Tuesday, September 8, 2015

आज की कविता : बंधक

                                                                           - मिलन  सिन्हा 
बंधक 
उसने 
अपने सारे संबंधों को 
बंधक रख दिया 
बदले में 
ढेर सारा धन जुटा लिया 
और 
उस धन से 
अनेक नश्वर वस्तुएं ले आया 
सुख के साधन मिल गए 
खुशी नहीं मिली 
समय ने करवट ली 
न अब इस घाट के रहे 
न उस घाट के।

              और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Tuesday, August 25, 2015

मोटिवेशन: सरल जीवन जीना आनंद का मार्ग

                                                           -मिलन  सिन्हा, मोटिवेशनल स्पीकर...
कहा जाता है कि सरल ही सुन्दर होता है और सर्वग्राही भी. सरल जीवन जीना आनंद का मार्ग है.  लियो  टॉलस्टॉय कहते हैं , ‘वहां कोई महानता –उत्कृष्टता नहीं हो सकती, जहां सरलता, अच्छाई और सच्चाई नहीं है.' जरा सोचिये, हम जो हैं, उसे हमसे बेहतर कौन जानता है. फिर भी हम जो नहीं हैं उसे दिखाने के चक्कर में स्वयं ही जीवन को सरल मार्ग से जटिलता की ओर ले जाते हैं. तभी तो  कन्फ़्यूशियस का कहना है, ‘जीवन वाकई सरल है, किन्तु हम इसे जटिल बनाने पर आमादा रहते हैं.’ 

एक कहावत भी हम सभी  वर्षों से सुनते आ रहे हैं, ‘सादा जीवन, उच्च विचार’. देश, विदेश से लेकर अपने आसपास भी कई लोग ऐसे मिल जाते हैं या जिन्हें हम जानते हैं  या जिनके विषय में हम पढ़ते हैं , जो इन बातों के ज्वलंत मिसाल रहे हैं . राष्ट्रपिता  महात्मा  गांधी  से लेकर प्रख्यात वैज्ञानिक अल्बर्ट आइन्स्टीन तक का जीवन देख लें. 

ऐसे भी, सरलता को छोड़कर  चाहे –अनचाहे  जटिलता को अपनाने में समय, उर्जा एवं  पैसे  की बर्बादी में कौन सी बुद्धिमानी है ? असहजता  और तनाव के  सीधे  रिश्ते से हम अपरिचित  भी तो नहीं हैं , क्यों ? 

उदारीकरण के वर्तमान दौर में जब चारों ओर बाजार का प्रभुत्व और जलवा दिखाई पड़ता है, जब विचारों से ज्यादा जानकारी को महत्व दिया जाता है, जब मशीनी श्रम  को मानव श्रम से ज्यादा तबज्जो देने का चलन  है, तब हमारे जैसे देश में समावेशी विकास के लिए इस कथन का विशेष अर्थ है. महात्मा गाँधी कहते हैं, ‘मनुष्य अपने विचारों से निर्मित प्राणी है. वह जो सोचता है, वही बन जाता है.' 

सोचने वाली बात तो है कि आखिर क्यों देश के आम लोग महात्मा गांधी, जयप्रकाश नारायण, विनोबा भावे या बाबा आम्टे जैसे लोगों को अपने सबसे लोकप्रिय नेताओं में गिनते हैं, जब कि वे न कभी मंत्री, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, राज्यपाल, उपराष्ट्रपति या  राष्ट्रपति रहे ? 

ऐसा इसलिए कि इन्होंने न केवल हमेशा विचार के स्तर पर विशिष्टता  प्रदर्शित की जो सर्वथा लोकहितकारी थी, बल्कि अपने  रोजमर्रा की जिंदगी में आचरण के स्तर पर सादगी, सरलता और सदाचार को अंगीकार किया. शानो –शौकत, तामझाम, आडम्बर आदि से इनका कोई रिश्ता नहीं रहा . लिहाजा, ऐसे आचरण वाले नेताओं का चरण स्पर्श करना भी सौभाग्य की बात मानी गयी. इन लोगों ने जहां भी काम किया, जिस वक्त भी काम किया, वहीं एक सकारात्मक परिवर्तन सुनिश्चित किया. इनका व्यवहार आम और खास के लिए अलग –अलग न होकर  एक रूप रहा. इसी  कारण ये निरंतर सबके प्रेरणास्रोत बने रहे . 

कहना न होगा, ऐसे लोग ही देश के लिए काम करने में खुशी महसूस करते हैं, जिसे सरदार पटेल इन शब्दों में व्यक्त करते हैं, ‘देश की  सेवा करने में जो मिठास है, वह और किसी चीज में नहीं.'  
    
