Friday, September 18, 2015

आओ, 'डीएनए - डीएनए' खेलें और बुनियादी मुद्दों को नेपथ्य में ठेलें

                                                                                           - मिलन  सिन्हा 
bihar

बिहार के सत्तासीन नेताओं को आजकल नींद नहीं आ रही है, कारण उनका स्वाभिमान आसन्न चुनाव से पहले अबूझ कारणों से लाखों गुना बढ़ गया प्रतीत होता है और उससे भी कहीं ज्यादा जागृत हो कर उन्हें परेशान (?) कर रहा है. कारण, कोई उन्हें आईना दिखाने की जुर्रत (?) करता है, जिसमें उन्हें उनके ( राजनीतिक नेताओं ) द्वारा आजादी के 68 साल तक शासित बिहार का वह  चेहरा दिखाई पड़ रहा है, जहां भूख है, बीमारी है, बेरोजगारी है, शोषण है, कुपोषण है ; जहां राजनीतिक सादगी व शिष्टाचार कम और  आडम्बर, दिखावा, बयानबाजी व भ्रष्टाचार ज्यादा है .  बहरहाल, ‘डी एन ए ’ पर  ऊँचा बोलने वाले ये नेता यह बता भी पायेंगे कि इनकी पार्टी के कितने बड़े नेताओं तक को  ‘डी एन ए ’ का फूल फॉर्म मालूम है और जिनको मालूम है वे क्या बताएंगे कि वैज्ञानिक दृष्टि से सभी बिहारियों  का ‘डी एन ए ’ एक कैसे हो सकता है. फिर सवाल तो पूछना वाजिब है कि जिस स्वाभिमान को मुद्दा बनाने की कोशिश करके ऐसे लोग बिहार में चुनाव से पहले राजनीति का तापमान बढ़ाये रखना चाहते हैं, उनका वह बिहारी स्वाभिमान तब कहाँ चला जाता है, जब यह तथ्य सामने आता है कि स्वतंत्रता के 68 वर्षों बाद भी बिहार में साक्षरता दर मात्र 63 % है जो कि देश में सबसे कम है  या बिहार के 77 % परिवारों को शौचालय की सुविधा तक उपलब्ध नहीं है या बिहार से रोजगार की तलाश में उन्नत प्रदेशों में जाने वालों की संख्या सर्वाधिक है .

दरअसल, राज्य में अधिकांश किसान कृषक मजदूर हैं, लेकिन उनका यह दुर्भाग्य रहा है कि भूमि सुधार के लिए योजनाएं बनने के बावजूद उनपर सख्ती से अमल नहीं हो पाया । यहाँ भी एक हद तक भू -हदबंदी एवं भूदान के द्वारा खेत मजदूरों को जमीन देने का ढोल वर्षों से पीटा जाता रहा । ऊपर से गांव के सम्पन्न व उच्च जाति के भूस्वामियों द्वारा गरीब - दलितों पर किये जा रहे अत्याचार -अन्याय में कोई गुणात्मक बदलाव नहीं आया जिसके फलस्वरूप भूस्वामी एवं भूमिहीन के बीच सामजिक तनाव व हिंसक संघर्ष की स्थिति किसी न किसी रूप में बनी रही । 

एक और विचारणीय सवाल । बिहार में पानी की बहुलता तो है, पर जल प्रबंधन की समुचित योजना के अभाव में कहीं बाढ़ तो कहीं सूखे की स्थिति बनी रहती है । दूसरी ओर, बीज, खाद आदि मंहगे होते रहने के कारण कृषि उत्पादन लागत बहुत बढ़ गया है, बावजूद इसके फसल को बाजार तक ले जाकर बेचने में बिचौलियों की सेंधमारी भी कायम है । फलतः  किसानों को खेती से पर्याप्त आय तो होती नहीं है, पानी के बंटवारे आदि को लेकर भी मारपीट व हिंसक झड़प  होती रहती है । ऐसी विषम परिस्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब गांव के पढ़े -लिखे नौजवान साल -दर -साल बेरोजगार रहते हैं । जहाँ तक कानून के सामने सबकी समानता के सिद्धांत का प्रश्न है, प्रशासन इसकी दुहाई तो देती है पर जमीनी हकीकत अभी भी भिन्न है । 

आजादी के 68  साल बाद भी जिसमें वर्त्तमान  सरकार  के 120  महीने का शासन भी शामिल है, आम जनता को लगता है कि यहाँ गरीबों, दलितों, शोषितों के लिए अलग क़ानून है तो अमीर, शक्तिशाली, ओहदेदार, रंगदार के लिए अलग क़ानून । हिंसा के बढ़ते जाने का यह एक प्रमुख कारण है  और  मनरेगा  आदि  के तहत रोजगार के कुछ अवसर बढ़ने के बाद भी  गांवों से मजदूरों एवं मजबूरों के पलायन का भी । 

चुनाव प्रचार के दौरान इन मुद्दों पर सार्थक चर्चा होती रहे, तभी बिहार और बिहारियों का सही हित साधन होगा .

                  और भी बातें करेंगे, चलते-चलते । असीम शुभकामनाएं      

#  प्रवक्ता . कॉम पर प्रकाशित, दिनांक :18.09.2015

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