Tuesday, December 9, 2014

तू-तू , मैं-मैं से सियासी जंग का फैसला नहीं

                                                                                - मिलन सिन्हा 
loading...राजनीति में नेता बनना और अरसे तक बने रहना साधारण बात तो कतई नहीं है। इसके लिए आपको असाधारण एवं असामान्य प्रतिभाओं से लैस होना पड़ेगा, उसमें नयापन लाते रहना पड़ेगा और साथ ही उसे धारदार बनाये रखना पड़ेगा, बात -बेबात, समय -असमय आरोप -प्रत्यारोप के खेल में आप को पारंगत होना पड़ेगा  अन्यथा कम -से -कम बिहार के  राजनीतिक मंच के दिग्गज खिलाड़ी तो आप नहीं बन सकते और न ही माने जाएंगे। प्रदेश के वर्तमान राजनीतिक  सन्दर्भ में  किसी भी मुद्दे पर मीडिया में सत्ता पक्ष व विपक्ष के नेताओं के बीच ज्यादातर अनावश्यक आरोप -प्रत्यारोप से भरे बयानों को देखने -पढ़ने से यह बात स्पष्ट हो जाती है। यह बिहार जैसे पिछड़े प्रदेश के लिए अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण है। बहुत पीछे जाने की जरुरत नहीं होगी। पिछले कुछेक हफ़्तों  का यहां का कोई अखबार उठा कर देख लीजिये। इतना ही नहीं,  विरोधियों पर आरोप -प्रत्यारोप के क्रम में जो शब्द इस्तेमाल किये जा रहे हैं, वे संसदीय मर्यादा एवं सामान्य शिष्टाचार के विपरीत हैं। एक तरफ  मुख्यमंत्री मांझी के बहाने पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश पर निशाना साधने की कोशिश होती है, तो दूसरी ओर सुशील मोदी के बहाने नरेन्द्र मोदी पर निशाना साधा जाता है । 

राजनीति में सत्ता पक्ष व विपक्ष द्वारा एक दूसरे के जन विरोधी नीतियों, फैसलों व कार्यकर्मों की आलोचना करना, उनका विरोध करना, गलत करने का आरोप लगाना बिलकुल मुनासिब है और ऐसा न करना लोकतंत्र को कमजोर करना है।  लेकिन सिर्फ विरोध के लिए विरोध करना बिलकुल नाजायज है।  और दुर्भाग्य वश बिहार की राजनीति में आजकल यह खूब हो रहा है। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है ?  कहीं 'गर बदनाम होंगे तो क्या नाम नहीं होगा ' वाली मानसिकता का प्रभाव तो नहीं बढ़ चला है, खासकर आसन्न विधानसभा चुनाव के मद्देनजर। 

कहते हैं, जब सत्य का साथ छूटता जाता है तथा जब तर्क चुकने  लगते हैं, तब झूठे वादों और तथ्यहीन दावों को चीख -चीख कर दोहराना मजबूरी हो जाती है। आंकड़ों का खेल भी चल पड़ता है। सच  तो यह है कि जब तक सार्वजनिक मंचों से झूठ को सच बताने का यह सिलसिला बंद नहीं  होगा, तब तक सकारात्मक राजनीति को  पुनर्स्थापित करना मुश्किल होगा

एक तरफ तो हमारे नेतागण  बार -बार कहते हैं कि जनता बहुत समझदार है , यह पब्लिक है सब जानती है, परन्तु वहीँ  इसके उलट सच को झूठ और झूठ को सच बताने और दिखाने की कोशिश करके क्या ये नेता आम लोगों को बेवकूफ समझने का प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर रहे हैं ? दिलचस्प बात यह भी है कि एक खास रणनीति के तहत ऐसे बयान बाजी के लिए   हाशिये पर पड़े नेताओं का इस्तेमाल किया जाता है जिससे किसी प्रतिकूल स्थिति में दल विशेष के बड़े नेताओं के लिए सुविधापूर्वक उन बयानों से किनारा किया जा सके। लेकिन इन  सबके बीच रणनीति बनाने वाले फिर एक बार आम जनता को बेवकूफ समझने की गलती कर बैठते हैं।  


सोचनेवाली बात है जब आम जनता सब भली-भांति जान व समझ रही है तो उस पर विश्वास कर उसे विवेचना करने दीजिये, मीडिया कर्मियों, राजनीतिक विश्लेषकों को विश्लेषण करने दीजिये। आवश्यक हो तो प्रेस कांफ्रेंस आयोजित कर अपनी बात रखें और  सार्थक सवाल-जवाब  कर लें।  
सवाल तो उठना लाजिमी है कि क्या अपने विरोधी को नीचा दिखाकर, उनकी परछाईं से अपनी परछाईं को बड़ा दिखाकर विकासोन्मुख राजनीति के वर्तमान दौर में कोई भी दल बड़ी सियासी जंग जीत सकता है ? कहते हैं  मुँह से निकली बोली और बंदूक से निकली गोली को वापस लौटाना मुमकिन नहीं होता। फिर बयान बहादुर का खिताब हासिल करने के बजाय आम जनता की भलाई के लिए सही अर्थों में एक भी छोटा कार्य करना नेता कहलाने के लिए क्या ज्यादा  सार्थक नहीं है ? ऐसे भी राजनीतिक नेताओं को राजनीति से थोड़ा ऊपर उठ कर बिहार की  अधिकांश आबादी जिसमें  गरीब, दलित, शोषित -कुपोषित, अशिक्षित, बेरोजगार और बीमार लोग दशकों से शामिल हैं,  की बुनियादी समस्याओं को समय बद्ध सीमा में सुलझाने का क्या कोई भगीरथ प्रयास नहीं करना चाहिए ?    


               और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं


लोकप्रिय हिंदी दैनिक, 'दैनिक भास्कर' में  प्रकाशित दिनांक :09.12.2014

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