Saturday, December 3, 2016

यात्रा के रंग : अब पुरी की ओर -1

                                                                                      - मिलन सिन्हा 
कई सालों की इच्छा और अनेक बार बनाए गए कार्यक्रम को साकार करने का दिन था. देश के एक बेहद प्रसिद्ध धार्मिक–आध्यत्मिक के साथ–साथ एक बेहद लोकप्रिय पर्यटन स्थल ‘पुरी’ प्रस्थान के लिए घर से निकला. तपस्वनी एक्सप्रेस ट्रेन, जो अपराह्न 4 बजे हटिया (रांची) से रवाना होकर अगले दिन सुबह 7.15 बजे पुरी स्टेशन पहुँचती है, समय से खुल गयी. हटिया स्टेशन परिसर की सफाई बेहतर लगी और ट्रेन के अन्दर की भी.

अमूमन ट्रेन के सामन्य आरक्षित डिब्बे के एक खाने में आठ लोगों के शयन हेतु शायिका की व्यवस्था होती है. हम जहाँ बैठे थे वहां गाड़ी खुलते वक्त 6 लोग आ चुके थे. आपसी वार्तालाप में पता चला कि उनमें जो दो लड़के थे, वे भुवनेश्वर तक जायेंगे और हमारे अलावे एक अल्पवय दंपति पुरी तक. गाड़ी के रफ़्तार पकड़ते ही चाय, समोसा, चना, चिप्प्स आदि बेचने वाले आने-जाने लगे, अलग-अलग स्वर व अंदाज में आवाज लगाने लगे. 

ट्रेन यात्रा में ऐसे खाने –पीने का सामान बेचने वाले अगर न हो तो यात्रा कैसी होगी, ऐसा हमने कभी सोचा भी है ? शायद कई लोगों को भूखे-प्यासे ही सोना पड़े, जीभ जैसे संवेदनशील अंग को तरसते-तड़पते कई घंटे गुजारने पड़े, स्वरोजगार के मार्फ़त अपने और अपने परिवार का लालन-पालन करनेवाले अनेक लोगों को बेकार-बेजार रहना पड़े, अनेक पुलिसवाले और रेल कर्मियों को खाने-पीने के लिए अपनी जेब ढीली करने पड़े.... 

खैर, जैसे हमें उनकी जरुरत है, वैसे ही उन्हें हमारी जरुरत होती है. माने-न-माने दिलचस्प पहलू यह भी है कि क्रेता-बिक्रेता का यह अस्थायी संबंध हमारी यात्रा में हमें जाने-अनजाने कितने ही अनुभवों से रूबरू करवाता है, हमारे जीवन को थोड़ा और सक्रिय कर जाता है – सोच व भावनाओं के स्तर पर ही सही. 

करीब तीन घंटे के बाद एक बड़े स्टेशन पर गाड़ी रुकी और डिब्बे में हलचल हुई. कुछ लोग उतरे, कुछ लोग सवार हुए. नीचे उतरा. यह राउरकेला स्टेशन था. वही राउरकेला जो अन्य बातों के अलावे देश के एक बड़े स्टील प्लांट के लिए जाना जाता है. रात हो चुकी थी. प्लेटफार्म बिलकुल साफ़ –सुथरा एवं रोशनी में नहाया हुआ. स्टेशन के दूसरे प्लेटफार्म पर नजर गयी तो वहां भी वैसा ही दृश्य. इन दिनों रेल यात्रा के बेहतर होने, रेल परिचालन एवं व्यवस्था में बेहतरी की बात सुनने को तो मिल ही रहे थे, आज देखा तो यकीन हो गया. उम्मीद है, आनेवाले दिनों में यह सिलसिला और सुदृढ़ होगा, क्यों कि उत्कृष्टता कोई मंजिल तो है नहीं, यह भी एक यात्रा ही तो है !


गाड़ी चल पड़ी. लौटा तो पाया कि इस बीच हमारे पास के दो शायिकाओं में ट्रेन में यात्रा के दौरान रात गुजारने दो यात्री आ गए थे. पूछा उनसे तो पता चला कि वे लोग भुवनेश्वर जा रहे है, एक ऑफिसियल मीटिंग में भाग लेने. उनके बीच कामकाजी बातचीत चल पड़ी. एक ने कहा कि उनके बॉस एक काम ख़त्म होने से पहले ही दूसरे काम के लिए अनावश्यक दवाब बनाना शुरू कर देते हैं. ऑफिस समय के बाद वजह-बेवजह डांट–फटकार करते हैं, नौकरी से निकालने की धमकी देते हैं. दूसरा व्यक्ति बीच-बीच में उसे प्रैक्टिकल बनने, बॉस को मैनेज करने, थोड़ा चालाक बनने की सलाह दे रहा था, जिसे उसका साथी यह कह कर नकार रहा था कि जब मै पूरी तन्मयता और ईमानदारी से काम कर रहा हूँ, तो गलत हथकंडे क्यों अपनाऊं? कहने की जरुरत नहीं कि देश –विदेश में खासकर कॉरपोरेट जगत में कार्यरत लाखों अच्छे व सच्चे युवा कर्मियों के लिए यह  मानसिक तनाव का बड़ा कारण रहा है. इतना ही नहीं, कई मायनों में समाज के हर संवेदनशील व्यक्ति के लिए यह एक गंभीर विचारणीय विषय था, है और रहेगा.

नौ बजने को थे. सबने खाने का उपक्रम शुरू किया, सिवाय एक यात्री के. खाना शुरू करने से पहले मैंने पूछा, तो उन्होंने  बताया कि उनका पेट गड़बड़ है. दिन में कुछ ऐसा-वैसा खा लिया था, सो अब उपवास. दवाई है, जरुरत होगी तो ले लेंगे. कहते हैं, उपवास भी पारम्परिक चिकित्सा पद्धति के अनुसार एक प्रकार का उपचार ही है. शायद तभी भारतीय जीवन पद्धति में उपवास को स्वास्थ्य प्रबंधन का एक अहम हिस्सा माना जाता रहा है.

बहरहाल, अपने-अपने बर्थ पर लेटने के बाद भी बॉस प्रकरण पर कुछ देर तक उन दोनों के बीच चर्चा चलती रही, साथ में सहमति-असहमति का सिलसिला भी. उसी विषय पर विचार एवं समाधान मंथन के क्रम में मैं भी काफी वक्त तक जगा रहा. उस बीच वे लोग सो चुके थे, जिसका पता उनके खर्राटों से चल रहा था. बत्ती बुझा कर मैं भी सो गया. 
                                                                    (hellomilansinha@gmail.com)

               और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं    

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