Tuesday, August 12, 2014

गुड लाइफ : चलते रहेंगे, तो चलते रहेंगे !

                                                                                    - मिलन सिन्हा 
स्वास्थ्य पर एक परिचर्चा के दौरान अनायास ही कह दिया था -चलते रहेंगे तो चलते रहेंगे ! फिर गहराई में जाकर सोचा तो पता चला कि इस छोटे से वाक्य में कई तरह के अर्थ छुपे हैं। मनोज कुमार अभिनीत मशहूर हिन्दी फिल्म, 'शोर' का यह गाना याद है न -'जीवन चलने का नाम, चलते रहो सुबह-शाम......'चलना ऐसे है तो एक सामान्य शारीरिक क्रिया, पर इसके परिणाम अत्यन्त ही बहुआयामी व दूरगामी होते हैं। अपने जीवन की घड़ी को थोड़ा पीछे मोड़ कर देखिये -याद कीजिये उस पल को जब आपने अपने बच्चे को पहली बार अपने पैरों पर चलते हुए देखा था। न केवल आपके व आपके परिवार के लिए वह एक अदभुत अनुभूति थी, बल्कि उस बच्चे के लिए भी कुछ नया करने व पाने का गौरवशाली पल था । मनुष्य जीवन का विकास  चलने -करने -सीखने -पाने -खोने के बीच से ही तो गुजरते हुए आगे बढ़ता रहा है । 

सच पूछिये तो टहलना -चलना एक लोकतान्त्रिक सोच है, एक समावेशी  दर्शन है, एक सम्पूर्ण विकास यात्रा है । गौतम बुद्ध, स्वामी विवेकानंद,  महात्मा  गांधी, विनोबा भावे जैसे कितने ही महान व्यक्ति इसका ज्वलंत उदाहरण हैं । सुबह टहलने के फायदे एकाधिक हैं। आजकल तो डॉक्टर, खासकर ह्रदय रोग विशेषज्ञ, मधुमेह रोग विशेषज्ञ आदि अपने-अपने मरीजों को रोज सुबह कम से कम आधा घंटा टहलने की सलाह जरूर देते हैं । विशेषज्ञ कहते है कि टहलने से सेरोटोनिन व एंडोर्फिन नामक फील -गुड व फील -हैप्पी  हॉर्मोन का स्राव हमारे शरीर में होता है जो हमें मानसिक रूप से प्रसन्न रखता है। ऐसे भी गाड़ियों के गड़गड़ाहट व बेवजह हॉर्न से कमोवेश मुक्त; चिडियों की चहचहाट; पेड़ -पौधों से हवा के वार्तालाप की सनसनाहट; साथ चलते लोगों के बीच संबंधों की गर्माहट भरे परिवेश में किसे आनंद की अनुभूति नहीं होगी ?

                     और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

'प्रभात खबर' के मेरे संडे कॉलम, 'गुड लाइफ' में प्रकाशित

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