Tuesday, January 21, 2020

"ना" कहना भी है एक कला

                                                       - मिलन  सिन्हा,  मोटिवेशनल स्पीकर... .... 
ना सुनना शायद ही किसी को अच्छा लगता है.  दरअसल, सामनेवाले  के मुंह से हां या 'यस सर' सुनना आम तौर पर सबको अच्छा लगता है. विद्यार्थियों को भी घर-बाहर हर जगह हां ही सुनना पसंद है, भले ही वह सच न हो. थोड़ा ठहर कर सोचने पर अटपटा लगता है  कि हर मुद्दे पर सहमति में हां कहना कैसे संभव है? फिर, सिर्फ हां कह देने मात्र से बात बन जाती है या उस हां के अनुरूप अपेक्षित कार्य को  अंजाम देना मुख्य उद्देश्य होता है? अधिकतर मामलों में हम पाते हैं कि छात्र-छात्राएं 'ऑल प्लीज एटीट्यूड' अथवा 'फियर साइकोसिस' के तहत 'यस सर' का सहारा लेते हैं. ऐसी स्थिति में कमिटमेंट पूरा नहीं होने पर अनावश्यक मानसिक द्वन्द या तनाव, विश्वसनीयता  का संकट, वादाखिलाफी के आरोप आदि से जूझना पड़ता है.

महात्मा गांधी ने कहा है, 'शुद्ध अंतःकरण एवं  प्रतिबद्धता से बोला गया एक स्पष्ट 'ना'  उस 'हां' के वनिस्पत कहीं ज्यादा अच्छा है जो महज दूसरे को खुश करने या किसी समस्या से तात्कालिक निजात पाने के लिए किया जाता है.' गांधी जी के इस विचार के तराजू पर अगर कोई भी विद्यार्थी  खुद को और अपने दोस्तों-सहपाठियों को तौले तो बहुत सारे कटु सत्य सामने आ जायेंगे. सोचिए, आपने अब तक कितनी बार अपने आसपास के लोगों से हां सिर्फ इसलिए कहा होगा  कि वे तात्कालिक रूप से वे आश्वस्त हो जाएं और अच्छा फील करें. लेकिन कभी आपने इस पर गंभीरता से विचार किया है कि जब उन लोगों की आशा-अपेक्षा आपके हां के अनुरूप पूरी नहीं हुई होगी तो उनका आपके प्रति विचार या मंतव्य कैसा रहा होगा. क्या उनकी नजरों में आप एक भरोसेमंद  विद्यार्थी या इंसान माने जायेंगे?

विद्यार्थी अपने आसपास गौर से देखेंगे तो पायेंगे कि कई साथी-सहपाठी, रिश्तेदार या कई बड़े अधिकारी-नेता लोगों को मात्र खुश करने या टरकाने-टहलाने या भ्रम में रखने के लिए हां कहकर अनावश्यक रूप से ओवर कमिटमेंट के जाल में स्वतः फंस जाते हैं. फिर एक झूठ को छुपाने के लिए सौ झूठ बोलने वाली कहावत को वास्तव में जीने लगते हैं. और  आज नहीं तो कल जब झूठ का भांडा फूटता है तब वे न घर के रहते हैं न घाट के. दसाधिक सर्वेक्षणों में यह पाया गया है कि कई छात्र-छात्राएं अपने अभिभावक, शिक्षक या  बड़े-बुजुर्ग के दवाब में कोई कोर्स ज्वाइन कर लेते हैं जहां उनका मन नहीं होता है. सही समय पर पूरी शालीनता व दृढ़ता से तर्क और तथ्य के आधार पर ना कह देने से भविष्य में होनेवाली अनेक समस्याओं से बचा जा सकता है. कहने का तात्पर्य यह कि जहां एक ना से काम आसान हो सकता है, वहां हां रूपी झूठ बोलकर खुद के लिए समस्या मोल लेना कहां की बुद्धिमानी है? सच तो यह है कि आप तो अच्छी तरह जानते हैं कि ना की जगह हां कह कर आपने दूसरे को थोड़ी देर के लिए खुश तो कर दिया, पर आपकी परेशानी का आरम्भ वहीँ  से हो गया. इसके चलते आप सोच और कार्य के स्तर पर जटिलता की राह पर चल पड़ते हैं जहां सफलता, स्वास्थ्य, सुख और शांति से कम या ज्यादा समझौता अनिवार्य हो जाता है. 
    
दरअसल हां कहने का सीधा मतलब है कि जो वादा किया है उसे तो जरुर निभाएंगे. मेरा तो स्पष्ट मत है कि हर विद्यार्थी को ना बोलने की कला में माहिर होना चाहिए. इससे वे कहीं भी अपनी बात या पक्ष दृढ़ता से रखने में सक्षम हो पायेंगे. विद्यार्थियों के लिए यह अच्छी तरह जानना-समझना बहुत लाभप्रद है कि जीवन एक खूबसूरत, लेकिन चुनौतियों से भरी लम्बी यात्रा है, जिसमें सहजता-सरलता से जीने के लिए हां और ना का सदुपयोग करते रहना है. जरुरतमंदों की मदद करना बहुत अच्छी बात है लेकिन सिर्फ बातों या वादों से नहीं, बल्कि उसके अनुरूप कार्य निष्पादन से. इससे ना कहने पर भी अगले को बुरा नहीं लगता और वे आपसे नाराज नहीं होते. दूसरे, आपको भी उन कार्यों को करने का समय मिलता है, जिसके लिए आपने हां बोला है, चाहे वह किसी दोस्त या सहपाठी को परीक्षा से पहले तैयारी में मदद करने की बात हो, दोस्त या  किसी परिजन की शादी में शिरकत करने की बात हो या ब्लड डोनेशन कैंप में सक्रियता से शामिल होने की बात. विश्वविख्यात एप्पल कंपनी के सह-संस्थापक स्टीव जॉब्स भी कहते हैं, "कुछ कार्यों या लोगों को ना बोलकर ही हम उन कार्यों पर अपना ध्यान केन्द्रित कर सकते हैं जो वाकई बहुत महत्वपूर्ण हैं." सार-संक्षेप यह कि  किसी को एकदम से  ना कहना आसान नहीं होता, पर ना कहना कोई गुनाह भी तो नहीं. हां, ना कहना निश्चित रूप से एक अदभुत कला है और देखा गया है कि जो लोग इस  कला में पारंगत हो जाते हैं वे ना कहकर भी लोगों के बीच लोकप्रिय बने रहते हैं,  क्यों कि ऐसे लोग अमूमन हां और ना की मर्यादा को बखूबी निभाना जानते हैं. 
(hellomilansinha@gmail.com) 

                 
                और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं 

# लोकप्रिय साप्ताहिक "युगवार्ता" के 17.11.2019 अंक में प्रकाशित
#For Motivational Articles in English, pl. visit my site : www.milanksinha.com  

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