Saturday, December 3, 2016

यात्रा के रंग : अब पुरी की ओर -1

                                                                                      - मिलन सिन्हा 

कई सालों की इच्छा और अनेक बार बनाए गए कार्यक्रम को  साकार करने का दिन था. देश के एक प्रसिद्ध धार्मिक–आध्यात्मिक के साथ–साथ एक बेहद लोकप्रिय पर्यटन स्थल ‘पुरी’ प्रस्थान के लिए घर से निकला. ऑटो से हमें  हटिया स्टेशन जाना था. बताते चलें कि झारखण्ड की राजधानी रांची शहर में दो रेलवे स्टेशन है, एक रांची और दूसरा हटिया. दक्षिण पूर्व रेलवे के इस महत्वपूर्ण स्टेशन से रोजाना दर्जनों ट्रेनों का आना-जाना है. खैर, ऑटो से हम चल पड़े. घर से हटिया स्टेशन करीब पांच किलोमीटर होगा. रास्ते में कई चौराहे आते हैं. हर चौराहे पर ट्रैफिक पुलिस आवागमन को सुचारू बनाए रखने के लिए तैनात रहती है. रांची की सड़कें ठीक-ठाक हैं, चौड़ी भी हैं, लेकिन कई स्थानों में अतिक्रमण का असर साफ दिखता है, हाई कोर्ट तक ने इस पर एकाधिक बार नाराजगी जताई है. सड़क पर हर तरह के वाहनों – साइकिल, मोटरसाइकिल, स्कूटर, रिक्शा, ठेला, ऑटो, कार, सिटी बस, स्कूल बस आदि की संख्या बढ़ती आबादी और अति सुलभ बैंक लोन (ऋण) के कारण निरंतर बढ़ती जा रही है. ट्रैफिक नियमों के अनुपालन में सुधार की बड़ी गुंजाइश तो है ही. ऐसी परिस्थिति में घर से स्टेशन पहुंचने के लिए सामान्य यात्रा समय से एक घंटे का मार्जिन लेकर चलने के बावजूद हम लोग ट्रेन खुलने से मात्र पांच मिनट पहले हटिया स्टेशन पहुंच सके, वह भी तब जब ऑटो चालक ने ज्यादा भीड़ वाले एक-दो चौराहे से पहले ही गलियों के रास्ते गाड़ी निकालने की बुद्धि लगाईं.    

वहां पहुँचते ही जाने क्यों स्मृति के एक कोने से गाने की ये पंक्तियां सुनाई देने लगी, गाड़ी बुला रही है, सीटी बजा रही है .... जल्दी से एक नंबर प्लेटफार्म पर पहुंचा. डिब्बे में सामान रखा. तपस्वनी एक्सप्रेस ट्रेन, जो अपराह्न 4 बजे हटिया से रवाना होकर अगले दिन सुबह 7.15 बजे पुरी स्टेशन पहुँचती है, समय से खुल गयी. 

कम समय में ही जितना देख पाया, हटिया स्टेशन परिसर की सफाई बेहतर लगी. सूटकेस –बैग आदि को ठीक से रखने और अपनी सीट पर इत्मीनान से बैठने के कुछ देर बाद डिब्बे का मुआयना कर लिया. सफाई सहित अन्य बातें भी संतोषप्रद थीं. 

अमूमन ट्रेन के सामान्य आरक्षित डिब्बे के एक खाने में आठ लोगों के शयन हेतु शायिका की व्यवस्था होती है. हम जहाँ बैठे थे वहां गाड़ी खुलते वक्त 6 लोग आ चुके थे. आपसी वार्तालाप में पता चला कि उनमें जो दो लड़के थे, वे भुवनेश्वर तक जायेंगे और हमारे अलावे एक अल्पवय दंपति पुरी तक. गाड़ी के रफ़्तार पकड़ते ही चाय, समोसा, चना, चिप्प्स आदि बेचने वाले आने-जाने लगे, अलग-अलग स्वर व अंदाज में आवाज लगाने लगे. ट्रेन यात्रा में ऐसे खाने –पीने का सामान बेचने वाले अगर न हो तो यात्रा कैसी होगी, ऐसा हमने कभी सोचा भी है ? शायद कई लोगों को भूखे-प्यासे ही सोना पड़े, जीभ जैसे संवेदनशील अंग को तरसते-तड़पते कई घंटे गुजारने पड़े, स्वरोजगार के मार्फ़त अपने और अपने परिवार का लालन-पालन करनेवाले अनेक लोगों को बेकार-बेजार रहना पड़े, अनेक पुलिसवाले और रेल कर्मियों को खाने-पीने के लिए अपनी जेब ढीली करने पड़े.... 

खैर, जैसे हमें उनकी जरुरत है, वैसे ही उन्हें हमारी जरुरत होती है. माने-न-माने दिलचस्प पहलू यह भी है कि क्रेता-बिक्रेता का यह अस्थायी संबंध हमारी यात्रा में हमें जाने-अनजाने जीवन के कितने अनछुए पहलुओं से परिचित  करवाता है, हमारे जीवन को थोड़ा और सक्रिय कर जाता है – सोच व भावनाओं के स्तर पर ही सही.  ... ....आगे जारी 
                                                                   (hellomilansinha@gmail.com)

               और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं    

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