                 और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं
# लोकप्रिय अखबार 'प्रभात खबर' में प्रकाशित 

Wednesday, August 12, 2015

आज की बात: 'अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस' - 'हमें रोजगार चाहिए'

                                     - मिलन  सिन्हा 
'अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस' के मौके पर  देश -विदेश के सभी युवाओं को हार्दिक शुभकामनाएं ! पढ़ें आगे ....  

....कहना न होगा, किसी देश का भविष्य तभी बेहतर हो सकता है, जब उस देश के युवाओं को बेहतर शिक्षा, ज्ञान , कौशल आदि  के आधार पर सहज व उपयुक्त  रोजगार उपलब्ध हों । लेकिन क्या हम अपने युवाओं के लिए ऐसा करना चाहते हैं और वाकई कर भी रहे हैं? आइये, देखें वस्तुस्थिति क्या है ?

हमारा देश विश्व का सबसे युवा देश  है । भारत दुनिया का ऐसा देश है, जहां युवाओं की संख्या सबसे अधिक है ।  2011 की जनगणना के अनुसार 15 से 29 वर्ष के आयु वर्ग के युवाओं के संख्या 33 करोड़ है, जो देश के कुल आबादी का 27.5 % है ।

गौरतलब  है कि जहां भारत में दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी रहती है , वहीँ यह भी एक कड़वा सच  है कि दुनिया में सबसे अधिक बेरोजगार युवा भी हमारे देश में हैं । इससे भी अधिक चिंताजनक विषय यह है कि युवाओं में जैसे-जैसे शिक्षा का स्तर बढ़ रहा है,  वैसे- वैसे ही बेरोजगारी की दर भी बढ़ रही है ।

 बिहार, उत्तर प्रदेश जैसे बड़े एवं  राजनीतिक रूप से ज्यादा संवेदनशील, लेकिन औद्योगिक रूप से पिछड़ते जा रहे  राज्यों में यह स्थिति और भी गंभीर है ।  फिर भी क्या इन प्रदेशों के राजनेताओं को वाकई इसकी चिंता है ?

राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण  संगठन द्वारा वर्ष 2009-10 के आंकड़ों के आधार पर जारी रपट के मुताबिक   ग्रामीण क्षेत्र के स्नातक डिग्रीधारी लड़कों  में बेरोजगारी दर 16.6 % और लड़कियों में 30.4 % रही । शहरी क्षेत्रों के ऐसे युवकों में यह  दर 13.8 % और युवतियों में 24.7 % दर्ज की गई । सेकेंडरी लेवल के सर्टिफिकेट धारक  ग्रामीण इलाके के युवकों में बेरोजगारी दर 5 % और लड़कियों  में करीब 7 %   रही, जबकि शहरी क्षेत्रों के युवकों में बेरोजगारी दर 5.9 % और महिलाओं में 20.5 % पाई गई ।

बहरहाल आशा करते हैं, 'जी डी पी' ग्रोथ के साथ रोजगार के अवसर में आने वाले महीनों में उत्साहवर्धक सुधार होंगे .

                  और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Tuesday, August 4, 2015

आज की कविता : मोक्ष का मजाक

                                                                                   - मिलन  सिन्हा 
Image result for free photo of persons with shackles, chainsहत्या के आरोप में 
गिरफ्तार 
एक कैदी को 
अपने पिता की मृत्यु पर 
मिलती है इजाजत अदालत से 
पिता के अन्तिम संस्कार हेतु 
आता है कैदी 
घेरे में पुलिस के 
बंधा हुआ मोटी रस्सी से 
देता है चिता को आग 
और 
पूरी करता है अन्य रस्में 
पिता के मोक्ष के लिए 
खुद घोर बंधन में जकड़े हुए !

                 और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Sunday, July 26, 2015

मोटिवेशन : प्रतियोगिता और पढ़ाई

                                                                                    - मिलन सिन्हा
clipप्रतियोगिता परीक्षाओं, खासकर नौकरी से संबंधित परीक्षाओं का रिजल्ट जब आता है, एक अजीब तरह का माहौल आसपास नजर आता है – कहीं ख़ुशी तो ज्यादा जगहों पर गम. कई बार सफल प्रतिभागी और विफल प्रतिभागी के बीच में प्राप्त अंकों का अंतर दशमलव में होता है, लेकिन सफल तो सफल है. चारों ओर उसी का गुणगान होता है. यह अकारण नहीं है. देश में बेरोजगारी की गंभीर समस्या के सन्दर्भ में युवाओं  के एक बड़े वर्ग के लिए  नौकरी पाना जीवन की  बड़ी उपलब्धि जो मानी जाती है. तभी तो बड़ी संख्या में लड़के-लड़कियां प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी में जुटे दिखाई पड़ते  हैं. बहरहाल, कई बार हम देखते हैं कि कमोबेश एक ही तरह के मेधा से लैस और सामान मेहनत करने वाले दो छात्रों में एक सफल हो जाता है, जब कि दूसरा काफी पीछे रह जाता है . देखने वाले सोचते हैं कि दोनों छात्रों ने जब बराबर ही मेहनत की है , दोनों ही पढ़ने में अच्छे रहे हैं, तो आखिर रिजल्ट में ऐसा फर्क कैसे रह गया ? वाकई फर्क पढ़ने के घंटे में नहीं, बल्कि तन्मयता से पढ़ने, पढ़ी हुई बातों को दिमाग में संजो कर रखने एवं परीक्षा में प्रश्नानुसार सही –सही उत्तर देने के बीच के बेहतर समन्वय –सामंजस्य में है . कहने का तात्पर्य यह कि अगर हमने किसी विषय विशेष के लिए 10 पेज पढ़ा , उतना ही समझ कर हम दिमाग में बिठा सके एवं परीक्षा के दौरान उससे संबंधित प्रश्नों का सही–सही उत्तर दे सके, तो उत्तम या अपेक्षित परिणाम न आने का सवाल ही नहीं है. लेकिन क्या ऐसा हो पाता है या होना संभव भी है ? आम तौर पर यह पाया जाता है कि पढ़ने, दिमाग में रख पाने तथा इम्तहान में उसका उपयोग करने का अनुपात 10 : 6 : 3 होता है. अर्थात पढ़ा तो दस पेज, दिमाग में रहा छः पेज, परन्तु उपयोग हो पाया मात्र तीन पेज. अच्छे विद्यार्थी इस अनुपात को बेहतर बनाकर  10 : 8 : 6 या उससे भी ऊपर तक ले जाने की निरंतर कोशिश करते हैं . इसके लिए वे लोग पूरे मनोयोग से पढ़ते हैं, समझते हैं, दोहराते हैं, अच्छी तरह ग्रहण करते हैं और फिर परीक्षा में उसका  यथोचित उपयोग करने में सक्षम हो पाते हैं. वे दूसरे विद्यार्थी के तरह रोजाना पढ़ते तो 8 -10 घंटा ही हैं, लेकिन वे पढ़ते हैं योजनाबद्ध तरीके से जिसमें खाने, सोने आदि को भी पर्याप्त तबज्जो दी जाती है.  ऐसे विद्यार्थी न केवल समय प्रबंधन में कुशल होते हैं, बल्कि आत्मविश्वास से भी भरे होते हैं. 

                    और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

Sunday, July 19, 2015

मोटिवेशन : जानकार एवं जागरूक बनें

                                                                                            - मिलन सिन्हा
clip2011 के जनगणना के मुताबिक देश में साक्षर लोगों की संख्या में 9.2 % की वृद्धि दर्ज की गई. वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार यह आंकड़ा कुल जनसंख्या का  64.84 % था तो 2011  में बढ़कर 74.04 % हो गया . निश्चय ही यह देश में शिक्षा के क्षेत्र में हो रही प्रगति का सूचक है. लोग निरंतर साक्षर  व  शिक्षित बनें, यह लोकतान्त्रिक ढांचे को मजबूत बनाए रखने के लिए अनिवार्य  माना जाता है. लेकिन क्या साक्षर, शिक्षित या प्रशिक्षित  होने मात्र से हम स्वतः ही जानकार एवं जागरूक भी माने जायेंगे  या सही मायने में जानकार  तथा जागरूक होना इसके आगे की बड़ी और ज्यादा महत्वपूर्ण सीढ़ी है जिसके माध्यम से हम अच्छे–बुरे की समझदारी से लैस होकर अपने और अपने परिवार –समाज की बेहतरी के लिए काम करते हैं . मसलन,  सिगरेट, गुटखा, खैनी , शराब आदि हमारे स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक हैं , तथापि हममें से अनेक, पढ़े –लिखे होने के बावजूद  इनका सेवन करते रहते हैं क्योंकि हम  इनसे होने वाले दुष्परिणामों के प्रति पूर्णतः जागरूक नहीं हैं . देश में जानलेवा बीमारियों जैसे कैंसर, ह्रदय रोग, गुर्दे की बीमारी आदि से बहुत हद तक बचे रहने के एकाधिक उपाय हैं जो जीवनशैली में अपेक्षित सुधार या बदलाव से संभव हो सकता है और अगर किसी कारण हम ऐसी बीमारी के शिकार हो भी जाते हैं , तब भी ऐसे रोगों के इलाज की व्यवस्था पहले की तुलना में कहीं ज्यादा सुलभ है, बेशक सरकारी एवं प्राइवेट अस्पतालों में खर्च में भारी अंतर है, लेकिन पर्याप्त जागरूकता के अभाव में हम इन सुविधाओं का भरपूर फायदा उठाने से वंचित रह जाते हैं . एम्स, दिल्ली के कैंसर रोग विशेषज्ञ  डॉ. रथ ने हाल ही में एक टीवी प्रोग्राम में इस बात को बखूबी रेखांकित किया . उन्होंने कहा कि कैंसर के ‘स्टेज –वन’ यानी प्रारंभिक अवस्था वाले मरीज के समुचित इलाज के उपरान्त पूर्णतः ठीक होने की संभावना 80 %  होती है. जब कि ‘स्टेज –टू’  यानी इलाज में देरी से  रोग के पुराने व गंभीर अवस्था में पहुंचने के कारण सुमिचित इलाज के बाद भी रोगी के अच्छे होने की संभावना केवल 20 % रह जाती है. कमोबेश ऐसे ही परिणाम अन्य गंभीर रोगों के मामले में भी सामने आते हैं. अतः आवश्यकता इस बात की है कि जीवन की इस खट्टी–मीठी लम्बी यात्रा में हम हर मामले में जानकार एवं जागरूक बनें और अपने आसपास के लोगों को भी इसके लिए प्रोत्साहित एवं प्रेरित करते रहें.

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Saturday, July 11, 2015

मोटिवेशन : जिम्मेवारी की बात

                                                                         - मिलन सिन्हा 
clipहर घर में उस दिन हर्ष और उल्लास का माहौल होता है जिस दिन बच्चा अपने पैरों पर पहली बार चलता है, बेशक लड़खड़ाते हुए बस दो कदम ही क्यों न हो . उससे पहले कई दिनों तक उसे हाथ या अंगुली पकड़ कर चलने को प्रेरित करने की प्रक्रिया सुबह –शाम चलती है. इस क्रम में उत्साहवश  कई बार बच्चा स्वयं खड़ा होने व चलने का प्रयत्न करता है . वह गिरता है, उठता है , फिर चलने की कोशिश करता है और अंततः चल भी पड़ता है . लेकिन कई बार ऐसा भी देखने में आता है कि कमोवेश एक जैसी परिस्थिति में एक ही उम्र के  बच्चे अलग –अलग समय पर चलना शुरू करते हैं, कोई पहले, कोई बाद में और कई तो काफी देर से , जब कि सबके माता –पिता अपने बच्चे को यथासमय चलते हुए देखना चाहते हैं . इसके एक नहीं, कई कारण होते हैं , किन्तु एक सामान्य पर बड़ा कारण यह होता है कि आप अपने बच्चे को इस जिम्मेदारी के लिए कैसे प्रेरित एवं तैयार कर रहे हैं . यही बात घर–दफ्तर प्रत्येक जगह लागू होती है . 

सच पूछें तो जिम्मेदारी देने से सिर्फ बात नहीं बनती, अपितु हमें उस व्यक्ति को जिम्मेदारी के लायक भी बनाना पड़ता है .कई बार यह भी होता है कि व्यक्ति जिम्मेदारी के लायक तो होता है, परन्तु उसे जिम्मेदारी दी नहीं जाती, जिससे उसके अंदर कुंठा और हीन भावना घर करने लगती है. इससे उस व्यक्ति के  आत्म विश्वास, प्रतिबद्धता, कार्य क्षमता आदि पर नकारात्मक असर पड़ता है . 

सर्वमान्य तथ्य यह  है  कि मनुष्य मात्र में जिम्मेदारी लेने की स्वभाविक प्रवृति होती है. वह  दुनिया के सामने यह साबित करना चाहता है कि वह भी उस कार्य के लायक है. और फिर मौका दिए जाने पर व्यक्ति पूरे लगन, उत्साह और उर्जा के साथ अपेक्षा से कहीं बेहतर परिणाम देने की भरपूर कोशिश करता है .  इस क्रम में उस व्यक्ति की सृजनशीलता रंग दिखाती है, उसका काम के प्रति लगाव बढ़ता है और साथ ही अपने सहकर्मियों तथा उस संस्था से जुड़ाव भी. कहते हैं न कि जिस  आदमी को अपनी जिम्मेदारियों का एहसास हो गया, वह जीवन में कुछ आगे बढ़ गया, घर-समाज के लिए कुछ बेहतर करने लायक बन गया. 

यही कारण है कि अच्छी  संस्थाएं अपने कर्मचारियों का नियमित आकलन करती है एवं उन्हें सतत प्रेरित करते हुए जिम्मेदारी लेने लायक बनाती है. इतना ही नहीं, जिम्मेदारी देने के बाद एक मार्गदर्शक की भूमिका का बखूबी निर्वहन भी करती हैं .
                 और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं