीला छोड़ दें. शरीर को शव की तरह पड़ा रहने दें. श्वास को सामान्य करते हुए आते-जाते महसूस करें. अब श्वास-प्रश्वास पर मन को केन्द्रित करते हुए उनकी गिनती शुरू कर दें. यानी श्वास को आते-जाते सजगता से अनुभव करें और गिनें भी. मन भटके तो उसे पुनः इस काम में लगाएं. कुछ मिनटों तक ऐसा करने पर तन-मन शिथिल हो जाएगा और आप बहुत रिलैक्स्ड फील करेंगे. 
अवधि: कम-से-कम 5 मिनट रोजाना. ऐसे आपको जब जरुरत महसूस हो इस क्रिया को करें.   
सावधानी: लेटने का स्थान समतल हो और आप श्वास-प्रश्वास के प्रति सचेत रहें.
लाभ: समस्त शारीरिक तथा मानसिक प्रणालियों को शिथिल करके विश्राम देता है. थकान, चिंता, तनाव और अवसाद में बहुत लाभकारी. सोने से पूर्व और योगाभ्यास के पश्चात इसका अभ्यास आदर्श माना जाता है.

2. योग क्रिया: मकरासन  
विधि: पेट के बल सीधा लेट जाएं. अब कुहनियों के सहारे सिर और कंधे को उठाएं तथा हथेलियों पर ठुड्डी को टिका दें. आखें बंद कर शरीर को बिल्कुल ढीला छोड़ दें. अब श्वास-प्रश्वास पर मन को केन्द्रित करते हुए उनकी गिनती शुरू कर दें. कुछ समय तक लगातार इस अवस्था में रहें. 
अवधि: कम-से-कम 5 मिनट रोजाना. ऐसे आपको जब जरुरत महसूस हो इसे आप करें.   
सावधानी: लेटने का स्थान समतल हो और आप श्वास-प्रश्वास के प्रति सचेत रहें.
लाभ: रिलैक्सेशन के अलावे इस आसन से दमा एवं फेफड़े के अन्य रोगों से ग्रसित लोगों को बहुत लाभ मिलता है. मेरुदंड की समस्या से पीड़ित लोगों के लिए भी काफी लाभप्रद. (hellomilansinha@gmail.com)

     
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं। 

# लोकप्रिय दैनिक "प्रभात खबर" में 29.04.2020 को प्रकाशित
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Tuesday, April 28, 2020

जिंदगी जीने का नाम

                              - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर, स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट ... ...
भगवान बुद्ध कहते हैं, "ख़ुशी इसपर निर्भर नहीं करती कि आपके पास क्या है  या आप क्या हैं. ये पूरी तरह से इस पर निर्भर करती है कि आप क्या सोचते हैं." सच कहें तो यह विचार हमें दुःख की  मानसिकता से बाहर निकालने में भी बहुत मदद करता है. जीवन गतिशील है और हर विद्यार्थी को अपने सपनों को साकार करने और अपने छोटे-बड़े लक्ष्यों तक पहुंचने की स्वाभाविक इच्छा होती है. स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी में पढ़नेवाले विद्यार्थियों की संख्या बहुत बड़ी है. विद्यार्थियों में सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक विविधता भी बहुत है. लेकिन हर साल या हर सेमेस्टर के रिजल्ट के दिन रिजल्ट शीट में वही विद्यार्थी टॉप टेन या ट्वेंटी में जगह हासिल कर पाते हैं, जो हमेशा सोच के स्तर पर पॉजिटिव और यथार्थवादी बने रहते हैं. महात्मा गांधी का स्पष्ट कहना है, "व्यक्ति अपने विचारों के सिवाय कुछ नहीं है. वह जो सोचता है, वह बन जाता है." सचमुच, इन महापुरुषों के विचारों पर गौर करें तो विद्यार्थियों के लिए जीवन पथ पर दृढ़ता और ख़ुशी-ख़ुशी बढ़ते जाना आसान हो जाएगा. भगवान बुद्ध और महात्मा गांधी का जीवन इसका ज्वलंत प्रमाण है.

कभी ख़ुशी, कभी गम के मिलेजुले दौर से हर विद्यार्थी गुजरता है. यह सही है कि सभी छात्र-छात्राएं ऐसा जीवन जीना चाहते हैं जहां ज्यादा-से-ज्यादा ख़ुशी हो और कम-से-कम गम. इसके लिए सब अपने-अपने तरीके से जीवन जीने का प्रयास करते हैं. ज्ञानीजन बराबर कहते रहे हैं कि पूरी निष्ठा और विश्वास से यथासंभव प्रयास करते रहें. कभी भी किसी काम को बीच में न छोड़ें. फल क्या होगा इसकी चिंता कार्य करते वक्त कदापि ना करें. एक किसान के बारे में सोचें. अगली फसल  के लिए जमीन को जोतते या तैयार करते वक्त या जमीन में बीज डालते या पौधा लगाते समय वह फल के विषय में ज्यादा नहीं सोचता है. वह बस इस आत्मविश्वास से काम करता है कि जो कुछ हमारे अख्तियार में है, उसे सर्वश्रेष्ट तरीके से करते हैं. उसे अच्छी तरह मालूम होता है कि मौसम सहित कतिपय बाहरी फैक्टर्स अपेक्षित फल पाने में अवरोध बन सकते हैं. ऐसा कई बार होता भी है. लेकिन इस कारण किसान अपना 100 % देने से बचने की कोशिश नहीं करता. देखा गया है कि अधिकांश समय उसे अपनी कोशिशों के अनुरूप ही फल मिलता है. अनेकानेक विद्यार्थी किसान की मानसिकता से ही अध्ययन में जुटे रहते हैं. खूब मेहनत करते हैं. नकारात्मकता से भरसक दूर रहते हैं और इसी कारण खुश भी रहते हैं. कामयाबी तो मिलती ही है.
                                   
एक सच्ची घटना बताता हूँ. एक दिन दो मित्र अपने-अपने घर से एक ही ऑटो में  रेलवे स्टेशन की ओर चले. उन्हें एक प्रतियोगिता परीक्षा के लिए प्रदेश की राजधानी जाना था. घर से स्टेशन के बीच जाम के कारण वे लोग कुछ देर से स्टेशन पहुंचे. टिकट लेकर जब तक वे प्लेटफार्म पर  पहुंचते उनकी ट्रेन निकल चुकी थी. दोनों को बहुत अफ़सोस हुआ. लेकिन उनमें से एक ने तुरत उस गम को पीछे छोड़कर यह सोचना शुरू किया कि जो होना था वह तो हो गया, अब विकल्प क्या है? वह मोबाइल के जरिए यह पता करने में जुट गया कि ट्रेन या बस या टैक्सी से समय से राजधानी पहुंचना संभव है या नहीं. दूसरी ओर उसका साथी थोड़ी देर तो माथा पकड़ कर बैठा रहा, फिर ऑटोवाले और सड़क पर जाम के लिए पुलिसवाले और न जाने किसको-किसको कोसने लगा. इसके बाद  ट्रेन मिस करने के विषय में विस्तार से किसी दोस्त को बताता रहा. उसने तो गम की दरिया में न जाने इस बीच कितने गोते लगाए. और फिर जब साथ चल रहे लड़के को घर लौटने को कहने लगा तब उसे बताया गया कि चिंता की कोई खास बात नहीं है, क्यों कि एक ट्रेन जो तीन घंटे लेट चल रही है वह अगले बीस मिनट में आनेवाली है जिससे वे लोग  गंतव्य तक कमोबेश ठीक समय से पहुंच जायेंगे. इस वाकया से यह साफ़ है कि एक ही घटना को दो अलग-अलग मानसिकतावाले विद्यार्थी ने अलग-अलग रूप में लिया और तदनुसार रियेक्ट किया.
  
विचारणीय बात है कि  परेशानी या गम का वक्त सभी छात्र-छात्राओं को  हमेशा एक मौका देता है खुद को संयत और शांत रखकर उस समय उपलब्ध संभावित विकल्पों पर विचार करने का और उनमें से सबसे अच्छे विकल्प का उपयोग करके मंजिल तक पहुंचने का. परेशानी के समय परेशान होने, उत्तेजित होने, खुद को और परिस्थिति को कोसने का कोई लाभ नहीं होता. नुकसान तो अवश्य होता है. कहने का मतलब यह कि विद्यार्थीगण ख़ुशी या गम को जीवन का महज एक पड़ाव मानकर पॉजिटिव सोच के साथ बस अपना मूल काम करते रहें तथा जीवन को एन्जॉय करते चलें. जो होगा, सब बढ़िया होगा.  
(hellomilansinha@gmail.com) 
       
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं। 

# लोकप्रिय साप्ताहिक "युगवार्ता" के 09.02.2020 अंक में प्रकाशित
#For Motivational Articles in English, pl. visit my site : www.milanksinha.com 

Tuesday, April 21, 2020

चेंज मैनेजमेंट के लाभ

                               - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर, स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट ... ...
हम सभी परिवर्तनशील दुनिया में रहते हैं. सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक और शाम से सुबह तक जैसे पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमते हुए अपना स्थान परिवर्तित करती है, उसी तरह हम जीवन में परिवर्तन से रूबरू होते रहते हैं -प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में और छोटे या बड़े रूप में. यकीनन,  विद्यार्थियों के जीवन में परिवर्तन का सिलसिला थोड़ी तीव्र गति से होता है. 

सच तो यह है कि समय बदलता रहता है और बदलता रहता है छात्र-छात्राओं के जीवन में बहुत सारी छोटी-बड़ी बातें. जीवन के इस कालखंड में  हार्मोनल चेंज से लेकर कक्षा, पाठ्यक्रम, दोस्त, शिक्षक, स्थान, मान्यता, संवेदना आदि तक में बदलाव  के दौर से गुजरते हैं सभी विद्यार्थी. इतने  परिवर्तनों के बीच सच्चाई और अच्छाई को अपने व्यक्तित्व विकास में शामिल करते हुए अपनी मूल मानवीय पहचान को बनाए रखना तथा सतत उन्नत करते रहना बड़ी चुनौती होती है. ऐसा इसलिए कि आम तौर पर  परिवर्तन के दौर में विद्यार्थियों को अनिश्चितता और शंका-आशंका का सामना तो करना ही पड़ता है.  लेकिन इन परिवर्तनों के साथ कमोबेश सभी छात्र-छात्राओं में होता  है अनजाने-अनदेखे के प्रति जिज्ञासा तथा उत्साह भी. जो भी हो, दिलचस्प बात यह है कि परिवर्तन उन्हें जड़ता एवं 'कम्फर्ट जोन' से बाहर निकलने का अवसर देता है और कई बार मजबूर भी करता है. यह वाकई बहुत अच्छी बात है. परिवर्तन को सकारात्मकता के साथ अंगीकार कर एक बेहतर भविष्य की ओर बढ़ने का यही तो कारण भी बनता है. 

महात्मा गाँधी का यह विचार कि पहले खुद में वो बदलाव लाएं जो आप दुनिया में देखना चाहते हैं, विद्यार्थियों के लिए बहुत ही विचारणीय विषय है. आम तौर पर बहुत सारे विद्यार्थी दूसरों से तो बदलाव की सौ फीसदी अपेक्षा करते हैं, लेकिन खुद को बदलने के मामले में जड़ता के सिद्धांत का पालन करते प्रतीत होते हैं. ऐसा भी देखा जाता है कि कई विद्यार्थी पहनावे, स्टाइल या आवरण में तो त्वरित बदलाव के पक्ष में रहते हैं, लेकिन अपने खराब आचरण या नकारात्मक नजरिये को बदलने से कतराते हैं. कुछ विद्यार्थी तो विरोध तक करते हैं. यह नासमझी है और इससे उनका बहुत नुकसान होता है. समझदार और अच्छे विद्यार्थी परिवर्तन से घबराते नहीं, बल्कि एक अच्छे दोस्त की तरह उसका स्वागत करते हैं. परिवर्तन को बोझ समझने के बजाय अपने डेवलपमेंट के लिए एक नया अवसर मानते हैं. 

शाश्वत सत्य यह है कि परिवर्तन एक स्थायी प्रक्रिया है.  लिहाजा, सर्वप्रथम परिवर्तन के प्रति अपने नजरिये को परिवर्तित करना जरुरी होता है. चार्ली चैप्लिन तो कहते हैं, "इस दुनिया में कुछ भी स्थायी नहीं है – यहाँ तक कि जीवन में आनेवाले संकट भी नहीं." अपने आसपास और इतिहास पर नजर डालें तो चार्ली चैप्लिन का यह कथन बिलकुल सही लगता है. आप अपने  पिछले एक हफ्ते के घटनाक्रम पर ही गौर करें तो आपको लगेगा कि आप सुबह से शाम तक छोटे-बड़े बदलावों के बीच से गुजरते रहे हैं. देखा जाए तो हर विद्यार्थी का, घर हो या स्कूल या कॉलेज, हर जगह,  हर रोज कितने प्रकार के बदलावों से सामना होता  है. उनसे उन्हें  निबटना पड़ता है. बेशक कई बार ये बदलाव जाने-पहचाने होते हैं, लिहाजा उन्हें परेशान नहीं करते. वे इनसे आसानी से पार पा लेते हैं. हां, यह सच है कि बड़े परिवर्तन उनके लिए कुछ कठिनाई पैदा करते हैं. लेकिन यह भी उतना ही सही है कि अगर कठिनाई है तो उसका कोई-न-कोई  निदान भी है और सही-गलत की समझ से अर्जित आत्मविश्वास भी उनके साथ है. तो फिर डर काहे का. एक और अहम बात. कठिनाई के उस पार संघर्ष से अर्जित उपलब्धि का अदभुत आनन्द भी तो होता है. सो, प्रत्येक विद्यार्थी को करना यह चाहिए कि हर बड़े  बदलाव से जुड़े तथ्यों की जानकारी पाने की कोशिश करें, इसके सकारात्मक पक्ष को देखें और  बदलाव को भावनात्मक स्तर पर लेने के बजाय पेशेवर तरीके से लें. जहां जरुरत महसूस हो अपने अभिभावक, शिक्षक और अच्छे दोस्त से सलाह और मदद लें. बहरहाल, ऐसा पाया गया है कि ऐसे मौकों पर जो विद्यार्थी  व्यक्तिगत हठ छोड़कर मानसिक रूप से लचीला बने रहते हैं, उनके लिये परिवर्तन को एन्जॉय करना आसान  हो जाता है. अंत में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित मशहूर साहित्यकार जॉर्ज बर्नार्ड शॉ के इस कथन पर जरुर विचार करें और जिंदगी को समग्रता में जीने का भरपूर प्रयास करते रहें. शॉ कहते हैं, "बिना बदलाव के विकास संभव नहीं है. बदलाव लाने का मूल मंत्र यही  है कि सबसे पहले अपने विचारों को बदलें"
 (hellomilansinha@gmail.com)
       
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं। 

# लोकप्रिय साप्ताहिक "युगवार्ता" के 02.02.2020 अंक में प्रकाशित
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Tuesday, April 14, 2020

परीक्षा के दौर में स्ट्रेस को कैसे करें मैनेज?

                             - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर, स्ट्रेस मैनेजमेंट कंसलटेंट ... ...
स्कूल-कॉलेज-यूनिवर्सिटी की परीक्षाओं के मौसम में छात्र-छात्राओं के तनाव में थोड़ी वृद्धि बिलकुल स्वाभाविक है. यह असामान्य तब होता है जब विद्यार्थी तनावग्रस्त रहने लगे या तनाव उन्हें बराबर परेशान करता रहे और परिणामस्वरूप वे पढ़ाई-लिखाई में फोकस न कर सकें. देखा गया है कि कुछ विद्यार्थी ऐसे भी होते हैं जिनका तनाव बढ़ता जाता है, जैसे-जैसे परीक्षा की तिथि नजदीक आती है. तनावग्रस्त रहने के दुष्परिणाम बहुआयामी होते हैं. तो आइए तनाव को मैनेज करने के तरीकों पर थोड़ी चर्चा करते हैं.

परीक्षा के दौर में यह बेहतर होगा कि छात्र-छात्राएं सामान्य दिनचर्या का पालन  करने की कोशिश करें. इतने कम समय में इतना कुछ पढ़ना है, यह सब अब कैसे होगा जैसे नकारात्मक विचारों को खुद पर हावी न होने दें. अब तक जो नहीं पढ़ पाए हैं, उसकी चिंता छोड़कर जितना पढ़ना है और जिसे पढ़ना जरुरी जान पड़ता है, उन्हें चिन्हित कर बस पढ़ना शुरू कर दें. जो भी बात आपको परेशान कर रही है, उसे दोस्तों के बजाय अपने अभिभावक या शिक्षक को खुल कर बताएं और उनकी सलाह-सुझाव पर अमल करने की कोशिश करें.

आपके दोस्त-सहपाठी क्या कर रहें हैं, क्या–क्या पढ़ रहें हैं, ऐसा सोच–सोच कर न तो अपना दिमाग खराब करें और न ही अपना कीमती वक्त. फ़ोन करके यह सब जानने की कोशिश तो कतई न करें. उचित तो यह होगा कि इस दौरान अपने मोबाइल फ़ोन का उपयोग बहुत जरुरी हो तभी करें. मोबाइल या तो बंद रखें या साइलेंट मोड पर  कर लें. फेस बुक, व्हाट्सएप आदि से इस समय दूर रहना अच्छा. अभी तो बस खुद पर और परीक्षा की अपनी तैयारी पर ध्यान देना सबसे जरुरी है.

जब भी ज्यादा तनाव महसूस हो तो थोड़ा पानी पी लें. रोजाना बढ़िया से स्नान करें. पानी तनाव की तीव्रता को कम कर देगा. ऐसे भी आपका शरीर जितना हाइड्रेटेड रहेगा, आप उतना ही स्वस्थ रहेंगे. केला, दूध, लेमन टी, डार्क चाकलेट, ड्राई फ्रूट्स, वेजिटेबल सूप आदि  मानसिक तनाव को कम करने में अहम रोल अदा करते हैं. कुछ पल के लिए खुले में निकल आएं और स्वाद लेकर इनमें से किसी चीज का धीरे –घीरे सेवन करें, अच्छा फील करेंगे.

संगीत का साथ  न केवल हमारे व्यक्तित्व में निखार लाता है, बल्कि हमें शारीरिक और मानसिक रूप में स्वस्थ रखने में कारगर भूमिका अदा करता है. मानसिक तनाव से परेशान रहने वाले छात्र-छात्राओं के लिए तो संगीत बेहद प्रभावी औषधि का काम करता है. ज्ञानीजन कहते हैं कि जिनके जीवन में लय,ताल व सुर का बेहतर समन्वय होता है, वे सरलता से अपने कार्यों को संपन्न करने में ज्यादा सक्षम होते हैं. 

जानकार-समझदार लोग भी श्वास की महत्ता को बखूबी समझते हैं और मानसिक तनाव  को कम करने में इसकी प्रभावी भूमिका की तार्किक व्याख्या भी करते हैं. अतः सुबह  15-20 मिनट प्राणायाम और ध्यान करें. अगर समय कम हो तो मिनी मेडीटेशन यानी ध्यान की मुद्रा में 5 मिनट बैठ कर सिर्फ श्वास को आते-जाते देखना भी फायदेमंद होता है. एक बात और. खेलकूद  और  एक्सरसाइज  ऐसे तो सामान्य शारीरिक क्रियाएं हैं, लेकिन इनका असर बहुत व्यापक और सकारात्मक होता है. तनाव के क्षणों में कुछ मिनट का  हल्का व्यायाम तनाव को कम करने में प्रभावी भूमिका निभाता है. 

इस पर जोर देने की आवश्यकता नहीं है कि हंसी सर्वोत्तम औषधि है. गांधीजी ने हंसी की अमूल्यता की प्रशंसा की है. विशषज्ञों का यह स्पष्ट मत है कि हंसी का समय तनावमुक्त होता है. पूर्व की अपनी उपलब्धियों एवं खुशनुमा क्षणों को याद कर हंस लिया करें. खाने के टेबल पर  परिवार के सदस्यों के साथ जोक्स आदि शेयर करने  से भी आप तनावमुक्त रह सकते हैं. समय मिले तो कुछ देर के लिए ही सही, कॉमेडी फिल्म या टीवी शो देख लें.

सच पूछिये तो नींद प्राणी मात्र की जिन्दगी में सुख का बेहतरीन समय होता है और तनाव मुक्ति  की अचूक दवा. रात में अच्छी नींद का पॉजिटिव असर दिनभर महसूस होता है. आप  दिन भर सक्रिय रहते हैं. अतः रात में जल्दी सोयें और सुबह जल्दी उठें. रात में 7-8 घंटा जरुर सोयें. सच तो यह है कि नींद हमारी जरुरत नहीं, आवश्यकता है. मौका मिले तो दोपहर में भी थोड़ी देर (घंटा भर) सो लें, आप तरोताजा महसूस करेंगे.
(hellomilansinha@gmail.com)

         
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं। 

# लोकप्रिय साप्ताहिक "युगवार्ता" के 26.01.2020 अंक में प्रकाशित
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Tuesday, April 7, 2020

गलती स्वीकारना अच्छी बात

                                      - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर, वेलनेस  कंसलटेंट ...
गलती करना या हो जाना असामान्य बात नहीं है. यह भी सामान्य बात है कि गलती करने पर माता-पिता, घर-बाहर के बड़े-बुजुर्ग, शिक्षक सहित कई लोग इस बाबत छात्र-छात्राओं को टोकते और रोकते हैं. उनका एक मात्र मकसद उन्हें सुधारने और सही रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित करने का होता है. बहरहाल, कई विद्यार्थी अपनी गलती को देख नहीं पाते, किन्तु  दूसरों  की गलती उन्हें तुरत दिख जाती है. इतना ही नहीं, कई बार कुछ विद्यार्थी अपनी गलती को छुपाते हैं. किसी के बताने और गलती करते हुए पकड़े जाने के बाद भी बेवजह उसे सही ठहराने का प्रयास करते हैं या इसका दोष दूसरे पर डालने का पूरा प्रयास भी करते हैं. कुछ विद्यार्थी तो बारंबार  गलती करते हैं. और-तो-और ऐसे विद्यार्थियों को एक गलती को बार-बार दोहराने की आदत हो जाती है, बावजूद इसके कि उन्हें पिछली गलती के लिए टोका गया था या चेतावनी दी गई थी या दंडित भी किया गया था. ऐसे विद्यार्थियों को देर-सबेर बड़ी समस्या से जूझना पड़ता है. 

