Sunday, November 1, 2015

आखिर इतने कम मतदान प्रतिशत के क्या मायने हैं ?

                                                    -    मिलन  सिन्हा
बिहार के सभी दलों के नेता तथा  बिहार से बाहर बैठे अधिकांश समाज विज्ञानी व कुछ बड़े पत्रकार यह कहते रहे हैं कि बिहार के वोटर राजनीतिक रूप से बड़े परिपक्व हैं; उनकी सूझ-बूझ का कोई जोड़ नहीं, वे बेशक कम पढ़े-लिखे हो सकते हैं, पर हैं बहुत बुद्धिमान आदि,आदि. अगर ऐसा है तो फिर क्या कारण है कि इतने परिपक्व व समझदार आम बिहारी मतदाता मतदान के दिन मतदान केन्द्रों पर बड़ी संख्या में नहीं पहुँचते? पिछले तीन चरण के मतदान में वोट प्रतिशत 60 % (पहले चरण में 57%, दूसरे में 55%,  तीसरे में 53 % और चौथे चरण में करीब 58 % ) से भी नीचे क्यों रह गया ? क्या उनमें लोकतंत्र में चुनाव की महत्ता की समझ कम है या उनमें इसके प्रति जागरूकता का अभाव है या चुनावी राजनीति से उनका मोह्भंग हो रहा है या बिहार में राजनीतिक दल वोटरों को जाने-अनजाने कारणों से मतदान केन्द्रों तक लाने के लिए प्रोत्साहित करने में रूचि नहीं रखते हैं

कुछ तो गड़बड़ है, नहीं तो कोई कारण नहीं कि पिछले विधानसभा चुनाव,2010 में भी वोट का प्रतिशत मात्र 52.73 % रह जाय ! अर्थात 47.27% मतदाताओं ने किसी को भी अपना वोट नहीं दिया. इस तरह  लोकतंत्र कैसे मजबूत हो सकता है, क्यों कि 47.27% मतदाताओं की अपना विधायक चुनने में कोई भागीदारी ही नहीं रही.

क्या पिछले पांच वर्षों में प्रदेश की सरकार, केन्द्र की सरकार, प्रदेश के राजनीतिक दल व उनके छोटे- बड़े नेता और सबसे ऊपर निर्वाचन आयोग ने वोटिंग प्रतिशत को कम-से-कम 80% करने हेतु कोई गंभीर कदम उठाये, कोई नायाब पहल की ? अगर हाँ, तो उसका असर अब तक के तीन चरणों के मतदान में क्यों नहीं दिखा ? और अगर नहीं, तो क्यों ? फिर तो यह सवाल जायज है कि इस तरह के चुनाव की सार्थकता क्या है ?


एक और विचारणीय प्रश्न ! ज्ञातव्य है कि 2010 के चुनाव में बिहार विधान सभा के 243 सीटों के लिए 3523 प्रत्याशियों ने चुनाव लड़ा, जिसमें 3019 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गयी. जाहिर है कि  243 सीटों के लिए केवल 504 प्रत्याशियों को ही मतदाताओं ने गंभीरता से लिया. स्पष्टतः लगभग हर सीट पर सीधा मुकाबला था. क्या चुनाव आयोग ने इस बात का नोटिस लिया और इस चुनाव से पहले जमानत राशि में यथोचित वृद्धि करने सहित अन्य प्रभावी कदम उठाये जिससे विकास के लिए अपर्याप्त संसाधनों का रोना रोने वाले प्रदेश-देश में चुनावों को कम खर्चीला बनाया जा सके
(सन्दर्भ : बिहार विधानसभा चुनाव, 2015)

                  और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं

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