Saturday, December 6, 2014

गुड लाइफ : तराजू एक रखें

                                                                                         - मिलन सिन्हा

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ऐसा होना मुनासिब है कि एक ही व्यक्ति का एक ही काम के लिये विभिन्न लोगों द्वारा अलग -अलग, आकलन किया जाए - प्रशंसा या आलोचना की जाए । गैर मुनासिब तो तब लगता है जब एक ही व्यक्ति द्वारा किसी व्यक्ति विशेष का उनके एक ही कार्य हेतु अलग-अलग मंचों से बिल्कुल अलग, कभी-कभी तो एकदम विपरीत  विवेचना की जाती है, वह भी तथ्य और तर्क से परे । राजनीति में तो यह सब रोज का खेल हो गया है जिसका खामियाजा अंततः देश को भुगतना पड़ता है ।

 पर कभी हमने सोचा है कि ऐसा क्यों होता है ? ऐसा इसलिए होता है क्यों कि अलग-अलग आदमी के लिये समय और परिस्थिति के अनुसार विविध प्रकार के तराजू का रिवाज है । डंडी मारने वाली बात से तो हम सब वाकिफ हैं । सो, एक तराजू को हम अपने फायदे के लिये विभिन्न तरीके से काम में लाते हैं या यूँ कहें कि तराजू तो वही दिखता है, लेकिन वाकई होता वह अलग है, अलग -अलग लोगों को तौलने के लिये । कभी सही वजन से ज्यादा वजन दिखाने के लिए तो कभी कम दिखाने के लिये- डंडी मारते हुए । ऐसा हममें से अनेक लोग अपने रोजमर्रा की जिंदगी में बेहिचक करते रहे हैं । 

ऐसा होते हुए देखना भी अब सामान्य बात है । नौकरी हो या स्कूल -कॉलेज में प्रवेश के लिये आयोजित साक्षात्कार का सवाल हो, अलग -अलग तराजू में तौले जाने वाले अनैतिक आचरण का स्वाद चखे बिना रहना मुश्किल है । लोगों के साथ आम व्यवहार में भी कई लोग इस 'तराजू वाली मानसिकता' से ग्रसित नजर आते हैं । ऐसे लोगों को पहचानना एवं उन्हें बेनकाब करना समाज को बेहतर बनाने के लिये जरुरी है, क्योंकि दिखे या न दिखे, यह साफ़ तौर पर अनैतिक व गैरकानूनी है । कहना न होगा, एक तराजू  रखना मतलब नैतिकता, ईमानदारी एवं न्याय का पक्षधर होना है । ऐसे लोग खुद तो विवेकी व विश्वसनीय होते ही हैं, साथ ही उस संस्था की विश्वसनीयता को भी ऊंचाई प्रदान करते हैं, जहां वे पदस्थापित होते हैं । यूँ भी बड़े -बूढ़े कहते हैं कि डंडी मारने वाले को बरकत नहीं मिलती ।

              और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

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