इसके विपरीत अच्छे विद्यार्थी "गलती की हो तो मानें भी" सिद्धांत पर चलते हैं. वे कभी भी न तो एरर ब्लाइंड होते हैं और न ही अहंकार से चालित. सतत सफलता की सीढ़ियां चढ़ते जाने वाले ऐसे विद्यार्थी गलती करने के मामले में  कंजूस भी होते हैं और सॉरी बोलने में फ्रंट रनर. मजे की बात है कि ये लोग अपनी हर गलती से कुछ-न-कुछ सीखते हैं  और अनुभव समृद्ध होते हैं. इससे उनमें सही-गलत की बेहतर समझ भी पैदा होती है. लेकिन  इस पूरी प्रक्रिया में सबसे अहम बात होती है उनका अपनी गलती को मन से स्वीकारना और भविष्य में उस गलती को न दोहराने का सकल्प लेना. आइए, गलती स्वीकारने और उससे सबक लेने के फायदे और गलती न स्वीकारने के नुकसान पर थोड़ा और गौर करते हैं.

दरअसल, अपनी गलती को स्वीकारने के एकाधिक फायदे हैं.  सभी विद्यार्थी जानते हैं कि गलती स्वीकारने से दिल हल्का हो जाता है. अगर दंड आदि के भागी बने तब भी उसे सामान्य रूप से झेलने की शक्ति आ जाती है. कोई असहजता या अपराध बोध नहीं रहता. आगे कदम बढ़ाना मुश्किल नहीं होता और भविष्य में उनके कामयाब होने के चांस बढ़ जाते हैं. एक और  अच्छी बात यह होती है कि झूठ बोलने और बहाने बनाने से भी बच जाते हैं. सोचनीय तथ्य है कि हम एक झूठ को छुपाने के लिए एक-के-बाद-एक कई झूठ बोलते हैं और खुद अपनी जिंदगी को सरलता से जटिलता की ओर ले जाते हैं और बाद में इसके दुष्परिणाम के भागी बनते हैं. हां, यहां इस बात को बिलकुल महत्व देने की जरुरत नहीं है कि गलती मानने से लोग क्या कहेंगे, कितना ताना मारेंगे आदि? उस समय केवल यह सोचना अच्छा होता है कि कैसे इस नकारात्मक स्थिति से निकल कर अध्ययन और सामान्य दिनचर्या के सकारात्मक माहौल को फिर से जीना शुरू करें. 

गलती स्वीकारना वाकई हिम्मत का काम है. इससे विद्यार्थी का आत्मविश्वास कम होने की बजाय बढ़ता है. वे आगे वही गलती शायद ही कभी दोहराते हैं. इतना ही नहीं, वे पिछली गलती के कारण का विश्लेषण भी करते हैं. इससे उन्हें सीख मिलती है और आगे की कार्य योजना को बेहतर बनाने का अवसर मिलता है. ज्ञानीजनों का स्पष्ट मत है कि  जो विद्यार्थी अपनी गलती को स्वीकार कर माफ़ी मांग लेता है और फिर उस गलती को सुधारने  में लग जाता है, उसका जीवन पहले से ज्यादा अच्छा बनने लगता है. इस मानसिकता को बनाए रखना अच्छे गुणों से लैस होते जाने की गारंटी देता है. किशोरावस्था में गांधी जी के जीवन में घटी एक घटना एक प्रेरक मिसाल है, जिसमें गलती करने और फिर उसे  अपने पिता जी को स्वयं बताने के साथ-साथ आगे गलती न करने के संकल्प का वर्णन है. अनेक अन्य महापुरुषों की आत्मकथा में ऐसे ही मिलते-जुलते प्रेरक प्रसंग मिलते हैं. चाणक्य सही कहते हैं कि जो व्यक्ति अपनी गलतियों के लिए स्वयं से लड़ता है, उसे कोई भी हरा नहीं सकता. 

एकाधिक शोध और सर्वेक्षण बताते हैं कि जो विद्यार्थी अपनी गलती को छुपाने या अस्वीकार  करने का प्रयास करते हैं, वे अंदर-ही-अंदर एक अनबुझ भय से ग्रसित हो जाते हैं. उनमें से कई तो अंदर-ही-अंदर घुटते रहते हैं, किसी से साफ़ तौर पर कह नहीं पाते और फिर पढ़ाई-लिखाई से उनका मन भटकता है. इस दौर में मन में कई तरह के नकारात्मक विचार आते हैं. इस सबका समेकित दुष्प्रभाव उनके स्वास्थ्य और परीक्षा फल पर पड़ता है. सार-संक्षेप यह कि जाने-अनजाने जब भी गलती हो, उसे तुरत स्वीकार करें, सॉरी बोलें और खुद में सुधार करते रहें.  
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Friday, April 3, 2020

नई राहें: बनना चाहते हैं टीम लीडर?

                                       - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर, वेलनेस कंसलटेंट ... ...
खेल का मैदान हो या ऑफिस या फैक्ट्री, हर व्यक्ति की स्वाभाविक चाहत होती है कि उसे टीम लीडर का पोजीशन मिले. मन में कितनी ही बातें और योजनाएं होती हैं. इस समय यह ठीक नहीं है, वह ठीक नहीं है, यहां ऐसा होता तो अच्छा होता, वहां यह चेंज किया जाता तो कितना बढ़िया होता, काश मैं उनकी जगह होता तो सब कुछ परफेक्ट होता इत्यादि.  जीवन में आगे बढ़ने की इच्छा रखनेवाले अधिकांश लोगों की मानसिकता कमोबेश ऐसी ही होती है. लेकिन क्या सिर्फ इच्छा रखने भर से जो चाहा वह मिल जाता है और अगर संयोगवश मिल भी जाता है तो क्या उस जिम्मेदारी को निभाना उतना ही आसान होता है? सच यह है कि अपवाद को छोड़ दें तो सिर्फ इच्छा करने से इच्छित मुकाम नहीं मिलता है. उसके लिए यथोचित प्रयास करते रहना पड़ता है. फिर वह  पोजीशन मिल जाने पर भी आगे उस जिम्मेदारी को बखूबी निभाने के लिए कई बातों को साधकर चलना पड़ता है. अगर टीम लीडर की बात करें तो अगर आपको वह पद मिल जाता है तो आगे किन-किन बातों में पारंगत होने और उसे अमल में लाने की जरुरत होगी, आइए जानने का प्रयास करते हैं.

अपने रोल को जानें : आप जहां भी काम कर रहे हैं, उसके विषय में अपटूडेट सब जानकारी आपके पास हो. मसलन, अगर आप मोबाइल कंपनी के सेल्स फील्ड में हैं तो अपनी कंपनी के सेल्स पालिसी से लेकर आपके वार्षिक, तिमाही, मासिक एवं साप्ताहिक सेल्स टारगेट से आप पूर्णतः अवगत हों. अपने टारगेट को नियत समय के भीतर पूरा ही नहीं, बल्कि उससे ज्यादा हासिल करने की आपकी कार्ययोजना और उसपर अमल करने का रोडमैप बिलकुल क्लियर हो. इसके प्रति सजग रहें कि आपसे आपके सीनियर्स और जूनियर्स की क्या-क्या अपेक्षाएं हैं. यह जानकार और मानकर काम करें कि प्लान करके चलने, डेलिगेट करने और सबसे काम लेने में दक्ष होने का आपके परफॉरमेंस से सीधा और गहरा रिश्ता होता है. 

अपने टीम के सदस्यों के बारे में जानें : आपकी टीम छोटी है या बड़ी, सब एक लोकेशन पर हैं या अलग-अलग लोकेशन पर, इसे ध्यान में रखकर काम करना लाजिमी है. जो भी स्थिति हो, आपको टीम के सारे मेंबर्स, छोटे-बड़े सब पोजीशन वाले, का नाम और काम मालूम हो तो बेहतर. टीम छोटी हो तो टीम के सभी सदस्यों की पूरी प्रोफाइल - फैमिली बैकग्राउंड से लेकर प्रोफेशनल, एजुकेशनल बैकग्राउंड तक, हो सके तो हॉबी आदि के विषय में भी जानकारी रखनी चाहिए. इससे उनके साथ प्रोफेशनल और इमोशनल रूप से जुड़े रहने के कॉमन पॉइंट्स मिल जाते हैं. इतना ही नहीं, टीम में कौन किस फील्ड में ज्यादा दक्ष है और कौन थोड़ा कम, कौन एक्स्ट्रा टाइम काम कर सकता है और कौन चाहकर भी कई जायज कारणों से  नहीं कर सकता है, इसकी जानकारी होने और जरुरत पड़ने पर इसका उपयोग करने से नियत समय से पहले लक्ष्य तक पहुंचने में कोई दिक्कत नहीं होती है. अच्छे लीडर को अपने टीम मेंबर्स की खूबियों और कमियों दोनों की पूरी जानकारी  होती है और वह पूरी टीम को लक्ष्य के प्रति संकल्पित और समर्पित करने का हर संभव प्रयास करता रहता है जिससे कि नियत लक्ष्य को हासिल करना बहुत आसान हो और साथ में आनंददायक भी. 

अपने टीम द्वारा किए जाने वाले काम का नॉलेज जरुरी : टीम लीडर को अपने टीम द्वारा किए जानेवाले हर छोटे-बड़े काम की बुनियादी समझ तथा जानकारी होनी चाहिए. कहते हैं न कि नॉलेज इस पॉवर. इसके बहुत सारे फायदे हैं. किसी कार्य विशेष को करने में लगने वाले न्यूनतम और अधिकतम समय का पता होता है. इससे उस कार्य विशेष से जुड़े लक्ष्य को पूरा करने में कितना वक्त लगेगा, यह तय कर पाना आसान हो जाता है. इतना ही नहीं, किसी आकस्मिक घटना-दुर्घटना के वक्त कार्य बाधित नहीं होता और टीम बिना पैनिक के सामान्य रूप से कार्य संपादित कर पाती है. इससे लीडर का आत्मविश्वास ऊँचा होता है और उनके सहकर्मियों का उनके प्रति सम्मान भी. 

जब भी टीम को आगे का रास्ता दिखाने की बात हो तो सदा तत्पर रहें : जब भी कोई बड़ा और नया काम शुरू करना हो, उस समय टीम के सभी सदस्यों को मोटीवेट करने, उनके साथ मजबूती से खड़ा होने और उन्हें जरुरी मार्गदर्शन देना बेहतर होता है. इसका मतलब यह नहीं कि लीडर छोटी-छोटी बातों में हस्तक्षेप करे. इरादा सिर्फ टीम को सशक्त और आगे बढ़ने के लिए सब तरह से प्रेरित करना होता है. वह अपने सहकर्मी के अच्छे काम की प्रशंसा सार्वजानिक रूप से करता है और गलती करने पर उसकी अकेले में काउंसलिंग करता है.  वह लगातार मानवीय तरीके से सहकर्मियों को सुधारने की कोशिश करता रहता है. निरंतर सीखने और सीखाना सच्चे लीडर की खासियत होती है. आउट ऑफ़ बॉक्स थिंकिंग भी लीडर की बड़ी क्वालिटी मानी जाती है. 

कोई बड़ा या साहसिक काम हो तो खुद आगे आकर लीड करें: जब भी कोई ऐसा काम करना हो जिसे करना तो जरुरी हो, लेकिन उसमें अपेक्षाकृत जोखिम ज्यादा हो या उसे आगे बढ़कर करने में अतिरिक्त साहस की जरुरत हो तब लीडर को बेझिझक आगे आकर टीम को लीड करना चाहिए. ऐसा करने पर टीम के सदस्यों में पर्याप्त उर्जा और उत्साह का संचार होता है. पूरे टीम का मनोबल बढ़ता है. सेकंड लाइन लीडर्स को बहुत प्रेरणा मिलती है. दरअसल, टीम लीडर असफलता से नहीं डरता. वह तो बस हर काम को पूरी प्लानिंग के साथ निष्ठापूर्वक निष्पादित करने में विश्वास करता है. अच्छा लीडर बातों  का बादशाह नहीं, बल्कि कर्मठ कर्मयोगी होता है. वह जो कहता है, करता है. सोच-विचार-परामर्श कर निर्णय लेता है और उसपर कायम रहता है. वह मसला नहीं खड़ा करता, बल्कि छोटे-बड़े सभी मसले का हल निकालता है और सबके सामने मिसाल कायम करता है. जॉन क्विंसी एडम्स सही कहते हैं, "अगर आपके एक्शन दूसरों को ज्यादा सपने देखने, ज्यादा सीखने, ज्यादा काम करने और ज्यादा विकास करने को प्रेरित करते हैं तो आप सचमुच एक लीडर हैं." 
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