Sunday, May 31, 2015

मोटिवेशन : आवश्यकता बनाम विलासिता

                                                                -मिलन सिन्हा
clipगांधी जी कहा करते थे कि आवश्यकताओं को पूरा करना नामुमकिन नहीं है, लेकिन लालच को पूरा करना वाकई है. 

मनुष्य की मूलभूत आवश्यकता जैसे रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार एवं सामाजिक सुरक्षा को व्यक्तिगत, सामाजिक व सरकारी स्तर पर पूरा करना बहुत मुश्किल नहीं है, लेकिन सबके लिए विलासिता के सामान उपलब्ध करना-करवाना क्या प्राथमिकता में शुमार होना चाहिए? 

यह एक महत्वपूर्ण विचारणीय सवाल है जिसका उत्तर हम सबको मिलकर तलाशना होगा और उस पर अमल भी सुनिश्चित करना होगा. 

हम सब यह तो मानेंगे कि हमारे देश में संसाधनों की कमी नहीं है. कमी है तो संसाधनों की मौजूदा वितरण व्यवस्था में. सभी जानते हैं कि संसाधनों के वितरण में दशकों से चले आ रहे गोलमाल एवं सुनियोजित गड़बड़ी के कारण देश में गरीबों और अमीरों के बीच सुविधाओं का विराट अंतर रहा है जो साफ़ दिखता भी है. समाज विज्ञानियों का कहना है कि इस असमानता की वजह से भी देश के अनेक भागों में समय-समय पर आपसी सामाजिक समरसता में असंतुलन व उसके फलस्वरूप हिंसा की  घटनाएं होती रहती है. इससे हमारा लोकतंत्र मजबूत होने के बजाय कमजोर होता है, विकास की रफ़्तार बाधित होती है. 

खुले दिमाग से सोचने पर यह स्पष्ट होता जाता है कि विलासिता के भाव का प्रवेश एवं उसके प्रति निरंतर बढ़ती आसक्ति हमारे जीवन के सामान्य व प्राकृतिक लय को बिगाड़ कर उसे जटिल एवं प्रदूषण युक्त बनाने का काम करता है. 

गांधीजी के जीवन प्रसंग के उल्लेख से ही इस चर्चा को ख़त्म करें तो हम पाते हैं कि गांधीजी ने अपने जीवन को इतना सरल और सामन्य बना लिया था कि कभी कोई काम करने में उन्हें ज्यादा परेशानी नहीं हुई. साथ ही वे हमेशा पूर्णतः स्वस्थ एवं उर्जावान बने रहे. क्या हम सब भी ऐसी कोशिश नहीं कर सकते? 

                  और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 

Friday, May 22, 2015

आज की कविता : यौगिक

                                       - मिलन सिन्हा 
यौगिक
यहाँ
प्रत्येक व्यक्ति
एक यौगिक है
जिसके
तत्वों को
अलग -अलग करके
पहचानना
काफी मुश्किल है !
            और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Tuesday, May 12, 2015

मोटिवेशन : इज्जत करें और इज्जत पाएं

                                                               - मिलन सिन्हा 
हमें बचपन से यह बताया और सिखाया जाता है कि न केवल अपने से बड़ों से  बल्कि संसार में हर इंसान के साथ पूरी मानवीय संवेदना से पेश आना चाहिए. अपनी वाणी एवं व्यवहार से किसी को भी आहत करने की चेष्टा नहीं करनी चाहिए. इसी दर्शन को अपनाते हुए देश-विदेश के सफलतम लोग और कम्पनियां मानवीय व्यवहार में इज्जत दे कर इज्जत पाने के  सरलतम, किन्तु अत्यन्त प्रभावी मार्ग पर चलते हैं. लेकिन क्या हमारे आसपास ऐसा देखने को मिलता है? कड़वा सच तो यह है कि आजकल घर-बाहर हर जगह छोटी-छोटी बात तक पर तकरार व गाली-गलौज को हथियार बनाकर एक-दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश आम होती जा रही है. सत्ता या पद के नशे में चूर कुछ ओहदेदार लोगों का अपने ही घर-आफिस में उनके सहायकों के साथ अभद्र व अमानवीय तरीके से पेश आने की ख़बरें हम पढ़ते रहते हैं. अपने ऑफिस या कार्यस्थल में तो अधीनस्थ कर्मी अपनी नौकरी बचाए रखने जैसे कारणों से बॉस का खौफ खाते हैं और उनकी बेवजह की डांट-फटकार को भी कई बार चुपचाप सह लेते हैं. हालांकि बॉस प्रवृति वाले लोगों को यह नहीं भूलना चाहिए कि सत्ता या पद तो आज है, कल रहे या ना रहे, लेकिन उनके द्वारा अपने लोगों के साथ किये जाने वाले दुर्व्यवहार का दुर्गन्ध उनके आसपास हमेशा बना रहेगा और उन्हें कमजोर करने के साथ –साथ परेशान भी करता रहेगा. 
सोचने वाली बात है कि किसी को नीचा दिखाना बड़े होने की पहचान थोड़े ही है, बल्कि यह तो उनके व्यक्तित्व में बड़ी कमी को दर्शाता है. खुद को सामने वाले की जगह पर रखकर देखने पर ऐसी समस्या नहीं होती. सच कहें तो हर आदमी को अपना स्वाभिमान बहुत प्यारा होता है और वह खुद अपनी गरिमा और मर्यादा को अक्षुण्य बनाए रखना चाहता है. इसीलिये तो ज्ञानीजन कहते हैं कि विश्वसनीय सम्बन्ध बनाने का एकमात्र तरीका दूसरों की गरिमा का सम्मान करना है. कहने का अभिप्राय यह कि हम जैसा व्यवहार दूसरों से चाहते हैं, हमें वैसा ही व्यवहार उनसे करनी चाहिए. ऐसे भी इज्जत मांगने से कदाचित ही मिलता है, इसे तो अपने कर्मों तथा अच्छे व्यवहार से अर्जित करना पड़ता है.
                   और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Monday, May 4, 2015

मोटिवेशन : आपदा, अफवाह एवं अच्छाई

                                                                          -मिलन सिन्हा
clip
हाल ही में पड़ोसी देश नेपाल के साथ बिहार प्रदेश में भी जो भूकम्प के बड़े झटके महसूस किये गए, उसके बाद भी कई छोटे-छोटे कम्पन महसूस किये जाते रहे, जिसे भूकम्प का आफ्टर शॉक्स कहा जाता है. ये आफ्टर शॉक्स यानी अपेक्षाकृत छोटी तीव्रतावाले झटके दो-चार दिनों तक आते रहें तो इसमें कोई अस्वाभाविक बात नहीं है. विशेषज्ञ कहते हैं कि इन दिनों में अतिरिक्त जागरूकता, संयम और सतर्कता की जरुरत होती है. कहना न होगा भूकम्प के पहले बड़े झटके से अगर किसी मकान/ अपार्टमेंट  में दरार आ गई है या मकान / अपार्टमेंट क्षतिग्रस्त हो गए हैं, तो उसे तत्काल इंजीनियर/विशेषज्ञ से दिखाकर उनकी सलाह से आगे की कारवाई करनी चाहिए क्यों कि आफ्टर शॉक्स के दौरान ऐसे मकानों/ इमारतों को ज्यादा नुकसान होने की संभावना होती है.


हम सब जानते हैं कि भूकम्प जैसे आपदा का पूर्वानुमान लगाना मुमकिन नहीं होता है. शायद इसी का फायदा उठाकर कुछ शरारती लोग ऐसी प्राकृतिक विपदा के वक्त भी अफवाह और भ्रम फैलाने की कोशिश करते हैं. इससे अनावश्यक ही दहशत व खौफ का एक नकारात्मक परिवेश निर्मित हो जाता है जिसका नुकसान निर्दोष व कम समझदार लोगों को उठाना पड़ता है. इसका तात्कालिक  असर बच्चों, महिलाओं और बूढ़े –बीमार लोगों पर ज्यादा देखा गया है. फलतः कई बार भूकम्प आदि से जितनी क्षति होती है, उससे कहीं ज्यादा क्षति अफवाह के कारण मची अफरा-तफरी से हो जाती है.


कहते हैं न किसी भी आपदा या संकट की घड़ी में अच्छे लोगों की सही पहचान होती है और उनके कंधे पर इससे पार पाने की अतिरिक्त जिम्मेदारी भी. तो ऐसे समय में राहत व पुनर्वास के सभी उपायों के साथ–साथ समाज के सच्चे व अच्छे, जानकार-जानदार लोगों यानी ओपिनियन मेकर्स द्वारा व्यक्तिगत व सामूहिक स्तर पर आम लोगों के प्रति एक अपील करने की आवश्कता होती है जिसमें तथ्यों की जानकारी दी जाय और अपवाह, भ्रम आदि से लोगों को बचने का आग्रह भी किया जाय.

                   और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Sunday, April 26, 2015

मोटिवेशन : पुस्तक और हम

                                                                   - मिलन सिन्हा 
clipकिताबें हमारे जीवन में अहम रोल निभाती  रही हैं. दुनिया से हमारा परिचय करवाते रहने का यह एक सशक्त जरिया है. गीता, कुरान, बाइबिल जैसे ग्रंथों की बात न भी करें, तब भी ऐसी बहुत से किताबें हैं जो अनेक महान व्यक्तियों के जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन का माध्यम बनी हैं. गाँधी जी को ही लें. उनके जीवन में जॉन रस्किन एवं लियो टॉलस्टॉय की किताबों की भूमिका  का जिक्र गाँधी जी ने खुद किया है. दूसरी ओर महापुरुषों की जीवन गाथा पढ़ कर लाखों-करोड़ों लोगों ने अपने जीवन में अकल्पनीय बदलाव लाया है, लाते रहेंगे. गाँधी जी आत्म कथा, ‘सत्य के प्रयोग’ को पढ़ कर न जाने कितने ही भटके हुए लोगों ने फिर से एक सार्थक और सम्मानजनक जिंदगी जीना प्रारंभ किया. यह सिलसिला आगे भी चलता रहेगा.

बहरहाल, उदारीकरण के इस दौर में देखने में आता है कि नौकरी या व्यवसाय में जाने के बाद हममें से अनेक लोग जाने-अनजाने पढ़ना छोड़ देते हैं या छुट्टी आदि में भूले-भटके पढ़ लेते हैं. ऐसे भी टीवी, कंप्यूटर, मोबाइल और इंटरनेट के इस दौर में हमारा समय कैसे गुजर जाता है पता ही नहीं चलता. तभी तो गुलजार साहब को लिखना पड़ता है, “किताबें झांकती है बंद अलमारी के शीशे से/ बड़ी हसरत से तकती हैं / महीनों अब मुलाक़ात नहीं होती / जो शामें उनकी शोहबत में होती थीं ....” लेकिन इससे यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि लोगों में पढ़ने, जानने और समझने की प्यास बुझती जा रही है. हर साल देश के विभिन्न शहरों में पुस्तक मेला का आयोजन और उसमें भाग लेनेवाले लाखों–करोड़ों पुस्तक प्रेमियों ने इस बात को स्पष्टतः रेखांकित किया है कि इंटरनेट जैसे संचार तकनीक के बढ़ते प्रभाव और किताबों के डिजिटल फॉर्म में कंप्यूटर के स्क्रीन पर सुलभता के बावजूद किताबों को अपने हाथ में लेकर पढ़ने का जो एक अलग ही आनंद होता है, उससे लोग अपने को वंचित नहीं करना चाहते. हाँ, आवश्यकता तो है ही इस बात की कि हम किताबों के साथ कुछ समय बिताने की आदत डालें जिससे किताबें हमारे घर-परिवार का अभिन्न हिस्सा तथा हमारे सुख-दुःख का साथी बनी रहें. शायद तभी हम अपनी शख्सियत को तलाशने एवं तराशने के काम को निरंतरता प्रदान करते हुए एक बेहतर इंसान बने रह पायेंगे.
                     और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Sunday, April 19, 2015

मोटिवेशन : कोर्स बनाम कैरियर

                                                            - मिलन सिन्हा 
clipअमूमन 12वीं यानी प्लस-टू की परीक्षा के बाद छात्र-छात्राओं के लिए अपने कैरियर को ध्यान में रख कर उपयुक्त कोर्स चुनने का मुश्किल वक्त होता है. अच्छे अंक प्राप्त करने वाले विद्यार्थी इंजीनियरिंग या मेडिकल की तैयारी के लिए आंतरिक एवं बाहरी दवाब महसूस करते हैं और  चाहे–अनचाहे इन्हीं दोनों कोर्सेज  में से किसी एक में दाखिला लेने की पुरजोर चेष्टा करते हैं. कॉमर्स और आर्ट्स के अधिकांश विद्यार्थी भी पारम्परिक कोर्सों में ही एडमिशन के लिए प्रयास करते देखे गए हैं. देश में कोचिंग के बाजार के निरंतर फैलने का यह भी एक बड़ा कारण है. कहना न होगा, निम्न एवं मध्यम आय वर्ग के परिवारों के लड़के- लड़कियां औपचारिक शिक्षा ग्रहण करने के बाद एक अच्छी नौकरी की चाहत रखते हैं. लेकिन क्या नौकरी के आज के बाजार में सिर्फ परंपरागत स्नातक या स्नातकोत्तर डिग्री के बूते मनचाही नौकरी पाना आसान है? 

देश में शिक्षित बेरोजगारों से संबंधित आंकड़े बताते हैं कि परंपरागत कोर्सों में अच्छे अंक या ग्रेड के साथ उत्तीर्ण होने के बावजूद ऐसे छात्र-छात्राओं में से अनेक या तो बेरोजगार हैं या कोई ऐसी-वैसी नौकरी कर रहे हैं जिनका उनकी डिग्री से कोई प्रत्यक्ष वास्ता नहीं होता है, जब कि ऐसी डिग्रियां अर्जित करने में काफी वक्त व मोटी रकम खरचने पड़ते हैं. यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि व्यापार एवं उद्योग की बदलती जरूरतों के लिहाज से ऐसे कई कोर्स विभिन्न शिक्षण संस्थानों तथा स्किल डेवलपमेंट इंस्टिट्यूट में अब उपलब्ध हैं जिन्हें  नौकरी के बाजार में अपेक्षाकृत ज्यादा अहमियत दी जा रही है. देखा जा रहा है कि नियोक्ता के तौर पर आजकल निजी क्षेत्र की कम्पनियां आम तौर पर ऐसे उम्मीदवार को तरजीह देते हैं जिनका एकेडमिक बैकग्राउंड तो ठीक-ठाक हो, साथ ही जो नयी चीजें सीखने तथा चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए तत्पर रहे. कारण, ऐसे नए कर्मियों को तीन से छह माह की अवधि का उपयुक्त ऑन-द-जॉब ट्रेनिंग देकर दक्ष बनाना आसान होता है. अतः यह आवश्यक है कि विद्यार्थी अभी से अपने एकेडमिक कोर्स के चयन के साथ-साथ अपने जॉब/बिज़नेस कैरियर की प्लानिंग को भी यथोचित महत्व दें.
                    और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Sunday, April 12, 2015

मोटिवेशन : गुस्से को नियंत्रित करना सीख लें

                                        - मिलन सिन्हा 
clipअपने रोजमर्रा की जिंदगी में हम घर-बाहर हर जगह लोगों को बात-बेबात गुस्सा करते देखते हैं, गुस्से में अपशब्द कहते, वस्तुओं को तोड़ते-फोड़ते, खुद अपना भी माथा ठोकते हुए देखते हैं. गुस्से में बेकाबू लोगों के तो कहने ही क्या? हम खुद भी गुस्से में यह सब करते हैं, बेशक कम या ज्यादा, बराबर या कभी-कभी. देखा गया है कि गुस्से की हालत में ‘हम किसी से कम नहीं’ वाली मानसिकता हमारे सिर चढ़ कर बोलने लगती है. मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि उस वक्त हमारा मानसिक संतुलन ठीक नहीं रह पाता है, फलतः चीखने-चिल्लाने के साथ हम अतार्किक एवं हिंसक भी हो जाते हैं. बहरहाल, हमने शायद ही कोई व्यक्ति देखा हो, जिसे गुस्सा आता ही न हो. आम हो या खास, हर मनुष्य को गुस्सा आता है और गुस्सा आना कोई अवगुण नहीं, अनहोनी भी नहीं. पर सवाल तो उठता है कि गुस्सा आता क्यों है और जब चाहे-अनचाहे आ ही जाता है तो फिर गुस्से को काबू में कैसे रखा जाए जिससे कोई बड़ी दुर्घटना न हो जाय?

कहते हैं कि गुस्सा स्वभावतः अन्याय, अत्याचार, शोषण, असफलता, अतृप्त इच्छा, अक्षमता आदि से जुड़ा वह सामान्य भाव है जो मानव ही नहीं जीव मात्र में  उत्पन्न होता है और अधिकांश मामले में किसी न किसी रूप में प्रकट होता है. क्रोध आने पर उसे कैसे नियंत्रित किया जाय, इसके लिए कुछ जाने-पहचाने सिद्धांत व नुस्खें हैं जिसका लाभ प्रयोग की दृढ़ता पर निर्भर करता है. मसलन, गुस्से की स्थिति में उस स्थान विशेष से हट जायें, कहीं बैठ जायें और आँख बंद कर दीर्घ श्वास लें व छोड़ें, एक से दस तक गिनती करें, कुछ समय के लिए शांत रहने की कोशिश करें, किसी अच्छे मित्र से बात करें आदि.  तमाम शोध तथा सर्वेक्षण बताते हैं कि इन छोटे प्रयासों से गुस्से को नियंत्रित करना एवं इसके एकाधिक दुष्प्रभावों से बचना संभव हो जाता है. ऐसे, योग में कई आसन-प्राणायाम बताये गए हैं जिनके नियमित अभ्यास से गुस्से को काबू में रखना और उस विशिष्ट उर्जा को अपने व समाज के फायदे के लिए काम में लाना सहज हो जाता है. 
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं